Thursday, February 11, 2010

रक्तपात, खूनखराबा और विरक्ति

पिछली कड़ियों-img1090614025_1_1पहले से फौलादी हैं हम…और जब आंख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है....से आगे

सं स्कृत में खून के लिए रक्त के अलावा एक अन्य शब्द है शोण जिसका मूलार्थ है लाल रंग। इसमें लालिमायुक्त गहरे रंग का भाव भी है। सिंदूर, अग्नि, सूर्य, माणिक, मणि अथवा लाल गन्ने को भी शोण कहा जाता है। लाल रंग से जुड़ कर शोण का अर्थ बनता है रक्त, रक्तिम या रक्ताभ। शोण एक नदी का भी नाम है। संभवतः आज की सोन नदी इसका ही अपभ्रंश है। सोनभद्र के लिए प्राचीन संदर्भों में शोणभद्र उल्लेख भी मिलता है। बिहार की राजगृह पहाड़ियों का एक नाम शोणगिरि भी है। शोण से ही बना है शोणित शब्द जिसका अर्थ है रक्त। लाल चंदन को शोणित चंदन कहा जाता है। इसके अलावा शोणित का अर्थ ताम्बा, लाल पत्थर, गुलाल, केसर आदि भी भी होता है। संस्कृत का वर्ण फारसी में जाकर में तब्दील होता है। भाषाविद् आनंद गहलोत के अनुसार इसी शोण का परिवर्तित रूप फारसी में खून हुआ। हालांकि जॉन प्लैट्स के कोश के अनुसार फारसी का खून शब्द अवेस्ता के वोहनिश vohunish या vohuni से बना है। यहां आदिव्यंजन का लोप हो रहा है और ध्वनि में बदल रही है। अन्तिम व्यंजन का भी लोप हो रहा है। तब जाकर वोहनिश से खून बन पाना संभव लगता है। यह व्युत्पत्ति कुछ दुरूह और अव्यावहारिक लगती है। रक्त के अर्थ में वोहनिश शब्द निश्चित ही वह् धातु में निहित बहाव के गुण के आधार पर बना होगा।
शोण से खून शब्द बनने की बात ज्यादा तार्किक लगती है क्योंकि मध्यकालीन फारसी में रक्त के लिए ख़ोन xon शब्द प्रचलित था। नुक़ते वाला ख़ फारसी में रोमन वर्ण x से व्यक्त किया जाता है। विभिन्न संदर्भों के मुताबिक वोहनिश का अर्थ रक्त न होकर रक्त का बहाव है। इसका मूलार्थ है स्रियों का मासिक धर्म। इस तरह देखें तो फारसी के ख़ून का रिश्ता संस्कृत के शोण, शोणित से जुड़ता है न कि वोहनिश से। वैसे डॉ विल्हेम ग्रैगर के मुताबिक vohuni की मूल संस्कृत धातु वस् है। पश्तो से लेकर सुदूर तुर्की तक फैले विशाल क्षेत्र में इस शब्द के विविध रूप देखने को मिलते हैं जैसे बलोची में यह होन है तो कुर्दिश में ख्विन, पश्तो में इसे विन कहते हैं और ज़ज़ाकी में गुन। फारसी में खून का अर्थ रक्त तो होता ही है साथ ही इसका अर्थ हत्या या मौत के घाट उतारना भी होता है। किसी का खून हो गया शब्द में हत्या का ही भाव है। खून शब्द से बने कई मुहावरे हैं जो बरास्ता फारसी, हिन्दी-उर्दू में प्रचलित हैं जैसे खून सफ़ेद होना या ख़ून पानी होना अर्थात सहज मानवीय रिश्तों-भावनाओं का तिरोहित होना। जाहिर है खून का असली गुण गर्मजोशी है। खून जब पानी हो जाएगा तब blood123रिश्तों में ठण्डक तो महसूस होगी ही। यही बात खून के सफेद होने में है। लाल रंग ही उसकी जीवंतता का प्रतीक है। मृतदेह धीरे धीरे सफेद पड़ती जाती है क्योंकि खून पानी बनने लगता है। खून की नदियां बहाना मुहावरा आमतौर पर कत्लेआम या नरसंहार के संदर्भ में प्रयुक्त होता है। इसी तरह मारपीट या हिंसा के लिए खून-खराबा होना मुहावरा है। खून ख़ौलना यानी उत्तेजित होना। बहुत अधिक तंग करने के अर्थ में खून चूसना या खून पीना जैसे मुहावरे प्रचलित हैं। बहुत अधिक परिश्रम और लगन के लिए खून-पसीना एक करना मुहावरा बहुत लोकप्रिय है। अपमान सहने या क्रोध को दबाने के लिए खून का घूंट पीना मुहावरा कहा जाता है।
