Sunday, February 14, 2010

बहादुर की जाति नहीं होती[माई नेमिज खान-2]

पिछली कड़ी-माई नेमिज खान बहादुर पठान [1] 

मध्यकाल में बहादुर शब्द की महिमा खान शब्द की तरह ही बढ़ती रही। शौर्यसूचक इस शब्द की व्याप्ति सिर्फ शासक वर्ग तक सीमित न रहकर आम लोगों में भी हुई।
हादुर शब्द भी खान की तरह तुर्क-मंगोल संस्कृति से उपजा है जिसका इस्तेमाल मुगलों और अंग्रेजों ने रेवडियां बांटने में किया। इस शब्द की अर्थवत्ता और उससे जुड़ा रुतबा इतना जबर्दस्त है कि उत्तर भारत की मार्शल कौमों (लड़ाका जातियां) में पुरुषों के नाम के साथ यह शब्द लगाना शान की बात मानी जाती है मसलन- विजय बहादुर, जंग बहादुर। यही नहीं, नेपाल के क्षत्रियों में तो यह परंपरा इतनी प्रचलित है कि भारत में तो अब नेपालियों के लिए बहादुर शब्द ही पहचान बन गया है। बहादुर शब्द वैसे तो हिंन्दी में उर्दू-फारसी के जरिये आया मगर है तुर्की जबान का। बल्कि यूं कहें कि इसकी पैदाइश मंगोल जबान में हुई और परवरिश तुर्की जबान में। तुर्की में इसका उच्चारण होता है बगातुर यानी वीर, योद्धा, बलवान या नायक। इसी तरह मंगोल जबान में इसका उच्चारण होता है बघातुर। मूलतः तुर्क-मंगोल (पश्चिमी एशिया वाला तुर्की नहीं बल्कि मध्यएशिया के तुर्कमेनिस्तान वाला तुर्क, जहां से तुर्किक समुदाय और भाषा का उद्गम हुआ है) भाषा परिवार का शब्द है बघातुर  जिसमें रुतबा, शौर्य और जुझारूपन के भाव है। समुच्चय रूप में ये सभी भाव योद्धा से जुड़ते हैं और इसका अर्थ भी यही है-वीर, लड़ाका। एक पौराणिक शूरवीर जिसके किस्से लोकगाथाओं में मिलते हैं। बघातुर शब्द तुर्क-मंगोल संस्कृति से निकल कर मध्यकाल में सुदूर पूर्व से लेकर पश्चिम में बुल्गारियाई भाषाओं में विभिन्न रूपांतरों के साथ प्रचलित हो गया। इस शब्द को लोकप्रिय बनाने में खान नामधारी तुर्क-मंगोल बघातुरों का ही योगदान रहा मसलन चंगेज़ खान। तेरहवीं सदी में एशिया से यूरोप तक फैले उसके विशाल साम्राज्य में इस नाम की महिमा खान शब्द की तरह ही बढ़ती रही। शौर्यसूचक इस शब्द की व्याप्ति सिर्फ शासक वर्ग तक सीमित न रहकर आम लोगों में भी हुई।
मंगोल भाषा में इस शब्द का व्यापक प्रयोग होता रहा। इसका कारण रहा मंगोल अमीरों और राजाओं द्वारा अपने नाम के साथ इसका प्रयोग करने का चलन। प्रसिद्ध मंगोल योद्धा चंगेज खान के पिता का नाम था येसुगी बघातुर(1100-1180) और उसके दादा का नाम था बैरतान बघातुर। जाहिर है नाम के साथ इस लफ्ज के इस्तेमाल की रिवायत भी मंगोलिया से चल कर तुर्कमेनिस्तान, ईरान होते हुए हिन्दुस्तान और नेपाल तक आम हो गई। उधर ईरान के उत्तर में जॉर्जिया होते हुए यह रूस में दाखिल हुआ और फिर एशिया की सरहद लांघते हुए यूरोप की बुल्गारी भाषा में समा गया।  Abdul_Ghafar_[15]बुल्गारी में इसका उच्चारण बगातुर, रूसी में बोगातिर, पोलिश में बहातेर, फारसी और हिन्दी उर्दू में बहादुर, जॉर्जियाई में बगातुर, हंगारी में बतोर, उज्बेकी, तातार और कुर्दिश में बातिर, तुर्किक में बातुर और मंगोल में बटोर है। मंगोलिया की राजधानी उलानबटोर में भी यही बहादुर शब्द झांक रहा है जिसका मतलब होता है बहादुरों का घर।
