Friday, January 20, 2012

ग़नी और माले-ग़नीमत

livestock

बो ली भाषा में हम अक्सर ऐसे शब्दों का किन्हीं विशिष्ट अर्थों में इस्तेमाल कर रहे होते हैं जिनके साथ वह अर्थ मूलतः जुड़ा नहीं होता। अरबी भाषा से बरास्ता फ़ारसी होते हुए हिन्दी में आए ऐसे सैकड़ों शब्द हैं जो बोल-व्यवहार में हिन्दी के अपने से लगते हैं। आम बोलचाल का ऐसा ही एक शब्द है ग़नीमत जिसका इस्तेमाल करने के लिए किसी को उसका अर्थ या वाक्यों में प्रयोग सीखने की ज़रूरत महसूस नहीं होती। “ये तो ग़नीमत है, जो...,” “ग़नीमत थी कि...,” “ग़नीमत समझिए कि...,” जैसे अल्फ़ाज़ आए दिन हम बोलते-सुनते हैं। इन वाक्यों से ज़ाहिर हो रहा है कि शुक्र, कृपा, मेहरबानी, सन्तोष, भलाई जैसे भावों को व्यक्त करने के लिए यहाँ ग़नीमत शब्द का प्रयोग हुआ है। उक्त वाक्यों में ग़नीमत का प्रयोग इस तरह हुआ है मानों किसी चीज़ की प्राप्ति हुई है। प्राप्ति की यह अनुभूति मानसिक भी हो सकती है और भौतिक भी।ग़नीमत थी, कि दुर्घटना के वक्त मैं वहाँ नहीं था” यह वाक्य बोलने वाला व्यक्ति सुख और सन्तोष प्राप्त करते हुए ही अपने उद्गार व्यक्त कर रहा है। इसी तरह ग़नीमत थी कि मेरी जेब में कुछ रुपए निकल आए” इस वाक्य में भी प्राप्ति की बात उभर रही है। सेमिटिक मूल के ग़नीमत शब्द में भी मूल रूप से प्राप्ति का भाव नहीं है बल्कि प्रकारान्तर से वह आ रहा है, मगर अरबी समाज में विकासक्रम के दौरान इसमें जो भाव रूढ़ हुआ वह था लूट का माल या मुफ़्त का माल।
नीमत के मूल में अरबी का घनम शब्द है जो बना है सेमिटिक धातु घ-न-म से, जिसमें हस्तगत करने, अवाप्त करने, कब्ज़ा करने जैसे भाव हैं । ज़ाहिर है ये सभी बातें प्राप्त करने, कुछ पाने से जुड़ी हैं, मगर सीधे सीधे इन्हें प्राप्ति से नहीं जोड़ा जा सकता। लूट के ज़रिए कुछ पाना और मेहनत कर के कुछ पाना, दोनों में फ़र्क है। सामान्य अर्थों में प्राप्ति शब्द में अनैतिक कर्म के ज़रिये प्राप्ति का भाव नहीं है। इसके बावजूद लूट की रकम, पड़ा हुआ माल, लावारिस वस्तु को हस्तगत करना भी प्राप्ति में ही आता है। इस तरह ग़नीमत शब्द में प्रकारान्तर से प्राप्ति का भाव जुड़ा हुआ है। कालान्तर में इस प्राप्ति में अस्तित्व रक्षा के संसाधन, सामग्री या लाभ की वस्तु का भाव भी जुड़ गया।दुनिया भर की भाषाओं की आदिम शब्दावली पशुपालन और कृषि संस्कृति से जन्मी है। उस दौर में सामाजिक व्यवहार उतने व्यापक और पेचीदा नहीं थे। पशु के पालन-पोषण, भ्रमण, खेती, खरीद-बिक्री जैसी क्रियाएँ और युद्ध, लूट, चोरी जैसी घटनाएँ सामान्य थीं जिनसे जुड़े शब्द ही प्रारम्भिक शब्दावली का हिस्सा बने।
रबी का घनम भी मूलतः पशुपालन संस्कृति से जन्मा शब्द है। हिन्दी-उर्दू में जिसे हम ग़नीमत की तरह इस्तेमाल करते हैं, मूल रूप से वह घ़नीमत है और अरबी के घनम से बना है। इसमें मूलतः समूह में रहने वाले चौपायों का भाव है। मोटे तौर पर भेड़, बकरी और ऊँट इसमें आते हैं जो रेगिस्तानी बद्दुओं के प्राचीन सहचर रहे हैं और प्राचीन अरबी समाज के सामाजिक-आर्थिक जीवन का प्रमुख आधार थे। पशुओं के रेवड़ के सन्दर्भ में समूहवाची घनम शब्द की व्याप्ति सेमिटिक भाषाओं में हुई। घनम में सम्पत्ति का भाव भी शामिल हुआ क्योंकि प्राचीन समाज में मनुष्य ने लाभकारी पशुओं को काबू कर उन्हें पालतू बनाया इस तरह से पशुधन की अवधारणा विकसित हुई। अधिकार, स्वामित्व और सम्पत्ति का बहुआयामी बोध अगर किसी ने मनुष्य को कराया है तो वे पशु ही हैं। भाषा में भी यह रिश्ता

