Saturday, October 15, 2011

अग्निपरीक्षा थी सौगन्ध [गन्ध-3]

पिछली कड़ियाँ-1.गंदगी और गन्धर्व-विवाह2.Deathक्यों खाते हैं सौगन्ध ?

तार (पवित्राग्नि) की अवधारणा के तहत ऐसे ही विधानों में एक शपथ विधान भी था जिसका उल्लेख अवेस्ता में है। इसी अनुष्ठान का मध्यकालीन पर्शियन सन्दर्भों में ‘सोगन्द’ खोरदन (sogand xwardan, xordan) के रूप में ज़िक्र हुआ है। अवेस्ता में गन्धक को ‘सौकन्त’ कहा गया है। ‘सौकन्त’ और ‘सौगन्ध’ की समानता गौरतलब है। विशेषज्ञों का मानना है कि अवेस्ता का ‘सौकन्त’ saokant ही मध्यकालीन पर्शियन में ‘सोगन्द’ sogand हुआ और फिर आज की फ़ारसी में सौगन्द sowgand बना। अवेस्ता में ‘सौकन्त’ का तात्पर्य गन्धक से था। ‘सौकन्त’ के बारे मं बहुत कम सन्दर्भ उपलब्ध हैं और जो हैं उनमें भी इस शब्द की व्युत्पत्ति का कोई सूत्र नहीं मिलता। न्साइक्लोपीडिया इरानिका में जो जानकारी मिलती है उससे लगता है कि ‘सौकन्त’ पीने (खाने) की परिपाटी ईसापूर्व एक हज़ार साल पहले ईरान में रही होगी। इस शपथ का उद्धेश्य था सत्य का परीक्षण करना। अर्थात ‘सोगन्द’ खोरदन के तहत गन्धक से बनी एक ओषधि को पीना होता था। यह माना जाता था कि गवाही देने से पहले ‘सौकन्त’ युक्त ओषधि पीने वाला व्यक्ति अगर झूठा है तो ‘सौकन्त’ में निहित गन्धक की तीव्रता से उसका गला जल जाएगा। यहाँ जलने की क्रिया ही खास है। अग्नि सत्यशोधक है, यह बात अग्निपूजक ईरानियों में सर्वमान्य थी। यूँ भी आग में तप कर ही सोना कुंदन बनता है। भारतीय सन्दर्भों में भी विष पीने, आग पर चलने, अंगारा उठाने जैसी मिसालें सचाई की चमक की पुष्टि करती हैं। सत्य ही अग्नि का प्रतीक है।
कुछ व्याख्याकारों का मानना है कि खोरदन में पीने का भाव भी है और खाने का भी। रस्म के तौर पर तो गन्धक से बनी ओषधि को पीने का उल्लेख ही सन्दर्भों में है, मगर समझा जा सकता है कि ‘सोगन्द’ के साथ बाद में खाने का भाव रूढ़ हुआ और इसे ‘‘सौगन्द’ ’ खोरदन कहा जाने लगा। यह महत्वपूर्ण है कि शपथ जैसी विधियों या अनुष्ठानों के साथ लेने, उठाने, खाने का ही भाव ज्यादा है। ‘सौगन्ध’ ली भी जाती है और खाई भी जाती है। ‘क़सम’ उठाई भी जाती है, ली भी जाती है और खाई भी जाती है। ‘क़सम’ चढ़ाई भी जाती है और उतारी भी जाती है। हिन्दी मराठी में खायी भी जाती है, ली भी जाती है और उठाई भी जाती है। प्रतिज्ञा की जाती है या ली जाती है। वचन दिया जाता है या लिया जाता है।
‘सौकन्त’ के बारे में गन्धक के अलावा एक अन्य सन्दर्भ पर्वत का मिलता है जिसके बारे में अवेस्ता और फारसी साहित्य में ज्यादा कुछ मिलता नहीं है, लेकिन जहाँ भी इसका उल्लेख हुआ है वहाँ एक वलयाकार स्वर्ण-पथ की मौजूदगी बताई गई है इसका सम्बन्ध धरती के किसी रहस्यमयी जादुई अध्यात्मिक जगह से है। नसरवानजी फ्रामजी बिलिमोरिया द्वारा सम्पादित ‘जोरास्ट्रियनिज्म’ में ‘सौकन्त’ पर्वत की आध्यात्मिक व्याख्या है। किताब के मुताबिक ‘सौकन्त’ पर्वत को हम भारतीय संस्कृति में प्रचलित मेरु पर्वत से जोड़ सकते है जो की पृथ्वी के मध्य स्थित है और वहाँ देवताओ का निवास है। पुस्तक में वलयाकार स्वर्ण-पथ की तुलना मेरुदण्ड से की गई है। मेरु दंड की सरंचना मनुष्य की रीढ़ की हड्डी की तरह होती है और ‘सौकन्त’ पर्वत की तरह ही मेरु पर्वत भी उत्तरी ध्रुव पर ही स्थित है। हम इससे ये अनुमान लगा सकते है की शारीरिक सरंचना में भी हम इस पर्वत को मनुष्य के उपरी भाग में स्थित मान सकते है। दूसरे शब्दों में कहे तो ‘सौकन्त’ पर्वत एक भौगोलिक जगह नहीं है बल्कि मनुष्य के मस्तिष्क के उपरी हिस्से में स्थित है जहाँ ब्रह्मरन्ध्र होता है जहाँ परमज्ञान की अनुभूति होती है। परमज्ञान यानी परमसत्य। अहुरमज्द इसी सत्य के प्रतीक है, परमशक्ति है, अग्नि के सूर्य के प्रतीक हैं। इस मुकाम पर आकर सत्य परीक्षण की बात से ‘सौकन्त’ का रिश्ता जुड़ता है।
‘सौकन्त’ के ‘सौ’ को अगर भूल जाएँ तो शेष रहता है ‘कन्त’ जिसका साम्य संस्कृत ‘गन्ध’ से होता है। इंडो-ईरानी, ईरानी- सेमिटिक भाषाओं में ‘क’ और ‘ग’ में परिवर्तन होता है। मध्यकालीन फ़ारसी में इस ‘कन्त’ का रूपान्तर ‘गन्द’ हो गया। ‘त-द-ध’ वर्णों में भी रूपान्तर आम बात है। यह सिर्फ़ अनुमान है, मगर इसका पुख्ता आधार है ‘सौकन्त’ में निहित गन्धक का अर्थ। गौर करें गन्धक का जन्म भी गन्ध ( बू ) से ही हुआ है। फ़ारसी सौगन्द में चाहे गन्ध ( बू ) नहीं है, मगर इसमें जो ‘गन्द’ है, वह अवेस्ताई ‘सौकन्त’ के ‘कन्त’ से आ रही है जिसका अर्थ गन्धक ( सल्फ़र ) होता है और गन्धक में ‘बू’ वाली ‘गन्ध्’ धातु ही है। फ़िलहाल यह तो तय है कि कसम या शपथ के अर्थ में हिन्दी के ‘सौगन्ध’ का मूल फ़ारसी का ‘सौगन्द’ है जिसकी रिश्तेदारी सीधे सीधे ‘सुगन्ध’ से नहीं हैं। फ़ारसी ‘सौगन्द’ हिन्दी की सुगन्ध के प्रभाव में आकर ‘सौगन्ध’ हो जाता है। फिर बोली भाषा में इसका रूप ‘सौन्ध’ होता है। अवधी में इस ‘सौन्ध’ के ‘ध’ (द+ह) ‘द’ का लोप होकर ‘ह’ शेष रहता है अलबत्ता अनुनासिकता बरकरार रहती है। इस तरह सौगन्ध का ‘सौंह’ रूप बनता है। एक दिलचस्प बात और ध्यान आ रही है। अवेस्ता में अगर ‘सौकन्त’ (गन्ध) का एक सन्दर्भ पर्वत मिलता है तो संस्कृत में भी इस ‘गन्ध’ का रिश्ता एक पर्वत से है जिसका नाम ‘गन्धमादन’ पर्वत है और इसका उल्लेख पुराणों में है। -समाप्त

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Friday, October 14, 2011

क्यों खाते हैं सौगन्ध ? [गन्ध-2]

बीते साल गन्ध पर लिखते हुए मुझे कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिली थीं और उसे मैने दो कड़ियों में देना तय किया था। पर जैसा कि अब तक होता आया है, कई शब्दों पर एक साथ काम करते हुए अक्सर सीरीज वाले शब्दों की अगली कड़ी लिखना मैं भूलता रहा और फिर नया शब्द शुरू। शब्दचर्चा समूह पर विचरण के दौरान भाई अभय तिवारी को सौगन्ध पर चर्चा करते पाया तो अपनी सौगन्ध याद आई। फौरन पुराने सन्दर्भ टटोले। दूसरी कड़ी कुछ लम्बी हो गई है इसलिए इसे भी दो किस्तों में पढ़ें-
oath
सु गन्ध और ‘सौगन्ध’ में क्या अन्तर है? बड़ी आसान सी बात है कि ‘सुगन्ध’ यानी खुशबू और ‘सौगन्ध’ यानी शपथ, क़सम आदि। पूर्वी बोलियों में ‘सौगन्ध’ यानी शपथ ‘सौंह’ रूप में बसा है जबकि फ़ारसी में इसका रूप ‘सौगन्द’ या ‘सोगन्द’ होता है। मतलब समान है- शपथ। आमतौर पर माना जाता है कि ‘सुगन्ध’ का रिश्ता ‘सौगन्ध’ से हैं। बात भी सही है कि ‘सौगन्ध’ और ‘सुगन्ध’ में बड़ी दिलचस्प रिश्तेदारी है क्योंकि दोनों में ही ‘गन्ध’ का बसी है। ध्वनि, वर्ण समानता के आधार पर ‘सुगन्ध’ और ‘सौगन्ध’ लगभग समान लगते हैं, मगर शब्दकोशों में ‘सौगन्ध’ का सिर्फ़ शपथ वाला अभिप्राय प्रकट होता है, ‘सुगन्ध’ वाला नहीं। हालाँकि जॉन प्लैट्स के कोश में ‘सौगन्ध’ का एक अर्थ ‘सुगन्ध’ ही बताया गया है। ‘सौगन्ध’ यानी एक खुशबूदार घास। वे इससे जुड़ा एक मुहावरा “सुगन्ध-सना” भी बताते हैं। इस प्रविष्टि में ‘सौगन्ध’ का रिश्ता क़सम या शपथ से नहीं जोड़ा गया है। यही नहीं, ‘सौगन्ध खाना’ जैसे मुहावरे के साथ खाने की, भक्षण करने की जो क्रिया है उससे इसका सम्बन्ध ‘सुगन्ध’ से नहीं हो सकता क्योंकि उसका रिश्ता सूँघने की क्रिया से है। आखिर ‘सौगन्ध’ क्यों खायी जाती है?

बसे पहले ‘गन्ध’ की बात। संस्कृत में गंध का रूप गन्धः है जिसका अर्थ ‘वास’ या ‘बू’ है। इसमें अच्छा या बुरा विशेषण नहीं लगा है। मगर यही ‘गन्ध’ फारसी में ‘गंद’ के रूप में दुर्गन्ध की अर्थवत्ता धारण करती है। फारसी में सामान्य गन्ध के लिए ‘बू’ शब्द है जिसके खुशबू और बदबू जैसे रूप प्रचलित हैं, किंतु हिन्दी में सिर्फ ‘बू’ के मायने भी खराब गंध होता है। ठीक इसी तरह जैसे संस्कृत के ‘वास्’ का अर्थ सुगंधित करना होता है मगर उसका हिन्दी रूप बना ‘बास’ जिसे ‘बदबू’ समझा जाता है। ‘गन्ध’ का फारसी रूप ‘गंद’ व्यापक अर्थवत्ता रखता है और इसमें मलिनता, गलीजपन, घिनौनापन, निर्लज्जता या व्यवहारगत अनैतिककर्म, प्रदूषित अथवा लज्जास्पद शब्द भी शामिल हैं।

