Tuesday, September 21, 2010

एक किस्म की कट्टरता है शुद्धतावाद [बाज़ारवाद-2]

रा ष्ट्रभाषा या मातृभाषा के अस्तित्व पर मंडराते खतरों के मद्देनज़र अक्सर लोग भावुक होकर बातें करते हैं। शुद्धतावाद एक किस्म की कट्टरता है जो भाषा के विकास में रुकावट डालती है। दरअसल समाज में भाषा दो स्तरों पर प्रचलित रहती है। पहली है वह भाषा जो बोली जाती है और दूसरी है वह भाषा जो लिखी जाती है। इसे बोलचाल की भाषा और साहित्य की भाषा भी कहा जा सकता है। बोलचाल की भाषा को कई तत्व प्रभावित करते हैं। लोकव्यवहार में आया बदलाव शब्दों के बरते जाने की प्रवृत्ति में साफ़ नज़र आता है और यह भाषा को एक नया संस्कार देता है। संस्कृत की बुध् धातु में ज्ञान, प्रकाश, चमक जैसे भाव हैं। बुद्धि, बुद्ध जैसे शब्दों के मूल में यही बुध् धातु है। भारत से लेकर समूचे मध्यएशिया में बुद्ध की इतनी प्रतिमाएं बनीं कि फारसी में जाकर बुद्ध का उच्चारण बुत हो गया और मतलब हुआ प्रतिमा। जाहिर है संस्कृत का बुद्ध फारसी का बुत बनकर एक नए अर्थ में फिर भारतीय भाषाओं में लौट आया। एक ही शब्द से दो शब्द बनने, उनकी अर्थवत्ता बदलने की वजह से भाषा के समृद्ध होते जाने की ऐसी अनगिनत मिसालें ढूंढी जा सकती हैं। इस संदर्भ में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा बनाया गया वनस्पति घी डालडा भारत में, खासतौर पर हिन्दी पट्टी में इतना लोकप्रिय हुआ कि डालडा का अर्थ ही वनस्पति घी हो गया। हिन्दी के लगातार विकसित होते जाने में बाज़ार की भूमिका के ये कुछ उदाहरण हैं।

जिस तरह से कठोर खुरदुरी चट्टानों को भी पानी चिकना बना देता है ताकि उस पर सुगमता से गुजर सके उसी तरह सदियों तक अलग अलग समाजों के बीच भाषा विकसित होती है। किसी शब्द में दिक्कत होते ही, ध्वनितंत्र अपनी जैविक सीमाओं में शब्दों के उच्चारणों को अनुकूल बना लेता है। स्कूल-इस्कूल, लैन्टर्न-लालटेन, एग्रीमेंट-गिरमिट, गैसलाईट-घासलेट, ऊं नमो सिद्धम्-ओनामासीधम, सिनेमा-सलीमा, प्लाटून-पलटन, बल्ब-बलब-बलप-गुलुप, लैफ्टीनेंट-लपटन जैसे अनेक शब्द हैं जो एक भाषा से दूसरी में गए और फिर उस जब़ान में अलग ही रूप में जगह बनाई। कई शब्द हैं जिनका उच्चारण दूसरी भाषा के ध्वनितंत्र के अनुकूल रहा और उनके उच्चारण में बहुत ज्यादा अंतर नहीं आया। ध्यान रहे शब्दों की अर्थवत्ता और उनके उच्चारणों में बदलाव की प्रक्रिया दुतरफा रहती है। आमतौर पर शासक वर्ग की भाषा किसी क्षेत्र की लोकप्रचलित भाषा को तो प्रभावित करती ही है मगर इसके साथ शासक वर्ग की भाषा भी उसके प्रभाव से अछूती नहीं रहती। अंग्रेजी, फारसी यूं तो इंडो-यूरोपीय परिवार की भाषाएं हैं इसलिए उसकी शब्दावली में अर्थसाम्य और ध्वनिसाम्य नज़र आता है। इसके बावजूद हिन्दी अथवा द्रविड़ भाषाओं के शब्दों को भी अंग्रेजी ने अपनाया है जैसे नमस्कार, गुरु आदि। इसके अलावा भी कुछ शब्द ऐसे हैं जिनकी अर्थवत्ता और उच्चारण अंग्रेजी में जाकर सर्वथा बदल गया जैसे जैगरनॉट। खुरदुरा सा लगनेवाला यह शब्द मूलतः हिन्दी का है। आप गौर करें यह अंग्रेजी भाषा के ध्वनितंत्र के मुताबिक हुआ है इसलिए हमें खुरदुरा लगता है। उड़ीसा का भव्य जगन्नाथ मंदिर और विशाल रथ अंग्रेजी में जैगरनॉट हो गया। शुरुआती दौर में जगन्नाथ के विशाल रथ में निहित शक्ति जैगरनॉट की अर्थवत्ता में स्थापित हुई उसके बाद जैगरनॉट में हर वह वस्तु समा गई जिसमें प्रलयकारी, प्रभावकारी बल है। एक हॉलीवुड फिल्म के दैत्याकार पात्र का नाम भी जैगरनॉट है। जगन्नाथ को जैगरनॉट ही होना था और जयकिशन की नियति जैक्सन होने में ही है। हालांकि असली जैकसन वहां पहले ही है। दिल्ली, डेल्ही हो जाती है। ये तमाम परिवर्तन आसानी के लिए ही हैं। भाषा का स्वभाव तो बहते पानी जैसा ही है।