... जिसके हाथ माल लगा वह पहले तो घनीम अर्थात विजेता कहलाया। पराजितों की निगाह में वह लुटेरा, डाकू, दस्यु था। आगे घनीम का एक और रूपान्तर हुआ जिसमें शक्तिशाली, समृद्ध, मालदार, ताक़तवर, दौलतमंद जैसे वज़नदार अर्थों की स्थापना के साथ अरबी, फ़ारसी, उर्दू और हिन्दी में ग़नी जैसा रौबदाब वाला शब्द भी अस्त्तित्व में आ गया। 

साफ नज़र आता है। उर्दू –हिन्दी का एक आम शब्द है “माल” जो मूल रूप से सेमेटिक भाषा परिवार का है। माल का अर्थ होता है सम्पत्ति। व्यापक तौर पर धन-दौलत, सामान, भंडार, कीमती सामग्री, वस्तुएं आदि भी आती हैं। यह बना है “माल” अर्थात mwl से जिसका अर्थ होता है पशुओं का रेवड़। खासतौर पर जो दुधारू पशु पालतू हों
द्दुओं की संघर्षशील जीवन शैली से घनम शब्द का अर्थ विस्तार हुआ और इससे नए नए शब्द बने जैसे इघ्तानम जिसमें क़रीब-क़रीब माले-मुफ्त का आशय है। ऐसी सम्पत्ति को अर्जित करने का भाव  है जिसमें अधिक श्रम खर्च न हुआ हो। मिसाल के तौर पर इधर-उधर भटकते पशुओं को कब्जे में लेकर अपनी सम्पत्ति बनाना बहुत मेहनत का काम नहीं था। वैसे भी दुधारू पशुओं को हर धर्म में खुदाई तोहफ़ा माना गया है। उन्हें हस्तगत करना पाप नहीं है। इस्लाम में भी यही मान्यता है। घनीम ( ग़नीम ) शब्द का अर्थ मूलतः (पशुओं पर ) कब्ज़ा करने वाला है, बाद में इसमें विजेता, लुटेरा, डाकू, शुत्रु, दुश्मन जैसी अर्थवत्ता कायम हुई। प्राचीन समाजों में पशुधन की चोरी बड़ी घटना होती थी। वेदों में पशु चोरी प्रकरणों का उल्लेख है। पशु चोरों को कहीं दस्यु तो कहीं पणि कहा गया है। बाद के दौर में घनीमाह शब्द विकसित हुआ जो ग़नीमत का पूर्वरूप था। घनीमाह में लूट के माल की अर्थवत्ता स्थापित हुई। माले-ग़नीमत का अर्थ होता है लूट का माल, मुफ़्त में मिला माल, खुदा की नेमत, अचानक मिला लाभ, सौभाग्य चिह्न वगैरह वगैरह।
गौरतलब है कि प्राचीन अरब का युद्धप्रिय कबाइली समाज में अलग अलग समूह अस्तित्व के लिए निरन्तर संघर्षरत रहते थे और पराजित समूह तितर-बितर होकर जब अपना साज़ो-सामान छोड़ कर भागता था तब उस सामग्री पर बिना श्रम किए आसानी से विजेता समूह का कब्ज़ा हो जाता था। यह घनीमा या माले-ग़नीमत था। प्रसंगवश मराठी में भी शत्रु, वैरी, विरोधी के अर्थ में ग़नीम शब्द है। कृपा कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश में इसका जन्मसूत्र अरबी के घनीम से ही जोड़ा गया है। मज़े की बात यह कि मुगलों ने मराठों के लिए शत्रु, लुटेरों के अर्थ में ग़नीम शब्द का इस्तेमाल किया। गनीम का मराठी में एक रूप गलीम भी मिलता है। आमने-सामने की लड़ाई की बजाय शत्रु को फँसाकर मारने की युद्धशैली को गनिमाई या गनीमी कहा गया। स्पष्ट है कि शिवाजी की छापामार शैली के लिए यह इस्तेमाल हुआ। मुगलों की सेना के आगे मराठों की सैन्य शक्ति काफ़ी कम थी और इसीलिए मराठों ने छापामार शैली अख्तियार की थी। 
कुल मिलाकर धार्मिक व्याख्या के अनुसार दुधारू पशु ( घनम ) ईश्वर की देन हैं। घनम पर कब्ज़ा करने की क्रिया से घनीमा (ग़नीमा)बना जिसमें पशुओं को पालतू बना कर अपनी सम्पत्ति का दर्ज़ा देने वाली संस्कृति विकसित हुई। बाद के दौर में संग्राम के दौरान छोड़े गए असबाब को ग़नीमत समझा जाने लगा। इस्लाम में घनीमा को लेकर नैतिक व्यवस्थाएँ कायम हुईं जो निश्चित ही विजेता समूह के पक्ष में ही थीं। इस्लामी विस्तारवाद के दौर में बहुत कुछ बदलाव हुआ और लूट के माल में गुलामों के साथ साथ औरतों को भी माले-ग़नीमत समझा जाने लगा। कहने की ज़रूरत नहीं कि ग़नीमत में शुरू से ही माल की अर्थवत्ता स्थापित थी। ज़ाहिर है कि जिसके हाथ माल लगा वह पहले तो घनीम अर्थात विजेता कहलाया। पराजितों की निगाह में वह लुटेरा, डाकू, दस्यु था। आगे घनीम का एक और रूपान्तर हुआ जिसमें शक्तिशाली, समृद्ध, मालदार, ताक़तवर, दौलतमंद जैसे वज़नदार अर्थों की स्थापना के साथ अरबी, फ़ारसी, उर्दू और हिन्दी में ग़नी जैसा रौबदाब वाला शब्द भी अस्त्तित्व में आ गया।

