Saturday, January 16, 2016

‘उलाहना’ तो प्रेरणा है, भर्त्सना नहीं


ळमा और ‘उरहन’ जैसे शब्दों में कुछ समानता नज़र आती है ? इन दोनों के बीच मारवाड़ और ब्रज के बीच की दूरी ज़रूर है पर दोनों का मूल एक ही है। दरअसल हिन्दी में जिसे उलाहना कहते हैं उसका राजस्थानी रूप ओळमा है और ब्रज, अवधी रूप उरहन या उराहन/ उराहना हैं। इसमें में शिकवा-शिकायत का भाव है या निन्दा का ? दरअसल हिन्दी के शब्दकोश तो ये दोनों ही भाव बताते हैं पर हमारा मानना कुछ और है। उपालम्भ में निन्दा करने, दोष गिनाने, शिकवा करने से ज्यादा उसे प्रेरित करने, प्रवृत्त करने, सचेत करने, समझाने, अनुभव कराने के आशय ज्यादा हैं।

उलाहना शब्द का रिश्ता संस्कृत के उपालम्भ से जोड़ा जाता है। इसका प्राकृत रूप उवालंभ है। इसका विकास ओलंभ होता है। राजस्थानी में यह ओळमा हो जाता है। उपालम्भ का अर्थ है धिक्कार, भर्त्सना, झिड़क, कोसना, घुड़की, आक्षेप, तिरस्कार, निन्दा, दुर्वचन, कुबोल, डाँट या वर्जना, निषेध, रोक, पाबंदी आदि। उपालम्भ बना है उप+आलम्भ से। हिन्दी में आलम्भ शब्द में छूने, स्पर्ष करने, अपनाने जैसे आशय हैं। इसमें ‘उप’ सर्ग जुड़ने से आशय एकदम स्पष्ट होता है।

किसी आश्रय के ज़रिये, किसी बहाने से छूना, स्पर्ष करना या अधिकार जताना-अपना बनाना। ध्यान रहे उपालम्भ के जितने भी अर्थ हमने ऊपर देखे वे सभी नकारात्मक हैं। हालाँकि उनका आशय यह लगाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति को वास्तविकता का बोध कराने के लिए कहे गए कटुबोल दरअसल उसे अपना बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। किन्तु प्रश्न यही है कि उलाहना का अर्थ सीधे सीधे गाली या दुर्वचन नहीं है। उलाहना में हमेशा तिरस्कार, भर्त्सना या धिक्कार का भाव भी नहीं होता। अलबत्ता उसमें आक्षेप, व्यंग्य ज़रूर होता है।

हमारा मानना है कि हिन्दी के ‘उलाहना’ का विकास प्राकृत के उपलंभणा से हुआ है जिसका संस्कृत प्रतिरूप ‘उपलम्भन’ है। ध्यान रहे उपलम्भना में बोध, समझ, अनुभव के साथ ही देखना, बूझना जैसे भाव भी हैं। उलाहना इसलिए नहीं दिया जाता क्योंकि आप किसी को कोसना चाहते हैं, बल्कि उलाहना उसे दिया जाता है जिससे अपेक्षित प्रतिसाद न मिले, जो अपने कर्तव्य को भूल जाए। उलाहना चेतना जगाता है, जागरुक करता है, जिम्मेदारी की याद दिलाता है। उपलम्भना या उपालम्भ दोनों ही शब्दों के मूल में लभ् धातुक्रिया है जिसमें पाना, सोचना, समझना जैसे भाव हैं। ध्यान रहे ‘ल’ का रूपान्तर ‘र’ में होता है। ‘लभ्’ का अगला रूप ‘रभ्’ होता है। जिस तरह ‘लभ्’ से ‘लम्भ’ होता है उसी तरह ‘रभ्’ से ‘रम्भ’ होता है। ‘रम्भ’ से ही ‘आरम्भ’ भी बनता है जिसका अर्थ है शुरुआत। उलाहना इसी नई शुरुआत के लिए तो दिया जाता है।

तो उलाहना में दरअसल इसी शुरुआत का संकेत है, उत्प्रेरण है। उपलम्भना > उवलम्भना में ज्ञानप्राप्ति भी है और आक्षेपयुक्त प्रेरणा भी। रत्नावली का उलाहना ही तुलसी के लिए मानस-सृजन की प्रेरणा बना। इसलिए हमारा स्पष्ट मानना है कि उलाहना के मूल में उपालम्भ नहीं बल्कि उपलम्भणा है। इसकी पुष्टि हरगोविंददास त्रिकमचंद सेठ के प्राकृत कोश “पाइय सद्द महण्णवो” से भी होती है। हिन्दी के उलाहना का विकास उपलंभणा > उवलंभना > उलांभना > उलाहना के क्रम में हुआ है। राजस्थानी ओळमा भी उपलंभणा से ही उळांभणा >ओळमा के क्रम में सामने आया। ब्रज/ अवधी का उराहना भी इसी कड़ी में उपलंभणा > उराहना > उरहन से विकसित हुआ है।

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3 कमेंट्स:

प्रवीण पाण्डेय said...

नरेन्द्र कोहली का महासमर पढ़ रहा हूँ, उपालम्भ का विस्तृत प्रयोग है उसमें।

JEEWANTIPS said...

सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (18-01-2016) को "देश की दौलत मिलकर खाई, सबके सब मौसेरे भाई" (चर्चा अंक-2225) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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