Wednesday, November 18, 2015

'रमना' में कोई रमे तो कैसे !!


हिन्दी भाषी क्षेत्रों में अनेक स्थानों के नाम ‘रमना’ हैं। इनमें गाँव-बस्ती भी है और अरण्य-वाटिका भी। उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश, हरियाणा और पंजाब में रमना नामधारी अनेक स्थान या बस्तियाँ हैं। 'रमना' बना है रमण से जिसका अर्थ है सुन्दर, सुखद, रमणीय, मनोरम। ध्यान रहे संस्कृत की धातुक्रिया रम् में सुख, आनंद, तुष्टि, चमक, केलि जैसे भाव हैं। इससे ही रमण, रमणी, आराम, विराम, राम जैसे शब्द बने हैं जिनमें मूलतः सौन्दर्य, सुख, आनंद, हर्ष, प्रसन्नता, विलास जैसे भाव हैं।

'रमना' हिन्दी की लोकअभिव्यक्ति है। आशय घूमना-फिरना, टहलना, चलना, भोग-विलास और मज़े करना है।  पहले गाँव के आसपास की वह भूमि जिसे पशुओं के चरने के लिए सुरक्षित कर दिया जाता था 'रमना' कहलाती थीं अर्थात जहाँ पशु रमते हों, रमण करते हों। "छुट्टा घूमना" मुहावरे से भाव ग्रहण करें। जहाँ पशु उन्मुक्त विचरण करते हों वह उनकी रमण-भूमि ही तो कहलाएगी न! बाद में उस गोचर भूमि पर भी आबादी काबिज हो गई और बस्ती को भी रमना पहचान ही मिली।

आरा में एक रमना बाग है। देखना होगा कि वह किसी ज़माने में वह भूखण्ड सम्भवतः गोचर भूमि की तरह सुरक्षित रखी गई होगी बाद में शहर बढ़ कर वहाँ तक पहुँचा हो और वह सार्वजनिक मैदान बन गया हो जिसे रमना मैदान ही नाम मिला। इसी तरह ‘रमनाबाग’ या ‘रमना फ़ॉरेस्ट’ जैसे नामों से ही स्पष्ट है कि यहाँ आशय उस स्थान के रमणीक होने से है। ढाका के बाहरी हिस्से मे एक जमाने मे बीहड जंगल था और वहां संन्यासियों को समाधि दी जाती थी। उसे भी रमना के जंगल कहते थे। 1971 युद्ध के बाद वहा जंगल साफ कर शहीद स्मारक बनवाया गया। इस रमना का मूल जितना खूबसूरत है, ज़्यादातर ‘रमना’ बस्तियों की हक़ीक़त उसके उलट है। वाराणसी में गंगा किनारे किसी ज़माने में गोचरभूमि रहा रमना क्षेत्र अब आबादी के दबाव से घिरा ब्लॉक है। विसंगति यह कि आज इस स्थान पर शहरभर का कचरा डाला जाता है। यहाँ सॉलिड वेस्ट प्लान्ट है जो शायद ही कभी ठीक से चलता हो।

जहाँ तक ‘रमना’ नाम से जुड़े ‘गोचर’ शब्द का सवाल है, उसका प्रमुख अर्थ पशुओं के लिए छोड़ी गई भूमि से ही है। बाकी वैदिक शब्दावली में ‘ग’ ध्वनि का आशय गमन से है। गम् धातुक्रिया का अर्थ गमन करना ही है। गति का ग भी यही कहता है। इसलिए ‘गो’ का अर्थ सिर्फ़ धेनु अथवा गाय नहीं बल्कि पशु मात्र से भी है, क्योंकि वह चलता है, गति करता है। यूँ कहें कि प्राचीन मनीषियों ने हर उस पदार्थ को ‘गो’ के दायरे में रखा जो गतिशील है। इसीलिए पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्र, तारे ये भी 'गो' ही हैं। मन की गतियाँ भी 'गो' हैं। स्वाभाविक है तब इन्द्रियगतियाँ इसके दायरे से बाहर कैसे रहतीं? आँखों से जितना दिख रहा है वह भी गोचर और पैरों से जितना नापा जा सके वह भी गोचर। यहाँ पशुओं और मनुष्यों में फ़र्क़ न करें। पशुओं के पैर भी इन्द्री ही हैं सो कोई पशु जहाँ विचरण करे वह गोचर भूमि है। इसीलिए कहा जाता है “सबै भूमि गोपाल की”।

पशुओं का घूमना यानी ‘चरना’ किस लिए? ज़ाहिर है उदरपूर्ति के लिए सो जिन चरणों की गति को ‘चरना’ कहा जाता है, वही क्रिया आहार कहलाई। चरने यानी चलने का साध्य हुआ ‘चारा’। ‘चरना’ का कारक हुए ‘चरण’ अर्थात इन्द्री। कहने की ज़रूरत नहीं कि ‘चरना’ और ‘चलना’ एक ही हैं। दुनियाभर की अनेक भाषाओं में भी यही अर्थस्थापन प्रक्रिया है। अर्थात गतिशील को ही पशु कहा जाता है।
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2 कमेंट्स:

Rushabh Shukla said...

​सुन्दर रचना ..........बधाई |
आप सभी का स्वागत है मेरे इस #ब्लॉग #हिन्दी #कविता #मंच के नये #पोस्ट #चलोसियासतकरआये पर | ब्लॉग पर आये और अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें |

http://hindikavitamanch.blogspot.in/2015/11/chalo-siyasat-kar-aaye.html

shail said...

रमणीय रचना और ब्लॉग। बधाई।

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