Monday, January 10, 2011

‘चिरंजीव’ की ‘चिता’ से रिश्तेदारी

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मारे यहाँ अपने से छोटों को आशीर्वचन के रूप में विजयी भव, यशस्वी भव, चिरंजीव भव कहने की परिपाटी रही है जिसमें जीतने, प्रसिद्ध होने और दीर्घजीवी होने का भाव छुपा है। इससे ज्यादा और क्या आशीर्वचन हो सकते हैं? चिरंजीव एक नाम भी है। मराठी समेत दक्षिण भारतीय भाषाओं में पुत्र संतान का नाम लोग चिरंजीव या चिरंजीवी रखते हैं। संस्कृत में इसका शुद्ध रूप है चिरञ्जीव जिसका अर्थ भी लम्बी उम्र या दीर्घायु वाला ही होता है। यह बना है चिरम्+जीव में संस्कृत का अच् प्रत्यय लगने से। संस्कृत की चिर धातु में दीर्घ, दीर्घकाल तक रहनेवाला, दीर्घकाल से चला आ रहा, पुरातन, चिरन्तन जैसे भाव निहित हैं। चिर बना है चि धातु से। चि मे समूहवाचक भाव हैं। मूलतः इसका मतलब होता है चुनना, बीनना, इकट्ठा करना आदि। जाहिर है चुनी, बीनी और एकत्रित वस्तुएँ कहीं तो रखी जाएँगी, सो इन क्रियाओं का परिणाम है ढेर लगाना, अंबार लगाना आदि। स्थूल रूप में इन सभी के आकार पर ध्यान दें। इकाई की तुलना में समूह बड़ा होता है, इसीलिए अंबार या ढेर निश्चित ही दीर्घ होता है। लंबाई, चौडाई और ऊँचाई में। इसे दीर्घ कह सकते हैं। इसके बाद ही चि में फलने-फूलने, बढ़ने और समृद्ध होने का भाव उपजता है। समृद्धि और विकास किसी भी रूप में हो सकता है जिसमें भौतिक वस्तुओं की मात्रा से लेकर काल और आयु तक आ जाती है। चिरंजीव का भाववाचक अर्थ पुत्र भी होता है और मराठी में पुत्र को चिरंजीव कहने की परम्परा है जिसमें संतान के दीर्घजीवी होने के गर्हित अर्थ साथ ही अपनी वंश परम्परा को लम्बे समय तक कायम रखनेवाले से परिचित कराने का भाव है। पुत्र का परिचय कराते वक्त यही कहा जाता है- ये हमारे चिरंजीव हैं। भाव होता है मेरे वंश को आगे ले जानेवाले। आमतौर पर चिरंजीव में आशीर्वाद छुपा है अर्थात चिरकाल तक जीवित रहो! स्वाभाविक रूप में अपने अंश के रूप में पुरुषवादी समाज में पुत्र के चिरजीवी होने की कामना रही और इसीलिए संज्ञा-नाम के रूप में चिरंजीव का अर्थ पुत्र भी हुआ।
म्बी उम्रवाले व्युक्ति को हिन्दी में दीर्घायु या दीर्घजीवी कहते हैं। दीर्घकाय, दीर्घजीवी या दीर्घायु जैसे शब्दों में दीर्घ प्रमुख है। हिन्दी में दीर्घ deergh का अर्थ होता है लंबा, दूर तक पहुंचनेवाला, ऊंचा, उन्नत आदि। इस तरह देखें तो दीर्घकाय का अर्थ हुआ लंबा व्यक्ति मगर दीर्घकाय शब्द का अभिप्राय आमतौर पर विशालकाय के अर्थ में ही लगाया जाता है। दरअसल जब किसी आकार के साथ दीर्घ शब्द का विशेषण की तरह प्रयोग होता है तब लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई के आयाम भी उसमें जड़ जाते हैं, इस तरह दीर्घाकार, दीर्घकाय जैसे शब्दों में बड़ा अथवा विशाल का भाव आ जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति को दूरदर्शी कहा जाता है। संस्कृत में इसके लिए दीर्घदर्शी शब्द भी है यानी दूर तक देखनेवाला। लंबी आयु के लिए दीर्घजीवी शब्द प्रचलित है। संस्कारी हिन्दी में बालकनी या गैलरी के लिए दीर्घा शब्द प्रचलित है। वैसे इसके लिए गवाक्ष, बारजा या बालाख़ाना जैसे शब्द आमतौर पर ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। दीर्घा इसी कड़ी से जुड़ा शब्द है जिसका मूल अर्थ है ऊंचाई की ओर जाता लम्बा रास्ता। दर्शकदीर्घा या कलादीर्घा जैसे शब्दों से समझा जा सकता है कि दीर्घ में निहित ऊंचाई का भाव कहाँ से आ रहा है। संस्कृत में दीर्घा लम्बी-बड़ी झील को और दीर्घिका छोटे तालाब को कहते हैं।
