
आपाधापी वाले समाज में आमतौर पर समाचारों के जरिये अपने दिन की शुरूआत करते हुए अक्सर जिस एक शब्द से हमारा साबका पड़ता है वह है हत्या। यह शब्द जन्मा है संस्कृत के मूल शब्द यानी धातु हन् से जिसका अर्थ है मार डालना , नष्ट कर देना , चोट पहुंचाना अथवा जीतने न देना , पछाड़ना या पराजित करना आदि।
प्रोटो इंडो -यूरोपियन भाषा का एक मूल शब्द है ग्वेन । इससे ही भाषाविज्ञानी संस्कृत के हन् या हत् का रिश्ता जोड़ते हैं। इस हन् की व्यापकता इतनी हुई कि अरबी समेत यह यूरोप की कई भाषाओं में जा पहुंचा और चोट पहुंचान या मार डालना जैसे अर्थों में तो अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई ही साथ ही इसके विपरीत अर्थ वाले शब्द जैसे डिफेन्स (रक्षा या बचाव) के जन्म में भी अपना योगदान दिया। यही नहीं हत्या के प्रमुख उपकरण -अंग्रेजी भाषा के गन शब्द की उत्पत्ति भी इसी हन् से हुई है। हन् न सिर्फ हत्या - हनन आदि शब्दों से बल्कि आहत, हताहत, हतभाग जैसे शब्दों से भी झांक रहा है। यही नहीं, निराशा को उजागर करनेवाले हताशा और हतोत्साह जैसे शब्दों का जन्म भी इससे ही हुआ है।
कहावत है कि बेइज्जती मौत से भी बढ़कर है। हन् जब अरबी में पहुंचा तब तक संस्कृत में ही इसका हत् रूप विकसित हो चुका था। अरबी में इसका रूप हुआ हत्क जिसका मतलब है बेइज्जती, अपमान या तिरस्कार। इसी तरह हत्फ़ यानी मृत्यु। यही हत्क जब हिन्दी में आया तो हतक बन गया जिसका अर्थ भी मानहानि है। बात चाहे मौत की हो, हताशा की हो या बेइज्जती की हो भाव तो एक ही है - कुछ नष्ट होने का , चले जाने का।
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Wednesday, September 12, 2007
हताश हत्यारा और गन
Tuesday, September 11, 2007
पाटील का दुपट्टा
हाल ही में जब देश की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में प्रतिभाताई पाटील के चुने जाने का प्रसंग चल रहा था तो हिन्दी के कई अखबार उनके उपनाम के साथ पाटिल लिख रहे थे। पाटील नाम के साथ बडी़ ई की मात्रा सही है यह सिद्ध होता है इस शब्द की व्युत्पत्ति से।
दरअसल जो हिन्दीभाषी क्षेत्रों में पटेल है वही महाराष्ट्र में पाटील है। पटेल गुजरात में भी खूब होते है। आज प्रचलित तौर पर गांवों में पटेल उस व्यक्ति को कहते हैं जो गांव का प्रमुख हो या मुखिया हो। गौरतलब है कि संस्कृत मे एक शब्द है पट्टकील जो पाटील या पटेल का आधार है। यह लफ्ज बना है संस्कृत के पट्टः या पट्टम् और कीलकः के मेल से। संस्कृत में पट्ट के कई अर्थ है जैसे सूत, रेशम, कपड़ा, तख्ती,राजाज्ञा, शिला, पेढ़ी आदि।
पट्ट से ही जन्मा है हिन्दी का दुपट्टा यानी ओढनी या उत्तरीय। यह शब्द बना है पट्ट में द्वि उपसर्ग लगने से । अर्थात ऐसा कपड़ा जो दोहरा हो। इससे ही बना है पटोल या पटोला शब्द जिसका मतलब होता है एक प्रकार का रेशमी कपड़ा। साड़ी की एक खास किस्म जो बंगाल में पाई जाती है, वह भी पटोला कहलाती है। यह सिल्क यानी रेशमी होती है । ढाका की मलमल चूंकि मशहूर थी, अतः बंगाल से इसका रिश्ता स्वाभाविक है।
