Wednesday, June 17, 2015

//क्या हाल भिड़ू //


राठी के अनेक शब्द हिन्दी में घुलमिल चुके हैं। जैसे हलकट, वास्तव, वापरना, बिन्दास आदि। इसी कड़ी में भिड़ू शब्द भी आता है। अनेक लोग अनजाने में इसका प्रयोग बीडू करते हैं जो सही नहीं है। मराठी ‘भिड़ू’ में मूलतः संगी, साथी, स्नेही, मित्र, यार जैसे भाव हैं। किसी ज़माने में इसमें प्रतिस्पर्धी का भाव था और मित्र, दोस्त, यार जैसे ये तमाम भाव प्रतिस्पर्धी का ही अर्थविस्तार हैं। हिन्दी की ‘भिड़ना’ क्रिया का मराठी रूप होता है ‘भिड़णे’ और इससे ‘भिड़ू’ का गहरा रिश्ता है। हिन्दी में भिड़न्त, भिड़ना, भेड़ना (दरवाज़ा), भिड़ाना जैसे शब्द इसी कड़ी में आते हैं। और तो और, भीड़ जैसा आमफ़हम शब्द भी इसी परिवार का सदस्य है। जानते हैं मराठी भिड़ू के उत्तर-भारतीय सजातीय बन्धुओं की जन्मकुंडली को।

मराठी की भिड़णे क्रिया का अर्थ है एक दूसरे के सम्मुख आना, पास-पास आना आदि। अर्थात सहचर-जोड़ीदार भी भिड़ू है और दूसरे पाले में खड़ा प्रतिस्पर्धी भी भिड़ू है। कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश (पृ.611) में भिड़णे क्रिया के अन्तर्गत ही भिड़ू शब्द का उल्लेख है और इसका अर्थ “खेळांतील गडी” अर्थात जोड़ीदार, साथी, कम्पैनियन, संगी आदि होता है। कुलकर्णी इस सिलसिले में कुछ भ्रम पैदा करते हैं। वे भिड़ू की व्युत्पत्ति प्राकृत ‘आब्भिड’ से बताते हुए इसका रिश्ता संस्कृत के ‘आद्भिद’ शब्द से जोड़ते हैं। गड़बड़ यह है कि संस्कृत कोशों में आद्भिद की प्रविष्टि नहीं है। कुलकर्णी भी इस शब्द का जिक्र करते हुए इसका सन्दर्भ नहीं बताते। इसी तरह प्राकृत ‘आब्भिड’ का उल्लेख भी अशुद्ध रूप से करते है। सही रूप है ‘अब्भिड’।

पण्डित हरगोविन्ददास त्रिकमचंद सेठ रचित प्राकृत भाषा के सम्मान्य कोश पाइअ सद्द महण्णवो (प्राकृत शब्द महार्णव) में 'अब्भिड' शब्द की प्रविष्टि है जिसका अर्थ है संगति करना, मिलना आदि। अगर हम भिड ध्वनि पर विचार करेंगे तो बात नहीं बनती। कुलकर्णी जिस आद्भिद का ज़िक्र करते हैं उसमें मूलतः 'भिद्' है। भिद् में भेदने, छेदने, फाड़ने का भाव है। इससे भिड नहीं बनता साथ ही सम्मुख, संग या साथ जैसे अर्थ भी विकसित नहीं होते। प्राकृत का ही एक शब्द है अब्भिट्ठ। प्राकृत शब्द महार्णव में जिसका अर्थ है संगत, सामने आकर भिड़ा हुआ। इसमें भिट्ठ या भिट पर गौर करने से राह निकलती है।

