Wednesday, August 8, 2012

जासूस की जासूसी

Spy

न्सान शुरू से बेहद फ़ितनासिफ़त रहा है । उसे सब कुछ जानना है । एक ओर धरती के पेट में क्या है, यह जानने और फिर उसे निकालने में वह दिन-रात एक किए रहता है, दूसरी तरफ़ चांद-सितारों के पार क्या है इसके लिए बेचैन रहता है । जो कुछ छुपा हुआ है, जो कुछ अदृष्ट है वह सब उसे देखना है, जानना है । जानने की यह चाह ही जासूस की राह बनती है । सामान्य जिज्ञासा रखने से समझदारी के दरवाज़े खुलते हैं और किन्हीं निजी दायरों के भेद जानने कोशिश से जासूसी की कहानी बनती है । इन दायरों की सीमा किसी देश की सरकार और राजनीतिक दल से लेकर घरानों, परिवारों और एक व्यक्ति विशेष तक भी सीमित हो सकती है । दुनिया के सबसे पुराना पेशा देहव्यापार कहा जाता है । हमारा मानना है कि जासूसी को भी इसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए ।
किसी के भेद लेना, टोह लेना, गुप्तचरी कराना जैसी क्रियाओं के लिए हिन्दी में जासूसी सबसे ज्यादा लोकप्रिय शब्द है । हिन्दी में जासूस शब्द की आमद फ़ारसी के ज़रिये हुई है मगर यह सामी मूल का शब्द है । अल सईद एम बदावी, अरबी-इंग्लिश डिक्शनरी ऑफ़ कुरानिक यूज़ेज के मुताबिक इसका अर्थ हाथों से परीक्षण करना, जाँच करना, झाँकना, ढूँढना, तलाशना, टोह लेना, भेद लेना, छान-बीन करना जैसी बातें हैं । यह ध्यान देने योग्य है कि ये सभी बातें किसी की निजता के दायरे में करने का आशय इस धातु में निहित है । आज आज जिस अर्थ में जासूस शब्द का प्रयोग होता है निश्चित ही उसका विकास राजनीति के इतिहास के साथ-साथ हुआ । जासूस शब्द अरबी की जीम-सीन-सीन धातु से बना है । बदावी ने इसके लिए j-s-s का प्रयोग किया है जबकि अन्द्रास रज्की इसके लिए g-s-s का प्रयोग करते हैं । हालाँकि दोनों ही स्थानों पर वर्ण का ही संकेत है ।
रबी मूल के जासूस की व्याप्ति कई सेमिटिक और भारोपीय भाषाओं में है जैसे तुर्की में जासुस, अज़रबेजानी में जासूस, स्वाहिली में जासिसी, उज़्बेकी में जोसस है । इसी कड़ी में अरबी का जस्सा शब्द भी है जिसका हिब्रू रूप गिशेश है जिसका अर्थ है परीक्षण करना । मूलतः जासूस शब्द का अर्थ भी छूना, टटोलना, महसूस करना, परीक्षण करना, जाँचना है । मराठी में जासूस को जासूद कहते हैं जिसका मूलार्थ संदेशवाहक, हरकारा या दूत है । जासूस के अर्थ में चोरजासूद शब्द है जो दरअसल गुप्तचर या भेदिया होता है । संदेशवाहकों की जोड़ी जासूदजोड़ी कहलाती है । मराठी में जासूस के लिए हेर, बातमीदार या निरोप्या शब्द भी हैं जबकि संस्कृत-हिन्दुस्तानी में एक लम्बी कतार नज़र आती है जैसे- अपसर्प, हरकारा, अवलोकक, अवसर्प, गुप्तचर, गुरगा, सूचक, गोइंदा, मुखबिर, दूत, चर, चरक, भेदिया, कासिद, जबाँगीर, चारपाल, जरीद, टोहिया, थांगी, पनिहा, प्रणिधि, वनमगुप्त, प्रवृतिज्ञ, वार्तायन, वार्ताहर, प्रतिष्क, संदेशवाहक आदि ।
