Saturday, November 24, 2012

सुर्खियों में शुक्र

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हि न्दी में दो ‘शुक्र’ प्रचलित हैं । एक वो जिसके नाम पर सप्ताह का एक दिन मुक़र्रर है । ‘शुक्रवार’ वाला शुक्र ।  खगोलीय शब्दावली से आया हुआ आकाशीय पिण्ड शुक्र । एक ग्रह । फ़िल्मों के रिलीज़ होने का दिन । दूसरा वो जिससे बने शुक्रिया को हमने बतौर साधुवाद, धन्यवाद जाना-समझा है । इस ‘शुक्र’ में धन्यता, साधुता, आभार, स्तुति, प्रशंसा, गुणगान जैसे भाव छिपे हैं । शुक्रवार वाला शुक्र जहाँ भारोपीय भाषा परिवार की इंडो-ईरानी शाखा का शब्द है वहीं शुक्रिया वाला शुक्र सेमिटिक भाषा परिवार की अरबी ज़बान से बरास्ता फ़ारसी, भारतीय भाषाओं में दाखिल हुआ है । इसी तरह खगोल ज्योतिष शब्दावली वाला शुक्र मूलतः वैदिक शब्दवाली से आता है और पड़ोसी ईरान की फ़ारसी भाषा में भी इसका समरूप सुर्ख़ मौजूद है । वैदिकी की बहन अवेस्ता में इसका सुख्र होता है ।
बसे पहले उस शुक्र की बात करते हैं जिसमें चमक, दीप्त, दीप्तिमान, प्रकाशित, चमकीला जैसे भाव हैं । चमक से जुड़े भावों की वजह से इसमें उज्ज्वल, स्वच्छ, निर्मल जैसे आशय भी जुड़ते हैं क्योंकि चमकीले पदार्थ में मलिनता नहीं रहती । शुक्र के मूल में शुच् धातु है जिसका अर्थ है अग्नि, दाह, ताप, ज्वाला, दीप्ति आदि । आमतौर पर शुच के साथ पवित्रता जुड़ी हुई है । शुचि, शुचिता जैसे शब्दों में चमक, दीप्ति और पवित्रता का भाव ही है । अग्नि प्रत्येक वस्तु को शुद्ध और पवित्र बनाती है । इसीलिए शुक्र का अर्थ पवित्र भी है । मोनियर विलियम्स के कोश में इसकी तुलना संस्कृत के शुक्ल से भी की गई है । उनका मानना है कि शुक्र का अगला रूप ही शुक्ल है जिसमें वही सारे भाव हैं जो शुक्र में हैं । सौरमण्डल के दूसरे ग्रह का नाम भी शुक्र है । सूर्य से निकट होने की वजह से यह अत्यन्त चमकीला तारा है ।
शुक्र का अर्थ धन, सम्पत्ति, स्वर्ण भी है । इसे दैत्यों का गुरु माना जाता है । इसी तरह पौराणिक संदर्भों में इसके कुबेर का कोषाध्यक्ष होने का उल्लेख है । शुक्र यानी स्वच्छता और शुद्धता का प्रतीक । बल, सामर्थ्य और शक्ति के प्रतीक जीवन-तत्व को भी शुक्र कहते हैं । मूलतः शुक्र में पौरुष भाव समझा जाता है जबकि शुक्र में स्त्री या पुरुष दोनो के प्रजनन-सार का भाव है । शुक्र का अर्थ जल या किसी भी किस्म का द्रव या सत्व भी है । इसे जीवनतत्व का प्रतीक इसलिए माना गया क्योंकि इसमें शुद्धता और सारत्व का भाव है । इस जीवन तत्व का सबसे सुक्ष्म अंश शुक्राणु है ।
हिन्दी में सामान्यतया किसी भी खास खबर या अखबार के मुख्य शीर्षक को सुर्खी / सुरखी कहा जाता है । सुर्खी यानी जिस बात की सर्वाधिक चर्चा हो । आमतौर पर “सुर्खियों में” वाक्यांश इस सिलसिले में हमेशा सुनने को मिलता है । “आज की सुर्खी क्या है” में खास ख़बर जानने का आशय ही है । शुक्र का समरुप अवेस्ता में सुख्र होता है और फिर वर्ण विपर्यय के ज़रिये फ़ारसी में यह सुर्ख़ हो जाता है । गौर करें शुक्र में निहित चमक के भाव पर । सुर्खी में इसी चमक का आशय है मगर अनजाने में सुर्ख़ या सुर्ख़ी में लाल रंग का अर्थबोध होता है । यूँ अग्नि की एक अवस्था रक्ताभ होती है । चमक की यह रक्ताभ अवस्था दरअसल फ़ारसी में सुर्ख़ है । हालाँकि शुक्र के समरूप सुर्ख़ पर विचार करें तो भी उसकी चमक वाली अर्थवत्ता ही ज्यादा तार्किक सिद्ध होती है । खासतौर पर सुर्खी के खास समाचार वाले अर्थ में लाल रंग की कोई भूमिका नहीं है बल्कि सर्वाधिक चमकदार यानी जिस पर नज़र टिके, ऐसा भाव है ।
