Monday, November 7, 2011

अच्छा…हाँ हाँ…

संबंधित कड़ी-होनहार भूत और अनहोनी hindi-ki-bindi

सु बह से शाम तक सामान्य बोलचाल में ऐसे कितने ही शब्द हैं जो क़रीब क़रीब प्रत्येक वार्तालाप या संवाद का ज़रूरी हिस्सा होते हैं। ‘अच्छा’ और ‘हाँ’ का शुमार भी इनमें है। प्रायः सम्बोधित किए जाने वाले प्रत्येक वाक्य के बाद सुनने वाले का प्रत्युत्तर या प्रतिक्रिया ‘अच्छा’ या ‘हाँ’ में होती है। अगर कोई किस्सा, प्रसंग या प्रबोधन चल रहा हो तो भी ‘अच्छा’ ही कहा जाता है। इस ‘अच्छा’ / ‘हाँ’ में संतुष्टि का भाव भी रहता है और यह स्वीकार और सम्मति सूचक शब्द भी है। इसके अलावा इसमें सुनाई पड़ने का संकेत भी निहित है जैसे हूँ, ‘हाँ’ करना। निर्देशात्मक, आदेशात्मक सम्बोधन के बाद सुनने वाले पक्ष की ओर से प्रायः स्वीकार सूचक ‘हाँ’ का प्रयोग सामान्य शिष्टाचार में शामिल है। वाक्यरचना के विशिष्ट रूपों के मद्देनज़र यह क्रिया विशेषण (अव्यय) हैं। किन्हीं वाक्यों में एक साथ ये दोनों अ्व्यय होते हैं जैसे कुछ याद आने का विस्मय और फिर उसकी स्वीकारोक्ति वाले वाक्य जैसे-अच्छा…हाँ हाँ, याद आया।
बसे पहले ‘हाँ’ की बात। सामान्य वार्तालाप के दौरान अगर इस ‘हाँ’ का इस्तेमाल न किया जाए तो संवाद आगे ही नहीं बढ़ सकता। ‘अच्छा’ से भी ज्यादा इस ‘हाँ’ की अहमियत है। किसी संवाद के दौरान अगर यह ‘हाँ’ सुनाई नहीं पड़े तो समझिए कि बहरा होने का उलाहना अब मिलने ही वाला है। ‘हाँ’ की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘आम्’ से मानी जाती है और इस अव्यय को विद्वानों ने अलग अलग नाम दिए हैं, मगर मूल भाव एक ही है-स्वीकृति, सहमति, समर्थन आदि का। आम् के मूल में विद्वानों का मानना है कि हिन्दी का ‘हाँ’ अव्यय संस्कृत के आम् से बना है। इसका विकासक्रम यूँ रहा है-सं.आम् >(पाली) आम > (प्राकृत) अम्ह। आंचलिक रूपों में ‘म्’ की अनुनासिकता ‘ह’ में समा गई। फिर ‘अ’ स्वर भी ‘ह’ से जुड़ गया। यह क्रम कुछ यूँ रहा-(प्राकृत) अम्ह > अहँ > हआँ > ‘हाँ’। मोनियर विलियम्स और आप्टे कोश के मुताबिक आम् संस्कृत अव्यय है। आप्टे लिखते हैं कि यह विस्मयादि द्योतक अव्यय है और अंगीकरण, स्वीकृति जैसे भावों अर्थात ओह, ‘हाँ’ को अभिव्यक्त करता है। उदय नारायण तिवारी इसे सम्मतिसूचक अव्यय कहते हैं तो वाशि आप्टे, भोलानाथ तिवारी इसे विस्मयबोधक अव्यय मानते हैं। इन तमाम अर्थों में ‘हाँ’ का प्रयोग सिर्फ़ ‘हाँ’ कह कर भी किया जाता है अथवा ‘हाँ’ के साथ वाक्य के जरिए। मिसाल के तौर पर- आपने कुछ खाया? जवाब में सिर्फ़ ‘हाँ’ भी कहा जा सकता है और ‘हाँ’, अभी कुछ देर पहले ही...” भी कहा जा सकता है। विशेष स्थितियों में ‘हाँ’ के प्रयोग से भी वार्तालाप का सिरा पकड़ा जाता है जैसे, ‘हाँ’, बताइये...या फिर, ‘हाँ’, क्या कह रहे थे आप...।
सी तरह दूसरा स्वीकृति सूचक अव्यय है ‘अच्छा’। आप्टे कोश के मुताबिक प्राप्ति के द्योतन वाला यह अव्यय संस्कृत के ‘अच्छ’ से बना है। व्युत्पत्तिमूलक अर्थ देखें तो ‘अच्छ’ में विशुद्ध, निर्मल, उज्ज्वल, पारदर्शी जैसे भाव हैं अर्थात जो कुछ स्वच्छ है, वही ‘अच्छ’ है। अब अव्यय के रूप में सहमतिसूचक या कहे विस्मयादिबोधक के तौर पर ‘अच्छ’ के इन व्युत्पत्तिमूलक भावों की क्या व्याख्या हो सकती है? आमतौर पर सहमति, स्वीकृति या अनुमोदन करते हुए- ‘अच्छा’, तो ऐसा ही करते हैं, ‘अच्छा’, अब और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है या ‘अच्छा’, देखते हैं और क्या कर सकते हैं। इन तमाम वाक्यों में यह ‘अच्छा’ शब्द सिर्फ़ संवाद के उपसंहार की औपचारिकता के लिए नहीं बोला गया है बल्कि इसमें यह निश्चय भी झलक रहा है कि बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है। ‘अच्छा’ में जो पारदर्शिता, निर्मलता या उज्ज्वलता है, अव्यय के रूप में ‘अच्छ’ में उसका अभिप्राय स्पष्टता से है। यानी संवाद के बाद जब ‘अच्छा’ कहा जाता है तब यह संकेत होता है कि सब कुछ स्पष्ट हो गया है।
च्छ में जो ‘छ’ है वह ‘छत’ अर्थात ‘छाया’ का प्रतीक है। संस्कृत छाया का ही फारसी रूप साया है। मगर हिन्दी के ‘छाया’ में अब सिर्फ़ परछाईं का भाव रह गया है वहीँ फारसी के साया में परछायी के साथ साथ ‘छत’ का भाव भी बरकरार है। संस्कृत की ‘छद्’ धातु में छत, छाया, ढके होने का भाव है। मोनियर विलियम्स के कोश के मुताबिक यह अ+च्छ है। इसमें जो ‘च्छ’ है वह ‘छद्’ से आ रहा है। इस तरह ‘अच्छ’ का अर्थ हुआ जो ढका हुआ न हो, जो उजागर है, पूरी तरह स्पष्ट है, पारदर्शी है, साफ है। इस तरह संवाद होने के बाद अन्त में जब ‘अच्छा’ कहा जाता है तब अभिप्राय यही होता है कि अब सब कुछ स्पष्ट है, कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। “अच्छी बात है, चलते हैं” का अर्थ यह नहीं कि कोई बहुत बढ़िया बात कही गई है और जाने की इजाज़त मांगी जा रही है। इसका अर्थ है- “सब कुछ स्पष्ट है, अब कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। अब वार्तालाप में जो कुछ तय हुआ है उस पर अमल किया जाएगा।” कृपा कुलकर्णी के मराठी कोश में तो ‘अच्छा’ का अर्थ ही अत्यर्थम् या स्वच्छम् बताते हुए स्वचछ्म् की व्युत्पत्ति सु+अच्छम् बताई है। अच्छम् यानी जो शुद्ध है। ज़ाहिर है शुद्धता का बड़ा गुण निर्मलता ही है। निर्मलता में ही स्पष्टता है।
विशेषण के तौर पर तो ‘अच्छा’ का अर्थ रूप, गुण और योग्यता में औरों से बढ़ कर या काबिलेतारीफ़ वाला भाव है जैसे ‘अच्छा’ शहर। शुभ मुहूर्त को ‘अच्छा’ दिन कहा जाता है। यहाँ ‘अच्छा’ में मंगलकारी भाव है। कई बार निर्दोष वस्तु के तौर पर भी ‘अच्छा’ का प्रयोग होता है जैसे ‘अच्छा’ वस्त्र, ‘अच्छा’ खाना। क्रिया विशेषण या अव्यय के रूप में हमेशा ‘अच्छा’ ही प्रयोग होता है, वैसे ‘अच्छा’ का बहुवचन अच्छे होता है जैसे अच्छे बच्चे, अच्छे लोग। व्यंग्य या नकारात्मक भाव के तौर पर भी अच्छे का प्रयोग होता है जैसे, काम बिगाड़ देने वाले के लिए कहा गया जुमला- बहुत अच्छे ! ‘अच्छा’ की अभिव्यक्ति हिन्दी समेत अनेक भाषाओं में होती है। टर्नर कोश के मुताबिक, कश्मीरी में यह ओछू है, सिन्धी में अछो है, तो बांग्ला में आच्च्छा, राजस्थानी में आछो, कुमाऊनी में आछो है। ‘अच्छा’ के इस्तेमाल में ‘ह’ का प्रयोग भी मिलता है जैसे लहँदा और पंजाबी में ‘अच्छा’ (हच्छा) है तो पहल्वी की पश्चिमी शैली या भद्रवाही में हच्च्छो सुनाई पड़ता है।

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Saturday, November 5, 2011

बेहिचक शराबी की हिचकियाँ

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बोलचाल की हिन्दी का एक क्रियारूप हिचकिचाना या हिचकिचाहट खूब इस्तेमाल होता है। ‘हिचकिचाना‘ यानी संकोच करना, खुद में सिमट जाना, किसी काम में जुटने से कतराना, दुविधा में पड़ना वगैरह वगैरह। ‘हिचकिचाना‘ के मूल में ‘हिचकिच’ है जो ‘हिचक’ से बना है। ‘हिचक’ भी हिन्दी में खूब प्रचलित है। संकोच, दुविधा, असमंजस जैसे भाव ही हिचक में भी हैं। रोज़मर्रा इस्तेमाल होने वाले शब्दों में कई शब्द ऐसे होते हैं जो ध्वनिअनुकरण के आधार पर प्रचलित होते हैं। ‘हिचक’ शब्द की रिश्तेदारी भी ऐसे ही एक शब्द से है। हिचक शब्द में निहित हिचकिचाने के भाव पर गौर करें। इसमें करने या न करने का भाव है।
हिचकिचाना क्रिया का रिश्ता एक महत्वपूर्ण शारीरिक क्रिया, ‘हिचकी’ से है जिसका रिश्ता शारीरिक क्रिया से है। मसालेदार भोजन, तेज़ हँसने जैसे कारणों से हुई उत्तेजना के चलते भोजन नली में हवा फँस जाती है। यह अस्वाभाविक स्थिति होती है। सामान्य श्वासप्रक्रिया को जारी रखने के लिए फेंफड़ों की पेशियाँ उत्तेजित होकर ज्यादा हवा खींचती है, जिसकी वजह से झटके का आभास होता है। यही हिचकी है। शरीर तंत्र इसे सामान्य बनाने के लिए जब नाडियों को सक्रिय करता है तो यह हवा गले के रास्ते झटके के साथ बाहर आती है। इसे ‘डकार’ कहा जाता है। झटके के साथ जारी श्वास प्रक्रिया के दौरान ‘हिक्क’ जैसी ध्वनि निकलती है।
राब भी स्नायुतंत्र को उत्तेजित करती है जिसके चलते हिचकियों की स्थिति बनती है। शराबी के अभिनय में हिचकी होना उसे प्रामाणिक बनाता है। शराब की शुरूआत भी हिचक के साथ ही होती है, हिचक जब खत्म हो जाती है तो हिचकियाँ शुरू हो जाती हैं। सामाजिक जीवन में हिचकिचाने वाले, कतराने वाले लोग शराब पीकर बेहिचक हो जाते हैं। हिचक में जहाँ संकोज का भाव है वहीं एक मर्यादा भी है। हिचक के आगे जब फारसी का ‘बे’ उपसर्ग  लगता है तब बेहिचक बनता है। अक्सर ‘आप-आप’ वाली बेहद मर्यादित और संस्कारी भाषा बोलने वाले लोग शराब के असर में ‘अबे-तुबे’ की ज़बान बोलते हुए बेहिचक के साथ बेपरवाह, बेशऊर और बेशर्म भी हो जाते है। यहाँ ‘बे’ की महिमा दिखती है।
हरहाल, ‘हिचकी’ में शरीर ऊर्ध्व दिशा में झटके से उठता है, इसे हल्का झटका भी कह सकते हैं। यह क्रिया कुल मिलाकर व्यवधान या रुकावट ही पैदा करती है। इस अवस्था में इनसान कुछ और करने की स्थिति में नहीं रहता। बोलते-बोलते आने वाली इस रुकावट को इस ध्वनि की वजह से ‘हिचकी’ नाम मिला। कोई काम हाथ में लेने से पहले की अनिच्छा के पीछे भी कोई मानसिक व्यवधान होता है। इसलिए कुछ करने या कहने का संकोच, कतराना जैसे भावों के लिए ‘हिचकिचाना‘  जैसी क्रिया बनी। इसका एक रूप हिचमिचाना भी है। संशय या झिझक की स्थिति के लिए ‘हिचर-मिचर’ भी कहा जाता है। ‘हिचकी’ में व्यवधान का जो भाव है, गति के सम्बन्ध में ‘हिचकोला’ या हिचकोला खाना जैसी क्रियाएँ उससे ही बनी हैं। फैलन के कोश में इसका उर्दू रूप ‘हचकोला’ बताया गया है।
सामाजिक जीवन में हिचकिचाने वाले, कतराने वाले लोग शराब पीकर बेहिचक हो जाते हैं item_3765
मोनियर विलियम्स और आप्टे कोश में ‘हिचकी’ की मूल धातु हिक्क् बताई गई है। इसका निर्धारण ध्वनि-अनुकरण के आधार पर ही हुआ है। इसे कण्ठ से आती अनियमित ध्वनि कहा गया है। संस्कृत में ‘हिक्किका’ जैसा शब्द है और’ हिचकी’ इससे ही निकला है। जिसे अक्सर हिचकी आती हो, उसे ‘हिक्काश्वासिन’ , यानी हिचकियों के साथ साँस लेने वाला कहते हैं। किसी की याद आने के सम्बन्ध में हिचकी आना एक मुहावरा भी है। रोने की एक अवस्था ऐसी भी होती है जब भावावेश में आवाज़ रुँध जाती है, इसे हिचकियाँ ले लेकर रोना कहते हैं। अंग्रेजी में भी इसे हिकप hiccup कहते हैं भाव किसी रुकावट या हिचकी का ही है। वहाँ भी ध्वनि अनुकरण प्रभाव के चलते ही इसे यह नाम मिला है।
हिचकी का रिश्ता आदि काल से ही कवियों ने दूरदराज बसे किन्हीं अपनों की स्मृति से जोड़ा है। यादों की घाटी से आती एक सुहानी सदा का नाम है हिचकी। मुझे लगता है कि हिचकी  जैसी किसी हद तक कष्टदायी प्रक्रिया की असहज अनुभूति को भुलाने के लिए मानवीय संवेदना ने इसे अपनों की याद से जोड़ा। आमतौर पर बच्चों को हिचकी मिटाने का तरीका बताने के बावजूद वे उन्हें नहीं आज़माते, वरन कल्पना करते हैं कि कौन उन्हें याद कर रहा होगा। संचार के आधुनिक साधनों के जाल में अब हिचकी आना अपनों को याद करने का शग़ल नहीं रहा। कोई अपना अब हिचकी के जरिए नहीं बल्कि मोबाइल फोन के जरिये याद करता है। हिचकी अब एक शारीरिक क्रिया भर रह गई है, वर्ना पहले के ज़माने में आँख फड़कना अगर असगुन था तो ‘हिचकी’ शगुन थी। कवियों की कल्पनाशीलता ने हिचकी को शृंगाररस का विषय बना दिया था।
-जारी

