Monday, February 20, 2012

किसी कंपेश को जानते हैं आप ? [कम-3]

पिछली कड़ियाँ-Balance1.‘काम’ में ‘कमी’ की तलाश [कम-1] 2.पहचानिए हिन्दी के दो कमीनों को…[कम-2]

पने कभी कंपेश पढ़ा या सुना है? ‘लंकेश’, ‘सुकेश’, ‘मुकेश’, ‘काकेश’, ‘लोकेश’, राकेश जैसे संज्ञा-नाम हमारे आस-पास रोज देखने सुनने को मिलते हैं, मगर ‘कंपेश’ शायद कभी नहीं सुना होगा । वैसे ‘कंपेश’ इन शब्दों की तरह संज्ञा न होकर, सामासिक शब्द है । मराठी ने फ़ारसी के ‘कमोबेश’ का ऐसे देशी संस्कार में ढाला कि यह ‘कंपेश’ हो गया । देशी संस्कार मिलने के बाद शब्दों का इतना रूपान्तर हो जाता है कि उनकी शिनाख्त मुश्किल होती है कि इनका मूल क्या था । ‘लालटेन’ ( लैन्टर्न ), ‘लपटन’ ( लैफ्टीनेंट ), पलटन ( प्लाटून ) या ‘गिरमिट’  (एग्रीमेन्ट) जैसे शब्दों से यह अंदाज़ नहीं लगता कि ये मूल रूप से अंग्रेजी के हैं । ऐसे शब्दों के लिखित रूप स्थिर होने के बाद परिनिष्ठित भाषा में भी जगह पा लेते हैं । मगर बोलियों में एक ही शब्द के कई रूप प्रचलित रहते हैं और जब उसी रूप में इन्हें लिखा जाता है जैसे- कंपेश, कम्बेश, कमबेश, कंबेस आदि तो दिलचस्प मामला बनता है । इन्हें पढ़ कर यह अंदाज़ लगाना कठिन है कि ये फ़ारसी के ‘कमोबेश’ शब्द के बहुरूप हैं । ‘कमोबेश’ हिन्दी में खूब प्रचलित है जो कमज्यादा, न्यूनाधिक या थोड़ा-बहुत के अर्थ में प्रयुक्त होता है। मालवी-राजस्थानी में इसके थोड़ा-घणा या थोड़ो-घणों रूप प्रचलित हैं। मराठी में यह ‘उणे-अधिक’ या ‘अधिक-उणे’ है जिस पर विस्तार से पिछली कड़ी में चर्चा हो चुकी है ।
कमोबेश के बेश का आधार
फ़ारसी का ‘कमोबेश’ शब्द मूलतः सामासिक पद है और फ़ारसी के ‘कम’ और ‘बेश’ शब्दों से मिल कर बना है। ‘कम’ की व्युत्पत्ति अवेस्ता के ‘कम्ना’ से हुई है । मूलतः ‘कम्ना’ का ‘कम्’ उसी पूर्ववैदिक भाषा से जन्मा है जिससे इच्छा, चाह, अभिलाषा के अर्थ वाला वैदिक भाषा का कम् जन्मा । ‘कम्’ से ही ‘कामना’ शब्द बनता है, ‘काम’ यानी इच्छा है । ‘कम्’ में अवेस्ता का ‘उन’ प्रत्यय लगने से ‘कम्ना’ बनता है । यह ‘उन’ भी पूर्ववैदिक रूप है और वैदिकी में इसका ‘ऊण’ रूप देखने को मिलता है जिसका अर्थ है अल्प, थोड़ा, न्यून आदि । इस तरह ‘कम्ना’ में इच्छा से ‘कम’ का भाव स्थिर होता है और बाद में फ़ारसी के ‘कम’ शब्द में सिर्फ़ ‘कमी’ का भाव रूढ़ हो जाता है । यह तो हुई ‘कमोबेश’ के ‘कम’ के बारे में संक्षिप्त सी बात क्योंकि विस्तार से चर्चा पहली कड़ी में हो चुकी है । सवाल है कि कमोबेश के ‘बेश’ का आधार क्या है ?
बेहतर हुआ ‘बेश’