प्रसंगवश यह भी जान लिया जाए कि वैदिक शुक्र का समरूप फ़ारसी में सुर्ख तो बनता है मगर संस्कृत वाङ्मय की ज्योतिषीय शब्दावली वाले शुक्र तारे के अर्थ में शुक्र के सुर्ख़ समरूप का कोई अर्थ नहीं है । फ़ारसी में शुक्र या वीनस ग्रह के लिए नाहीद शब्द मिलता है जो स्त्रीवाची है । मुस्लिम समाज की स्त्रियों का नाम नाहीद भी रखा जाता है । जॉन प्लैट्स नाहीद की व्युत्पत्ति संस्कृत के असित से मानते हैं जिसका अर्थ भी चमकदार होता है । प्लैट्स अनाहत / अनाहिदा तक पहुँचने के बावजूद इसका रिश्ता असित से जोड़ते हुए इसमें अनुनासिकता आने का तार्किक आधार नहीं बता पाते ।  मोहम्मद हैदरी मल्येरी के खगोलीय शब्दकोश के अनुसार यह अवेस्ता के अनाहिता का रूपान्तर है । अवेस्ता में अनाहिता पवित्रता, उर्वरता की देवी है । चूँकि ये दोनों गुण पानी में हैं इसलिए अनाहिता जलदेवी हुई । ‘अनाहिता’ का अर्थ होता है निर्दोष, बेदाग । संस्कृत में अनाहिता शब्द नहीं है । हमारा मानना है कि इसका समरूप अनाहत हो सकता है जिसका अर्थ भी बेदाग होता है । अन + आहत = अनाहत । संस्कृत के हत् में आघात, चोट का भाव है । ज़ाहिर है पृथ्वी के पड़ोसी और सूर्य के दूसरे क्रम के चमकदार तारे को बेदाग़ मानते हुए उसे अवेस्ता में अनाहिता कहा गया । मध्यकालीन फ़ारसी में इसका रूप अनाहिता /अनाहिद हुआ और फिर का लोप होकर फ़ारसी में नाहीद सामने आया ।
रंग से ताल्लुक रखती एक और महत्वपूर्ण बात । वैदिक शब्दावली में अनेक शब्द हैं जिनमें एक साथ सफ़ेद, पीला, लाल, हरा और कभी कभी भूरे रंग का भाव उभरता है । संदर्भों के अनुसार उस रंग का आशय स्वतः स्पष्ट होता जाता है । इसीलिए कांति या दीप्ति की अर्थवत्ता वाले शब्दों में प्रायः इन सभी रंगों का भी बोध होता है । डॉ. रामविलास शर्मा के मुताबिक “प्राचीन गण समाजों के लिए रंग वह जो चमके । हरे-पीले का भेद उनके लिए गौण था ।” तोते के लिए संस्कृत में शुक शब्द है जिसके मूल में भी चमक, उज्ज्वल, दीप्ति के अर्थ वाली शुच् धातु ही है जिसमें मूलतः पीला रंग होता है । मगर तोता चटक हरे रंग की वजह से जाना जाता है और यही हरा रंग चटक-चमकीले की अर्थवत्ता साबित कर रहा है । दुख का पर्याय शोक है । शोक के मूल में भी शुच् है । मूलतः शोक में अग्नि, जलन, ज्वाला, दग्धता जैसे अर्थ हैं मगर इसका रूढ़ अर्थ दुख में प्रकट होता है । ये तमाम भाव मनुष्य के शरीर और मन के लिए दुखकारी ही हैं ।
ब आते हैं दूसरे शुक्र पर । हिन्दी में कृतज्ञता जताने के लिए धन्यवाद और शुक्रिया बेहद आम शब्द हैं । यह बना है शुक्र से जिसमें साधुता, धन्यता और आभार जैसे ही भाव हैं । इसका रिश्ता भी पशुपालन संस्कृति से है । प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया से उपजे शब्दों की शृंखला में इसे देखा जाना चाहिए । शुक्रिया की व्युत्पत्ति सेमिटिक धातु शीन-काफ़-रा (sh-k-r) से हुई है जिसमें उगना, शाखों पर नए बौर आना अथवा हरे-भरे चरागाह का भाव है । गौरतलब है कि ये सभी परिस्थितियाँ प्रकृति के दाता या पालक रूप को दर्शाती हैं । बाद के दौर में शीन-काफ़-रा में कृतज्ञता, धन्यवाद जैसे भाव विकसित हुए जिसके मूल में प्रकृति की उदारता थी । आभार जताने के संदर्भ में इससे ही शुक्रिया बना । शुक्राना / शुकराना में आभार प्रदर्शन या कोई भेट-उपहार का आशय है । शुक्रगुज़ार शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है जिसका अर्थ है आभारी या कृतज्ञ । शुक्र मनाना, शुक्र मानना, शुक्रिया अदा करना जैसे मुहावरे हिन्दी में खूब चलते हैं । कृतज्ञ के अर्थ में इसी कड़ी में शकीर शब्द बनता है जिसका एक रूप शाकिर भी है । आभार व्यक्त करने के लिए मशकूर शब्द भी हिन्दी में जाना-पहचाना है ।