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Monday, October 31, 2011

…क्या साहब तेरा बहिरा है?

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क सामान्य आदरयुक्त सम्बोधन के तौर पर किसी को ‘साहब’ कहना हमारे भाषिक शिष्टाचार में शामिल है। साहब एक बड़ा महिमावान और बहुरूपिया शब्द है। इसके साब, शाब, साहेब, साहिब, साहाब, साबजी, साहबजी जैसे रूप हिन्दी की विभिन्न बोलियों में प्रचलित है। जिस तरह किसी के वजूद को आदर प्रदान करने के लिए उसके नाम के साथ हिन्दी में जी लगाने का रिवाज़ है, जैसे-रामजी, किशनजी वगैरह। इसी तरह साहब भी आदरयुक्त प्रत्यय का रूप लेकर किसी भी नाम के साथ चस्पा होकर उसे ख़ास बनाता है जैसे ‘फ़ैज़ साहब’, ‘फ़िराक़ साहब’ आदि। ‘साहब’ का स्त्रीवाची हिन्दी में ‘साहिबा’ होता है और उर्दू में ‘सहबा’। कबीर के यहाँ साहिब का खूब प्रयोग मिलता है। ना जाने तेरा साहब कैसा है/ मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारे/ क्या साहब तेरा बहिरा है/ पंडित होय के आसन मारे, लंबी माला जपता है/ अंतर तेरे कपट कतरनी, सो भी साहब लखता है। कबीर के लिए स्वामी या प्रभु ही साहब हैं, मगर उनकी बंदगी करने वालों के लिए कबीर खुद साहब हैं क्योंकि वे पथ प्रदर्शक हैं।
मूल रूप से ‘साहब’ शब्द सेमिटिक भाषा परिवार से निकला है और इसकी धातु है स-ह-ब जिसमें साथ होना, साथ लेना, सहचर, संगी, मित्र, बंधु, सखा होने के अलावा स्वामित्व, प्रभुत्व अथवा सम्पदा का आशय है। इस धातु से अरबी में ‘साहिब’ शब्द बनता है मगर विभिन्न भाषाओं में इसके अलग अलग रूप हैं जैसे हिन्दी में ‘साहब’, अज़रबैजानी, इंडोनेशियाई में यह ‘साहिब’ है तो नाइजीरिया की हौसा ज़बान में ‘साहिबी’। मराठी. फ़ारसी में यह ‘साहेब’ है तो उर्दू में इसके ‘साहिब’ और ‘साहेब’ दोनों रूप चलते हैं। तुर्की में यह ‘साहिप’ है। गौर करें कि ‘साहब’ में मूल भाव साथ देने का है जबकि अर्थ है, जो साथ चले वह ‘साहब’ है। इसमें मित्र, सखा, संगी, सहचर, सहयोगी, दोस्त, जोड़ीदार आदि का भाव ही है मगर हिन्दी में ‘साहब’ का अर्थ  श्रीमान, महोदय, महाशय, स्वामी, मालिक, प्रभु  ही प्रचलित है। बात यह है कि जो साथ चलता है वही आपका पथ प्रदर्शक भी होता है। दूसरे अर्थों में स्वामी, मालिक या प्रभु को अपने भक्तों का सहचर होना पड़ता है। यह माना जाता है कि अच्छा नेता या शासक वही है जिसका साथ लोगों को हर कदम पर महसूस हो। जो हर घड़ी उनकी मदद के लिए तैयार हो, सबको अपने साथ लेकर चले। इसलिए ‘साहब’ में मालिक का भाव कम और साथी, साझीदार, जोड़ीदार का भाव ज्यादा है।
क्सर अफ़सरों की बीवियाँ उनके मातहतों के सामने पति के लिए भी ‘साहब’ शब्द का इस्तेमाल करती हैं। इसके पीछे मित्र या जोड़ीदार का भाव न होते हुए यह रौब ग़ालब कराने का भाव ज्यादा रहता है कि वे उसके पति के मातहत हैं, अर्थात पत्नी के स्वामी चाहे न हों, पर मातहतों के स्वामी ज़रूर हैं। ध्यान दें कि उदार सोच वाली बीवियाँ ही अर्धांग और अर्धांगिनी वाले भाव के तहत ‘साहब’ में मित्र, सखा, संगी, सहचर, सहयोगी, दोस्त, जोड़ीदार का रूप देखते हुए इन अर्थों में इस्तेमाल करती होगी। पति के रूप में ‘साहब’ शब्द का प्रयोग करने के पीछे आमतौर पर इसमें निहित सर्वशक्तिमान, भरतार, पालनकर्ता, प्रभु अथवा स्वामी वाला भाव ही होता है। राजस्थानी में तो साहब का सायबा रूप बहुत लोकप्रिय है। वैसे साहब की सोहबत में रहने वाले को अरबी में मुसाहब कहते हैं। समझा जा सकता है कि अरबी में भी साहब में निहित संगी साथी का भाव ज्यादा प्रचलित न रहा और इसके भीतर की साहबीयत ज़ोर मारती रही लिहाज़ा साहब का अर्थ प्रभावशाली, शक्तिमान ही बना रहा और इसलीलिए उनके साथी, मित्र, बंधु, सखा के लिए मुसाहब शब्द प्रचलित हुआ। अब तो मुसाहब का प्रयोग अर्दली या चाकर के तौर पर भी होता है।
साहिब से जुड़े कुछ और शब्द भी हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे साहिबा अर्थात साहब का स्त्रीवाची। गौर करें कि जिस साहब में अफ़सरी ठसका है वहीं साहिबा में महाराज की महारानी वाला ठसका होते हुए भी संगिनी वाला भाव भी मौजूद है। अरबी में साहब का बहुवचन असहम है जबकि हिन्दी में गणमान्य लोगों के लिए साहबान शब्द का प्रयोग होता है। मान्यवरों या अफ़सरों जैसे हावभाव के लिए साहबी शब्द प्रचलित है। साहबी ठाठबाट, साहबी रंगढंग जैसे मुहावरों में यह भाव नुमाँया हो रहा है। आमतौर पर साहबज़ादा या साहज़ादी शब्द सुपुत्र या सुपुत्री के लिए इस्तेमाल होते हैं। आमतौर पर साहबी रंगढंग वाले व्यक्ति को साहबबहादुर की उपमा भी दी जाती है। वैसे सचमुच अंग्रेज अफ़सरों को हिन्दुस्तनियों नें साहबबहादुर का ही रुतबा दिया था। ध्यान रहे बहादुर शब्द तुर्की का है और फ़ारसी के ज़रिये उर्दू-हिन्दी में आया है।
साहिब में निहित साथ देने या मित्रता के भाव के मद्देनज़र संस्कृत के प्रसिद्ध उपसर्ग ‘सह’ ध्यान में आता है। खासतौर पर साद-हा-बा हिज्जों से ही बने सोहबत के अर्थ पर गौर करें तो यही जान पड़ता है कि यहाँ भी सेमिटिक और भारोपीय भाषा परिवारों के अन्तर्संबन्धों का मामला हो सकता है। साहिब का मूलार्थ जिस तरह साथ देने वाला, साथी, मित्र है मगर उसका व्यावहारिक प्रयोग मालिक, स्वामी, श्रीमान, महाशय आदि अर्थों में होता है। इसी मूल से उपजे सोहबत के साथ ऐसा नहीं है। सोहबत का अर्थ सीधे सीधे संगत, साथ, हेलमल ही है। संस्कृत के सह शब्द में भी शक्तिमान, पराक्रमी, संगत, साथ का भाव है। सहित यानी जो साथ है। जो साथ दे, साथ चले, साथ साथ सहन करे वही सहितृ है। हिन्दी में साथी के लिए सोहबती, सोबती शब्द भी बनता है। सोहबत में समागम अर्थात सम्भोग का भाव भी है। वैसे सोहबत शब्द का मूल भी अरबी का सुह्ह्बा है। सोह्हबत, सुहबत भी इसके रूप है जो उर्दू-फ़ारसी में चलते हैं। मराठी में सोबत प्रचलित है। सुह्ह्बा का अर्थ मित्र या साथी भी होता है।
स सिलसिले में साहिब में निहित ‘हिब’ की वजह से अरबी का हब्ब भी याद आता है जिसमें साहचर्य, मित्रता का भाव है। अरबी में मित्र, संगी को हबीब कहते हैं। हिन्दी में भी यह प्रचलित है। प्रेम को महब्बत कहते हैं। साथ साथ चलने से प्रेमभाव बढ़ता है। कोई अपना सा इसी मुकाम पर हबी से महबूब बन जाता है। साहिब और साहिबा कभी महबूब और महबूबा भी हो सकते हैं।

