Friday, September 30, 2011

श्रवणकुमार की सुन-गुन

Hear
कि सी भाषा की लम्बी उम्र और शब्द-समृद्धि के मूल में उस भाषा का अन्य भाषाओं से जीवंत सम्पर्क महत्वपूर्ण है। प्राचीन काल से भाषाई आदान-प्रदान होता रहा है। सभ्यता के विकासक्रम में क्षेत्रीय भाषाओं में से कोई एक भाषा परिनिष्ठित भाषा का रूप लेती है। तब शुद्धता का आग्रह भी सामने आता है। आज के दौर में हिन्दी भी ऐसी ही परिस्थिति से जूझ रही है। हिन्दी में अब बोली-भाषा के शब्द धीरे धीरे गायब हो रहे हैं। गौरतलब है कि लोक बोलियों के विभिन्न शब्दों की अर्थवत्ता बड़ी व्यापक होती है। साहित्यिक प्रयोगों के ज़रिये इन शब्दों से पढ़ा-लिखा समाज परिचित होता है। दो दशक पहले तक परिनिष्ठित हिन्दी में आंचलिक बोली के शब्दों का इस्तेमाल होता था। समर्थ अभिव्यक्ति के लिए भाषा में शब्दों की आवाजाही ज़रूरी है, किन्तु हिन्दी वालों में साहित्यानुराग भी धीरे धीरे कम हो रहा है लिहाज़ा लोकभाषा के शब्दो से अपरिचय वाला हिन्दी समाज हमारे सामने है।

श्रवण करने की क्रिया के लिए हिन्दी में ‘सुनना’ शब्द के अलावा कोई अन्य विकल्प हमारे सामने नहीं है। इसका प्रयोग सुनवाई, सुनना, सुनाई पड़ना जैसे अर्थों में होता है। इसके अलावा विचार करना, ध्यान देना जैसे भाव भी इसमें शामिल हैं। सुनना क्रिया से सुन-गुन लेना जैसा मुहावरा भी हिन्दी में चल पड़ा है। संस्कृत में सुनने के लिए ‘श्रवण’ शब्द है। यह बना है ‘श्रु’ धातु से जिसमें सुनने, सुनाई पड़ने का भाव है। ‘श्रवण करना’ यूँ तो सुनने के संदर्भ में हिन्दी में बोला जा सकता है, मगर ऐसे वाक्य प्रयोग व्यवहार में नहीं है। पाली में ‘श्रवण’ का ‘सवन’ रूप है और प्राकृत में ‘सवण’। इसी कड़ी में हिन्दी की ‘सुनना’ क्रिया का विकास हुआ। ताज्जुब होता है कि सुनने की क्रिया के लिए कभी हमारे पास ‘अकनि/अकुनि’ जैसी क्रिया भी थी। सूरदास, तुलसीदास जैसे मध्यकालीन कवियों ने इसके विविध रूपों का प्रयोग किया है। डॉ रामविलास शर्मा इस ‘अकनि/अकुनि’ क्रिया के बारे में लिखते हैं कि अन्य भारतीय आर्यभाषाओं में भी सुनने के अर्थ वाली इस क्रिया का इस्तेमाल होता है। उनके मुताबिक ‘अकनि’ क्रिया के मूल में ‘अक्’ जैसी धातु होनी चाहिए, मगर संस्कृत में ‘अक्’ जैसी कोई क्रिया नहीं है। वे ग्रीक भाषा की क्रिया ‘अकोउओ’ से ‘अकनि’ की तुलना करते हैं जिसका अर्थ भी सुनना ही होता है। उनका मानना है कि ‘अकनि’ या ‘अकुनि’ और ‘अकोउओ’ परस्पर सम्बद्ध हैं। माना जाता है कि आर्यों के भारत आने से पहले प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा से ग्रीक शाखा अलग हो गई थी। ‘अकोउओ’ प्राचीन ग्रीक का शब्द है, आधुनिक ग्रीक का नहीं। इस तरह के शब्द साम्य से ऐसा लगता है कि इंडो-यूरोपीय भाषाओं के विकास को समझने के लिए उनका तुलनात्मक अध्ययन केवल संस्कृत से नहीं बल्कि आधुनिक आर्य भाषाओं से भी करना चाहिए।
