Monday, November 3, 2008

मिलिये ओझाजी और पाधाजी से...[सयाना-2]

विद्या जब अर्थ-लिप्सा की राह पर चल पड़ती है तो फिर नीति-अनीति का ख्याल कहां रहता है। यही बात ओझा शब्द की अवनति के मूल में रही
Sorcerer
याना-बैगा की तरह ही हिन्दी में एक अन्य शब्द है ओझा जो झाड़-फूंक करनेवाले के अर्थ में प्रयुक्त होता है। आदिवासी समाज में ओझा की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। यहां ओझा, पंडित पुरोहित भी है और तांत्रिक-मांत्रिक भी। शारीरिक रोग से लेकर मानसिक रोग का इलाज करनेवाले चिकित्सक की भूमिका में भी वहीं है। पारिवारिक-सामाजिक समस्याओं का निराकरण करनेवाला परम ज्ञानी भी वही है। आमतौर पर इनका समाधान वह जादू-टोना और तंत्र-मंत्र के जरिये करता है।
झा  की महिमा आश्चर्यचकित  करनेवाली है । आदिवासी  समाज से हटकर सामान्यतौर  पर ओझा ब्राह्मण समूदाय  का एक उपनाम है। ओझा शब्द बना है  उपाध्याय से ।  संस्कृत ध्य  प्राकृतों में या   में बदलता है। उपाध्याय के  ओझा में तब्दील होने का क्रम कुछ  यूं रहा - उपाध्याय > उवज्झाय> उअज्झाय > उअज्झा > ओझा । दिलचस्प यह कि उपाध्याय से ओझा के अलावा भी ब्राह्मण समाज के अनेक उपना म निकले हैं । अपने आप में उपाध्याय भी एक उपनाम है। प्रायः सभी भाषाओं में स्वरलोप की प्रकृति होती है और इसी वजह से नए नए शब्द बनते हैं और शब्द संपदा समृद्ध होती है। उपाध्याय के उदाहरण में आप देख सकते हैं कि वर्णलोप के साथ साथ स्वरलोप होते होते नया शब्द बना ओझा। इस ओझा से का भी जब लोप हुआ तो रह गया झा और यह भी प्रतिष्ठित मैथिल ब्राह्मणों का उपनाम है। महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों में उपाध्याय उपनाम के साथ एक और रूप देखने को मिलता है – पाध्ये। यहां भी  वर्ण और स्वर का लोप हुआ है।
वध क्षेत्र में जा बसे खत्रियों खासतौर पर शाहजहांपुर के खत्रियों में अपने कुलगुरू या पुरोहित को पाधा या पाधाजी कहने की परिपाटी रही है।