जासूस के अलावा हिन्दी में भेदिया शब्द भी है जो बना है संस्कृत धातु भिद् से जिसमें दरार, बाँटना, फाड़ना, विभाजित करने जैसे भाव हैं । दीवार के लिए भित्ति शब्द इसी मूल से आ रहा है । कोई भी दीवार दरअसल किसी स्थान को दो हिस्सों में बाँटती है। एक समूचे मकान की दीवारें विभिन्न प्रकोष्ठों का निर्माण करती हैं । भेद, भेदन, भेदना जैसे शब्द भी भिद् से तैयार हुए हैं। रहस्य के अर्थ में जो भेद है उसमें दरअसल आन्तरिक हिस्से में स्थित किसी महत्वपूर्ण बात का संकते है जो उजागर नहीं है । ज़ाहिर है इस बात को रहस्य की तरह माना गया, इसलिए भेद का एक अर्थ गुप्त या रहस्य की बात भी है । भेद को उजागर करने के लिए उस स्थान पर भेदने की क्रिया ज़रूरी है, तभी वह गुप्त बात सामने आएगी । भेदिया शब्द भी इसी धातु से तैयार हुआ है जिसका अर्थ है जासूस, भेदने वाला । कई बार प्रकार, अन्तर, फर्क आदि के अर्थ में भी भेद शब्द का प्रयोग होता है । बात वही विभाजन की है । किसी चीज़ के जितने विभाजन होंगे, उसे ही भेद कहेंगे जैसे नायिका-भेद यानी नायिकाओं के प्रकार । फूट डालने के अर्थ मे भेद डालना मुहावरा भी प्रचलित है । “दीवारों के भी कान होते” हैं जैसी कहावत में दीवारों के पीछे छुपने वाले और वहाँ बसने वाले भेदों का ही तो संकेत मिलता है अर्थात दीवारे भी जासूसी करती हैं ।
संस्कृत का गुप्तचर शब्द हिन्दी की तत्सम शब्दावली में भी जासूस के अर्थ में मौजूद है । यह बना है गुप् धातु से जिसमें रक्षा करना, बचाना, आत्मरक्षा जैसे भाव तो हैं ही, साथ ही इसमें छुपना, छुपाना जैसे भाव भी हैं । गौर करें कि आत्मरक्षा की खातिर खुद को बचाना या छुपाना ही पड़ता है । मल्लयुद्ध के दाव-पेच दरअसल क्या हैं ? दरअसल अपने अंगों को आघात से बचाने की रक्षाविधि ही दाव-पेच है । रक्षा के लिए चाहे युद्ध आवश्यक हो किन्तु वहां भी शत्रु के वार से खुद को बचाते हुए ही मौका देख कर उसे परास्त करने के पैंतरे आज़माने पड़ते हैं। यूँ बोलचाल में गुप्त शब्द का अर्थ होता है छुपाया हुआ, अदृश्य । गोपन, गोपनीय, गुपुत जैसे शब्द इसी मूल से आ रहे हैं। प्राचीनकाल में गुप्ता एक नायिका होती थी जो निशा-अभिसार की बात को छुपा लेने में पटु होती थी । इसे रखैल या पति की सहेली की संज्ञा भी दी जा सकती है। गुप्ता की ही तरह गुप्त से गुप्ती भी बना है जो एक छोटा तेज धार वाला हथियार होता है। इसका यह नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि इसे वस्त्र-परिधान में आसानी से छुपाया जा सकता है ।
गुप्त और चर दोनों से मिलकर बना है गुप्तचर जिसका का शाब्दिक अर्थ हुआ छुप-छुप कर चलने वाला । गुप्तचर में जो मूल भाव है वह है खुद की पहचान को छुपाना न कि चोरी-छिपे चलना । खुद को छुपाने से बड़ी बात है खुद की पहचान को गुप्त रखते हुए लोगों के बीच रहना, उठना-बैठना । ये सब बातें “चर” में निहित हैं । राजनय और कूटनीति के क्षेत्र में गुप्तचरी का महत्व सर्वाधिक होता है जहाँ एक अध्यापक, एक चिकित्सक, एक सिपाही, एक सब्ज़ीवाला, नाई, गृहिणी गर्ज़ यह कि कोई भी जासूस हो सकता है । यही है गुप्तचर का असली अर्थ ।
इसे भी देखें- जासूस की जासूसी

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11 कमेंट्स:

Sanjay Karere said...

