Saturday, December 13, 2014

।।डण्डा करना।।


जकल एक मुहावरा चल पड़ा है- डण्डा करना। इसका लाक्षणिक अर्थ है किसी को डण्डे से आगे ठेलना। भावार्थ हुआ किसी काम में सक्रिय करना। इसका अर्थविस्तार अब किसी काम में व्यवधान डालना, अड़चन पैदा करना या उकसाना भी हो गया है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पुलिसिया कार्यप्रणाली से जन्मा शब्द है। लोक-व्यवहार में अतीत से ही डण्डे के ज़रिये उकसाने, ठेलने के काम आदि किए जाते रहे हैं। पहुँच से दूर किसी व्यक्ति तक उठ कर जाने की बजाय डण्डे के स्पर्श और दबाव से उसे संकेत देना या प्रेरित करना बहुत पुरानी तकनीक रही है। गौर करें किसी नाली को अवरुद्ध हो जाने पर डण्डे के ज़रिये ही सुचारू बनाया जाता है। यूँ इस मुहावरे का अश्लील अर्थ लेने वालों की भी कमी नहीं है। यन्त्रणा देकर अपराध कबूलवाने के लिए गुदा में डण्डा डालना भी एक आम पुलिसिया हथकण्डा है।

दुनियाभर की संस्कृतियों में डण्डे को बतौर कानूनी प्रतीक मान्यता मिली हुई है। इसी लिए डण्डे का पुलिस से भी स्वाभाविक रिश्ता है। मूलतः पुलिस-प्रशासन की जिम्मेदारी कानून का पालन कराने की है। डण्डा इसे लागू कराता है। डण्डा यानी बाँस या लकड़ी का लम्बा टुकड़ा , छड़ी या सोंटा। मोनियर विलियम्स दण्ड का रिश्ता ग्रीक डेन्डरॉन/ डेन्ड्रॉन- dendron से भी बताते हैं। डॉ. जेम्स स्ट्राँग के बाइबल-कोश में डेन्डरॉन/ डेन्ड्रॉन का अर्थ वृक्ष या पेड़ है। डण्डा के मूल में वैदिक क्रियारूप दण्ड है जिसमें लकड़ी, छड़ी, सोंटा जैसे अर्थ तो हैं ही कालान्तर में प्रताड़ना, सजा आदि के तौर पर दण्ड का अर्थविस्तार हुआ। किसी को “तीन डण्डे लगाने” में सजा देने का भाव निहित है। पुराने ज़माने में डण्डे जमा कर ही दण्डित किया जाता था। गौर करें “दण्डित करने” में डण्डे लगाने की क्रिया ही है। इस तरह दण्ड, सजा का पर्याय बना। दण्ड का अर्थ जुर्माना भी होता है। इसके लिए अर्थदण्ड शब्द भी प्रचलित हुआ।

बाद के दौर में नियन्त्रण, समूहन, सेना, न्यायशक्ति आदि जैसी अभिव्यक्तियाँ भी दण्ड में निहित हुईं। प्राचीनकाल से डण्डे के जोर पर दुनिया चल रही है। राजा के हाथ में हमेशा दण्ड रहता था जो उसके न्याय करने और सजा देने के अधिकारी होने का प्रतीक था। आज भी जिलाधीश के पास दंडाधिकारी के अधिकार होते हैं। इसीलिए उसे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट कहते हैं। वह न्याय करता है। मजिस्ट्रेट की टेबल पर रखा हथोड़ा इसी दंड का प्रतीक है। पौराणिक ग्रंथों में यम, शिव और विष्णु को भी दण्डाधिकारी कहा गया है। कानून व्यवस्था सम्भालने वाले अफसर को दण्डनायक शब्द मिलता है। अर्दली या चौकीदार को दण्डधर कहा जाता था।

भुजदंड भी एक प्रयोग है। प्रणिपात के अर्थ में भी 'दंडवत' शब्द का प्रयोग होता है जिसमें दण्ड की भाँति भूमि पर लेट कर नमन करने का आशय है। दंड धारण करने वाले सन्यासी को दंडीस्वामी कहा जाता है। दंड धारण करने की परंपरा प्रायः दशनामी सन्यासियों में प्रचलित है। शंकराचार्य परंपरा के ध्वजवाहक मठाधीश भी दंडधारण करते है। प्राचीन धर्मशास्त्र मे दंड का महत्व इतना अधिक था कि मनुस्मृति में तो दंड को देवता के रूप में बताया गया है। एक श्लोक है-
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः।।
(दंड ही शासन करता है। दंड ही रक्षा करता है। जब सब सोते रहते हैं तो दंड ही जागता है। बुद्धिमानों ने दंड को ही धर्म कहा है)
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3 कमेंट्स:

Vinay Singh said...

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Health Care in Hindi

GYANDUTT PANDEY said...

अर्थ और प्रचार तो बरास्ते अश्लीलता ही आया है इसका।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (15-12-2014) को "कोहरे की खुशबू में उसकी भी खुशबू" (चर्चा-1828) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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