Monday, May 7, 2012

रग-रग की खबर

leaf

क्त वाहिनी के लिए हिन्दी में रग शब्द भी खूब प्रचलित है, अलबत्ता नस का चलन ज्यादा है । नस को नाड़ी भी कहते हैं और नलिका भी । रग भारत-ईरानी परिवार का शब्द है और फ़ारसी के ज़रिए हिन्दी में आया है जिसका सही रूप रग़ है । रग़ की व्युत्पत्ति के बारे में निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता । रक्त की पहचान उसका लाल रंग है और उसका काम है नसों में बहना क्योंकि वह तरल है और तरलता में नमी होती ही है ।  सो नमी और बहाव के गुणों को अगर पकड़ा जाए तो रग़ शब्द के जन्मसूत्र इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में नज़र आते हैं । वैदिक और जेंदावेस्ता साहित्य से यह स्ष्ट हो चुका है कि इंडो-ईरानी और भारोपीय भाषा परिवार में ऋ-री जैसी ध्वनि में बुनियादी तौर पर गति, प्रवाह का भाव रहै है और ऐसे शब्दों की एक लम्बी फेहरिस्त तैयार की जा सकती है जिनमें न सिर्फ राह, रास्ता, दिशा, आवेग, वेग, भ्रमण, चक्र, गति, भ्रमण जैसे आशय छुपे हैं बल्कि इनसे नमी, रिसन जैसे अर्थों का द्योतन भी होता है । रक्तवाहिनी मूलतः एक मार्ग भी है और और साधन भी जिसमें हृदय द्वारा तेज रफ़्तार से खून बहाया जाता है । गौरतलब है कि नल, नड, नद जैसे प्रवाही अर्थवत्ता वाले शब्द के पूर्वरूप से ही एक विशेष नली जैसे तने वाली वनस्पति का नाम नलिनी पड़ा । इसी तरह नदी के लिए भी नलिनी नाम प्रचलित हुआ ।
जॉन प्लैट्स रग़ के मूल में संस्कृत का रक्त शब्द देखते हैं । ए डिक्शनरी ऑफ़ उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एंड इंग्लिश में रग़ की तुलना प्राकृत के रग्गो से की गई है जो रक्त का परिवर्तित रूप है । ध्वनि के आधार पर शब्दों के रूपान्तर की भी निश्चित प्रक्रिया होती है । इस हिसाब से देखें तो रक्त का एक रूप रत्त बनेगा और दूसरा रूप रग्ग या रग्गो हो सकता है । खास बात यह है कि रक्त साध्य है जबकि रग़ साधन का नाम है । रक्त की विशिष्ट पहचान उसका लाल होना है जबकि रक्तवाहिनी में गति प्रमुख है । इसलिए रक्त के रग्ग रूपान्तर से यह मान लेना कि इससे ही फ़ारसी का रग़ बना होगा, दूर की कौड़ी है । रक्त से बने रग्ग का अर्थ भी खून ही होता है । फ़ारसी का रग़ निश्चित ही रक्त से नहीं है । गौरतलब है कि भारोपीय भाषा परिवार में ऋ-री जैसी ध्वनियों से बने कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिनमें जलवाची भाव हैं अर्थात जिनकी अर्थवत्ता में गति व प्रवाह के साथ साथ नमी, आर्द्रता और गीलेपन का आशय निहित है । इसे यूँ समझें कि किसी स्रोत से रिसाव में मुख्यतः गति से भी पहले गीलेपन का अहसास होता है, फिर वह रिसाव धारा का रूप लेता है ।
ख्यात जर्मन भाषा विज्ञानी जूलियस पकोर्नी ने भारोपीय भाषाओं में धारा, बहाव, प्रवाह, गति, वेग, नमी, आर्द्रता को अभिव्यक्त करने वाले विभिन्न शब्दों के कुछ पूर्वरूप तलाशे हैं जिससे इनके बीच न सिर्फ़ सजातीय साम्य है बल्कि इनका व्युत्पत्तिक आधार भी एक है । res, ros, eres ऐसे ही पूर्वरूप हैं जिनसे ताल्लुक रखने वाले अनेक शब्द भारोपीय भाषाओं में हैं जैसे दौड़ने के लिए रेस, आवेग के लिए आइर , संस्कृत का रसा अर्थात रस, पानी या नदी आदि । इन सबमें ऋ – री नज़र आता है । प्रोटो इंडोयूरोपीय भाषा परिवार की एक धातु *reie- इसी कड़ी में आती है । इसमें भी ऋ की महिमा देखें । में मूलतः गति का भाव है। जाना, पाना, घूमना, भ्रमण करना, परिधि पर चक्कर लगाना आदि । प्राचीन संस्कृत धातु ऋत् और ऋष् में निहित गतिसूचक भावों का विस्तार अभूतपूर्व रहा है । संस्कृत धातु से बना है ऋत् जिसमें उचित राह जाने और उचित फल पाने का भाव तो है ही साथ ही चक्र, वृत्त जैसे भाव भी निहित हैं । हिन्दी के रेल शब्द में बहाव या प्रवाह का आशय निहित है । रेला शब्द की व्युत्पत्ति राल्फ़ लिली टर्नर संस्कृत के रय से मानते हैं जिसका अर्थ है तेज बहाव, तेज गति, द्रुतगामी, शीघ्रता आदि । रय बना है से जिसमें गति, प्रवाह का भाव है । इसी तरह र के मायने गति या वेग से चलना है जाहिर है मार्ग या राह का अर्थ भी इसमें छुपा है ।
