Thursday, February 18, 2010

मलिका, गुलाम और मुल्क…

farming Coins
…पशु ही आदिम मानव की सम्पत्ति थे। इसीलिए भारतीय संस्कृति में इन्हें पशुधन कहा गया है। ये अलग बात है कि मालदार होने के बाद इन्सान धनपशु भी बनता है...
माज के विकास के साथ ही भाषा का भी विकास जुड़ा हुआ है। प्राचीनकाल में मानव समुदायों के क्रियाकलापों ने विभिन्न भाषाओं के शब्द भंडारों को समृद्ध किया है। आदिमकाल से ही मनुष्य सामाजिक प्राणी रहा है। सामाजिकता का विस्तार तब हुआ जब उसने स्थायी निवास के ठिकाने ढूंढ निकाले और इस तरह सजात कौटुम्बिक समाज की नींव पड़ी। हालांकि अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पशुपालन धर्म को अपनाकर वह इस सामाजिकता को एक विस्तार सदियों साल पहले भी दे चुका था। दरअसल मनुश्य स्वभाव से ही यायावर है। प्रवासी मन अक्सर निवासी होना चाहता है और सतत निवास से उकताहट ही उसे प्रवासी बनाती है। प्रवासी मनुष्य के साथ पालतु पशु भी यायावर बने रहे और जहां कहीं मनुष्य ने स्थायी बसेरा किया तो पशुओं के खूंटे भी वहीं गड़ गए। ये पशु ही आदिम मानव की सम्पत्ति थे। पशु और मनुष्य का साहचर्य विविध रूपों में नजर आता है। यह उपभोक्ता और उत्पाद के रूप में भी है और पारिवारिक-आध्यात्मिक धरातल पर भी है। सर्वप्रथम उसकी सत्ता पशुओं पर ही कायम हुई। उसने मानवेतर जीव-जगत का नियंता स्वंयं को स्थापित किया। तात्पर्य यह कि अधिकार, स्वामित्व और सम्पत्ति का बहुआयामी बोध अगर किसी ने मनुष्य को कराया है तो वे पशु ही हैं। भाषा में भी यह रिश्ता साफ नज़र आता है।
माल यानी पशु
र्दू –हिन्दी का एक आम शब्द है माल जो मूल रूप से सेमेटिक भाषा परिवार का है। माल का अर्थ होता है सम्पत्ति। व्यापक तौर पर धन-दौलत, सामान, भंडार, कीमती सामग्री, वस्तुएं आदि भी आती हैं।यह बना है माल अर्थात mawl (mwl) से जिसका अर्थ होता है पशुओं का रेवड़। खासतौर पर जो दुधारू पशु पालतू हों। सेमेटिक परिवार की हिब्रू, अरबी, सीरियक, आरमेइक आदि कई भाषाओं में इस धातु की व्याप्ति इसी अर्थ में हैं। जाहिर सी बात है कि पशु ही प्राचीन इन्सान की सबसे बड़ी सम्पत्ति थे इसीलिए पशुधन जैसा शब्द हिन्दी में प्रचलित हुआ। ये अलग बात है कि पशुधन से मालदार का रुतबा हासिल करनेवाले इन्सान के सामने जब पूंजी के विविध रूपों का प्रकटीकरण हुआ तो उसे धनपशु बनते भी देर नहीं लगी। साफ है कि माल यानी पशु। प्रचलित अर्थ में यही पशुधन ऐश्वर्य-सामग्री, धन-सम्पत्ति और दौलत है। जिसके पास माल है वह मालदार है अर्थात ऐश्वर्य वान है,

 Mahmud of Ghazni माम्लूक यानी गुलामवंश मुल्क के लिए एक अन्य शब्द है मम्लूक़त जिसका अर्थ प्रभुसत्ता सम्पन्न राष्ट्र होता है । इसी का बहुवचन है ममालिक यानी बहुत से देश। प्राचीन काल में अरब में गुलामों के लिए मम्लूक शब्द प्रचलित था। जाहिर सी बात है गुलाम भी रसूख़दार का माल अर्थात सम्पत्ति ही होता है। बग़दाद के अब्बासी खानदान को सत्ताच्युत करने में गुलामों की बग़ावत काफी मददगार रही। ये विद्रोही गुलाम बाद के शासकों द्वारा वफादारी का ईनाम पाने लगे और इन्हें फौज में अच्छे ओहदे मिलने लगे। इन्हें भी मम्लूक या माम्लूक कहा जाने लगा। मध्यकाल में तुर्की और मिस्र में इनसे नया राजवंश बना माम्लूक सुल्तानों का। भारत में इन्हीं के संबंधियों ने एक तरह से मुस्लिम शासन की नींव डाली थी। महमूद गज़नवी का रिश्ता माम्लूकों से ही था।भारत में भी  गुलाम वंश ने दिल्ली पर राज किया है। कुतुबुद्दीन, इल्तुत्मिश, बलबन, रजिया ये सब माम्लुक ही थे। साफ है कि माल शब्द की अमलदारी काफी व्यापक है । इस शब्द की प्रभुसत्ता में सिर्फ और सिर्फ ऐश्वर्य है। यह शब्द मालदार को मालिक बनाता है तो गुलाम को माम्लूक अर्थात राजवंशी भी बनाता है। razia-sultana गौर करें कि हिन्दी में इन दिनों धन के फूहड़ प्रदर्शन करनेवाले मालदार को धनपशु कहने का चलन बढ़ गया है। यह ग़लत नहीं है क्योंकि माल अपने मूल रूप में पशु से ही जुड़ा हुआ है इसलिए पशुधन और धनपशु का विपर्यय स्वाभाविक है।

