Saturday, June 30, 2012

‘दीन’ में समाया ‘ध्यान’ [1]

religion

क-सी ध्वनि वाले शब्द भी भिन्न अर्थवत्ता की वजह से भाषा को समृद्ध बनाते हैं । हिन्दी में दो “दीन” बसे हुए हैं । एक “दीन” वह है जिसका साथ देना मानवता का धर्म है । ‘दीन’ यानी दुखी, वंचित, विपन्न व्यक्ति । एक अन्य ‘दीन’ वह है  जिसका पालन कर हम मानवीय बने रह सकते हैं । ‘दीन’ यानी धर्म । पहला ‘दीन’ हिन्दी की तत्सम शब्दावली का हिस्सा है और दूसरा ‘दीन’ विदेशज शब्दावली में शामिल है । अक्सर ईमानदारी, नैतिकता को अभिव्यक्त करते हुए हम “दीनो-ईमान” और “दीन-धर्म”, “दीन-मज़हब” जैसे मुहावरों का प्रयोग करते हैं । “दीन-दुनिया” भी ऐसा ही मुहावरा है जिसका अर्थ है धर्म और समाज । तात्पर्य यह कि जीवनयापन करते हुए धर्म और समाज दोनो का ध्यान रखना । जो ऐसा नहीं करता, उसे गाफिल, बेफिक्र, बेगाना, बेहोश, पागल समझा जाता है । ऐसे लोगों के बारे में ही “दीन-दुनिया का होश न रहना” जैसा मुहावरा कहा जाता है । हिन्दी शब्दसागर में “दीन-दुनिया” का अर्थ लोक-परलोक बताया गया है, जो मेरे विचार में सही नहीं है । इन सभी मुहावरों में ‘दीन’ शब्द बराबर मौजूद है जिसमें नैतिक कर्तव्य या धर्म का भाव है और प्रस्तुत आलेख में इसी ‘दीन’ की बात होगी ।
ब्दकोशों में ‘दीन’ को अरबी ज़बान का बताया गया है । प्लैट्स संकेत करते हैं कि ‘दीन’ का रिश्ता सम्भवतः पहलवी के ‘देन’ dēn से हो सकता है जबकि रज़ाकी के कोश में निश्चयपूर्वक ‘दीन’ को फ़ारसी से आयातित शब्द कहा गया है । पारसी साहित्य में दाएनम पद का प्रयोग भी धर्म के अर्थ में में हुआ है जिससे दीन का विकास हुआ है । ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की दृष्टि से भी ‘दीन’ शब्द का विकास इंडो-ईरानी भाषा परिवार में हुआ नज़र आता है और अन्य भाषाओं में इसका व्यापक प्रसार हुआ है । धर्म, पंथ, मज़हब, कर्तव्य जैसे अर्थों में ‘दीन’ शब्द की व्याप्ति स्वाहिली, फ़ारसी, हिन्दी, पहलवी, किरगिज़ी, तुर्की, अज़रबैजानी, उज़्बेकी आदि अनेक भाषाओं में है । मेरे विचार में ‘दीन” का रिश्ता संस्कृत के “ध्यानम्” से है या यूँ कहें कि दाएनम और ध्यानम् समतुल्य हैं ।
रअसल ‘दीन’ शब्द की फ़ारसी में स्वतंत्र अर्थवत्ता है और इसका विकास अवेस्ता के ‘दाएना’ से हुआ जिसमें पंथ, आस्था, मत, भरोसा, धर्म जैसे भाव हैं । इनसाइक्लोपीडिया इरानिका समेत विभिन्न स्रोत इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि ‘दाएना’ पहलवी ज़बान के ‘दैन’ में रूपान्तरित होता हुआ फ़ारसी में ‘दीन’ बना । प्रो.डी. एन. मेकेन्जी की “कनसाइज़ पहलवी डिक्शनरी” में ‘दैन’ (dēn ) का अर्थ रिलीजन दिया हुआ है । कोश में ‘दैन-आस्तवान’ और ‘दैन-बुरदार’ जैसे शब्दयुग्म भी हैं जिनका अर्थ “धर्म में भरोसा रखने वाला” बताया गया है । अवेस्ता के ‘आस्तवन’ शब्द पर गौर करें तो यह संस्कृत के ‘आस्थावान’ का ही रूपान्तर नज़र आता है । मगर इसे संस्कृत ‘आस्थावान’ का रूपान्तर न कहते हुए वैदिक भाषा के ‘आस्थावान’ का सहोदर कहना ज्यादा सही होगा । ‘दैन-आस्तवान’ यानी ‘दीन’ में आस्था रखने वाला । ‘दैन-बुरदार’ का बुरदार वही प्रसिद्ध सर्ग है जो फ़ारसी में ‘बरदार’ (उठाने वाला, थामने वाला) के रूप में हिन्दी के कई प्रचलित शब्दों में नज़र आता है जैसे अलमबरदार या हुक्काबरदार जिसका अर्थ क्रमशः ध्वजवाहक या हुक्का उठाने वाला होता है ।
पारसियों ( प्राचीन ज़रथ्रुस्ती) के साहित्य में “दाएनम वंगुहिम मज़्दायस्निम” पद का उल्लेख आता है । “जोरास्ट्रियन हेरिटेज” में के. ई. एडुलजी बताते हैं कि इसमें ‘मज़्दायस्निम’ का अर्थ है ईश्वर की आराधना । ध्यान रहे, पारसी लोग अहुरमज्द की उपासना करते हैं । ‘मज़्दायस्निम’ में उसका ही उल्लेख है । ‘दाएनम वंगुहिम’ का अर्थ है विवेकयुक्त आस्था । भलीभाँति विचार किया हुआ, सुचिन्तित विश्वास । इस तरह इस पूरे पद का अर्थ हुआ- ईश्वर ( अहुरमज़्द ) की आराधना में सम्यक आस्था । ‘दाएनम् वंगुहिम’ बाद में अवेस्ता में ‘दाएना-वंगुही’ के रूप में ‘उत्तम-धर्म’ के अर्थ में अभिहित हुआ । अवेस्ता का वंगुही पहलवी में ‘वेह’ हुआ । मध्यकालीन फ़ारसी में इसका रूप ‘विह’ और फिर फ़ारसी में ‘बिह’ हुआ । इसी तरह दाएनम > दाएना > दैन होते हुए ‘दीन’ बन गया ।
–अगली कड़ी में समाप्त

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1 कमेंट्स:

प्रवीण पाण्डेय said...

दीन और ध्यान के भाव एक जैसे ही हैं...

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