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Friday, October 28, 2011

भगदड़ के बाद चढ़ दौड़ना

Stampede

कि सी स्थान पर अव्यवस्था फैलने के सम्बन्ध में भगदड़ शब्द का भी प्रयोग होता है। भगदड़ (मचना) शब्द भाग + दौड़ से मिल कर बना है। यूँ देखा जाए तो भाग-दौड़ (करना) या दौड़-भाग (करना) हिन्दी का एक प्रचलित मुहावरा है जिसका मतलब होता है किसी खास मक़सद से की जाने वाली मेहनत, मशक्कत। ऐसा श्रम जो किसी काम को सम्पन्न करने के लिए बीते कुछ समय से जारी है। भाग-दौड़ सफल भी हो सकती है और निष्फल भी। मगर भाग-दौड़ में जहाँ भागना-दौड़ना क्रिया का भाव सक्रियता के अर्थ में है वहीं भगदड़ में अस्तव्यस्तता, अव्यवस्था, गड़बड़ी, तितर-बितर होने और खलबली जैसी स्थितियाँ नज़र आती हैं।
पूर्वी शैली की हिन्दी में भगदड़ का एक रूप भगदर भी होता है। भगदड़ का शाब्दिक अर्थ है कि किसी वजह से बहुत से लोगों का तितर-बितर होना, अलग अलग दिशाओं में भाग छूटना या दौड़ लगा देना। ऐसा एक समूह के बीच किसी अफ़वाह फैलने चलते हो सकता है या किसी आशंका के वशीभूत होकर। किसी धमाके की प्रारम्भिक प्रतिक्रिया भी भगदड़ हो सकती है। कुछ लोगों का मानना है कि भगदड़ के मूल में आशंका और भय का होना आवश्यक है। बात सही है। मगर अब किसी गड़बड़ी की वजह से भागने-दौड़ने की क्रिया के लिए ही भगदड़ शब्द का प्रयोग नहीं होता बल्कि अफ़रातफ़री जैसी स्थिति के लिए भी भगदड़ का इस्तेमाल होता है। रेलवे स्टेशन पर गाड़ी आने की सूचना से भी भगदड़ मच सकती है या सभा में जनप्रिय हस्ती के आने की खबर से भी भगदड़ मच सकती है।
दौड़ना हिन्दी की आम क्रिया है। संस्कृत के धोरण शब्द से इसका रिश्ता है। हिन्दी शब्दसागर में इसका धौरना रूप भी है। संस्कृत की धोर् धातु में तेज गति से चलने, भागने का भाव है। इसका एक अर्थ घोड़े की दुलकी चाल भी है और सरपट भागना भी। धौर् यानी लम्बे लम्बे डग भरते हुए आगे बढ़ना या तेज चाल से तेजी से निकल जाना। यही दौड़ना है। दौड़ना क्रिया से कई मुहावरेदार अभिव्यक्तियाँ निकलती हैं। दौड़ लगा देना यानी किसी काम या उद्धेश्य को पूरा करने के लिए भागना। दौड़ में शामिल होना यानी किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रयासरत कई लोगों में खुद का भी शामिल होना। दौड़ में शामिल होना का विलोम है दौड़ से बाहर होना अर्थात किसी स्पर्धा से निकल जाना। घोड़े दौड़ाना यानी किसी काम के लिए खूब सारे लोगों को लगा देना। दौड़ कर आना यानी किसी उद्धेश्य या लोभ से कुछ पाने की की प्रत्याशा में शीघ्रता से चले आना। सिर्फ़ पैर ही नहीं दौड़ते, दिल भी दौड़ता है, मन भी दौड़ता है और आँखें भी दौड़ती हैं। निगाह या नज़र का दौड़ना या दौड़ाना में बहुत तेज़ी से किसी स्थान, वस्तु या बात को समझ लेने का भाव है। दौड़-भाग या भाग-दौड़ की चर्चा ऊपर हो चुकी है। इसी क्रम में दौड़-धूप भी शामिल है। अनवरत मेहनत करने या श्रम करने के अर्थ में इसका प्रयोग होता है। आक्रमण, धावा या चढ़ाई के अर्थ में चढ़ दौड़ना का प्रयोग होता है। वैसे किसी पर हावी होने की कोशिश भी चढ़ दौड़ना ही है। अक्सर चढ़ाई से पहले भगदड़ मचाना भी एक रणनीति है।
भागना क्रिया के मूल में संस्कृत की भज् धातु है जिसका अर्थ है हिस्से करना, अंश करना, वितरित करना, बांटना, लाभ प्राप्ति, पूजा-आराधना आदि। भज् से ही बना है भक्त जिसका अर्थ भी बंटा हुआ है। भक्त वह है जो अपने ईश्वर से विभक्त है। ईश्वर से जुड़ कर तो वह ब्रह्मलीन हो जाता है। भज् के बाँटने, खण्ड खण्ड होने के भाव के साथ साथ मोनियर विलियम्स के कोश में भयभीत होकर जाने का भाव भी है। भाज् धातु में आश्रय खोजने, जाने और खोजने का भाव है। भगना, भागना क्रिया में तेजी से चलते हुए भूमि के अंश नापने की क्रिया भी सम्पन्न हो रही है।
भागना मूलतः दौड़ना का ही एक रूप है मगर इसका एक सूक्ष्म फर्क है पलायन का भाव। दौड़ना जैसी क्रिया में जहाँ निरपेक्ष तेज गति का भाव है वहीं भागना में आशंका, भय से त्राण पाने के लिए तेज गति से दूर हटने की उभरती है। भाग खड़ा होना जैसे मुहावरे में भय या आशंका ही प्रमुख है। हालाँकि पुलिस को देखते ही बदमाश भाग निकले में जहाँ पलायन का भाव है वहीं इसी स्थिति में अगर बदमाशों ने दौड़ लगा दी या पुलिस को दौड़ा लिया जैसा प्रयोग होता है तो इसमें बदमाशों के पलायन का भाव न होकर पुलिस से बचने की युक्ति का उनका सहज कर्म नज़र आता है। यहाँ दौड़ लगाना या दौड़ा लेना जैसे मुहावरे सामने आ रहे हैं। मार भगाना में पलायन का भाव न होकर शौर्य है क्योंकि इससे पूर्व मारने की क्रिया सम्पन्न हो रही है। सिर्फ भगाना भी पलायन या कायरतापूर्ण है। हाँ, दुश्मन से बचाने के लिए किसी को भगाना में चतुराई का भाव है। भागना के साथ पलायन किस क़दर जुड़ा है यह मेहनत से भागना, काम से भागना जैसे मुहावरों से स्पष्ट है।

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Friday, October 21, 2011

‘अहदी’ यानी आलसी की ओहदेदारी

Ernst_Rudolf

रिश्रम किए बिना मनुष्य रह नहीं सकता। हमारी तरक्क़ी की बुनियाद ही मेहनत पर टिकी है। मगर यह भी सच है कि इन्सान का मूल स्वभाव आलस्य ही है। आलसियों को कई तरह के नामों से नवाज़ा जाता है जैसे अजगर। अहदी भी आलसियों का ही नाम है। उत्तर भारत की ज्यादातर बोलियों में अहदी शब्द आलसी का पर्याय माना जाता है। राजस्थान में यह ऐदी सुनाई पड़ता है तो पूर्वी उत्तरप्रदेश में हैदी, ऐहदी। यूँ देखा जाए तो आलसी हर वर्ग, हर पेशे में मिल जाते हैं। आलस्य व्यक्ति से लेकर समूह तक की पहचान हो सकती है। आलस्य संक्रामक भी होता है। एक व्यक्ति अगर उबासी लेता है तो बाकी लोगों पर भी उसका असर तत्काल नज़र आता है। ताज्जुब की बात है किसी को आलसी इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह काम नहीं करता, मगर कोई पद ही आलसीपन का पर्याय बन जाए, यह विलक्षण बात है। समाज में उच्च दर्ज़े की समझी जाने वाली बातें वक्त के साथ इतनी बदल जाती हैं कि मूल शब्द अपनी अर्थवत्ता बदलने लगते हैं और या तो मूल भाव की अर्थोन्नति हो जाती है या अर्थावनति। अहदी के साथ यही हो रहा है। पाखण्ड, गुरु, चेला, उस्ताद जैसे शब्द इसी श्रेणी के हैं। पाखण्ड कभी सम्प्रदाय था, अब यह ढोंगी का पर्याय है। गुरु का प्रयोग अब धूर्त, चालाक के अर्थ में होता है। चेला शिष्य था, पर अब चापलूस है। उस्ताद की गति भी गुरु जैसी ही हुई। अहदी और ओहदा दोनों शब्दों का रिश्ता पद (पोस्ट) यानी अफ़सरी से है। अब वो अफ़सर ही क्या जो आलसी न हुआ। काम तो दस्तूरी लेकर होती है।
मुग़लों के ज़माने में अहदी एक प्रभावशाली दरबारी पद होता था और अहदियों की बड़ी अहमियत थी। सबसे पहले देखते हैं कि अहद आया कहाँ से। सेमिटिक भाषा परिवार की एक धातु है अह्द अर्थात अ-ह-द (ahd) जिसमें अनुबन्ध, क़रार, इक़रार, वादा जैसे भाव हैं। इससे बने अहद में भी ये भाव सुरक्षित रहे साथ ही वक्त, काल, शासनकाल जैसे भाव भी इसमें शामिल हुए। उर्दू फ़ारसी में अहदनामा एक पद है जिसका अर्थ भी वही है जो क़रारनामा / इक़रारनामा का होता है। क़रारनामा दरअसल एक सहमतिपत्र होता है जिसमें दो पक्ष या दो व्यक्ति किसी बिन्दु पर सहमति के हस्ताक्षर करते हैं। इसे हिन्दी में अनुबन्धपत्र कहते हैं। गौर करें कि अरबी शब्दों में फ़ारसी के प्रत्यय लग कर हज़ारों नए शब्द बनते रहे हैं जो उर्दू हिन्दी में भी सीधे सीधे चले आए हैं। अहद के साथ दार शब्द लगने से अहददार शब्द बनता है। मुस्लिम शासनकाल में अहददार दरअसल अनुबन्ध पर नियुक्त एक कारिन्दा होता था। कुछ कुछ उन कमीशन एजेंटों की तरह जिन्हें बैंकों द्वारा अपने कर्जों की वसूली के लिए नियुक्त किया जाता है। अहदी / अहद से मिलता-जुलता शब्द है ओहदा जिसका इस्तेमाल भी हिन्दी में होता है। ओहदा यानी पद, रुतबा, पोस्ट आदि। ओहदा भी हिन्दी में प्रयोग किया जाता है। फ़ारसी में इसका रूप ओहदे होता है। उच्च पद पर तैनात व्यक्ति को ओहदेदार कहते हैं। अरबी में इसका रूप उह्दा होता है। उह्दा शब्द का मूलार्थ भी वचन, वादा, अनुबन्ध या शपथ ही है। निश्चित ही उच्चपदासीन व्यक्ति का राज्य के साथ नैतिक अनुबन्ध होता है। वह कर्तव्यपालन की शपथ लेता है और आम लोगों के के प्रति वह वचनबद्ध होता है।
ये कारिन्दे कर्जदार से नियमित वसूली न हो पाने की स्थिति में डरा धमका कर या मार पीट कर वसूली का काम करते थे। अहद यानी क़रार और दार यानी जिससे किया गया हो, अर्थात अनुबन्धित व्यक्ति। इसे ही कमीशन एजेन्ट कहते हैं। अहददार को ही अहदी भी कहा जाता था। अहदियों को बड़े बड़े मालगुज़ारों, ज़मींदारों से भी करों की वसूली के लिए भेजा जाता था। आम तौर पर रसूखदार लोगों से वसूली मुश्किल होती थी, ऐसे में सरकार को अहदियों की विशेष सेवाएँ लेनी पड़ती थीं। हिन्दी शब्द सागर के मुताबिक- “ये लोग कभी कभी उन जमींदारों से मालगुजारी वसूल करने के लिए भी भेजे जाते थे, जो देने में आनाकानी करते थे। ये लोग अड़कर बैठ जाते थे और बिना लिए नहीं उठते थे।” मगर ये लोग साधारण मालगुज़ार न थे जो वेतनभोगी कर्मचारी था। ये विशेष रुतबे वाले लोग थे, अहददार थे, इसीलिए अहदी थे। शब्द सागर में दिए संदर्भ से ऐसा लगता है कि अहदियों की भूमिका सिर्फ़ वसूली कारिन्दे की थी। मगर ऐसा नहीं है। अहदियों के बारे में कई सन्दर्भ मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि अहदी सीधे बादशाह के अधीन काम करने वाले खास अहलकार होते थे जिनका रुतबा फ़ौजी अफ़सर का भी होता था मगर फ़ौज के सामान्य पदानुक्रम में वे न होकर सीधे बादशाह के लिए काम करते थे। सामान्य गुप्तचरी से जुड़े लोग भी इनमें होते थे। मनसबदार, जागीरदार भी अहदी हो सकते थे। और तो और गुणी कलावन्तों का शुमार भी अहदियों में होता था।
जॉन प्लैट्स के कोश में स्वामीभक्त, सेवानिवृत्त अफ़सरों को भी अहदी का रुतबा मिलने की बात कही है। ये लोग कोई काम नहीं करते थे। घुड़सवार दस्ते के लोग भी अहदी कहलाते थे। मगर अक्सर उन्हें उच्च प्रशासनिक ज़िम्मेदारियाँ भी दी जाती थीं। घुड़सवार दस्ते का ज़्यादातर वक्त घोड़ों की देखरेख और खाली बैठने में ही जाता था। इसके अलावा इनका प्रमुख काम संदेश पहुँचाना था।  शासन की ओर से इन्हें भारी तनखाहें दी जाती थीं। सवाल उठता है कि इतने महत्वपूर्ण रसूख वाले शब्द के साथ आलसी, कामचोर जैसी अर्थवत्ता क्यों जुड़ी? एक वजह तो यह हो सकती है कि वसूली कारिन्दा जैसी ज़िम्मेदारी के चलते ही अहदी शब्द के साथ आलसी, निकम्मा, कामचोर जैसी अर्थवत्ता जुड़ी हो। वसूली का काम साल में एक या दो बार होता था, ऐसे में बाकी समय ये कारिन्दे खाली होते थे और अपनी ख़ास आरामगाह, जिसे अहदीख़ान कहा जाता था, में पड़े रहते थे। कुछ शब्दकोशों में अहदी का अर्थ अफीमची, मदकची, भंगेड़ी, गंजेड़ी भी बताया गया है। मेरा विचार है कि अहदी पद के आलसी ओहदेदारों की कारगुज़ारियाँ देखने के बाद ही अहदी शब्द की अर्थवत्ता में यह परवर्ती विकास हुआ होगा।
हदियों के बारे में यह स्पष्ट है कि इन्हें विशेष काम अंजाम देने के लिए ही राज्याश्रय मिलता था। ये विशिष्ट फ़ौजी काम भी हो सकते थे। कुछ लोगों को सिर्फ़ खास संदेश देने के लिए रखा जाता था। इन तमाम लोगों को जब तक फ़रमान नहीं मिलता था ये लोग या तो अहदीख़ाना जैसी एक आरामगाह में काम के इंतज़ार में वक़्त गुज़ारते थे। इस दौरान सरकारी तौर पर उनके ऐशोआराम का पूरा ख्याल रखा जाता था। कई अहदी ऐसे भी होते थे जो इस किस्म की आरामतलबी के आदी हो जाते थे और मौका आने पर अपना फ़र्ज़ पूरा करने में नाकाम साबित होते थे। इन हालात में आम लोगों में इन अहदियों के बारे में दिल्लगी होती थी। धीरे धीरे अहदी शब्द का रुतबा घटता गया। बाद में आलस्य के लिए अहदीपन जैसे क्रियाविशेषण भी बन गए। एनेमेरी शिमर और बर्जिन के वैग्मर ने द एम्पायर आफ द ग्रेट मुगल्स में में लिखा है कि अहदीपन उन अहदियों की वजह से प्रचलित हुआ जो आरामतलबी की वजह से अपने फ़र्ज़ को अंजाम देने में नाकामयाब होने लगे थे।

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Saturday, October 15, 2011

अग्निपरीक्षा थी सौगन्ध [गन्ध-3]

पिछली कड़ियाँ-1.गंदगी और गन्धर्व-विवाह2.Deathक्यों खाते हैं सौगन्ध ?