प्राचीन ईरान की अग्निपूजा से जुड़ी एक आनुष्ठानिक परम्परा का ‘सौगन्ध’ से गहरा रिश्ता है। यह वैदिकयुगीन ईरान की बात है यानी अग्निपूजक पारसिकों के दौर की। यहाँ की प्राचीनतम भाषा अवेस्ता थी। जरथुस्त्र (ईपू दसवीं सदी) के पूर्व के ईरानी-आर्य, भारतीय-आर्यों की भाँति ही अग्निपूजक, यज्ञपरायण तथा देवोपासक थे परन्तु मतभेद के कारण ईरानियों के लिए ‘देव’ का अपकर्ष हो गया और भारतीय आर्यों के लिए ‘असुर’ का। ईरानियों ने ‘असुर’ को देवता के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। ऋग्वेद के प्राचीनमंत्रों में ‘असुर’ शब्द वरुण आदि देवताओं के विशेषण के रूप में व्यवहृत हुआ है। अवेस्ता में ईश्वर को अहुरमज़्दा-असुरमेधा कहा गया है। प्रायः हर संस्कृति में मनुष्य ने अपने निवास के पास अग्निस्थापना की है। प्राचीन ईरान में भी हर घर में अग्निस्थान होता था। वैदिक काल से आज तक हिन्दू परिवारों में घर के भीतर अग्निस्थान निश्चित होता है। इन स्थानों के कुछ विशिष्ट नाम भी हैं जैसे अग्निकुण्ड, अग्निवेदी, अग्निगृह, अग्निधान, अग्निष्ठस्। रसोईघर तो पारम्परिक अग्निस्थान है ही।
भाषाशास्त्रियों और इतिहासकारों का मानना है कि प्राचीन ईरान के अग्निविधान मगध के अग्निपुरोहितों द्वारा कराए जाते थे, जो बाद में वहीं बस गए। ‘मागध‘ ब्राह्मण होने की वजह से वहाँ वे ‘मागी’ कहलाए। पश्चिमी यात्रियों ने इन मागियों के अग्निविधानों को चमत्कार माना। प्राचीन यूनानी ग्रन्थों में इन्हें ‘मागीज़‘ कहा गया है। बाद में मागीज़ का रूपान्तर ‘मैजिक’ हुआ। अपने विचित्र अनुष्ठानों की वजह से मागी से ही मैजिशियन शब्द भी बना जिसका अर्थ हुआ जादूगर। वैदिक काल में अग्निकर्म कराने वाले पुरोहित को अथर्वन् कहते थे। पश्चिमी विचारकों ने इस अथर्वन् को भी तंत्र-मंत्र कर्ता के रूप में ही देखा। पारसिकों में पवित्र-अग्नि की अवधारणा है जिससे समूची सृष्टि ऊर्जा प्राप्त करती है, इसे ‘अतर’ या ‘अतार’ कहते हैं। ‘अथर्व’ या ‘अथर्वन् ‘से इसका शब्द साम्य देखा जा सकता है। अवेस्ता में रचित पारसिकों के प्राचीन धर्मग्रन्थ गाथा में भी ‘अतार’ का उल्लेख हुआ है।
क बार फिर ‘गन्ध’ पर आते हैं। एक प्रसिद्ध रसायन ‘गन्धक’ का नामकरण भी इसी ‘गन्ध्’ धातुमूल से हुआ है। दरअसल ‘सौगन्ध’ में जो गन्ध है उसमें अभिप्राय ‘गन्धक’ का है। अत्यंत तीक्ष्ण गंध वाले इस पदार्थ को अंग्रेजी में सल्फर कहते हैं। दिलचस्प यह भी कि प्रकृति में गन्धक परिशुद्ध रूप में नहीं मिलता। वह किसी न किसी यौगिक के रूप में होता है और इसीलिए उसमें से गन्ध आती है। परिशुद्ध सल्फर गन्धहीन होता है। इसके औद्योगिक और ओषधीय उपयोग हैं। एक पाचक दवा को ‘गंधवटी’ भी कहते हैं। वैसे गन्धक अत्यधिक ज्वलनशील और अग्निमित्र पदार्थ है। तेज गन्ध की वजह से ही इस पदार्थ को गन्धक कहा गया। प्याज में सल्फ़र बड़ी मात्रा में होता है और इसकी तेज़ गन्ध के पीछे, जिसे कई लोगो बदबू कहते हैं, गन्धक ही है। बहरहाल, यज्ञप्रिय वैदिक आर्यों की भांति ही पारसिकों के आचारव्यवहार पर भी अग्निपूजक संस्कृति की छाप थी। तमाम अनुष्ठानों में अग्निपूजा का महत्व था। अहुरमज्द ही परमज्ञान अथवा शक्तिपुंज का भी प्रतीक है।
प्राचीन ईरान में पारसिक ‘यज्ञ’ (यज्, यजन) करते थे जिसे अवेस्ता में ‘यश्न’ कहा जाता था। यही ‘यश्न’ कालान्तर में ‘जश्न’ बन कर फिर भारत लौट आया। यह ‘यश्न’ अहुरमज्द की उपासना के लिए था। जिस तरह से भारत के ग्रामीण समाज में आज भी प्रेतबाधा ग्रस्त व्यक्ति को दागा जाता है, अथवा ईमान की परीक्षा के लिए अग्निपरीक्षा का विधान है, ऐसे ही कर्मकाण्ड प्राचीन ईरानी समाज में भी प्रचलित थे। मूलतः ये कर्मकाण्ड अग्निपूजा का विधान ही थे और इसके मूल में अग्नि को साक्षी कर सत्य या बुराई का परीक्षण करना था। जैसे झूठ बोलने पर आग को जीभ पर रखना, धोखाधड़ी करने पर शरीर को गर्म लोहे की छड़ों से दागना या शरीर पर खौलता हुआ पानी डालना जैसे परीक्षण होते थे जो मूलतः अग्निपरीक्षा ही थी। अर्थात अगर आरोपी निर्दोष है तो पवित्र-अग्नि उसे नुकसान नहीं पहुँचाएगी। बाद में ये सब ढकोसला बन गए।
-अगली कड़ी में समाप्त
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Wednesday, October 12, 2011

गलाटा नक्को करने का !

loud-mouth

क्कनी के शब्दों की हिन्दी में आमद मुम्बइया फिल्मों के ज़रिये अर्से से होती रही है। तुर्क-पठानों नें आठ-नौ सदी पहले से दक्षिण में बसना शुरू कर दिया था। फ़ारसी, हिन्दवी और हिन्दी की कई बोलियों से छनते छनते इन तुर्कों का वास्ता जब दक्खिन की कोंकणी, कानड़ी और मराठी बोलियों के शब्दों से हुआ तो एक निरालापन पैदा हो गया। संस्कृतियों के हेलमेल, लगत-जुड़त और उससे बढ़ कर संकरण की प्रकिया में ही सृजन की इतनी ऊर्जा निहित है कि इससे गुज़र कर बने शब्द को एक नई पहचान, नई अर्थवत्ता मिल जाती है। ऐसा ही एक शब्द है ‘गलाटा’। महाराष्ट्र और कर्नाटक के सीमावर्ती क्षेत्रों में इसे बोला समझा जाता है। आमतौर पर यह टपोरियों का शब्द है। ‘गलाटा’ यूँ तो मुम्बइया हिन्दी के ज़रियों फ़िल्मों और जासूसी उपन्यासों में सुनने-पढ़ने को मिलता है मगर बिन्दास की तरह कुछ सालों में यह भी हिन्दी वालों का पसंदीदा बन जाएगा, इसमें संदेह नहीं।
‘गलाटा’ बोले तो गड़बड़ी या पेचीदगी। बखेड़ा, फ़साद, टंटा वग़ैरह वग़ैरह। झगड़ा, फ़साद, टंटा, में बहुत कुछ देखने-सुनने लायक होता है। यानी गड़बड़ियों की इन तमाम क़िस्में में हाथापाई से लेकर ज़बानदराज़ी तक सब शामिल है। मगर कुछ गड़बड़ियाँ बड़ी खामोंश होती हैं जैसे काम बिगड़ जाने से जुड़ी कई स्थितियाँ। सगाई टूटना भी ‘गलाटा’ है और ट्रेन चूकना भी गलाटा है। मगर गलाटा की असल रिश्तेदारी खामोशी से नहीं वरन हल्ला-गुल्ला से है। गलाटा शब्द दरअसल मराठी के ‘गळ्हाटा’ या ‘गळ्हाठा’ से बना है। हिन्दी भाषी ‘ळ’ का उच्चार ‘ल’ या ‘ड़’ की तरह करते हैं। इसका चालू उच्चारण होगा ‘गळाटा’ जिसे हिन्दी वालों ने ‘गलाटा’ कहना शुरू किया। आमतौर पर मराठी-कोंकणी का जो शब्द मुंबइया हिन्दी में प्रचलित होता है उसके पीछे वहाँ के हिन्दीभाषियों  से ज्यादा मुंबई के तमिल, कन्नड़ और गुजराती समाज में उस शब्द का प्रचलित रूप महत्वपूर्ण होता है। वैसे ‘गळ्हाटणें’ मराठी की बहुप्रचलित क्रिया है और इससे बने ‘गळ्हाटा’ का दक्कनी में ‘गलाटा’ रूप प्रचलित हुआ। ‘गळ्हाटणें’ का शाब्दिक अर्थ है गला फाड़कर रोना। मगर बतौर मुहावरा इससे बने गळ्हाटा का अर्थविस्तार होता है और इसमें कुछ गुम होना, कमी पड़ना, क्षीण होना, ह्रास होना, गड़बड़ी, अस्तव्यस्ता, उन्माद, बखेड़ा, शांति भंग जैसे भाव शामिल हो जाते हैं।
‘गळ्हाटणें’ का ही एक रूप गळ्हाटा / गल्हाठा होता है जिससे ‘गलाटा’ बना। गौर करें मराठी के ‘ळ’ का उच्चारण भी हिन्दी में ‘ल’ की तरह होता है हालाँकि मराठी में यह स्वतंत्र व्यंजन है। गुजरात के सीमित क्षेत्रों और समूचे राजस्थानी बोलियों भी की उपस्थिति है। ‘गला’ को मराठी में ‘गळा’ कहा जाता है। गला या गळा बना है संस्कृत की ‘गल्’ धातु से जिसका अर्थ है टपकना, चुआना, रिसना, पिघलना आदि। गौर करें इन क्रियाओं में नष्ट होने, खत्म होने का भाव भी है। इसका एक अन्य अर्थ है अन्तर्धान होना, गुजर जाना या ओझल हो जाना आदि। हिन्दी के गली और गला शब्द का रिश्ता इसी गल् धातु से है। मराठी में ‘गली’ का ‘गल्ली’ रूप है और गला को गळा कहा जाता है। सम्बन्ध संस्कृत ‘गल्’ से ही है। गौर करें गले की संरचना पर। मुँह के ज़रिये हलक़ में जो कुछ भी जाता है, वह अंतर्धान हो जाता है, ग़ायब हो जाता है। ‘गल्’ से बनी ‘गलन’ क्रिया का अर्थ है टपकना, रिसना आदि। ये क्रियाएँ ज़ाहिर करती हैं कि टपकना और रिसना अनंतकाल तक नहीं हो सकता, अर्थात रिसने वाला पदार्थ खत्म भी होगा। यहाँ जो खत्म होने का भाव है, अंतर्धान होने का भाव है उसे गले में उतरते भोजन के ज़रिए समझा जाए। मुँह में रखा पदार्थ गले में जाकर गायब हो जाता है। यही है गल् का क्रियारूप। इससे ही बना है एक मुहावरा निगल लेना या निगलना। किसी वस्तु या सामग्री को हड़पने या कब्ज़ा जमाने के संदर्भ में निगलना मुहावरा इस्तेमाल होता है।
हिन्दी के ‘गला फाड़ना’ मुहावरे का शाब्दिक अर्थ मराठी के ‘गळ्हाटणे’ जैसा ही है मगर जो बात ‘गळ्हाटा’ और ‘गलाटा’ में है वह ‘गला फाड़ना’ में नहीं। गौर करें कि गल् धातु में निहित भावों पर। गायब होने, नष्ट होने, रिसने, चूने, पिघलने जैसी क्रियाओं में हानि का, रहित होने का, रीतने का भाव है। तयशुदा नतीजों के न आने, योजना चौपट होने, अनहोनी जैसी स्थितियों को ही गड़बड़ी कहा जाता है। बना बनाया काम बिगड़ जाना ही बखेड़ा है और प्रकारान्तर से यही गळ्हाटा या गलाटा है। यूँ कुछ लोगों का मानना है कि काम बिगड़ने पर यूँ भी इन्सान गला फाड़कर रोता है, आर्तनाद करता है, क्रंदन करता है इसलिए गलाटा का लाक्षणिक अर्थ बखेड़ा या काम बिगड़ना हुआ,इसका मूलार्थ बुक्का फाड़ कर रोना ही है। मेरा मानना है कि गळ्हाटणे क्रिया में गला फाड़ कर रोना या बुक्का फाड़ना जैसे अर्थ निहित हैं मगर गलाटा करना, गलाटा होना में आर्तनाद, क्रन्दन या गला फाड़ना जैसे भाव न होकर कुछ रीतने, हानि होने से उत्पन्न बखेड़े या अशांति का भाव प्रमुख है।

