Monday, June 21, 2010

कुलटा बन गई पतुरिया

kathak

लो कभाषा का एक शब्द है पतुरिया। प्रचलित अर्थों में पतुरिया स्त्रीवाची शब्द है जिसमें दुश्चरित्रा या नाचने गाने वाली औरत का भाव है। बोलचाल की भाषा में शब्दों का किस तरह अर्थान्तर होता है उसका उदाहरण है यह शब्द। यहां इसके साथ अर्थसंकोच या अर्थापकर्ष (अर्थावनति) हुई है। पतुरिया शब्द बना है संस्कृत के पात्र शब्द से जिसका अर्थ है नाट्यकर्म करनेवाला। अभिनय करनेवाला। संस्कृत के पात्र का स्त्रीवाची देशज रूप बना पात्रा या पात्री यानी वह स्त्री जो नारी पात्रों का अभिनय करे। पात्रा या पात्री के लोकरूप हुए पातर, पातुर, पातरिया, पातुरी अथवा पतुरिया। गौरतलब है कि नाट्यशास्त्र में एक साथ कई कलाओं का उल्लेख है। जिसमें नृत्य भी शामिल है। प्राचीन काल से ही प्रदर्शनकारी कलाओं में घरेलु स्त्री की उपस्थिति अच्छी नहीं समझी जाती थी। सामान्य स्त्री मनोरंजन माध्यमों में सार्वजनिक भूमिका नहीं निभाती थी बल्कि यह काम पेशेवर नर्तकियों का था। चाहे जितनी गुणी नृत्यांगना हो, उसे हीन नजरिये से ही देखा जाता था। ऐसी उच्च श्रेणी की नृत्यांगनाएं भी रूपजीवा और देहजीवा के ठप्पे के साथ रहती थीं। ऐसे में नाट्य की पात्र के तौर पर एक स्त्री कलाकार के हिस्से में या तो नृत्य ही आता था अथवा कमनीय, कामोद्दीपक नायिका का अभिनय।
श्मिवाजपेयी सम्पादित कथक प्रसंग में आचार्य बृहस्पति लिखते हैं-“यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि कथक लोग अपनी बेटियों या बहुओं नाच की शिक्षा कभी देते नहीं थे, क्योंकि वे समझते थे कि यह वेश्याओं का कार्य है। वेश्याओं को वे निस्संकोच नचाते थे, उनसे धन लेने में भी उन्हें संकोच नहीं था, परन्तु उनकी बहू-बेटियां स्वं कथक-नृत्य की राधा बने यह उन्हें सह्य नहीं था। स्वयं न तो उन्हें लखनववी कन्हैया बनने में संकोच था, न अपने पुत्रों कन्हैया बनाने में।” आचार्य बृहस्पति ने भी पतुरिया शब्द को संस्कृत पात्र का अपभ्रंश माना है। शार्ङगदेव कृत संगीत रत्नाकर के अनुसार नृत्य का पात्र नारी ही हो सकती है। मुग्धा, मध्यमा और प्रगल्भा नारी को पात्र बनाया जाता था। ऐसी स्थिति में गणिका ही  नायिका या नारी पात्र का काम कर सकती थी। नाचनेवालियों द्वारा नाटकों में भूमिकाएं करने की परम्परा बहुत प्राचीन रही है और इसीलिए पात्रा, पात्री से घिसघिस कर इसके पतुरिया, पातुर जैसे विभिन्न रूप प्रदर्शित हुए जिनमें एक पेशे z5का भाव था न कि सम्मान का। कालांतर में तो पतुरिया शब्द सिर्फ नाचनेवाली का पर्याय हो गया और बाद में खुले आम रंडी, कुलटा या वेश्या को पतुरिया का नाम मिल गया। यानी बेबात ही पतुरिया पतिता बन गई।
पात्र शब्द बना है संस्कृत के पात्रम् से जिसकी व्युत्पत्ति पा धातु में ष्ट्रन प्रत्यय लगने से हुई है। संस्कृत की पा धातु में मुख्यतः पालन करना, समाहित करना, पान करना, शासन करना, योग्य होना, आकार देना, आधार प्रदान करना, सहारा देना, धारण करना या स्थापित रखने का भाव है। पिता, पालक, पति जैसे बहुप्रचलित शब्दों के मूल में भी यही पा धातु है। संस्कृत के पात्रम् में नृत्य-नाट्य की अर्थवत्ता भी है और पीने का प्याला अथवा बर्तन का भाव भी। गौरतलब है कि किसी पदार्थ को स्वयं में धारण करने या आधार प्रदान करने की वजह से बरतन को पात्र कहा जाता है और किसी काल्पनिक चरित्र को धारण करने या खुद में स्थापित करने की वजह से कोई कलाकार नाटक का पात्र कहलाता है। पात्र वही है जो धारण करे या किसी भूमिका का पालन करे। बरतन रूपी पात्र की भूमिका उसमें उपस्थित द्रव या वस्तु को सुरक्षा प्रदान करने की है। पा धातु में निहित रक्षा का भाव पाल में स्पष्ट होता है। पाल अर्थात मेड़, दीवार। किसी बर्तन की गोलाई और गहराई उसकी चारों ओर की पाल की वजह से होती है। इसी तरह किसी ऐतिहासिक या काल्पनिक चरित्र को खुद में स्थापित करना, उसे आधार प्रदान करना एक कुशल पात्र का ही काम है। एक कुशल कलाकार किन्ही नाटकीय चरित्रों को खुद में पालता-पोसता है, उसकी खूबियों और वास्तविकता की रक्षा करने का दायित्व उस पर होता है।
पात्र से भी कुछ शब्द जन्में हैं जैसे कृपापात्र, दानपात्र, कुपात्र, सुपात्र आदि। आमतौर पर किसी के प्रति आभार जताने के संदर्भ में अक्सर धन्यवाद का पात्र जैसा वाक्यांश इस्तेमाल होता है। गौर करें कि यहां धन्यवाद को ग्रहण करने, आभार को आधार प्रदान करनेवाले व्यक्ति के लिए पात्र शब्द का प्रयोग है। यानी जो धन्यवाद के लायक हो, उसे ग्रहण कर सके, आधार दे सके वह है धन्यवाद का पात्र। कृपापात्र वह है जिस पर कृपा की जाए।

