Monday, December 5, 2011

दिलो-दिमाग़ की बातें

पिछली कड़ी-आखिर क्या है सौहार्द्र?Heart

फ़ा रसी ने कुछ ऐसे नायाब शब्द हिन्दी को दिए हैं कि जिनके बिना दिल की बात ज़ुबाँ पर आनी मुश्किल होती है। अब देखिए, इस दिल को ही लीजिए, दिल यानी हृदय। दिल से जुड़ी कितनी ही बातें मुहावरों की शक्ल में आज विभिन्न भाषाओं में समायी हैं। मराठी के दिलगीर शब्द से हिन्दी वाले अपरिचित हैं, मगर मूलतः मराठी में इसकी आमद फ़ारसी से ही हुई है। दिलगीर यानी दुखी, शोकाकूल, शोक-संतप्त आदि। दिलगीर का एक अन्य अर्थ खेद प्रकट करने वाला या पश्चाताप जताने वाला भी होता है। दिलफ़रेब, दिलरुबा, दिलबर, दिलकश, दिलेर, दिलावर, दिलवाला, दिलदार, दिलखुश, दिलचस्प जैसे न जाने कितने शब्दों का रोज़ बोलचाल में इस्तेमाल होता है। दिल से जो अभिव्यक्ति और लालित्य पैदा होता है, वह बात हृदय से नहीं आती। हिन्दी में आमतौर पर हृदय शब्द का प्रयोग अब शरीर के अंग की तरह चिकित्सकीय आशय में होता है। इस सन्दर्भ में हृदय-रोग, हृदय-रोगी आम शब्द हैं। यही हाल अंग्रेजी के हार्ट शब्द का है। हार्ट-प्रॉब्लम, हार्ट-पेशेन्ट जैसे शब्द आमतौर पर हिन्दी में प्रचलित हैं। दूसरी ओर दिल की अर्थवत्ता व्यापक है। शरीरांग के रूप में भी दिल शब्द का प्रयोग होता है, जैसे-दिल में छेद होना। मगर किसी को दिल का रोगी कहने के पीछे अक्सर हृदयरोगी का आशय नहीं होता बल्कि आशिक माशूक वाली बात होती है। किसी को दिल का रोगी कहने के पीछे अक्सर हृदयरोगी का आशय नहीं होता बल्कि आशिक माशूक वाली बात होती है।
संस्कृत हृदय के मूल में हृद् है जिसका अर्थ है दिल और इसके लिए भाषा वैज्ञानिकों ने मूल इंडो-यूरोपीय धातु कर्द kerd तलाश की है जिसका आधार ग्रीक का कार्दिया kardia है। हृदय का संबंध सोच-विचार करने से है। मलयालम में यह करुतु है जिसका साम्य कॉर्ड से जोड़ा जा सकता है। करुतु का अर्थ है सोचना, विचारना, कल्पना करना आदि। वैसे ख्यात भाषवाविद् डॉ रामविलास शर्मा द्वारा बरो और एमेनो के द्रविड़ व्युत्पत्ति कोश से संग्रहित शब्दों में मलयालम के करिळ का उल्लेख है जिसे उन्होंने इसी शब्द शृंखला का हिस्सा बताया है। द्रविड़ परिवार की ही कोत भाषा में यह कर्ल है। वे इन शब्दों की ग्रीक कॉर्दिया से तुलना करते हैं- कर्द > कर्ल। हिन्दी का शृद्धा शब्द भी इसी परिवार का है जिसका अर्थ है आस्था, निष्ठा, भरोसा जिनका रिश्ता दिल से है। इसके अलावा मन की स्वस्थता और हृदय की शान्ति जैसे भाव भी इसमें हैं। हालाँकि इसका अर्थ थोड़ा भिन्न है मगर रामविलास शर्मा बड़ी आसानी से इसकी हृदय से रिश्तेदारी साबित करते हैं। उनके अनुसार शृद्धा का शृद् और हृदय का हृद दरअसल एक ही हैं। लिथुआनी का सिर्डिस और रूसी का सर्डेस / सेर्द्त्से इस सिलसिले में गौरतलब है जिसका उच्चारण शृद्धा से मिलता-जुलता है।
इंडो-ईरानी भाषा परिवार का दिल भी भारोपीय धातु कर्द kerd से ही तैयार हुआ है। यह दिलचस्प है कि इस धातु के पहले वर्ण का उच्चार पूर्व से पश्चिम तक अलग अलग होता रहा है। ये सभी ध्वनियाँ कण्ठ्य, तालव्य, दन्त्य और दन्त्यमूलीय हैं। इसी तरह इनकी प्रकृति भी कण्ठ्य, स्पर्श और स्पर्श संघर्षी रही है। इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ते हुए ध्वनियों की प्रकृति कण्ठ्य से तालव्य और फिर दन्त्य में तब्दील हुई है। पंचनद, उत्तरी ईरान, कुर्दिश, आर्मीनियाई और फिर जर्मन। चाहें तो इस क्रम को ठीक उलटा भी मान सकते हैं। संस्कृत के हृद् में मूल ध्वनि   है जो कण्ठ्य संघर्षी है। इससे हृदय शब्द बनता है। अवेस्ता में इस का रूपान्तर ज़ / झ़ में होता है और वहाँ हृदय के लिए ज़रेदा शब्द मिलता है। कुर्दिश में यह ज़ार है और बलूची में ज़ेर्दे तो आर्मीनियाई में ज़ का बदलाव में होता है जो दन्त्यमूलीय ध्वनि है। यहाँ हृदय के लिए सिर्त शब्द है। रूसी में यह सर्डेस या सेर्द्स्ते है। जर्मन में यह हर्ज़ है मगर प्रोटो जर्मन में यह ख़ैर्तन था। बहरहाल, अवेस्ता के ज़रेदा zereda से पहलवी के दील और फिर फ़ारसी के दिल, देल का विकास हुआ है।