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Tuesday, October 11, 2011

होनहार भूत और अनहोनी

panini

हि न्दी में ‘होना’ एक बहुत आम क्रिया है। कुछ घटित होने के अर्थ में होना क्रिया बोली और लिखत-पढ़त की भाषा में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली क्रिया है। ‘होना’ क्रिया का जन्म अधिकांश विद्वान संस्कृत के ‘भवन्’ से मानते हैं। डॉ भोलानाथ तिवारी के मुताबिक भवन का प्राकृत रूप होण था जिसका हिन्दी रूप होना है। समझा जा सकता है कि भवन > हअण > होण > होन > होना, कुछ इस क्रम में ‘होना’ का विकास समझ आता है। इस वाक्य को अगर यूँ लिखा जाए- “कुछ इस क्रम में होना का विकास हुआ होगा” गौर करें कि ये ‘हुआ’ और ‘होगा’ भी ‘होना’ के ही कालसूचक क्रियारूप हैं अर्थात ये भी ‘भवन’ से सम्बद्ध हैं। होना की मूल धातु ‘हो’ है। कुछ का कुछ होना यानी काम बिगड़ना,  किसी का होना यानी अपनी आस्था किसी को सौंपना, होता-सोता यानी सगा-सम्बन्धी। होकर रहना यानी अनिष्ट घटना आदि। 
हिन्दी वर्तमानकालिक वाक्य रचनाओं के अन्त में ‘हूँ’, ‘है’, ‘हो’ जैसी सहायक क्रियाएँ अवश्य लगती हैं। ये सभी ‘हो’ या ‘होना’ से सम्बद्ध हैं। विभिन्न व्याकरणाचार्यों ने ‘होना’ के विभिन्न रूपों का विकास संस्कृत की ‘अस्’ धातु या ‘भू’ धातु से माना है। इसमें ‘भू’ से ही होना का विकास अब सर्वमान्य है। उदयनारायण तिवारी और धीरेन्द्र वर्मा हूँ रूप को ‘अस्मि’ से यूँ सिद्ध करते हैं- संस्कृत, अस्मि > प्राकृत, अम्हिं > हिन्दी, हूँ। डॉ भोलानाथ तिवारी ‘हूँ’ का विकास संस्कृत की ‘भू’ धातु के वर्तमानकालिक रूप से ही मानते हैं मसलन संस्कृत, पाली में भवामी > प्राकृत में होमी > अपभ्रंश में होवि > हौं > हिन्दी, हूँ। डॉ तिवारी कहते हैं कि ये सभी रूप ‘हो’ धातु के हैं जो कि ‘भू’ से ही विकसित हो सकते हैं न कि ‘अस्’ से। इन सहायक क्रियाओँ की विशेषता ये है कि इनमें पुरुष और वचन के अनुरूप बदलाव होता है। लिंग से वाक्य रचना में कोई अन्तर नहीं पड़ता। जैसे उत्तम पुरुष में- मैं जा रहा हूँ / हम जा रहे हैं। मध्यम पुरुष में तुम जा रहे हो / वे जा रहे हैं। अन्य पुरुष में वह जा रहा है/ वे जा रहे हैं। ‘भव’ से ही पूरवी बोलियों का ‘भया / भवा’ शब्द बना है। हिन्दी में इसका रूप ‘हुआ’ बनता है। ‘भयो’ का मालवी रूपान्तर काँईं ‘हुओ’ / काँईं’ होयो’ है। अन्यमनस्कता को सिद्ध करने के लिए हिन्दी में ‘हूँ-हाँ करना’ मुहावरा बहुत कुछ कह देता है।
संस्कृत के ‘भवनम्’ का एक अर्थ होता है आवास, निवास, घर, प्रकोष्ठ, स्थान, आधार, इमारत या प्रकृति। यहाँ प्रकृति शब्द पर गौर करें। इसके अलावा जितने भी पर्याय हैं वे सब आश्रय शब्द के दायरे में आते हैं। ये निर्मित हैं। भवन को बनाया जाता है अर्थात उसमें होने की क्रिया निहित है। कुछ आश्रय प्राकृतिक भी होते हैं जैसे वृक्ष-कोटर, पर्वत-कंदरा, गुफा आदि। ये सब मनुष्य के प्राकृतिक आवास होते हैं। प्रकृति अपने आप में जीव-जगत का नैसर्गिक आश्रय है, इसलिए प्रकृति का एक अर्थ ‘भवन’ महत्वपूर्ण है। भवनम् बना है संस्कृत धातु ‘भू’ से जिसमें मूलतः घटित होने का भाव है। घटित होने में उगने, पैदा होने, जन्म लेने, उदित होने, आकार लेने, उगने, निकलने, जीवित रहने, विद्यमान रहने का भाव है। व्यापक और दार्शनिक अर्थों में ये सब क्रियाएँ और भावार्थ सृष्टि की ओर इंगित करते हैं।
भू से संस्कृत में भूः बनता है जिसमें विश्व, सृष्टि, पृथ्वी जैसे भाव हैं। पृथ्वी के सभी भाव बड़े प्रतीकात्मक में हैं। इसी कड़ी में ‘भू’ से बना भूमि जो विश्व के सभी जीवधारियों का आश्रय है। ‘भूमि’ जैसी रचना में होने का भाव स्वतः निहित है। ‘भूमि’ यानी जो हो चुकी है अर्थात जो विद्यमान है। ‘भूमिका’ शब्द का अर्थ भी ज़मीन, आधार, पृथ्वी, स्थान, प्रदेश आदि है। अभिनय के संदर्भ में भूमिका का अर्थ है नाटक का कोई चरित्र। यहाँ आधार शब्द प्रमुख है। नाटकीय चरित्र ही नाटक का आधार होते हैं। ‘भौमिक’ का अर्थ है पार्थिव अर्थात भूमि सम्बन्धी। ‘भू’ के साथ जब ‘क्त’ प्रत्यय लगता है तो बनता है ‘भूत’ अर्थात जो हो चुका है, बीत चुका है, व्यतीत हो चुका है। अतीत का विषय। जो घट चुका है। भूतकाल का हिस्सा है इसलिए जो सामने है, वर्तमान है, जो सामने है, वह भी भूत है और जो घट चुका है, जो अतीत है वह भी भूत है। भूत यानी तत्व यानी पंचमहाभूत-अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु और आकाश। ज़ाहिर है समूची सृष्टि के भाव वाला ‘भू’ यहाँ स्पष्ट है। व्यतीत के अर्थ में ‘भूत’ का एक अर्थ और है, मगर यही अर्थ सर्वाधिक लोकप्रिय और व्यापक है। भूत यानी प्रेत, पिशाच, मृतात्मा, बुरी आत्मा आदि। मनुष्य का जीवन जब सम्पन्न हो जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है। यह माना जाता है कि प्रत्येक शरीर में आत्मा का वास होता है। सद्ग्रहस्थ या सन्यासी को मोक्ष मिलता है मगर विषय वासना से युक्त जीवधारी की आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता और मतात्मा तभी भूत कहलाती है। भूत का होना यहाँ सिद्ध है। जो हो चुका है, बीत चुका है वही भूत है। न भूतो, न भविष्यति उक्ति से सब अवगत हैं।
वनम् से बने ‘होना’ में अस्तित्व या विद्यमानता का भाव प्रमुख है। ‘भव्य’ शब्द भी इसी मूल का है जिसमें उत्तम, शानदार, योग्य जैसे भाव है। मुख्यतः भव्य में भी विद्यमानता या होने वाला जैसे ही भाव है। अर्थविस्तार होते हुए इसमें मनोहर, प्रिय, अत्युत्तम, आलीशान जैसे भाव भी समा गए। होना मे मुहावरेदार अर्थवत्ता भी है। होनी, अनहोनी, होनहार जैसे शब्द जो इसी कड़ी से जुड़े हैं, मुहावरे की अर्थवत्ता रखते हैं। ‘होनी’ का अर्थ हो जो होने वाला है अर्थात भविष्य के गर्भ में छुपी बात। अनहोनी यानी अनिष्ट, दुर्भाग्य आदि। ‘होनहार’ का अर्थ सकारात्मक है। भविष्य में होने वाली अच्छी बात। होनहार संज्ञा के रूप में अच्छे गुणों वाला सुपुत्र भी होता है। अच्छे लक्षणों वाली संतति या बच्चा होनहार कहलाता है। होनहार बिरवान के, होत चीकने पात कहावत किसने नहीं सुनी होगी। ‘भू’ धातु से हिन्दी समेत अनेक भाषाओं में कई शब्द बने हैं।

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Friday, September 30, 2011

श्रवणकुमार की सुन-गुन

Hear
कि सी भाषा की लम्बी उम्र और शब्द-समृद्धि के मूल में उस भाषा का अन्य भाषाओं से जीवंत सम्पर्क महत्वपूर्ण है। प्राचीन काल से भाषाई आदान-प्रदान होता रहा है। सभ्यता के विकासक्रम में क्षेत्रीय भाषाओं में से कोई एक भाषा परिनिष्ठित भाषा का रूप लेती है। तब शुद्धता का आग्रह भी सामने आता है। आज के दौर में हिन्दी भी ऐसी ही परिस्थिति से जूझ रही है। हिन्दी में अब बोली-भाषा के शब्द धीरे धीरे गायब हो रहे हैं। गौरतलब है कि लोक बोलियों के विभिन्न शब्दों की अर्थवत्ता बड़ी व्यापक होती है। साहित्यिक प्रयोगों के ज़रिये इन शब्दों से पढ़ा-लिखा समाज परिचित होता है। दो दशक पहले तक परिनिष्ठित हिन्दी में आंचलिक बोली के शब्दों का इस्तेमाल होता था। समर्थ अभिव्यक्ति के लिए भाषा में शब्दों की आवाजाही ज़रूरी है, किन्तु हिन्दी वालों में साहित्यानुराग भी धीरे धीरे कम हो रहा है लिहाज़ा लोकभाषा के शब्दो से अपरिचय वाला हिन्दी समाज हमारे सामने है।