धनी है, श्रीमंत है। माल का रिश्ता इस तरह अर्थ यानी धन से स्थापित होता है। आर्थिक स्थिति के लिए हिन्दी में आमतौर पर माली हालत शब्द खूब प्रचलित है। मालमत्ता, मालामाल जैसे शब्द युग्म भी माल की ही देन हैं। लेन-देन अथवा व्यवसाय के तौर पर मुद्रा की भूमिका सबसे पहले पशुधन ने ही निभाई।
मालिक, मालगुज़ार, मिल्कीयत
म्पत्ति और ऐश्वर्य के रूप में मालदार यानी परमशक्तिशाली हुआ। वह स्वामी है। अर्थात सम्पत्ति का मालिक है। यह मालिक शब्द भी इसी कड़ी का हिस्सा है। मालिक अर्थात स्वामी, प्रभु, शक्तिशाली, पति आदि। ऐश्वर्य का स्वामी ही ईश्वर कहलाता है उसी तरह माल का स्वामी मालिक हुआ। सम्पत्ति के लिए एक अन्य शब्द है मिल्कीयत जो इसी कड़ी का शब्द है। माल का रिश्ता कर अथवा राजस्व से भी है इसके लिए मालियः शब्द है । राजस्व वसूली करनेवाले कारिंदे का मुग़लकाल में मालगुज़ार कहते थे। राजस्व को मालगुज़ारी भी कहा जाता था। मालखानः या मालखाना सरकारी कोषागार होता था जिसमें सरकारी जब्ती के तहत सामान, बरामदगी, वसूली की राशि, लगान, अनाज आदि जमा किया जाता था। यह व्यवस्था आज भी कायम है। कलेक्ट्रेट में और पुलिस थानों में मालख़ाना ज़रूर होता है।
मुल्क, मलिका और मलिक
स सिलसिले की सबसे दिलचस्प कड़ी है मुल्क। सेमेटिक मूल का यह शब्द आज दुनियाभर में देश या कन्ट्री के रूप में मशहूर है। माल, मालिक जैसे शब्दों से आगे मुल्क शब्द की अर्थवत्ता में सार्वभौम साम्राज्य का भाव समा गया। मुल्क का मालिक राजा होता है इसीलिए मालिक का एक अन्य राजा भी होता है। मालिक का ही दूसरा रूप मलिक भी है जो प्रायः रसूखदार लोगो की उपाधि भी रही है। रानी के लिए मलिका शब्द भी प्रचलित है। मलिका-सुल्तान, मलिका-आलिया जैसे शब्द इतिहास की किताबों में खूब पढ़े जाते रहे हैं। पुरानी हिन्दी में मल्लिक और मल्लिका शब्द भी इन्हीं अर्थों में लिखने का चलन रहा है मगर अरबी मूल के मलिक-मलिका का इन शब्दों से रिश्ता नहीं है। संस्कृत के मल्लिः से ये दोनो शब्द बने हैं जिसका अर्थ होता है एक प्रकार की चमेली। मल्लिः बना है मल्ल से जिसमें शारीरिक क्रियाएं, व्यायाम आदि का भाव है। मल्ल कृष्ण और शिव का नाम भी है। इसीलिए मल्लिकार्जुन भी शिव का एक नाम है। मल्लिका यानी चमेली का फूल। मल्लिक यानी एक खास हंस। अलबत्ता पंजाबी और बंगालियों में मलिक या मल्लिक सरनेम भी होता है जो निश्चित ही मुगलों के ज़माने में दी जानेवाली उपाधि का असर है।
अमला, अमलदारी
माल शब्द में समुच्चय का ,परिपूर्ण करने, भरने, एकीकृत करने , समोने का भाव भी है। जब कभी निर्माण कार्य चल रहा होता है तो निर्माण सामग्री ; खास-तौर पर कंक्रीट-गारा को माल ही कहते हैं, यह इसी अर्थ में है। इसके लिए मम्लू शब्द भी है। राष्ट्र या देश क्या है ? नागरिकों का समुच्चय ही ! किसी स्थान विशेष पर लोगों की तैनाती और उपस्थिति के संदर्भ में भी इस धातु से अलग शब्द का निर्माण होता है जैसे अमला। खासतौर पर विशिष्ट कर्मचारियों के जत्थे के लिए अमला शब्द प्रयुक्त होता है। यह विशिष्टता ही उनके कर्तव्य को भी महत्वपूर्ण बनाती है जिसके क्रियान्वयन को अमल करना या अमल होना कहते हैं। यह अमल भी इसी कड़ी का हिस्सा है। जिस तरह अरबी माल में फारसी का दार प्रत्यय जुड़ने से मालदार शब्द बनता है वैसे ही अमल में भी दार जुड़ कर अमलदार शब्द बनता है अर्थात रसूखवाला व्यक्ति। –संशोधित पुनर्प्रस्तुति