भारत के उत्तरी इलाके में बहादुर का बोलबाला कुछ इस कदर बढ़ा कि इसके हिन्दी अर्थ वीर ने इसका साथ देना पसंद किया। नतीजतन बहादुरों की शान बढ़ाने वाला एक नाम और बन गया-वीर बहादुर। भारत में जब मुस्लिम शासन खत्म हुआ तो अंग्रेजों ने प्रभावी हिन्दू और मुस्लिम ज़मींदारों को उपाधियां बांटीं जिनमें खान बहादुर मुसलमानों के लिए थी और राय बहादुर हिन्दुओं के लिए। मज़े की बात यह कि खान और बहादुर दोनों ही शब्द मंगोल मूल के थे, जिनका धर्म से कोई लेना देना नहीं था। यह फर्क करना सबसे पहले अंग्रेजों ने ही शुरू किया। शब्दों का सफर अजीब होता है। खान की जो प्रभावशीलता अंततः धर्म की चमक से जुड़ गई, वहीं उसी मूल से निकले बहादुर शब्द में वीरता का भाव बरक़रार रहा और इसका दायरा हिन्दू-मुस्लिम दोनों कौमों में विस्तृत होता रहा।
सी किस्म का एक शब्द है पठान यानी खालिस अफगानी लोग। भारतवर्ष की आज़ादी के वक्त जब दोनों देशों के कई नेता बेहद आत्ममुग्ध, स्वार्थ के नशे में चूर थे तब इस देश का एक महान नेता तथाकथित राष्ट्रवादियों के हाथों ठगे जाने से सर्वाधिक दुखी था। वह एक सच्चा पठान था- खान अब्दुल गफ्फार खान यानी सीमांत गांधी। विभाजन के पूर्व  भारत के पश्चिमी क्षेत्र पख्तूनिस्तान में आजादी की अलख जगानेवाला सीमांत गांधी। हिन्दुस्तान का विभाजन न होता तो आज शायद इस्लामी आतंकवाद नाम की समस्या भी यहां नहीं होती। भारत के मुस्लिम समाज में बहुत से लोग पठान उपनाम का इस्तेमाल करते है। आज पठान शब्द से एक धर्म या जाति-विशेष का हो कर रह गया है मगर किसी वक्त ऐसा नहीं था, बल्कि पश्चिमोत्तर भारत के एक खास इलाके में रहनेवाले सभी लोग पठान कहलाते थे ठीक वैसे ही जैसे पंजाब निवासी पंजाबी, महाराष्ट्र के लोग मराठी और गुजरातवासी गुजराती। दरअसल इस्लाम के जन्म से भी सदियों पहले वैदिककाल में जब अलग-अलग गण हुआ करते थे भारत के उत्तर-पश्चिमी इलाके में पक्थ नाम का एक गण था। इसका क्षेत्र आज के रावलपिंडी से लेकर अफगानिस्तान के दक्षिण-पूर्वी इलाके तक थे। इसमें उत्तर में आज के पेशावर-काबुल से लेकर दक्षिण मे क्वेटा जैसे इलाके आते हैं।
खास बात ये कि ये समूचा क्षेत्र पहाड़ी है। पख्त शब्द मूल रूप से पष् धातु से बना है जिसमें ऊंचाई, बुलंदी और मजबूती जैसे अर्थ निहित हैं। समझा जा सकता है कि ये सब विशेषताएं पहाड़ में ही होती है और पहाड़ी क्षेत्र होने से ही इसे पक्थ नाम मिला होगा। इससे बने पठार(हिन्दी ), पुख्ता (फारसी) और पाषाण् ( संस्कृत) जैसे शब्द भी इसी तथ्य को साबित करते हैं। जाहिर है पक्थगण का एक रूप पहले पश्त या पष्त रहा होगा। क्योंकि आज भी इस इलाके के लोग खुद को पश्तून कहते हैं। इनकी बोली भी पश्तो या पुश्तो कहलाती है। पक्थ गणवासी ही पख्तून कहलाए। इन लोगों का इलाका पख्तूनिस्तान कहलाया और पख्तून से ही बना पठान। अविभाजित भारत में पेशावर, सियालकोट, रावलपिंडी के हिन्दू भी पठान ही थे और मुस्लिम भी। भारत में मुस्लिम आक्रमण के वक्त तक इस पूरे क्षेत्र में हिन्दू राजा जयपाल का शासन था जो पठान था। छह सदी ईसापूर्व हुए प्रख्यात वैयाकरण पाणिनी भी पठान थे। रावलपिंडी, क्वेटा जैसे क्षेत्रों में आज भी हिन्दू अल्पसंख्यक हैं और वे पठान ही हैं। पठानकोट  नाम के साथ पठान शब्द भी किसी ज़माने में वहां पठानों की बहुतायत होने का संकेत करता है। महाराष्ट्र में पैठण नाम का स्थान अपनी नफीस बुनावट वाली साड़ियों और संत एकनाथ के जन्मस्थान के लिए मशहूर है। प्राचीनकाल में इसका नाम प्रतिष्टान था जिसका अपभ्रंश पैठण हुआ। ग्रियर्सन ने अपने भाषायी सर्वे में इसे पश्तून का भारतीय रूप समझा था।

