Tuesday, February 16, 2010

फ़िरक़ों की अफ़रातफ़री, क़यामत आने को है…

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हि न्दी के सबसे ज्यादा इस्तेमालशुदा शब्दों में अफ़रातफ़री का भी शुमार है जिसका मतलब है अस्तव्यस्त होना, हंगामा होना, बदहवासी फैलना आदि। इस शब्द के और भी कई प्रयोग होते हैं जैसे गड़बड़ी फैलना, घोटाला होना, गोलमाल करना आदि जिनमें मूलतः अनियमितता और बेकायदगी की बात उभर रही है। मुहावरे की शक्ल में इसका प्रयोग अफ़रातफ़री मचना या अफ़रातफ़री फैलना जैसे वाक्यों में होता है। किसी समूह, समाज या समुच्चय की तयशुदा व्यवस्था में घोर व्यतिक्रम आने का परिणाम है अफ़रातफ़री। इसमें नियमों का टूटना, अनुशासन की धज्जियां उड़ना या फिर शांत गतिशील समाज में अचानक किसी भयकारी घटना से उत्पन्न अव्यवस्था है। यानी अफ़रातफ़री में गड़बड़ी का तत्व तो हर हाल में विद्यमान है। भारत की कई भाषाओं में यह शब्द विविध रूपों में है मसलन मराठी में यह अफरातफर है जिसमें अव्यवस्था के साथ साथ रिश्तवतखोरी, आर्थिक अनियमितता या असंतुलन का भाव है। हिन्दी में भी आर्थिक अनियमितता  या भ्रष्टाचार के संदर्भ में पुराने लोग अफ़रातफ़री शब्द का इस्तेमाल करते हैं पर ज्यादातर के लिए अफ़रातफ़री के मायने आज अव्यवस्था ही है। खैर, इल्म की अफ़रातफ़री में इतना भी कम नहीं!!!
फ़रातफ़री हिन्दी में फ़ारसी ज़बान से आया मगर मूल रूप से यह है अरबी ज़बान का जहां इसका मूल रूप कुछ और है। यह दरअसल एक शब्दयुग्म है जो सेमिटिक भाषा परिवार की अरबी के दो लफ्जों इफ्रात और तफ्रीत या तफ़्रीक़ से socialism_vs_capitalismashx मिलकर बना है। हिन्दी में बाहुल्य के लिए इफरात शब्द प्रचलित है। अफ़रातफ़री दरअसल इफ्रात और तफ्रीत (तफ़्रीक़) है। मूल अरबी में यह  इफ्रात ओ तफ्रीत या इफ्रातो-तफ्रीक़ है। इसका फारसीकरण हुआ अफ़रा-तफ़री। हिन्दी में यह  हो गया अफरातफरी। इफ्रात ओ तफ्रीत जैसा पद (टर्म) दरअसल इस्लाम धर्म के सम्यक और मानवतावादी दर्शन से उपजा है। ईश्वर की बसाई इस दुनिया में जो कुछ भी चल-अचल रचनाएं हैं वे सब सुंदर हैं और सब पर सबका बराबर का हक़ है। यहां कोई छोटा बड़ा नहीं है, सब समान हैं। न सिर्फ कुर्आन में बल्कि सभी धर्मग्रंथों में यही संदेश किसी न किसी पैग़म्बर के हवाले से आया है, क्योंकि उन्हें अपनी भटकन और साधना के बाद यही तत्वज्ञान मिला था।  हिन्दुस्तानी सरज़मीं के मशहूर शायर इब्ने इंशा साहब यही बात बड़ी खूबसूरती से कहते हैं-इस जग में सबकुछ रब का है, जो रब का है, वो सबका है
रबी के इफ्रात ifrat शब्द बना है फ़रात्ता से जिसमें आधिक्य का भाव है। इफ्रात का अर्थ भी आधिक्य, प्रचुरता, बहुत सारा, बाहुल्य, अधिकता या बहुतायत है। इसी तरह तफ्रीत tafrit का अर्थ है कमी, न्यूनता, नष्ट करना, नुकसान करना आदि। कुछ संदर्भों में तफ्रीक के स्थान पर इफ्रातो-तफ्रीक़ भी मिलता है। अरबी में तफ्रीक बना है फ़राक़ा faraqa धातु से जिसका अर्थ है अंतर करना, भेद करना आदि। इससे बने तफ्रीक़ का मतलब हुआ फूट डालना, अलग-अलग करना, बड़ी संख्या में से छोटी घटाना वगैरा वगैरा। रोज़मर्रा की हिन्दी में इस्तेमाल होनेवाला शब्द फ़र्क इसी धातुमूल से उपजा है जिसके मायने भी अंतर, भेद, पार्थक्य आदि हैं। जातिभेद या वर्गभेद को अरबी फारसी में फिरक़ापरस्ती / फ़िरक़ावाराना कहा जाता है और हिन्दी में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है। इसमें जो फ़िरक़ा है वह इसी फ़राक़ा से जन्मा है। वर्ग शब्द का अर्थ ही है खाना या खण्ड। अर्थात बंटवारा या भेद। खण्ड-खण्ड करना यानी टुकड़े टुकड़े करना। सो फ़राका  की आत्मा और फ़र्क़  यानी  भेदभाव की मिट्टी से जो ढ़ांचा बना उसका नाम फ़िरक़ा तो होना ही था।  हम मनुष्य की बजाय बनिया-बसोड, कायस्थ-कुर्मी, ब्राह्मण-भंगी और मियां-मुसहर बने रहने में फ़ख़्र महसूस करते हैं।