तार (पवित्राग्नि) की अवधारणा के तहत ऐसे ही विधानों में एक शपथ विधान भी था जिसका उल्लेख अवेस्ता में है। इसी अनुष्ठान का मध्यकालीन पर्शियन सन्दर्भों में ‘सोगन्द’ खोरदन (sogand xwardan, xordan) के रूप में ज़िक्र हुआ है। अवेस्ता में गन्धक को ‘सौकन्त’ कहा गया है। ‘सौकन्त’ और ‘सौगन्ध’ की समानता गौरतलब है। विशेषज्ञों का मानना है कि अवेस्ता का ‘सौकन्त’ saokant ही मध्यकालीन पर्शियन में ‘सोगन्द’ sogand हुआ और फिर आज की फ़ारसी में सौगन्द sowgand बना। अवेस्ता में ‘सौकन्त’ का तात्पर्य गन्धक से था। ‘सौकन्त’ के बारे मं बहुत कम सन्दर्भ उपलब्ध हैं और जो हैं उनमें भी इस शब्द की व्युत्पत्ति का कोई सूत्र नहीं मिलता। न्साइक्लोपीडिया इरानिका में जो जानकारी मिलती है उससे लगता है कि ‘सौकन्त’ पीने (खाने) की परिपाटी ईसापूर्व एक हज़ार साल पहले ईरान में रही होगी। इस शपथ का उद्धेश्य था सत्य का परीक्षण करना। अर्थात ‘सोगन्द’ खोरदन के तहत गन्धक से बनी एक ओषधि को पीना होता था। यह माना जाता था कि गवाही देने से पहले ‘सौकन्त’ युक्त ओषधि पीने वाला व्यक्ति अगर झूठा है तो ‘सौकन्त’ में निहित गन्धक की तीव्रता से उसका गला जल जाएगा। यहाँ जलने की क्रिया ही खास है। अग्नि सत्यशोधक है, यह बात अग्निपूजक ईरानियों में सर्वमान्य थी। यूँ भी आग में तप कर ही सोना कुंदन बनता है। भारतीय सन्दर्भों में भी विष पीने, आग पर चलने, अंगारा उठाने जैसी मिसालें सचाई की चमक की पुष्टि करती हैं। सत्य ही अग्नि का प्रतीक है।
कुछ व्याख्याकारों का मानना है कि खोरदन में पीने का भाव भी है और खाने का भी। रस्म के तौर पर तो गन्धक से बनी ओषधि को पीने का उल्लेख ही सन्दर्भों में है, मगर समझा जा सकता है कि ‘सोगन्द’ के साथ बाद में खाने का भाव रूढ़ हुआ और इसे ‘‘सौगन्द’ ’ खोरदन कहा जाने लगा। यह महत्वपूर्ण है कि शपथ जैसी विधियों या अनुष्ठानों के साथ लेने, उठाने, खाने का ही भाव ज्यादा है। ‘सौगन्ध’ ली भी जाती है और खाई भी जाती है। ‘क़सम’ उठाई भी जाती है, ली भी जाती है और खाई भी जाती है। ‘क़सम’ चढ़ाई भी जाती है और उतारी भी जाती है। हिन्दी मराठी में खायी भी जाती है, ली भी जाती है और उठाई भी जाती है। प्रतिज्ञा की जाती है या ली जाती है। वचन दिया जाता है या लिया जाता है।
‘सौकन्त’ के बारे में गन्धक के अलावा एक अन्य सन्दर्भ पर्वत का मिलता है जिसके बारे में अवेस्ता और फारसी साहित्य में ज्यादा कुछ मिलता नहीं है, लेकिन जहाँ भी इसका उल्लेख हुआ है वहाँ एक वलयाकार स्वर्ण-पथ की मौजूदगी बताई गई है इसका सम्बन्ध धरती के किसी रहस्यमयी जादुई अध्यात्मिक जगह से है। नसरवानजी फ्रामजी बिलिमोरिया द्वारा सम्पादित ‘जोरास्ट्रियनिज्म’ में ‘सौकन्त’ पर्वत की आध्यात्मिक व्याख्या है। किताब के मुताबिक ‘सौकन्त’ पर्वत को हम भारतीय संस्कृति में प्रचलित मेरु पर्वत से जोड़ सकते है जो की पृथ्वी के मध्य स्थित है और वहाँ देवताओ का निवास है। पुस्तक में वलयाकार स्वर्ण-पथ की तुलना मेरुदण्ड से की गई है। मेरु दंड की सरंचना मनुष्य की रीढ़ की हड्डी की तरह होती है और ‘सौकन्त’ पर्वत की तरह ही मेरु पर्वत भी उत्तरी ध्रुव पर ही स्थित है। हम इससे ये अनुमान लगा सकते है की शारीरिक सरंचना में भी हम इस पर्वत को मनुष्य के उपरी भाग में स्थित मान सकते है। दूसरे शब्दों में कहे तो ‘सौकन्त’ पर्वत एक भौगोलिक जगह नहीं है बल्कि मनुष्य के मस्तिष्क के उपरी हिस्से में स्थित है जहाँ ब्रह्मरन्ध्र होता है जहाँ परमज्ञान की अनुभूति होती है। परमज्ञान यानी परमसत्य। अहुरमज्द इसी सत्य के प्रतीक है, परमशक्ति है, अग्नि के सूर्य के प्रतीक हैं। इस मुकाम पर आकर सत्य परीक्षण की बात से ‘सौकन्त’ का रिश्ता जुड़ता है।
‘सौकन्त’ के ‘सौ’ को अगर भूल जाएँ तो शेष रहता है ‘कन्त’ जिसका साम्य संस्कृत ‘गन्ध’ से होता है। इंडो-ईरानी, ईरानी- सेमिटिक भाषाओं में ‘क’ और ‘ग’ में परिवर्तन होता है। मध्यकालीन फ़ारसी में इस ‘कन्त’ का रूपान्तर ‘गन्द’ हो गया। ‘त-द-ध’ वर्णों में भी रूपान्तर आम बात है। यह सिर्फ़ अनुमान है, मगर इसका पुख्ता आधार है ‘सौकन्त’ में निहित गन्धक का अर्थ। गौर करें गन्धक का जन्म भी गन्ध ( बू ) से ही हुआ है। फ़ारसी सौगन्द में चाहे गन्ध ( बू ) नहीं है, मगर इसमें जो ‘गन्द’ है, वह अवेस्ताई ‘सौकन्त’ के ‘कन्त’ से आ रही है जिसका अर्थ गन्धक ( सल्फ़र ) होता है और गन्धक में ‘बू’ वाली ‘गन्ध्’ धातु ही है। फ़िलहाल यह तो तय है कि कसम या शपथ के अर्थ में हिन्दी के ‘सौगन्ध’ का मूल फ़ारसी का ‘सौगन्द’ है जिसकी रिश्तेदारी सीधे सीधे ‘सुगन्ध’ से नहीं हैं। फ़ारसी ‘सौगन्द’ हिन्दी की सुगन्ध के प्रभाव में आकर ‘सौगन्ध’ हो जाता है। फिर बोली भाषा में इसका रूप ‘सौन्ध’ होता है। अवधी में इस ‘सौन्ध’ के ‘ध’ (द+ह) ‘द’ का लोप होकर ‘ह’ शेष रहता है अलबत्ता अनुनासिकता बरकरार रहती है। इस तरह सौगन्ध का ‘सौंह’ रूप बनता है। एक दिलचस्प बात और ध्यान आ रही है। अवेस्ता में अगर ‘सौकन्त’ (गन्ध) का एक सन्दर्भ पर्वत मिलता है तो संस्कृत में भी इस ‘गन्ध’ का रिश्ता एक पर्वत से है जिसका नाम ‘गन्धमादन’ पर्वत है और इसका उल्लेख पुराणों में है। -समाप्त

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Friday, October 14, 2011

क्यों खाते हैं सौगन्ध ? [गन्ध-2]

बीते साल गन्ध पर लिखते हुए मुझे कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिली थीं और उसे मैने दो कड़ियों में देना तय किया था। पर जैसा कि अब तक होता आया है, कई शब्दों पर एक साथ काम करते हुए अक्सर सीरीज वाले शब्दों की अगली कड़ी लिखना मैं भूलता रहा और फिर नया शब्द शुरू। शब्दचर्चा समूह पर विचरण के दौरान भाई अभय तिवारी को सौगन्ध पर चर्चा करते पाया तो अपनी सौगन्ध याद आई। फौरन पुराने सन्दर्भ टटोले। दूसरी कड़ी कुछ लम्बी हो गई है इसलिए इसे भी दो किस्तों में पढ़ें-
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सु गन्ध और ‘सौगन्ध’ में क्या अन्तर है? बड़ी आसान सी बात है कि ‘सुगन्ध’ यानी खुशबू और ‘सौगन्ध’ यानी शपथ, क़सम आदि। पूर्वी बोलियों में ‘सौगन्ध’ यानी शपथ ‘सौंह’ रूप में बसा है जबकि फ़ारसी में इसका रूप ‘सौगन्द’ या ‘सोगन्द’ होता है। मतलब समान है- शपथ। आमतौर पर माना जाता है कि ‘सुगन्ध’ का रिश्ता ‘सौगन्ध’ से हैं। बात भी सही है कि ‘सौगन्ध’ और ‘सुगन्ध’ में बड़ी दिलचस्प रिश्तेदारी है क्योंकि दोनों में ही ‘गन्ध’ का बसी है। ध्वनि, वर्ण समानता के आधार पर ‘सुगन्ध’ और ‘सौगन्ध’ लगभग समान लगते हैं, मगर शब्दकोशों में ‘सौगन्ध’ का सिर्फ़ शपथ वाला अभिप्राय प्रकट होता है, ‘सुगन्ध’ वाला नहीं। हालाँकि जॉन प्लैट्स के कोश में ‘सौगन्ध’ का एक अर्थ ‘सुगन्ध’ ही बताया गया है। ‘सौगन्ध’ यानी एक खुशबूदार घास। वे इससे जुड़ा एक मुहावरा “सुगन्ध-सना” भी बताते हैं। इस प्रविष्टि में ‘सौगन्ध’ का रिश्ता क़सम या शपथ से नहीं जोड़ा गया है। यही नहीं, ‘सौगन्ध खाना’ जैसे मुहावरे के साथ खाने की, भक्षण करने की जो क्रिया है उससे इसका सम्बन्ध ‘सुगन्ध’ से नहीं हो सकता क्योंकि उसका रिश्ता सूँघने की क्रिया से है। आखिर ‘सौगन्ध’ क्यों खायी जाती है?

बसे पहले ‘गन्ध’ की बात। संस्कृत में गंध का रूप गन्धः है जिसका अर्थ ‘वास’ या ‘बू’ है। इसमें अच्छा या बुरा विशेषण नहीं लगा है। मगर यही ‘गन्ध’ फारसी में ‘गंद’ के रूप में दुर्गन्ध की अर्थवत्ता धारण करती है। फारसी में सामान्य गन्ध के लिए ‘बू’ शब्द है जिसके खुशबू और बदबू जैसे रूप प्रचलित हैं, किंतु हिन्दी में सिर्फ ‘बू’ के मायने भी खराब गंध होता है। ठीक इसी तरह जैसे संस्कृत के ‘वास्’ का अर्थ सुगंधित करना होता है मगर उसका हिन्दी रूप बना ‘बास’ जिसे ‘बदबू’ समझा जाता है। ‘गन्ध’ का फारसी रूप ‘गंद’ व्यापक अर्थवत्ता रखता है और इसमें मलिनता, गलीजपन, घिनौनापन, निर्लज्जता या व्यवहारगत अनैतिककर्म, प्रदूषित अथवा लज्जास्पद शब्द भी शामिल हैं।