ब्रज, अवधि में प्रचलित ‘अकनि/अकुनि’ , ‘अकनना’ जैसी क्रियाओं से मिलती जुलती एक क्रिया मराठी में भी है। हिन्दी की ’सुनना’ जैसी ही स्थिति मराठी के ‘ऐकणे’ (अइकणे) की भी है अर्थात यहाँ भी ‘श्रवण’ करने के लिए ‘ऐकणे’ (अइकणे) के अलावा कोई अन्य पर्यायी शब्द नहीं है। डॉ रामविलास शर्मा जिस दिशा में संकेत कर रहे हैं उससे ऐसा आभास होता है कि संभवतः प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार कि भारतीय शाखाओं में ‘ऐकणे’ (अइकणे), ‘अकनि / अकुनि’ जैसे शब्दों की उपस्थित प्राचीन ग्रीक के
ear tumpet‘अकनि’ और ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति कल्पित ‘अक्’ धातु की बजाय ‘कर्ण’ में ही निहित है। प्रोटो भारोपीय भाषाओं के मूल स्रोतों की दिशा में महान काम करने वाले जूलियस पकोर्नी जैसे ख्यात भाषा शास्त्री का ध्यान इस ओर नहीं गया होगा, यह बात मानना मुश्किल है।
‘अकोउओ’ का प्रभाव मानी जानी चाहिए। इसे आर्यों के आप्रवासन का परिणाम भी माना जा सकता है और प्राचीन यूनान से वृहत्तर भारत के सांस्कृतिक सम्बंधों का नतीजा भी। ग्रीक ‘अकोउओ’ का परवर्ती रूपान्तर ‘अकूस्टोस’ होता है जिसमें सुनने लायक जैसा भाव है। इसका ही एक रूप ‘अकूस्टिकोस’ होता है जिसका अर्थ भी सुनना ही है। अंग्रेजी के ‘अकूस्टिक’ acoustic और फ्रैंच के acoustique से इसकी रिश्तेदारी निर्विवाद है। जूलियस पकोर्नी द्वारा बताई गईं प्रोटो भारोपीय धातु kous से इसकी रिश्तेदारी है। डॉ शर्मा का सुझाव महत्वपूर्ण है कि प्राचीन भारोपीय भाषाओं के विकास को परखने के लिए संस्कृत समेत आधुनिक आर्यभाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन भी होना चाहिए। मगर विभिन्न संदर्भों के मद्देनज़र अवधी शब्दों ‘अकनि/अकुनि’  और मराठी के ‘ऐकणे’ (अइकणे) की रिश्तेदारी ग्रीक की बजाय संस्कृत से ही जुड़ती लग रही है। ‘अकनि’ और ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति कल्पित ‘अक्’ धातु की बजाय ‘कर्ण’ में ही निहित है। प्रोटो भारोपीय भाषाओं के मूल स्रोतों की दिशा में महान काम करने वाले जूलियस पकोर्नी जैसे ख्यात भाषा शास्त्री का ध्यान इस ओर नहीं गया होगा, यह बात मानना मुश्किल है।हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक ‘अकनि’ दरअसल संस्कृत के ‘आकर्णन’ का रूपान्तर है। आकर्णन का प्राकृत रूप ‘आकण्णण’ होता है। इसका एक रूप ‘आकर्णे’ भी है। ‘आकण्णण’ के अवहट्ठ भाषा में ‘आकण्ड’, ‘आकण्णे’ जैसे रूप भी हैं। ‘अकनि/अकुनि’ इसी कड़ी में आता है।
ह मानना दूर की कौड़ी लगती है कि ‘आकर्णन’ से बने ‘आकण्ण’, ‘अकनि / अकनि’ और ‘ऐकणे’ जैसे शब्दों की ग्रीक ‘अकोउओ’ से रिश्तेदारी है। ध्यान देना चाहिए कि ग्रीक ‘अकोउओ akouo’ का उच्चारण a-koo-oh अर्थात ‘अ कू ओह’ होता है। यह स्पष्ट है कि संस्कृत के आकर्णन की अर्थवत्ता ‘कर्ण’ अर्थात कान से स्थापित हो रही है जिसका गुण सुनना है। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक ‘आकर्णन’ से बनी ‘अकनना’ क्रिया का अर्थ सुनना, कर्णागोचर करना जैसे भाव हैं। आहट लेने, अंदाज़ा लेने के लिए बना सुन-गुन वाला भाव भी आकर्णन या अकनना में है। ‘कान लगा कर सुनना’ जैसा भाव ही वाशि आप्टे के संस्कृत कोश में भी है। यहाँ ‘आकर्णनम्’ शब्द की व्युत्पत्ति आ + कर्ण+ल्युट बताते हुए इसका अर्थ सुनना, कान लगा कर सुनना दिया है। इसके विपरीत कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश में ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘अभिकर्ण’ से बताई गई है। संस्कृत के ‘अभि’ उपसर्ग का अर्थ ‘की ओर’, ‘की दिशा में’ होता है। इस तरह अभिकर्ण में भी कान लगा कर सुनने का भाव ही है। इसका मराठी प्राकृत रूप होता है अहिकण्ण > अहिक्खण्ण > ऐकणे। मेरा मानना है कि मराठी ऐकणे का विकास भी संस्कृत के आकर्णनम् से ही हुआ होगा। क्योंकि संस्कृत कोशों में अभिकर्ण शब्द की प्रविष्टि मुझे नहीं मिली।
संस्कृत के ‘कर्ण’ की व्युत्पत्ति हुई है ‘कर्ण्’ धातु से जिसकी व्यापक अर्थवत्ता है और इससे बने अनेक शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं। ‘कर्ण्’ में छेदना, प्रवेश करना, घुसना जैसे भाव शामिल हैं। कान  की संरचना के संदर्भ में इन भावों का अर्थ स्पष्ट है। कान दरअसल एक दीर्घ विवर जैसी संरचना ही है। ‘कर्ण्’ से बने ‘कर्ण’ का अर्थ है किसी वस्तु को थामने वाली संरचना, बाहर निकला हुआ हिस्सा, हत्था, दस्ता या मूठ आदि। कर्ण शब्द की कान के संदर्भ में यहां गुणवाचक अर्थवत्ता भी है और भाववाचक भी। श्रवणेन्द्रिय होने की वजह से यहां स्पष्ट है कि कानों में ध्वनि प्रवेश करती है। इस तरह स्पष्ट है कि ग्रीक ‘अकोउओ’ या अवधी के ‘अकनि/अकनि’ में शब्द साम्य है मगर यह मानना थोड़ा मुश्किल लगता है कि ‘आकर्णनम्’ के प्राकृत रूपों का प्रसार ग्रीक भाषा में हज़ारों वर्ष पहले हुआ होगा। खास बात यह कि ‘अकनि / अकनि’ की रिश्तेदारी जिस तरह से कान अर्थात कर्ण ( संस्कृत धातुमूल कर्ण्) से सिद्ध हो रही है, ग्रीक के ‘अकोउओ’, उसकी मूल धातु kous और इससे बने ‘अकूस्टिक’ जैसे शब्दों में कहीं भी शरीरांग ‘कान’ का भाव नहीं है। प्रोटो भारोपीय शब्दों के मूल स्रोत खोजने का बड़ा काम करने वाले ख्यात भाषाविद् जूलियस पकोर्नी ने इस पहलू की जानबूझ कर अनदेखी की है, यह बात माननी मुश्किल है। ‘अकनि’ और ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति कल्पित ‘अक्’ धातु की बजाय ‘कर्ण’ में ही निहित है।
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Friday, September 23, 2011

घर-गिरस्ती की रस्सियाँ

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शु और मनुष्य का साहचर्य शब्दों के सफ़र में भी विविध रूपों में नजर आता है। यह उपभोक्ता और उत्पाद के रूप में भी है और पारिवारिक-आध्यात्मिक धरातल पर भी है। सर्वप्रथम मनुष्य की सत्ता पशुओं पर ही कायम हुई। उसने खुद को मानवेतर जीव-जगत का नियंता स्वयं को स्थापित किया। तात्पर्य यह कि अधिकार, स्वामित्व और सम्पत्ति का बहुआयामी बोध अगर किसी ने मनुष्य को कराया है तो वे पशु ही हैं। भाषा में भी यह रिश्ता साफ नज़र आता है। उर्दू –हिन्दी का एक आम शब्द है “माल” जो मूल रूप से सेमेटिक भाषा परिवार का है। माल का अर्थ होता है सम्पत्ति। व्यापक तौर पर धन-दौलत, सामान, भंडार, कीमती सामग्री, वस्तुएं आदि भी आती हैं। यह बना है “माल” अर्थात