बेश फ़ारसी मूल का शब्द है और हिन्दी समेत भारत की अनेक बोली-भाषाओं में प्रचलित है । कमोबेश के विभिन्न रूपान्तरों की ऊपर चर्चा हो ही चुकी है । अधिक, ज्यादा के अर्थ में ‘बेशी’, ‘बेसी’, ‘बेश’, ‘बेस’ जैसे शब्द हिन्दी वाक्यों में प्रचलित हैं । ‘बेश’ का मूलाधार भी ‘कम्ना’ की तरह ही अदृष्य है । बेश के दो आधार नज़र आते हैं । पहला है वशिष्ट > बहिश्त > की अगली कड़ी बेश के रूपान्तर का । बहिश्त का अर्थ अवेस्ता में श्रेष्ठ होता है । दूसरा आधार । ‘बेश’ दरअसल फ़ारसी का ‘बेह’ है जिससे हम ‘बेहतर’, ‘बेहतरीन’ जैसे शब्दों के ज़रिए खूब परिचित हैं । ‘बेह’ का मतलब होता है बढ़िया, भला, अच्छा आदि। ‘बेह’ की व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘भद्र’ bhadra से मानी जाती है जिसका मतलब, शालीन, भला, मंगलकारी आदि होता है। फारसी में इसका रूप ‘बेह’ हुआ। अंग्रेजी में गुड good के सुपरलेटिव ग्रेड( second ) वाला ‘बेटर’ better अक्सर हिन्दी-फारसी के ‘बेहतर’ का ध्वन्यात्मक और अर्थात्मक प्रतिरूप लगता है । इसी तरह ‘बेस्ट’ best को भी फारसी ‘बेहस्त’ beh ast पर आधारित माना जाता है। अंग्रेज विद्वानों का मानना है कि ये अंग्रेजी पर फारसी, प्रकारांतर से इंडो-ईरानी प्रभाव की वजह से ही है ।
‘बेश’ में है अधिकाई
यूँ बैटर-बेस्ट को प्राचीन जर्मन लोकशैली ट्यूटानिक का असर माना जाता है जिसमें इन शब्दों के क्रमशः बेट bat (better) और battist (best) रूप मिलते हैं। इस ‘बेहस्त’ का ही रूपान्तर ‘बेश’ हुआ है जिसमें ‘बेह’ की अर्थवत्ता सुरक्षित बनी रही है । फैलन के उर्दू-इंग्लिश कोश के मुताबिक ‘बेश’ में बेहतर का भाव है । उत्तम का भाव है । ‘बेश’ में आधिक्य, अधिकाई, वृद्धि, ज़ोर जैसे भाव भी हैं । ‘बेशी ज़मीन’ यानी ज्यादा भूमि (सरप्लस लैंड), ‘बेशी माल’ यानी ज़रूरत से ज्यादा सम्पदा, बेशी जुर्माना यानी गैरकानूनी सज़ा आदि शब्दों में बेशी की पहचान आसानी से हो रही है । अत्यधिक मूल्यवान वस्तु के लिए आए दिन हम ‘बेशकीमती’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं । इस समास का पहला हिस्सा ‘बेश’ है जिसमें आधिक्य का भाव बेशकीमती के अत्यधिक मूल्यवान अर्थ में स्पष्ट हो रहा है । सो, स्पष्ट है कि कमोबेश का बेश भी आखिर इंडो-ईरानी परिवार का और संस्कृत-हिन्दी का नज़दीकी रिश्तेदार निकला । ‘कमोबेश’ शब्द थोड़े-बहुत फ़र्क़ के साथ प्रायः देश की सभी आर्य भाषाओं में प्रचलित है ।
कम-ज्यादा भी डटा है
मोबेश की तरह ही ‘कम-ज्यादा’ पद भी हिन्दी में खूब वापरा जाता है । मराठी-मालवी में यह ‘कम-जास्त’ हो जाता है । ‘कम’ शब्द जहाँ भारत-ईरानी भाषा परिवार की फ़ारसी ज़बान से आया है वहीं ‘ज्यादा’ शब्द सेमिटिक भाषा परिवार की अरबी ज़बान से हिन्दी में दाखिल हुआ है जिसमें अधिकता, आधिक्य का भाव है । ज्यादा सेमिटिक धातु z-y-d से बना है जिसमें वृद्धि का भाव है । इसका सही रूप है ‘ज़ियादह्’ दरअसल अपने सेमिटिक रूप में तो यह ‘ज़िआदा’ ( ज़ादा ) है मगर फ़ारसी में पहले से ही ‘ज़ादा’ मौजूद है जिसकी वजह से अरबी के ‘ज़ादा’ का फ़ारसीकरण ‘ज़ियादह्’ हुआ । अरबी में ज़ियादत का हिन्दी में जियाज़त और फिर ज़ियासत होते हुए जास्ती यह रूप स्थिर हुआ । बोलचाल की भाषा में जास्ती भी