याद रहे, विदेशी शब्दों के प्रयोग की दिशा पढ़े लिखे समाज से होकर सामान्य या अनपढ़ समाज की ओर होती है। रेल के इंजन का दैत्याकार रूपवर्णन जब ग्रामीणों आज से करीब दो सदी पहले सुना तब उनकी कल्पना में वह यातायात का साधन न होकर सचमुच का दैत्य ही था। लोकभाषाओं में इंजन के बहुरूप इसलिए नहीं मिलते क्योंकि इस शब्द की ध्वनियां भारतीय भाषाओं के अनुरूप रहीं अलबत्ता अंजन, इंजिन जैसे रूपांतर फिर भी प्रचलित हैं। मालवी, हरियाणवी, पंजाबी में इस इंजन के भीषण रूपाकार को लेकर अनेक लोकगीत रचे गए। इंजन चाले छक-पक, कलेजो धड़के धक-धक, या इंजन की सीटी में म्हारो मन डोले जैसे गीत इसी कतार में हैं। ध्यान रहे इंजन की सीटी में मन डोलने वाली बात में जिया डोलने वाली रुमानियत नहीं बल्की भयभीत होने का ही भाव है। यदि उधर हमारे जगन्नाथ रथ को अंग्रेजी में जैगरनॉट जैसी अर्थवत्ता मिली तो इधर अंग्रेजी का इंजन भी डेढ़ सदी पहले के लोकमानस में भयकारी रूपाकार की तरह छाया हुआ था। इस प्रक्रिया के तहत कई पौराणिक चरित्रों में अलौकिकता का विस्तार होता चला गया। शब्दों के साथ भी यही होता है।

पूरब के अग्निपूजक मग (मागध) पुरोहित जब ईरानियों के अग्निसंस्कारों के लिए पश्चिम की जाने लगे तब मग शब्द के साथ जादू की अर्थवत्ता जुड़ने लगी। उन्हें मागी कहा गया जो अग्निपुरोहित थे। और पश्चिम की तरह यात्रा करते हुए यह मैजिक में तब्दील हुआ जिसका अर्थ जादू था। याद रहे अग्निपूजकों के हवन और आहूति संबंधी संस्कारों में नाटकीयता और अतिरंजना का जो पुट है उससे ही इस शब्द को नई अर्थवत्ता और विस्तार मिला। मराठी, हिन्दी पर फारसी अरबी का प्रभाव और फिर एक अलग उर्दू भाषा के जन्म के पीछे कही न कही राज्यसत्ता का तत्व है। मगर मराठी और हिन्दी कहीं भी फारसी से आक्रान्त नहीं हुई उलट उन्होंने इसे अपने शृंगार का जरिया बना लिया। यह उनकी आन्तरिक ताकत थी। आज भी देवनागरी के जरिये उर्दू का इस्तेमाल करने की ललक से यह साबित होता है।-जारी

इन्हें भी पढ़े-
1.शब्दों की तिजौरी पर ताले की हिमायत...2.शुद्धतावादियों, आंखे खोलो…



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Sunday, September 19, 2010

पुरानी है बाज़ार से भाषा की यारी (बाजारवाद-1)