कुरान में इफ्रातो-तफ्रीत (या तफ्रीक़) का सीधा-सादा सा मतलब निकलता है किसी को कम ज़्यादा न समझना, किसी भी किस्म की अति से बचना। संस्कृत में भी अति सर्वत्र वर्जयेत् उक्ति प्रसिद्ध है। सनातन हिन्दू परम्परा से लेकर जैन, बौद्ध धर्म तक सादगीपूर्ण जीवन की सलाह देते हुए संग्रह से बचने का उपदेश देते हैं। संग्रह में  समुच्चय है जिसकी रचना आधिक्य से होती है। कामना, लोभ, ईर्ष्या, वासना सभी कुरूपताओं के मूल में यही संग्रहवृत्ति है इसीलिए परिव्राजक के लिए अपरिग्रह का व्रत अनिवार्य है। मगर गृहस्थ के लिए भी अपरिग्रह ज़रूरी है। monkeys-survivingकिसी शायर ने खूब कहा है-और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन, मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे। यानी ग्रहस्थ भी उतने में गुज़ारा करे जितने में शांति और मंगल की सृष्टि हो जाए। सुखानुभव संग्रह में नहीं बल्कि निरपेक्ष जीवन में है। कबीर भी कह गए हैं कि साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।।
सामाजिक व्यवहार में किसी भी तरह का फ़र्क़ वैमनस्यता लाता है। तफ्रीक़ में यही बात है। खुदा की बनाई दुनिया में जब  खुद सिरजनहार ने फ़र्क़ नहीं किया तो हम बंदे कौन होते हैं आपस में फ़र्क़ करने वाले? इसी तरह तफ़्रीत में जो न्यूनता या कमी का भाव है उसकी व्याख्या यही है कि समाज में रंगभेद, जातिभेद और वर्गभेद करनेवाले हम कौन हैं? रंग में, बोली में, जाति में, हैसियत में गरज़ ये कि हर बात में कमी निकालना। यही तफ़्रीत है। तौलना है तो खुद के गुणों को तौलें और खामियों को दूर करें। इस तरह इफ़्रातो-तफ़्रीत (तफ्रीक़) के मायने हुए न्यूनाधिक्य, कमोबेश, थोड़ा-बहुत, कम-ज्यादा आदि। यानी संदेश यही है कि हमें संतुलन रखना है। न ज्यादा और न ही कम। हमारे हर कर्म में तारतम्य, संतुलन बना रहे। किसी बात की कमी भी बुरी और ज्यादती भी खराब। मध्यमार्ग सही है। क़यामत के दिन खुदा की तराजू पर तो सभी एक भाव तुलेंगे फिर आपस में फ़र्क़ क्यों करें?
गर इन्सान यह नहीं समझता है और इसी वजह से सारी गड़बड़ियां पैदा हो रही हैं। पर्यावरण से लेकर आर्थिक मोर्चे पर और जीव जगत से लेकर अध्यात्म तक। यही है इफ़्रातो-तफ़्रीत (तफ्रीक़) का मूल भाव अर्थात असंतुलन या गड़बड़ी। ईश्वर की बनाई दुनिया में सबके लिए सब कुछ बराबर होना चाहिए था, मगर यहां हुआ इफ्रातो-तफ्रीक यानी भेदभावपूर्ण बंटवारा जिसे गड़बड़झाला कहा जा सकता है। हिन्दी में कहें तो न्यूनाधिक्य। इफ्रातो-तफ्रीक़ में मूल अरबी में ही संभवतया अंतस्वरालोप हो गया होगा और असंतुलन के अर्थ में इसके मायने सामने आए होंगे। अरबी से फ़ारसी में जाकर इसमें से या क़ का लोप हुआ और बना अफ़रा-तफ़री जिसमें भी मूलतः गड़बड़ी या असंतुलन का ही भाव था। अर्थ विस्तार होते होते इसके दार्शनिक मायने फ़ना हो गए और जो बचा रह गया उसमें अव्यवस्था, गड़बड़ी, हड़बड़ी, घोटाला, गोलमाल जैसे स्थूल भाव ही उजागर होते हैं। यानी इफ़्रातो-तफ़्रीत (तफ्रीक़) में भी अफ़रातफ़री हुई। मुमकिन है क़यामत के दिन भी लोग अफ़रातफ़री का फ़ायदा उठाना चाहें! क्या खुदा की आंखों में धूल झोंक पाएंगे?

