Friday, January 22, 2016

‘खानम’ और ‘बेग़म’ की कथा


संगीत की दुनिया की खानम और बेग़मः  फ़रीदा ख़ानम और  बेग़म अख़्तर
मुस्लिम महिलाओं के नाम के साथ सम्मानसूचक विशेषणों में बेग़म, खानम/खानुम का भी शुमार है। आमतौर पर कोश इनके बारे में यही जानकारी देते हैं कि बेग़म फ़ारसी और खानुम तुर्की शब्द है और ये दोनों ही बेग और खान उपाधियों के स्त्रीवाची हैं। स्वाभाविक है इसे उसी तरह लिख दिया गया है मानो तहसीलदार से तहसीलदारनी और जमादार से जमादारनी। मगर बात इतनी आसान नहीं है। अनेक लोग इसे राजा या रानी वाला मामला समझते हैं, दरअसल वैसा भी नहीं। बेग़म और ख़ानुम का रिश्ता दरअसल रसूख़दार स्त्री से है।

खान और बेग आमतौर पर तुर्क-मंगोलों के कुलीन समूहों के आम प्रत्यय हैं जिनसे प्रतिष्ठा, प्रभाव, सम्मान और शक्ति का एहसास कराया जाता है। साफ़ है कि राजपरिवारों और सामन्तों द्वारा इन उपनामों का इस्तेमाल किया जाता रहा। यूँ समझ लें कि काफी कुछ श्रीमान-श्रीमती की तरह बेग-बेग़म और खान-खानुम के भी आशय हैं। बस, बेग़म और खानुम की निर्माण प्रक्रिया एक सी है और ये दोनों शब्द महज़ स्त्रीवाची प्रत्ययों के जोड़ने भर से सामने नहीं आए। हालाँकि इनकी

बेग़म और खानुम दोनों ही शब्दों के साथ अरबी का उम्म जुड़ा है जिसका आशय बीज, उद्गम, स्रोत, मूल और सर्वोच्च से है। इस तरह इस शब्द में माँ की अर्थस्थापना होती है क्योंकि माँ में जननिभाव है। सृष्टि का निर्माण उसी से माना गया है। वह जन्मदात्री है। अरबी के उम्म की रिश्तेतारी प्राचीन अक्कादी भाषा के अम्मु से है जिसमें संरक्षण और समूहवाची भाव हैं।
दरअसल यह सेमिटिक भाषा परिवार का इतना महत्वपूर्ण शब्द है कि इस “आम” की अर्थवत्ता के एक छोर पर माँ है, दूसरे पर अवाम है तो तीसरे पर मुल्क । दिलचस्प बात यह कि सेमिटिक भाषा परिवार की कई भाषाओं में “अम्मु” शब्द का वर्ण विपर्यय होकर माँ के आशय वाले शब्द बने हैं जैसे अक्कद में “उम्मु” ummu, अरबी में “उम्म”, हिब्रू में “एम”, सीरियाई में “एमा” आदि । मेरी नज़र में शिशु जिन मूल ध्वनियों को अनायास निकालता है उनमें सर्वाधिक ‘म’ वर्ण वाली ही होती हैं यथा अम् , मम् , हुम्म् आदि । अक्कद भाषा के “अम्मु” और “उम्मु” दरअसल पालन-पोषण वाले भावों को ही व्यक्त कर रहे हैं।

वैदिकी और संस्कृत के “अम्बु”, “अप्” और अक्कद भाषा के “अम्मु”, “उम्मु” में अन्तर्सम्बन्ध के ये संकेत बहुत साफ़ हैं। इससे मिलते जुलते शब्दों का जलवाची, जननिवाची भाव साबित करता है कि इन शब्दों का विकास भौगोलिक भिन्नता के बावजूद एक जैसा रहा है। तो इस तरह अरबी के उम्म में माँ समेत पोषण, स्रोत, आधार या मूल जैसे आशय समाए। उर्दू में अम्मी इसी उम्म से आ रहा है। मम्मी, अम्मा, मम्मा, मॉम, माँ सब के मूल में जलवाची अम्ब ही है, ऐसा लगता है।

तो इस तरह खान से खान और बेग के साथ उम्म जुड़ने से अपने समूह की प्रभावशाली महिला की अर्थवत्ता मिली जिसमें माँ भी है और समूह भी। हालाँकि बेग़ और खान पर शब्दों का सफ़र में विस्तार से चर्चा की जा चुकी है फिर भी संक्षेप में बताते चलें कि भारत-ईरानी परिवार में भग, बाग, बेग जैसे शब्दों में अंश, श्री, समृद्धि, शक्ति जैसे भाव हैं। हिन्दी संस्कृत के भाग्य, भगवान, भक्त जैसे शब्दों से लेकर फ़ारसी के बेग, बाग, बहादुर, बेक, बहा, बख़्श में भी यह नज़र आता है। बेग़ और साफ़ नज़रा आता है उज़बेक में जिसके पीछे उज़बेकिस्तान है। यही भारत में उज़बक कहलाता है जिसमें गंवार या असभ्य का भाव है। कुछ विद्वान इस BAG में उद्यान के अर्थ वाला बाग़ भी देखते हैं जिसकी व्याख्या समृद्ध भूमि, ऐश्वर्य भूमि के रूप में है। बगीचा इसका ही रूप है। बगराम, बगदाद, बागेवान जैसे शहरों के नामों के पीछे यही अर्थ छुपा है। इस क़तार में अनेक शब्द हैं।

जहाँ तक ख़ान का सवाल है, इसमें मंगोल और चीनी संस्कृति का भाषायी आधार है। इसकी व्युत्पत्ति संभवतः चीन के महान वंश हान से है। चीन के मध्यप्रान्त शांक्सी से होकर गुज़रनेवाली हानशुई नदी के नाम पर चीन के प्राचीन और प्रसिद्ध हान वंश का नामकरण हुआ। यह ठीक वैसे ही है जैसे सिन्धु नदी के नाम पर सैन्धव सभ्यता की पहचान बनी। चीनी भाषा का एक उपसर्ग है के-ke जिसमें महानता, सर्वोच्चता का भाव है। हान han से पहले के जुड़ने से बना ke-han जिससे कुछ नए शब्द जैसे काघान, कागान kagan, खाकान khakan या कान kan सामने आए। उक्त मंगोल रूपांतर बने। मंगोल भाषा में इन सभी नामों में शासक या सत्ता के सर्वोच्च पदाधिकारी का भाव था। यह जानना दिलचस्प है कि कुबलाई खान और चंगेज़ खान जैसे महान खान, मुसलमान नहीं थे। कुबलाई खान बौद्धधर्म की एक विशेष शाखा का अनुयायी था जबकि चंगेज़ खान चीन के शॉमन पंथ का अनुयायी था।
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2 कमेंट्स:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-01-2016) को "कुछ सवाल यूँ ही..." (चर्चा अंक-2231) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

भारत भूषण तिवारी said...

अजित जी, अगर मैं ग़लत नहीं समझ रहा तो बेग का स्त्रीवाची बेगम हुआ न? 'बेग़म' टाइपो है न?

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