प्राचीन ईरान की अग्निपूजा से जुड़ी एक आनुष्ठानिक परम्परा का ‘सौगन्ध’ से गहरा रिश्ता है। यह वैदिकयुगीन ईरान की बात है यानी अग्निपूजक पारसिकों के दौर की। यहाँ की प्राचीनतम भाषा अवेस्ता थी। जरथुस्त्र (ईपू दसवीं सदी) के पूर्व के ईरानी-आर्य, भारतीय-आर्यों की भाँति ही अग्निपूजक, यज्ञपरायण तथा देवोपासक थे परन्तु मतभेद के कारण ईरानियों के लिए ‘देव’ का अपकर्ष हो गया और भारतीय आर्यों के लिए ‘असुर’ का। ईरानियों ने ‘असुर’ को देवता के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। ऋग्वेद के प्राचीनमंत्रों में ‘असुर’ शब्द वरुण आदि देवताओं के विशेषण के रूप में व्यवहृत हुआ है। अवेस्ता में ईश्वर को अहुरमज़्दा-असुरमेधा कहा गया है। प्रायः हर संस्कृति में मनुष्य ने अपने निवास के पास अग्निस्थापना की है। प्राचीन ईरान में भी हर घर में अग्निस्थान होता था। वैदिक काल से आज तक हिन्दू परिवारों में घर के भीतर अग्निस्थान निश्चित होता है। इन स्थानों के कुछ विशिष्ट नाम भी हैं जैसे अग्निकुण्ड, अग्निवेदी, अग्निगृह, अग्निधान, अग्निष्ठस्। रसोईघर तो पारम्परिक अग्निस्थान है ही।
भाषाशास्त्रियों और इतिहासकारों का मानना है कि प्राचीन ईरान के अग्निविधान मगध के अग्निपुरोहितों द्वारा कराए जाते थे, जो बाद में वहीं बस गए। ‘मागध‘ ब्राह्मण होने की वजह से वहाँ वे ‘मागी’ कहलाए। पश्चिमी यात्रियों ने इन मागियों के अग्निविधानों को चमत्कार माना। प्राचीन यूनानी ग्रन्थों में इन्हें ‘मागीज़‘ कहा गया है। बाद में मागीज़ का रूपान्तर ‘मैजिक’ हुआ। अपने विचित्र अनुष्ठानों की वजह से मागी से ही मैजिशियन शब्द भी बना जिसका अर्थ हुआ जादूगर। वैदिक काल में अग्निकर्म कराने वाले पुरोहित को अथर्वन् कहते थे। पश्चिमी विचारकों ने इस अथर्वन् को भी तंत्र-मंत्र कर्ता के रूप में ही देखा। पारसिकों में पवित्र-अग्नि की अवधारणा है जिससे समूची सृष्टि ऊर्जा प्राप्त करती है, इसे ‘अतर’ या ‘अतार’ कहते हैं। ‘अथर्व’ या ‘अथर्वन् ‘से इसका शब्द साम्य देखा जा सकता है। अवेस्ता में रचित पारसिकों के प्राचीन धर्मग्रन्थ गाथा में भी ‘अतार’ का उल्लेख हुआ है।
क बार फिर ‘गन्ध’ पर आते हैं। एक प्रसिद्ध रसायन ‘गन्धक’ का नामकरण भी इसी ‘गन्ध्’ धातुमूल से हुआ है। दरअसल ‘सौगन्ध’ में जो गन्ध है उसमें अभिप्राय ‘गन्धक’ का है। अत्यंत तीक्ष्ण गंध वाले इस पदार्थ को अंग्रेजी में सल्फर कहते हैं। दिलचस्प यह भी कि प्रकृति में गन्धक परिशुद्ध रूप में नहीं मिलता। वह किसी न किसी यौगिक के रूप में होता है और इसीलिए उसमें से गन्ध आती है। परिशुद्ध सल्फर गन्धहीन होता है। इसके औद्योगिक और ओषधीय उपयोग हैं। एक पाचक दवा को ‘गंधवटी’ भी कहते हैं। वैसे गन्धक अत्यधिक ज्वलनशील और अग्निमित्र पदार्थ है। तेज गन्ध की वजह से ही इस पदार्थ को गन्धक कहा गया। प्याज में सल्फ़र बड़ी मात्रा में होता है और इसकी तेज़ गन्ध के पीछे, जिसे कई लोगो बदबू कहते हैं, गन्धक ही है। बहरहाल, यज्ञप्रिय वैदिक आर्यों की भांति ही पारसिकों के आचारव्यवहार पर भी अग्निपूजक संस्कृति की छाप थी। तमाम अनुष्ठानों में अग्निपूजा का महत्व था। अहुरमज्द ही परमज्ञान अथवा शक्तिपुंज का भी प्रतीक है।
प्राचीन ईरान में पारसिक ‘यज्ञ’ (यज्, यजन) करते थे जिसे अवेस्ता में ‘यश्न’ कहा जाता था। यही ‘यश्न’ कालान्तर में ‘जश्न’ बन कर फिर भारत लौट आया। यह ‘यश्न’ अहुरमज्द की उपासना के लिए था। जिस तरह से भारत के ग्रामीण समाज में आज भी प्रेतबाधा ग्रस्त व्यक्ति को दागा जाता है, अथवा ईमान की परीक्षा के लिए अग्निपरीक्षा का विधान है, ऐसे ही कर्मकाण्ड प्राचीन ईरानी समाज में भी प्रचलित थे। मूलतः ये कर्मकाण्ड अग्निपूजा का विधान ही थे और इसके मूल में अग्नि को साक्षी कर सत्य या बुराई का परीक्षण करना था। जैसे झूठ बोलने पर आग को जीभ पर रखना, धोखाधड़ी करने पर शरीर को गर्म लोहे की छड़ों से दागना या शरीर पर खौलता हुआ पानी डालना जैसे परीक्षण होते थे जो मूलतः अग्निपरीक्षा ही थी। अर्थात अगर आरोपी निर्दोष है तो पवित्र-अग्नि उसे नुकसान नहीं पहुँचाएगी। बाद में ये सब ढकोसला बन गए।
-अगली कड़ी में समाप्त
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Wednesday, October 12, 2011

गलाटा नक्को करने का !

loud-mouth

क्कनी के शब्दों की हिन्दी में आमद मुम्बइया फिल्मों के ज़रिये अर्से से होती रही है। तुर्क-पठानों नें आठ-नौ सदी पहले से दक्षिण में बसना शुरू कर दिया था। फ़ारसी, हिन्दवी और हिन्दी की कई बोलियों से छनते छनते इन तुर्कों का वास्ता जब दक्खिन की कोंकणी, कानड़ी और मराठी बोलियों के शब्दों से हुआ तो एक निरालापन पैदा हो गया। संस्कृतियों के हेलमेल, लगत-जुड़त और उससे बढ़ कर संकरण की प्रकिया में ही सृजन की इतनी ऊर्जा निहित है कि इससे गुज़र कर बने शब्द को एक नई पहचान, नई अर्थवत्ता मिल जाती है। ऐसा ही एक शब्द है ‘गलाटा’। महाराष्ट्र और कर्नाटक के सीमावर्ती क्षेत्रों में इसे बोला समझा जाता है। आमतौर पर यह टपोरियों का शब्द है। ‘गलाटा’ यूँ तो मुम्बइया हिन्दी के ज़रियों फ़िल्मों और जासूसी उपन्यासों में सुनने-पढ़ने को मिलता है मगर बिन्दास की तरह कुछ सालों में यह भी हिन्दी वालों का पसंदीदा बन जाएगा, इसमें संदेह नहीं।
‘गलाटा’ बोले तो गड़बड़ी या पेचीदगी। बखेड़ा, फ़साद, टंटा वग़ैरह वग़ैरह। झगड़ा, फ़साद, टंटा, में बहुत कुछ देखने-सुनने लायक होता है। यानी गड़बड़ियों की इन तमाम क़िस्में में हाथापाई से लेकर ज़बानदराज़ी तक सब शामिल है। मगर कुछ गड़बड़ियाँ बड़ी खामोंश होती हैं जैसे काम बिगड़ जाने से जुड़ी कई स्थितियाँ। सगाई टूटना भी ‘गलाटा’ है और ट्रेन चूकना भी गलाटा है। मगर गलाटा की असल रिश्तेदारी खामोशी से नहीं वरन हल्ला-गुल्ला से है। गलाटा शब्द दरअसल मराठी के ‘गळ्हाटा’ या ‘गळ्हाठा’ से बना है। हिन्दी भाषी ‘ळ’ का उच्चार ‘ल’ या ‘ड़’ की तरह करते हैं। इसका चालू उच्चारण होगा ‘गळाटा’ जिसे हिन्दी वालों ने ‘गलाटा’ कहना शुरू किया। आमतौर पर मराठी-कोंकणी का जो शब्द मुंबइया हिन्दी में प्रचलित होता है उसके पीछे वहाँ के हिन्दीभाषियों  से ज्यादा मुंबई के तमिल, कन्नड़ और गुजराती समाज में उस शब्द का प्रचलित रूप महत्वपूर्ण होता है। वैसे ‘गळ्हाटणें’ मराठी की बहुप्रचलित क्रिया है और इससे बने ‘गळ्हाटा’ का दक्कनी में ‘गलाटा’ रूप प्रचलित हुआ। ‘गळ्हाटणें’ का शाब्दिक अर्थ है गला फाड़कर रोना। मगर बतौर मुहावरा इससे बने गळ्हाटा का अर्थविस्तार होता है और इसमें कुछ गुम होना, कमी पड़ना, क्षीण होना, ह्रास होना, गड़बड़ी, अस्तव्यस्ता, उन्माद, बखेड़ा, शांति भंग जैसे भाव शामिल हो जाते हैं।
‘गळ्हाटणें’ का ही एक रूप गळ्हाटा / गल्हाठा होता है जिससे ‘गलाटा’ बना। गौर करें मराठी के ‘ळ’ का उच्चारण भी हिन्दी में ‘ल’ की तरह होता है हालाँकि मराठी में यह स्वतंत्र व्यंजन है। गुजरात के सीमित क्षेत्रों और समूचे राजस्थानी बोलियों भी की उपस्थिति है। ‘गला’ को मराठी में ‘गळा’ कहा जाता है। गला या गळा बना है संस्कृत की ‘गल्’ धातु से जिसका अर्थ है टपकना, चुआना, रिसना, पिघलना आदि। गौर करें इन क्रियाओं में नष्ट होने, खत्म होने का भाव भी है। इसका एक अन्य अर्थ है अन्तर्धान होना, गुजर जाना या ओझल हो जाना आदि। हिन्दी के गली और गला शब्द का रिश्ता इसी गल् धातु से है। मराठी में ‘गली’ का ‘गल्ली’ रूप है और गला को गळा कहा जाता है। सम्बन्ध संस्कृत ‘गल्’ से ही है। गौर करें गले की संरचना पर। मुँह के ज़रिये हलक़ में जो कुछ भी जाता है, वह अंतर्धान हो जाता है, ग़ायब हो जाता है। ‘गल्’ से बनी ‘गलन’ क्रिया का अर्थ है टपकना, रिसना आदि। ये क्रियाएँ ज़ाहिर करती हैं कि टपकना और रिसना अनंतकाल तक नहीं हो सकता, अर्थात रिसने वाला पदार्थ खत्म भी होगा। यहाँ जो खत्म होने का भाव है, अंतर्धान होने का भाव है उसे गले में उतरते भोजन के ज़रिए समझा जाए। मुँह में रखा पदार्थ गले में जाकर गायब हो जाता है। यही है गल् का क्रियारूप। इससे ही बना है एक मुहावरा निगल लेना या निगलना। किसी वस्तु या सामग्री को हड़पने या कब्ज़ा जमाने के संदर्भ में निगलना मुहावरा इस्तेमाल होता है।
हिन्दी के ‘गला फाड़ना’ मुहावरे का शाब्दिक अर्थ मराठी के ‘गळ्हाटणे’ जैसा ही है मगर जो बात ‘गळ्हाटा’ और ‘गलाटा’ में है वह ‘गला फाड़ना’ में नहीं। गौर करें कि गल् धातु में निहित भावों पर। गायब होने, नष्ट होने, रिसने, चूने, पिघलने जैसी क्रियाओं में हानि का, रहित होने का, रीतने का भाव है। तयशुदा नतीजों के न आने, योजना चौपट होने, अनहोनी जैसी स्थितियों को ही गड़बड़ी कहा जाता है। बना बनाया काम बिगड़ जाना ही बखेड़ा है और प्रकारान्तर से यही गळ्हाटा या गलाटा है। यूँ कुछ लोगों का मानना है कि काम बिगड़ने पर यूँ भी इन्सान गला फाड़कर रोता है, आर्तनाद करता है, क्रंदन करता है इसलिए गलाटा का लाक्षणिक अर्थ बखेड़ा या काम बिगड़ना हुआ,इसका मूलार्थ बुक्का फाड़ कर रोना ही है। मेरा मानना है कि गळ्हाटणे क्रिया में गला फाड़ कर रोना या बुक्का फाड़ना जैसे अर्थ निहित हैं मगर गलाटा करना, गलाटा होना में आर्तनाद, क्रन्दन या गला फाड़ना जैसे भाव न होकर कुछ रीतने, हानि होने से उत्पन्न बखेड़े या अशांति का भाव प्रमुख है।