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14 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

बहुत जबरदस्त आलेख. आभार.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अरे व्यस्तता इत्ती भी नहीं के आपका एकदम डीटेल से रीसर्च किया आलेख ना पढूं
अजी, आप की हर कड़ी पढ़कर इतनी काम की जानकारी मिल जातीं हैं के हम बस पढ़ते ही रह जाते हैं और वाह वाह
कहते हैं ...आप का लेखन, बदस्तूर जारी रहे अजित भाई
और, ' अफरातफरी ' आजकल हर न्यूज़ चेनल पर सुनाई देता है ..मैं भी सोच रही थी ' ये शब्द आया कहाँ से ? '
और लो, आपने हल खोज कर सामने रख दिया
बहुत स्नेह के साथ,
- लावण्या

'अदा' said...

baap re kya research karte hain aap shabdon par kamaal hai..
very impressive..

hamari taraf se..
GOOD
GOODER
GOODEST...:)
shabdon ke safar mein galat shabd likh kar jaa rahi hun..himmat hai meri ..ye hamari afratafri hai :)

श्यामल सुमन said...

बहुत ही शानदार और ज्ञानवर्धक पोस्ट। जवाब नहीं आपका।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

Devendra said...

..मुमकिन है क़यामत के दिन भी लोग अफ़रातफ़री का फ़ायदा उठाना चाहें! क्या खुदा की आंखों में धूल झौंक पाएंगे?
..'अफ़रातफ़री' का सुंदर प्रयोग. अच्छी पोस्ट.

किरण राजपुरोहित नितिला said...

बहुत बढ़िया जानकारी है.