संस्कृत धातु रंज् [ranj] का मतलब होता है लाल रंग या रंगे जाने योग्य। लाल होना, चमकना, प्रसन्न होना, संतुष्ट होना। अब गौर करें कि चेहरे की चमक आमतौर पर उसके रक्ताभ होने से ही झलकती है और चेहरा तभी चमकेगा जब मन में प्रसन्नता होगी, सो प्राचीनकाल में मुख्य रंग के तौर पर लाल की ही प्रधानता मानी गई। उगते और डूबते सूर्य के रंग भी यही हैं जिनसे प्रकृति की चमक उजागर होती है। खून के लिए हिन्दी में रक्त शब्द प्रचलित है जो रंज् धातु से जन्मा है। यूं रक्त का अर्थ है रंगना, रंगा हुआ होना, लाल रंग का, रंगीन आदि। एक लाल रंग का बीज रक्तिका (Abrus precatorius)कहलाता है। राजस्थानी मालवी में उसे गुंजा भी कहते हैं। यह रक्तिका भार की एक इकाई भी है जिससे सोना चांदी तौली जाती है। बोलचाल की भाषा में इसे रत्ती कहते हैं। पल में रत्ती, पल में माशा जैसी कहावत में यही रत्ती है जिसका अर्थ है घड़ी घड़ी बदलता रवैया। बारीक से बारीक बात का पता रहने के अर्थ में राई-रत्ती का हाल पता होना मुहावरा कहा जाता है।  रक्त में उपसर्ग लगने से बनता है आरक्त यानी लालिमा या लाल होना। संसार के Chapter4-2 मोह-बंधन को त्याग कर परिव्राजक हो जाने वाले को विरक्त कहा जाता है जो रक्त में वि उपसर्ग लगने से बना है। गौर करें रक्त में जीवन का उल्लास, लगाव और खुशी का भाव है। वि उपसर्ग का प्रयोग अनुपस्थिति के अर्थ में होता है। यानी जब मनुष्य के मन में नैराश्य घर कर जाता है तब उसे विरक्ति कहा जाता है। किसी के प्रति विशेष अनुराग या जुड़ाव का भाव अनुरक्त शब्द से भलीभांति व्यक्त होता है। खूनखराबा के लिए रक्तपात शब्द भी प्रचलित है। रक्त में जुड़ाव का भाव महत्वपूर्ण है तभी रक्त संबंध जैसा शब्द बना।
रंगरेज को हिन्दी में रजक भी कहते हैं जो इसी कड़ी का शब्द है। रंज् से बने रंगः में रंगने का मसाला, वर्ण, मनोरंजन स्थल, रंगशाला, नाट्यशाला, महावर आदि कई अर्थ शामिल हो गए है। यही रंग फ़ारसी में भी जस का तस मौजूद है और फारसी के प्रत्ययों, उपसर्गों के ज़रिये कई नए शब्द बन गए हैं जितने हिन्दी में भी नहीं बने । इनमें से ज्यादातर आम बोलचाल में प्रचलित हैं मसलन-रंगीन, रंगत, रंगदार, रंगबरंग, रंगरेज, रंगसाज़, रंगारंग, रंगीनमिजाज़, रंगों बू, रंगरोगन वगैरह। रंग शब्द ने कई मुहावरे भी बनाए है जैंसे रंगबाजी, रंगदारी, रंग दिखाना, रंग उड़ना, रंग जमाना, रंग बदलना, रंग में आना, रंगा सियार और रंगे हाथों पकड़ना आदि। रंगत बदलना या चेहरे की रंगत बदलना में खून की भूमिका स्पष्ट है। हर्ष या विषाद के क्षणों में शरीर में रक्त प्रवाह घटता-बढ़ता है जिसे चेहरे के रंग बदलने से साफ समझा जा सकता है। रंज् धातु से ही बना है राग जिसका मतलब भी वर्ण, रंग, लालिमा, अबीर-गुलाल, महावर आदि होता है मगर इसका अर्थ खुशी, आनंद, उल्लास के साथ साथ एकदम विपरीत क्रोध और रोष भी होता है। मराठी में गुस्से के लिए बहुप्रचलित शब्द राग ही है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की विभिन्न स्वरसंगतियों को भी राग ही कहा जाता है राग यानी लगाव के विपरीत अर्थ वाला शब्द है विराग या वैराग्य  जिससे बना है बैराग या बैरागी

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16 कमेंट्स:

Sanjay Kareer said...