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Tuesday, October 11, 2011

होनहार भूत और अनहोनी

panini

हि न्दी में ‘होना’ एक बहुत आम क्रिया है। कुछ घटित होने के अर्थ में होना क्रिया बोली और लिखत-पढ़त की भाषा में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली क्रिया है। ‘होना’ क्रिया का जन्म अधिकांश विद्वान संस्कृत के ‘भवन्’ से मानते हैं। डॉ भोलानाथ तिवारी के मुताबिक भवन का प्राकृत रूप होण था जिसका हिन्दी रूप होना है। समझा जा सकता है कि भवन > हअण > होण > होन > होना, कुछ इस क्रम में ‘होना’ का विकास समझ आता है। इस वाक्य को अगर यूँ लिखा जाए- “कुछ इस क्रम में होना का विकास हुआ होगा” गौर करें कि ये ‘हुआ’ और ‘होगा’ भी ‘होना’ के ही कालसूचक क्रियारूप हैं अर्थात ये भी ‘भवन’ से सम्बद्ध हैं। होना की मूल धातु ‘हो’ है। कुछ का कुछ होना यानी काम बिगड़ना,  किसी का होना यानी अपनी आस्था किसी को सौंपना, होता-सोता यानी सगा-सम्बन्धी। होकर रहना यानी अनिष्ट घटना आदि। 
हिन्दी वर्तमानकालिक वाक्य रचनाओं के अन्त में ‘हूँ’, ‘है’, ‘हो’ जैसी सहायक क्रियाएँ अवश्य लगती हैं। ये सभी ‘हो’ या ‘होना’ से सम्बद्ध हैं। विभिन्न व्याकरणाचार्यों ने ‘होना’ के विभिन्न रूपों का विकास संस्कृत की ‘अस्’ धातु या ‘भू’ धातु से माना है। इसमें ‘भू’ से ही होना का विकास अब सर्वमान्य है। उदयनारायण तिवारी और धीरेन्द्र वर्मा हूँ रूप को ‘अस्मि’ से यूँ सिद्ध करते हैं- संस्कृत, अस्मि > प्राकृत, अम्हिं > हिन्दी, हूँ। डॉ भोलानाथ तिवारी ‘हूँ’ का विकास संस्कृत की ‘भू’ धातु के वर्तमानकालिक रूप से ही मानते हैं मसलन संस्कृत, पाली में भवामी > प्राकृत में होमी > अपभ्रंश में होवि > हौं > हिन्दी, हूँ। डॉ तिवारी कहते हैं कि ये सभी रूप ‘हो’ धातु के हैं जो कि ‘भू’ से ही विकसित हो सकते हैं न कि ‘अस्’ से। इन सहायक क्रियाओँ की विशेषता ये है कि इनमें पुरुष और वचन के अनुरूप बदलाव होता है। लिंग से वाक्य रचना में कोई अन्तर नहीं पड़ता। जैसे उत्तम पुरुष में- मैं जा रहा हूँ / हम जा रहे हैं। मध्यम पुरुष में तुम जा रहे हो / वे जा रहे हैं। अन्य पुरुष में वह जा रहा है/ वे जा रहे हैं। ‘भव’ से ही पूरवी बोलियों का ‘भया / भवा’ शब्द बना है। हिन्दी में इसका रूप ‘हुआ’ बनता है। ‘भयो’ का मालवी रूपान्तर काँईं ‘हुओ’ / काँईं’ होयो’ है। अन्यमनस्कता को सिद्ध करने के लिए हिन्दी में ‘हूँ-हाँ करना’ मुहावरा बहुत कुछ कह देता है।
संस्कृत के ‘भवनम्’ का एक अर्थ होता है आवास, निवास, घर, प्रकोष्ठ, स्थान, आधार, इमारत या प्रकृति। यहाँ प्रकृति शब्द पर गौर करें। इसके अलावा जितने भी पर्याय हैं वे सब आश्रय शब्द के दायरे में आते हैं। ये निर्मित हैं। भवन को बनाया जाता है अर्थात उसमें होने की क्रिया निहित है। कुछ आश्रय प्राकृतिक भी होते हैं जैसे वृक्ष-कोटर, पर्वत-कंदरा, गुफा आदि। ये सब मनुष्य के प्राकृतिक आवास होते हैं। प्रकृति अपने आप में जीव-जगत का नैसर्गिक आश्रय है, इसलिए प्रकृति का एक अर्थ ‘भवन’ महत्वपूर्ण है। भवनम् बना है संस्कृत धातु ‘भू’ से जिसमें मूलतः घटित होने का भाव है। घटित होने में उगने, पैदा होने, जन्म लेने, उदित होने, आकार लेने, उगने, निकलने, जीवित रहने, विद्यमान रहने का भाव है। व्यापक और दार्शनिक अर्थों में ये सब क्रियाएँ और भावार्थ सृष्टि की ओर इंगित करते हैं।
भू से संस्कृत में भूः बनता है जिसमें विश्व, सृष्टि, पृथ्वी जैसे भाव हैं। पृथ्वी के सभी भाव बड़े प्रतीकात्मक में हैं। इसी कड़ी में ‘भू’ से बना भूमि जो विश्व के सभी जीवधारियों का आश्रय है। ‘भूमि’ जैसी रचना में होने का भाव स्वतः निहित है। ‘भूमि’ यानी जो हो चुकी है अर्थात जो विद्यमान है। ‘भूमिका’ शब्द का अर्थ भी ज़मीन, आधार, पृथ्वी, स्थान, प्रदेश आदि है। अभिनय के संदर्भ में भूमिका का अर्थ है नाटक का कोई चरित्र। यहाँ आधार शब्द प्रमुख है। नाटकीय चरित्र ही नाटक का आधार होते हैं। ‘भौमिक’ का अर्थ है पार्थिव अर्थात भूमि सम्बन्धी। ‘भू’ के साथ जब ‘क्त’ प्रत्यय लगता है तो बनता है ‘भूत’ अर्थात जो हो चुका है, बीत चुका है, व्यतीत हो चुका है। अतीत का विषय। जो घट चुका है। भूतकाल का हिस्सा है इसलिए जो सामने है, वर्तमान है, जो सामने है, वह भी भूत है और जो घट चुका है, जो अतीत है वह भी भूत है। भूत यानी तत्व यानी पंचमहाभूत-अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु और आकाश। ज़ाहिर है समूची सृष्टि के भाव वाला ‘भू’ यहाँ स्पष्ट है। व्यतीत के अर्थ में ‘भूत’ का एक अर्थ और है, मगर यही अर्थ सर्वाधिक लोकप्रिय और व्यापक है। भूत यानी प्रेत, पिशाच, मृतात्मा, बुरी आत्मा आदि। मनुष्य का जीवन जब सम्पन्न हो जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है। यह माना जाता है कि प्रत्येक शरीर में आत्मा का वास होता है। सद्ग्रहस्थ या सन्यासी को मोक्ष मिलता है मगर विषय वासना से युक्त जीवधारी की आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता और मतात्मा तभी भूत कहलाती है। भूत का होना यहाँ सिद्ध है। जो हो चुका है, बीत चुका है वही भूत है। न भूतो, न भविष्यति उक्ति से सब अवगत हैं।
वनम् से बने ‘होना’ में अस्तित्व या विद्यमानता का भाव प्रमुख है। ‘भव्य’ शब्द भी इसी मूल का है जिसमें उत्तम, शानदार, योग्य जैसे भाव है। मुख्यतः भव्य में भी विद्यमानता या होने वाला जैसे ही भाव है। अर्थविस्तार होते हुए इसमें मनोहर, प्रिय, अत्युत्तम, आलीशान जैसे भाव भी समा गए। होना मे मुहावरेदार अर्थवत्ता भी है। होनी, अनहोनी, होनहार जैसे शब्द जो इसी कड़ी से जुड़े हैं, मुहावरे की अर्थवत्ता रखते हैं। ‘होनी’ का अर्थ हो जो होने वाला है अर्थात भविष्य के गर्भ में छुपी बात। अनहोनी यानी अनिष्ट, दुर्भाग्य आदि। ‘होनहार’ का अर्थ सकारात्मक है। भविष्य में होने वाली अच्छी बात। होनहार संज्ञा के रूप में अच्छे गुणों वाला सुपुत्र भी होता है। अच्छे लक्षणों वाली संतति या बच्चा होनहार कहलाता है। होनहार बिरवान के, होत चीकने पात कहावत किसने नहीं सुनी होगी। ‘भू’ धातु से हिन्दी समेत अनेक भाषाओं में कई शब्द बने हैं।

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Friday, September 30, 2011

श्रवणकुमार की सुन-गुन

Hear
कि सी भाषा की लम्बी उम्र और शब्द-समृद्धि के मूल में उस भाषा का अन्य भाषाओं से जीवंत सम्पर्क महत्वपूर्ण है। प्राचीन काल से भाषाई आदान-प्रदान होता रहा है। सभ्यता के विकासक्रम में क्षेत्रीय भाषाओं में से कोई एक भाषा परिनिष्ठित भाषा का रूप लेती है। तब शुद्धता का आग्रह भी सामने आता है। आज के दौर में हिन्दी भी ऐसी ही परिस्थिति से जूझ रही है। हिन्दी में अब बोली-भाषा के शब्द धीरे धीरे गायब हो रहे हैं। गौरतलब है कि लोक बोलियों के विभिन्न शब्दों की अर्थवत्ता बड़ी व्यापक होती है। साहित्यिक प्रयोगों के ज़रिये इन शब्दों से पढ़ा-लिखा समाज परिचित होता है। दो दशक पहले तक परिनिष्ठित हिन्दी में आंचलिक बोली के शब्दों का इस्तेमाल होता था। समर्थ अभिव्यक्ति के लिए भाषा में शब्दों की आवाजाही ज़रूरी है, किन्तु हिन्दी वालों में साहित्यानुराग भी धीरे धीरे कम हो रहा है लिहाज़ा लोकभाषा के शब्दो से अपरिचय वाला हिन्दी समाज हमारे सामने है।

श्रवण करने की क्रिया के लिए हिन्दी में ‘सुनना’ शब्द के अलावा कोई अन्य विकल्प हमारे सामने नहीं है। इसका प्रयोग सुनवाई, सुनना, सुनाई पड़ना जैसे अर्थों में होता है। इसके अलावा विचार करना, ध्यान देना जैसे भाव भी इसमें शामिल हैं। सुनना क्रिया से सुन-गुन लेना जैसा मुहावरा भी हिन्दी में चल पड़ा है। संस्कृत में सुनने के लिए ‘श्रवण’ शब्द है। यह बना है ‘श्रु’ धातु से जिसमें सुनने, सुनाई पड़ने का भाव है। ‘श्रवण करना’ यूँ तो सुनने के संदर्भ में हिन्दी में बोला जा सकता है, मगर ऐसे वाक्य प्रयोग व्यवहार में नहीं है। पाली में ‘श्रवण’ का ‘सवन’ रूप है और प्राकृत में ‘सवण’। इसी कड़ी में हिन्दी की ‘सुनना’ क्रिया का विकास हुआ। ताज्जुब होता है कि सुनने की क्रिया के लिए कभी हमारे पास ‘अकनि/अकुनि’ जैसी क्रिया भी थी। सूरदास, तुलसीदास जैसे मध्यकालीन कवियों ने इसके विविध रूपों का प्रयोग किया है। डॉ रामविलास शर्मा इस ‘अकनि/अकुनि’ क्रिया के बारे में लिखते हैं कि अन्य भारतीय आर्यभाषाओं में भी सुनने के अर्थ वाली इस क्रिया का इस्तेमाल होता है। उनके मुताबिक ‘अकनि’ क्रिया के मूल में ‘अक्’ जैसी धातु होनी चाहिए, मगर संस्कृत में ‘अक्’ जैसी कोई क्रिया नहीं है। वे ग्रीक भाषा की क्रिया ‘अकोउओ’ से ‘अकनि’ की तुलना करते हैं जिसका अर्थ भी सुनना ही होता है। उनका मानना है कि ‘अकनि’ या ‘अकुनि’ और ‘अकोउओ’ परस्पर सम्बद्ध हैं। माना जाता है कि आर्यों के भारत आने से पहले प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा से ग्रीक शाखा अलग हो गई थी। ‘अकोउओ’ प्राचीन ग्रीक का शब्द है, आधुनिक ग्रीक का नहीं। इस तरह के शब्द साम्य से ऐसा लगता है कि इंडो-यूरोपीय भाषाओं के विकास को समझने के लिए उनका तुलनात्मक अध्ययन केवल संस्कृत से नहीं बल्कि आधुनिक आर्य भाषाओं से भी करना चाहिए।
ब्रज, अवधि में प्रचलित ‘अकनि/अकुनि’ , ‘अकनना’ जैसी क्रियाओं से मिलती जुलती एक क्रिया मराठी में भी है। हिन्दी की ’सुनना’ जैसी ही स्थिति मराठी के ‘ऐकणे’ (अइकणे) की भी है अर्थात यहाँ भी ‘श्रवण’ करने के लिए ‘ऐकणे’ (अइकणे) के अलावा कोई अन्य पर्यायी शब्द नहीं है। डॉ रामविलास शर्मा जिस दिशा में संकेत कर रहे हैं उससे ऐसा आभास होता है कि संभवतः प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार कि भारतीय शाखाओं में ‘ऐकणे’ (अइकणे), ‘अकनि / अकुनि’ जैसे शब्दों की उपस्थित प्राचीन ग्रीक के
ear tumpet‘अकनि’ और ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति कल्पित ‘अक्’ धातु की बजाय ‘कर्ण’ में ही निहित है। प्रोटो भारोपीय भाषाओं के मूल स्रोतों की दिशा में महान काम करने वाले जूलियस पकोर्नी जैसे ख्यात भाषा शास्त्री का ध्यान इस ओर नहीं गया होगा, यह बात मानना मुश्किल है।
‘अकोउओ’ का प्रभाव मानी जानी चाहिए। इसे आर्यों के आप्रवासन का परिणाम भी माना जा सकता है और प्राचीन यूनान से वृहत्तर भारत के सांस्कृतिक सम्बंधों का नतीजा भी। ग्रीक ‘अकोउओ’ का परवर्ती रूपान्तर ‘अकूस्टोस’ होता है जिसमें सुनने लायक जैसा भाव है। इसका ही एक रूप ‘अकूस्टिकोस’ होता है जिसका अर्थ भी सुनना ही है। अंग्रेजी के ‘अकूस्टिक’ acoustic और फ्रैंच के acoustique से इसकी रिश्तेदारी निर्विवाद है। जूलियस पकोर्नी द्वारा बताई गईं प्रोटो भारोपीय धातु kous से इसकी रिश्तेदारी है। डॉ शर्मा का सुझाव महत्वपूर्ण है कि प्राचीन भारोपीय भाषाओं के विकास को परखने के लिए संस्कृत समेत आधुनिक आर्यभाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन भी होना चाहिए। मगर विभिन्न संदर्भों के मद्देनज़र अवधी शब्दों ‘अकनि/अकुनि’  और मराठी के ‘ऐकणे’ (अइकणे) की रिश्तेदारी ग्रीक की बजाय संस्कृत से ही जुड़ती लग रही है। ‘अकनि’ और ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति कल्पित ‘अक्’ धातु की बजाय ‘कर्ण’ में ही निहित है। प्रोटो भारोपीय भाषाओं के मूल स्रोतों की दिशा में महान काम करने वाले जूलियस पकोर्नी जैसे ख्यात भाषा शास्त्री का ध्यान इस ओर नहीं गया होगा, यह बात मानना मुश्किल है।हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक ‘अकनि’ दरअसल संस्कृत के ‘आकर्णन’ का रूपान्तर है। आकर्णन का प्राकृत रूप ‘आकण्णण’ होता है। इसका एक रूप ‘आकर्णे’ भी है। ‘आकण्णण’ के अवहट्ठ भाषा में ‘आकण्ड’, ‘आकण्णे’ जैसे रूप भी हैं। ‘अकनि/अकुनि’ इसी कड़ी में आता है।
ह मानना दूर की कौड़ी लगती है कि ‘आकर्णन’ से बने ‘आकण्ण’, ‘अकनि / अकनि’ और ‘ऐकणे’ जैसे शब्दों की ग्रीक ‘अकोउओ’ से रिश्तेदारी है। ध्यान देना चाहिए कि ग्रीक ‘अकोउओ akouo’ का उच्चारण a-koo-oh अर्थात ‘अ कू ओह’ होता है। यह स्पष्ट है कि संस्कृत के आकर्णन की अर्थवत्ता ‘कर्ण’ अर्थात कान से स्थापित हो रही है जिसका गुण सुनना है। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक ‘आकर्णन’ से बनी ‘अकनना’ क्रिया का अर्थ सुनना, कर्णागोचर करना जैसे भाव हैं। आहट लेने, अंदाज़ा लेने के लिए बना सुन-गुन वाला भाव भी आकर्णन या अकनना में है। ‘कान लगा कर सुनना’ जैसा भाव ही वाशि आप्टे के संस्कृत कोश में भी है। यहाँ ‘आकर्णनम्’ शब्द की व्युत्पत्ति आ + कर्ण+ल्युट बताते हुए इसका अर्थ सुनना, कान लगा कर सुनना दिया है। इसके विपरीत कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश में ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘अभिकर्ण’ से बताई गई है। संस्कृत के ‘अभि’ उपसर्ग का अर्थ ‘की ओर’, ‘की दिशा में’ होता है। इस तरह अभिकर्ण में भी कान लगा कर सुनने का भाव ही है। इसका मराठी प्राकृत रूप होता है अहिकण्ण > अहिक्खण्ण > ऐकणे। मेरा मानना है कि मराठी ऐकणे का विकास भी संस्कृत के आकर्णनम् से ही हुआ होगा। क्योंकि संस्कृत कोशों में अभिकर्ण शब्द की प्रविष्टि मुझे नहीं मिली।
संस्कृत के ‘कर्ण’ की व्युत्पत्ति हुई है ‘कर्ण्’ धातु से जिसकी व्यापक अर्थवत्ता है और इससे बने अनेक शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं। ‘कर्ण्’ में छेदना, प्रवेश करना, घुसना जैसे भाव शामिल हैं। कान  की संरचना के संदर्भ में इन भावों का अर्थ स्पष्ट है। कान दरअसल एक दीर्घ विवर जैसी संरचना ही है। ‘कर्ण्’ से बने ‘कर्ण’ का अर्थ है किसी वस्तु को थामने वाली संरचना, बाहर निकला हुआ हिस्सा, हत्था, दस्ता या मूठ आदि। कर्ण शब्द की कान के संदर्भ में यहां गुणवाचक अर्थवत्ता भी है और भाववाचक भी। श्रवणेन्द्रिय होने की वजह से यहां स्पष्ट है कि कानों में ध्वनि प्रवेश करती है। इस तरह स्पष्ट है कि ग्रीक ‘अकोउओ’ या अवधी के ‘अकनि/अकनि’ में शब्द साम्य है मगर यह मानना थोड़ा मुश्किल लगता है कि ‘आकर्णनम्’ के प्राकृत रूपों का प्रसार ग्रीक भाषा में हज़ारों वर्ष पहले हुआ होगा। खास बात यह कि ‘अकनि / अकनि’ की रिश्तेदारी जिस तरह से कान अर्थात कर्ण ( संस्कृत धातुमूल कर्ण्) से सिद्ध हो रही है, ग्रीक के ‘अकोउओ’, उसकी मूल धातु kous और इससे बने ‘अकूस्टिक’ जैसे शब्दों में कहीं भी शरीरांग ‘कान’ का भाव नहीं है। प्रोटो भारोपीय शब्दों के मूल स्रोत खोजने का बड़ा काम करने वाले ख्यात भाषाविद् जूलियस पकोर्नी ने इस पहलू की जानबूझ कर अनदेखी की है, यह बात माननी मुश्किल है। ‘अकनि’ और ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति कल्पित ‘अक्’ धातु की बजाय ‘कर्ण’ में ही निहित है।
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Friday, September 23, 2011

