Monday, June 4, 2012

कुलीनों का पर्यावरण

Environment-Image

हि न्दी की पारिभाषिक शब्दावली के जो शब्द बोलचाल में खूब प्रचलित हैं उनमें पर्यावरण का भी शुमार है । यहाँ तक कि यह शब्द अब कुलीन वर्ग की शब्दावली में भी जगह बना चुका है क्योंकि पर्यावरण पर बात करना आभिजात्य होने का लक्षण है । जिस तरह वातावरण शब्द से आशय वात + आवरण यानी पृथ्वी के चारों और हवा के आच्छादन से है मगर इसका प्रयोग परिस्थिति, परिवेश, माहौल जैसे आशय प्रकट करने के लिए भी होता है । पर्यावरण का प्रयोग ऐसी अभिव्यक्तियों के लिए भी होने लगा है । पर्यावरण शब्द, वातावरण की तुलना में बहुत व्यापक है । हालाँकि माहौल, परिस्थिति जैसे भावों को अभिव्यक्त करने के लिए वातावरण की तुलना में पर्यावरण का प्रयोग कम होता है । हमारे आस-पास के जीवन घटकों जिसमें, समाज, आचार-विचार, जीवजगत, वनस्पतिजगत, बोली-भाषा और जलवायु आदि का समावेश है, उन सबका आशय पर्यावरण में प्रकट होता है ।
र्यावरण शब्द बना है आवरण में परि उपसर्ग लगने से । आवरण में छा जाने, आच्छादन, कवर, ढकने का भाव है । आवरण शब्द भी वरण में उपसर्ग लगने से बना है । वरण में चुनने, छाँटने जैसे भावों के अलाव ढकने, पर्दा करने जैसे भाव हैं जो आवरण में व्यक्त हो रहे हैं । वरण के मूल में संस्कृत की वृ धातु है । जिसका अर्थ है घेरना, लपेटना, ढकना, छुपाना और गुप्त रखना । ध्यान रहे आवरण में किसी आकार को चारो ओर से ढकने, घेरने का भाव है । संस्कृत का परि उपसर्ग बड़ा महत्वपूर्ण है और इसकी व्याप्ति तमाम भारोपीय भाषाओं में है । परि उपसर्ग जिन शब्दों में लगता है, उनमें वह शब्द के मूल भावों को बढ़ा देता है । मूलतः परि में चारों ओर, घेरा, सम्पूर्ण जैसे आशय हैं । परिनिर्वाण, परिभ्रणण, परिकल्पना, परिचर्या, परितोष जैसे शब्दों से यह स्पष्ट हो रहा है ।
भाषाविज्ञानियों नें प्रोटो भारोपीय भाषा परिवार में वृ के समकक्ष वर् wer धातु की कल्पना की है जिससे इंडो-यूरोपीय भाषाओं में कई शब्द बने हैं । आवरण के अर्थ वाले अंग्रेजी के कवर, रैपर जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं । वृ बने वर्त या वर्तते में वही भाव हैं जो प्राचीन भारोपीय धातु वर् wer में हैं । गोल, चक्राकार के लिए हिन्दी संस्कृत का वृत्त शब्द भी इसी मूल से बना है। गोलाई दरअसल घुमाने, लपेटने की क्रिया का ही विस्तार है। वृत्त, वृत्ताकार जैसे शब्द इसी मूल से बने हैं । संस्कृत की ऋत् धातु से भी इसकी रिश्तेदारी है जिससे ऋतु शब्द बना है । गोलाई और घूमने का रिश्ता ऋतु से स्पष्ट है क्योंकि सभी ऋतुएं बारह महिनों के अंतराल पर खुद को दोहराती हैं अर्थात उनका पथ वृत्ताकार होता है। दोहराने की यह क्रिया ही आवृत्ति है जिसका अर्थ मुड़ना, लौटना, पलटना, प्रत्यावर्तन, चक्कर खाना आदि है ।

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5 कमेंट्स:

अरूण साथी said...

sarthak jankari

वाणी गीत said...

रोचक !

प्रवीण पाण्डेय said...

आज आवरण पर से आवरण हट गया।

Mansoor Ali said...

इज्ज़त बची हुई कि कोई 'आवरण' तो है,

'प्रदूषित' वर्ना अपने सभी आचरण तो है,

"चर्चा" कुलीन अब नहीं करते ग़रीब की,

स्तर बुलंद जिसका वो ''पर्यावरण'' तो है.

सुनते है आजकल ये बहुत ही ख़राब है,

'माहौल' जिसका नाम वो 'वातावरण' तो है.

more at..........http://aatm-manthan.com
--mansoor ali hashmi [from Kuwait]

आशा जोगळेकर said...

पर्यावरण की तरह आप भी छा गये हैं । विस्तृत और सार्थक चर्चा ।

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