मौर्यकाल में सूत से बने पट्टे पर भूमि संबंधी स्वामित्व का उल्लेख किया जाता था। ये लिखित पट्ट, कीलकों में रखे जाते थे । कीलक यानी धातु या बांस की पोली नलकियां जिनमें गोल घुमाकर इन सरकारी दस्तावेजों को सुरक्षित रखा जाता। जिसके अधिकार में पट्टकील होता उसे पट्टकीलक कहा जाता। इस विवरण से स्पष्ट है कि पट्टकीलक एक पदवी थी। यह व्यक्ति राजा का विश्वासपात्र और प्रमुख कर्मचारी होता था जिसके पास राज्य का भूमि संबंधी रिकार्ड रहता था। यह व्यवस्था तत्कालीन समाज में शासन के उच्चतम स्तर से नीचे तक थी अर्थात छोटे सामंतों के यहां भी भूमि बंदोबस्त का काम पट्टकीलक देखते और वे गांव के
प्रमुख व्यक्ति कहलाते। आज भी भू अभिलेख संबंधी दस्तावेजों को पट्टा कहा जाता है और इस रिकार्ड को रखने का काम एक सरकारी कर्मचारी करता है जिसे पटवारी कहते हैं।
बाद के दौर में तांबे की पट्टियों पर यानी ताम्रपत्रों पर भू-अभिलेखों का चलन शुरू हुआ तो भी ऐसे अभिलेख पट्टकीलकों के ही पास सुरक्षित रहते। यही पट्टकीलक पट्टईल में तब्दील होते हुए पाटील, पाटेल, पाटैलु या पटेल कहलाए। बाद में यह कार्य जातिगत विशेषण में तब्दील हो गया। गुजरात के पटेल या मालवा के पाटीदार भी इसी मूल से जुड़ते हैं।
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Monday, September 10, 2007
रंगमहल के दस दरवाजे ...
हिन्दी के द्वार , अग्रेजी के डोर और फारसी के दर शब्द मूलतः एक ही परिवार के सदस्य हैं। इन तमाम शब्दों के लिए संस्कृत का शब्द है द्वार् ।
इसका अर्थ है फाटक – दरवाजा,उपाय या तरकीब । हिन्दी में आमतौर पर बोले जाने वाले द्वारा शब्द ( इसके द्वारा, उसके द्वारा ) में भी उपाय वाला भाव ही है। द्वार् से ही द्वारम् भी बना है जिसके मायने है तोरण, प्रवेशद्वार, घुसना, मार्ग वगैरह। इसके अलावा शरीर के छिद्र ( आंख, कान, नाक वगैरह ) भी द्वार कहलाते है इसीलिए मानव शरीर को दशद्वार की उपमा दी गई है। मध्यकाल में सूफी कवियों ने भी आत्मा परमात्मा के संदर्भ में देह को रंगमहल की उपमा देकर इसके दस दरवाजों की बात कही है। गुजरात के पश्चिमी छोर पर स्थित कृष्ण की राजधानी के द्वारवती, द्वारावती या द्वारका जैसे नाम भी समुद्री रास्ते से भारत में प्रवेश वाले भाव की वजह से ही ऱखे गए है। प्राचीन उल्लेखों के अनुसार इस नगर में प्रवेश के भी कई द्वार थे इसलिए इसे द्वारवती कहा गया।
इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार में द्वार शब्द के लिए मूल धातु dhwer या dhwor है। अब संस्कृत के द्वार (dwaar) शब्द से इसकी समानता पर गौर करें। ओल्ड इंग्लिश में इसके लिए दुरा शब्द है तो पोस्ट जर्मेनिक में दुर। ग्रीक में इसे थुरा तो रशियन में द्वेर ,स्लोवानी में दुरी, चेक में द्वेरी और पोलिश में द्रेज्वी कहते हैं। इसी क्रम में आता है अंग्रेजी का डोर ।
उर्दू में भी फाटक के लिए दरवाज़ा शब्द आम है और हिन्दी में भी खूब इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल प्राचीन ईरान की भाषा अवेस्ता और वेदों के भाषा मे काफी समानता है। अवेस्ता में भी द्वारम् शब्द ही चलन में था जिसने