श्रवण करने की क्रिया के लिए हिन्दी में ‘सुनना’ शब्द के अलावा कोई अन्य विकल्प हमारे सामने नहीं है। इसका प्रयोग सुनवाई, सुनना, सुनाई पड़ना जैसे अर्थों में होता है। इसके अलावा विचार करना, ध्यान देना जैसे भाव भी इसमें शामिल हैं। सुनना क्रिया से सुन-गुन लेना जैसा मुहावरा भी हिन्दी में चल पड़ा है। संस्कृत में सुनने के लिए ‘श्रवण’ शब्द है। यह बना है ‘श्रु’ धातु से जिसमें सुनने, सुनाई पड़ने का भाव है। ‘श्रवण करना’ यूँ तो सुनने के संदर्भ में हिन्दी में बोला जा सकता है, मगर ऐसे वाक्य प्रयोग व्यवहार में नहीं है। पाली में ‘श्रवण’ का ‘सवन’ रूप है और प्राकृत में ‘सवण’। इसी कड़ी में हिन्दी की ‘सुनना’ क्रिया का विकास हुआ। ताज्जुब होता है कि सुनने की क्रिया के लिए कभी हमारे पास ‘अकनि/अकुनि’ जैसी क्रिया भी थी। सूरदास, तुलसीदास जैसे मध्यकालीन कवियों ने इसके विविध रूपों का प्रयोग किया है। डॉ रामविलास शर्मा इस ‘अकनि/अकुनि’ क्रिया के बारे में लिखते हैं कि अन्य भारतीय आर्यभाषाओं में भी सुनने के अर्थ वाली इस क्रिया का इस्तेमाल होता है। उनके मुताबिक ‘अकनि’ क्रिया के मूल में ‘अक्’ जैसी धातु होनी चाहिए, मगर संस्कृत में ‘अक्’ जैसी कोई क्रिया नहीं है। वे ग्रीक भाषा की क्रिया ‘अकोउओ’ से ‘अकनि’ की तुलना करते हैं जिसका अर्थ भी सुनना ही होता है। उनका मानना है कि ‘अकनि’ या ‘अकुनि’ और ‘अकोउओ’ परस्पर सम्बद्ध हैं। माना जाता है कि आर्यों के भारत आने से पहले प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा से ग्रीक शाखा अलग हो गई थी। ‘अकोउओ’ प्राचीन ग्रीक का शब्द है, आधुनिक ग्रीक का नहीं। इस तरह के शब्द साम्य से ऐसा लगता है कि इंडो-यूरोपीय भाषाओं के विकास को समझने के लिए उनका तुलनात्मक अध्ययन केवल संस्कृत से नहीं बल्कि आधुनिक आर्य भाषाओं से भी करना चाहिए।
ब्रज, अवधि में प्रचलित ‘अकनि/अकुनि’ , ‘अकनना’ जैसी क्रियाओं से मिलती जुलती एक क्रिया मराठी में भी है। हिन्दी की ’सुनना’ जैसी ही स्थिति मराठी के ‘ऐकणे’ (अइकणे) की भी है अर्थात यहाँ भी ‘श्रवण’ करने के लिए ‘ऐकणे’ (अइकणे) के अलावा कोई अन्य पर्यायी शब्द नहीं है। डॉ रामविलास शर्मा जिस दिशा में संकेत कर रहे हैं उससे ऐसा आभास होता है कि संभवतः प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार कि भारतीय शाखाओं में ‘ऐकणे’ (अइकणे), ‘अकनि / अकुनि’ जैसे शब्दों की उपस्थित प्राचीन ग्रीक के
ear tumpet‘अकनि’ और ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति कल्पित ‘अक्’ धातु की बजाय ‘कर्ण’ में ही निहित है। प्रोटो भारोपीय भाषाओं के मूल स्रोतों की दिशा में महान काम करने वाले जूलियस पकोर्नी जैसे ख्यात भाषा शास्त्री का ध्यान इस ओर नहीं गया होगा, यह बात मानना मुश्किल है।
‘अकोउओ’ का प्रभाव मानी जानी चाहिए। इसे आर्यों के आप्रवासन का परिणाम भी माना जा सकता है और प्राचीन यूनान से वृहत्तर भारत के सांस्कृतिक सम्बंधों का नतीजा भी। ग्रीक ‘अकोउओ’ का परवर्ती रूपान्तर ‘अकूस्टोस’ होता है जिसमें सुनने लायक जैसा भाव है। इसका ही एक रूप ‘अकूस्टिकोस’ होता है जिसका अर्थ भी सुनना ही है। अंग्रेजी के ‘अकूस्टिक’ acoustic और फ्रैंच के acoustique से इसकी रिश्तेदारी निर्विवाद है। जूलियस पकोर्नी द्वारा बताई गईं प्रोटो भारोपीय धातु kous से इसकी रिश्तेदारी है। डॉ शर्मा का सुझाव महत्वपूर्ण है कि प्राचीन भारोपीय भाषाओं के विकास को परखने के लिए संस्कृत समेत आधुनिक आर्यभाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन भी होना चाहिए। मगर विभिन्न संदर्भों के मद्देनज़र अवधी शब्दों ‘अकनि/अकुनि’  और मराठी के ‘ऐकणे’ (अइकणे) की रिश्तेदारी ग्रीक की बजाय संस्कृत से ही जुड़ती लग रही है। ‘अकनि’ और ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति कल्पित ‘अक्’ धातु की बजाय ‘कर्ण’ में ही निहित है। प्रोटो भारोपीय भाषाओं के मूल स्रोतों की दिशा में महान काम करने वाले जूलियस पकोर्नी जैसे ख्यात भाषा शास्त्री का ध्यान इस ओर नहीं गया होगा, यह बात मानना मुश्किल है।हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक ‘अकनि’ दरअसल संस्कृत के ‘आकर्णन’ का रूपान्तर है। आकर्णन का प्राकृत रूप ‘आकण्णण’ होता है। इसका एक रूप ‘आकर्णे’ भी है। ‘आकण्णण’ के अवहट्ठ भाषा में ‘आकण्ड’, ‘आकण्णे’ जैसे रूप भी हैं। ‘अकनि/अकुनि’ इसी कड़ी में आता है।
ह मानना दूर की कौड़ी लगती है कि ‘आकर्णन’ से बने ‘आकण्ण’, ‘अकनि / अकनि’ और ‘ऐकणे’ जैसे शब्दों की ग्रीक ‘अकोउओ’ से रिश्तेदारी है। ध्यान देना चाहिए कि ग्रीक ‘अकोउओ akouo’ का उच्चारण a-koo-oh अर्थात ‘अ कू ओह’ होता है। यह स्पष्ट है कि संस्कृत के आकर्णन की अर्थवत्ता ‘कर्ण’ अर्थात कान से स्थापित हो रही है जिसका गुण सुनना है। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक ‘आकर्णन’ से बनी ‘अकनना’ क्रिया का अर्थ सुनना, कर्णागोचर करना जैसे भाव हैं। आहट लेने, अंदाज़ा लेने के लिए बना सुन-गुन वाला भाव भी आकर्णन या अकनना में है। ‘कान लगा कर सुनना’ जैसा भाव ही वाशि आप्टे के संस्कृत कोश में भी है। यहाँ ‘आकर्णनम्’ शब्द की व्युत्पत्ति आ + कर्ण+ल्युट बताते हुए इसका अर्थ सुनना, कान लगा कर सुनना दिया है। इसके विपरीत कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश में ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘अभिकर्ण’ से बताई गई है। संस्कृत के ‘अभि’ उपसर्ग का अर्थ ‘की ओर’, ‘की दिशा में’ होता है। इस तरह अभिकर्ण में भी कान लगा कर सुनने का भाव ही है। इसका मराठी प्राकृत रूप होता है अहिकण्ण > अहिक्खण्ण > ऐकणे। मेरा मानना है कि मराठी ऐकणे का विकास भी संस्कृत के आकर्णनम् से ही हुआ होगा। क्योंकि संस्कृत कोशों में अभिकर्ण शब्द की प्रविष्टि मुझे नहीं मिली।
संस्कृत के ‘कर्ण’ की व्युत्पत्ति हुई है ‘कर्ण्’ धातु से जिसकी व्यापक अर्थवत्ता है और इससे बने अनेक शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं। ‘कर्ण्’ में छेदना, प्रवेश करना, घुसना जैसे भाव शामिल हैं। कान  की संरचना के संदर्भ में इन भावों का अर्थ स्पष्ट है। कान दरअसल एक दीर्घ विवर जैसी संरचना ही है। ‘कर्ण्’ से बने ‘कर्ण’ का अर्थ है किसी वस्तु को थामने वाली संरचना, बाहर निकला हुआ हिस्सा, हत्था, दस्ता या मूठ आदि। कर्ण शब्द की कान के संदर्भ में यहां गुणवाचक अर्थवत्ता भी है और भाववाचक भी। श्रवणेन्द्रिय होने की वजह से यहां स्पष्ट है कि कानों में ध्वनि प्रवेश करती है। इस तरह स्पष्ट है कि ग्रीक ‘अकोउओ’ या अवधी के ‘अकनि/अकनि’ में शब्द साम्य है मगर यह मानना थोड़ा मुश्किल लगता है कि ‘आकर्णनम्’ के प्राकृत रूपों का प्रसार ग्रीक भाषा में हज़ारों वर्ष पहले हुआ होगा। खास बात यह कि ‘अकनि / अकनि’ की रिश्तेदारी जिस तरह से कान अर्थात कर्ण ( संस्कृत धातुमूल कर्ण्) से सिद्ध हो रही है, ग्रीक के ‘अकोउओ’, उसकी मूल धातु kous और इससे बने ‘अकूस्टिक’ जैसे शब्दों में कहीं भी शरीरांग ‘कान’ का भाव नहीं है। प्रोटो भारोपीय शब्दों के मूल स्रोत खोजने का बड़ा काम करने वाले ख्यात भाषाविद् जूलियस पकोर्नी ने इस पहलू की जानबूझ कर अनदेखी की है, यह बात माननी मुश्किल है। ‘अकनि’ और ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति कल्पित ‘अक्’ धातु की बजाय ‘कर्ण’ में ही निहित है।
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Friday, September 23, 2011

घर-गिरस्ती की रस्सियाँ

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शु और मनुष्य का साहचर्य शब्दों के सफ़र में भी विविध रूपों में नजर आता है। यह उपभोक्ता और उत्पाद के रूप में भी है और पारिवारिक-आध्यात्मिक धरातल पर भी है। सर्वप्रथम मनुष्य की सत्ता पशुओं पर ही कायम हुई। उसने खुद को मानवेतर जीव-जगत का नियंता स्वयं को स्थापित किया। तात्पर्य यह कि अधिकार, स्वामित्व और सम्पत्ति का बहुआयामी बोध अगर किसी ने मनुष्य को कराया है तो वे पशु ही हैं। भाषा में भी यह रिश्ता साफ नज़र आता है। उर्दू –हिन्दी का एक आम शब्द है “माल” जो मूल रूप से सेमेटिक भाषा परिवार का है। माल का अर्थ होता है सम्पत्ति। व्यापक तौर पर धन-दौलत, सामान, भंडार, कीमती सामग्री, वस्तुएं आदि भी आती हैं। यह बना है “माल” अर्थात mwl से जिसका अर्थ होता है पशुओं का रेवड़। खासतौर पर जो दुधारू पशु पालतू हों। सेमेटिक परिवार की हिब्रू, अरबी, सीरियक, आरमेइक आदि कई भाषाओं में इस धातु की व्याप्ति इसी अर्थ में हैं। जाहिर सी बात है कि पशु ही प्राचीन इन्सान की सबसे बड़ी सम्पत्ति थे इसीलिए पशुधन जैसा शब्द हिन्दी में प्रचलित हुआ। साफ है कि माल यानी पशु। प्रचलित अर्थ में यही पशुधन ऐश्वर्य सामग्री, धनसम्पत्ति और दौलत है। जिसके पास माल है वह मालदार है अर्थात ऐश्वर्य वान है, धनी है, श्रीमंत है। माल-असबाब, मालमत्ता और मालामाल जैसे शब्द युग्म भी माल की ही देन हैं। लेनदेन अथवा व्यवसाय के तौर पर मुद्रा की भूमिका सबसे पहले पशुधन ने ही निभाई।
बसे पहले “माल-असबाब” की बात। विभिन्न शब्दकोशों में असबाब का अर्थ रोजमर्रा के काम की वस्तु होता है। दरअसल “असबाब” अरबी भाषा से फ़ारसी होते हुए उर्दू-हिन्दी में दाखिल हुआ। बुनियादी तौर पर यह अरबी के “सबब” sbb शब्द का बहुवचन है। सबब में अरबी का “अ” उपसर्ग लगने से बनता है “असबाब”। सबब के प्रचलित अर्थ हैं वजह, निमित्त, कारण, अभिप्राय, प्रयोजन, आशय, सुयोग, मौका अवसर आदि। सबब से बना बेसबब शब्द भी हिन्दी में प्रचलित है जिसका अर्थ है अकारण। मगर माल-असबाब के संदर्भ में इन अर्थों से बात नहीं बनती है और कोश इससे ज्यादा कुछ नहीं बताते। अरबी के पुराने संदर्भों में “सबब” का अर्थ रस्सी या तम्बू भी होता है “असबाब” में भी रस्सी और तम्बू के बहुवचन का भाव है। यह तम्बू “असबाब” के संदर्भ को और ज्यादा स्पष्ट करता है। कारण, वजह, प्रयोजन जैसे अर्थों का विकास बाद में हुआ। सभ्यता के अत्यंत प्रारम्भिक युग में इनसान के कुछ खास उपकरणों में रस्सी भी थी। इसी के साथ डण्डा और छाजन भी प्रमुख उपकरण थे जिनके जरिए वह आश्रय से लेकर आत्मरक्षा और पशुपालन जैसे कार्यों का कुशलतापूर्वक सम्पादन कर पाता था।
गौर करें रस्सी बँटी हुई, गुँथी हुई रचना का नाम है। कुरान की अरबी के विशेषज्ञ मार्टिन आर ज़ैमिट के मुताबिक “सबब” में गूँथने, बँटने का भाव भी निहित है। वे सेमिटिक भाषा परिवार की अन्य भाषाओं के कुछ शब्दों से भी समानता सिद्ध करते हैं जिनमें घूमने, गोलाई, मुड़ने और चक्कर लगाने के भाव हैं। गूँथना और बँटना में यही क्रियाएँ होती हैं। जैमिट के मुताबिक सीरियक में शबा, आरमेइक में सबा, हिब्रू का सबाब और फोनेशियन में सब्ब जैसे शब्द हैं। ध्यान रहे रस्सी एक माध्यम है। किन्ही दो बिन्दुओं के बीच किसी प्रयोजन को सिद्ध करने का ज़रिया। रस्सी का माध्यम या ज़रिया बनना महत्वपूर्ण है। रस्सी में कड़ी या माध्यम का भाव है जो दो बातों, दो बिन्दुओं, दो वस्तुओं को जोड़ने की वजह बनती है। हैन्स व्हेर, जे मिल्टन कोवैन की डिक्शनरी ऑफ मॉडर्न रिटन अरेबिक में भी “सबब” के प्राचीन मायने रस्सी

tent... तम्बू को खड़ा करने में रस्सी और डण्डे की बड़ी भूमिका है। इसी तरह मवेशियों को बांध कर रखने में भी रस्सी एक ख़ास ज़रिया है। तम्बू ही बद्दुओं का आश्रय था। तम्बू में ही गृहस्थी की अर्थवत्ता समायी है अर्थात दुनियादारी की सभी वस्तुएँ...