भा षा संबंधी विमर्शों के दौरान अक्सर अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव से प्रदूषित होती हिन्दी के स्वरूप पर फिक्र जताई जाती है। ऐसी फिक्र करनेवाले यह भूल जाते हैं कि बीते बारह सौ साल में कोई वक्त ऐसा नहीं रहा जब इस देश की भाषाओं पर किन्हीं विदेशी भाषाओं का प्रभाव न पड़ा हो। पहले अरबी, फिर फ़ारसी इस मुल्क में सत्ता की भाषा रही मगर हिन्दी तब भी लोक में रची बसी रही। शुद्धतावादियों को अरबी-फारसी का बढ़ता प्रभाव रास नहीं आया मगर लोक मानस अपने स्तर पर इन भाषाओं से अपनी भाषा बोली को अलग संस्कार देता रहा।

ह राज्यसत्ता या धर्म के जोर पर नहीं हुआ बल्कि बाजार की ज़रूरत पर हुआ। उपज के लिए फ़सल शब्द आम हो गया। कोश के लिए ख़ज़ाना शब्द का कोई दूसरा विकल्प हिन्दी में ढूंढने से भी नहीं मिलता। साबुन का कोई विकल्प हिन्दी के पास नहीं है। पुर्तगाली मूल के सैपोन शब्द को अरब सौदागरों ने साबुन बनाया। अरब के शासक इस मुल्क पर तलवार की दम पर इस्लाम थोपते, उससे पेशतर अरबी सौदागर ने हिन्दुस्तानियों को सैपोन को साबुन की शक्ल में एक नई सौग़ात दे दी थी। बात यह है कि बड़ा भाषायी समूह ही किसी भी समाज का प्रभावी समूह होता है। चाहे धर्म और सत्ता जैसे तत्व उसके खिलाफ़ हों।


बीती कई सदियों से अरबी, फ़ारसी, पुर्तगाली, अंग्रेजी के बीच पलती-पनपती हिन्दी इसका प्रमाण है। वजह है इस भाषायी समूह के साथ गाढ़ा रिश्ता बनाने की बाज़ार की पुरज़ोर कोशिश। बाज़ार उस भाषा में संवाद करता है जो जनमानस में पैठी है। बाज़ार के तत्व चूंकि स्थानीय धर्म और सत्ता की सीमाओं से बाहर निकल कर विस्तृत भौगोलिक सामाजिक परिवेश से जुड़ता है इसलिए विभिन्न क्षेत्रों के साथ उसका संवाद होता है। कारोबारी तबका विराट स्तर पर भाषाओं को प्रभावित करता है और यह परिवर्तन राजकाज की भाषा पर कम और लोकभाषाओं या सम्पर्क भाषाओं पर ज्यादा तेज़ी से असर डालता है। हर दौर में समाज बदलता है क्योंकि यह प्रकृति का स्थायी नियम है। भाषा जब समाज से जुड़ती है तब वह धर्म, नस्ल से परे अपने सफ़र पर होती है। यह सफ़र कठिन से आसान की राह चुनता है। हालांकि भाषा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में धर्म और राज्यसत्ता भी हैं मगर भाषा का असली याराना सिर्फ और सिर्फ बाज़ार के साथ है। साहित्य में भाषाएं सांस भर लेती हैं पर उनकी असली चेतनता लोक में प्रचलित बरताव से पता चलती है। प्राचीनकाल से ही कारोबारी समुदायों का योगदान भाषाओं के विकास में रहा है।

ज हम जिस बाजारवाद के नाम का सियापा करते हैं दरअसल यह विकास की प्रक्रिया है। विभिन्न देशों प्रदेशों के बीच कारोबार के दौरान सबसे पहले नए शब्दों से व्यापारी ही परिचित होता है। उसमें संस्कृति भी है, स्थानीय समाज भी है पर सबसे महत्वपूर्ण वह उत्पाद होता है जिससे वह परिचित होता है और फिर उसका कारोबार दूसरे कई इलाकों में करता है। यूं ही बढ़ते हैं शब्द और भाषाएं। जनता-जनार्दन के मुख की भाषा लोकभाषा है। यह लोकभाषा बाढ़ के पानी के समान नियन्त्रण में नहीं आती। भाषाविद् डॉ सुरेश कुमार वर्मा के मुताबिक भाषा बड़ी मौज से सब तरफ़ बहती है और वैयाकरण का अनुशासन का बर्दाश्त नहीं कर पाती। मूल या तत्सम शब्दों से निस्सृत नए शब्दों को कोई लाख भ्रष्ट कहे, किन्तु वास्तव में वे भाषा के निरन्तर परिवर्तनशील बने रहने के परिचायक हैं। परिवर्तन जीवन्तता का प्रतीक है। परिवर्तन प्रकृति का विधायी तत्त्व है, जो उसे सदैव ताजा़, स्फूर्त और सानन्द बनाए रखता है।   