पुरानी फारसी में द्वाराया की शक्ल ले ली और फारसी तक आते आते बन गया दरः जिसका मतलब है दो पहाड़ों के बीच का रास्ता। संस्कृत के द्वारम् का अर्थ रास्ता भी है। इसी से निकला है दर्रा या दर लफ्ज के मायने भी यही हैं। बीच का रास्ता वाली विशेषता पर गौर करे। फारसी में एक लफ्ज है सफदर पर जिसके मायने हैं शूरवीर, यौद्धा, महारथी आदि। यह भी बना है दर से ही । दर शब्द के मद्देनज़र इसका भाव हुआ सेना की पंक्ति को चीरता हुआ आगे बढ़ जाने वाला। सेना की बीच से रास्ता बना लेने वाला अर्थात सफदर। फारसी के दरगाह या दरबान और हिन्दी के द्वारपाल, द्वारनायक अथवा द्वाराधीश जैसे शब्द इससे ही बने हैं। दर शब्द से हिन्दी में कई मुहावरे जन्में हैं मसलन दर दर की ठोकरें खाना, दरवाज़े पर नाक रगड़ना, दरवाज़ा बंद होना, दरवाज़ा खुलना आदि।
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Sunday, September 9, 2007
राष्ट्रीय एकता बनाम करतबबाजियां
मुल्क के सियासी हुक्मरानों के लिए अब होशियार होने का वक्त आ गया है। उनके पसंदीदा शगल यानी ‘राष्ट्रीय एकता’ मे कुछ अन्य लोग बेहद दिलचस्पी ले रहे हैं।
यह नया तबका है करतबबाज एकता कामियों का।
छत्तीस करोड़ देवी देवताओं वाले देश में आज सवासौ करोड़ इन्सान बसते हैं। राष्ट्रीय एकता की घुट्टी बीते छह दशकों में छोटे-बड़े, औरत –मर्द , अमीर-गरीब हर किसी को पिलाई जा चुकी है। इसका असर अब दिखाई पड रहा है। हो ये रहा है कि आप घंटों सिर के बल खड़े रहते हैं या पानी में शीर्षासन लगाते हैं। लगातार कूद-कूद कर चलते हैं या दंडवत करते हुए भारत दर्शन कर लेते हैं। दांतों से हवाई जहाज या रेल का इंजन खींचकर पराक्रम दिखाते हैं। गर्ज यह कि उन सारे कारनामों को अंजाम दिया जा रह है , जिन्हें कारोबारे दुनिया में कोई अहमियत नहीं दी गई है। इस सच्चाई को ये तमाम लोग भी जानते हैं, इसलिएराष्ट्रीय एकता के नाम पर इन्हें अमली जामा पहनाते है।
आज हर कोई बस , फकत राजनीति या समाजसेवा की छिछली परत छू भर लोने को उतावला है। इसी वजह से ये सारे करतब ! ये असली देशभक्त हैं ? शायद इन्हें यह भी नहीं मालूम होगा कि देश की भौगोलिक विशेषताएं क्या है ? कितने राज्य हैं और राजधानियों के नाम क्या है। क्यों नहीं यह सब केवल साहसिक कारनामों या एडवेंचर के नाम पर किया जाता ? गिनीज़ बुक में हजारों परदेशियों के साहसिक कारनामें दर्ज हैं, मगर यह कहीं नहीं लिखा कि ऐसा उन्होने देश की एकता की खातिर किया।
सवाल उठता है, क्या सारे एडवेंचरिस्ट राष्ट्रवादी एकताकामी होते है ? एक मिसाल देखिये। कुछ बरस पहले मध्यप्रदेश के एक जिला मुख्यालय के एक चिथड़ा अखबार के टपोरी संवाददाता को मारपीट के बाद जिलाबदर कर दिया गया। इन साहब ने एक छुटभैये कांग्रेसी नेता से साइकल स्पांसर करा ली । वक्त काटने का इससे नायाब तरीका और क्या हो सकता था। श्रीमानजी ‘राष्ट्रीय एकता यात्रा’ की तख्ती साइकल पर लगाकर एक साल के लिए भारत भ्रमण पर निकल पड़े और जिला स्तरीय हीरो का दर्जा पा गए।