बिल्‍कुल सही कहा .... रक्त में जुड़ाव का भाव महत्वपूर्ण है। एकदम सटीक जानकारी वाली पोस्‍ट...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत बढ़िया रहा आज का अंक. और हाँ, आपकी पुस्तक के लिए बधाई.

हिमांशु । Himanshu said...

बेहद खूबसूरत प्रविष्टि । आभार ।

Udan Tashtari said...

रक्तिका-बहुत उगा करती थीं हमारे घर के पास.

आनन्द आ गया इस अंक में. शानदार जानकारी.

अभय तिवारी said...

बहुत बढ़िया विवेचना हुई है!

Baljit Basi said...

अगर 'लहू' ग़ालिब के शेर से शुरू किया था तो आतिश का क्या कसूर था कि 'खून' का आगाज़ उसके इस शेर से नहीं हुआ:
बहुत शोर सुना था पहिलु-ए-दिल में
चीर कर देखा तो कतरा-ए-खून निकला.
खैर बात यह है कि 'शोण' का मुझे कम से कम पंजाबी में कोई अवशेष भी नहीं मिला. लेकिन कहने से डरता हूँ कहीं आप खफा- खून न हो जाओ.वैसे 'वोहनिश' से खून का रिश्ता भी नहीं जुड़ता लगता. सोन नदी कि व्याख्या मैं ने गोल्ड वाले सोने से जुडी सुनी थी. नदीओं में पत्थर गीटे घिस घिस कर सोने जैसे चमकीले हो जाते हैं. कश्मीर का सोनमर्ग मैंने देखा है, उसके पहाड़ बिलकुल सोने की तरह पीले पीले चमकते हैं, पास में गलेशिअर से घिस घिस आते पत्थर भी चमकते हैं. शोण बिहार क़ी एक नदी का नाम भी है/था जिस का रंग लाल था. वैसे भरोसा आप पर ही है आप की तो खून पसीने की कमाई है.
रंज् ने तो चारों तरफ रंग लाये हुए हैं. पंजाबी में 'रती' का मतलब थोडा सा भी है( रती ठहर जा). फिर 'सग्गा-रत्ता' जैसा खूबसूरत शब्द है.
पंजाबी में रत्ता का मतलब लाल है. रत्ता सालू शादी में दुल्हन डालती है.
स्कीट 'लाख'(अंग्रेजी lac) का सबंध भी इस से जोड़ता है. संस्कृत लक्ष>लक्त्का>रक्ताक .

'रत्त' और 'खून' का एक साथ वर्णन गुरु नानक की मशहूर बाबर वाणी में आता है जिस में बाबर के भारत पर हमले ने भारतीय जनता पर कितने कहर ढाए, उसका मार्मिक चित्रण मिलता है:
खून के सोहिले गावीअहि नानक रतु का कुंगू पाइ वे लालो

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत सुगठित और महत्वपूर्ण आलेख है। बधाई!

Mansoor Ali said...

लहू के रंग में मिश्रण बढ़ा सफेदी का,
हुआ जो हल्का तो दिखने लगा है भगवा सा,
रगों का रंग हरा सांप सा नज़र आये,
हमारी सोच को क्यों लग गया है लकवा सा.

-मंसूर अली हाशमी

http://mansooralihashmi.blogspot.com

Mansoor Ali said...

@ बलजीत बासी
'आतिश' का शेर शायद कुछ इस तरह है:-

बहुत शौर सुनते थे पहलू में दिल का,
जो चीरा तो एक कतरा-ए-खूँ न निकला.

-मंसूर अली हाशमी

किरण राजपुरोहित नितिला said...