घर-गिरस्ती की रस्सियाँ

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शु और मनुष्य का साहचर्य शब्दों के सफ़र में भी विविध रूपों में नजर आता है। यह उपभोक्ता और उत्पाद के रूप में भी है और पारिवारिक-आध्यात्मिक धरातल पर भी है। सर्वप्रथम मनुष्य की सत्ता पशुओं पर ही कायम हुई। उसने खुद को मानवेतर जीव-जगत का नियंता स्वयं को स्थापित किया। तात्पर्य यह कि अधिकार, स्वामित्व और सम्पत्ति का बहुआयामी बोध अगर किसी ने मनुष्य को कराया है तो वे पशु ही हैं। भाषा में भी यह रिश्ता साफ नज़र आता है। उर्दू –हिन्दी का एक आम शब्द है “माल” जो मूल रूप से सेमेटिक भाषा परिवार का है। माल का अर्थ होता है सम्पत्ति। व्यापक तौर पर धन-दौलत, सामान, भंडार, कीमती सामग्री, वस्तुएं आदि भी आती हैं। यह बना है “माल” अर्थात mwl से जिसका अर्थ होता है पशुओं का रेवड़। खासतौर पर जो दुधारू पशु पालतू हों। सेमेटिक परिवार की हिब्रू, अरबी, सीरियक, आरमेइक आदि कई भाषाओं में इस धातु की व्याप्ति इसी अर्थ में हैं। जाहिर सी बात है कि पशु ही प्राचीन इन्सान की सबसे बड़ी सम्पत्ति थे इसीलिए पशुधन जैसा शब्द हिन्दी में प्रचलित हुआ। साफ है कि माल यानी पशु। प्रचलित अर्थ में यही पशुधन ऐश्वर्य सामग्री, धनसम्पत्ति और दौलत है। जिसके पास माल है वह मालदार है अर्थात ऐश्वर्य वान है, धनी है, श्रीमंत है। माल-असबाब, मालमत्ता और मालामाल जैसे शब्द युग्म भी माल की ही देन हैं। लेनदेन अथवा व्यवसाय के तौर पर मुद्रा की भूमिका सबसे पहले पशुधन ने ही निभाई।
बसे पहले “माल-असबाब” की बात। विभिन्न शब्दकोशों में असबाब का अर्थ रोजमर्रा के काम की वस्तु होता है। दरअसल “असबाब” अरबी भाषा से फ़ारसी होते हुए उर्दू-हिन्दी में दाखिल हुआ। बुनियादी तौर पर यह अरबी के “सबब” sbb शब्द का बहुवचन है। सबब में अरबी का “अ” उपसर्ग लगने से बनता है “असबाब”। सबब के प्रचलित अर्थ हैं वजह, निमित्त, कारण, अभिप्राय, प्रयोजन, आशय, सुयोग, मौका अवसर आदि। सबब से बना बेसबब शब्द भी हिन्दी में प्रचलित है जिसका अर्थ है अकारण। मगर माल-असबाब के संदर्भ में इन अर्थों से बात नहीं बनती है और कोश इससे ज्यादा कुछ नहीं बताते। अरबी के पुराने संदर्भों में “सबब” का अर्थ रस्सी या तम्बू भी होता है “असबाब” में भी रस्सी और तम्बू के बहुवचन का भाव है। यह तम्बू “असबाब” के संदर्भ को और ज्यादा स्पष्ट करता है। कारण, वजह, प्रयोजन जैसे अर्थों का विकास बाद में हुआ। सभ्यता के अत्यंत प्रारम्भिक युग में इनसान के कुछ खास उपकरणों में रस्सी भी थी। इसी के साथ डण्डा और छाजन भी प्रमुख उपकरण थे जिनके जरिए वह आश्रय से लेकर आत्मरक्षा और पशुपालन जैसे कार्यों का कुशलतापूर्वक सम्पादन कर पाता था।
गौर करें रस्सी बँटी हुई, गुँथी हुई रचना का नाम है। कुरान की अरबी के विशेषज्ञ मार्टिन आर ज़ैमिट के मुताबिक “सबब” में गूँथने, बँटने का भाव भी निहित है। वे सेमिटिक भाषा परिवार की अन्य भाषाओं के कुछ शब्दों से भी समानता सिद्ध करते हैं जिनमें घूमने, गोलाई, मुड़ने और चक्कर लगाने के भाव हैं। गूँथना और बँटना में यही क्रियाएँ होती हैं। जैमिट के मुताबिक सीरियक में शबा, आरमेइक में सबा, हिब्रू का सबाब और फोनेशियन में सब्ब जैसे शब्द हैं। ध्यान रहे रस्सी एक माध्यम है। किन्ही दो बिन्दुओं के बीच किसी प्रयोजन को सिद्ध करने का ज़रिया। रस्सी का माध्यम या ज़रिया बनना महत्वपूर्ण है। रस्सी में कड़ी या माध्यम का भाव है जो दो बातों, दो बिन्दुओं, दो वस्तुओं को जोड़ने की वजह बनती है। हैन्स व्हेर, जे मिल्टन कोवैन की डिक्शनरी ऑफ मॉडर्न रिटन अरेबिक में भी “सबब” के प्राचीन मायने रस्सी

tent... तम्बू को खड़ा करने में रस्सी और डण्डे की बड़ी भूमिका है। इसी तरह मवेशियों को बांध कर रखने में भी रस्सी एक ख़ास ज़रिया है। तम्बू ही बद्दुओं का आश्रय था। तम्बू में ही गृहस्थी की अर्थवत्ता समायी है अर्थात दुनियादारी की सभी वस्तुएँ...

या तम्बू ही बताए गए हैं मगर “प्रयोजन, वजह, कारण, हेतु” जैसी अर्थवत्ता इनमें कैसे विकसित हुई होगी, इसका स्पष्टीकरण नहीं मिलता।
म्पत्ति, गृहस्थी, साज़ो-सामान, कीमती पदार्थ, जमाजत्था, झोला-डण्डा जैसे अर्थों के पर्याय के रूप में अगर माल-“असबाब” पर विचार करें तो प्राचीन अरब समाज का जन-जीवन उभरता है। अरब के विस्तीर्ण मरुस्थलों में बद्दु जाति के लोग अपने मवेशियों के साथ सतत यायावरी करते थे और दाना-पानी मिलने पर यहाँ-वहाँ डेरा जमा लेते थे। अरबी में माल का अर्थ होता है पशु और असबाब यानी शिविर, तम्बू। इन दोनों से मिल कर बनता है माल-असबाब जिसमें समूची गृहस्थी या कीमती वस्तुओं का समावेश हो जाता है। प्राचीन घूमंतू जनजातियों के जीवन का सबसे बड़ा आधार ही उनके पशु और उनका तम्बू होता था। कबाइली जनजातियों के लिए खानाबदोश जैसी उपमा से भी यह स्पष्ट होता है। “खाना” का अर्थ होता है प्रकोष्ठ या आश्रय। यहाँ तम्बू का भाव स्पष्ट है। “दोश” यानी कंधा अर्थात अपने कंधों पर अपना घर लिए फिरने वाले लोग यानी बेदुइन ही खाना-ब-दोश हुए। तम्बू को खड़ा करने में रस्सी और डण्डे की बड़ी भूमिका है। इसी तरह मवेशियों को बांध कर रखने में भी रस्सी एक ख़ास ज़रिया है। तम्बू ही बद्दुओं का आश्रय था। तम्बू में ही गृहस्थी की अर्थवत्ता समायी है अर्थात दुनियादारी की सभी वस्तुएँ। हिन्दी के झोला-डण्डा, झोला-रस्सी जैसे शब्दयुग्म में समूची गृहस्थी की अर्थवत्ता समायी हुई है।
स्पष्ट है कि “माल-असबाब” में सबब के प्रचलित अर्थ यानी कारण, वजह, प्रयोजन की अर्थवत्ता महत्वपूर्ण न होते हुए इसके प्राचीन भाव का ज्यादा महत्व है। यूँ कारण, वजह, प्रयोजन जैसे अर्थ भी रस्सी की अर्थवत्ता से ही विकसित हुए हैं। रस्सी में समाए माध्यम के भाव का विस्तार हुआ। वस्तुओं, पदार्थों, साज़ो-सामान, जमाजत्था जैसे अर्थ अकारण विकसित नहीं हुए। दरअसल दैनंदिन काम में आने वाली चीज़ें, उपकरण भी माध्यम हैं, एक जरिया हैं। प्रयोजन सिद्ध करने का माध्यम हैं। हमारे इर्दगिर्द जो असबाब है दरअसल वही जीवन का निमित्त है। जीवन का स्थूल अर्थ अब गृहस्थी के साधन जुटाना ही रह गया है सो साज़ोसामान के अर्थ में असबाब का प्रयोजन होना यहाँ सिद्ध है। जॉन प्लैट्स के कोश में  औपनिवैशिक दौर की हिन्दुस्तानी ज़बान में प्रचलित  असबाब के  उदाहरण  दिए हुए हैं जैसे असबाब ए पेशा अर्थात व्यवसायगत वस्तुएँ, असबाब ए जंग यानी युद्ध का साज़ोसामान, असबाब ऐ खानादारी यानी बैठकखाने की चीजें-फ़र्निचर, असबाब ए सफ़र यानी यात्रा की ज़रूरी चीज़ें।
ब बात “मालमत्ता” की। माल का अर्थ तो ऊपर स्पष्ट है। “मत्ता” दरअसल अरबी से आया शब्द है और हिन्दी में इसकी स्वतंत्र उपस्थिति न होकर“मालमत्ता” में ही देखने को मिलती है। अरबी में इसका शुद्ध रूप है “माअता” और इसे “मताआ” भी उच्चारा जाता है। अरबी मे प्रश्नवाचक सर्वनाम है “मा” जिसका अर्थ होता है- यह क्या है। इंडो-ईरानी भाषा परिवार में जिस तरह प्रश्नवाची सर्वनाम “की” के फ़ारसी रूपान्तर “ची” में पदार्थ की अर्थवत्ता आ जाने से “ची” का चीज़ रूपान्तरण हुआ और इसका अर्थ वस्तु हुआ ठीक वैसे ही अरबी सर्वनाम “मा” के साथ हुआ। “माअता” शब्द का अर्थ भी वस्तु ही होता है। “मताआ” में हर उस आमफ़हम चीज़ का शुमार है जो जीवन जीवन निर्वाह के लिए ज़रूरी है। उर्दू शायरी में “मता” शब्द का प्रयोग पढ़ने को मिलता है जैसे मता ए बाज़ार यानी बाज़ार में बिकने वाली वस्तु। मता ए ग़ैर यानी किसी और की चीज़।