ओझा महिमा


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 ओझाओं की जमात ने जिनमें बैगा और सयाने भी शामिल थे,  अध्यात्म से लेकर पराविद्या तक सब कुछ अपने कार्यक्षेत्र में समो लिया। तंत्र-मंत्र जादू-टोना,पंडिताई पुरोहिताई  और तो और वैद्यकी भी इनका शग़ल हो गई।
लखनऊ-कानपुर-बरेली-शाहजहांपुर में यह शब्द इसी अर्थ में खूब चलता है। ये पाधाजी भी दरअसल उपाध्यायजी ही हैं। कहने को ये सब एक हुए मगर किसी झा उपनामधारी मैथिल ब्राह्मण को पाधा कहलाना गवारा नहीं होगा और कोई पाधा खुद को पाध्ये कहलाना नहीं चाहेगा। और ये सब मिलकर कभी झाड़फूंक वाले ओझा के रूप में अपनी शिनाख्त नहीं कराना चाहेंगे। ओझा[ojha], झा , उपाध्याय और पाध्ये उपनामधारी कितने ही  विद्वानों के नाम हमें सहज ही याद आते हैं जिनका विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान रहा।
पाध्याय का अर्थ होता है गुरु, धार्मिक शिक्षक, अध्यात्म समझानेवाला। मूलतः यह शब्द बना है उप+अध्याय से। अध्याय का अर्थ होता है पढ़ना, किसी ग्रंथ का पाठ या खंड। व्याख्यान को भी अध्याय ही कहते हैं। संस्कृत के अधि उपसर्ग में उच्चता, उठना, उर्ध्व, ऊपर जैसे भाव होते हैं। इसमें इ+अच् प्रत्यय लगने से बना अध्ययः शब्द जिसमें ज्ञान, स्मरण , पाठ जैसे अर्थ निहित हैं। अधि में विभिन्न प्रत्ययों के योग से अध्याय अर्थात पाठ या खंड, अध्ययन यानी सीखना, पढ़ना, जानना, अध्यापक यानी गुरु, शिक्षक आदि। इसी तरह बना है अध्यापन अर्थात पढ़ाना या पारिश्रमिक के बदले शिक्षाज्ञान कराना। अर्थात ओझा खुद तो सयाने थे ही, शिष्यों को भी सयाना बनाते थे। गौर करें सयाना शब्द संस्कृत के संज्ञान से बना है। अर्थात सम्यक ज्ञान कराना।
स्पष्ट है कि उप+अध्याय शब्द में भी ज्ञान-बोध-शिक्षा जैसे भाव जुड़े हैं। यह शब्द प्राचीनकाल की गुरुकुल संस्कृति से पनपा है। गुरुकुलों के अधिष्ठाता प्रसिद्ध ऋषि-मुनि थे। प्रायः वे स्वयं अथवा अन्य विद्वान ब्राह्मण जो वेदोपनिषदों की दार्शनिक मीमांसा करते थे आचार्य कहलाते थे।  विद्यार्थी को वेदों के विशिष्ट अंश पढ़ाने के लिए नियमित वृत्ति अर्थात वेतन पर जो शिक्षक होते थे वे उपाध्याय कहलाते थे। कालांतर में शिक्षावृत्ति अर्थात पारिश्रमिक के बदले पढ़ानेवाले ब्राह्मणों  का पदनाम ही उनकी पहचान बन गया । इस तरह पाध्याय सरनेम बना। वेदपाठी होने की वजह ये शिक्षक समाज में कर्मकांड भी करने लगे। पुरोहित वर्ग की उत्पत्ति हुई। उपाध्याय/ओझा[ojha] शब्द का ध्वन्यार्थ ब्राह्मण तक सीमित न रहकर ब्राह्मणेतर समाजों के पुरोहित के लिए भी होने लगा। इसकी पहुंच आदिवासी समाज में भी हुई । वहां भी ज्ञानी, सयाने के तौर पर इस शब्द को स्वीकार्यता मिली। ओझा[ojha] व्यापक रूप से वहां उन सभी अर्थो में प्रतिष्ठित हुआ जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। कहां तो उपाध्याय में निहित अध्यापन और पौरोहित्य जैसा भाव और कहां ओझा और ओझाई जिसका अर्थ होता है झाड़-फूंक करनेवाला या जादूटोना करना। इस शब्द की भी अवनति हुई । ओझाओं की जमात ने अध्यात्म से लेकर पराविद्या तक सब कुछ अपने कार्यक्षेत्र में समो लिया । विद्या जब अर्थ-लिप्सा की राह पर चल पड़ती है तो फिर नीति-अनीति का ख्याल कहां रहता है। यही बात ओझा शब्द की अवनति के मूल में रही वर्ना तो आदिवासी समाज ने भी इस ओझा की महत्ता को मान देते हुए ही अपनाया था।

9 कमेंट्स:

Gyan Dutt Pandey said...

मैं सोचता हूं कि ओझा की उपाध्यायी (स्मार्त ग्रन्थों का अध्यापन) पहले आया और ओझाई (भूत-प्रेत विषयक) बाद में चिपकी।

अविनाश वाचस्पति said...

नोट प्राप्ति के लिए की गई वर्किंग

ओझा मूल शब्‍द अवनति सर्फिंग।

Udan Tashtari said...

मिल लिए...सही है!!

Dineshrai Dwivedi दिनेशराय द्विवेदी said...

शब्दों की अवनति या उन्नति लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। इधर चिट्ठा को भी कच्चा के साथ से अलग कर जब से हिन्दी ब्लागरों ने अपनाया है वह सम्मान पाने लगा है।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अब तारीफ़ क्या करें !
आपके लिए दुआएं निकलती हैं
दिल की गहराई से. आभार...!!
=========================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

हमारे "अभिषेक ऑझाजी " कहाँ हैँ ?
उनके सरनेम पर
अच्छी शोध की आपने अजित भाई -
- लावण्या

अभिषेक ओझा said...

लोगों को समझाना पड़ता था कि भाई हम झाड़ फूंक वाले नहीं हैं... अब इसे सहेज कर रख लेता हूँ, डाउट वालों को एक प्रिंटआउट निकाल के पकड़ा दूंगा :-)
बहुत-बहुत आभार आपका.

समीर यादव said...

ओझा जी के शुभचिंतकों का ही नहीं अपितु कई हम जैसे स्वयम्भू विद्वानों का शब्दकोष अर्थपूर्ण ढंग से समृद्ध हो रहा है..इस हेतु हम आभारी...से कुछ ज्यादा भारी हैं.....आप पर. कदाचित ऐसा होता है कि किसी शब्द विशेष की मीमांसा किए बगैर हम अवचेतन मन में जो धारणा कर लेते हैं, वह हमें उस शब्द के लिए पूर्वाग्रही बना देता है...ऐसी बीमारी का जड़-मूल से उपचार कर रही है...आपकी अभिनव प्रस्तुति.

विष्णु बैरागी said...

आप तो ब्‍लागियों के ओझा/उपाध्‍याय बन गए ।
अच्‍छी सामग्री है ।
बंगाल के 'मुखोपाध्‍याय' के मूल में भी 'उपाध्‍याय' ही है - 'मुख्‍य उपाध्‍याय' ने 'मुखोपाध्‍याय' का स्‍वरूप ले लिया ।

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