भाषाविज्ञानियों नें संस्कृत के दीर्घ शब्द की रिश्तेदारी प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु dlonghos में खोजी है। अंग्रेजी का लाँग long शब्द भी इससे ही बना है जिसका अर्थ भी लंबा या दीर्घ ही होता है। गौरतलब है कि संस्कृत दीर्घ शब्द ने ही बरास्ता अवेस्ता, ईरानी परिवार की भाषाओं में जाकर दराग, दिरंग होते हुए फारसी के दराज़ शब्द का रूप लिया।
dah... चिता ही नहीं, चिन्ता के मूल में भी यही चि है। कहावत है कि चिंता चिता समाना। जिस तरह से घुन अनाज को पोला कर देता है, दीमक वृक्ष को खोखला कर देती है उसी तरह चिन्ता शरीर को धीरे-धीरे क्षीण करती जाती है जिसकी चरम परिणति मृत्यु है...
फारसी के दराज़ का अर्थ होता है लंबा। गौरतलब है कि भारोपीय भाषाओं मे र-ल और क-ग-घ जैसे वर्णों में आपस में तब्दीली होती है। फारसी का दराज़ शब्द उम्रदराज़ के रूप में हिन्दी में भी इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ होता है लंबी आयु वाला अर्थात बूढ़ा, वृद्ध, बुजुर्ग।
प्रारम्भ में ही अन्त भी छुपा है। जो जन्मा है, उसे जाना भी होगा। चिरंजीव के जन्मसूत्र जिस चि धातु में छुपे हैं उसी से जन्मा है हिन्दी का चिता शब्द भी जिसका रिश्ता जन्म की समाप्ति से जुड़ता है। चिता ही नहीं, चिन्ता के मूल में भी यही चि है। कहावत है कि चिंता चिता समाना। जिस तरह से घुन अनाज को पोला कर देता है, दीमक वृक्ष को खोखला कर देती है उसी तरह चिन्ता शरीर को धीरे-धीरे क्षीण करती जाती है जिसकी चरम परिणति मृत्यु है अर्थात् चिन्ता का शीघ्र समाधान न मिले तो शरीर को चिता मिल सकती है। यहां सिर्फ चिंता और चिता का मेल सिर्फ कहावत के स्तर पर नहीं है बल्कि ये दोनों शब्द सचमुच संबंधी भी हैं। चिता अर्थात दाह संस्कार के लिए चुनकर रखी रखी गई लकड़ियों का ढेर। चिता बना है चित शब्द से जिसके मूल में चि धातु है और उसमें निहित सारे भाव चित में हैं अर्थात बीना हुआ, संग्रह किया हुआ, जमा किया हुआ, अंबार लगाया हुआ और जमाया हुआ आदि।
चित से ही बना है चित्यम् जिसका मतलब होता है दाह संस्कार करने का स्थान। गौर करें की बौद्ध और जैन देवालयों को चैत्य, चैत्यालय भी कहा जाता है। यह चैत्य भी इससे ही बना है। बौद्ध महास्थविरों के अवशेष इन चैत्यों में रखे जाने की परंपरा रही है। बाद में इन्हीं के इर्द-गिर्द विहार भी बनते चले गए। चैत्य मूल रूप से समाधि या स्मारक ही रहे हैं मगर बाद में देवालय के अर्थ में पहचाने जाने लगे। चि में निहित चुनने की क्रिया पर अगर गौर करें तो पाएंगे की चुनना, बीनना, संग्रह करना, जमाना आदि सभी क्रियाएं देखने से जुड़ी हुई हैं। बिना देखे-भाले किसी भी किस्म का चुनाव संभव नहीं। अर्थात चुनने से ही ज्ञानबोध होता है और बिना ज्ञानबोध के चुनाव असंभव है-दोनों में अंतर्संबंध गहरा है, सो चि से ही बना चित्त् जिसमें जानना, समझना, चौकस होना, ज्ञानबोध आदि अर्थ समाहित हैं। हिन्दी का चित्त भी यही सारे अर्थ प्रकट करता है जिसमें देखना, विचार करना, मनन करना भी शामिल है। आमतौर पर चिन्ता का मतलब फिक्र, ध्यान, परवाह आदि माना जाता है। यह बना है चिन्त् से जिसके व्यापक अर्थ हैं और इसी परिवार का शब्द है जिसमें सोच-विचार, चिन्तन मनन आदि बातें शामिल है।
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11 कमेंट्स:

