Wednesday, June 9, 2010

प्रस्ताव और स्तुति

किसी योजना की शुरुआत प्रस्ताव रखने से होती है अर्थात कार्ययोजना का परिचय, उसकी तारीफ ही प्रस्ताव है। यूं आप्टे कोश के मुताबिक प्रस्ताव का अर्थ है प्रवचन का प्रयोजन।
किसी योजना अथवा कार्यक्रम के परिचय के लिए हिन्दी में प्रस्तावना, भूमिका या आमुख जैसे शब्द प्रचलित हैं जिनमें प्रस्तावना का सर्वाधिक इस्तेमाल होता है। यह बना है। प्रस्तावना में शुरुआत या आरम्भ का भाव है। किसी भाषण, आलेख या अन्य दस्तावेजों के आरम्भिक अंश को भी प्रस्तावना कहते हैं। नाटक की प्रस्तावना आमतौर पर नट-नटी या सूत्रधार के द्वारा पेश की जाती है। प्रस्तावना के मूल में मूलतः प्रशंसा या तारीफ का भाव है। प्रस्तावना शब्द के मूल में है संस्कृत का स्तवः जिसका अर्थ है प्रशंसा करना, विख्यात करना, जानकारी देना आदि। स्तवः शब्द बना है स्तु धातु से जिसमें सराहना, तारीफ, प्रशंसा का भाव है। किसी की कीर्ति बखानना भी इसके अंतर्गत आता है। परिचित होना, जानकारी कराना भी इसके दायरे में आता है। याद रहे जब भी हम किसी व्यक्ति का परिचय कराते हैं या जानना चाहते हैं तो यही कहा जाता है-आपकी तारीफ! जाहिर है किसी समाज में किसी व्यक्ति का औपचारिक परिचय उस व्यक्ति के गुणों के जरिये ही होता है। दुर्गुण कभी किसी व्यक्ति का परिचय नहीं हो सकते। इसमें यह भाव भी निहित है कि हमें लोगों के सद्गुण ही देखने चाहिए, दुर्गुण नहीं। इसी तरह परिचय के दौरान नाम जानने के लिए भी शुभनाम शब्द का प्रयोग किया जाता है। नाम में छुपी अच्छाई से शुभता के साथ जानने का यह मंगलकारी भाव जाहिर करता है कि मनुष्य को जानने के लिए उसके उज्जवल पक्ष का सामने आना ही महत्वपूर्ण है। कलुषता तो छुपती नहीं है। दुर्गुण जल्दी ही सामने आ जाते हैं और बुराई सिर चढ़ कर बोलती है।
स्तु धातु से ही स्तुति शब्द बना है जिसका मूलार्थ प्रशंसा ही है। आत्मस्तुति यानी आत्म प्रशंसा। जो कुछ काबिले तारीफ है उसे हिन्दी में स्तुत्य कहते हैं। स्तुति का अर्थ ऐसी काव्यरचना भी है जिसमें किसी की प्रशंसा हो। स्तोत्रम् शब्द इसी कड़ी में आता है। यह संस्कृत का श्लोक होता है जिसे गाया जाता है। इसे स्तुतिगान भी कह सकते हैं। आजकल स्तुतिगान की अर्थवत्ता में  चमचागीरी का भाव भी शामिल हो गया है। हिन्दी में इसके लिए स्तोत्र शब्द प्रचलित है। स्तु में निहित प्रशंसा, जानकारी जैसे भावों पर गौर करें। स्तु से बने स्तवः में प्र उपसर्ग लगने बनते हैं प्रस्ताव और प्रस्तावना जैसे शब्द। किसी योजना की शुरुआत प्रस्ताव रखने से होती है अर्थात कार्ययोजना का परिचय, उसकी तारीफ ही प्रस्ताव है। यूं आप्टे कोश के मुताबिक प्रस्ताव का अर्थ है प्रवचन का प्रयोजन। जाहिर है प्रस्ताव किसी कार्य-कारण की वजह से ही रखा जाता है। पेश करने के लिए प्रस्तुत शब्द भी हिन्दी में आमफहम है। प्रस्तुत का मूलार्थ है जिसकी प्रशंसा की गई हो किन्तु अब इसका अर्थ है किसी चीज या तथ्य को सामने लाना, उजागर करना अथवा पेश करना। इसमें शुरुआत करने या आरम्भ करने का भाव स्पष्ट है। जिसे पेश किया जाए उसे प्रस्तुति कहते हैं। आजकल यह रचनाधर्म से जुड़ा शब्द बनता जा रहा है जैसे नाटक की प्रस्तुति। किसी भी रचना को प्रस्तुति कहा जा सकता है जो प्रदर्शित है। इसमें नाटक, कविता, गीत, चित्र से लेकर शिल्प तक आ जाते हैं।

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8 कमेंट्स:

आचार्य जी said...

आईये जानें ... सफ़लता का मूल मंत्र।

आचार्य जी

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

स्तु में स और त शब्दों का प्रयोग है। इस का सत् से कोई संबंध है?

प्रवीण पाण्डेय said...

अभी तक तो अनजाने में प्रयोग कर लेते थे ये शब्द । अब मन में आने के बाद जब ये शब्द अपने प्रयोग के बारे में प्रश्न करेंगे, इनको न्याय दे पाना कठिन हो जायेगा ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

प्र्स्ताव और स्तुति का बढ़िया ताल-मेल बैठाय है आपने!

Mansoor Ali said...

हर हाथ को काम मिलेगा यह प्रस्तावित है,
हर काम का दाम लगेगा यह संभावित है.

प्रस्तावना अच्छी कौन लिखेगा, है निर्भर,
अब कौन यहाँ किससे कितना प्रभावित है.

ali said...

अजित भाई आपकी व्याख्या से सहमति से आगे एक तुक्का हमारा भी... पता नही क्यों हमें ऐसा लग रहा है कि 'स्तु' लिख्नंनें में 'अ' अथवा 'इ' भले ही साइलेंट हों पर उच्चारण में , (अ)स्तु और (इ)स्तुति ये दोनों अक्षर ध्वन्यात्मक रूप मौजूद हैं ! यहां 'स्तु' का अर्थ है 'हो' जरा गौर करिये तथास्तु / एवमस्तु वगैरह वगैरह !

बहरहाल अंतिम निर्णय आपका जो भी हो !

रंजना said...

प्रस्तावना में भी स्तुति का भाव होगा ,कभी सोच न पायी थी..
सुन्दर ज्ञानवर्धक आलेख सदैव की भांति...
बहुत बहुत आभार..

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

इस शमा को जलाए रखें।
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