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13 कमेंट्स:

Amitraghat said...

बेहतरीन..हमेशा की तरह.."

अभय तिवारी said...
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अभय तिवारी said...

अजित भाई,

पात्र के नीचे आप्टे जी ने आप्टे जी के कोष में इसके आगे लिखा है -पाति रक्षति। इस पा का अर्थ सम्भवतः रक्षा से है, जिस ओर आप इशारा कर रहे हैं, तो शायद इसका अर्थ होगा - जो रक्षा करता है। लेकिन पा का यहाँ पर एक दूसरा अर्थ पातिन्‌ से भी हो सकता है जो पत्‌ (गिरना, बहना) धातु से सम्बन्धित है और जिसका अर्थ है उड़ेला हुआ। अब इसमें ध्यान देने योग्य बात है कि इसमें पा के साथ त्र लगा हुआ है। इस त्र में त्रै धातु का तारने का भाव है, उद्धार करने का। 'त्राहि माम' पुकार का अर्थ होता है.. मुझे बचाओ।

ये मेरा दावा नहीं है.. बस एक प्रस्तावना है.. सम्भव है निराधार हो..

या फिर आप्टे के द्वारा दी हुई दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार पा+ष्ट्रन्‌। यहाँ पा धातु का अर्थ है पीना। मतलब हुआ पीने का बर्तन या प्याला।

पालक अगर पा धातु से निकल रहा है तो पाल्‌ धातु बेचारी किस को जन्म दे रही है?

अजित वडनेरकर said...

