Friday, February 3, 2017

सहेली, बरास्ता हेठी और अवहेलना



शा न में गुस्ताख़ी के सन्दर्भ में हन्दी में ‘हेठी’ खूब प्रचलित है जिसमें अवमानना, अपमान या मानहानी का भाव है। इसी तरह तत्सम शब्दावली का होने के बावजूद ‘अवहेलना’ भी आम बोलचाल में इस्तेमाल होता है। इसमें अवज्ञा और अनदेखी है। दोनों ही शब्द मूलतः तिरस्कार, अपमान, उपेक्षा, और मानहानी को अभिव्यक्त करते हैं। देखते हैं दोनों शब्दो की जन्मकुण्डली।
हेठी’ का रिश्ता संस्कृत ‘हेठ्’ से है जिसमें खिझाने, सताने के साथ हानि पहुँचाने, सताने आदि का भाव है। हेठ् का अर्थ उत्पाती, शठ या कुकर्मी भी होता है। दरअसल संस्कृत में यह एक शृंखला है जिसमें में हेल्, हेळ्, हेट्, हेठ्, हेड् जैसी क्रियाएँ हैं और इन सबका आशय अवमानना, अनादर, असम्मान या अवज्ञा ही है। इस हेठ् का ‘एँठ’ से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह एँठना से आ रहा है जिसका अभिप्राय तनना, बल खाना, अकड़ना जैसे भाव हैं।

सी कड़ी ‘हेला’ भी है जिसका अर्थ भी अवज्ञा, बेपरवाही, तिरस्कार आदि है। इसी के साथ इसमें आनंद, आमोद, क्रिड़ा, खेल, खिलवाड़, केलि, शृंगार-विलास, काम-मुद्राएं, शृंगार-चेष्टा जैसे भाव भी हैं। ‘हेला’ का प्रयोग आमतौर पर हिन्दी में स्वतन्त्र रूप में नहीं होता पर सहेली, सहेला (अल्पप्रचलित), अवहेलना जैसे शब्दों में यह नज़र आता है। संस्कृत सहेल या सहेलम् में- व्यग्रता, बेपरवाही, विरक्तता, आवारगी, उधम, चंचल, लम्पट, कामोत्सुक जैसे आशय हैं।

मोनियर विलियम्स ‘सहेल’ या सहेलम का अर्थ full of play or sport बताते हैं। हिन्दी का सहेली या सहेला इसी कड़ी में विकसित हुआ है मगर उसमें साथिन, संगी, जोड़ीदार, मित्र, सहचर, संगिनी या सेविका का भाव है। हालाँकि शृंगारिक अर्थो में भी सहेली, सहेला का प्रयोग होता रहा है। बात आमोद-क्रीड़ा से शुरू हुई तो अर्थ बेपरवाही तक विकसित होता चला गया। खेल के साथ बेफिक्री जुड़ी हुई है और उससे ही इसमें आगे चल कर उपेक्षा, अवज्ञा की अर्थस्थापना भी होती चली गई। अवहेलना में यह अच्छी तरह उजागर हो रहा है।

मेलजोल, जान-पहचान, पारस्परिकता के सन्दर्भ में हेल-मेल बड़ा प्यारा पद है। हेल-मेल, हिल-मिल का प्रयोग रोजमर्रा की भाषा में किया जाता है। “वह उससे काफी ‘हिला’ हुआ है” जैसे प्रयोग भी आम है। बुनियादी तौर पर यहाँ जो हेल है वह इसी शृंखला का है जिसकी चर्चा की जा रही है। हालाँकि श्यामसुंदर दास हिन्दी शब्दसागर में हेल-मेल के ‘हेल’ का सम्बन्ध हिलना क्रिया से बताते हैं जिसका संस्कृत के हल्लन से सम्बन्ध है और जिसमें हरकता, गति जैसे भाव हैं।

हालांकि मेरे लिए इससे सहमत होना कठिन है। हेल-मेल में हरकत, गति प्रमुख नहीं, घनिष्ठता, सोहबत, संग-साथ, परस्परता प्रमुख है। इनमें वही वही क्रिड़ा-भाव है जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है।
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4 कमेंट्स:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "मेहनती चींटी की मोर्डन कहानी - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

sanjay vyas said...

पश्चिमी राजस्थान में कुछ विशेष प्रकार के लोक भजनों में 'हेली' शब्द का प्रयोग बार बार मिलता है. ये भजन निराकार भक्ति का भाव लिए होते हैं. जैसे- ' हेली म्हारी निरभै रइजो जी...'
इस तरह के भजनों में आत्मा या आत्मा तत्व को 'हेली' कहकर संभवतः स्वयं की आत्मा को सहेली की तरह बताया गया है. आपने भी हेल- मेल में घनिष्ठता और सोहबत को प्रमुखता दी है.
आभार. अपने प्रिय ब्लॉग पर अरसे बाद इस तरह लिखना अच्छा लगा.

प्रतिभा सक्सेना said...

'हेला'- यह शब्द मालवी भाषा में पुकारने के अर्थ में प्रयुक्त होता है(हेला पाड़ना -पुकार लगाना).नागरी प्रचारिणी और राजपाल के शब्द-कोशों में भी पुकार और हाँक के अर्थ हैं .

arvind mishra said...

शृंगार सही है या श्रृंगार या दोनों प्रचलन में होने के कारण सही हैं?
क्रिड़ा-भाव=क्रीड़ा होगा न?

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