mwl से जिसका अर्थ होता है पशुओं का रेवड़। खासतौर पर जो दुधारू पशु पालतू हों। सेमेटिक परिवार की हिब्रू, अरबी, सीरियक, आरमेइक आदि कई भाषाओं में इस धातु की व्याप्ति इसी अर्थ में हैं। जाहिर सी बात है कि पशु ही प्राचीन इन्सान की सबसे बड़ी सम्पत्ति थे इसीलिए पशुधन जैसा शब्द हिन्दी में प्रचलित हुआ। साफ है कि माल यानी पशु। प्रचलित अर्थ में यही पशुधन ऐश्वर्य सामग्री, धनसम्पत्ति और दौलत है। जिसके पास माल है वह मालदार है अर्थात ऐश्वर्य वान है, धनी है, श्रीमंत है। माल-असबाब, मालमत्ता और मालामाल जैसे शब्द युग्म भी माल की ही देन हैं। लेनदेन अथवा व्यवसाय के तौर पर मुद्रा की भूमिका सबसे पहले पशुधन ने ही निभाई।
बसे पहले “माल-असबाब” की बात। विभिन्न शब्दकोशों में असबाब का अर्थ रोजमर्रा के काम की वस्तु होता है। दरअसल “असबाब” अरबी भाषा से फ़ारसी होते हुए उर्दू-हिन्दी में दाखिल हुआ। बुनियादी तौर पर यह अरबी के “सबब” sbb शब्द का बहुवचन है। सबब में अरबी का “अ” उपसर्ग लगने से बनता है “असबाब”। सबब के प्रचलित अर्थ हैं वजह, निमित्त, कारण, अभिप्राय, प्रयोजन, आशय, सुयोग, मौका अवसर आदि। सबब से बना बेसबब शब्द भी हिन्दी में प्रचलित है जिसका अर्थ है अकारण। मगर माल-असबाब के संदर्भ में इन अर्थों से बात नहीं बनती है और कोश इससे ज्यादा कुछ नहीं बताते। अरबी के पुराने संदर्भों में “सबब” का अर्थ रस्सी या तम्बू भी होता है “असबाब” में भी रस्सी और तम्बू के बहुवचन का भाव है। यह तम्बू “असबाब” के संदर्भ को और ज्यादा स्पष्ट करता है। कारण, वजह, प्रयोजन जैसे अर्थों का विकास बाद में हुआ। सभ्यता के अत्यंत प्रारम्भिक युग में इनसान के कुछ खास उपकरणों में रस्सी भी थी। इसी के साथ डण्डा और छाजन भी प्रमुख उपकरण थे जिनके जरिए वह आश्रय से लेकर आत्मरक्षा और पशुपालन जैसे कार्यों का कुशलतापूर्वक सम्पादन कर पाता था।
गौर करें रस्सी बँटी हुई, गुँथी हुई रचना का नाम है। कुरान की अरबी के विशेषज्ञ मार्टिन आर ज़ैमिट के मुताबिक “सबब” में गूँथने, बँटने का भाव भी निहित है। वे सेमिटिक भाषा परिवार की अन्य भाषाओं के कुछ शब्दों से भी समानता सिद्ध करते हैं जिनमें घूमने, गोलाई, मुड़ने और चक्कर लगाने के भाव हैं। गूँथना और बँटना में यही क्रियाएँ होती हैं। जैमिट के मुताबिक सीरियक में शबा, आरमेइक में सबा, हिब्रू का सबाब और फोनेशियन में सब्ब जैसे शब्द हैं। ध्यान रहे रस्सी एक माध्यम है। किन्ही दो बिन्दुओं के बीच किसी प्रयोजन को सिद्ध करने का ज़रिया। रस्सी का माध्यम या ज़रिया बनना महत्वपूर्ण है। रस्सी में कड़ी या माध्यम का भाव है जो दो बातों, दो बिन्दुओं, दो वस्तुओं को जोड़ने की वजह बनती है। हैन्स व्हेर, जे मिल्टन कोवैन की डिक्शनरी ऑफ मॉडर्न रिटन अरेबिक में भी “सबब” के प्राचीन मायने रस्सी

tent... तम्बू को खड़ा करने में रस्सी और डण्डे की बड़ी भूमिका है। इसी तरह मवेशियों को बांध कर रखने में भी रस्सी एक ख़ास ज़रिया है। तम्बू ही बद्दुओं का आश्रय था। तम्बू में ही गृहस्थी की अर्थवत्ता समायी है अर्थात दुनियादारी की सभी वस्तुएँ...

