Sunday, June 27, 2010

आज़ादी और ज़ात-बिरादरी

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ज़ादी किसे प्यारी नहीं होती। यह एक ऐसा लफ़्ज़ है जिसमें खुद्दारी है, हौसला है, भरोसा है, सुकूं है और सबसे बढ़कर है वो रूमानियत जिसके लिए खुदा ने हमें ज़िंदगी बख़्शी है। यूं कहें कि ज़िंदगी का नाम ही आज़ादी है। विडम्बना यह कि हमने जीने का जो ढर्रा अपनाया हुआ है, वह हमें आज़ादी नहीं देता। हमने खुद को न जाने कितनी तरह की बेड़ियों में जकड़ रखा है। आज़ादी की चाह सबमें होती है क्या इनसान, क्या जानवर। हमारी बनिस्बत जानवर किन्हीं मामलों में ज़्यादा आज़ाद है। यह भी सच है कि आज़ादी का असली मज़ा तब है जब आपने गुलामी झेली हो। बंदिशों के बिना आज़ादी बेलज्ज़त है। आज़ाद शब्द हिन्दी का अपना हो चुका है मगर इसकी आमद सैकड़ों साल पहले बरास्ता फारसी हुई थी। इंडोयूरोपीय भाषा परिवार की भारत-ईरानी शाखा का यह शब्द मूलतः पूर्ववैदिक शब्दसमूह से विकसित हुआ है।
ज़ाद का अर्थ है स्वाधीन, स्वतंत्र, खुदमुख्तार, आत्मनिर्भर, बंधनमुक्त, बेपरवाह, निडर, स्वामी वग़ैरा वग़ैरा। आज़ाद यानी फ़ारसी का aazaad ( āzād ) मध्यकालीन फारसी में आज़ात āzāt था। प्राचीन अवेस्ता में भी इसका रूप यही था। समझा जा सकता है कि फ़ारसी में यह अवेस्ता से इसी रूप में पहुंचा और फिर की तब्दीली में हो गई और Birdsआज़ात ने आज़ाद का रूप लिया। मूलतः आज़ाद में ज़ाद शब्द छुपा हुआ है। आदिस्वरागम के तहत ज़ाद में जुड़ने से बनता है आज़ाद। फ़ारसी उर्दू में ज़ाद का अर्थ होता है पीढ़ी, नस्ल, वंश, आदि। ज़ादः भी इसी कड़ी में आता है जिसका अर्थ है पुत्र, संतति, उत्पन्न, जन्मा हुआ आदि। हरामज़ादा, नवाबज़ादा, साहबज़ादा जैसे शब्द इसी कड़ी में हैं। ज़ाद का पूर्वरूप होता है ज़ात। जिसकी अर्थवत्ता कहीं व्यापक है और इसमें वंश, नस्ल, पीढ़ी के अलावा कुल, बिरादरी, शख्सियत, व्यक्तित्व, स्वभाव, चरित्र, अस्तित्व, कौम जाति आदि समाए हुए हैं।
देवनागरी के वर्ण में उत्पन्न, वंशज, अवतीर्ण या पैदा होने का भाव है। संस्कृत की जन् धातु में पैदा होना, उत्पन्न होना,  उगना, उठना, फूटना, होना, बनना, निर्माण-सृजन ( जन्म के संबंध में ), रचा जाना, परिणत होना जैसे अर्थ छुपे हैं। जन् से ही बना है जीव अर्थात प्राणी। जीव वह है जिसका जन्म हुआ है। जन् धातु रूप का ही रूपांतर अवेस्ता में ज़ात होता है। याद रहे वर्णक्रम की सभी ध्वनियां एक दूसरे में परिवर्तित होती हैं। इस तरह जन् का रूपांतर ज़ात होता है। इसमें भी उद्भव, जन्म जैसे भाव हैं। कुल, परिवार, वंश, गोत्र के अर्थ में संस्कृत-हिन्दी का जाति शब्द भी जन् धातु से ही निकला है। ज़ात या जाति में जन्म के अनुसार अस्तित्व के रूप का भाव है। आज़ाद के अर्थ में जन् से बने ज़ात या जाति शब्दों पर गौर करें तो साफ है कि जो प्रकृति से उद्भूत है वह स्वतंत्र है और मौलिक रूप में उसका अस्तित्व है। अवेस्ता के आज़ात और फारसी के आज़ाद में यही भाव है। जन्म से कोई गुलाम या पराधीन नहीं होता। जन् में उगने, उत्पन्न होने के भाव पर ध्यान दें तो स्पष्ट होता है कि उगना या उत्पन्न होना अपने आप में किसी छाया, पृष्ठभूमि या आंतरिकता से बाहर आना है। यह भाव ही स्व अथवा आज़ादी से ज़ुड़ता है। इस तरह देखें तो जन् से उद्भूत ज़ात> (आ)ज़ात> आज़ात >आज़ाद का सफ़र बेहद दिलचस्प है। हिन्दी का जन, जनता जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं। अंग्रेजी के जेनरेशन, जेनरेटर, जेनरिक जैसे शब्दों समेत यूरोपीय भाषाओं की शब्दावली को इस धातु ने समृद्ध किया है। हिन्दी का जीवन और फारसी का ज़िंदगी इसी शृंखला में हैं।
न् से हिन्दी, फारसी, उर्दू में कई शब्द बने हैं। अरबी-फारसी में महिला के लिए एक अन्य शब्द है ज़न जिसकी रिश्तेदारी इंडो-ईरानी भाषा परिवार के जन् शब्द से है जिसमें जन्म देने का भाव है। ज़नानी या ज़नान जैसे रूप भी प्रचलित हैं। संस्कृत में उत्पन्न करने, उत्पादन करने के अर्थ में जन् धातु है। इससे बना है जनिः, जनिका, जनी जैसे शब्द जिनका मतलब होता है स्त्री, माता, पत्नी। जिससे हिन्दी-उर्दू के जन्म, जननि, जान, जन्तु जैसे अनेक शब्द बने हैं। भाषा विज्ञानियों ने ज़न, ज़नान, जननि जैसे शब्दों को प्रोटो इंडो-यूरोपीय मूल का माना है। क्वीन, रानी, राज्ञी, महाराज्ञी जैसे शब्द इसी मूल के हैं। ध्यान रहे ज्ञ का तिलिस्म आर्य तो जानते थे मगर इस व्यंजन में छुपी ज+ञ अथवा ग+न+य जैसी ध्वनियां हजारों सालों से आर्यों के विभिन्न भाषा-भाषी समूहों को भी वैसे ही प्रभावित करती रही हैं जैसे आज भी करती हैं। हिन्दी भाषी ज्ञ का उच्चारण ग्य करते हैं तो गुजराती मराठी भाषी ग्न्य या द्न्य और आर्यसमाजी ज्न। स्पष्ट है कि ज्ञ में छुपा ज ही रानी के स्त्रीवाची अर्थात जननि होने का प्रतीक भी है। क्वीन इसी कड़ी में आता है। गाईनेकोलॉजी  शब्द भी इसी शृंखला का हिस्सा हैं। जिस जन् में आज़ादी, स्वतंत्रता का भाव है उसी से जन्मे जनक के हिस्से में आज़ादी पैदाईशी तौर पर मिली मगर जिस जननी ( औरत ) ने उसे जन्म दिया था उसके हिस्से में नियति ने गुलामी लिख दी।