अधिकता, आधिक्य के अर्थ में बोला जाता है । वैसे जास्ती नक्को, जास्ती खाने का, जास्ती पढ़ने का जैसे वाक्य-प्रयोगों वाला जास्ती मुम्बइया असर है । वैसे जास्ती शब्द हिन्दी की विभिन्न बोलियों में स्वतंत्र रूप में है । ज़ियादह् से बना ‘ज्यादा’ हिन्दी में ज्यादा चलता है । जबर्दस्ती के अर्थ में ज़्यादती शब्द भी खूब प्रचलित है । कम – ज्यादा की तरह थोड़-ज्यादा भी चलता है । ‘ज़िआदा’ का एक रूप ‘ज़ाइद’ भी होता है जिसका अर्थ है अधिक, बहुत अधिक, प्रचूर ।
न्यूनता में ‘ऊनता’ 
मोबेश में जो ‘कम’ है वह अवेस्ता के ‘कम्ना’ से बना है, इस पर पिछली कड़ी में विस्तार से कहा जा चुका है । ‘कम्ना’ में ‘उन्’ प्रत्यय का प्रयोग हुआ है और यह ‘कम् + उन्’ से बना है । ‘कम्ना’ में निहित ‘न्यून’, ‘कुछ’, ‘थोड़ा’ या ‘कमी’ का भाव दरअसल ‘कम्’ से नहीं बल्कि ‘उन्’ प्रत्यय से आ रहा है । कोश में इसकी तुलना अपूर्ण, त्रुटिपूर्ण, अतिरिक्त, कुछ, अपर्याप्त या न्यून की अर्थवत्ता वाले संस्कृत विशेषण ‘ऊन’ से की गई है । गौरतलब है कि वैदिकी और अवेस्ता लगभग जुड़वाँ प्रकृति की भाषाएँ हैं। फिर भी विद्वान वैदिक भाषा को अवेस्ता से कुछ प्राचीन ठहराते हैं । ज़ाहिर है गाथाअवेस्ता का ‘उन’ और वैदिक भाषा का ‘ऊन’ एक ही है । कम के अर्थ में संस्कृत-हिन्दी का जो ‘न्यून’ शब्द है उसकी अर्थवत्ता और व्युत्पत्ति भी इसी ‘ऊन’ से सिद्ध होती है। ‘न्यून’ बना है नि + ऊन ‘अच्’ प्रत्यय लगने से । इस तरह फ़ारसी के ‘कम’ और संस्कृत के ‘न्यून’ के बीच समीकरण भी बनता है और व्युत्पत्तिक रिश्ता भी ।
फ़र्क़ ‘उन्नीस-बीस’ का
संस्कृत में ‘ऊन’ का प्रयोग प्रत्यय की तरह भी होता है जिसका अर्थ है अभाव, अधूरा कम, अपर्याप्त, अपूर्ण आदि । इस ‘ऊन’ का एक रूप मराठी का उणे है जिसका अर्थ भी कम होता है । ‘कम-ज्यादा’ या ‘कमोबेश’ की तर्ज़ पर मराठी में ‘उणे-अधिक’ पद प्रचलित है । संख्यावाचक कमी दर्शाने के लिए भी ऊन का प्रयोग भी संस्कृत में खूब होता है और हिन्दी संख्याओं में भी यह नज़र आता है जैसे उन्नीस, उन्तीस, उनचालीस, उनपचास, उनसाठ, उन्हत्तर आदि । यह जो उन है इसमें निहित कमी के भाव पर विचार करें तो उपरोक्त संख्याओं का अभिप्राय एक कम बीस, एक कम तीस, एक कम चालीस यहाँ अचानक स्पष्ट हो जाता है । संस्कृत में यह क्रिया और भी स्पष्टता से नज़र आती है । एक + ऊन = एकोन अर्थात एक कम , विंशति = बीस । एकोनविंशति > उनविंशति ( पाली ) एकूनवीस > एकूनवीसती ( प्राकृत) ऊणवीसई > ऊनवीसा > उनवीसई ( अपभ्रंश ) एगूणवीस > एगूणीस > उणवीस > उन्नीस । मराठी में उन्नीस के स्थान पर एकोणीस का चलन है और इसमें भी ‘एकोन’ यानी एक + ऊन ( एक कम ) को साफ़ पहचाना जा सकता है । किन्ही दो चीज़ों में न्यूनाधिक फ़र्क़ बताने के लिए उन्नीस-बीस का अन्तर जैसा मुहावरा बोला जाता है । गौर करें, यहाँ भी एक-कम का ही महत्व अर्थात ऊन की ही महत्ता पता चल रही है । 