या तम्बू ही बताए गए हैं मगर “प्रयोजन, वजह, कारण, हेतु” जैसी अर्थवत्ता इनमें कैसे विकसित हुई होगी, इसका स्पष्टीकरण नहीं मिलता।
म्पत्ति, गृहस्थी, साज़ो-सामान, कीमती पदार्थ, जमाजत्था, झोला-डण्डा जैसे अर्थों के पर्याय के रूप में अगर माल-“असबाब” पर विचार करें तो प्राचीन अरब समाज का जन-जीवन उभरता है। अरब के विस्तीर्ण मरुस्थलों में बद्दु जाति के लोग अपने मवेशियों के साथ सतत यायावरी करते थे और दाना-पानी मिलने पर यहाँ-वहाँ डेरा जमा लेते थे। अरबी में माल का अर्थ होता है पशु और असबाब यानी शिविर, तम्बू। इन दोनों से मिल कर बनता है माल-असबाब जिसमें समूची गृहस्थी या कीमती वस्तुओं का समावेश हो जाता है। प्राचीन घूमंतू जनजातियों के जीवन का सबसे बड़ा आधार ही उनके पशु और उनका तम्बू होता था। कबाइली जनजातियों के लिए खानाबदोश जैसी उपमा से भी यह स्पष्ट होता है। “खाना” का अर्थ होता है प्रकोष्ठ या आश्रय। यहाँ तम्बू का भाव स्पष्ट है। “दोश” यानी कंधा अर्थात अपने कंधों पर अपना घर लिए फिरने वाले लोग यानी बेदुइन ही खाना-ब-दोश हुए। तम्बू को खड़ा करने में रस्सी और डण्डे की बड़ी भूमिका है। इसी तरह मवेशियों को बांध कर रखने में भी रस्सी एक ख़ास ज़रिया है। तम्बू ही बद्दुओं का आश्रय था। तम्बू में ही गृहस्थी की अर्थवत्ता समायी है अर्थात दुनियादारी की सभी वस्तुएँ। हिन्दी के झोला-डण्डा, झोला-रस्सी जैसे शब्दयुग्म में समूची गृहस्थी की अर्थवत्ता समायी हुई है।
स्पष्ट है कि “माल-असबाब” में सबब के प्रचलित अर्थ यानी कारण, वजह, प्रयोजन की अर्थवत्ता महत्वपूर्ण न होते हुए इसके प्राचीन भाव का ज्यादा महत्व है। यूँ कारण, वजह, प्रयोजन जैसे अर्थ भी रस्सी की अर्थवत्ता से ही विकसित हुए हैं। रस्सी में समाए माध्यम के भाव का विस्तार हुआ। वस्तुओं, पदार्थों, साज़ो-सामान, जमाजत्था जैसे अर्थ अकारण विकसित नहीं हुए। दरअसल दैनंदिन काम में आने वाली चीज़ें, उपकरण भी माध्यम हैं, एक जरिया हैं। प्रयोजन सिद्ध करने का माध्यम हैं। हमारे इर्दगिर्द जो असबाब है दरअसल वही जीवन का निमित्त है। जीवन का स्थूल अर्थ अब गृहस्थी के साधन जुटाना ही रह गया है सो साज़ोसामान के अर्थ में असबाब का प्रयोजन होना यहाँ सिद्ध है। जॉन प्लैट्स के कोश में  औपनिवैशिक दौर की हिन्दुस्तानी ज़बान में प्रचलित  असबाब के  उदाहरण  दिए हुए हैं जैसे असबाब ए पेशा अर्थात व्यवसायगत वस्तुएँ, असबाब ए जंग यानी युद्ध का साज़ोसामान, असबाब ऐ खानादारी यानी बैठकखाने की चीजें-फ़र्निचर, असबाब ए सफ़र यानी यात्रा की ज़रूरी चीज़ें।
ब बात “मालमत्ता” की। माल का अर्थ तो ऊपर स्पष्ट है। “मत्ता” दरअसल अरबी से आया शब्द है और हिन्दी में इसकी स्वतंत्र उपस्थिति न होकर“मालमत्ता” में ही देखने को मिलती है। अरबी में इसका शुद्ध रूप है “माअता” और इसे “मताआ” भी उच्चारा जाता है। अरबी मे प्रश्नवाचक सर्वनाम है “मा” जिसका अर्थ होता है- यह क्या है। इंडो-ईरानी भाषा परिवार में जिस तरह प्रश्नवाची सर्वनाम “की” के फ़ारसी रूपान्तर “ची” में पदार्थ की अर्थवत्ता आ जाने से “ची” का चीज़ रूपान्तरण हुआ और इसका अर्थ वस्तु हुआ ठीक वैसे ही अरबी सर्वनाम “मा” के साथ हुआ। “माअता” शब्द का अर्थ भी वस्तु ही होता है। “मताआ” में हर उस आमफ़हम चीज़ का शुमार है जो जीवन जीवन निर्वाह के लिए ज़रूरी है। उर्दू शायरी में “मता” शब्द का प्रयोग पढ़ने को मिलता है जैसे मता ए बाज़ार यानी बाज़ार में बिकने वाली वस्तु। मता ए ग़ैर यानी किसी और की चीज़।

