Friday, April 15, 2011

ढपोरशंख की पोल...

MadLibsसंबंधित कड़ियां-1.भोंपू, ढिंढोरची और ढोल2.ढोल की पोल, नगाड़े की क्यों नहीं ?3.लाऊडस्पीकर और रावण4.मुनादी, एलान और घोषणा5.तूती तो बोलेगी, नक्कारखाने में नहीं....6.भांडाफोड़, भड़ैती और भिनभिनाना-2

पोरशंख हिन्दी का आम मुहावरा है और हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय समाज में आज भी इसका प्रयोग होता है। ढपोरशंख की निगाहबीनी करने से पहले ढोल की पोल कहावत को भी याद कर लेना चाहिए। गौर करें कि ढोल एक ऐसा वाद्य होता है जिसके दोनों सिरों पर चमड़ा मढ़ा होता है और इसे दोनों हाथों से बजाए जाने पर यह बहुत तेज़ आवाज़ करता है। ढोल की आकृति पर ध्यान दें। मूलतः यह अंदर से खोखला होता है। ढोल की पोल कहावत का अर्थ यह हुआ कि दिखने में बहुत बड़ा और तेज़ आवाज़वाला होने के बावजूद ढोल में भीतर कुछ भी ठोस नहीं है अर्थात वह भीतर से खोखला और पोला होता है। भाव यही है कि बाहरी प्रदर्शन और दिखावा करने से भीतरी खामियाँ दूर नहीं हो जातीं। ढोल बना है संस्कृत के ढौलः से। एक ही बात को बार बार दोहराने को ढोल-पीटना भी कहते हैं और इसे ढिंढोरा-पीटना पके अर्थ में भी प्रयोग किया जाता है। ढोल बजानेवाले को ढोली कहा जाता है। हिन्दू समाज में ढोली एक जाति भी होती है। यह एक श्रमजीवी तबका है जो पुराने वक्त से ही श्रीमंतों के यहां मांगलिक अवसरों पर मंगलध्वनि का काम करता रहा है अर्थात द्वाराचार के दौरान ढोल बजाना। इसके अलावा ये लोग कृषि कर्म व दस्तकारी की कला में भी प्रवीण होते हैं।
पोरशंख अर्थात वह व्यक्ति जो ऊँची ऊँची  हाँकने में माहिर है। क्षमता न होने के बावजूद बड़ी बड़ी बातें करना। बोलचाल में ये लोग “फैंकू” भी कहलाते हैं। मूर्खों की कई क़िस्में होती हैं, जिनमें से एक किस्म ढपोरशंख भी है। शब्दकोशों में इसका पर्याय गप्पी भी दिया है, पर गप्पी मूर्ख नहीं होता, हाँ कुछ गप्पी मूर्ख भी होते हैं। जानते हैं ढपोरशंख की व्युत्पत्ति क्या है, कौन हैं इसके कुनबे के जाने-अनजाने रिश्तेदार। दरअसल ढपोरशंख का शुद्ध रूप है ढपोलशङ्ख अर्थात ढपोलशंख। ढपोल शब्द का ही रूपान्तर ढपोर हो गया। वृहत् हिन्दी शब्दकोश के अनुसार ढपोल शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के दर्पवत् से हुई है। दर्पवत् में शंख जुड़ने से ढपोलशंख समास बनता है। दर्पवत् का प्राकृत रूप होता है दप्पुल्ल > दपुल्ल > दपोल > और फिर ढपोल यह रूपान्तर सामने आता है। इस तरह बनता है ढपोरशंख या ढपोलशंख। दर्पवत् शब्द के मायने हुए फूला हुआ। यूँ हिन्दी में संस्कृत के दर्प शब्द के मायने हैं घमण्ड, अभिमान, अहंकार। इससे पैदा होनेवाले अन्य दुर्गुणों का भाव भी इसमें समाहित है जैसे अक्खड़पन, उद्दण्डता आदि।
संस्कृत की दृप् धातु से बना है यह दर्प शब्द जिसमें एकतरफ़ जहाँ प्रकाशित करना, आलोकित करना जैसे भाव हैं तो साथ ही इनका विस्तार प्रज्वलित करना या सुलगाना भी है। दृप् का एक अन्य अर्थ है घमण्ड करना, अहंकार करना। संस्कृत के दर्प में इस तरह एक नया अर्थ भी जुड़ा अभिमान से फूलना, फैलना, चौड़ा होना। गौर करें इस चौडेपन के भाव पर। अभिमानी व्यक्ति खद को सिर्फ़ अपने ही आईने में देखता है, मन में निर्मित अपनी छवि पर वह मुग्ध होता है। जाहिर है, एक ही वक्त में वह दो छवियों को जीता है। इसी वजह से वह दर्पवत् अर्थात फूला रहता है। यहाँ फूलना में भौतिक आकार कम और हाव-भाव पर अधिक जोर है। काल्पनिक और प्रभावशाली छवि को वास्तविक जीवन में जीनेवाले व्यक्ति के हावभाव के लिए घमण्ड से फूलना जैसी उक्ति उभरती है। शीशा या आईना शब्द के लिए हिन्दी का दर्पण शब्द इसी दृप धातु से बने दर्प से बना है। वह वस्तु जिसमें छवि नज़र आती है अर्थात प्रकाशित होती है, आभासित होती है, दर्पण कहलाई। स्वयं की नज़रों में खुद को बड़ा समझने की बात यहाँ समझी जा सकती है।
शंख यूँ तो भारतीय संस्कृति में एक मांगलिक चिह्न है। यह एक प्राचीन वाद्य भी है जिसका प्रयोग विश्व की विभिन्न संस्कृतियों में होता रहा है। शंखनाद एक चिरपरिचित शब्द है जिसमें मुहावरे की अर्थवत्ता है। इसका अर्थ होता है किसी संकल्प की घोषणा, युद्ध की घोषणा आदि। शंख आकार में छोटा हो या बड़ा, उसकी मूल बनावट एक सी होती है अर्थात उसका मध्यांग बेहद फूला हुआ होता है जिसमें से होकर गूँजती हुई तेज़ आवाज निकलती है, मगर इस संरचना के भीतर सिर्फ खाली स्थान ही होता है। वही ढोल की पोल। मराठी में किसी शठ या मूर्ख व्यक्ति को भी शंख की उपमा दी जाती है अर्थात जो सिर्फ़ बातें करना जानता है, या जिसके भीतर दिमाग़ नहीं होता। स्पष्ट है कि ढपोरशंख ऐसा व्यक्ति है जो मूलतः अज्ञानी है, मगर ज्ञान बघारता नज़र आता है, जिसकी बातों में सार नहीं है, पर वह अंतहीन बोलता है। ऐसे व्यक्ति भी मूर्ख की श्रेणी में गिने जाते हैं।
अगली कड़ी में भी “ढ” महिमा