हिन्दी शब्दसागर के सम्पादक भिड़ना क्रिया के मूल में ‘भड़’ जैसा अनुकरणात्मक शब्द देखते हैं। कोश के मुताबिक भिड़ना में - “1. एक चीज का दूसरी चीज से टक्कर खाना। टकराना। 2. लड़ना । झगड़ना । लड़ाई करना। 3. समीप पहुँचना। पास पहुँचना। नजदीक होना। सटना।” जैसे भाव है। ‘भड़’ जैसी काल्पनिक ध्वनि पर विचार करें तो भिड़ना क्रिया में हर बार भौतिक टकराहट नहीं है। हर चीज़ टकराने पर ‘भड़’ आवाज़ नहीं करती। इसलिए भड़ से भिड़ना दूर की कौड़ी है। भिड़ाना क्रिया में सटाने, साथ लाने का भाव है। भिड़ना में टकराना कम और सम्मुख होने, जोर-आज़माइश करने या कशमकश का भाव है। जोर-आज़माइश सट कर भी होती है और संवाद से भी होती है। मूल रूप से इस शब्द के दायरे में दो चीज़ो का साथ होना है। चाहे सम्मुख हों या अगल-बगल में। सम्मिलन का भाव है। सटने का भाव है। दरवाज़ा भेड़ना या भिडाना इसी अर्थ में है। इन्ही भावों का अर्थ विस्तार लड़ाई, ज़ोर-आज़माइश, मिलाना, मिलना, गाँठना, पास आना, साथ चलना, निकटता आदि में होता है।

एक बार फिर से आते हैं प्राकृत के अब्भिट्ठ और अब्भिड पर। अब्भिड़ में भिड़ साफ पकड़ में आता है। अब्भिट्ठ का अगला विकास अब्भिड़ है। मिलने, पाने के अर्थ में हिन्दी के भेट शब्द पर विचार करें। भिट्ट> भिट्ठ> भिड इस भेट के प्राकृत रूप हो सकते हैं। इसकी पुष्टि होती है रॉल्फ लिली टर्नर के भारतीय-आर्य भाषाओं के तुलनात्मक कोश में भिट् प्रविष्टि से। टर्नर प्राकृत की ‘भिट्’ धातु का उल्लेख करते हैं। वे प्राकृत- भिडई (मिलना), सिन्धी- भैड़नूं (मिलना), मराठी- भिड़णे (पास आना, कशमकश), हिन्दी-भिड़ना (जोर-आजमाइश) का उल्लेख करते हुए भीड़ (जन-जमाव) और भेट यानी मिलना, भेला, भिल्ल (मिलना, समूहन, बन्धन, मिश्रण), सिन्धी- भेटणूँ (आलिंगन) जैसे शब्दों का उल्लेख भी करते हैं जो इसी कड़ी में आते हैं।

गौर करें, भेट शब्द में जो मिलने का भाव है। मालवी में भेट से भेटना क्रिया बनती है और मराठी में भेट से भेटणे। संस्कृत में निकटता, पास जाना, समीप आना जेसे भाव ‘अभ्ये’ से प्रकट होते हैं। कुलकर्णी ‘अभ्येति’ से प्राकृत भिट्ट का रिश्ता बताते हैं जो तार्किक है। मोनियर विलियम्स के कोश में अभ्येत्य की प्रविष्टि है। अभ्येत्य > अब्भिट्ठ
>अभिट्ठ > भिट्ट से हमें भिट मिलता है जिससे भेट बनता है या अभ्येत्य> अब्भिड >; भिड़ के विकासक्रम में हमें भिड़ना, भेड़ना प्राप्त होते हैं। मराठी का भिड़ू यानी संगी, साथी, प्रतिस्पर्धी या हिन्दी के भीड़भाड़, भिड़न्त जैसे अनेक शब्दों में रिश्तेदारी इससे साबित होती है।
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1 कमेंट्स:

Shreyas Gokhale said...

अब्भिट्ठ शब्द काफी हद तक संस्कृत 'अभीष्ट' से भी संबंधित जान पड़ता है। इससे 'प्रिय, स्नेही' आदि का भाव प्रकट होता है।

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