Monday, January 12, 2009

तलाश दूध के विकल्प की...[बकलमखुद-84]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा और रंजना भाटिया को पढ़ चुके हैं।   बकलमखुद के चौदहवें पड़ाव और बयासीवें सोपान पर मिलते हैं पेशे से पुलिस अधिकारी और स्वभाव से कवि पल्लवी त्रिवेदी से जो ब्लागजगत की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उनका चिट्ठा है कुछ एहसास जो उनके बहुत कुछ होने का एहसास कराता है। आइये जानते हैं पल्लवी जी की कुछ अनकही-

क पुलिस ऑफिसर के तौर पर अब तक मैं अपने आपको काफी कुछ इस परिवेश में ढाल चुकी थी!लेकिन फिर भी कभी कभी अपने लिए टाइम न निकाल पाना बहुत खलता था! खासकर कई बार ऐसा हुआ जब मैंने किसी को डिनर पर बुलाया और ऐन डिनर के टाइम पर अचानक कोई घटना हो गयी और मुझे घर से तुंरत निकलना पड़ा...मेहमानों को इस खेद सन्देश के साथ की " डाइनिंग टेबल पर खाना रखा है...प्लीज़ खाकर ही जाइयेगा"! कई बार गेस्ट मेरी अनुपस्थिति में खाना खाकर गए! जब दुसरे देशों के पुलिस सिस्टम के बारे में पढ़ती हूँ तो अच्छा लगता है की वहाँ सबके काम के घंटे तय हैं!लेकिन हमारे यहाँ ऐसा नहीं है! कई बार दो दो रात तक नींद नसीब नहीं होती! ऐसे में जब मैं मेहमानों को वक्त नहीं दे पायी या बाज़ार से कोई ज़रूरी शौपिंग नहीं कर पायी तो मुझे काफी खीज पैदा हुई ! लेकिन वहीं ये सोचने वाली बात है की एक सिपाही या हवलदार के पास तो कोई अर्दली भी नहीं होते, उन्हें अपने घर के काम भी खुद ही निपटाने पड़ते हैं! ऐसे में कोई वीकली ऑफ न होना उनके लिए वाकई तनाव का कारण है! हमारे यहाँ पुलिस कर्मचारी सचमुच बहुत स्ट्रेस में काम करता है! उन्हें ऑफ नहीं मिलता इसलिए सरकार उन्हें तेरह महीने की तनख्वाह देती है लेकिन पैसों से वक्त की कमी कैसे पूरी की जा सकती है!

नकली डॉक्टर, असली पुलिसः पुलिस में कई खट्टे मीठे अनुभवों के साथ कई मजेदार वाकये भी सामने आये!जिनमे से एक था जब हमने फर्जी डॉक्टरों की एक टीम को पकडा था!! हुआ यूं !एक बार मैं अपने थाने में बैठी हुई थी,तभी एक पास के किसी गाँव से एक व्यक्ति आया और उसने बताया कि गाँव में कुछ डॉक्टरों ने पिछले १० दिन से कैम्प लगा रखा है और १०-१० रुपये में इलाज कर रहे हैं!खबर में कुछ ज्यादा दम नहीं थी फिर भी थोडा अजीब लगा!सोचा जाकर देख आते हैं,अगर कुछ न भी हुआ तो गाँव का दौरा तो हो ही जायेगा ! अपने थाना प्रभारी को लिया और पहुँच गयी उस गाँव में!पता चला कि गर्मी की छुट्टियों में गाँव का सरकारी स्कूल बंद है तो हेडमास्टर ने डॉक्टरों को किराये पर दे दिया है और उसी में मेडिकल कैम्प चल रहा है! खैर उस तथाकथित मेडिकल कैम्प मैं पहुंचे ,देखा तो नज़ारा कुछ इस प्रकार था! दो कमरों के उस स्कूल में पहले दोनों कमरों में तीन तीन पलंग डले हुए थे जिन पर तीन लडकियां और दो लड़के लेटे थे और सभी को ड्रिप लगी हुई थी !अच्छा तो ये मरीज हैं..हमने सोचा!एक मरियल सा छोटे कद का लगभग २०-२१ साल का लड़का कुर्सी पर बैठा हुआ था जो देखने से मैकेनिक लग रहा था!शायद किसी मरीज का रिश्तेदार होगा...हमने पूछा कि डॉक्टर कहाँ है? तो वो बोला कि मैं ही डॉक्टर हूँ!हमने बमुश्किल अपनी हंसी रोकते हुए पूछा कि आपके साथ के बाकी डॉक्टर कहाँ हैं तो जवाब मिला " सभी बीमार हो गए हैं! कहकर सामने पड़े पलंगों कि तरफ इशारा कर दिया!अब हंसी रोकना नामुमकिन था! उसने बताया कि तेज़ गर्मी के कारण ये सब बीमार हो गए हैं!वो सभी लोग भी बमुश्किल १९-२० साल से ज्यादा के नहीं लग रहे थे!अब पूरा मामला डाउटफुल लग रहा था! उनसे उनकी डिग्री के बारे में पूछा तो एक डब्बे में से किसी काशी के विद्यालय कि फर्जी डिग्री निकाल कर बताई!हमने तुरंत सभी डॉक्टरों को उनके साजो सामान के साथ गाडी में बैठाया और थाने ले आये!