कुछ अर्सा पहले एक बच्ची चर्चा में थी। राष्ट्रीय एकता के नाम पर उससे रोलर स्केटिंग कराई जा रही थी। बच्चों से और भी कई तरह के कारनामें लगातार कराए जाते रहे हैं। वे बच्चे जिन्हें यह तक नहीं पता कि किस काम से देश की भलाई होनी है उनसे राष्ट्रीय एकता के मायने समझने की उम्मीद ?जिन्हें शायद यह नहीं पता कि पेप्सी बहुराष्ट्रीय कंपनी है मगर वही उसका पसंदीदा पेय है। मैगी नूडल्ज उसे भाते हैं मगर इस स्विस कंपनी की महंगी हकीकत उस पर उजागर न हुई हो । इन करामाती बच्चों के अभिभावक भी शायद न जानते हों कि मैगी से भी बेहतर नूडल्ज ईद के मौके पर हमारी मुस्लिम खवातीन बना डालती हैं जिन्हे सिंवैया कहते । देश का भला तो छोटी –छोटी बातों से भी हो सकता है। 
जिस मुल्क का खेलों की दुनिया में कोई नाम न हो , वहां राष्ट्रीय एकता के नाम पर करतबबाजों की फौजी कवायद वाकई शर्मनाक है। आपकी मंजिल ओलिंपिक नहीं है और नही आप खुली स्पर्धा में शारीरिक क्षमता दिखाना चाहते हैं। इन एडवेंचरिस्ट एकताकामियों से कहीं कमतर नहीं है गांवों-कस्बों के मेलों-ठेलों में लगातार साइकल चलाने वाला वह अनपढ़-बेढब कलाकार जो पूरे सात दिन साइकल चलाता है। उसी पर रोजमर्रा के काम भी निपटाता है। क्या उसे भी यह सब करतब दिखाने के लिए ‘राष्ट्रीय एकता जादुई मंत्र’ को नहीं सीखना चाहिए ? हमारे देश के इन साहसियों को कब समझ आएगा कि उनके कारनामे केवल मानवीय क्षमता भर दिखाते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। इनका देश जाति, मजहब और अंततः राष्ट्रीय एकता से कोई लेना देना नहीं है। हमारी राष्ट्रीय एकता न तो इतनी कमजोर है और न ही इन करतबों से मजबूत होती है। इन्ही करतबों से राष्ट्रीय एकता मजबूत होनी होती तो देश की दर्जनों सर्कस कंपनियों के हजारों कलाकार इसे बरसों पहले कर चुके होते ।
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बजा दो बैंडबाजा !
बैंडबाजा दरअसल अंग्रेजी के बैंड और हिन्दी के बाजा शब्दों से मिलकर बना देसी शब्द है। अंग्रेजी में बैंड का अर्थ फीता या स्ट्रिप है जिसे किसी चीज के इर्द-गिर्द चिपकाया अथवा बांधा जाए जैसे रबरबैंड को बांधा जाता है। इसी तरह बैंड का दूसरा अर्थ जो हिन्दी में ज्यादा प्रचलित है
वह है मांगलिक अवसरों पर आमंत्रित वाद्यवृंद अथवा शादी-ब्याह के मौके पर बाजा बजानेवाली मंडली।
सबसे पहले बात बाजे की। बाजा दरअसल संस्कृत के वाद्यम् शब्द का तद्भव रूप है जिसका मतलब हुआ बाजा, बाजे की ध्वनि आदि। यह लफ्ज संस्कृत की मूल धातु वद् से बना है जिसका अर्थ है कहना , बोलना, उच्चारण करना । संगीतिक संदर्भों के तहत इसमें स्वरों को ऊंचा उठाना, गायन करना, प्रवीणता दिखाना आदि भाव भी शामिल है। इस तरह वाद्यम् शब्द का अर्थ हुआ मधुर ध्वनि करने वाले संगीत यंत्र अथवा साज। इसी का एक और क्रियारूप बना वादन या वादनम जिसका मतलब हुआ बजाना, ध्वनि करना। वादक शब्द भी इसी से बना जिसका देसी रूप बजैया ,बजनियां या बजवैया भी बोला जाता है। मराठी में वाद्यवृंद के लिए वाजंत्री शब्द भी है। हिन्दी में बजाना शब्द का एक अर्थ मारपीट या लाठी चलाना वगैरह भी है।