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Monday, September 19, 2011

दिल चीज़ क्या है…नाचीज़ क्या है…

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कु दरती तौर पर नज़र आने वाली ज्यादातर चीज़ों के पैदा होने का एक ख़ास तरीका होता है मगर भाषा के बदलने और शब्दों के जन्म लेने के पीछे तयशुदा सिलसिला नहीं है। कोई शब्द आज जिस रूप में है, उसका कल क्या रूप होगा, कहा नहीं जा सकता। यही नहीं, बदले रूप में उसका क़िरदार क्या होगा इसका भी कुछ ठिकाना नहीं। हिन्दी में “चीज़”बड़ा आमफ़हम शब्द है। “चीज़” की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। सूक्ष्म से लेकर दीर्घकाय वस्तुएँ इसमें शामिल है। मामूली से लेकर बेशक़ीमती पदार्थ तक इसमें आते हैं। बेजान वस्तुओं से लेकर प्राणी तक इसके दायरे में शामिल हैं। क़ुदरत की बनाई नायाब चीज़ों में हीरा भी है और हीरे की खदान भी है। नदी भी है तो सागर भी। सहरा भी है और जंगल भी। हवा, पानी, पेड़, फूल, पत्ती, सोना, चांदी सब कुछ उन चीज़ों में शामिल है जिन्हें कुदरत ने बनाया है। इनसान भी इन्हीं में से एक चीज़ है। आशिकमिज़ाज लोग दिल को “चीज़” कहते हैं विनम्रतावश शरीफ़ लोग खुद को भी “नाचीज़” कहते हैं। चीज़ दरअसल फ़ारसी से बरास्ता उर्दू ज़बान, हिन्दी में दाखिल हुआ। हिन्दी की बोलियों में चीज़बस्त शब्दयुग्म भी प्रचलित है जिसका अर्थ है रोज़मर्रा के काम की वस्तुएँ। चीज़ में स्थूल रूप से पदार्थ का भाव है। इसमें चल-अचल सम्पत्ति, सामान, मालमत्ता, असबाब, सामग्री आदि सब कुछ शामिल है। जॉन शेक्सपियर के कोश के मुताबिक इसमें सरंजाम, डंडा-डेरा, साज़ो-सामान, घर-बार, झोला-तम्बू सब आ जाता है।
“चीज़” की व्युत्पत्ति के जन्मसूत्र इंडो-ईरानी भाषा परिवार के प्रश्नवाची सर्वनाम से जुड़े हैं। सृष्ठि में जो कुछ भी दृश्यमान है, सब “पदार्थ” की श्रेणी में आता है। वैशैषिक दर्शन में विश्व को छह पदार्थों (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय) में समेट दिया गया है। मनुष्य का मूल स्वभाव है अस्तित्व के प्रति जिज्ञासु होना। यह बहुत महत्वपूर्ण है। जागृत विश्व में अस्तित्व के प्रति जिज्ञासा प्रकट करने के लिए छह प्रकार के ककार हैं। हिन्दी में इन्हें प्रश्नवाची सर्वनाम अर्थात क्या, क्यों, कहाँ, कब, कैसे, कौन कहा जाता है। इन्हें ककार इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनमें “क” वर्ण या ध्वनि है। इसी तरह अंग्रेजी में फाईव डब्ल्यू और वन एच में भी यही बात हैं। गौरतलब है कि हमारे यहाँ "क" की महिमा है तो अंग्रेजी में "डब्ल्यू" की। इनमें रिश्तेदारी है, जिसकी चर्चा आगे। संस्कृत के “क” (कः) वर्ण में जिज्ञासा का भाव महत्वपूर्ण है। मेरा मानना है कि “चीज़” के मूल में भी इसी ‘क’ की माया है। हिन्दी की अनेक बोलियों में जानने के लिए, प्रश्नवाचक “की/ki” (की?) शब्द बोला जाता है। अभिप्राय “क्या” से होता है। “की” में “क्यों” का भाव भी है। इंडो-ईरानी भाषा परिवार में इस “की” का रूपान्तर “ची” में भी होता है। लोक बोली में मुख-सुख के आधार पर “क्यों” के “चों” या “च्यों” जैसे रूप भी सुनने को मिलते हैं। तुतलाने वाले भी “क्यों” की एवज में “च्यों” का उच्चार करते हैं।