कम्पाऊंडर के भरोसे ठगीः थाने आकर पहले उनका असली परिचय प्राप्त किया जो थोड़े नानुकुर के बाद उन्होने इस प्रकार बताया! उनके असली नाम अब मुझे याद नहीं हैं लेकिन उनमे से एक लड़की ग्यारहवी क्लास में पढ़ रही थी,उसका चिकित्सा से इतना संबंध अवश्य था कि वो आगे चलकर डॉक्टर बनने की इच्छा रखती थी! दूसरी तीन साल पहले पढाई छोड़ कर घर बैठी हुई थी और तीसरी किसी ब्यूटीपार्लर में काम करती थी! लड़कों का परिचय कुछ यूं था,एक किसी ऑटो पार्ट्स की दुकान में मैकेनिक का काम करता था, दूसरा बी.कॉम. प्रथम वर्ष का छात्र था और तीसरा किसी डॉक्टर के क्लीनिक में ५ साल कम्पाऊंडर रह चुका था!एक मात्र वही था जो थोडी बहुत मरहम पट्टी करना जानता था! जब उनका सामान देखा तो थोडी बहुत बेसिक दवाइयों के अलावा एक रजिस्टर और कुछ पेम्फलेट्स मिले! रजिस्टर में उन मरीजों के नाम थे जो अब तक इलाज करवा चुके थे!

... जरा नज़र डालिए, मरीज और उनके रोगों पर! मोनू- उम्र दस वर्ष, हेपेताइतिस! सुनैना- उम्र आठ वर्ष, गुप्त रोग! रामजी लाला- पचास वर्ष, कैंसर! गोया कि मरीजों को स्टेथस्कोप लगाकर ही हर मर्ज पहचाना जा रहा था!...

नाम के आगे रोग लिखा हुआ था....जरा नज़र डालिए, मरीज और उनके रोगों पर! मोनू- उम्र दस वर्ष, हेपेताइतिस! सुनैना- उम्र आठ वर्ष, गुप्त रोग! रामजी लाला- पचास वर्ष, कैंसर! गोया कि मरीजों को स्टेथस्कोप लगाकर ही हर मर्ज पहचाना जा रहा था! कुल बीस मरीजों को ये देख चुके थे!यानी दो सौ रुपये कमा चुके थे!और उस पर सबसे मजेदार बात ये थी जिसके कारण ये सारे चिकित्सक दुखी थे कि अपने व्हाइट एप्रन और दवाइयाँ खरीदने में ये करीब दो हज़ार रुपये खर्च कर चुके थे उस पर खुद बीमार पड़े सो अलग! इन्हें दख इस बात का था कि काश मूल पूँजी ही निकल आती! इनके पेम्फलेट में भी संसार में जितनी बीमारियाँ हो सकती हैं सबका शर्तिया इलाज करने का दावा किया गया था!जी हाँ...ये एड्स का भी इलाज कर रहे थे!और वो भी बेचारे बिना पढ़े लिखे गाँव वालों को क्रोसिन और बी कॉम्प्लेक्स के टेबलेट्स देकर!इस मजेदार वाकये के पीछे ये आज कि बहुत बड़ी सच्चाई है कि आज भी गाँव के लोग ऐसे फर्जी डॉक्टरों का हर रोज़ शिकार हो रहे हैं!

