Sunday, December 9, 2012

सुरख़ाब के पर

surkhab

कि सी अद्वितीय गुण, ध्यान आकर्षित करने वाली विशेषता या विलक्षणता की अभिव्यक्ति के लिए “सुरखाब के पर” मुहावरा बोलचाल की भाषा में खूब इस्तेमाल होता है मसलन “ इंदौर में क्या सुरख़ाब के पर लगे हैं जो भोपाल में गुज़र नहीं हो सकती? ” सुरख़ाब यानी हंस की प्रजाति का एक पक्षी जिसके पखों की खूबसूरती की वजह से प्राचीनकाल से इस पखेरु को ख़ास रुतबा मिला हुआ है । हंस जहाँ सफेद रंग के होते हैं वहीं सुरखाब अपनी पीली, नारंगी, भूरी, सुनहरी व काली रंगत के पंखों की वजह से अत्यधिक आकर्षक होते हैं । ख़ूबसूरत, मुलायम, रंगीन पंखों का उपयोग कई तरह के परिधानों में होता रहा है जिसकी वजह से दुनियाभर में इनका अंधाधुंध शिकार होने से अब सुरख़ाब दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों में हैं और इसके शिकार पर पाबंदी है ।
सुऱखाब को अंग्रेजी में रूडी शेलडक Ruddy Shelduck कहते हैं जिसका अर्थ है रंगीन हंस । अंग्रेजी के रूडी शब्द में रक्ताभ, सुर्ख या चटक का भाव है । डक यानी बतख । यूँ देखें तो इसे सुर्ख़+आब यानी सुर्खाब कहना ग़लत नहीं है । मगर यह इसकी व्युत्पत्ति का आधार नहीं है । रंगों के संदर्भ मे चटक, गहरा या तेज़ भाव वाला सुर्ख़ शब्द हिन्दी में फ़ारसी से आया और यह संस्कृत के शुक्र का रूपान्तर है । रंग से ताल्लुक रखती एक और महत्वपूर्ण बात । वैदिक शब्दावली में अनेक शब्द हैं जिनमें एक साथ सफ़ेद, पीला, लाल, हरा और कभी कभी भूरे रंग का भाव उभरता है । संदर्भों के अनुसार उस रंग का आशय स्वतः स्पष्ट होता जाता है । इसीलिए कांति या दीप्ति की अर्थवत्ता वाले शब्दों में प्रायः इन सभी रंगों का भी बोध होता है । संस्कृत के शुक्र में जहाँ श्वेताभ, पीताभ, रक्ताभ जैसी अर्थवत्ता रखता है वहीं फ़ारसी में शुक्र से बने सुर्ख़ में चटकीला लाल ही रूढ़ हुआ । सुरख़ाब में सुर्ख़ की कोई भूमिका नहीं है । जिस तरह चक्र से सुर्ख़ बना उसी तरह इसी सुरख़ाब के मूल में संस्कृत का चक्रवाक है ।
संस्कृत में सुरख़ाब chakravak का एक नाम हिरण्य हंस भी है । हिरण्य यानी सोना अर्थात सुनहरी हंस । सुरख़ाब के संस्कृत में अन्य कई नाम भी हैं जैसे चक्रवाक, रथचरण, वियोगिन, द्विक, अवियुक्त, हरिहेतिहूति, द्वन्द्वचर, निशाचर, भूरिप्रेमन्, द्वन्द्वचारिन्, गोनाद, रथाङ्ग, नादावर्त आदि । इसी तरह हिन्दी में इसे कोक, कोकहर, कोकई, चकई, चक्कवा, चाकर, चकवाह कहते हैं । प्राकृत में इसे रहंग कहा गया है और मराठी में इसका एक नाम ब्राह्माणी बदक Brahminy Duck भी है । सुरख़ाब दरअसल संस्कृत के चक्रवाक का फ़ारसी रूपान्तर है । ध्वनिपरिवर्तन के साथ अनुमानित विकासक्रम– चक्रवाक > शक्रवाक > शर्कवाब > सर्खवाब होते हुए सुरख़ाब हुआ होगा ।
हिरण्य हंस या सुनहरी हंस के चक्रवाक नामकरण के पीछे दरअसल रंग नहीं बल्कि उसकी विशेष आवाज़ है । मराठी संदर्भों के मुताबिक चक्रवाक नामकरण के पीछे संस्कृत में ‘चक्र इव वाक् शब्दोऽस्य रथाङ्गतुल्यावयन’ कारण बताया गया है । इसका मतलब हुआ रथ के चक्के में चिकनाई (लुब्रिकेंट) न डाले जाने पर जिस तरह किर-किर, खर-खर ध्वनियाँ पैदा होने से किरकिराहट की आवाज़ आती है, चक्रवाक भी अपने गले से वैसी ही आवाज़ निकालता है । संस्कृत में चक्र यानी चक्का और वाक् यानी आवाजा इस तरह चक्र + वाक = चक्के जैसी (रथ के पहिए समान) आवाज़ निकालने वाला पक्षी । चक्रवाक का एक अन्य नाम रथाङ्ग से भी यह स्पष्ट है । कर्नाटक संगीत में इस पक्षी के नाम पर एक राग-चक्रवाकम् Chakravakam भी है । 
प्राचीन कवियों के शृंगार-वर्णन में चक्रवाक का कई बार उल्लेख आता है । नर पक्षी को चक्रवाक और मादा को चक्रवाकी कहते हैं । हिन्दी में चकवा, चकवी (चक्रवाक > चक्कवा > चकवा / चक्रवाकी > चक्कवी > चकवी-चकई ) जैसे शब्द इससे ही बने हैं । चकवा-चकवी शाश्वत प्रेम प्रतीक हैं । दिनभर साथ रहने के बाद चक्रवाक और चक्रवाकी अलग अलग हो जाते हैं और रातभर विरह की अकुलाहट में कुर-कुर ध्वनि करते रहते हैं । मराठी संदर्भों में यह ध्वनि “ आंङ्ग-आङ्ग” बताई गई है । हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य का इतिहास में “चक्रवाक-मिथुन (चकवा-चकई)” शीर्षक आलेख में इस पक्षी के बारे में विस्तार से लिखा है । चक्रवाक chakravak  शरत्काल में भारत के जलाशयी क्षेत्रों में नज़र आता है और शेषकाल में यह अपने पर्यावास में लौट जाता है । स्वभावतः ये जोड़े में रहने वाला पक्षी ( रूडी शेल्डक ) है और मादा एक बार में 50-60 अंडे देती है ।
सम्बन्धित कड़ी- सुर्ख़ियों में शुक्र 