जासूस की अच्‍छी जासूसी कर दी आपने ..

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

तो, फिर यह मान लिया जाए कि हम ब्‍लॉगिंग की दुनिया के गुप्‍तचर हैं। आते हैं, जाते हैं, किसी को खबर नहीं लगती... :)

वैसे एक बार हमारे "सर" ने पूछा था कि स्‍पाई और डिटेक्टिव में क्‍या अंतर है। क्‍लास में किसी को पता नहीं था। सो उन्‍होंने आधे घंटे का लेक्‍चर दिया। बाद में पता चला कि उनकी कांप्‍लीमेंट्री क्‍लास थी, सो टाइम पास कर गए। मुझे तो आज तक पता नहीं चला कि स्‍पाई और डिटेक्टिव में क्‍या अंतर है... :)

प्रवीण पाण्डेय said...

सारे भेद खोल दिये हैं इस पोस्ट में आपने..

भावना said...

hamare computer ki bhi koi jasusi me laga hai ...lage rae koi fark nahin padata hum mast hain aur vo past he he he

RDS said...

वडनेरकर जी,

देवकीनन्दन खत्री के चन्द्रकांता भूतनाथ आदि उपन्यासों मे जासूस के लिये 'ऐयार' शब्द का ही प्रयोग हुआ है । यह किस भाषा का शब्द है ? देवकीनन्दन खत्री की कार्यस्थली चुनार के जंगलों मे रही थी जहाँ भोजपुरी का चलन है परंतु ऐयार शब्द भोजपुरी का प्रतीत नही होता । 'चन्द्रकांता' मे ही एक अन्य स्थान पर जासूस के लिये 'चितारी' शब्द का भी इस प्रकार प्रयोग हुआ है -

"गये चुनार क्रूर बहुरंगी लाये चार 'चितारी'
संग मे उनके पंडित देवता रमल करे अति कारी "

यह जिज्ञासा बरसों से थी । जासूसी का प्रसंग छिडते ही जिज्ञासा पुनः जाग्रत हो गई । समाधान कीजियेगा ।

सादर,

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर पोस्ट। एक नई जिज्ञासा उत्पन्न हुई। ये बनिए नाम के पीछे गुप्त क्यों लगाते हैं। मसलन मैथिलीशरण गुप्त।

अजित वडनेरकर said...

@दिनेशराय द्विवेदी
साहेब,
गुप्त बना है 'गुप्' से जिसमें पालनकर्ता का भाव है । गुप्त के पालक या शासक-सरंक्षक वाले भाव का विस्तार इतना हुआ हुआ कि यह एक राजवंश की पहचान ही बन गया। उस दौर में क्षत्रियों के साथ साथ श्रेष्ठिवर्ग में भी 'गुप्त' उपनाम लगाने की परिपाटी चल पड़ी थी । ठीक उसी तरह जैसे क्षत्रियों ने 'पाल' प्रयोग शुरू किया जैसे नरेन्द्रपाल, सुरेन्द्रपाल, अजितपाल आदि । श्रेष्ठ थे सो सेठ कहलाए । गरीबों का उद्धार करते थे । इसी उद्धार से उधार शब्द जन्मा है । जो उद्धार करे वह श्रेष्ठी और गुप्त । सो बनियाजी इस तरह सेठ और गुप्ता हो गए । विस्तार से देखें यहाँ - गुप्ताजी का राजकाज

सादर
अजित

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

धन्यवाद, अजित जी।
मैं ही थोड़ा आलस कर गया। शब्दों का सफर सर्च करता तो पहले ही मिल जाता।

yashoda agrawal said...

नई जानकारी
मेरे लिए नया बागीचा
शुक्रिया

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

आज 13/08/2012 को आपकी यह पोस्ट (दीप्ति शर्मा जी की प्रस्तुति मे ) http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!

आशा जोगळेकर said...

गुप्तचर की गुप्तता खोल कर रख दी आपने ।

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