sanjay vyas said...

चिता और चैत्य किस रिश्तेदारी में बंधे हैं, जानना रोचक रहा.

प्रवीण पाण्डेय said...

चिरन्तन चिन्तन।

डॉ. मनोज मिश्र said...

जन्मदिन की बहुत -बहुत शुभकामनाएं.

डॉ. दलसिंगार यादव said...

मैं भी शब्दों के सागर में गोता लगाता रहता हूं। ऐसी ही जानकारी अपने ब्लॉग पर दे रहा हूं। जानकारी बेहद उपयोगी है और हिंदी के क्षेत्र से जुड़े हर व्यक्ति को यह जानना चाहिए ताकि 'विजित' जैसी गलती दुबारा न होने पाए।

सूर्य गोयल said...

अजित जी, सबसे पहले तो मेरी और से जन्मदिन की ढेरो शुभकामनाये और बधाई स्वीकार करें. उसके पश्चात इतना ही कहना चाहूँगा की आपकी पोस्ट पढ़ कर और विचार जानकार मजा आ गया.

Asha said...

नई जानकारी मिली |आभार
आशा

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

अजित जी, जन्‍मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।

---------
कादेरी भूत और उसका परिवार।
मासिक धर्म और उससे जुड़ी अवधारणाएं।

डॉ टी एस दराल said...

जन्मदिन की बधाई अवम शुभकामनायें अजित जी ।

Mansoor Ali said...

" बिना देखे-भाले किसी भी किस्म का चुनाव संभव नहीं। अर्थात चुनने से ही ज्ञानबोध होता है और बिना ज्ञानबोध के चुनाव असंभव है-दोनों में अंतर्संबंध गहरा है, सो चि से ही बना चित्त् जिसमें जानना, समझना, चौकस होना, ज्ञानबोध आदि अर्थ समाहित हैं।" .......

क्या-क्या लिख जाते हो अजित साहब ... कि गाड़ी इस दिशा में भी चल पड़ती हैं .........................!

"चिलमन नहीं हटा था कि करना पड़ा 'चुनाव',
बिन 'ज्ञानबोध' के ही तो ब्याहे गए थे हम,
सम्बन्ध गहरे होने में गुज़री ये ज़िन्दगी,
जन्नत में काम आएगा , अब उनसे हुआ लगाव.

-मंसूर अली हाशमी
http://aatm-manthan.com

अजित वडनेरकर said...

आज अपने जन्मदिन पर जिस क़दर जीवन के गहरे दर्शन से जुड़ी ये पंक्तियाँ पढ़ीं, तो दिन सार्थक हो गया। आप हमें नाहक श्रेय देते हैं...
बहुत आभार हाशमी साहेब...

Mansoor Ali said...

जन्मदिन की हार्दिक बधाई. आपकी लेखनी प्रेरणा दायक रहती है, श्रेय तो सारा उसको ही जाएगा.

# उपरोक्त चौपाई [?] की चौथी पंक्ति यूं पढ़ी जाए:

"जन्नत में काम आएगा अब उनसे 'यह' लगाव"

म.हाश्मी

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