स्लाम की आंधी में अरबीकरण पर जोर देने के बावजूद फारसी को फारसी ही कहा जाता है। शुद्धतावाद के बावजूद सरकारी हिन्दी और संस्कृतनिष्ठता से हटकर बोलचाल की हिन्दी ने अलग अलग इलाकों में अपनी अलग पहचान कायम रखी है। हर दौर में भाषाओं को जिंदा रखने में बाजार की ही भूमिका प्रमुख रही है। मनोरंजन के पैमाने पर साहित्य तो भाषा की एक आज़माईश भर है। समाज, बाजार और भाषा यही त्रिकोण महत्वपूर्ण है। सदियों से बाजार के जरिये ही शब्दों का कारोबार होता आया है जिसने भाषाओं को समृद्ध किया है। लेन-देन में कोई हर्जा नहीं, बल्कि लेन-देन चलता रहे तभी भाषाएं भी चलेंगी।  अगली कड़ी में भी जारी

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Thursday, September 16, 2010

ब्लॉग बोला- सीखो सबक...

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Friday, September 10, 2010

अल्हड़, खिलंदड़ी होती है लोकभाषा…

... इन दिनों मैं शब्दों का सफ़र के पुस्तकाकार रूप की साज-संभार में व्यस्त हूं और  प्रूफरीडिंग कर रहा हूं।  चार वर्षों में पहली बार पिछले दो-तीन महीनों से सफ़र अनियमित चल रहा है। आप सबका आभारी हूं कि इसके बावजूद साथ बने हुए हैं। जल्दी ही सफ़र अपनी पुरानी रफ़्तार पकड़ लेगा।  दीवाली तक इस पुस्तक का पहला खण्ड  आपके हाथों तक पहुंच सकेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। यह आलेख मेरे गुरु, प्रो. सुरेशकुमार वर्मा ने वीणा से प्रवीण और कुश से कुशल पोस्ट में बलजीत बासी की प्रतिक्रिया से प्रेरित होकर लिखा है। बलजीत भाई की संदर्भित शब्दों और विवेचना के बारे में कुछ जिज्ञासा थी। निश्चित ही बलजीत भाई की उर्वर जिज्ञासा का समाधान करने की क्षमता मुझमें नहीं थी। डॉक्टर वर्मा के आलेख ने मेरा काम आसान कर दिया। मैं गौरवान्वित हूं कि सफ़र के लिए उन्होंने स्वतःप्रेरणा से यह आलेख भेजा।  प्रसंगवश बताता चलूं कि सफ़र के पुस्तक रूप की भूमिका गुरुवर ने ही लिखी है।

