Friday, May 3, 2019

इंतज़ामअली और इंतज़ामुद्दीन



हि न्दी में इन दिनों ये दो नए मुहावरे भी चल पड़े हैं। अगर अभी आप तक नहीं पहुँचे हैं तो जल्दी ही पहुँच जाएँगे। चीज़ों को संवारने, तरतीब देने, नियमानुसार काम करते हुए सब कुछ सही ढंग से आयोजित-नियोजित करने वाले लोग आजकल इन्हीं खिताबों से नवाज़े जाते हैं। दोनों की बुनियाद है 'इंतज़ाम'। हालाँकि हिन्दी की तत्सम शब्दावली के व्यवस्था, प्रबन्ध या फ़ारसी के बन्दोबस्त का इस्तेमाल भी किसी मायने में कम नहीं है। गौर करें, 'प्रबन्धकौशल सिंह', 'व्यवस्था भारती' या 'बन्दोबस्ती लाल' जैसी लाक्षणिक संज्ञाएँ इनसे भी बनाई जा सकती थीं पर नहीं बनीं। तथ्य यह भी है कि महज़ लक्षणा के आधार पर इंतज़ामअली या इंतज़ामुद्दीन जैसी संज्ञाएँ नहीं गढ़ी गईं बल्कि मुस्लिम तबके में बतौर व्यक्तिनाम भी चलन में हैं। हिन्दी में प्रबन्ध की अर्थवत्ता वाले शब्दों में इंतज़ाम की शोहरत सबसे ज़्यादा है।

अरबी का इंतज़ाम अपने आगे-पीछे कई रिश्तेदारियाँ लिए चलता है। यूँ कहिए कि इंतज़ामअली का कुनबा भी ख़ासा बड़ा है। आइए, पूरे कुटुम्ब से मिल लिया जाए। अरबी में एक क्रिया है नज़्म ن-ظ-ا (इसका उल्लेख कहीं कहीं नज़ामा भी है) जिसे नून-ज़ा-मीम से व्यक्ति किया जाता है। इस क्रम का सबसे पहला शब्द है नज़्म जिससे शायरी के शौक़ीन खूब परिचित हैं। आमतौर पर नज़्म का मतलब लोग कविता से लगाते हैं। दरअसल नज़्म में तरतीब या व्यवस्था का भाव है। इसका दूसरा अर्थ है कड़ी, लड़ी, माला या बन्धन। याद रखें साहित्य-विधाओं में पद्य सबसे पुरानी है।

दुनियाभर की प्रमुख साहित्यिक भाषाओं यानी हिब्रू, ग्रीक, लैटिन, अरबी, अवेस्ता, संस्कृत आदि में पद्य को विभिन्न अनुशासनों, नियमों से बान्धा गया है। ध्यान रहे कविता या शायरी के सभी रूप छंद में बन्धे रहते हैं। छन्द यानी वह अनुशासन जिसके दायरे में ऐसा कुछ कहा जाए जो सामान्य संवाद में न कहा जा सके। इस अनूठेपन को ही काव्यरचना माना जाता रहा है। सो कविता या काव्य एक बन्धन और अनुशासन था। फ़ारसी में पद्यांश को बंद भी कहा जाता है। गौरतलब है, यह बंद दरअसल संस्कृत के बन्ध का ही समरूप है। यानी जिसे अनुशासन से बान्धा गया हो। नए दौर की कविताई, चाहे वह किसी भी भाषा में हो, अब छन्दमुक्त नज़र आती है।

इस कतार में दूसरा सबसे ख़ास शब्द है निज़ाम। आमतौर पर हिन्दी में निज़ाम का प्रयोग शासन, तन्त्र या प्रणाली के अर्थ में ही होता है मसलन “आज़ादी के बाद हिन्दुस्तान ने सेक्युलर निज़ाम ही अपनाया”। बात व्यवस्था या प्रबन्ध की ही है। कभी कभी निज़ाम का प्रयोग दौर या कालखण्ड की तरह भी किया जाता है, या उसका आशय इसी तरह लगाया जाता है मिसाल के तौर पर- “बुजुर्गवार की ज़बान मुसलसल मुगल दौर के लिए वाहवाहियाँ और अंग्रेजी निज़ाम के लिए गालियाँ उगल रही थी”।

निज़ाम की ही तरह नाज़िम भी हिन्दी का जाना पहचाना है। निज़ाम और नाज़िम दोनों ही नामवाची संज्ञाएँ भी हैं। निज़ाम का आशय मुखिया, सरदार, प्रधान, शासनकर्ता का आशय है जिस पर नियमपालन की जिम्मेवारी आयद हो। जो मुख्य प्रबन्धकर्ता, व्यवस्थापक हो। इसी तरह नाज़िम में भी प्रबन्धक या व्यवस्थापक का ही भाव है। निज़ाम से नाज़िम का हल्का फ़र्क़ यही है कि निज़ाम का प्रयोग सर्वोच्च शक्तिमान के लिए भी हो सकता है और उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के लिए भी। अलबत्ता नाज़िम उस प्रधान कार्यकारी को कहा जाता था जिस पर समूचे शासन या प्रदेश के बन्दोबस्त को देखने की ज़िम्मेदारी आयद हो जैसे वज़ीर, दीवान, मन्सबदार, मन्त्री, सूबेदार या सामन्त।

यूँ देखें तो दक्कन के सूबेदार मीर कमरुद्दीन सिद्दीकी को फ़र्रुख़सियर ने निज़ाम-उल-मुल्क का ख़िताब बख़्शा था। इसी का संक्षेप दक्कन के ‘निज़ाम’ में जुड़ा नज़र आता है। दक्षिण की राजसत्ता को निज़ामशाही भी कहा जाता है। निज़ाम क्रिया भी है और संज्ञा भी। इसी कड़ी में आता है निज़ामत जिसका अर्थ है नाज़िम की जिम्मेवारी, पद या दायित्व। या उसका कार्यक्षेत्र, दायरा, अमलदार-अहलकार। या वह स्थान जहाँ ये बैठते हों, यानी नाज़िम का दफ्तर।

इसी कड़ी का एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द है तनजीम जिसका तंजीम रूप हिन्दी में चल पड़ा है। 'तंजीम' वर्तनी की दिक्कत यही है कि इससे इसके मूल में समाए ‘नज्म’ या n-z-m का खुलासा नहीं होता। तंजीम का आशय है संगठन जैसे क़ौमी-तंजीम या तंजीमे-इस्लामी। तंजीम में मुख्य आशय जोड़ने, गूँथने या बान्धने का है ठीक उस तरह जैसे माला हो। एक कतार में रखना, एक सूत्र में बान्धना। तंजीम का अर्थ शासन से भी है क्योंकि वह एक व्यवस्था में निबद्ध होता है।

ख़ास बात ये कि निज़ाम, नाज़िम या तंजीम जैसी तमाम व्यवस्थाओं में जो भाव निहित है अक्सर उसके विलोम का प्रयोग करने की नौबत भी इन्हीं के सन्दर्भ में आती रहती है- बदइंतज़ामी या बदइंतज़ामियाँ। हाँ, इंतजामुद्दीन और इंतजामअली पर कभी बदइंतज़ामियों की तोहमत नहीं लगती
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24 कमेंट्स:

रवि रतलामी said...

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