हृदय से दिल का विकास विस्यमकारी सा लगता है मगर जिस तरह हम सूक्ष्मतम एक कोशिकीय जीव-विभाजन के सिद्धान्त को स्वीकार करते हुए तमाम जीवधारियों के विकसित होने की कल्पना को स्वीकार कर  लेते हैं, भाषा और शब्दों के विकास का सफ़र उतना दुरूह और असम्भव नहीं है। समूचे तुर्क-ईरान क्षेत्र में अवेस्ताई ज़रेदा के कई रूपान्तर हुए हैं जैसे ताज़िकिस्तान के पामीर और बदख्शाँ क्षेत्र की क़बाइली भाषा इशकाशिमी में यह ज़िल है तो पूर्वी तुर्की में बोली जाने वाली जज़ाकी में यह ज़ेर्री है। पामीर क्षेत्र की ही एक अन्य भाषा सारीगुल में इसका रूप झाँर्द है। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक पार्थियाई भाषा में इसका एक रूप ज़िर्द रहा होगा। जॉर्जिया की एक बोली ओसेटिक में इसका रूप झ़िर्द मिलता है। डॉ शर्मा की बात तार्किक लगती है कि जैसे लैटिन कोर्द का रूप कोर हुआ, वैसे ही ज़िर्द ( ज़रेदा का एक रूप ) का रूपान्तर ज़िर हुआ होगा। ज़िर > जिर > दिर के बाद अगला रूपान्तर दिल हुआ होगा। गौर तलब है कि बदख्शाँ की इशकाशिमी भाषा में ज़िर का रूप ज़िल है।
दिल के साथ अक्सर दिमाग़ का ज़िक्र भी होता है। सयानों का कहना है कि “दिल की नहीं, दिमाग़ की बात सुननी चाहिए”। मगर जो लोग दिल से बोलते हैं, वे सुनते भी दिल की ही हैं। दिल की तरह दिमाग़ भारोपीय भाषा परिवार का न होकर सेमिटिक कुनबे का शब्द है। कुछ सेमिटिक भाषाओं में दिमाग़ का उच्चारण दिमाह की तरह होता है जैसे इथियोपिया की ग़ीज़ भाषा में। अरबी में दिमाग़ का अर्थ होता है मस्तिष्क, ब्रेन। इसका अर्थ होता है सिर, सिर का सबसे ऊपरी हिस्सा, शिखर आदि। दिमाग़ के अन्तिम दो वर्णों से भारोपीय मस्ज्, मग्ज़, मज़्ग याद आते हैं जिनसे हिन्दी में प्रयोग होने वाले कुछ ख़ास शब्द बने हैं। मगज और भेजा इंडो-ईरानी और इंडो-यूरोपीय मूल के शब्द हैं जबकि दिमाग अरबी मूल से आया है। संस्कृत में इसकी मूल धातु है मज्ज्।
यह भी दिलचस्प है कि हिन्दी में मगज शब्द जहाँ फारसी से आया है वहीं भेजा शब्द इसके मूल तत्सम का तद्भव रूप है। मगज शब्द का मूल फारसी रूप मग्ज़ है। यह अवेस्ता के मज्ग mazga से बना है। इसका संस्कृत रूप है मस्ज् जिसका अर्थ है सार, तरल, रस आदि। इससे ही बना है संस्कृत और हिन्दी का मज्जा शब्द जिसका अर्थ है अस्थियों के भीतर का द्रव (बोनमेरो bonemarrow), वसा, चर्बी, पौधों का रस आदि। मुमकिन है अवेस्ता के मज़्ग से यह अरबी में आयात हुआ हो जहाँ इसका अरबीकरण दिमाग़ के रूप में हुआ हो। वैसे भी अन्य सेमिटिक भाषाओं में यह शब्द अरबी से ही गया है। यूँ भी अरबी और फ़ारसी में भाषायी लेन-देन रहा है। हिन्दी का भेजा शब्द मज्ज से बना है। संस्कृत के तद्भव रूपों में प ध्वनि का चरित्र भ में बदलता है। यहाँ मज्ज> मज्जस् > भज्जअ> भेजा के जरिये यह तैयार हुआ है। अक्सर दिलवाले दिल लिया दिया करते हैं, दिल से दिल लगाया करते हैं। बेवकूफ़ किस्म के लोग हमेशा दूसरों का दिमाग़ चाटते या दिमाग़ खाते हैं। व्यर्थ की बकवाद करने के अर्थ “भेजा खाना” या “भेजा चाटना” मुहावरा भी हिन्दी में प्रचलित है।
-जारी

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7 कमेंट्स:

चंदन कुमार मिश्र said...

http://main-samay-hoon.blogspot.com/2009/05/blog-post_09.html पर समय ने दिल-दिमाग के मनोवैज्ञानिक पक्ष पर बहुत अच्छा लिखा था। …एक शब्द दिलफेंक भी है…

यादें....ashok saluja . said...

दिल की दिलचस्प व्याख्या दिल को दिलचस्प लगी|
आभार|

प्रवीण पाण्डेय said...

हृदय से दिल बनने की रोचक कहानी।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! अधिक से अधिक पाठक आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

आशा said...

अच्छा जानकारी देता लेख |
आशा

संजय बेंगाणी said...

यानी 'कार्डियोग्राम' का 'हृदय' से खून का सा रिश्ता है :)

रोहित said...

मस्ज् जिसका अर्थ है सार, तरल, रस, वो अर्थ दिमाग में कैसे बदल गया?

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