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5 कमेंट्स:

प्रवीण पाण्डेय said...

गनीमत है कि गनीमत का मूल समझ आ गया है..

Charanjeet said...

शुक्रिया अजित जी ; शेएर पूरा न हो रहा था;इसे पड कर हुआ ;

लूट का माल भी गनीमत है
पर जो हक का हलाल रहता है

वैसे मैं ने पंजाबी में लिखा है

लुट दा माल वी गनीमत है
पर जो हक दा हलाल रहंदा है

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छी जानकारी। काफी दिन गैरहाज़िर रहने के लिये क्षमा चाहती हूँ। शुभकामनायें।

Mansoor Ali said...

'ग़नीमत' है कि 'हाथी' रुपया खा के ख़ुश तो रहता है,
ग़नीमत है कि कीचड़ में 'कमल' अब खिल तो लेता है,
ग़नीमत है कि 'पंजा' मार कर पुचकार लेता है,
'ग़नीमत' कि 'हथोड़े' ने ही ख़ुद 'हंसिये' को तोड़ा है,
ग़नीमत कि नहीं मोहताज 'तीर' अब तो 'कमानों' के,
ग़नीमत कि 'घड़ी' में बारह बजते ही नहीं अब तो,
ग़नीमत कि 'अमर' बिन 'सायकल' हरकत में रहती है,
ग़नीमत कि सियासत की समझ 'अन्ना' को आई है,
ग़नीमत कि ग़नीमत की समझ अब हमको आई है,
जो मिल जाए मुफ़त में, वो नहीं अपनी, पराई है !

http://aatm-manthan.com

विष्णु बैरागी said...

सचमुच में हम ऐसे अनेक शब्‍द प्रयुक्‍त करते हैं जिनका अर्थ हम न तो जानते हैं और न ही जानने की कोशिश करते हैं। 'गनीमत' भी उन्‍हीं में से एक है। इससे परिचित कराने के लिए धन्‍यवाद।

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