हरहाल “की/ki” का प्रयोग “क्या” अथवा “कौन” के लिए होता है, यह स्थापित सत्य है। प्रश्नवाची सर्वनाम “किस” पर विचार करते हुए भाषाविज्ञानी भोलानाथ तिवारी संस्कृत के “कस्य” शब्द के आदिरूप “किस्य” की कल्पना करते हैं। इसमें संस्कृत के “किम्” का पुरानी फ़ारसी में “चिम्” रूप बतलाते हैं। इसी तरह डॉ फ्रिट्ज़ रोज़ेन भी फ़ारसी में कौन के लिए “की ki” और क्या के लिए “ची chi” शब्द में अंतर्संबंध बताते हैं। बात को और स्पष्ट करने के लिए एक और सर्वनाम की मिसाल देखते हैं। हिन्दी का अनिश्चयवाची सर्वनाम है “कुछ”। हिन्दी की विभिन्न बोलियों में इसके “कुच्छो, कछू, किछु” जैसे रूप भी मिलते हैं। इसका प्रयोग निर्जीव पदार्थों के अस्तित्व को उजागर करने के लिए होता है। उदयनारायण तिवारी समेत अनेक विद्वानों ने कुछ की व्युत्पत्ति किं-चिद् से मानी है जिसका हिन्दी रूप किंचित् है। पदार्थ के अस्तित्व का यही भाव “की/ki” के फ़ारसी रूपान्तर “ची” में भी देखने को मिलता है और इसी वज़ह से वस्तु या पदार्थ के अर्थ में ही प्रश्नवाची सर्वनाम “ची” का रूपान्तर “चीज़” हो गया। अलबत्ता पदार्थ के प्रति कुछ में जो तुच्छता का भाव है, वैसा “चीज़” में नहीं है। “चीज़” में जब तुच्छता प्रकट की जाती है तो उसके आगे विलोमार्थक “ना” उपसर्ग लगाकर “नाचीज़” शब्द बनाया जाता है अर्थात जो तुच्छ हो। तुच्छ वही है जो हीन है, क्षीण है या महीन है। जाहिर है चीज़ में महत्व निहित है। यह भी कि किं-चिद् से अगर “कुछ” बनता है तो “ची”(की) से “चीज़” बनना तार्किक है।
चीज़ में ज्यादातर वैशिष्ट्य, महत्वपूर्ण जैसी अर्थवत्ता है। कोई खास वस्तु, कीमती पदार्थ, मालमत्ता, माल-असबाब, सम्पत्ति, खास आदमी वगैरह चीज़ के दायरे में आते हैं। मराठी में भी “चीज़” और “चीज़बस्त” शब्द का अर्थ कीमती पदार्थ, खास बात या कोई पदार्थ, टुकड़ा, पीस piece ही है। जेटी मोल्सवर्थ अपने मराठी कोश में चीज़ का अर्थ स्पष्ट करते हुए मिसाल देते हैं कि गायन जैसी कोई चीज़ नहीं ( गायना सारखी दुसरी चीज नाहीं) ज़ाहिर है यहाँ चीज़ का अभिप्राय कला से है। यानी पदार्थ की श्रेणी में गुण भी शामिल है। इसके विपरीत मराठी में कभी कभी तुच्छता का भाव प्रकट करने के लिए भी चीज़ का प्रयोग होता है जैसे- इस लड़के ने तो मेरी मेहनत की “चीज़” कर दी (ह्या पोराने माझ्या श्रमाचे चीज केले) यहाँ आशय मेहनत पर पानी फेरने से ही है। खानोलकर और सरमोकदम के मुताबिक बखानने योग्य बात, सराहने योग्य बात भी “चीज़” हैं मसलन किसी कविता की पंक्ति, कोई उक्ति या श्लोक आदि। संगीत घरानों में पुरानी घरानेदार बंदिश को चीज़ कहने की रिवायत रही है जैसे-राग दरबारी की एक चीज़ पेश है।
