Friday, November 14, 2008

चार दिन की चांदनी ...[चन्द्रमा-3]

चांद शब्द का प्रसार संस्कृत से लेकर यूरोपीय भाषाओं में भी देखने को मिलता है उसी तरह चांद के कुछ अन्य नाम भी हैं जिनका प्रसार संसार की कई भाषाओं में हुआ है। प्राचीन मनीषियों ने कालगणना के लिए ऋतुओं को आधार बनाया मगर ऋतुओं की आवृत्ति का बोध करानेवाले काल की गणना उन्होंने सौर-व्यवस्था का अध्ययन कर धीरे-धीरे सीखी होगी। चांद ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चांद की ज़िद इन्सान को शरु से ही रही है और इससे बहुत कुछ सीखा भी है। 
प्राचीन मानव चांद की घटती-बढ़ती कलाओं में आकर्षित हुआ तो उसने इनमें दिलचस्पी लेनी शुरू की। स्पष्ट तो नहीं , मगर अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ववैदिक काल में कभी चन्द्रमा के लिए मा शब्द रहा होगा। संस्कृत में मा धातु का अर्थ होता है प्रदीप्त, किरण, रश्मि, सौन्दर्य,कांति आदि। जाहिर सी बात है ये तमाम गुण चांद में हैं। इस मा की छाया चन्द्रमा  में भी नज़र आती है। चन्द धातु से बने चन्द्र में चमक का भाव है। चन्द्र से पूर्व इसे मा कहते थे अर्थात चन्द्रमा पूर्णचन्द्र का पर्याय हुआ। इसीलिए बिना चांद की रात के लिए संस्कृत में अमा शब्द है। इसे अ+मा अर्थात जब चांद न हो...से भी समझ सकते हैं। संस्कृत – हिन्दी के अमावस्या, अमावसी, अमावस जैसे शब्द इससे ही बने हैं।
सा लगता है मापने के अर्थ में संस्कृत की मा धातु का जन्म भी चांद के अर्थ वाले मा से हुआ है। चंद्रकलाओं के घटते-बढ़ते क्रम से मनुष्य ने कालगणना शुरू की। यह उसका माप था। पूर्णचन्द्र के घटते जाने को कृष्णपक्ष और और फिर अंतर्ध्यान हो जाने को अमावस्या कहा गया। इसी तरह चन्द्रमा के बढ़ते क्रम को शुक्लपक्ष कहा गया। एक पूर्णचन्द्र से दूसरे पूर्णचन्द्र की अवधि को इस तरह मास कहा गया। मा यानी चन्द्रमा। इसीलिए पूर्णचन्द्र की रात्रि को पूर्णिमा कहा गया। चन्द्रमा के लिए संस्कृत में एक नाम चंन्द्रमस मिलता है। डा रामविलास शर्मा के अनुसार संस्कृत में मस कोई स्वतंत्र शब्द नहीं है। चन्द्रमस में आया मस मूल रूप से चन्द्र का ही प्रतीक है यानी मा का रूप जिससे मास शब्द बना अर्थात चन्द्रकलाओं के दो पखवाड़ों के बराबर की अवधि।
दिलचस्प बात यह कि संस्कृत में मास यानी महिने से चन्द्रमा का रिश्ता स्थापित करने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ती है मगर यही मास अवेस्ता में मा है और फ़ारसी में माह है। फ़ारसी में चन्द्रमा को भी माह कहते हैं और तभी मा , चन्द्रमा और मास की पहेली सुलझती नज़र आती है। हिन्दी उर्दू का महिना इसी मास की देन है। गौरतलब है कि संस्कृत का फारसी के में बदलता है। चन्द्रमा के लिए मा धातु का विस्तार यूरोपीय भाषाओं में भी दिखाई पड़ता है। प्राचीन भारोपीय भाषापरिवार में me(n)ses धातु है जिसमें चन्द्रमा, महिना जैसे भाव शामिल हैं। अब इस शब्द की समानता अन्य भारतीय-यूरोपीय भाषाओं के इन्हीं अर्थोवाले शब्दों से देखिये। अंग्रेजी में मून, moon प्राचीन इंग्लिश में मोना(mona), पुरानी जर्मन में मेनॉन, जर्मन में मॉन(mond),ग्रीक में मेने,संस्कृत में मा, मासः, स्लोवानी में मेसेसि, लैटिन में मैनेसिस, पुरानी आईरिश में मी आदि शब्द एक ही मूल के हैं और अर्थसाम्य और ध्वनिसाम्य महत्वपूर्ण है।
... चन्द्रमा के लिए मा धातु का विस्तार यूरोपीय भाषाओं में भी दिखाई पड़ता है। प्राचीन भारोपीय भाषापरिवार में me(n)ses धातु है जिसमें चन्द्रमा, महिना जैसे भाव शामिल हैं। ...
पूर्ववैदिक भाषा के मा अर्थात चन्द्रमा से बने मासः की तरह ही यूरोप में भी मून moon ही महीने का जन्मदाता है। अंग्रेजी में माह को मंथ month कहा जाता है। उर्दू-फारसी में मास, माह है जो हिन्दी में भी चला आया । माह चांद को कहते हैं। माहताब यानी चांद जैसे चमकदार ललाट वाला चेहरा। मेहताब एक किस्म की फुलझड़ी को कहते हैं। माहरुख यानी चांद सा मुखड़ा। फारसी में माहनामा कहते हैं मासिक पत्रिका को। प्रति दो पखवाड़ों के लिए माहवारी, माहवार ,मासिक,  जैसे शब्द प्रचलित हैं और तीस दिन की नियत अवधि के लिए अन्य कई अर्थों में भी इनका प्रयोग होता है। चांद ने भाषा को भी समृद्ध किया है । कवियों का प्रिय विषय चांद रहा है। इब्नेइंशा की शायरी मं सारी रूमानियत चांद की बदौलत ही है। मुहावरों में चांद है ईद का चांद, चांद सा मुखड़ा, चार दिन की चांदनी,चांद-सितारे तोड़ लाना वगैरह वगैरह।   