शहरों से गांव न्यारेः पनी देहात की पोस्टिंग के दौरान गावों को बहुत करीब से देखने का मौका मिला और जो बात मुझे बहुत प्रभावित करती है वो ये कि स्वागत सत्कार और अपनेपन में शहर इन गावों से बहुत पीछे हैं! गावों में जाते ही गाडी के पीछे भागते और हाथ हिलाते बच्चे, एक लड़की को पुलिस यूनीफोर्म में देखने के लिए घूंघट किये अपने घरों से झांकती महिलायें और बैठाने के लिए झटपट अपने घरों के आँगन में खटिया बिछाते लोग...सचमुच बहुत अच्छा लगता था! पहले पहल मैं गाँव में किसी के घर पानी नहीं पीती थी क्योंकि मैं अपना फिल्टर पानी अपने साथ गाडी में रखती थी!और वही पीती थी पता नहीं गाँव का पानी क्या बीमारी लेकर आये! लेकिन बाद में मैंने महसूस किया कि मेरा पानी पीने से इनकार करना उन्हें दुःख पहुंचाता था! इसके लिए फिर मैंने एक रास्ता निकला! मैं पानी तो नहीं पीती थी लेकिन चाय के लिए पूछने पर उनसे गर्म दूध कि फरमाइश कर देती थी! चूंकि मैं चाय नहीं पीती हूँ इसलिए उबला दूध ही मुझे सबसे सुरक्षित लगता था! वो भी खुश और मैं भी!इससे उन्हें पानी न पीने कि शिकायत भी नहीं रहती थी! हांलाकि ये अलग बात है की उबला दूध मुझे नहीं भाता है!लेकिन इसी बहाने कैल्सियम तो मिल ही रहा है!पर दूध का भी विकल्प तलाश रही हूँ जो नुक्सान भी न करे और मुझे पसंद भी आये!आप कोई आइडिया दे सकें तो बताइए!

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23 कमेंट्स:

अजित वडनेरकर said...

बढ़िया अनुभव हैं। आप चाहें तो जब भी गांव जाएं, अपने साथ इंस्टैंट सूप के पाऊच रखें। आतिथ्य के आग्रह पर सिर्फ पानी उबलवाएं और उसमें इंस्टैंट पाऊडर मिलाकर सूप का मज़ा खुद भी लें और भोले ग्रामीणों को भी लेने दें...:)अलबत्ता रोजमर्रा के लिए दूध का विकल्प तो मट्ठा ही सुझा सकते हैं।

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

अब तक तो काफी कैल्सियम मिल गया होगा !!!

अरे भाई मेरा अनुभव है कि पुलिस वाले पहुँच जाएँ ,
तो सम्मान के साथ डर में भी एक पैर के बल पूरा गों खड़ा हो जाता है !!

मुद्दे की बात यह कि वास्तव में पुलिस के हर स्तर के कर्मचारियों के ऊपर काम का दबाव और बोझ बहुत ज्यादा है
, उनका व्यवस्थित कार्य -प्रणाली भी नहीं है!! मनोज्ञानिक ढंग से कार्य करने की क्षमता भी उनमे नहीं होती है !!!
शायद उनको इस तरह से प्रशिक्षित भी नहीं किया जाता है !!!