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12 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

बढ़िया आलेख.

kailash said...

जननी ( औरत ) ने उसे जन्म दिया था उसके हिस्से में नियति ने गुलामी लिख दी।' ये नियति कोण है ?

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर आलेख!
यह आलेख कई सामाजिक प्रश्नों पर भी सोचने को विवश कर रहा है।

Divya said...

उसी से जन्मे जनक के हिस्से में आज़ादी पैदाईशी तौर पर मिली मगर जिस जननी ( औरत ) ने उसे जन्म दिया था उसके हिस्से में नियति ने गुलामी लिख दी।

This is the irony !

I wonder how long we women have to live like this.

निर्मला कपिला said...

बहुत बडिया जानकारी धन्यवाद्

डॉ० डंडा लखनवी said...

व्युत्पत्ति संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी के लिए धन्यवाद |
सद्भावी --डॉ० डंडा लखनवी

राजकुमार सोनी said...

आलेख कई सवाल उठाता है। आपको एक अच्छी पोस्ट के लिए बधाई।

ali said...

आज़ादी ,खुदमुख्तारी , स्वतंत्रता , बेपरवाह ...महज़ एक 'ख्याल' है या इसे 'दैहिक' होना है ?

प्रवीण पाण्डेय said...

ज शब्द अपने अर्थ की तरह ही फैल गया है ।

Mansoor Ali said...

'जन' 'जातियों' के 'जीव' है, करनी में उलझ कर,
'जननी' को अपनी आज भुलाए हुए है हम.
'आज़ाद' थी सिफत कभी, परवाज़ काम था,
'ज़न' के मुरीद होके 'ज़नाने' हुए है हम.

आशुतोष कुमार said...

क्या इस ज का जी से भी कोई रिश्ता हो सकता है? जी -हजूरी वाले जी से?
हालांकि आज़ादी का तो उलटा है वो .

Mrs. Asha Joglekar said...

बहुत सुंदर जानकारी पूर्ण और कितने ही नये अर्थों की सृष्टी करने वाला आलेख ।

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