11 कमेंट्स:

जीवन सफ़र said...

आपने हमेशा की तरह बहुत अच्छी जानकारी दी है/शुभकामनायें उज्जवल चांदनी बिखेरती हुई आपकी लेखनी सतत हो/आपका कहना सही है कि कवियों का प्रिय विषय चांद रहा है। चांद ने तो हमेशा ही शेरो-शायरी,कविता,और नज्म मे अपनी चांदनी बिखराई है/एक गजल की पंक्ति है-आसमां मे खलबली है सब यही पुछा किये कौन फ़िरता है जमीं पर चांद सा चेहरा लिये/

Udan Tashtari said...

चाँद के बारे में इतनी जानकारी आपके पास है तभी तो आपके ब्लॉग पर हर समय शीतल चाँदनी की अनुभूति होती है. अब समझा जाकर कि मन इतना पावन पावन कैसे हो जाता है यहाँ पधार कर.

बहुत आभार.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

चाँद पर आपने स विस्तार लिखा और कई भाषाओँ मेँ "मा" शब्द की समानता को जतलाया -
शुक्रिया इतनी सारी जानकारी के लिये अजित भाई
स स्नेह,
- लावण्या

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

प्राणियों के मुख से निकला पहला शब्द मा ही है। और चांद से उस का रिश्ता चांद को मामा बना ही देता है।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

मोनो....मून....मंथ
गज़ब मंथन है भाई !
====================
आभार
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत अदभुत जानकारी मिलती इस ब्लॉग के माध्यम से

विष्णु बैरागी said...

चन्‍द्रमा की तो कुल सोलह कलाएं ही बताई गई हैं । आपने तो चन्‍द्रमा की कला-ही (कलाई नहीं) खेल कर रख दी है ।
आप जितना कुछ बता रहे हैं, काश, वह सब याद रखा जा सकता ।

अभिषेक ओझा said...

अजब-गजब ! वाह !

एस. बी. सिंह said...

हमेशा की तरह बहुत अच्छी जानकारी. धन्यवाद

हर्षदेव said...

लगातार पढ़ रहा हूं। कई पोस्ट तो बहुत अद्ïभुत बन पड़े हैं। आज चंद्रमा और चंदन वाला पोस्ट अमरउजाला ने भी छापा है। मुझे सबसे उल्लेखनीय बात लगती है, पहले से ही सजीली भाषा में अभिव्यक्ति और अर्थवत्ता के अनोखे गुण का विकास। आपके ब्लॉग में रोचकता भी है और सूचनारंजन भी। मैं इसे निरंतर उत्कृष्टï और अर्थवान होते देखकर अभिीूत हूं। मेरी हार्दिक शुभकामनाएं और वधाई।

Baljit Basi said...

आपने अंग्रेजी मून और मोनो को जोड़ने का अटकल लगाया है. आपके और हैरिटेज कोष के अनुसार मोनो की व्युत्पत्ति ग्रीक मैनोस से है. लेकिन हैरिटेज इसको आगे पूर्वभरोपी मूल 'मेन-' से निकला हुआ भी बता रहा है. इसी मूल से संस्कृत 'मानस', अंग्रेजी 'माइंड' और फारसी 'मैन्यहय' बने हैं. जब कि अंग्रेजी मून(moon) और संस्कृत 'मास' का मूल अलग से me(n)ses है. समझ नहीं आ रहा ग्रीक 'मैनोस'( mind) का एक (mono) के साथ कैसे जोड़ बैठेगा.

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