डॉ. सुरेशकुमार वर्मा
फ़र की पिछली पोस्ट  वीणा से प्रवीण और कुश से कुशल पर बलजीत बासी की दो प्रतिक्रियाओं ने मेरा ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने समध्वनीय शब्दों पर
SKVARMA ख्यात भाषाविद, कहानीकार प्रो. सुरेशकुमार वर्मा मध्यप्रदेश के कई महाविद्यालयों में प्राचार्य रहे। मध्यप्रदेश शासन के उच्चशिक्षा विभाग के संचालक पद पर प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी वहन कीं। कई पुस्तकें लिखीं जिनमें अर्थविज्ञान के क्षेत्र में शोधग्रन्थ हिन्दी अर्थान्तर महत्वपूर्ण है। कहानी संग्रह जंग के बारजे पर काफी चर्चित रहा। 
जिज्ञासा की है। इससे उनकी बहुज्ञता का परिचय मिलता है। समध्वनीय शब्दों के स्रोतों (व्युत्पत्तियों) तक पहुंचना ज़रूरी होता है। `शब्दों के सफ़र´ का यही महत्त्व है कि वहां शब्दों के स्रोतों तक पहुंचकर मूलार्थ और निहितार्थ को प्रासंगिक आयामों के साथ विवेचित किया जाता है। व्युत्पत्तिविज्ञानी श्री अजित ने संस्कृत के वीणा से विकसित प्रवीण आदि शब्दों की विवेचना की है। यह `प्रवीण´ ही `परबीन´ के रूप में देशी भाषाओं में विकसित हो गया है। शब्द के आदि में आये संयुक्ताक्षर का विघटन देशी भाषाओं की सामान्य प्रकृति रही है। अवधी, बुन्देली, ब्रज आदि बोलियों मे संयुक्ताक्षरों को तोड़ कर स्वतन्त्र वर्णों के प्रयोग की प्रवृत्ति आम है जैसे करम, मरम, धरम, शरम, कारज, तीरथ, बरत इत्यादि। उर्दू भी इस सन्दर्भ में असहनशील दिखाई देती है। वहां शब्द के आदि में संयुक्ताक्षर का परहेज़ किया जाता है। इसीलिए `ब्रिटेन´ वहां `बरतानिया´ हो गया है। असल में अरबी लिपि में संयुक्ताक्षर की लिपिपरक अलग पहचान नहीं है। `स्नान´ में सीन और नून वर्णों का स्वतन्त्र प्रयोग होगा,, जिसे `सनान´ पढ़ा जा सकता है। `खयाल´ शब्द में ख़ और ये वर्ण स्वतन्त्र रूप से लिखे जाते हैं। हिन्दी परम्परा में इस शब्द का उच्चारण `ख्याल´ भी हो सकता है। उर्दूवाले प्राण, प्रीति, स्मरण, और ज्योति के लिए परान, पिरीत, सिमरन और जोत का प्रयोग करना चाहेंगे। रही `व´ की `ब´ में बदलने की बात, तो खड़ी बोली को छोड़कर सभी बोलियों की यह बहुत आम प्रवृत्ति रही है। संस्कृत के जिन तत्सम षब्दों में `व´ को प्रयोग हुआ है, वहां बड़े धड़ल्ले से `ब´ कर दिया गया है। कुछ उदाहरण देखें - पूरब , करतब, बरत, बायस, बानी, बाजा, बिन्दु, बेदी आदि। अपवाद हो सकते हैं, किन्तु अपवादों से नियम नहीं टूटते।
श्री बलजीत बासी ने `दाना-बीना´ पद की चर्चा की है। यहां `बीना´ शब्द , संस्कृत के विनयन से उद्भूत है, जिसका मूल क्रियारूप `बीनना´ है। उन्होंने देखने के अर्थ में एक और `बीना´ शब्द का तज़किरा उठाया है। निस्सन्देह यह बरास्ते फ़ारसी उर्दू में आया है। `दूरबीन´ में यही शब्द विराज रहा है। दृष्टि का समानार्थक `बीनाई´ काफ़ी प्रचलित है। `बीना´ शब्द एक और अर्थ का वाचक है। वह अर्थ है बाज़ार। यह `बीना´ शब्द संस्कृत के `पण्य´ से विकसित हुआ है। एक रोचक लोकोक्ति का उल्लेख मुनासिब होगा। मांसाहारियों को मालूम होना चाहिये कि बकरे के शरीर का कौन सा हिस्सा अधिक स्वादिष्ट है। शायद उन्हें प्रशिक्षितकरने के लिए ही लोकपरम्परा में यह लोकोक्ति प्रचलित हुई - चले जाओ बीना, तो ले आओ सीना / न मिले सीना, तो ले आओ पुट /न मिले पुट तो चले आओ उठ। उन्होंने पंजाबी शब्द के `बैण´ का जिक्र किया है। हिन्दी में यही `बैन´ है। यह शब्द संस्कृत वाणी से विकसित हुआ है। हिन्दी की बोलियों में `वचन´ या PP009XX `कथन´ के रूप में `बैन´ शब्द खूब प्रयुक्त हुआ है। `रामचरितमानस´ में राम-वन-गमन के अन्तर्गत गंगा पार करने के प्रसंग में एक सोरठे में इसका प्रयोग हुआ है - `सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे।´
ब कृष्ण जन्माष्टमी का प्रसंग चल रहा है, तो जगन्नासदास रत्नाकर के `उद्धवशतक´ के एक मार्मिक पद को उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं। गोपियां श्रीकृष्ण के प्रेम-रस में पगी थीं। उद्धव उन्हें निर्गुण, निराकार की उपासना के शुश्क उपदेश रूपी पत्थर से घायल करना चाहते हैं। वे दर्पण के दृष्टान्त से अपनी व्यथा को प्रकट करती हैं। यह तथ्य है कि दर्पण जब साबुत रहता है, तो उसमें एक ही छवि प्रतिबिम्बित होती है। दर्पण को जब तोड़ दिया जाता है, तो दर्पण के जितने टुकड़े होते हैं, उसके हर टुकड़े में अलग-अलग उतने ही प्रतिबिम्ब दिखाई देते हैं। गोपियां कहती हैं कि हमारा मन दर्पण के समान है। उसमें कृष्ण का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। कृष्ण के एक ही प्रतिबिम्ब ने हमारी यह दुर्दशा कर रखी है। हे उद्धव, तुम अपने निर्गुण ब्रह्म का वचन (बैन) रूप पत्थर मत चलाओ। तुम्हारे इस पत्थर से हमारा मन-रूपी दर्पण टुकड़े-टुकड़े हो जायगा। मन-रूप दर्पण के जितने टुकड़े होंगे, उतने कृष्ण हमारे मन में बस जायेंगे। एक कृष्ण ने तो हमारी यह दुर्दशा कर रखी है, जब ढेर सारे कृष्ण हमारे मन में बस जायेंगे, तो न जाने हमारी क्या दुर्दशा होगी !
टूकि टूकि जइहै मन मुकुर हमारो हाय/ चूकि ही कठोर बैन पाहन चलावो ना/ एक मनमोहन तो बसि के उजारियौ मोहिं/ हिय में अनेक मनमोहन बसावो ना।
नता-जनार्दन के मुख की भाषा लोकभाषा है। यह लोकभाषा बाढ़ के पानी के समान नियन्त्रण में नहीं आती। बड़ी मौज से सब तरफ़ बहती है और वैयाकरण का अनुशासन का बर्दाश्त नहीं कर पाती। मूल या तत्सम शब्दों से निस्सृत नये शब्दों को कोई लाख भ्रष्ट कहे, किन्तु वास्तव में वे भाषा के निरन्तर परिवर्तनशील बने रहने के परिचायक हैं। परिवर्तन जीवन्तता का प्रतीक है। परिवर्तन प्रकृति का विधायी तत्त्व है, जो उसे सदैव ताजा़, स्फूर्त और सानन्द बनाये रखता है। बकौल जयशंकर प्रसाद - `पुरातनता का यह निर्मोक, सहन कर सकती न प्रकृति पल एक / नित्य नूतनता का आनन्द, किये है परिवर्तन में टेक।´  शब्दों के सफ़र में भाषा के इन्हीं जीवन्त तत्त्वों की व्याख्या और विवेचना की गई है और जब हमसफ़र जीवन्त हों, तो सफ़र तो जीवन्त और हुलासपूर्ण रहेगा ही।