बढ़िया अनुभव लग रहे हैं!!!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत खूब पल्लवी जी! हमारे यहाँ हर चीज कम है, पुलिस कम है,
डाक्टर कम हैं, अदालतें कम हैं, स्कूल कम हैं। हम बस काम चलाते हैं किसी तरह से। बहुतायत है तो बेरोजगार लोगों की। हमारी व्यवस्था इस अंतराल को भर ही नहीं पा रही है।
जब कि पुलिस, अदालत, डाक्टर और स्कूल ये चार चीजें तो पूरी तरह सरकार की जिम्मेदारी होती हैं। जाने कब वो दिन आएगा जब ये पूरी हो पाएंगी। जब ये पूरी होगी तो शायद बेरोजगारी भी नही होगी।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

सरकार उन्हें तेरह महीने की तनख्वाह देती है लेकिन पैसों से वक्त की कमी कैसे पूरी की जा सकती है!

इस मुद्दे पर विचार किया जाना चाहिए.
आख़िर पुलिस की अपनी जिंदगी
एक इंसान की ज़रूरतों से सर्वथा
अलग कैसे हो सकती है ?
====================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

कंचन सिंह चौहान said...

police walo ke stress ke vishay me pata chala...! sahi hai dosh kahi.n vyavastha me hai...!

श्रुति अग्रवाल said...

पल्लवी जी चिंता छोड़ गाँव का पानी पीने लगिए कुछ भी नहीं होगा। इलेक्ट्रानिक मीडिया में गाँव-देहात का चक्कर काटते हुए हमें भी पहले-पहल ऐसा ही लगता था ...लेकिन कब तक यह सिलसिला चलता। सिंहस्थ के समय यह सिलसिला तोड़ा और यकीन मानिए अब तो डालडा छोड़कर कुछ भी खालू असर नहीं पड़ता। वैसे आपकी जिंदगी काफी दिलचस्प है।

दिवाकर प्रताप सिंह said...

अरे वाह ...! तो आप भी चाय नहीं पीतीं, फिर तो हमारी तरह आप को भी अभ्यागतों के साथ कुछ न कुछ झिझक होती ही होगी।
शब्दों के साथ आपका सफ़र (जिन्दगी का ) भी अच्छा लगा। शुभकामनाओं के साथ .....

डॉ .अनुराग said...

देर से आने के लिए के लिए मुआफी .बंगलौर में होने के कारण ब्लॉग जगत से दूर था.....इसलिए आज आपकी जीवन यात्रा के पिछले पन्ने भी पढ़े....कैल्सियम मिला है..कम से कम फोटो देखकर तो नही लगता....हमने गाँवों में लोगो को पजामे के ऊपर इंजेक्शन लगाते देखा है....ख़ुद गाँव वाले ऐसे कई काम्पौंदर को डॉ डॉ कहकर बुलाते है....
पुलिस की जिंदगी वाकई कठिन है ...मैंने अपने एक बेहद करीबी रिश्तेदार के व्यक्तित्व को पुलिस में जाने के बाद बदलते हुए देखा है...फ़िर भी मुझे लगता है भारत में जनसँख्या के अनुपात के हिसाब से पुलिस में मेन- पॉवर के साथ साथ संसाधन की भरी कमी है ओर महिला पुलिस की भी....कई थानों में उनके लिए अलग से व्यवस्था नही है..कुछ जरूरी अवश्यक्ताओ की..खास तौर से महिला पुलिस कर्मियों के लिए......ओर हाँ एक बात ओर अब गाँव वैसे गाँव नही रहे.....उनमे भी मिलावट आ गयी है...शायद एम् पि के गाँव अब भी वैसे रहे हो.....हमारे प्रदेश के तो नही रहे......
चलते चलते अजित जी को जन्म दिवस की शुभकामनाये !

ताऊ रामपुरिया said...

बेहद सुन्दर और प्रवाहमय़ी भाषा मे आपके संस्मरण पढना बेहद अच्छे लग रहे हैं. एक पुलिस आफ़िसर की जिंदगी के उतार चढाव और निजि पलों को आपकी खास भाषा शैली मे पढना अच्छा लगता है.