या तम्बू ही बताए गए हैं मगर “प्रयोजन, वजह, कारण, हेतु” जैसी अर्थवत्ता इनमें कैसे विकसित हुई होगी, इसका स्पष्टीकरण नहीं मिलता।
म्पत्ति, गृहस्थी, साज़ो-सामान, कीमती पदार्थ, जमाजत्था, झोला-डण्डा जैसे अर्थों के पर्याय के रूप में अगर माल-“असबाब” पर विचार करें तो प्राचीन अरब समाज का जन-जीवन उभरता है। अरब के विस्तीर्ण मरुस्थलों में बद्दु जाति के लोग अपने मवेशियों के साथ सतत यायावरी करते थे और दाना-पानी मिलने पर यहाँ-वहाँ डेरा जमा लेते थे। अरबी में माल का अर्थ होता है पशु और असबाब यानी शिविर, तम्बू। इन दोनों से मिल कर बनता है माल-असबाब जिसमें समूची गृहस्थी या कीमती वस्तुओं का समावेश हो जाता है। प्राचीन घूमंतू जनजातियों के जीवन का सबसे बड़ा आधार ही उनके पशु और उनका तम्बू होता था। कबाइली जनजातियों के लिए खानाबदोश जैसी उपमा से भी यह स्पष्ट होता है। “खाना” का अर्थ होता है प्रकोष्ठ या आश्रय। यहाँ तम्बू का भाव स्पष्ट है। “दोश” यानी कंधा अर्थात अपने कंधों पर अपना घर लिए फिरने वाले लोग यानी बेदुइन ही खाना-ब-दोश हुए। तम्बू को खड़ा करने में रस्सी और डण्डे की बड़ी भूमिका है। इसी तरह मवेशियों को बांध कर रखने में भी रस्सी एक ख़ास ज़रिया है। तम्बू ही बद्दुओं का आश्रय था। तम्बू में ही गृहस्थी की अर्थवत्ता समायी है अर्थात दुनियादारी की सभी वस्तुएँ। हिन्दी के झोला-डण्डा, झोला-रस्सी जैसे शब्दयुग्म में समूची गृहस्थी की अर्थवत्ता समायी हुई है।
स्पष्ट है कि “माल-असबाब” में सबब के प्रचलित अर्थ यानी कारण, वजह, प्रयोजन की अर्थवत्ता महत्वपूर्ण न होते हुए इसके प्राचीन भाव का ज्यादा महत्व है। यूँ कारण, वजह, प्रयोजन जैसे अर्थ भी रस्सी की अर्थवत्ता से ही विकसित हुए हैं। रस्सी में समाए माध्यम के भाव का विस्तार हुआ। वस्तुओं, पदार्थों, साज़ो-सामान, जमाजत्था जैसे अर्थ अकारण विकसित नहीं हुए। दरअसल दैनंदिन काम में आने वाली चीज़ें, उपकरण भी माध्यम हैं, एक जरिया हैं। प्रयोजन सिद्ध करने का माध्यम हैं। हमारे इर्दगिर्द जो असबाब है दरअसल वही जीवन का निमित्त है। जीवन का स्थूल अर्थ अब गृहस्थी के साधन जुटाना ही रह गया है सो साज़ोसामान के अर्थ में असबाब का प्रयोजन होना यहाँ सिद्ध है। जॉन प्लैट्स के कोश में  औपनिवैशिक दौर की हिन्दुस्तानी ज़बान में प्रचलित  असबाब के  उदाहरण  दिए हुए हैं जैसे असबाब ए पेशा अर्थात व्यवसायगत वस्तुएँ, असबाब ए जंग यानी युद्ध का साज़ोसामान, असबाब ऐ खानादारी यानी बैठकखाने की चीजें-फ़र्निचर, असबाब ए सफ़र यानी यात्रा की ज़रूरी चीज़ें।
ब बात “मालमत्ता” की। माल का अर्थ तो ऊपर स्पष्ट है। “मत्ता” दरअसल अरबी से आया शब्द है और हिन्दी में इसकी स्वतंत्र उपस्थिति न होकर“मालमत्ता” में ही देखने को मिलती है। अरबी में इसका शुद्ध रूप है “माअता” और इसे “मताआ” भी उच्चारा जाता है। अरबी मे प्रश्नवाचक सर्वनाम है “मा” जिसका अर्थ होता है- यह क्या है। इंडो-ईरानी भाषा परिवार में जिस तरह प्रश्नवाची सर्वनाम “की” के फ़ारसी रूपान्तर “ची” में पदार्थ की अर्थवत्ता आ जाने से “ची” का चीज़ रूपान्तरण हुआ और इसका अर्थ वस्तु हुआ ठीक वैसे ही अरबी सर्वनाम “मा” के साथ हुआ। “माअता” शब्द का अर्थ भी वस्तु ही होता है। “मताआ” में हर उस आमफ़हम चीज़ का शुमार है जो जीवन जीवन निर्वाह के लिए ज़रूरी है। उर्दू शायरी में “मता” शब्द का प्रयोग पढ़ने को मिलता है जैसे मता ए बाज़ार यानी बाज़ार में बिकने वाली वस्तु। मता ए ग़ैर यानी किसी और की चीज़।

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Monday, September 19, 2011

दिल चीज़ क्या है…नाचीज़ क्या है…

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कु दरती तौर पर नज़र आने वाली ज्यादातर चीज़ों के पैदा होने का एक ख़ास तरीका होता है मगर भाषा के बदलने और शब्दों के जन्म लेने के पीछे तयशुदा सिलसिला नहीं है। कोई शब्द आज जिस रूप में है, उसका कल क्या रूप होगा, कहा नहीं जा सकता। यही नहीं, बदले रूप में उसका क़िरदार क्या होगा इसका भी कुछ ठिकाना नहीं। हिन्दी में “चीज़”बड़ा आमफ़हम शब्द है। “चीज़” की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। सूक्ष्म से लेकर दीर्घकाय वस्तुएँ इसमें शामिल है। मामूली से लेकर बेशक़ीमती पदार्थ तक इसमें आते हैं। बेजान वस्तुओं से लेकर प्राणी तक इसके दायरे में शामिल हैं। क़ुदरत की बनाई नायाब चीज़ों में हीरा भी है और हीरे की खदान भी है। नदी भी है तो सागर भी। सहरा भी है और जंगल भी। हवा, पानी, पेड़, फूल, पत्ती, सोना, चांदी सब कुछ उन चीज़ों में शामिल है जिन्हें कुदरत ने बनाया है। इनसान भी इन्हीं में से एक चीज़ है। आशिकमिज़ाज लोग दिल को “चीज़” कहते हैं विनम्रतावश शरीफ़ लोग खुद को भी “नाचीज़” कहते हैं। चीज़ दरअसल फ़ारसी से बरास्ता उर्दू ज़बान, हिन्दी में दाखिल हुआ। हिन्दी की बोलियों में चीज़बस्त शब्दयुग्म भी प्रचलित है जिसका अर्थ है रोज़मर्रा के काम की वस्तुएँ। चीज़ में स्थूल रूप से पदार्थ का भाव है। इसमें चल-अचल सम्पत्ति, सामान, मालमत्ता, असबाब, सामग्री आदि सब कुछ शामिल है। जॉन शेक्सपियर के कोश के मुताबिक इसमें सरंजाम, डंडा-डेरा, साज़ो-सामान, घर-बार, झोला-तम्बू सब आ जाता है।
“चीज़” की व्युत्पत्ति के जन्मसूत्र इंडो-ईरानी भाषा परिवार के प्रश्नवाची सर्वनाम से जुड़े हैं। सृष्ठि में जो कुछ भी दृश्यमान है, सब “पदार्थ” की श्रेणी में आता है। वैशैषिक दर्शन में विश्व को छह पदार्थों (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय) में समेट दिया गया है। मनुष्य का मूल स्वभाव है अस्तित्व के प्रति जिज्ञासु होना। यह बहुत महत्वपूर्ण है। जागृत विश्व में अस्तित्व के प्रति जिज्ञासा प्रकट करने के लिए छह प्रकार के ककार हैं। हिन्दी में इन्हें प्रश्नवाची सर्वनाम अर्थात क्या, क्यों, कहाँ, कब, कैसे, कौन कहा जाता है। इन्हें ककार इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनमें “क” वर्ण या ध्वनि है। इसी तरह अंग्रेजी में फाईव डब्ल्यू और वन एच में भी यही बात हैं। गौरतलब है कि हमारे यहाँ "क" की महिमा है तो अंग्रेजी में "डब्ल्यू" की। इनमें रिश्तेदारी है, जिसकी चर्चा आगे। संस्कृत के “क” (कः) वर्ण में जिज्ञासा का भाव महत्वपूर्ण है। मेरा मानना है कि “चीज़” के मूल में भी इसी ‘क’ की माया है। हिन्दी की अनेक बोलियों में जानने के लिए, प्रश्नवाचक “की/ki” (की?) शब्द बोला जाता है। अभिप्राय “क्या” से होता है। “की” में “क्यों” का भाव भी है। इंडो-ईरानी भाषा परिवार में इस “की” का रूपान्तर “ची” में भी होता है। लोक बोली में मुख-सुख के आधार पर “क्यों” के “चों” या “च्यों” जैसे रूप भी सुनने को मिलते हैं। तुतलाने वाले भी “क्यों” की एवज में “च्यों” का उच्चार करते हैं।
हरहाल “की/ki” का प्रयोग “क्या” अथवा “कौन” के लिए होता है, यह स्थापित सत्य है। प्रश्नवाची सर्वनाम “किस” पर विचार करते हुए भाषाविज्ञानी भोलानाथ तिवारी संस्कृत के “कस्य” शब्द के आदिरूप “किस्य” की कल्पना करते हैं। इसमें संस्कृत के “किम्” का पुरानी फ़ारसी में “चिम्” रूप बतलाते हैं। इसी तरह डॉ फ्रिट्ज़ रोज़ेन भी फ़ारसी में कौन के लिए “की ki” और क्या के लिए “ची chi” शब्द में अंतर्संबंध बताते हैं। बात को और स्पष्ट करने के लिए एक और सर्वनाम की मिसाल देखते हैं। हिन्दी का अनिश्चयवाची सर्वनाम है “कुछ”। हिन्दी की विभिन्न बोलियों में इसके “कुच्छो, कछू, किछु” जैसे रूप भी मिलते हैं। इसका प्रयोग निर्जीव पदार्थों के अस्तित्व को उजागर करने के लिए होता है। उदयनारायण तिवारी समेत अनेक विद्वानों ने कुछ की व्युत्पत्ति किं-चिद् से मानी है जिसका हिन्दी रूप किंचित् है। पदार्थ के अस्तित्व का यही भाव “की/ki” के फ़ारसी रूपान्तर “ची” में भी देखने को मिलता है और इसी वज़ह से वस्तु या पदार्थ के अर्थ में ही प्रश्नवाची सर्वनाम “ची” का रूपान्तर “चीज़” हो गया। अलबत्ता पदार्थ के प्रति कुछ में जो तुच्छता का भाव है, वैसा “चीज़” में नहीं है। “चीज़” में जब तुच्छता प्रकट की जाती है तो उसके आगे विलोमार्थक “ना” उपसर्ग लगाकर “नाचीज़” शब्द बनाया जाता है अर्थात जो तुच्छ हो। तुच्छ वही है जो हीन है, क्षीण है या महीन है। जाहिर है चीज़ में महत्व निहित है। यह भी कि किं-चिद् से अगर “कुछ” बनता है तो “ची”(की) से “चीज़” बनना तार्किक है।
चीज़ में ज्यादातर वैशिष्ट्य, महत्वपूर्ण जैसी अर्थवत्ता है। कोई खास वस्तु, कीमती पदार्थ, मालमत्ता, माल-असबाब, सम्पत्ति, खास आदमी वगैरह चीज़ के दायरे में आते हैं। मराठी में भी “चीज़” और “चीज़बस्त” शब्द का अर्थ कीमती पदार्थ, खास बात या कोई पदार्थ, टुकड़ा, पीस piece ही है। जेटी मोल्सवर्थ अपने मराठी कोश में चीज़ का अर्थ स्पष्ट करते हुए मिसाल देते हैं कि गायन जैसी कोई चीज़ नहीं ( गायना सारखी दुसरी चीज नाहीं) ज़ाहिर है यहाँ चीज़ का अभिप्राय कला से है। यानी पदार्थ की श्रेणी में गुण भी शामिल है। इसके विपरीत मराठी में कभी कभी तुच्छता का भाव प्रकट करने के लिए भी चीज़ का प्रयोग होता है जैसे- इस लड़के ने तो मेरी मेहनत की “चीज़” कर दी (ह्या पोराने माझ्या श्रमाचे चीज केले) यहाँ आशय मेहनत पर पानी फेरने से ही है। खानोलकर और सरमोकदम के मुताबिक बखानने योग्य बात, सराहने योग्य बात भी “चीज़” हैं मसलन किसी कविता की पंक्ति, कोई उक्ति या श्लोक आदि। संगीत घरानों में पुरानी घरानेदार बंदिश को चीज़ कहने की रिवायत रही है जैसे-राग दरबारी की एक चीज़ पेश है।
इंडो-ईरानी परिवार का “चीज़” शब्द अंग्रेजी में भी गया और वहाँ इसका रूप हुआ Cheese. पश्चिमी भाषाविज्ञानियों के अनुसार अंग्रेजी का चीज़ Cheese भी उर्दू-फ़ारसी के चीज़ से ही गया है जिसका अर्थ है पदार्थ, कुछ आदि। भाषा विज्ञानियों के मुताबिक पुरानी फ़ारसी में “किस-की” जैसे शब्दों का अर्थ वही था जो संस्कृत के “कस्य” या “किस्य” का था। यहाँ ध्यान रखा जाना चाहिए कि बाद के दौर में किस-की के “चिस-ची” जैसे रूप बने होंगे तभी “ची” से “चीज़” जैसे सूप सामने आए। “किस” में भी “कौन” का ही भाव है। एटिमऑनलाइन के मुताबिक इसका रिश्ता प्रोटो इंडो-यूरोपीय धातु kwo- से ही जिससे ही अंग्रेजी का “हू who” (कौन) बना है। गौर करें संस्कृत में भी प्रश्नवाचक सर्वनाम “क/ka” से शुरू होते है और भारोपीय भाषाओं में भी जैसे अवेस्ता में को, रूसी में क्तो, लिथुआनी में कस, लैटिन में क्वी, क्वे, क्वोद, स्लोवानी में कुतो ( संस्कृत के कुतः से साम्यता देखें) आदि। बात यहाँ भी प्रश्नवाची सर्वनाम से ही जुड़ रही है। अंग्रेजी के चीज़ की अर्थवत्ता भी महत्वपूर्ण है। औपनिवैशिक काल के शुरुआती दौर में इसकी अर्थवत्ता में तुच्छता का भाव था मगर बाद में असली माल, बड़ी बात या ऐसी कोई भी चीज़ जो खास हो, के अर्थ में चीज़ का मुहावरेदार प्रयोग होने लगा। हॉब्सन जॉब्सन के कोश से इसका पता चलता है।
ब आते हैं चीज़बस्त पर। दरअसल यह सामासिक पद है और “चीज़” तथा “बस्त” से मिल कर बना है। फ़ारसी में “बस्त” में भी वस्तु का ही भाव है। वस्तु का एक रूपान्तर बत्तू भी होता है। चीज़ भी पदार्थ है और वस्तु भी पदार्थ है। समान अर्थ वाले शब्दों के मेल से बने सामासिक पद अकसर लोकभाषा में मुखसुख के आधार पर बनते हैं जैसे सामान-सुमान। भारोपीय भाषाओं में “व” का रूपान्तर “ब” में होना आम बात है सो संस्कृत की वस्तु फ़ारसी में “बस्त” हो जाती है। वस्तु बना है “वस्” धातु से। संस्कृत की वस् धातु में रहने का भाव है। गौरतलब है कि वस्तु यानी पदार्थ के रूप में “वस्” धातु का अर्थ अवस्थिति, उपस्थिति या मौजूदगी से है। भाव अस्तित्व का ही है। वासः यानी मकान के अर्थ में निवास, आवास जैसे शब्द भी इसी मूल से आ रहे हैं। परिधान के अर्थ में कपड़ों के लिए वस्त्र शब्द भी इसी मूल से निकला है। वस् अर्थात जिसमें वास किया जाए। यह दिलचस्प है कि काया जिस आवरण में निवास करती है, उसे वस्त्र कहा जाए। वस् धातु का अर्थ होता है ढकना, रहना, डटे रहना आदि। यही नहीं, गाँव देहात में आज भी घरों के संकुल या मौहल्ले के लिए बास या बासा (गिरधर जी का बासा) शब्द काफी प्रचलित है। वस् से ही बना है वसति जिससे निवास या रहने का भाव है। हिन्दी का बस्ती शब्द इससे ही बना है। इस तरह वस्तु का अर्थ हुआ कोई चल या अचल पदार्थ।
कुछ लोग इस बस्त को बंदोबस्त या बस्तोबंद वाले बस्त से जोड़ कर देखते हैं। इस दूसरे बस्त का अर्थ होता है बांध कर रखा हुआ या बांधा हुआ। संस्कृत का “बद्ध” अवेस्ता में बस्तः हुआ जिसका मतलब हुआ जिसे बांधकर, जमा कर, तह कर या गठरी बांधकर रखा गया हो। इसी से बना फारसी-उर्दू में बस्ता यानी स्कूल बैग या पोथी-पोटली। पुराने जमाने में विद्याध्ययन के लिए छात्रों को दूर दूर तक जाना पड़ता था और वे घर से कई तरह का सामान साथ ले जाया करते थे। तब सफर भी पैदल या घोड़ों पर ही तय किया जाता था जाहिर है सामान को सुरक्षित रखने के लिए उसे बेहद विश्वसनीय तरीके से बांधकर या जकड़ कर रखा जाता था। यह क्रिया पहले बद्ध कहलाई फिर इससे बस्तः शब्द बना। इसमें गठरी बैडिंग या पुलंदे का भाव था। बाद में बस्ता के रूप में स्कूलबैग के अर्थ में सिमट कर रह गया।

