Friday, May 2, 2008

अपने नरक का बंदोबस्त


भारतीय संस्कृति में वनस्पति की महिमा अनुपम है। प्रकृति के इस अद्भुत सुंदर पक्ष पर हमारे मनीषियों ने बहुत चिन्तन किया और वनस्पति को ईश्वरीय दर्जा दिया। मगर मनुश्य ने सहजीवन का महत्व कभी नहीं समझा । लगातार नष्ट हो रहे वनस्पति जगत की रक्षा के लिए सालाना वृक्षारोपण पर्व जैसे दिखावटी अनुष्ठान किये जाते हैं, मगर सोचने वाली बात यह है कि अत्यंत प्राचीनकाल में जब समूची पृथ्वी वृक्षाच्छादित थी तब भी वृक्षोत्सव मनाए जाते थे।

ये जानना दिलचस्प है कि वृक्ष शब्द की व्युत्पत्ति से जाहिर होता है कि उस पर कुल्हाड़ी चलना तो उसके जन्म के साथ ही तय हो गया था। वृक्ष शब्द का मूल अर्थ है पेड़ या वृक्ष खासतौर पर वटवृक्ष के लिए भी सिर्फ वृक्ष शब्द चलता है। इसके अलावा काटने वाली छोटी रेती । वृक्ष से ही हिन्दी-राजस्थानी का रूंख, रूंखड़ा या रूक्ष जैसे शब्द भी बने हैं। वृक्ष बना है व्रश्च धातु से जिसका अर्थ होता है काटना, छांटना, विभाजित करना, जख्मी करना आदि। वृक्ष में व+ऋ+क्ष शामिल हैं। गौर करें कि वर्ण में आवास, निवास का भाव शामिल है। वृक्ष आदिकाल से प्राणियों के प्राणियों के आवास रहे हैं। पेड़ों की शाखाओं पर, लताओं पर, कोटरों में हजारों तरह के प्राणी निवास करते आए हैं। मनुश्य तक सदियों से आवास के तौर पर पेडों का आश्रित रहा है। बाद में पेड़ों की लकड़ी पर वह पूरी तरह आश्रित हो गया। में जाने, बढ़ने , चुनने के साथ साथ घेरने, फैलने , ढकने और छुपाने का भाव भी शामिल है। राह, रास्ता, रीति जैसे शब्द यही जाहिर करते हैं। वृत्त् में जो घेर या गोलाई वाला भाव है वही वट् में भी है। इसीलिए वटवृक्ष सर्वाधिक गोलाई वाला पेड़ कहलाता है। क्ष वर्ण में निहित विस्तार का भाव वृक्ष में सहज ही समझ में आता है मगर क्ष में ही क्षति का अर्थ भी समाया है।

वाल उठता है वृक्ष के अर्थ में कुल्हाड़ी या आरी का क्या भाव हो सकता है ? मुझे लगता है कि पेड़ों की भरपूर बढ़वार के लिए उसकी कटाई-छंटाई करने जैसा ज्ञान तो वनस्पतियों के साथ सहजीवन के शुरूआती दौर में ही मानव ने अर्जित कर लिया था। प्राचीनकाल में जितने सघन वनक्षेत्र थे उनकी कटाई-छंटाई किए बिना उनसे होकर गुज़रना निश्चित ही असंभव था। संभवतः इसीलिए वृक्ष के अर्थ के साथ कटाई छंटाई जैसे भाव भी जुड़ते चले गए। अब ये काल की लीला है कि वृक्षों की बढ़वार के लिए काम आने वाली छोटी रेती शासनतंत्र के भारी भरकम मशीनी कुल्हाड़ों में तब्दील हो गई। सिर्फ मार्गों के लिए , रास्ता बनाने के लिए सघन वनों में वृक्षों की कटाई करने वाले समाज का इतना पतन हुआ कि अब वृक्षविहीन स्थानों पर मार्ग बनाए जाते हैं और उसके दोनो और दिखावे के लिए पेड़ लगाए जाते हैं।

वृक्षों का महत्व पुराणों के इस उल्लेख से समझा जा सकता है कि एक पुत्र दस जलाशयों के समान है तथा एक वृक्ष का रोपण दस पुत्रों के समान है। एक फलदायी वृक्ष अपने स्वामी को नरक में जाने से बचाता है। वृक्षों के बूते अपने वसुओं को पालने वाली हमारी पृथ्वी का वसुधा कहलाने का गौरव हमने उसे वृक्षविहीन करके छीन लिया है । क्या हमने खुद अपने लिए नरक का बंदोबस्त नहीं कर लिया है ?