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21 कमेंट्स:

Sanjay Kareer said...

औरंगाबाद में एक इलाके का नाम पैठण गेट है। दो बार जा चुका हूं... आपने पुरानी यादें ताजा करा दीं। पठानकोट की भी...। अब विश्‍लेषण की गहराई और बढ़ती जा रही है। पढ़ कर आनंद आ गया।

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया विश्लेषण रहा. जय हो!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत रोचक और सतर्क (तर्क के साथ? - इस पर भी कुछ कहिये कभी मौक़ा मिले तो) , खासकर पाषाण और पख्तून का अन्तरंग सम्बन्ध.

हिमांशु । Himanshu said...

"मज़े की बात यह कि खान और बहादुर दोनों ही शब्द मंगोल मूल के थे, जिनका धर्म से कोई लेना देना नहीं था। यह फर्क करना सबसे पहले अंग्रेजों ने ही शुरू किया।"
यही बात सालती है । ऐसे अनगिनत फर्क करना अंग्रेजों ने शुरु किया । हम समझ नहीं सके ।

बेहतरीन विश्लेषण । आभार ।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

हमारे यहा भी नाम के बीच मे वीर लगाते है मेरा स्कूली नाम धीरेन्द्र वीर सिंह ....... लेकिन अब लगता है आंखो से अन्धे नाम नयन सुख

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर और काम की जानकारियाँ दीं।

प्रशांत पाण्डेय said...

भाषा विज्ञान का इतना गहरा अध्ययन।लगता है पुरा भारोपीय भाषा परिवार कन्ठस्थ हो चुका है।ब्लोग जगत में आते ही आप जैसे मर्मज्ञ से मुलाकात। बहुत सुन्दर लगी आपकी यह प्रविष्टि।धन्यवाद।

Baljit Basi said...

'रावलपिंडी, पठानकोट, क्वेटा जैसे क्षेत्रों में आज भी हिन्दू अल्पसंख्यक हैं और वे पठान ही हैं।' आप किस पठानकोट की बात कर रहे हैं? पूर्वी पंजाब के पठानकोट में तो मेरी जानकारी अनुसार हिन्दू अल्पसंख्यक नही हैं यहाँ के ६०% लोक हिन्दू, ३२% सिख, ८% ईसाई, 0 .४% मुस्लिम हैं. हाँ, इसका पठानों से सम्बन्ध जरूर है.

निर्मला कपिला said...

बहुत बडिया जानकारी है धन्यबाद्

अजित वडनेरकर said...

बलजीत भाई ,
भाषायी चूक थी, दूर कर दी है। रावलपिण्डी-क्वेटा के बीच तड़फड़ा रहे पठानकोट को मुक्ति दिलाने का शुक्रिया...

ali said...

अजित भाई बहादुरी केवल शौर्य , जुझारूपन ही नहीं बल्कि सौन्दर्य...बांकपन और कौशल के भाव को भी अभिव्यक्त करती है ! कह नहीं सकता कि बोगातिर ,बघातुर आदि आदि से इसका शब्द साम्य या कोई सम्बन्ध है भी कि नहीं किन्तु अर्थ में शौर्य के साथ बांकपन जुड़ता ही है ! कुछ बरस पहले जोधपुर गया था वहां ,पैलेस के मुख्य द्वार पर पढ़ा, रण बंका राठौर ! जंग बहादुर और रण बंका / बांकुड़े / बांकुरे में शाब्दिक रिश्तेदारियों का तो पता आप लगायें पर शौर्य जुझारूपन और बांकपन का एक साथ होना हमें तो मुग्ध करता ही है :) वैसे इन दिनों आप जिस कदर फार्म में हैं / बहादुरी दिखा रहे हैं उसकी वज़ह से कई खान बहादुरों की आत्ममुग्धता का जनाज़ा निकल जायेगा :)

अनिल कान्त : said...