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Thursday, September 2, 2010

कृष्ण की गली में

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वि ष्णु के सर्वाधिक लोकप्रिय नामों में एक नाम कृष्ण भी है। इस शब्द की व्युत्पत्ति कृष् धातु से हुई है जिसमें खींचने का भाव निहित है। आकर्षण, खींचना, खिंचाव, कशिश जैसे शब्द भी इससे ही बने है। कृष धातु से बने कुछ और महत्वपूर्ण शब्द हैं कृषि, किसान, कृषक और आकृष्ट आदि। कृष्ण का एक अर्थ है काला, श्याम, गहरा नीला। इसी तरह काला हिरण भी इसके अर्थों में शामिल है। प्रख्यात संस्कृत विद्वान पांडुरंग राव कृष्ण शब्द की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि नटवर का प्रमुख लक्षण की आकर्षण है। समस्त संसार को वह अपनी ओर खींच लेते हैं। कृष्ण का जन्म रात को हुआ और राम का दिन में। रात सबको अपनी ओर खींच लेती है और दिन सबको अपने अपने काम मे लगा देता है। रात में लोग अपने में लीन हो जाते हैं ,सपनों की नई दुनिया में प्रवेश करते हैं जबकि दिन में लोग बहिर्मुख हो जाते है, बाहर के कामों में लग जाते हैं जिस प्रकार राम और कृष्ण एक दूसरे के पूरक हैं वैसे ही जैसे दिन और रात। कृषि तत्व से भी कृष्ण का संबंध है। भूमि पर कृषि की जाती है और सारी पृथ्वी भगवान के लिए कृष्य अर्थात खेती करने योग्य है। विशाल विश्व को कृष्यभूमि बनाकर विराट् कृष्ण भगवान् अच्छी अच्छी फसलें उगाते हैं। यही कृष्ण का आकर्षण है। कृष् धातु भू की सत्ता की प्रतीक है और ‘न’ निर्वृत्ति का वाचक। सत्ता और निर्वाण के संयोग से ही कृष्ण की उत्पत्ति होती है।

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