बहुत रोचक जानकारी दी आपने .
रक्तिका को राजस्थानी में चिरमी कहा जाता है. इससे गुड्डा गुड्डी की आँखे बनाई जाती थी .साथ ही यह बाजूबंद गोरबंद और चोटी के लच्छो में पिरोई जाती है.इसकी सुन्दरता के कारन राजस्थानी लोकगीतों में चिरमी लोकगीत बहुत मनचाहा है सबका.कही यह बाबोसा की लाडली बताई गई है कही इसे सहेली भी कहा गया है.गीत कुछ इस तरह है-------
चिरमी भोली म्हारी चिरमी
चिरमी रा डाळा च्यार
वारी जाऊ चिरमी रे
चिरमी बाबोसा री लाडली
आतो दोड़ी दौड़ी पीवर जाय
वारी जाऊ चिरमी रे

चढती ने दिखे मेड़तो
उतरती ने गढ़ अजमेर
वारी जाऊ चिरमी रे -------
लोक गीत देखिये -------
http://www.youtube.com/watch?v=WNYPTATZlpM
इस सुन्दर बीज की तासीर गरम है. गायों के बछड़ा जनने के बाद चिरमी पीस कर दी जाती है. कुम्भलगढ़ की पहाडियों में इसके झाड़ देखे जा सकते है.

अजित वडनेरकर said...

@बलजीत भाई,
संस्कृत में स्वर्ण और शोण दोनो शब्दों का अर्थ लाल और पीला होता है। सोन नाम की कई कई नदियां भारत में हैं। मूलतः इनकी व्युत्पत्ति शोण, स्वर्ण, स्वर्णा से मानी जा सकती है। जल प्रवाह में पत्थरों का घिसकर चमकीला होने से नामकरण सोना नहीं होता है बल्कि नदी से बहकर आते रेतकणों में स्वर्णिम चमक से सोन, सोना या स्वर्णा नाम सार्थक होता है। पुराने ज़माने में नदियों की रेत से सोना निकालने की तकनीक लोगों को ज्ञात थी। हालांकि यह श्रमसाध्य और खर्चीली ज्यादा थी।
सोनमर्ग पर अलग से पोस्ट लिखी है, ज़रूर देखें। वह हरी-भरी वादी प्राकृतिक समृद्धि की वजह से सोनमर्ग है। सोना समृद्धि का भी प्रतीक है। पंजाबी की ही तरह हिन्दी में अल्पमात्रा, किंचित या ज़रा सा के अर्थ में रत्ती शब्द का प्रयोग होता है। रत्तीभर यानी ज़रा सा, थोड़ा सा आदि।

अजित वडनेरकर said...

@किरण राजपुरोहित
आपने खूब याद दिलाया। राजस्थान में रहते हुए चिरमी शब्द सुन चुका हूं और लोक गीत भी सुने हैं। वैसे गुंजा शब्द को लेकर भी लोकगीत रचे जा चुके हैं। चिरमी शब्द चर्मरी से बना है। संस्कृत चर्मन् में त्वचा या खाल के अलावा रुधिर अथवा लाल रंग का भाव भी है। चर्मरी का अर्थ रंगीन या रक्तिका इस रूप में सार्थक है। कुछ शब्दकोशों में इसे चिरमिटी भी कहा गया है।

Baljit Basi said...

मंसूर अली जी, मैंने इस शेर के दो तीन और भी रूप सुने थे. बहुत शोर की जगह बादा शोर भी सुना. लेकिन आप की बात ठीक होगी, आप शायरी वाले हैं.

Mrs. Asha Joglekar said...

रत्ती रत्ती सच्ची आपने मेहनत की है । इतने सुरक्त आलेख के लिये धन्यवाद ।

ali said...

अजित भाई आपकी मेहनत को सलाम ! आपको पढ़ते हुए सोच रहा था स्वजनता , शत्रुता, द्वेष , विच्छेद , अनुराग ,ऐय्याशी , परजीविता,कृपणता,धोखेबाजी, गुंडागर्दी , अपमान, क्रोध और क़त्ल ...क़त्ल... जिस्मो का ही नहीं ,अरमानों का भी , वगैरह वगैरह...कितने सारे रंग बिखेरता है खून ...यह केवल लालिमा कहां है !

निर्मला कपिला said...

आश्चर्य हो रहा है आपके ग्यान पर लाजवाब पोस्ट है धन्यवाद्

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