Wednesday, February 10, 2010

जब आंख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है....

red-rose-side पिछली कड़ी-पहले से फौलादी हैं हम…से आगे

सं स्कृत की लोह् धातु में मूलरूप से लाल रंग का भाव है। वैसे इसका अर्थ है किसी भी किस्म की धातु। धातु अर्थ में भी इसमें ताम्बा का भाव प्रबल है। लोह् से जुड़े लाल रंग के भाव का विश्लेषण करें तो लाल रंग की महिमा नजर आती है। लौह अयस्क जिस मिट्टी से निकलता है वह लाल रंग की होती है। जाहिर है लाल रंग की मिट्टी से लौह अयस्क निकलने की वजह से ही लोह् शब्द का जन्म हुआ जिसका अर्थ लाल रंग है। ताम्बा धातु भी लाल रंग की होती है और प्राचीनकाल से ही इस धातु का ज्ञान मनुष्य को था इसलिए लोह् में ताम्बे का भाव भी है। गौर करे कि खून के लाल रंग में भी लौह तत्व का ही महात्म्य है इसलिए रक्ताल्पता की अवस्था में डॉक्टर खून में लौहतत्व बढ़ानेवाली दवाइयां देते हैं साथ ही हरी सब्जियां खाने की सलाह देते हैं ताकि खून में लोहा घुल सके।
खिर खून और लोहे में कुछ रिश्तेदारी तो है। यह रिश्तेदारी सिर्फ रंग की वजह से है या कोई और वजह भी है? शब्दों के सफर में तो इस रिश्तेदारी में सिर्फ रंग ही नज़र आ रहा है। संस्कृत की लोह् धातु का रिश्ता रुह् धातु और उससे बने रोह शब्द से है जिनमें आगे बढ़ने, गति करने, विकसित होने के साथ लाल रंग का भाव भी है। ऐसा लगता है रुह् से ही लोह का विकास हुआ है। शरीर में हर तरह की गति सिर्फ रक्त संचार से ही होती है। हृदय से लेकर मस्तिष्क तक में अगर रक्त गति भ्रमण न करे तो शरीर का जीवित रहना असंभव है। पैरों से सिर की ओर रक्त की गति ऊर्ध्वगामी होती है। रोह से ही बने हैं आरोहण, रोहण जैसे शब्द जिनमें चढ़ना, बढ़ना, ऊपर उठना जैसे अर्थ निहित हैं। पर्वतारोहण शब्द से यह उजागर है। राजगद्दी पर बैठने के लिए सिंहासनारोहण में यही रोह धातु नज़र आ
iron ore-1फौलाद शब्द बना है फारसी के पुलाद से जिसका रिश्ता लौह lauha से है। इस शब्द के विभिन्न रूप मध्यएशिया, मध्यपूर्व की भाषाओं में प्रचलित हैं। गौरतलब है कि संस्कृत के लोह धातुमूल में सोना, चांदी, ताम्बा समेत लाल रंग का भाव प्रमुख है…
रही है। रुह् का अगला रूप हुआ रुध् जिसका भारोपीय धातुरूप है reudh जिसमें लाल रंग का भाव है। रक्त के लिए संस्कृत हिन्दी में रुधिर शब्द है जो इसी धातु से बना है। गौर करें अंग्रेजी के रेड red शब्द पर जो इसी मूल से उपजा है जिसका अर्थ लाल रंग होता है। कई यूरोपीय भाषाओं में इसके मिलते जुलते रूपांतर हैं जैसे स्वीडिश में यह रॉड है तो डच में रुड और लिथुआनी में रुडास। गालों पर लाली लाने के लिए लगाए जानेवाले रूज़ शब्द की व्युत्पत्ति भी इसी मूल से हुई है। यहां रुह् में निहित गतिवाचक भाव पर गौर करें तो पाएंगे कि ज्यादा परिश्रम करने से शरीर में रक्त प्रवाह तेज होता है और चेहरा लाल हो जाता है। परिश्रमी व्यक्ति का रंग अक्सर ताम्बई या लाल होता है जो रक्त की वजह से है। रुह धातु से ही बना है रोहित जिसका  अर्थ है लाल, लालरंग का, एक प्रकार का हिरण जिस पर ताम्बई या पीले चित्ते पड़े हों। रोहितम् का अर्थ है केसर, जाफरान या अग्नि। गौर करें ये सभी ताम्बई या लाल आभा से युक्त हैं।
रोहित का अगला रूप होता है लोहित। यहां रोह के लोह में बदलने का तिलिस्म समझ में आ रहा है। रोह के गतिवाचक भाव ने लोह धातु में सिर्फ लाल रंग से रिश्ता रखा। लोहित का अर्थ भी लाल ही होता है। इसके अन्य अर्थ हैं- ताम्बा, मंगल ग्रह, रुधिर, जाफ़रान, केसर आदि। लाल चावल को भी लोहित कहते हैं। असम की प्रसिद्ध नदी ब्रह्मपुत्र का एक नाम लोहित भी है क्योंकि लगातार पहाड़ों से बह कर आते पानी की वजह से उसका रंग धूसर, मटमैला रहता है। एक शब्द है नीललोहित जिसका अर्थ है गहरे लाल रंग का। लाल रंग के अर्थ में ताम्बई, सुनहरी और पीतवर्ण का समावेश लोह शब्द में निहित है। आमतौर पर फारसी का समझा जानेवाला लहू शब्द भी लोह मूल से ही उपजा है। रक्त के विकल्प में खून और लहू दोनों ही खूब इस्तेमाल होते हैं। लहू शब्द का प्रयोग शायरी और मुहावरों में खूब हुआ है। ग़ालिब के एक शेर का प्रसिद्ध मिसरा है-जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है। जाहिर है, कठोर वर्णों की तुलना में कोमल वर्णों का चयन करनेवाले फारसी के खास चरित्र को अपनानेवाली हिन्दुस्तानी से उपजी उर्दू ने रक्त की बजाय लहू को कहीं आसानी से अपनाया। इससे बने कुछ मुहावरे जैसे लहू-लूहान होना यानी ज़ख्मी होना, लहू का प्यासा iron_ore_1होना, आंख से लहू टपकना यानी उद्दाम आवेग में आंखे लाल होना, लहू पीना यानी किसी को बहुत ज्यादा कष्ट देना या लहू का पानी होना यानी किसी की गैरत का मर जाना या स्वाभिमान गंवाना आदि। हिन्दी में लहू के एक रूप लोहू भी है जो लोह यानी लोहा के अधिक नज़दीक है।
लोहे का जिक्र हो तब लोहे में लगने वाले ज़ंग का उल्लेख भी ज़रूरी है। अंग्रेजी में इसे रस्ट rust कहते हैं जो इसी मूल से उपजा है। रस्ट का अर्थ होता है लाल या लाल रंग। इसका प्रयोग लोहे की ऊपरी सतह पर नमी के चलते जमने वाली लाल रंग की परत के संदर्भ में होना शुरू हुआ। अंग्रेजी में यह प्राचीन जर्मनिक के rudu से आया। भारोपीय धातु reudh से यूरोपीय भाषाओं में रेड यानी लालरंग समेत कई शब्द बने जिसका एक रूप पुरानी अंग्रेजी का rusta भी था जिसने अंग्रेजी में रस्ट का रूप लिया। -जारी