प्राचीन धारा, प्रवाह या नदियों के नामों में भी प्रवाहवाची र, री या ऋ के दर्शन होते हैं । एटिमऑनलाइन के मुताबिक जर्मनी की की प्रसिद्ध नदी है राईन Rhine जिसके पीछे भारोपीय धातु *reie- ही है जिसका अर्थ है गति और प्रवाह । लैटिन में राइवस शब्द का अर्थ धारा होता है । वैदिकी की सहोदरा ईरान की अवेस्ता भाषा में नदीवाची एक शब्द है ranha जिसका अभिप्राय प्रवाही धारा है और इतिहासकारों के मुताबिक यह रूस की विशालतम नदी वोल्गा का प्राचीन नाम है । मोनियर विलियम्स के कोश में संस्कृत में रिण्व् या रिण्वति का अर्थ जाना है । वैसे तो रेणुका शब्द का अर्थ भी नदी होता है और अवेस्ता के रंहा ranha से इसका ध्वनिसाम्य भी है किन्तु भाषाविज्ञानी रंहा का साम्य वैदिकी के रसा से बैठाते हैं जिसका अर्थ रस, नमी, रिसन, नदी, धारा आदि है । भाषा विज्ञानियों के मुताबिक वोल्गा नदी का नामकरण प्रोटो-स्लाव शब्द वोल्गा से हुआ है जिसमें नमी का आशय है । उक्रेनी में भी वोल्गा का यही अर्थ है । रूसी भाषा के व्लागा का अर्थ होता है नम इसी तरह चेक भाषा में व्लेह का अर्थ है गीलापन । दरअसल ये सारे शब्द जन्मे हैं प्राचीन शकस्थान यानी सिथिया क्षेत्र में बोली जाने वाली किसी भाषा के रा शब्द से जिसका अर्थ था वोल्गा नदी । मूलतः यह रा शब्द रिसन या नमी का प्रतीक ही था । इसकी तुलना अवेस्तन रंहा या संस्कृत के रसा से करनी चाहिए ।
ज के ताजिकिस्तान क्षेत्र का प्राचीन नाम सोग्दियाना था । सोग्दियन भाषा में रअक का अर्थ होता है वाहिका, नालिका आदि । र(अ)क यानी रक की तुलना फ़ारसी के रग़ से करनी चाहिए । दरअसल सोग्दियन र(अ)क ही फ़ारसी के रग़ का पूर्वरूप है । प्राचीन शक भाषा के मूल रिसन, नमी वाले भाव का स्लाव जनों नें अपनी भाषा में अनुवाद वोल्गा किया और इस तरह नदी का नाम वोल्गा बना । दरअसल मूल रंहा , राईन जैसे शब्द नदीवाची हैं और इनका अनुवाद वोल्गा हुआ । डॉ अली नूराई के कोश के मुताबिक भी अवेस्ता के रण्हा शब्द का अर्थ मूलतः एक कल्पित पौराणिक नदी है जिसे जरदुश्ती समाज मानता था । रंहा का ही रूपान्तर पहलवी में रघ, रग़ हुआ और फिर फ़ारसी में यह रग़ बना ।
गौर करें कि किसी स्रोत से जब रिसाव होता है तो उसकी अनुभूति नमी की होती है । सतत रिसाव प्रवाह बनता है । इस प्रवाही धारा तेज गति से सतह को काटते हुए अपने लिए मार्ग बनाती है जिसे नद, नदी, नाड़ी या नाली कहते हैं । शरीर में रक्त ले जाने वाली वाहिनियाँ ऐसी ही नाड़ियाँ या नालियाँ हैं । किसी विशाल भूभाग को सिंचित करने, पोषित करने और उसे हरा भरा रखने में भी नदियों की विशिष्ट भूमिका होती है । इन्हें हम किसी भूभाग की नाड़ियाँ कह सकते हैं । हमारे शरीर की नसें या रगें भी वही काम करती हैं । रग शब्द की व्युत्पत्ति रक्त से न होकर भारोपीय भाषा परिवार के ऋ-री ध्वनि से जन्मे जलवाची शब्द समूह से ज्यादा तार्किक लगती है । नस से जुड़े जितने भी मुहावरे हैं, वे सभी रग में समा गए हैं जैसे रग फड़कना यानी आवेग का संचार होना, रग दबना यानी किसी के वश में या प्रभाव में आना, रग चढ़ना यानी क्रोध आना, रग रग पहचानना यानी मूल चरित्र का भेद खुल जाना अथवा रग-पट्ठे पढ़ना यानी किसी चीज़ को बारीके से समझ लेना आदि ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