5 कमेंट्स:

Lavanyam - Antarman said...

अजित भाई , वृक्ष पर विस्तृत जानकारी के साथ व्याख्या करता ये आलेख बहुत अच्छा लगा.
हम जहाँ रहते हैँ उसी इलाके के पास एक सघन वृक्षोँ से आच्छादीत इलाका है जहाँ जो पेड हैँ वे
जब से ये धरती बनी होगी , तभी से , ये अटल खडे हैँ वहाँ दिन मेँ भी अँधकार रहता है और्
धूप आती है वो भी पत्तियोँ से
छन छन कर ..
और हरी आभा देखते ही बनती है -
पेड लगाना पुण्य का काम है . स्नेह्,
-- लावण्या

swapandarshi said...

sabhee dharmo me bhee vrixo ke mahattav ke baare me seekh dee gayee hai,
hindu dharm me to anginat ped pooje jaate hai.

aur chipko aandolan kee photo lagane kaa aabhaar,
jald hee swapandarshi me Guaraa Devi aur unakee saathino par , chipko ke itihaas par ek article dekhiyegaa. ittefaak kee baat hai, ki kchh dino se mere man me bhee baar-baar chipko kee cheeze baar baar aa rahee hai. vaise bhee meraa bachapan chipko andolan ko bahut nazdek se dekhate beetaa hai.


ek muslim mitr se kaee saal pahale pataa chalaa ki islaam ka hara rang , vaastav me "sabz" hai, yaanee ped-podho kaa rang. Kuraan me bhee jannat ko sabz rang kaa hee bataayaa gayaa hai. aapakaa title padhkar mujhe apane un baraso puraane mitr kee yaad aa gayee, jinse meri dhram ko lekar badee teekhee bahas huyaa karatee thee.

अरुण said...

वो सुना है न बडे पेड के नीचे कॊई नया पेड नही उगता ,बस जी प्राने पेड उखाडे जा रहे है और सिमेंटेड पेड लगाये जा रहे है जी :)

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अपने लिए नरक.........!
आपकी चिंता ज़ायज़ है.
वसुधा का वैभव छीनकर स्वर्ग की कल्पना
आकाश-कुसुम के समान ही है.
वृक्ष धरती के धन हैं . उनका सब पर बड़ा ऋण है.
लेकिन आजकल कर्ज़दार तो बहुत नाशुक्रे
हो गये हैं . आपकी यह पोस्ट सोचने-समझने की
दिशा दे रही है........कहते हुए कि ......जागते रहो !!
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आभार
डा.चंद्रकुमार जैन

Mala Telang said...

आज बहुत दिनों बाद सफर पर निकली हूँ ,आते ही दिलोदिमाग को छू लेने वाली पोस्ट पढ़ने को मिली ,इसके लिये भाई को धन्यवाद .... !!लावण्याजी आपसे थोड़ी सी जलन हो रही है ... ,इतनी सुंदर जगह पर आप जो रहती हैं !! मैं सोच में पड़ गई हूँ कि मैंने ये नजारा देखा हैं कहीं..? हाँ ,याद आया मुरादाबाद में .... वहाँ कई ऐसे स्थान थे जहाँ धूप पतों से छन कर आती थी । हरथला क़ॉलोनी की सड़क के दोनों ओऱ पेड़ लगे थे , जिनके तने आपस में इस तरह मिले थे मानों एक लम्बा मंडप बनाया गया हो हरा - भरा .....। पोस्ट का अंतिम चित्र ह्रदय विदारक !!!

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