अब आते हैं बैंड पर।अंग्रेजी मे इसका अर्थ है म्यूजिशियंस का ग्रुप । दुनियाभर के संगीत समूह अपने नाम के साथ बैंड शब्द का प्रयोग करते हैं जैसे रॉकबैंड। मूलत: इस शब्द का मतलब किसी खास काम को करने वाले व्यक्तियो का समूह है । कोई समूह बैंड तभी कहलाएगा जब उसकी ड्रेस के साथ एक फीता भी पहचान के तौर पर जोड़ा जाए। मसलन पुलिस या फौज। जाहिर सी बात है कि बैंड बजानेवालो की पहचान भी उनकी टोपी या बांह पर बंधे एक फीते से होती है।
खास बात ये कि बैंड शब्द मूलत: भारतीय यूरोपीय भाषा परिवार का ही है और इसकी
उत्पत्ति का आधार संस्कृत शब्द बंध् में छुपा है जिसका अर्थ है बांधना, कसना , जकड़ना आदि। वैसे वाद्ययंत्रो या वादकों के समूह को बैंड कहने का चलन इंग्लैंड में भी सोलहवीं-सत्रहवी सदी के आसपास ही शुरू हुआ। इस तरह भारत में वाद्यम् से बने बाजे के साथ बैंड के जुड़ जाने से बन गया बैंडबाजा। अब यूं तो बैडबाजे का बजना या बजाना मांगलिक शगुन होता है मगर मुहावरे के तौर पर अब बैंडबाजा बजना वाक्य का अर्थ शादी के लक्षण के साथ ही किसी हानि या नुकसान होने के संदर्भ में भी समझा जाता है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...
Saturday, September 8, 2007
लंबरदार से अलमबरदार तक
में आज भी एक खास शब्द सुनने को मिलता है लंबरदार । पुराने ज़माने में चौधरी की चौधराहट की तरह ही लंबरदार का भी अपने इलाके में अव्वल नंबर ही रहता रहा। कहने की ज़रूरत नहीं कि इसके रूतबे में हिस्सेदारी करने के लिए चौधरी की अर्धांगिनी जैसे चौधराइन बन गई वैसे ही लंबरदार की बीवी भी लंबरदारनी बन गई। दरअसल हिन्दी , फारसी और उर्दू का लंबरदार शब्द बना है अंग्रेजी के नंबर शब्द में फारसी का दार प्रत्यय लगने से। उत्तरभारत में इसे नंबरदार और लंबरदार दोनों तरीके से बोला जाता है। दरअसल इस नाम के पीछे अगर देखें तो प्राचीन भारत की संयुक्त परिवार प्रथा नज़र आती है। निकट संबंधियों के भरे पूरे परिवार की समृद्ध और समझदारी भरी परंपरा अंग्रेजों के शासन संभालने तक सांसे ले रही थी। यह परंपरा सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से चाहे बढ़िया थी मगर कुटुम्ब की संयुक्त अधिकार वाली संपत्तियों , ज़मीनों आदि का हिसाब किताब बड़ा पेचीदा काम था। खासतौर पर सरकार को जब लगान चुकाने की बात सामने आती थी तब इसकी मुश्किलें नज़र आती थीं। मगर सरकार को तो लगान वसूलना ही होता था सो एक व्यस्था बनाई गई जिसके मुताबिक संयुक्त परिवार के एक व्यक्ति विशेष को इस काम के लिए मुकर्रर कर दिया जाता था कि वह सरकारी शुल्क , लगान या अन्य दस्तावेजी कामों के लिए उत्तरदायी होगा। इस पूरी कार्रवाई का नंबर देखर रजिस्ट्रेशन होता था यानी वह व्यक्ति नंबर के ज़रिये रजिस्टर्ड होता इसलिए उसे नंबरदार कहा जाने लगा। वहीं व्यक्ति बाद में समूचे गांव से राजस्व वसूली के लिए भी प्रतिनिधि बनाया जाने लगा।
फारसी में एक शब्द है नामबरदार अर्थात जो नामवर है या प्रसिद्ध है। देखा जाए तो नामबरदार से भी नंबरदार का जन्म हुआ माना जा सकता है मगर ऐतिहासिक प्रमाण यही कहते हैं कि अंग्रेजी के नंबर से ही बना नंबरदार जो मुखसुख के लिए बाद में लंबरदार के रूप में लोकप्रिय हो गया।