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Sunday, July 3, 2011

जीहुजूरिया, यसमैन और जीमैन

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र भाषा में विविध भावों को व्यक्त करने वाले विभिन्न उच्चार या संबोधन होते हैं। किसी का संबोधन सुनने या कही गई बात को आत्मसात करने वाली ध्वनि है “हुँ” या “हूँ”। इसी तरह स्वीकार के भाव को व्यक्त करने वाला उच्चार है “हाँ”। नकार के लिए “ना” है। इसी तरह का एक उच्चार है “जी”। इस “जी” की व्याप्ति हिन्दी में जबर्दस्त है। यही नहीं, इस “जी” में शायराना सिफ़त भी है। रूमानी अंदाज़ वाली बात हो या उस्तादाना तबीयत वाली नसीहत, इस “जी” की मौजूदगी से रंगत आ जाती है। मिसाल के तौर पर अनपढ़ फिल्म में राजा मेंहदी अली खान के लिखे गीत की यह पक्ति – “जी” हमें मंजूर है आप का हर फैसला / कह रही है हर नज़र बंदापरवर शुक्रिया....।  “जी” की अभिव्यक्ति मुहावरेदार भी होती है जैसे किसी की हाँ में हाँ मिलाने को उर्दू में ‘जीहुज़ूरी’ कहा जाता है। इस ‘जी’ की मौजूदगी यहाँ बखूबी पहचानी जा सकती है।
जी कहाँ से आया इसकी बात इसी “जीहुज़ूरी” से करते हैं। “जीहुज़ूरी” का अर्थ जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है “हाँ में हाँ मिलाना” है। “जीहुजूरी” में “जी हुज़ूर” को साफ़ पहचाना जा सकता है। “हाँ में हाँ मिलाना” का अर्थ है किसी की बात के अंत में “हाँ हाँ” कहते चले जाना। साफ़ है कि सुनने वाला व्यक्ति सभी बातों को स्वीकार कर रहा है। स्वाभाविक है कि “हाँ हाँ” कहने वाला व्यक्ति सामने वाले की सत्ता के आगे नतमस्तक है। अंग्रेजी में इस “हाँ” की जगह ‘यस’ कहने का प्रचलन है। जब सामने वरिष्ठ वयक्ति हो तो ‘यस’ के आगे ‘सर’ जुड़ जाता है अर्थात ‘यस सर’। गौर करें यह ‘यस सर’ दरअसल “जी हुज़र” ही है। हुज़ूर यानी श्रीमान, मान्यवर, मालिक, श्रीमंत, हुकुम आदि। अंग्रेजी में इसे “सर” कहते हैं। समाज ने अंग्रेजी में “यस सर“ कहने वाले के लिए “यसमैन” टर्म विकसित कर ली और हिन्दुस्तानी में इसे “जीहुज़ूरिया” कहा जाने लगा। सरकारी भाषा में श्रीमान शब्द भी सर के लिए प्रचलित है और कई लोग वरिष्टों की बात सुनने के बाद हर बार श्रीमान श्रीमान कहते हैं।
स्पष्ट है कि “जी” दरअसल सामने वाले के लिए आदरयुक्त संबोधन या उच्चार है जिसमें उस व्यक्ति का रुतबा उभरता है। राजस्थान में हुकुम कहने का चलन है। वहाँ के सामंती समाज में वरिष्ठ व्यक्ति के लिए हुकुम, होकम जैसे संबोधन प्रचलित हुए। आज भी वहाँ ‘यस सर’ की तरह सिर्फ़ हुकुम या होकम कहने का प्रचलन है। यह अलग बात है कि होकम कहने में सचमुच जो आत्मीयता और आदर का भाव है वह “यस सर” में निहित जीहुज़ूर वाली चाटूकारिता से नहीं आ रहा है। संस्कृत हिन्दी में श्रीमान, श्रीमन्त, मान्यवर जैसे संबोधन हैं किन्तु प्राचीन भारत में बलशाली, सम्भ्रान्त, शिष्ट, कुलीन, शालीन, माननीय, अमीर व्यक्ति के लिए “आर्य” संबोधन प्रचलित था। मुझे लगता है यह “जी” इसी “आर्य” का अपभ्रंश है। भारोपीय भाषाओं में अक्सर संस्कृत की “य” ध्वनि का प्राकृत रूप “ज” हो जाता है। “युवन्” का “जवान”, “जुवनाइल”, “युवा” का “जुवा”, “यौवन” का “जोबन”, “यव” का “जौ” जैसे कई उदाहरण हैं। आर्य > आर्य्य > आज्ज > अज्ज > जी कुछ यह क्रम रहा होगा इस “जी” के विकास का।
“आर्य” शब्द की विस्तृत अर्थवत्ता पर हम अगली किसी कड़ी में चर्चा करेंगें फिलहाल हम इससे बने जी पर ही बात कर रहे हैं। प्राचीनकाल में श्रेष्ठिजनों के लिए “आर्य” शब्द आम था। सामान्य कार्यव्यवहार में जैसे आजकल “यस सर”, या “हुकुम” जैसे संबोधन होते हैं वैसे ही “आर्य” शब्द भी प्रचलित था अर्थात हर वाक्य के बाद सुनने वाला उसी तरह “आर्य” कहता था जैसे अब “सर”, “बॉस” या “हुकुम” कहा जाता है। गौर करें हिन्दी की विभिन्न बोलियों में दादी या नानी के लिए “आजी” शब्द है। यह दरअसल “आर्यिका” से आ रहा है। आर्य का स्त्रीवाची हुआ आर्यिका। आर्य अर्थात श्रेष्ठ, कुलीन इसी तरह आर्य स्त्री के लिए आर्यिका शब्द रूढ़ हुआ। प्राकृत / अपभ्रंश में इसका रूप है “अज्जिका” और आज की बोलियों में यह “आजी” हुआ। मराठी में दादी को “आजी” और दादा को “आजोबा” कहते हैं और परदादा को “पंजोबा”। आर्यिका से बने “आजी” शब्द में निश्चित ही घर की मुखिया, प्रमुख और प्रभावशाली महिला का भाव है। जाहिर है “आजोबा” की पत्नी भी उसी सम्मान की हकदार हुई। संस्कृत ग्रंथों में “आर्या” शब्द का भी उल्लेख है जिसमें भी सम्मानजनक उक्त सभी भाव निहित हैं।
कुल मिला कर “जी” शब्द संबोधनसूचक है प्राचीन भारतीय परम्परा से आ रहा है। हिंग्लिश के इस दौर में “यस मैन” की तर्ज पर हम “जीमैन” जैसी टर्म भी चला सकते हैं। इससे पहले ही हम सरजी और ओकेजी जैसी टर्म तो बना ही चुके हैं। स्वीकारसूचक भाव के लिए हाँ के साथ भी जी जुड़ गया और हाँजी बन गया। याद रखें इस के पीछे “हाँ आर्य” अर्थात सही है श्रीमान ही छुपा हुआ है। प्रश्नवाचक भाव के रूप में क्यों शब्द के साथ भी जी जुड़ा हुआ नज़र आता है यानी क्योंजी। इसमें पूछने वाले के प्रति सम्मान या आदर का भाव है। आर्य से बने अज्ज का एकदम प्राकृत रूप तो अजी में नज़र आता है जो रोजमर्रा की बातचीत के औपचारिक सम्बोधन में आमतौर पर शुमार होता है। इसके अलावा जी साहबजी, जी सरजी में भी इसे देख सकते हैं और व्यक्तिनाम के पीछे, सम्बोधनों के पीछे जैसे रमेशजी, सुरेशजी, ताईजी, भाईजी, पिताजी, माताजी के साथ भी इसके आदरसूचक भाव प्रकट हो रहे हैं।
आर्य और इससे बने अन्य शब्दों की बाबत अगली कड़ी में