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Monday, September 19, 2011

दिल चीज़ क्या है…नाचीज़ क्या है…

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कु दरती तौर पर नज़र आने वाली ज्यादातर चीज़ों के पैदा होने का एक ख़ास तरीका होता है मगर भाषा के बदलने और शब्दों के जन्म लेने के पीछे तयशुदा सिलसिला नहीं है। कोई शब्द आज जिस रूप में है, उसका कल क्या रूप होगा, कहा नहीं जा सकता। यही नहीं, बदले रूप में उसका क़िरदार क्या होगा इसका भी कुछ ठिकाना नहीं। हिन्दी में “चीज़”बड़ा आमफ़हम शब्द है। “चीज़” की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। सूक्ष्म से लेकर दीर्घकाय वस्तुएँ इसमें शामिल है। मामूली से लेकर बेशक़ीमती पदार्थ तक इसमें आते हैं। बेजान वस्तुओं से लेकर प्राणी तक इसके दायरे में शामिल हैं। क़ुदरत की बनाई नायाब चीज़ों में हीरा भी है और हीरे की खदान भी है। नदी भी है तो सागर भी। सहरा भी है और जंगल भी। हवा, पानी, पेड़, फूल, पत्ती, सोना, चांदी सब कुछ उन चीज़ों में शामिल है जिन्हें कुदरत ने बनाया है। इनसान भी इन्हीं में से एक चीज़ है। आशिकमिज़ाज लोग दिल को “चीज़” कहते हैं विनम्रतावश शरीफ़ लोग खुद को भी “नाचीज़” कहते हैं। चीज़ दरअसल फ़ारसी से बरास्ता उर्दू ज़बान, हिन्दी में दाखिल हुआ। हिन्दी की बोलियों में चीज़बस्त शब्दयुग्म भी प्रचलित है जिसका अर्थ है रोज़मर्रा के काम की वस्तुएँ। चीज़ में स्थूल रूप से पदार्थ का भाव है। इसमें चल-अचल सम्पत्ति, सामान, मालमत्ता, असबाब, सामग्री आदि सब कुछ शामिल है। जॉन शेक्सपियर के कोश के मुताबिक इसमें सरंजाम, डंडा-डेरा, साज़ो-सामान, घर-बार, झोला-तम्बू सब आ जाता है।
“चीज़” की व्युत्पत्ति के जन्मसूत्र इंडो-ईरानी भाषा परिवार के प्रश्नवाची सर्वनाम से जुड़े हैं। सृष्ठि में जो कुछ भी दृश्यमान है, सब “पदार्थ” की श्रेणी में आता है। वैशैषिक दर्शन में विश्व को छह पदार्थों (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय) में समेट दिया गया है। मनुष्य का मूल स्वभाव है अस्तित्व के प्रति जिज्ञासु होना। यह बहुत महत्वपूर्ण है। जागृत विश्व में अस्तित्व के प्रति जिज्ञासा प्रकट करने के लिए छह प्रकार के ककार हैं। हिन्दी में इन्हें प्रश्नवाची सर्वनाम अर्थात क्या, क्यों, कहाँ, कब, कैसे, कौन कहा जाता है। इन्हें ककार इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनमें “क” वर्ण या ध्वनि है। इसी तरह अंग्रेजी में फाईव डब्ल्यू और वन एच में भी यही बात हैं। गौरतलब है कि हमारे यहाँ "क" की महिमा है तो अंग्रेजी में "डब्ल्यू" की। इनमें रिश्तेदारी है, जिसकी चर्चा आगे। संस्कृत के “क” (कः) वर्ण में जिज्ञासा का भाव महत्वपूर्ण है। मेरा मानना है कि “चीज़” के मूल में भी इसी ‘क’ की माया है। हिन्दी की अनेक बोलियों में जानने के लिए, प्रश्नवाचक “की/ki” (की?) शब्द बोला जाता है। अभिप्राय “क्या” से होता है। “की” में “क्यों” का भाव भी है। इंडो-ईरानी भाषा परिवार में इस “की” का रूपान्तर “ची” में भी होता है। लोक बोली में मुख-सुख के आधार पर “क्यों” के “चों” या “च्यों” जैसे रूप भी सुनने को मिलते हैं। तुतलाने वाले भी “क्यों” की एवज में “च्यों” का उच्चार करते हैं।
हरहाल “की/ki” का प्रयोग “क्या” अथवा “कौन” के लिए होता है, यह स्थापित सत्य है। प्रश्नवाची सर्वनाम “किस” पर विचार करते हुए भाषाविज्ञानी भोलानाथ तिवारी संस्कृत के “कस्य” शब्द के आदिरूप “किस्य” की कल्पना करते हैं। इसमें संस्कृत के “किम्” का पुरानी फ़ारसी में “चिम्” रूप बतलाते हैं। इसी तरह डॉ फ्रिट्ज़ रोज़ेन भी फ़ारसी में कौन के लिए “की ki” और क्या के लिए “ची chi” शब्द में अंतर्संबंध बताते हैं। बात को और स्पष्ट करने के लिए एक और सर्वनाम की मिसाल देखते हैं। हिन्दी का अनिश्चयवाची सर्वनाम है “कुछ”। हिन्दी की विभिन्न बोलियों में इसके “कुच्छो, कछू, किछु” जैसे रूप भी मिलते हैं। इसका प्रयोग निर्जीव पदार्थों के अस्तित्व को उजागर करने के लिए होता है। उदयनारायण तिवारी समेत अनेक विद्वानों ने कुछ की व्युत्पत्ति किं-चिद् से मानी है जिसका हिन्दी रूप किंचित् है। पदार्थ के अस्तित्व का यही भाव “की/ki” के फ़ारसी रूपान्तर “ची” में भी देखने को मिलता है और इसी वज़ह से वस्तु या पदार्थ के अर्थ में ही प्रश्नवाची सर्वनाम “ची” का रूपान्तर “चीज़” हो गया। अलबत्ता पदार्थ के प्रति कुछ में जो तुच्छता का भाव है, वैसा “चीज़” में नहीं है। “चीज़” में जब तुच्छता प्रकट की जाती है तो उसके आगे विलोमार्थक “ना” उपसर्ग लगाकर “नाचीज़” शब्द बनाया जाता है अर्थात जो तुच्छ हो। तुच्छ वही है जो हीन है, क्षीण है या महीन है। जाहिर है चीज़ में महत्व निहित है। यह भी कि किं-चिद् से अगर “कुछ” बनता है तो “ची”(की) से “चीज़” बनना तार्किक है।
चीज़ में ज्यादातर वैशिष्ट्य, महत्वपूर्ण जैसी अर्थवत्ता है। कोई खास वस्तु, कीमती पदार्थ, मालमत्ता, माल-असबाब, सम्पत्ति, खास आदमी वगैरह चीज़ के दायरे में आते हैं। मराठी में भी “चीज़” और “चीज़बस्त” शब्द का अर्थ कीमती पदार्थ, खास बात या कोई पदार्थ, टुकड़ा, पीस piece ही है। जेटी मोल्सवर्थ अपने मराठी कोश में चीज़ का अर्थ स्पष्ट करते हुए मिसाल देते हैं कि गायन जैसी कोई चीज़ नहीं ( गायना सारखी दुसरी चीज नाहीं) ज़ाहिर है यहाँ चीज़ का अभिप्राय कला से है। यानी पदार्थ की श्रेणी में गुण भी शामिल है। इसके विपरीत मराठी में कभी कभी तुच्छता का भाव प्रकट करने के लिए भी चीज़ का प्रयोग होता है जैसे- इस लड़के ने तो मेरी मेहनत की “चीज़” कर दी (ह्या पोराने माझ्या श्रमाचे चीज केले) यहाँ आशय मेहनत पर पानी फेरने से ही है। खानोलकर और सरमोकदम के मुताबिक बखानने योग्य बात, सराहने योग्य बात भी “चीज़” हैं मसलन किसी कविता की पंक्ति, कोई उक्ति या श्लोक आदि। संगीत घरानों में पुरानी घरानेदार बंदिश को चीज़ कहने की रिवायत रही है जैसे-राग दरबारी की एक चीज़ पेश है।
इंडो-ईरानी परिवार का “चीज़” शब्द अंग्रेजी में भी गया और वहाँ इसका रूप हुआ Cheese. पश्चिमी भाषाविज्ञानियों के अनुसार अंग्रेजी का चीज़ Cheese भी उर्दू-फ़ारसी के चीज़ से ही गया है जिसका अर्थ है पदार्थ, कुछ आदि। भाषा विज्ञानियों के मुताबिक पुरानी फ़ारसी में “किस-की” जैसे शब्दों का अर्थ वही था जो संस्कृत के “कस्य” या “किस्य” का था। यहाँ ध्यान रखा जाना चाहिए कि बाद के दौर में किस-की के “चिस-ची” जैसे रूप बने होंगे तभी “ची” से “चीज़” जैसे सूप सामने आए। “किस” में भी “कौन” का ही भाव है। एटिमऑनलाइन के मुताबिक इसका रिश्ता प्रोटो इंडो-यूरोपीय धातु kwo- से ही जिससे ही अंग्रेजी का “हू who” (कौन) बना है। गौर करें संस्कृत में भी प्रश्नवाचक सर्वनाम “क/ka” से शुरू होते है और भारोपीय भाषाओं में भी जैसे अवेस्ता में को, रूसी में क्तो, लिथुआनी में कस, लैटिन में क्वी, क्वे, क्वोद, स्लोवानी में कुतो ( संस्कृत के कुतः से साम्यता देखें) आदि। बात यहाँ भी प्रश्नवाची सर्वनाम से ही जुड़ रही है। अंग्रेजी के चीज़ की अर्थवत्ता भी महत्वपूर्ण है। औपनिवैशिक काल के शुरुआती दौर में इसकी अर्थवत्ता में तुच्छता का भाव था मगर बाद में असली माल, बड़ी बात या ऐसी कोई भी चीज़ जो खास हो, के अर्थ में चीज़ का मुहावरेदार प्रयोग होने लगा। हॉब्सन जॉब्सन के कोश से इसका पता चलता है।
ब आते हैं चीज़बस्त पर। दरअसल यह सामासिक पद है और “चीज़” तथा “बस्त” से मिल कर बना है। फ़ारसी में “बस्त” में भी वस्तु का ही भाव है। वस्तु का एक रूपान्तर बत्तू भी होता है। चीज़ भी पदार्थ है और वस्तु भी पदार्थ है। समान अर्थ वाले शब्दों के मेल से बने सामासिक पद अकसर लोकभाषा में मुखसुख के आधार पर बनते हैं जैसे सामान-सुमान। भारोपीय भाषाओं में “व” का रूपान्तर “ब” में होना आम बात है सो संस्कृत की वस्तु फ़ारसी में “बस्त” हो जाती है। वस्तु बना है “वस्” धातु से। संस्कृत की वस् धातु में रहने का भाव है। गौरतलब है कि वस्तु यानी पदार्थ के रूप में “वस्” धातु का अर्थ अवस्थिति, उपस्थिति या मौजूदगी से है। भाव अस्तित्व का ही है। वासः यानी मकान के अर्थ में निवास, आवास जैसे शब्द भी इसी मूल से आ रहे हैं। परिधान के अर्थ में कपड़ों के लिए वस्त्र शब्द भी इसी मूल से निकला है। वस् अर्थात जिसमें वास किया जाए। यह दिलचस्प है कि काया जिस आवरण में निवास करती है, उसे वस्त्र कहा जाए। वस् धातु का अर्थ होता है ढकना, रहना, डटे रहना आदि। यही नहीं, गाँव देहात में आज भी घरों के संकुल या मौहल्ले के लिए बास या बासा (गिरधर जी का बासा) शब्द काफी प्रचलित है। वस् से ही बना है वसति जिससे निवास या रहने का भाव है। हिन्दी का बस्ती शब्द इससे ही बना है। इस तरह वस्तु का अर्थ हुआ कोई चल या अचल पदार्थ।
कुछ लोग इस बस्त को बंदोबस्त या बस्तोबंद वाले बस्त से जोड़ कर देखते हैं। इस दूसरे बस्त का अर्थ होता है बांध कर रखा हुआ या बांधा हुआ। संस्कृत का “बद्ध” अवेस्ता में बस्तः हुआ जिसका मतलब हुआ जिसे बांधकर, जमा कर, तह कर या गठरी बांधकर रखा गया हो। इसी से बना फारसी-उर्दू में बस्ता यानी स्कूल बैग या पोथी-पोटली। पुराने जमाने में विद्याध्ययन के लिए छात्रों को दूर दूर तक जाना पड़ता था और वे घर से कई तरह का सामान साथ ले जाया करते थे। तब सफर भी पैदल या घोड़ों पर ही तय किया जाता था जाहिर है सामान को सुरक्षित रखने के लिए उसे बेहद विश्वसनीय तरीके से बांधकर या जकड़ कर रखा जाता था। यह क्रिया पहले बद्ध कहलाई फिर इससे बस्तः शब्द बना। इसमें गठरी बैडिंग या पुलंदे का भाव था। बाद में बस्ता के रूप में स्कूलबैग के अर्थ में सिमट कर रह गया।

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