रामराम.

Amit said...

बहुत ही सुंदर ...काफ़ी अच्छा लग रहा है पढ़ कर....जारी रखे..

Gyan Dutt Pandey said...

फर्जी डाक्टरी के लिये ज्यादा दिमाग नहीं चाहिये!
यानी कि हम नटवरलाल होते तो चैन से मुद्रा कमाते! काश यह पोस्ट बहुत समय पहले लिखी-पढ़ी गयी होती! :-)

Suresh Varma said...
This comment has been removed by the author.
Shiv Kumar Mishra said...

आपने मजेदार अनुभव बताये. गावों में चिकित्सा व्यवस्था ऐसी ही है कि गाँव वालों को बेवकूफ बनाने के लिए लोग ऐसा ही करने की कोशिश में लगे रहते हैं. लेकिन इन बेचारों ने जितना पैसा लगाया था, उतना मिल जाना चाहिए था. हर मर्ज़ का शर्तिया इलाज करने का दावा करने वाले बहुत लोग मिल जाते हैं.

अभिषेक ओझा said...

झोलाछाप डॉक्टरों की लिस्ट बड़ी अच्छी थी... बेचारे !

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

ऐसा ही एक किस्सा याद आ रहा है एक फोटोग्राफर का कैमरा लुटेरो ने लूट लिया वह बेचारा क्या करता डाक्टर बन गया और एक गावं मे दूकान खोल ली एक दिन बहुत परेशान था पूछने पर बताया मैंने एक मरीज़ को दवा दी और वह ठीक हो गया . तो परेशान क्यों हो उसका जबाब मिला की मैं यह भूल गया उसे दवा कौन सी दी

सुशील कुमार छौक्कर said...

सच पहले तो हँसी और फिर गाँवो की याद। यह सच है गाँवो में बहुत प्यार सम्मान मिलता हैं। पुलिस विभाग में ऐसी परेशानियाँ होती हैं ये तो हमें पहले से ही पता था। पर सरकार भी कुछ करती नही।

महेन said...

गाँव के नाम पर मैं कोई भी चीज़ खा-पी जाऊँ मगर हाँ शायद आप जिन गावों की बात कर रही हैं उनमें और मेरे गाँव में फ़र्क हो. मजेदार किस्सागो हैं आप.

विष्‍णु बैरागी said...

'पैसों से वक्‍त की कमी कैसे पूरी की जा सकती है?' वाक्‍य मर्मान्‍तक पीडा व्‍यक्‍त करता है। ईश्‍वर आपको विभाग में ऐसी पदस्‍थापना दें कि आप पुलिसकर्मियों को राहत दिलवा सकें।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

क्या खूब लिखा है ये किस्सा भी पल्लवी जी -ऊम्र ,अनुभव के सामने क्या है भला ? :)
पुलिसकर्मीयोँ की स्थिति का सत्य आप ही ने बतलाया है -
अजित भाई, को साल गिरह मुबारक -
और बकलमखुद के लिये विशेष आभार
स स्नेह,
लावण्या

अनूप शुक्ल said...

बेहतरीन, रोचक संस्मरण। पुलिस की नौकरी सच में बड़ी तनावपूर्ण होती है। दूध का विकल्प अब चाय है। पीना शुरू कर दीजिये।

डा० अमर कुमार said...


वाह, अति-आनन्दम.. मेरे पास तो वान-रिप्ले का विचित्र किन्तु सत्य सरीखा संस्मरणों का ज़खीरा है.. मुआ टाइम नहीं है, जो मुल्क में उपलब्ध स्वास्थ्य-सुविधाओं के खुले मखौल को सामने लाऊँ !
धन्यवाद पल्लवी, मोज़ैम्बो खुस हुआ :)

रंजना said...

वाह ! आनंद आ गया पढ़कर.........इतना सजीव वर्णन है कि सारे दृश्य नयनाभिराम हो गए.

ANIL YADAV said...

नमस्कार मैं आपका बहुत सम्मान करता हूं।

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