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10 कमेंट्स:

धीरेश said...

थोड़ा-घणा या थोड़ा-घना हमारे यहां मुज़फ़्फ़रनगर में भी खूब बोला जाता है। कंपेश जरा मजेदार है।

प्रवीण पाण्डेय said...

ऐसा लग रहा है कि केले के बीच का गूदा निकाल कर कोई खा गया...कमोबेश..कंपेश

आशा जोगळेकर said...

कंपेश तो पहली बार सुना । कमोबेश के अर्थ में इसे प्रयेग किया जाता है वह भी मराठी में । बाकी इसके दोनों शब्दों कम और बेश के उद्गम के बारे में खासी विस्तृत जानकारी मिली ।

आखिर आपकी पुस्तक मैने खरीद ही ली । उपहार में देने के लिये यह अनुपम है ।

आशा जोगळेकर said...

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आशा जोगळेकर said...

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आशा जोगळेकर said...

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आखिर आपकी पुस्तक मैने खरीद ही ली । उपहार में देने के लिये यह अनुपम है ।

Mansoor Ali said...

'शब्दों का सफ़र' 'जाल' पे जारी है निरंतर,
नज़राने लिए 'ज्ञान' के हरसू से कमोबेश.

अब 'मन' की उदासीनता लिखने नहीं देती,
'शब्दों का सफ़र' देता है अलफ़ाज़ कमोबेश.

और भी है.... http://aatm-manthan.com

Udan Tashtari said...

ये एक नया शब्द मिला जी...

विष्णु बैरागी said...

'कम्‍पेश' पहली ही बार जाना और इसके बारे में जाना भी पहली ही बार।

रोहित said...

जैसे कम-ज़्यादा के लिए उन्नीस-बीस का प्रयोग होता है वैसे ही बीस का प्रयोग स्वतंत्र रूप में भी होता है ज़्यादा के अर्थ में। तो इस उन्नीस-बीस का जो बीस है उसका कमोबेश के बेस से कुछ लेना-देना?
शायद उन्नीस बीस मुहावरे के लिए बीस संख्या को इसीलिए चुना हो क्योंकि बीस और बेस में साम्यता है। या फिर इसका कुछ उल्टा हुआ हो।

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