बहुत खास जानकारी दी आपने

परमजीत बाली said...

बहुत बढ़िया विश्लेषण .अच्छी जानकारी।आभार।

संजय भास्कर said...

बेहतरीन विश्लेषण । आभार ।

डॉ टी एस दराल said...

खान बहादुर और राय बहादुर --ये जानकारी तो बड़ी दिलचस्प रही।
बहुत बढ़िया अजित जी।

डॉ टी एस दराल said...

खान बहादुर और राय बहादुर --ये जानकारी तो बड़ी दिलचस्प रही।
बहुत बढ़िया अजित जी।

अजित वडनेरकर said...

अली भाई,
बहादुरी का अपना सौन्दर्य होता है। सौन्दर्य वही है जो नुमांया हो। शौर्य अथवा बहादुरी ढका-छुपा तत्व नहीं है। बहादुरी में जहां ध्येयनिष्ठ शौर्य का भाव है वहीं बांकपन की अर्थवत्ता व्यापक है और शृंगार से लेकर वीर रस तक इसमें आ जाते हैं। वैसे शृंगारतत्व की अधिकता है। बांकपन पर तो विस्तार से एक अध्याय लिखा जा चुका है- कृपया देखें इसे-http://shabdavali.blogspot.com/2009/03/blog-post_13.html

किरण राजपुरोहित नितिला said...

शहरो के नामों के बारे में पढना बहुत बढ़िया लगता है.

Baljit Basi said...

यह छोटी सी चूक रड़कती थी. लेख पूरी बुलंदिओं पर है. आज कल आप कमाल कर रहे है. पंजाब में एक नगर का नाम है बसी पठानां. यह नगर पठानों ने बसाया. जालंधर शहर की कई बस्तियां पठानों ने बसईं. इनके नाम के आगे बस्ती लगता है जैसे बस्ती गुजाँ, बस्ती शेखां आदि. पंजाब में अगर किसी को बात समझ में ना आए तो बोला जाता है ' मैं पश्तो तो नहीं बोल रहा'
पठानकोट पर दुबारा सोचना पड़ेगा. बेशुमार हवाले बताते हैं कि गोदावरी वाले 'पैठण' की तरह इस का पुराना नाम भी 'पैठण' ही था और यह प्रतिष्टान से बना. कोट बाद में जुडा. पठानिया राजपूत गोत भी है जो अपना संबंध पैठान से निकला हुआ बताते हैं.
वैसे भी पंजाबी में पठान को पठाण कहा जाता है. एक ओनालीन हवाला देखिये:
Annual report By Archaeological Survey of India, Sir John Hubert Marshal पेज 111
पाकिस्तानी पंजाब में एक पोठोहार का इलाका भी है, जेहलम और सिंध दरिया के बीच का इलाका. पोठोहार भी पठार का ही एक रूप है. रावलपिंडी और इस्लामाबाद इसके मशहूर शहर हैं.

अजित वडनेरकर said...

आप सही कह रहे हैं बलजीत भाई,
ग्रियर्सन वाला संदर्भ पढ़ कर यही बात मुझे खटकती रही थी। इस पर और तलाश जारी रहेगी। आपकी निगाहबीनी से बहुत कुछ सफर का भला हो रहा है। दरअसल इस मंच पर ऐसी ही साझेदारी हम चाहते हैं सब साथियों से।

पैठण प्रतिष्ठान से ही बना है मगर पठानकोट की रिश्तेदारी पैठण से स्थापित करने में यूं तो कोई दिक्कत नहीं है पर कोई ठोस संदर्भ ढूंढने की कोशिश आप भी करें, मैं भी करता हूं। बाद में इसे नए सिरे से अपडेट कर देंगे।

शुक्रिया खूब

निर्मला कपिला said...

ापकी पोस्ट तो ग्यानवर्धक थी ही टिप्पनियों ने और जानकारी बढा दी। रो0चक पोस्ट धन्यवाद्

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