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4 कमेंट्स:

प्रवीण पाण्डेय said...

शुक्र है, यह आज समझ आ गया..हम तो एक ही मान बैठे थे...

Himanshu Kumar Pandey said...

शुक्र के लिए शुक्रिया!

Mansoorali Hashmi said...

टिपण्णी स्वरुप प्रतिक्रियाए, 'शब्दों' का वाक्यों में 'प्रयोग' मात्र है, गंभीरता से न ले:

# माल था मुफ्त का हज़म कर के ,
'शुक्र' वो तो गुज़ार कर बैठे .
'सुर्खियों' में है सिर्फ घोटाले,
लाख को अब हज़ार* कर बैठे ! *2G Spec.

# तीरे Cupid का फिर शिकार बने,
इक नज़र ही में प्यार कर बैठे,
मेहरबानी रही जो 'वीनस' की,
फिर तो 'शुक्राणु' "पार" कर बैठे।


# एक 'नाहीद' ही न मिल पायी,
वैसे तो चार-चार कर बैठे।

# 'शुक्र' के दिन बटोरने को 'धन',
फिल्म का कारोबार कर बैठे।

http://aatm-manthan.com

Rishabh Interiors said...

बहुत उमदा .........

कृ्पा कर एक बार यहाँ भी आएं
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