अब आते हैं अलमबरदार। कुछ लोग इसे हिन्दी में अलंबरदार भी लिखते हैं जो ग़लत प्रयोग है। यह शब्द भी अरबी फारसी के ज़रिये हिन्दी उर्दू में आया। अलमबरदार भी शाही दौर में एक पद था । अरबी में अलम कहते हैं ध्वज, झंड़ा, पताका अथवा पहाड़ को। साफ है कि जब सेना या राजा का काफिला निकलता था तो सबसे आगे ध्वजवाहक ही चलते थे जिन्हें अलमदार या अलमबरदार कहा जाता था। आज इसका मुहावरे के तौर पर भी प्रयोग होता है जिसका अर्थ है किसी खास पंथ, धर्म अथवा राजनीतिक विचारधारा के बडे नेता। हिन्दी में झंडाबरदार शब्द भी खूब चलता है।
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Friday, September 7, 2007
शाब्बाश ! वाह, शाह अब्बास
किसी की प्रशंसा में बेसाख्ता जो लफ्ज अक्सर जबान पर आता है वह है शाबाश। ये एहसास कुछ ज्यादी ही गहरा हो तो निकलता है शाब्बाश।
हिंदी उर्दू शबदकोशों मे इसका अर्थ खुश रहो, मजे करो जैसे आशीर्वाद के रूप में मिलता है। सवाल उठता है फारसी मूल के इस शब्द का जन्म कैसे हुआ?
फारसी का ही एक शब्द है शादबाश। शाद यानी आनंद और बाश यानी रहनेवाला। अर्थ हुआ-खुश रहो। कुछ जानकार इस लफ्ज के पीछे ईरान के किसी सूबे के राजा शाह अब्बास को खड़ा देखते है। दरअसल यह शाह अब्बास कोई और नहीं इस्फहान का प्रसिद्ध बादशाह शाह अब्बास महान था जो सफावी वंश का था। शाह अब्बास (१५५७-१६२९) गजब की बहादुरी और ईमान के लिए जाने जाते थे।
समाज में उनकी इतनी शोहरत थी कि हर अच्छे काम के लिए लोग उन्हीं की मिसालें दिया करते । क्या खूब ... बिल्कुल शाह अब्बास जैसा काम किया है। बाद में तारीफ हासिल करने वाले को ही शाह अब्बास कह कर सराहा जाने लगा। घिसते घिसते यह शाबाश हो गया। ठीक वैसे ही जैसे बुद्ध ने ही घिस-घिस कर फारसी में बुत का रूप अख्तियार कर लिया और हिंदी में बुद्धू बन गया। गौरतलब है कि फरसी निकला शाबाश लफ्ज आज हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी में भी इसी अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है। खासतौर पर ब्रिटिश फौज की शब्दावली में तो यह धड़ल्ले से बोला जाता है। कुछ शाह अब्बास के बारे में
सन् पंद्रह सौ से सत्रह सौ के बीच ईरान विशुद्ध ईरानियों द्वारा शासित रहा । यह दौर सफावी वंश का था। इसी वंश के थे शाह अब्बास।
इन्हें पश्चिम में ओटोमन तुर्कों का मुकाबला करना पड़ा। तब तुर्कों ने समूचे अजरबैजान पर कब्जा किया हुआ था। इसी तरह पूर्व में इन्हें उज्बेकों से टक्कर लेनी पड़ी जो खुरासान में घुस आए थे और हेरात और मशहद पर कब्जा किए बैठे थे। शाह अब्बास ने पहले तो तुर्कों से संधि करके उज्बेकों को मार भगाया। बाद में तुर्कों को पटखनी देते हुए अजरबैजान , आर्मीनिया और जार्जिया छीन लिया। अब्बास ने अंग्रेजों की मदद से १५९८ में हथियारों की ढलाई का एक कारखाना खोला। इस्फहान को राजधानी बनाया। दस हजार घुड़सवारों और बीस हजार पैदल सैनिकों की फौज खड़ी की। उन्होंने ईरान