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13 कमेंट्स:

RaniVishal said...

बहुत अच्छी जानकारी के साथ बहुत अच्छा शब्द विश्लेश्ण प्रस्तुत करने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

'अदा' said...

वाह, शब्दों की घुस-पैठ कहाँ तक हो सकती है...
एक 'माल' ने किसको-किसको क्या-क्या बना दिया..कमाल है ...!!
वैसे आपकी पोस्ट पढ़ने की अब लत पड़ने लगी है..
बहुत शुक्रिया..!!

Udan Tashtari said...

आभार इस ज्ञानवर्धक आलेख का.

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छी जानकारी धन्यवाद्

किरण राजपुरोहित नितिला said...

बहुत बढ़िया और रोचक .

Baljit Basi said...

यह संशोधित आलेख बहुत अच्छा बन गया.
बुरी नीयत से देखने वाले सुन्दर लड़की को भी 'माल' बोलते हैं . एक तरमाल भी होता है. माल-डंगर, माल-ढांडा शब्द युग्म भी हैं.
मुल्क राज, मलकीत सिंह, म़ल सिंह आदि व्यक्ति नाम हैं.
पंजाब के (हिन्दू सिख) जट्टों का गोत 'मलिक' है लेकिन शायद इस का संबंध यह अरबी वाले मालिक से नहीं. कहते हैं महाभारत में इनका जिकर है.( तदैव मरधाश चीनास तदैव दश मालिकाः कषत्रियॊपनिवेशाश च वैश्यशूद्र कुलानि च)
मल्ल तो पहलवान को भी बोला जाता है. और मल्ल का मतलब (कम से कम पंजाबी में) रखना, रोकना, (जगह) घेरना, कब्ज़ा करना, होता है. मल्लोमल्ली का मतलब जबरदस्ती होता है.
मालमत्ता में 'मत्ता' का क्या मतलब है?
'मल्लिक और मल्लिका .......संस्कृत के मल्लिः से ये दोनो शब्द बने हैं जिसका अर्थ होता है एक प्रकार की चमेली। मल्लिः बना है मल्ल से जिसमें शारीरिक क्रियाएं, व्यायाम आदि का भाव है।' थोडा स्पष्ट करें, शारीरिक क्रियाएं, व्यायाम आदि का चमेली से क्या सम्बन्ध?

ali said...
This comment has been removed by the author.
ali said...

@ बलजीत जी
बुरी नियत से सुन्दर लड़की को माल कहते ज़रूर हैं पर यह स्थायी भाव नहीं है ! शादी के बाद माल / मम्लूक और मलिका , किसे कहा जायेगा ये अंतर सब को समझ में आ जाता है...और हाँ कई शादीशुदा बन्दे यहां मालिकुल्मौत ( मलकुलमौत ) लफ्ज़ का इस्तेमाल भी करते हैं :)


@ अजित भाई
हमेशा की तरह बेहतरीन !

Baljit Basi said...

@अली जी,
शादी के बाद तो आदमी खुद माल(-डंगर) बन जाता है.

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी जानकारी। धन्यवाद।

Mansoor Ali said...

माल बनता है मल ही आखिर में,
'आज' बनता है 'कल'* ही आखिर में.

धन पशु है; पशु भी धन ही है,
चल भी होता अचल ही आखिर मे.

शब्दो से माला-माल कर रहे है अजित जी, प्रेरणा दायक पोस्ट, कुछ और भी शेर हो गये है,
http://mansooralihashmi.blogspot.com पर डाल रहा हू.,

Mansoor Ali said...

@ बलजीत बासी

''खूबसूरत'' भी 'माल' होता है,
सच है 'बासी' की गल ही आखिर में.

@अली ....

अब न पछताइए अली साहब,
खोटा सोना 'निकल' है आखिर में. ''nickel''

ali said...

@ मंसूर अली साहब
:)

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