6 कमेंट्स:

Mired Mirage said...

जिसे नर्व कहते हैं उसे हिंदी में या कहिए बातचीत की भाषा में क्या कहेंगे?

अजित वडनेरकर said...

@Mired Mirage
बोलचाल की भाषा में नर्व के लिए तन्त्रिका या नाड़ी शब्द हैं । बोलचाल में तो नस तक चलता है । "दिमाग की नसें सूख गई हैं" का अभिप्राय नर्व से ही होता है । बाकी नर्व भी वाहिका है चाहे संकेतों का वहन करे या रक्त का । इसीलिए धमनी या शिरा के लिए भी नर्व का प्रयोग मिलता है ।

प्रवीण पाण्डेय said...

रगों रगों में रक्त बह रहा,
शब्दों में भी वक्त बह रहा।

अमरनाथ 'मधुर'امرناتھ'مدھر' said...

लगाम के लिए वल्गा शब्द और वोल्गा में क्या कोई अंतर्संबंध है ? स्पष्ट करें | गंग -गंगा का नदी या पानी से क्या रिश्ता है यह भी बताने का कष्ट करें | क्योंकि क्योंइ नदियों के नाममें गंग शामिल है | जैसे गंगा, हवांगहो, यान्गातीसीकियांग, सीकियांग, मेकांग, सान्गापो आदि

अमरनाथ 'मधुर'امرناتھ'مدھر' said...

लगाम के लिए वल्गा शब्द और वोल्गा में क्या कोई अंतर्संबंध है ? स्पष्ट करें | गंग -गंगा का नदी या पानी से क्या रिश्ता है यह भी बताने का कष्ट करें | क्योंकि क्योंइ नदियों के नाममें गंग शामिल है | जैसे गंगा, हवांगहो, यान्गातीसीकियांग, सीकियांग, मेकांग, सान्गापो आदि

Mansoorali Hashmi said...

यानी 'शब्दों का सफ़र' , जी हां! 'शब्दों' का ओपरेशन यही होता है. प्रस्तुत है आज की पोस्ट पर प्रतिक्रिया:-

'माँ' की हमारी आँखे भी द्रवित है इन दिनों.


'कोलेस्ट्रल' जमा है 'रगों' में , इसी लिए,
रफ़्तार अपने देश की मद्धम सी हो रही,
'आचार' है 'भ्रष्ट' फिर 'संवेदनहीनता',
मदहोश रहनुमा है तो जनता भी सो रही,

'नलिनी', 'रेनुकाएं'* भी है प्रदूषित इन दिनों, {*नदी के अन्य नाम }
'प्रवाह', कोलेस्ट्रल से है, प्रभावित इन दिनों.
अपनी रगों में खून की गर्दिश भी कम हुई,
'माँ' की हमारी आँखे भी द्रवित है इन दिनों.

'आवेग' के लिए है ज़रूरत 'ऋ'षी की अब,
संस्कारों से 'सिंचित' हो, ये धरती ए मेरे रब,
'बाबाओं' से नजात मिले अब तो देश को,
खुशियों के और उम्मीदों के गाये तराने सब.

-मंसूर अली हाश्मी
Mansoorali Hashmi पर 10:19 PM

नीचे दिया गया बक्सा प्रयोग करें हिन्दी में टाइप करने के लिए

Post a Comment


Blog Widget by LinkWithin