Tuesday, June 1, 2010

[नामपुराण-13] श्रोता से श्रोत्रिय तक…

... श्रोता से नजदीकी रिश्ता है श्रोत्रिय का। प्राचीनकाल में ज्ञानार्जन का जरिया श्रौतकर्म अर्थात श्रवण, मनन और चिन्तन ही था ...

ब्राह्मणों के चिर-परिचित उपनामों या सरनेम में श्रोत्रिय का शुमार भी है। विद्याव्यसन और अध्यापन से ही जुड़ा हुआ शब्द है श्रोत्रिय जिसका अर्थ है श्रुति अथवा वेदों का अध्ययन करनेवाला ब्राह्मण। राजबली पाण्डेय के हिन्दू धर्मकोश में पद्यपुराण के हवाले से एक श्लोक श्रोत्रिय शब्द की व्याख्या करता है-जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते। वेदाभ्यासी भवेद् विप्रः श्रोत्रियस्त्रिभिरेव च।। अर्थात वह जन्म से ब्राह्मण जाना जाता है, संस्कारों से द्विज, वेदाभ्यास करने से विप्र होता है और तीनों से श्रोत्रिय है। पुराणों में कल्प के साथ एक वैदिक शाखा अथवा छह वेदांगों के साथ वैदिक शाखा का अध्ययन कर षट्कर्मों लगे ब्राह्मण को श्रोत्रिय कहा गया है। पुराणों में श्रोत्रिय ब्राह्मणों के कर्तव्यों और अधिकारों का उल्लेख है। यही नहीं राजा के प्रमुख कर्तव्यों में यह ध्यान रखना भी शामिल था कि उसके राज्य में कोई श्रोत्रिय बेसहारा न रहे। श्राद्ध आदि कर्मों में श्रोत्रिय निष्णात होते थे। श्रोत्रिय के श्रोती, सोती, स्रोती जैसे रूप भी प्रचलित हैं।
श्रोत्रिय शब्द बना है श्रु धातु से जिसमें मूलतः सुनने का भाव है। इससे ही बना है श्रुत अर्थात सुना हुआ, ध्यान लगा कर सुना हुआ, समझा हुआ, जिसे हृदयंगम किया गया हो, जाना हुआ, समझा हुआ, किसी का नाम लेकर पुकारा हुआ उच्चारण आदि। श्रुति भी इसी मूल से आ रहा है। श्रुति कन्या का नाम भी होता है इसका अर्थ है सुनना। चूंकि कानों से सुना जाता है इसलिए कान को भी श्रुति कहते हैं। अफवाह, सुनी-सुनाई, मौखिक बात अथवा अन्य समाचार भी श्रुति के दायरे में आते हैं। वेदों को भी श्रुति कहते हैं क्योंकि इनका ज्ञान सुनकर ही हुआ। इसी तरह वेदमंत्र भी श्रुति कहलाते हैं। ars संगीत में भी श्रुति का बड़ा महत्व है। एक स्वर का चतुर्थांश श्रुति कहलाता है अर्थात यह स्वर का कण होता है। श्रु का रिश्ता ही श्रवण अर्थात सुनने की क्रिया से भी है। पुराणों में श्रवणकुमार की कथा भी आती है जो अपने दृष्टिहीन माता-पिता के अत्यंत सेवाभावी थे। राजा दशरथ के तीर से उनकी मृत्यु हो गई थी।
श्रु धातु से ही बना है श्रोता शब्द जो बोलचाल में खूब इस्तेमाल होता है। जो श्रुत करने की क्रिया से गुजर रहा है वही श्रोता है। दिलचस्प बात यह कि श्रोता में शिष्य या विद्यार्थी का भाव भी है। श्रोता बना है संस्कत के श्रोतृ से जिसका भावार्थ है छात्र। प्राचीनकाल में पढ़ाई लिखाई में सुनने का ही महत्व था। विद्यार्थियों को खूब घोटा लगवाया जाता था। पुस्तकें प्राचीनकाल में भी होती थीं किन्तु यांत्रिक छपाई की सुविधा उस दौर में नहीं थी इसलिए पुस्तकों की सीमित हस्तलिखित प्रतियां होती थीं जो या तो बड़े विद्याकेंद्रों, गुरुकुलों में होतीं या फिर आचार्यों, पंडितों के पास। विद्यार्थियों को सस्वर इन ग्रंथों का पाठ कराया जाता था। फिर इन पर मनन-चिंतन और शास्त्रार्थ होता था। बाद में कुशाग्र विद्यार्थी जब खुद विद्यादान करने के लायक बन जाते तब वे उन ग्रंथों की विवेचना करते जिन्हें उनके शिष्य लिपिबद्ध करते। श्रोतृ का ही एक अन्य रूप हुआ श्रोत्रिय जिसमें वेदप्रवीण का भाव था। मूलतः इसका अर्थ भी विद्याव्यसनी या छात्र ही था। बाद में वेद-वेदांगों के ज्ञान में पारंगत हो चुके ब्राह्मण को श्रोत्रिय कहा जाने लगा।

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6 कमेंट्स:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ब्राह्मण, द्विज और विप्र इन तीनों का अंतर और तीनों के सम्मिलन से श्रोत्रिय। यह बात पहली बार जानी।

Mansoor Ali said...

अच्छे श्रोता वही कहाते है,
सिर जो अपना हिलाए जाते है,
अच्छे वक्ता की भी यही पहचान,
सिर श्रोता का जो धुनाते है.
--
mansoorali hashmi

प्रवीण पाण्डेय said...

श्रोता होना कितना कठिन हो गया है । इस उपाधि के लिये ओलम्पिक करवाना पड़ेगा ।

बालमुकुन्द अग्रवाल,पेंड्रा said...

हिंदी भाषा को अपने मूल से जोडनें की प्रयास कर रहे है आप. आपके इस ब्लाग को देखकर मुझे निरूक्त,निघण्टु और अमरकोष की याद आ गई. आधुनिक युग में यह ब्लाग उसी दिशा में एक कडी है.बधाई स्वीकारें.

ali said...

देखिये ये कहना उचित नहीं है कि पारंगत ब्राम्हणों को श्रोत्रिय कहा जाने लगा ! मुझे लगता है कि 'श्रुतियां' 'लिखित परंपरा' के आविर्भाव से पहले की कडियां हैं इसलिये उक्त समय के सारे विज्ञजन /विद्वान / मनीषी / पारंगत , प्रथमतः श्रोत्रिय हुए ! यानि कि सभी अध्येतागण पहले श्रोत्रिय हुए तभी ब्राह्मण हो पाए उसके बाद द्विवेदी ...चतुर्वेदी वगैरह वगैरह की विशेषज्ञता निर्धारित हुई !

तर्क ये है कि अगर 'श्रुतियां' 'लिखित परंपरा' से पहले हैं तो विद्वानों का नामकरण भी इसी क्रम में होगा ...आशय ये कि जब श्रुतियां थीं तो सभी श्रोत्रिय थे फिर यही श्रोत्रिय ब्राह्मण कहलाये !

जहाँ तक श्रोताओं का प्रश्न है वे ब्राह्मण और अन्य सभी वर्णों के लोग हुए !

मैंने वो कहा जो मुझे काल क्रम में सही लगता है लेकिन जरुरी नहीं कि मेरा सोचना सही ही हो !

अजित वडनेरकर said...

@अली
आपकी बात सही है। हमने इस शब्द के संदर्भ में ग्रंथों में उल्लिखित बातों का हवाला दिया है। श्रौत परम्परा के तहत हर विद्यार्थी (किसी भी वर्ण का) श्रोत्रिय ही है।

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