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Friday, June 24, 2011

स्मरण, सुमिरन से मेमोरंडम तक

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दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे होय।। कबीरवाणी का यह दोहा जगप्रसिद्ध है। इसमें जो सुमिरन शब्द है वह महत्वपूर्ण है। सुमिरन शब्द में आई ध्वनियां बड़ी मधुर हैं और इसके मायने भी लुभावने हैं। सुमिरन में ईश्वर को याद करने का भाव है। अनंतशक्ति के प्रति अगाध शृद्धा रखते हुए ध्यान केन्द्रित करना ही सुमिरन है। सुमिरन शब्द बना है संस्कृत के स्मरण से। स्मरण > सुमिरण > सुमिरन के क्रम में इसका विकास हुआ। हिन्दी की विभिन्न बोलियों में यह सुमरन, सुमिरण के रूप में मौजूद है और पंजाबी में इसका रूप है सिमरन जहाँ प्रॉपर नाऊन की तरह भी इसका प्रयोग होता है। व्यक्तिनाम की तरह स्त्री या पुरुष के नाम की तरह सिमरन का प्रयोग होता है। बहुतांश हिन्दीवाले पंजाबी के सिमरन की संस्कृत के स्मरण से रिश्तेदारी से अनजान हैं क्योंकि सुमिरन की तरह से पंजाबी के सिमरन का प्रयोग हिन्दीवाले नहीं करते हैं बल्कि उसे सिर्फ व्यक्तिनाम के तौर पर ही जानते हैं।
स्मरण शब्द बना है संस्कृत की स्मर् धातु से। मोनियर विलियम्स के संस्कृत इंग्लिश कोश के मुताबिक स्मर् में याद करना, न भूलना, कंठस्थ करना, याददाश्त जैसे भाव हैं। संस्कृत हिन्दी का स्मृति शब्द भी इसी मूल से आ रहा है। भाषा की खासियत है लगातार विकसित होते जाना। मनुष्य ने भाषायी विकास के दौर में लगातार उपसर्ग और प्रत्यय जैसे उपकरण विकसित किए हैं जिनके ज़रिए नए नए शब्दों का सृजन होता गया है। स्मर् में निहित याद रखने का भाव ही इसके उलट भूलनेवाली क्रिया के लिए भी इसी स्मर् धातु से नया शब्द बना लिया गया। संस्कृत का प्रसिद्ध उपसर्ग है वि जिससे रहित, कमी या हीनता का बोध होता है। स्मरण में वि उपसर्ग लगने से बनता है विस्मरण जिसका अर्थ है भूल जाना, याद न रहना। आए दिन इस्तेमाल होने वाला हिन्दी का विस्मृत शब्द इसी मूल से आ रहा है। विस्मरण क्रिया  का ही देशी रूप है बिसरना अर्थात भूलना। इसी तरह बना है बिसराना यानी भूलाना या भूल जाना। मराठी में इसी विस्मरण का रूप होता है विसरणें जिससे यहां और भी कई शब्द बने हैं।
स्मरण से ही बना है सुमिरनी शब्द। सुमिरनी यानी वह माला जिसमें मनका, मोती या रुद्राक्ष के दाने होते हैं। हिन्दू संस्कृति में 108 की संख्या का खास महत्व है। वैसे यह संख्या कुछ भी हो सकती है। सुमिरनी का उपयोग नाम स्मरण के लिए होता है। विश्व की कई प्राचीन संस्कृतियों में नाम स्मरण की परम्परा रही है। इस्लाम में भी नाम स्मरण का रिवाज़ है। सुमिरनी को अरबी में तस्बीह कहा जाता है। किसी शायर ने फ़रमाया है- मोहतसिब तस्बीह के दानों पे ये गिनता रहा/ किनने पी, किनने न पी, किन किन के आगे जाम था। परम्परा के अनुसार सुमिरनी को हाथ में पकड़ कर उस पर एक छोटी सफेद थैली डाल ली जाती है। तर्जनी उंगली और अंगूठे की मदद से नाम स्मरण करते हुए सुमिरनी के दानों को लगातार आगे बढ़ाया जाता है। सुमिरनी दरअसल एक उपकरण है जो नामस्मरण की आवृत्तियों का स्मरण भक्त को कराती है।
tasbihअंग्रेजी के मेमोरी शब्द का रिश्ता भी इस शब्द शृंखला से जुड़ता है।  हालाँकि डगलस हार्पर की एटिमॉनलाईन के मुताबिक मेमोरी शब्द का रिश्ता प्रोटो भारोपीय धातु *men-/*mon से  है जिसमें चिंतन या विचार का भाव निहित है। यह वही धातु है जिसकी रिश्तेदारी हिन्दी के मन और अंग्रेजी के mind से है। स्पष्ट है कि मन या माइंड में ही सोच, विचार या चिन्तन की प्रक्रिया सम्पन्न होती है। रामविलासजी के अनुसार स्मर् और मेमोरी एक ही मूल के हैं। मेमोरी यानी याददाश्त। पश्चिम की ओर गतिशील गण समाजों में स्मर् की ध्वनि का लोप हुआ और वर्ण विपर्यय के जरिए मेमोरी शब्द बना। संस्कृत में सोचने के लिए मन् धातु है और अन्तर्मन के रूम में मन के लिए मनस् है। दरअसल ध्यान, चिन्तन और मनन में प्रकाशवाची भाव है क्योंकि मनन चिन्तन दरअसल मन्थन की प्रक्रिया है और मन्थन के बाद प्रकटन, उद्घाटन होता है विचार का। इस प्रकटन में प्रकाशित होने का भाव प्रमुख है। इसीलिए चन्द्रमा के लिए संस्कृत में जो चन्द्रमस् शब्द है, इसका मस् में भी आधारभूत रूप में मन् ही है। प्रकाश, चमक या कान्ति का गुण ही चन्द्रमा में सौन्दर्य की स्थापना करता है।
डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार यह मन्स है। इससे जब का लोप हुआ तब जाकर मस् प्रचारित हुआ। ग्रीक मेनस् और मेने में विद्यमान है। इन सभी धातुओं के मूल में ध्वनि प्रमुख है जिसमें प्रकाशित होने के भाव का विस्तार चिन्तन से भी जुड़ता है और चमक से भी। मति, मत आदि भी इसी कड़ी में आते हैं। मन, मिन्, मेने, मेन्सिस जैसे अनेक रूप इन्हीं अर्थों में ग्रीक व लैटिन में हैं। यह तय है कि मन् का प्राचीन रूप मर् था। लैटिन के मैमॉर् अर्थात स्मृति में मर् के स्थान पर मॉर है। संस्कृत के स्मर, स्मरण, स्मृति में स-युक्त यही मर्  है। अंग्रेजी के मेमोरंडम शब्द का रिश्ता भी इसी मेमॉर से है जिसके लिए हिन्दी में स्मरणपत्र बनाया गया है। बुध के लिए मरकरी नाम में मर् की यही आभासिता प्रकाशमान है। गौरतलब है मरकरी के संस्कृत नाम बुध की मूल धातु बुध् है जिससे प्रकाश, ज्ञान, बुद्धि संबंधी शब्दावली के अनेक शब्द बने हैं। इस पर शब्दों का सफर की पिछली कड़ियों में लिखा जा चुका है।

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Wednesday, June 22, 2011

हाल कैसा है जनाब का….?

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हिए, क्या हाल हैं? अमूमन हर हिन्दीभाषी का एक दूसरे से संवाद इसी वाक्य से शुरू होता है। इसके जवाब में ज्यादातर लोग यही कहना चाहते हैं कि-हाल तो बेहाल हैं मगर शर्माशर्मी में "ठीक है" कहकर काम चला लेते हैं। चंद संतोषीजनों का जवाब कुछ यूँ होता है-जिस हाल में भी ऱखे है, ये बंदापरवरी है/ और यूँ भी वाह वाह है, और यूँ भी वाह वाह है। हिन्दी में हाल से अभिप्राय है परिस्थिति, अवस्था या दशा से। क्या हाल हैं में इन्ही सब बिन्दुओं के बारे में जानकारी लेने का भाव है। अवस्था के संदर्भ में हाल का भाव स्वास्थ्य से भी जुड़ता है। ग़ालिब साहब फ़र्माते हैं कि- उनके देखे से जो आजाती है मुँह पे रौनक / वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है। हिन्दी की खासियत है कि इसे बोलनेवाले जब दूसरी संस्कृतियों के सम्पर्क में आते हैं तो सबसे पहले वे नई भाषा से जुड़ते हैं। अरबी फारसी का हिन्दी पर बहुत प्रभाव है और हाल शब्द भी अरबी ज़बान से हिन्दी में आया है जो खूब इस्तेमाल होता है। प्रत्ययों और उपसर्गों के जरिए इससे बने शब्द भी खासी तादाद में प्रचलित हैं। फारसी के बद् या बे उपसर्गों के जरिए हाल से बेहाल, बदहाल जैसे शब्द भी बनते हैं जिनका अभिप्राय बुरी परिस्थिति या दुरवस्था से होता है। तंगहाली यानी ग़रीबी। यह हाल मुहावरों भी खूब इस्तेमाल होता है मसलन-वो हाल करेंगे कि याद रखोगे। क्या हाल कर दिया है। हाल-बेहाल हैं वगैरह वगैरह।

रबी का हाल-haal बना है सेमिटिक धातु hwl जिसमें बदलाव, परिवर्तन, अदलाबदली जैसे भावों के साथ साथ मंडल,  घेरा, परिधि, दायरा का आशय भी है। इसके अलावा इसमें वार्षिक चक्र की अर्थवत्ता भी समायी हुई है।  इसके अलावा इसमें हस्तक्षेप, अवरोध, प्रयास आदि आशय भी हैं। hwl से बने हाल शब्द में परिस्थिति, अवस्था या दशा का भाव है। यहाँ स्पष्ट करना ज़रूरी है कि इसमें अतीत से वर्तमान के बदलाव का भाव है अर्थात हाल क्या है में किसी वस्तु, मनुष्य या स्थान की अवस्था में आए परिवर्तन या बदलाव की बाबत जानने का भाव निहित है। आज हाल यह है कि हाल शब्द के विकल्प के तौर पर अधिकांश हिन्दीदाँ परिस्थिति, दशा या अवस्था का प्रयोग नहीं करते हैं। बोलचाल की हिन्दी में इन सभी शब्दों के विकल्प के तौर पर हाल शब्द को ही हरहाल में अपनाया गया है। हाल की कड़ी का दूसरा शब्द है हालत जिसका सीधा सा अर्थ भी दशा या परिस्थिति ही है। हालत का बहुवचन होता है हालात और यह शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है। अक्सर हिन्दी वाले हालत और हालात को एक ही मानते हूए हालात का भी बहुवचन हालातों के तौर पर करते हैं जो ग़लत है। हिन्दी-उर्दू के हवाला शब्द की रिश्तेदारी भी हाल से है जिसमें अदला-बदली, परिवर्तन जैसे भाव हैं।
रअसल हाल का ही एक रूप हवाल है जिसका फ़ारसी उर्दू रूप हवाला होता है। बिहारी की प्रसिद्ध पंक्ति-अलि कलि ही सो बिन्ध्यो, आगे कवन हवाल में इस हवाल की शिनाख्त हो रही है। गौरतलब है कि बिहारी ने यह पंक्ति क़रीब चार सदी पहले लिखी थी। हवाल का ही बहुवचन अहवाल है जिसका अर्थ होता है सूचना, समाचार, वृतांत रिपोर्ट आदि। गौरतलब है कि हवाल में जहाँ दशा, परिस्थिति का भाव है वहीं इसके बहुवचन अहवाल में सूचना, समाचार या वृतांत के भाव से स्पष्ट है कि कोई समाचार या सूचना दरअसल स्थान, वस्तु या व्यक्ति के बारे में किन्हीं परिवर्तनों या बदलाव के बारे में ही सूचित करती है। हवाल में निहित परिवर्तन का भाव बहुत व्यापक है और इसके अनेक मुहावरेदार प्रयोग हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे हवाले करना किसी के सिपुर्द करना। यहाँ परिवर्तन की बात स्पष्ट है। मराठी में रिपोर्ट के संदर्भ में अहवाल शब्द आमतौर पर चलता है। यूँ कहें कि सामान्य मराठीभाषी अहवाल शब्द से अरबी के जरिए नहीं बल्कि मराठी के जरिए ही परिचित है।
मौद्रिक लेनदेन के संदर्भ में हवाला कारोबार जैसी टर्म आज बहुत प्रचलित है। गैरकानूनी आर्थिक लेन-देन के संदर्भ में यह शब्द खूब सुनने को मिलता है। कालेधन को देश से बाहर भेजने में इसी हवाला व्यवस्था का सहारा कालाबाजारिए और जमाखोर लेते हैं। हवाला शब्द आज दुनियाभर में इसी अर्थ में इस्तेमाल होता है। वैसे लेन-देन की इस प्रणाली का जन्म भारत में ही  उस वक्त हुआ था जब आज की तरह बैंकिंग की नियमबद्ध कानूनी व्यवस्था अस्तित्व में नहीं थी। मुस्लिम दौर की प्रशासनिक व्यवस्था का एक आम हिस्सा था यह हवाला शब्द। हवलदार शब्द हिन्दी, मराठी, गुजराती जैसी भाषाओं में खूब प्रचलित है। आज की पुलिस व्यवस्था में भी कांस्टेबल को हवलदार कहा जाता है। पुराने ज़माने में हवलदार / हवालदार दरअसल शासन की ओर से नियुक्त कर वसूली करनेवाला कारिंदा या छोटा अफ़सर होता था। हवालदार उस फौजी अफ़सर को भी कहते थे जिसके सिपुर्द सिपाहियों की छोटी टुकड़ी होती थी। हवाला व्यवस्था में हवाला लेनदेन करानेवाला व्यक्ति हवालादार कहलाता है।
हाल या हवाल का रिश्ता अरबी की प्रसिद्ध उक्ति लाहौल विला कुव्वत से भी है। दरअसल यह इश्वर की प्रशंसा में कही गई उक्ति है जिसका उल्लेख कुर्आन के हदीस hadith में है। अरबी में इसका पूरा रूप है- ला हौल वा ला कुव्वता इल्ला बी अल्लाह। हिन्दी का ठेठ देसीपन इसमें भी घालमेल करता चलता है और इसका रूपांतर लाहोल बिला कूवत इल्ला बिल्ला हो जाता है। भाव यही है कि ईश्वर की मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं हो सकता। न तो किसी चीज़ अपने आप सामर्थ्यवान हो सकती है और न ही उसका रूप बदल सकता है। इस सृष्टि में कोई भी हेर-फेर, परिवर्तन सिर्फ़ और सिर्फ़ खुदा की मर्ज़ी से ही हो सकता है। यहाँ जो ला हौल है दरअसल उसका रिश्ता ही हाल, हवाला आदि से है अर्थात कोई परिवर्तन नहीं हो सकता, ईश्वर की मर्जी के बिना। हाल दरअसल साधना की वह उच्चतम अवस्था भी है जिसे समाधि या ध्यान भी कहते हैं। सामान्य जागृत अवस्था की तुलना समाधि अवस्था अपने आप में एक परिवर्तन है। सूफ़ी दार्शनिक शब्दावली में यही हाल है अर्थात ध्यानावस्था या तंद्रा है जिसमें योगी सीधे ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करता है। इसे ही कहते हैं हाल आना अर्थात समाधिस्थ होना।