अभय भाई,
पा ध्वनि (या धातु) ही महत्वपूर्ण है। मिलती-जुलती अर्थध्वनियों वाली धातुएं होती हैं। पा में रक्षित करने, पालने का भाव आप्टेकोश में भी स्पष्ट है। इसे उपसर्ग के साथ देखें-परि-पा, प्रति-पा यानी पालना, बचाना, स्थिर रखना आदि। मूल भाव पा में है। विशिष्ट शब्दों के लिए अधिक शुद्ध धातुओं की खोज हुई। पालक के लिए पाल् इसी कड़ी की धातु है। किन्तु इसमें पा निहित है और इसीलिए पा में निहित रक्षा का भाव भी पाल् में है। ....और गौर करें पा में निहित पीने का भाव भी ग्रहण करने, आधार बनाने या रक्षित करने (गटकने, हड़पने) के अर्थ में प्रकट हो रहा है। गौरतलब है धातु परिशुद्ध अवस्था में कभी नहीं मिलती, उसे तो खोजा जाता है। एक से अधिक रूपों की खोज सिर्फ संदर्भित शब्द के परिशुद्ध मूल तक पहुंचने की प्रक्रिया है। प्रकृति में भी धातुएं कहां शुद्ध मिलती हैं? सोना, चांदी, ताम्बा, जस्ता सभी के पार्थिव यौगिक रूप ही मिलते हैं। इनमें मूल या धातु की तलाश होती है।

प्रवीण पाण्डेय said...

जो शब्द प्रशम दृष्ट्या असम्बन्द्ध से लगते हैं, उनको भी आपस में गूँथ कर रख देते हैं आप ।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत सुन्दर।
---------
इंसानों से बेहतर चिम्पांजी?
क्या आप इन्हें पहचानते हैं?

रंजना said...

कितनी बड़ी बात कही आपने....
किसी अन्य चरित्र को कुशलता पूर्वक अभिनीत करने की पात्रता ,कितना विशिष्ठ गुण है...पर पतुरिया....
सचमुच इसे सम्मानीय दृष्टि से तो नहीं ही देखा जाता...

बड़ा ही रोचक लगा यह विवरण...
आपका बहुत बहुत आभार...

Mansoor Ali said...

'प' से भी प्राश्रय जो न पाए; पतुरिया, [पालक, पिता]
'प' के लिए तो ख़ुद को नचाये; पतुरिया, [पुरुष,पति,पैसा]
'राधा' भी बन के मान न पाए; पतुरिया, [उत्तम पात्र]
'कु' को भी जो 'सुपात्र' बनाए, पतुरिया.

mansoorali hashmi

ali said...

जानकारी अच्छी लगी !

निर्मला कपिला said...

दिलचस्प जानकारी धन्यवाद्

सुशीला पुरी said...

आपका ब्लॉग हम शब्द प्रेमियों के लिए अनोखा है ।

हमारीवाणी.कॉम said...

आ गया है ब्लॉग संकलन का नया अवतार: हमारीवाणी.कॉम



हिंदी ब्लॉग लिखने वाले लेखकों के लिए खुशखबरी!

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हिमान्शु मोहन said...

अजित जी,
आपका ब्लॉग देखता रहता हूँ अक्सर, शब्दों और भाषा में रुचि होने के कारण। आपके द्वारा सप्रयास बहुत अच्छे आलेख प्रस्तुत किए जाते हैं, जिनके लिए आप बधाई के पात्र हैं।
आज का आलेख भी बढ़िया है, मगर यह कहने के लिए ठहर गया कि पतुरिया का भी प्रचलित अर्थ ही है यह जो आप ने उभारा है आज, और ऐसा ही "कुलटा" के साथ भी है।
"कुलटा" का शाब्दिक अर्थ "कुलम् अटतीति सा कुलटा" के अनुसार 'ऐसी (उच्च) कुलीन महिला जो कुल (उच्च) में जाए' अर्थात् जो मायके और ससुराल दोनों ही उच्च कुलों को सुशोभित करे, होने के स्थान पर कालान्तर में 'ऐसी महिला जो कुल-कुल में जाए' अर्थात् 'जो किसी एक कुल में न रहे' का हो गया।
यानी शाब्दिक 'कुलटा' भी भावार्थ वाली 'कुलटा' बन कर शब्द से अर्थ के कुल में जाते-जाते कहाँ से कहाँ पहुँच गई!

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