ऑनलाइन होते ही सबसे पहले शब्दों का सफ़र पढ़ती हू जैसे गणेशजी का नाम लेते है काम शुरू करने से पहले वैसे ही . यही जिज्ञासा रहती है की आज जाने क्या मजेदार होगा.और यह मजेदारी कभी कम नहीं होती .एक से बढ़कर एक बढ़िया जानकारिया मिलती है.

Vidhu said...

मुझे अच्छा लगा ...और आपने याद दिलाया इसलिए भी ....बहुत दिनों से आपके ब्लॉग पर आना भी नहीं हुआ सच जिन्दगी का हर दिन इतनी अफरा-तफरी में बीत जाता है की क्या बताएं....स्वास्थ्य, घर गृहस्थी नातेदारियाँ ,सामाजिक संबंध व्यक्तिगत काम, लिखना पढ़ना ,स्वयं के कामों की मुश्किलें ...आप समझ सकतें हेँ ...लेकिन ऐसा भी नहीं की इतना शोधपरक आलेख न पढ़ा जाए .आपने मूल अफरा तफरी शब्द के शोध को इतने व्यापक रूप से समझाया है की सब कुछ याद हो गया है इसके दार्शनिक मायने भी भले ढंग आपने बताये बधाई ....एक बात सच है कोई भी इंसान चाहे जो कर लें खुदा की आँखों में धूल नहीं झोंक पायेगा

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छी जानकारी धन्यवाद्

ali said...

अजित भाई
इफ्रातो तफ्रीत से अफ़रा तफ़री का फ़िरकेवाराना सफर कुछ यूं लगता है जैसे ...
कमोबेश सब रब का है ...रब सबका है इक दर्शन था फिर फ़र्क हुआ रब मेरा है जो मेरा है तो रब का क्या ? सब गोलमाल !

Baljit Basi said...

बहुत खूब भाई. पंजाबी में यह शब्द बन गया: 'हफ्ड़ा-दफड़ी' . इस शब्द ने तो हमारी भाषाओं में पैर ही जमा लिए. खूब घुला मिला है. 'अँधा-धुंद',' आपा-धापी', 'पैरों में आग मचाना' मुहावरे भी इसके नजदीक हैं.
शायर इब्ने इंशां साहब का तो मैं फैन हूँ, ज्यादा इस लिए भी कि इसका जन्म-स्थान पंजाब में मेरे गाँव के पास ही है. फिलौर हमारी सांझी त्सील है.

पंकज said...

खूब अफ़रातफ़री मचाई आपने पर बेहतर के किये. बड़े दिन से आपके ब्लाग पर आना न हुआ था. आया तो पाया फिर वही शब्दों का जादू.मैंने पूर्व में भी निवेदन किया था, पुन: है, क्या ये पूरा ज्ञान पुस्तक रूप में एकत्रित मिलेगा.

पंकज said...

अरे ! नीचे जाकर पढ़ा तो मन खुश हो गया, अब प्रतीक्षा रहेगी मई की जब किताब आयेगी. राजकमल से कहियेगा इसे महंगा न करें.

अजित वडनेरकर said...

आपने कुछ ग़लत नहीं लिखा अदा जी। गुड गुड़र गुडेस्ट मेरी एक पोस्ट का हिस्सा बन चुके हैं। कृपया यहां देखें-http://shabdavali.blogspot.com/2009/02/blog-post_21.html

Mansoor Ali said...

अफरा-तफरी के आलम में भी सफ़र की डगर पर आपके क़दम साबित है, दार्शनिक मिजाज़ वाली पोस्ट...अच्छी लगी,

अफरा-तफरी का है आलम हरसू,
गेहूँ बोया था उग गयी सरसू,
टलते आये थे अब तलक कल पर,
अब तो कहने लगे है वो परसू.

-मंसूर अली हाश्मी
http://mansooralihashmi.blogspot.com

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