Saturday, December 17, 2011

घरबारी होना, गिरस्तिन बनना

landlord पिछली कड़ी-दम्पती यानी घर के मालिक

रो टी, कपड़ा और मकान, नून, तेल, लकड़ी या आटा-दाल का भाव जैसे मुहावरों में क्या समानता है? मोटे तौर पर इन मुहावरों में पदार्थों का उल्लेख है और जिस क्रम और जोड़े के साथ उल्लेख है, उसका महत्व तो गृहस्थी में ही है। गृहस्थ उसे कहते हैं जो घर में रहता हो। गृह+स्थ्  से बना है यह शब्द अर्थात जो घर में स्थिर हो। भारतीय परम्परा में गृहस्थाश्रम चार वर्णाश्रमों में दूसरा अधिष्ठान है। गृहस्थ में विवाहित, बाल-बच्चेदार, गृहपति जैसे भाव हैं। घर और मकान दरअसल एक से शब्द लगते हैं मगर इनमें फ़र्क है। ‘घर’ एक व्यवस्था है जबकि ‘मकान’ एक सुविधा है। ‘घर’ बनता है रिश्तों से, प्रेम से और व्यवहार से जबकि ‘मकान’ बनाता है ईंट-गारे से। सो घर जैसी व्यवस्था में रिश्तों के अधीन होना ज़रूरी होता है। इसीलिए आमतौर पर घर होना, किसी रिश्ते में बंधने जैसा है। शादी-शुदा व्यक्ति को इसीलिए घरबारी कहा जाता है क्योंकि वह रिश्ते के अधीन हो चुका है। किसी स्त्री को गिरस्तिन तभी कहा जाता है जबकि वह विवाहिता हो। मकान को घर का दर्जा यूँ ही नहीं मिल जाता। ‘घर’ बनवाया नहीं, बसाया जाता है। सो गृहस्थ, घरबारी जैसे शब्दों के मूल में जो बात उभर रही है वह है रहने का ठिकाना होना। यानी रहने का ठिकाना ही किसी व्यक्ति को समाज में सम्मान दिलाता है। 
शालीन वही है जो शाल् अर्थात घर में रहता है। आज चाहे शालीन का अर्थ शीलयुक्त हो मगर किसी ज़माने में शालीन का अर्थ घर में रहने वाला यानी घरबारी ही था।  दाम्पत्य में बंधा व्यक्ति दम्पती सिर्फ़ इसलिए नहीं है क्योंकि वह विवाहित अवस्था में है, बल्कि वह गृहस्थ है, गृहपति है। गृहस्थ के लिए ‘घरबारी’ शब्द बना है घर + द्वार से। घरद्वार एक सामासिक पद है जिसमें द्वार भी घर जैसा ही अर्थ दे रहा है। द्वार से ‘द’ का लोप होकर ‘व’ बचता है जो अगली कड़ी में ‘ब’ में तब्दील होता है। इस तरह घरद्वार से घरबार प्राप्त होता है जिससे बनता है घरबारी। गिरस्तिन भी दम्पति के अर्थ में असली घरमालकिन है। घर शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के गृह से मानी जाती है। संस्कृत का गृह और प्राकृत घर एक दूसरे के रूपान्तर हैं। यहाँ ‘र’ वर्ण ‘ग’ से अपना दामन छुड़ा कर आज़ाद होता है और ‘ह’ खुद को ‘ग’ से जोड़ कर ‘घ’ में तब्दील होता है इस तरह ‘गृह’ से ‘घर’ बनता है। मगर घर को अग्निपूजा अनुष्ठान से जोड़ कर भी देखना होगा। प्राचीन अग्निपूजक समाज में प्रत्येक आवास के भीतर एक अग्निस्थान अवश्य होता था। उससे भी पहले कबीलाई दौर में समूह के लिए अग्निग्रह होता था अग्निपीठ का महत्व उपासनास्थल जैसा था और उसी के आस-पास पूरा कुनबा बसता था। उस दौर में अग्नि की सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण थी। अग्नि की दैवी महत्ता तो आज भी जनमानस में कायम है। वेदों में अग्नि चुराने का उल्लेख कई बार है। बाद में विकासशील समाज ने पृथक आवासों का निर्माण किया तब भी अग्निस्थान निश्चित रहता था। डॉ रामविलास शर्मा लिखते हैं कि प्राचीन समाजों में अग्निस्थान और आवास दोनों के लिए अग्नि सम्बन्धी शब्दावली देखने को मिलती है।
गृह का पूर्व रूप गृभ् हो सकता है। ‘घृ’ धातु में चमक, कान्ति का भाव है जो अग्नि का विशिष्ट गुण है। गृह के अर्थ में आवास अर्थ बाद का विकास है। रामविलासजी के मुताबिक संस्कृत के गृह का ‘गृ’, ग्रीष्म के ‘ग्री’ के समान मूलतः अग्निवाचक है। गृह, गृध व अग्नि रखने के स्थान हर्म्य का अर्थ अग्निस्थान भी है और भवन भी है। मोनियर विलियम्स ने ठीक सुझाव दिया है कि इसका सम्बन्ध ‘घृ’ और हर्म्य से होगा जिसका मूलार्थ है पारिवारिक अग्निस्थान। हर्म्य के पूर्वरूप घर्म्य के ‘घर्’ से हिन्दी का ‘घर’ बना। घर्म्य वह स्थान है जहाँ ‘घर्’ अर्थात अग्नि रखी जाती है। प्राचीन काल से घर में अग्नि का होना, अग्नि अनुष्ठान अर्थात अग्नि के आह्वान के साथ भोजन निर्माण होने से ही घर को ‘घर’ का महत्व मिलता था। जिस घर में रसोई न हो, वह ‘घर’ नहीं होता। फ़ारसी का गर्म, वैदिक घर्म का प्रतिरूप है। घर्म से ही गर्मी के लिए ‘घाम’ शब्द बना है। वैदिक ‘हर्म्य’ की रिश्तेदारी संस्कृत के ‘होम’ से है। संस्कृत के ‘होम’ और अंग्रेजी के ‘होम’ में ध्वनिसाम्य तो है पर अर्थसाम्य नहीं। संस्कृत के होम में जहाँ मूल अग्नि का अर्थ प्रधानता के साथ बना हुआ है वहीं अंग्रेजी के होम में वैदिक भाषा के निवास के आशय वाला गौण अर्थ प्रमुख हो जाता है। यहाँ यह उल्लेख ज़रूरी है कि पाश्चात्य भाषा विज्ञानियों नें अंग्रेजी के होम को भारोपीय भाषी परिवार का शब्द तो माना है मगर उसकी व्युत्पत्ति को लेकर उनके पास अलग तर्क हैं।
houseइंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु kam या कम् में भी मुख्यतः झुकाव या टेढ़ापन है जिससे फारसी में कमान या कमानी शब्द बने। संस्कृत की कुट् धातु में भी टेढ़ेपन का भाव है। प्राचीन मकानों की छतें प्रायः दोतरफ़ा ढलानवाली होती थीं। आदिम आश्रयों का निर्माण टहनियों को दोहरा मोड़ने की तरकीब से हुआ। मोड़ी हुई टहनियाँ दीवारों पर टिकाई जाती थीं जिस पर पत्ते, फूस आदि डालकर बनाए छप्पर को छत कहा जाता था। संस्कृत के स्कम्भ और फ़ारसी के खम पर गौर करें। खम का अर्थ है झुकाव या टेढ़ापन। स्कम्भ में झुकाव या टेढ़ापन न होकर मुख्य स्तम्भ का भाव है। खम का ही रूप है कमान। कमान, मेहराब को ही कहते हैं जिस पर मुख्यतः मकान की छत डाली जाती है। अंग्रेजी का होम शब्द भी इसी श्रंखला की कड़ी है। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का होम शब्द पोस्ट जर्मनिक के khaim ख़ैम से आया है जिसका गोथिक रूप होता है हैम haim जिसने अंग्रेजी में home का रूप लिया।
 ग्निस्थान के आश्रय वाले गौण अर्थ को बाद के दौर में प्रधानता मिली और अग्नि को सुरक्षित रखने वाले सुरक्षित, घिरे हुए स्थान का भाव इसमें खास हो गया। पाश्चात्य भाषा विज्ञानियों ने इसी घिरे हुए सुरक्षित स्थान वाले अर्थ को निवास के सन्दर्भ में प्रमुखता देते हुए इससे मिलते-जुलते शब्दों को एक वर्ग में रखा। पकोर्नी की भारोपीय धातु तालिका में घेर् *gher- का रिश्ता संस्कृत के घर से जोड़ा गया है। हिन्दी के घिरना, घेरना का सम्बन्ध प्राचीन क्रिया घर् से अगर बनता है, जैसा कि पकोर्नी बताते हैं तो यह उत्तर वैदिक विकास कहा जा सकता है जब घर् में निहित अग्निसूचक भाव गौण होकर निवास, आश्रय प्रमुख हो गया। प्रकारान्तर से यह घेर, घेरा जैसे सुरक्षात्मक भावों की वजह से हुआ है। घेर् *gher-में भी घिरने, घेरने, बाड़ा, वाटिका, प्रांगण, परिसर, जैसे भाव हैं। अंग्रेजी का यार्ड शब्द इसी मूल का है जिसका अर्थ है किसी घर का अहाता या उससे सटा हुआ खाली स्थान। आवास से जुड़े परिसर को भी यार्ड yard कहते हैं। अंग्रेजी का गार्डन शब्द हिन्दी में भी बहुत प्रचलित है। यह इसी मूल का है। अल्बानी में इसका रूप गर्थ है जिसका अर्थ है बाड़, लैटिन में बगीचे के अर्थ में यह होर्तुस है, जर्मन में यह गार्तेन है। यूरोपीय भाषाओं में बस्तियों के नामों के बाद ग्राद, ग्रेड जैसे प्रत्यय लगे हुए मिलते हैं। ठीक वैसे, जैसे हिन्दी में पुर, नगर, नेर, वाड़ा (जबलपुर, जामनगर, बीकानेर, विजयवाड़ा) होते हैं। लेनिनग्राद या बेलग्रेड से इसे समझा जा सकता है। यह ग्राद, ग्रेड इसी मूल के हैं जिनका अर्थ है नगर, किला, बस्ती वगैरह। प्राचीन फ्रीसियन में इसका रूप गोर्दुम  था। रूसी में यह गोरोद gorod या ग्राद grad होता है। ये सारे विकास आदि भारोपीय घोर्धोस से हुए हैं। –अगली कड़ीः ...लेकिन अपना अपना दामन

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

4 कमेंट्स:

प्रवीण पाण्डेय said...

घेरते घेरते घर बन गया, अब घर घेरे रहता है।

singhSDM said...

शब्दों का कारोबार अच्छा लगा.... घर और शालीनजैसे शब्दों के विश्लेषण का आभार

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन पोस्ट....

विष्णु बैरागी said...

घर बसाने और घर बनाने का इतिहास इतना विस्‍तृत और व्‍यापक होगा, यह पता नहीं था। आपने एक 'बैरागी' को 'गृहस्‍थ' होने का अर्थ खूब समझाया।

नीचे दिया गया बक्सा प्रयोग करें हिन्दी में टाइप करने के लिए

Post a Comment


Blog Widget by LinkWithin