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9 कमेंट्स:

वाणी गीत said...

बहुत उपयोगी जानकारी ....शब्दों का इतना विस्तृत ज्ञान

Udan Tashtari said...

हमेशा की तरह बेहतरीन और उपयोगी जानकारी. आभार.

डॉ. मनोज मिश्र said...

सही है..

ali said...

स्वाद आना शुरू ही हुआ कि आपने कह दिया 'जारी' चलो वो भी पढलें फिर टिपियायें !

किरण राजपुरोहित नितिला said...

तभी शायद लहू को लोही भी कहते है हमारे यहाँ.

Baljit S Basi said...

My remarks could not be carried to the comment box because of some computer hitch. It was really very frustrating, my whole effort went to nought.Instead I am sending you a poem written by a revolutionary punjabi poet named Paash. He was killed by Khalistani terrorists because of his bold views. He was really a very popular poet , his poems were translated into many languages.I give below one of his poem. It is not a very good poem but just relevent to todays post:
लोहा
(पाश)
तुम लोहे की कार का आनन्द लेते हो
मेरे पास लोहे की बन्दूक है

मैंने लोहा खाया है
तुम लोहे की बात करते हो
लोहे के पिघलने से भाप नहीं निकलती
जब कुदाली उठाने वालों के दिलों से
भाप निकलती है तो
लोहा पिघल जाता है
पिघले लोहे को
किसी भी आकार में
ढ़ाला जा सकता है

कुदाली में देश की तकदीर ढ़ली होती है
यह मेरी बन्दूक,
आपके बैंकों की सेफ,
पहाड़ों को उलटाने वाली मशीने,
सब लोहे की हैं

शहर के वीराने तक हर फर्क
बहन से वैश्या तक हर एहसास
मालिक से मुलाजिम तक हर रिश्ता
बिल से कानून तक हर सफर
शोषण तंत्र से इंकलाब तक हर इतिहास
जंगल, कोठरियों और झोपड़ियों से लेकर इंटरोगेशन तक
हर मुकाम, सब लोहे के हैं

लेकिन आखिर लोहे को
पिस्तौलों, बन्दूकों और बमों की
शक्ल लेनी पड़ी है
आप लोहे की चमक में चुँधिया कर
अपनी बेटी को बीबी समझ सकते हैं
मैं लोहे की आँख से
दोस्तों के मुखौटे पहने दुश्मन
पहचान सकता हूँ
क्योंकि मैंने लोहा खाया है
आप लोहे की बात करते हैं

Parul said...

rochak jankari :)

शरद कोकास said...

ग़ालिब के शेर का मिसरा शीर्षक में देकर शुरुआत आपने की , फिर बलजीत भाई ने पाश को उद्धृत किया ..तो मैं पीछे क्यों रहूँ ..प्रस्तुत है कवि अरुण कमल की यह चर्चित कविता ..
"अपना क्या है इस जीवन में
सब तो लिया उधार
सारा लोहा उन लोगों का
अपनी केवल धार "

रंजना said...

अद्भुद विवेचना...वाह !!!
कहाँ कोमलता की पराकाष्ठ रूह/ह्रदय/मन और कहाँ कठोरता की पराकाष्ठा लौह ....और दोनों का कैसा सम्बन्ध विवेचित कर दिया आपने...

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