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Thursday, June 16, 2011

शब्दजन्मांच्या सुरस कथा

आंतरभारतीय
सुजय शास्त्री मुख्य उपसंपादक/ दिव्य मराठी
[ भास्कर समूह का मराठी मराठी अखबार दैनिक दिव्य मराठी महाराष्ट्र में लांच हो चुका है। प्रसिद्ध पत्रकार कुमार केतकर इसके प्रधान संपादक हैं। मेरा सौभाग्य कि राजेन्द्र माथुर, एसपी सिंह जैसे ख्यात संपादकों के साथ काम करने के बाद अब मुझे मराठी के सबसे बड़े नाम कुमारजी के साथ काम करने का मौका मिला है। शब्दों का सफर को कुमार जी ने भी सराहा है। दिव्य मराठी के रविवारीय परिशिष्ट रसिक में उन्होंने इस प्रयास के बारे में खासतौर पर एक आलेख प्रकासित किया। मूल मराठी आलेख सफ़र के पाठकों के लिए यहां पेश है। ]
का गज’ हा शब्द अनेकांना फारसी, उर्दू कुलातील वाटतो. पण त्याचे मूळ आहे ते चिनी भाषेतले. पोर्तुगीज पाणी भरण्याच्या भांड्याला ‘बाल्डे’ म्हणत. बंगाली भाषेने ‘बाल्डे’ला ‘बालटी’ म्हणून आपल्यात सामावून घेतले .नंतर हिंदीने ‘बालटी’ शब्द आहे तसा उचलला. हिंदी भाषक पत्रकार अजित वडनेरकर अशाच शब्द व्युत्पत्तींच्या शोधात गेली २५ वर्षे प्रवास करत आहेत...
राठीत ‘बादली’ हा शब्द आला तो हिंदीतील ‘बालटी’ या शब्दांतून. पण हिंदीत तो कसा आला? १६व्या शतकात पोर्तुगीज वसाहती बंगालमध्ये वसल्यानंतर ते पाणी भरण्याच्या भांड्याला ‘बाल्डे’ असे म्हणत. त्या काळात बंगाली भाषेने ‘बाल्डे’ला ‘बालटी’ म्हणून आपल्यात सामावून घेतले आणि नंतर हिंदीने ‘बालटी’ शब्द आहे तसा उचलला. अशीच कथा आहे महाभारतातील व्यक्तिरेखा अर्जुनाची आणि दक्षिण अमेरिकेतील देश अर्जेटिना यांच्यातील नामसाधर्म्याची. संस्कृतमध्ये चांदीला ‘रजत’ म्हणतात. तर प्राचीन इराणी अवेस्ता भाषेत त्याला ‘अर्जत’ म्हणतात. ग्रीक भाषेत चांदीला ‘अर्जाेस’, ‘अर्जुरोस’ व ‘अर्जुरोन’ म्हणतात. संस्कृतमध्ये ‘अर्जुन’ म्हणजे चमचमणारा. लॅटिनमध्ये ‘अर्जेंटम’ या शब्दाचा अर्थ चांदी आहे. १५व्या शतकात द. अमेरिकेत चांदीच्या खाणींचा शोध लागला, तेव्हा त्यावरून ‘अर्जेंटिना’ हे एका देशाचे नाव पडले. शब्द व्युत्पत्ती ही संस्कृत भाषेची परंपरा आहे. मराठीमध्ये कृ. पां. कुलकर्णी यांनी मराठी व्युत्पत्ती कोश संपादित केला आहे. शब्दांच्या जन्माच्या शोधात अनेक मनोरंजक सफरी घडतात. या प्रवासात भाषांवर झालेले संस्करण, त्यावर निसर्गासह राजकीय आक्रमणे, धार्मिक चालीरिती, रिवाज यांचा पडलेला प्रभाव आढळून येतो. अनेकदा आपण आपल्याच भाषेतला शब्द वेगळ्याच भाषेतून आल्याचे लक्षात येताच चकित होतो. मग शब्दाच्या व्युत्पत्तीविषयी वाचायला गेले, की हजारो वर्षांचा इतिहास डोळ्यांसमोर उलगडत जातो. हिंदी पत्रकार अजित वडनेरकर अशाच शब्द व्युत्पतींच्या शोधात गेली २५ वर्षे प्रवास करत आहेत. ‘ऋषीचे कूळ आणि शब्दांचे मूळ शोधू नये’ असे म्हणतात. पण वडनेरकरांनी याकडे साफ दुर्लक्ष करत १० ग्रंथांपैकी पहिला ग्रंथ ‘शब्दों का सफर’ या नावाने प्रसिद्ध केला आहे.
5 june rasikया ग्रंथात वडनेरकर पूर्व भारतातील भाषांपासून पश्चिम युरोपीय देशामधील भाषांचा वेध घेतात. हा वेध घेता-घेता त्यांनी काही वेळा सेमेटिक (प. आशिया आणि उ. आफ्रिकेतील) भाषांच्या खिडक्या किलकिल्या केल्या आहेत. तर गरज पडल्यावर चिनी भाषेतही डोकावून पाहिले आहे. पण वाचकांसमोर शब्दांची उत्पत्ती मांडताना त्यांनी कोणतीही कसूर ठेवलेली नाही. एकीकडे वाचकांची जिज्ञासा शमवण्याचा त्यांचा प्रयत्न आहे, पण त्याचबरोबर चाणाक्ष वाचकाला इतिहासाची शिदोरीही ते देतात. प्राचीन काळापासून व्यापाराच्या निमित्ताने विभिन्न देशांदरम्यान वस्तूंचे जेवढे आदान-प्रदान झालेले आहे, त्याच्या कित्येक पट शब्दांचा व्यापार झालेला आहे. व्यापाराच्या निमित्ताने हजारो ज्ञात-अज्ञात व्यापारी, फिरस्ते, दर्यावर्दींनी जगातील अनेक प्रदेश, भाषिक समूहांशी संपर्क साधला. या संपर्कातून त्यांनी आपली भाषा, संस्कृती, चालीरिती देऊ केल्या. अशा अनेक मुसाफिरांना लोक विसरले पण त्यांनी देऊ केलेली भाषा, शब्द मात्र तसेच राहिले. काही शब्द जेते-जिते संबंधांतून लादले गेले तर काही शब्द सहजपणे परक्या भाषेत सामावले गेले. शब्दांचा हा व्यापार आजच्या आधुनिक युगातही तसाच सुरू आहे. अजित वडनेरकर शब्दांच्या प्रवासाचा मोठा ऐतिहासिक दस्तावेज डोळ्यांसमोर उभा करतात. अगदी नेहमीचा हिंदी शब्द ‘कागज’ची व्युत्पत्ती ते अत्यंत मनोरंजकपणे आणि प्रसंगी धक्का देत सांगतात. ‘कागज’ हा शब्द अनेकांना फारसी, उर्दू कुलातील वाटतो. पण त्याचे मूळ आहे ते चिनी भाषेतले. इसवी सन पूर्व पहिल्या शतकात कागदाचा शोध चीनमध्ये लागला. कागदाला चिनी भाषेत ‘गू-झी’ व ‘कोग-द्ज’ असे दोन शब्द सापडतात. कागद निर्मितीचे तंत्रज्ञान गुप्त ठेवल्याने त्याची माहिती कित्येक शतके उर्वरित जगाला नव्हती. पण सातव्या-आठव्या शतकात उजबेकिस्तानमध्ये ‘कोग-द्ज’ हा शब्द तुर्कीत ‘काघिद’ म्हणून पोहोचला. नंतर अरबी, फारसी व उर्दूत तो ‘कागज’ झाला. भारतात मराठी, राजस्थानीत तो ‘कागद’, तर तामिळमध्ये ‘कागिदम्’, मल्याळममध्ये ‘कायितम्’ व कन्नडमध्ये ‘कायिता’ असा झाला.
‘शब्दों का सफर’ हा एका अर्थी विश्वकोश लेखनाच्या जवळ जाणारा ग्रंथ वाटतो. कारण या ग्रंथात प्रत्येक शब्द ‘प्रिझम’मधून पाहिल्यासारखा भासतो. शब्दाचा इतिहास, त्याचा देश, त्याची जातसंस्कृती, सामाजिकता, राजकीय इतिहास यांना स्पर्श करणारा हा व्यापक संग्रह आहे. अजित वडनेरकर मध्य प्रदेशचे असले तरी त्यांचे मूळ मराठी आहे. त्यांचा जन्म मध्य प्रदेशातील सिहोर येथे झाला. आजोबा पं. लक्ष्मणराव बुधकर व आई विजया वडनेरकर यांच्या प्रभावामुळे ते साहित्याकडे वळले. हिंदी साहित्यात एम.ए. करताना त्यांचा हिंदीतील श्रेष्ठ साहित्यिक व भाषातज्ज्ञ डॉ. सुरेश वर्मा यांच्याशी संपर्क आला. त्यांच्या मौल्यवान शिकवणुकीतून हा ग्रंथ साकार झाला आहे. आजूबाजूचे वातावरण हिंदी असले तरी त्यांच्या लिखाणात मराठीत सापडणारा विनोद आहे. या विनोदाच्या माध्यमातून त्यांनी अत्यंत रुक्ष वाटणाºया शब्दांचे कुळ अगदी सहजतेपणाने, सोप्या भाषेत, नर्म विनोदी शैलीत मांडले आहे. शब्दांची व्युत्पत्ती सांगण्याच्या ओघात ते ‘शाब्बाश’ या शब्दाचे कूळ इराणचा बादशहा ‘शाह अब्बास’ असे सांगतात तेव्हा हसू येते. तसेच ‘पायजमा’ हा शब्द शक राज्यकर्त्यांची देणगी आहे हे वाचल्यावर धक्का बसतो. तर ‘कमीज’ या शब्दाच्या मागे धावताना ते आपल्याला अरबस्तानातून ग्रीस, अल्बानिया, इजिप्त, नेपाळ, इंडोनेशिया, फ्रान्स, इंग्लंड अशा देशांची सफर घडवून आणतात. देश-विदेशाची सफर, त्यांचा इतिहास, रितीरिवाज, लोकसंस्कृती हे या ग्रंथाचे विशेष आहेत, पण शब्दाला सीमेची, संस्कृतीची, भाषेची बंधने नसतात हे ते ठासून सांगतात. शब्दांची सत्ता ही राजकीय सत्तेपेक्षा मोठी आहे. भाषेच्या शुद्धीकरणाच्या नावाखाली किंवा परकीय भाषेच्या आक्रमणाच्या नावाने गळा काढणाºया अनेकांना ते शब्दाचे सामर्थ्य सांगतात. भाषेमुळेच विविध मानवी समूहांमध्ये न तुटणारे संबंध निर्माण झाले आहेत, हे या ग्रंथामुळे लक्षात येते. 
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