इंडो-ईरानी परिवार का “चीज़” शब्द अंग्रेजी में भी गया और वहाँ इसका रूप हुआ Cheese. पश्चिमी भाषाविज्ञानियों के अनुसार अंग्रेजी का चीज़ Cheese भी उर्दू-फ़ारसी के चीज़ से ही गया है जिसका अर्थ है पदार्थ, कुछ आदि। भाषा विज्ञानियों के मुताबिक पुरानी फ़ारसी में “किस-की” जैसे शब्दों का अर्थ वही था जो संस्कृत के “कस्य” या “किस्य” का था। यहाँ ध्यान रखा जाना चाहिए कि बाद के दौर में किस-की के “चिस-ची” जैसे रूप बने होंगे तभी “ची” से “चीज़” जैसे सूप सामने आए। “किस” में भी “कौन” का ही भाव है। एटिमऑनलाइन के मुताबिक इसका रिश्ता प्रोटो इंडो-यूरोपीय धातु kwo- से ही जिससे ही अंग्रेजी का “हू who” (कौन) बना है। गौर करें संस्कृत में भी प्रश्नवाचक सर्वनाम “क/ka” से शुरू होते है और भारोपीय भाषाओं में भी जैसे अवेस्ता में को, रूसी में क्तो, लिथुआनी में कस, लैटिन में क्वी, क्वे, क्वोद, स्लोवानी में कुतो ( संस्कृत के कुतः से साम्यता देखें) आदि। बात यहाँ भी प्रश्नवाची सर्वनाम से ही जुड़ रही है। अंग्रेजी के चीज़ की अर्थवत्ता भी महत्वपूर्ण है। औपनिवैशिक काल के शुरुआती दौर में इसकी अर्थवत्ता में तुच्छता का भाव था मगर बाद में असली माल, बड़ी बात या ऐसी कोई भी चीज़ जो खास हो, के अर्थ में चीज़ का मुहावरेदार प्रयोग होने लगा। हॉब्सन जॉब्सन के कोश से इसका पता चलता है।
ब आते हैं चीज़बस्त पर। दरअसल यह सामासिक पद है और “चीज़” तथा “बस्त” से मिल कर बना है। फ़ारसी में “बस्त” में भी वस्तु का ही भाव है। वस्तु का एक रूपान्तर बत्तू भी होता है। चीज़ भी पदार्थ है और वस्तु भी पदार्थ है। समान अर्थ वाले शब्दों के मेल से बने सामासिक पद अकसर लोकभाषा में मुखसुख के आधार पर बनते हैं जैसे सामान-सुमान। भारोपीय भाषाओं में “व” का रूपान्तर “ब” में होना आम बात है सो संस्कृत की वस्तु फ़ारसी में “बस्त” हो जाती है। वस्तु बना है “वस्” धातु से। संस्कृत की वस् धातु में रहने का भाव है। गौरतलब है कि वस्तु यानी पदार्थ के रूप में “वस्” धातु का अर्थ अवस्थिति, उपस्थिति या मौजूदगी से है। भाव अस्तित्व का ही है। वासः यानी मकान के अर्थ में निवास, आवास जैसे शब्द भी इसी मूल से आ रहे हैं। परिधान के अर्थ में कपड़ों के लिए वस्त्र शब्द भी इसी मूल से निकला है। वस् अर्थात जिसमें वास किया जाए। यह दिलचस्प है कि काया जिस आवरण में निवास करती है, उसे वस्त्र कहा जाए। वस् धातु का अर्थ होता है ढकना, रहना, डटे रहना आदि। यही नहीं, गाँव देहात में आज भी घरों के संकुल या मौहल्ले के लिए बास या बासा (गिरधर जी का बासा) शब्द काफी प्रचलित है। वस् से ही बना है वसति जिससे निवास या रहने का भाव है। हिन्दी का बस्ती शब्द इससे ही बना है। इस तरह वस्तु का अर्थ हुआ कोई चल या अचल पदार्थ।
कुछ लोग इस बस्त को बंदोबस्त या बस्तोबंद वाले बस्त से जोड़ कर देखते हैं। इस दूसरे बस्त का अर्थ होता है बांध कर रखा हुआ या बांधा हुआ। संस्कृत का “बद्ध” अवेस्ता में बस्तः हुआ जिसका मतलब हुआ जिसे बांधकर, जमा कर, तह कर या गठरी बांधकर रखा गया हो। इसी से बना फारसी-उर्दू में बस्ता यानी स्कूल बैग या पोथी-पोटली। पुराने जमाने में विद्याध्ययन के लिए छात्रों को दूर दूर तक जाना पड़ता था और वे घर से कई तरह का सामान साथ ले जाया करते थे। तब सफर भी पैदल या घोड़ों पर ही तय किया जाता था जाहिर है सामान को सुरक्षित रखने के लिए उसे बेहद विश्वसनीय तरीके से बांधकर या जकड़ कर रखा जाता था। यह क्रिया पहले बद्ध कहलाई फिर इससे बस्तः शब्द बना। इसमें गठरी बैडिंग या पुलंदे का भाव था। बाद में बस्ता के रूप में स्कूलबैग के अर्थ में सिमट कर रह गया।

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