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9 कमेंट्स:

shama said...

Hameshaa kee tarah gyaan wardhak aur suruchi poorn!

मीनाक्षी said...

संस्कृत की दृप् धातु से बना है यह दर्प शब्द और उसकी व्याख्या तो चमत्कृत करती ही है लेकिन ..... ढोली जाति का उल्लेख... हतप्रभ कर देता है...कोई शक नहीं कि इस सफ़र में शब्दों का जादुई चिराग है आपके पास ...!

Shilpa said...

बहुत अच्छा ज्ञानवर्धक लेख |
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शिल्पा

घनश्याम मौर्य said...

ghajab ki jaankari di aapne. kripaya isi prakar 'ghongha basant' shabd ki vyutpatti bataani ki kripa karein.

Mansoor Ali said...

'आईना' तो हकीक़त बताता रहा,
बंद आँखों से वो ख़ुद को देखा किया,
'ढोल की पोल' जाकर खुली देर से,
जो भी 'फेंका'था!ख़ुद ही लपेटा किया.

प्रवीण पाण्डेय said...

जब कर्म से अधिक ध्वनि हो तो ढपोर।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बढ़िया ढंग से पोल खोली है
ढपोरशंख शब्द की!

Baljit Basi said...

दिलचस्प बात है कि पंजाबी में ढपोरशंख की जगह गपौड़संख शब्द चलता है. स्पष्ट है कि इस का मतलब मूर्ख की जगह गप्पी है.

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

देश और समाजहित में देशवासियों/पाठकों/ब्लागरों के नाम संदेश:-
मुझे समझ नहीं आता आखिर क्यों यहाँ ब्लॉग पर एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाना चाहते हैं? पता नहीं कहाँ से इतना वक्त निकाल लेते हैं ऐसे व्यक्ति. एक भी इंसान यह कहीं पर भी या किसी भी धर्म में यह लिखा हुआ दिखा दें कि-हमें आपस में बैर करना चाहिए. फिर क्यों यह धर्मों की लड़ाई में वक्त ख़राब करते हैं. हम में और स्वार्थी राजनीतिकों में क्या फर्क रह जायेगा. धर्मों की लड़ाई लड़ने वालों से सिर्फ एक बात पूछना चाहता हूँ. क्या उन्होंने जितना वक्त यहाँ लड़ाई में खर्च किया है उसका आधा वक्त किसी की निस्वार्थ भावना से मदद करने में खर्च किया है. जैसे-किसी का शिकायती पत्र लिखना, पहचान पत्र का फॉर्म भरना, अंग्रेजी के पत्र का अनुवाद करना आदि . अगर आप में कोई यह कहता है कि-हमारे पास कभी कोई आया ही नहीं. तब आपने आज तक कुछ किया नहीं होगा. इसलिए कोई आता ही नहीं. मेरे पास तो लोगों की लाईन लगी रहती हैं. अगर कोई निस्वार्थ सेवा करना चाहता हैं. तब आप अपना नाम, पता और फ़ोन नं. मुझे ईमेल कर दें और सेवा करने में कौन-सा समय और कितना समय दे सकते हैं लिखकर भेज दें. मैं आपके पास ही के क्षेत्र के लोग मदद प्राप्त करने के लिए भेज देता हूँ. दोस्तों, यह भारत देश हमारा है और साबित कर दो कि-हमने भारत देश की ऐसी धरती पर जन्म लिया है. जहाँ "इंसानियत" से बढ़कर कोई "धर्म" नहीं है और देश की सेवा से बढ़कर कोई बड़ा धर्म नहीं हैं. क्या हम ब्लोगिंग करने के बहाने द्वेष भावना को नहीं बढ़ा रहे हैं? क्यों नहीं आप सभी व्यक्ति अपने किसी ब्लॉगर मित्र की ओर मदद का हाथ बढ़ाते हैं और किसी को आपकी कोई जरूरत (किसी मोड़ पर) तो नहीं है? कहाँ गुम या खोती जा रही हैं हमारी नैतिकता?

मेरे बारे में एक वेबसाइट को अपनी जन्मतिथि, समय और स्थान भेजने के बाद यह कहना है कि- आप अपने पिछले जन्म में एक थिएटर कलाकार थे. आप कला के लिए जुनून अपने विचारों में स्वतंत्र है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं. यह पता नहीं कितना सच है, मगर अंजाने में हुई किसी प्रकार की गलती के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ. अब देखते हैं मुझे मेरी गलती का कितने व्यक्ति अहसास करते हैं और मुझे "क्षमादान" देते हैं.
आपका अपना नाचीज़ दोस्त रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा"

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