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9 कमेंट्स:

प्रवीण पाण्डेय said...

पक्षियों का नाम ध्वनियों पर, गेंडे का नाम कैसे धरेंगे तब..

Press Services of India Marathi News said...

प्रिय महोदय,

पीएसआई समाचार सेवा हिंदी उर्दू और मराठी भाषा में काम करती है। हम लघु समाचार पत्रों को प्रतिदिन फीचर व समाचार भेजते हैं। यदि आप आज्ञा दें तो आपके नाम के साथ आपके छपे हुए लेख हम जारी कर सकते हैं।

कृपया यह भी बताएं कि आप कितनी सहयोग राशी स्वीकार करेंगे।

कृपया शीघ्र उत्तर दें।

धन्यवाद

मुद्दस्सिर खान

GYANDUTT PANDEY said...

उस दिन गंगाजी में भ्रमण किया। साइबेरियायी कौव्वे को वह मल्लाह सुरखाब कह रहा था। काला-पीला-सफेद कौव्वा। सुन्दर पर कर्कश आवाज थी उसकी।

घनश्याम मौर्य said...

जिस गवेषणात्‍मक शैली में आपने इस मुहावरे का अर्थ बताया है, वह प्रशंसनीय है।

स्पाईसीकार्टून said...

अद्भुत पक्षी

Mansoorali Hashmi said...

है 'राँझा' तो, तू ढूँढ ले 'हीर' कोई ,
कोई खूबसूरत फ़साना तो गढ़ जा,
'मिलन' दिन में करले,'विरह' रात्रि में,
जुदाई जो सहना हो 'सुरखाब' बन जा .
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तिरा सुर भी 'कुर-कुर' है ए 'चक्रवाकी'
कर 'आंङ्ग-आङ्ग', 'सुरखाब' होजा.

http://aatm-manthan.com

Anonymous said...

अजीत भाई वनविहार आइये आपको सुरखाब दिखाते है. -सुदेश वाघमारे.

अजित वडनेरकर said...

@सुरेश वाघमारे।
वाह सुरेश भाई, मज़ा आ गया । बने रहिए शब्दों का सफ़र में । मैं इन दिनों औरंगाबाद में हूँ और परिवार भोपाल में ही है । इस बार ज़रूर मुलाक़ात होती है। जै हो ।

Himanshu Kumar Pandey said...

बहुत कुछ इकट्ठा जान लेते हैं यहाँ। इस पक्षी के बारे में तो जानना ही चाहते थे।
आभार।

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