के विकास के लिए खूब काम किए। ईरान का प्रसिद्ध बंदरगाह बंदरअब्बास उन्हीं की देन है। सन १६२२ में उन्होंने होरमुज़ से पुर्तगालियों को खदेड़ा था और यहां एक सुव्यवस्थित बंदरगाह बनाया। शाह अब्बास के युरोप से अच्छे संबंध थे। उसके शासन काल में ही इस्फहान की आबादी छह लाख थी। उसने शीराज, तबरेज आदि प्राचीन शहरों को भी आधुनिक बनाया। वह गैर मुस्लिमों के प्रति भी उदार थे। शाह अब्बास के बाद दूसरा कोई महान शासक इस वंश में प्रसिद्ध नहीं हुआ १७२५ ईस्वी के बाद सफावी वंश का पतन शुरू हो गया और तुर्की-रूसी विद्रोहों ने इसे कमजोर कर दिया।
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Thursday, September 6, 2007
वंशगान - बांस और बरगद की रिश्तेदारी

जन्माष्टमी पर जब बंसी की वंशावली की थाह ली तो बहुत कुछ हाथ लगा। जो हाथ लगा वो पूरा का पूरा अष्टमी का प्रसाद न बन सका और तिथि बदल गई। खैर, शब्दों के सफर में तिथियां मायने नहीं रखतीं लिहाजा वंशावली का अगला हि्स्सा पेश है।
वंशवृक्ष शब्द का मतलब यूं तो आज कुलपुरूषों, कुटुम्बियों के नामों की उस तालिका से लगाया जाता है जो वृक्ष की शाखाओ –प्रशाखाओं की तरह तरह अलग अलग कालखंडों में विभाजित कर बनाई गई हो। मगर प्राचीनकाल में तो वंशवृक्ष का मतलब सिर्फ बांस का पेड़ ही था। एक और शब्द है वंशवृद्धि यानी परिवार का बढ़ना या कुटुम्ब में इजाफा होना । अब कृष्ण हमेशा हाथ में बांसुरी लिए रहते थे सो बंशीधर कहलाए। इसका ही तत्सम रूप वंशीधर भी प्रचलित है। जिस पेड़ की नीचे उनका वंशीरव गूंजा करता था वह कहलाया वंशीवट। यानी बरगद का पेड़। 
नामश्रंखला में एक नाम खूब चलता है वह है हरबंस। इस नाम में भी बांस या वंश की महिमा छुपी है। हरबंस यानी हरिवंश अर्थात् श्रीकृष्ण का वंश। इस नाम से एक पुराण भी है जिसे महाभारत का उपांश कहा जा सकता है। कुछ लोग इसे उपपुराण भी मानते हैं मगर अठारह पुराणों और उपपुराणों मे इसका शुमार नहीं है। महाभारत में मुख्यतः युद्ध का पूरा वृत्तांत है मगर कृष्ण व यादवों के बारे में विस्तार से सब कुछ नहीं है । इसी के लिए महाभारत के परिशिष्ट के तौर पर सौति ने हरिवंश की रचना की। सौति ने ही नैमिषारण्य मे ऋषियों को महाभारत कथा सुनाई थी।
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Wednesday, September 5, 2007
कैसे-कैसे वंशज - बांस , बांसुरी और बंबू !

बांसों का झुरमुट
सन्ध्या का झुटपुट
है चहक रही चिड़िया
टि्वी टि्वी टुट टुट
बांस का जब कभी भी सन्दर्भ आता है तो कविवर सुमित्रानंदन पंत की ये पंक्तियां मुझे अक्सर याद आ जाती हैं। बांस बना है संस्कृत के वंश से। आमतौर पर कुटुम्ब, कुल, और खानदान के अर्थ में वंश शब्द इस्तेमाल मे लाया जाता है। ये तमाम अर्थ जुड़ते हैं घनत्व, संग्रह या समुच्चय से । अब बांस की प्रकृति पर गौर करें तो पाएंगे कि इसे जहां भी लगाया जाए , इकाई से दहाई और सैंकडे़ की प्रगति नज़र आती है। वंशावली शब्द पर ध्यान देना चाहिए। प्राचीन अर्थों में तो इसका अर्थ बांसों की पंक्ति ही होगा मगर आज इसका रूढ़ अर्थ कुल परंपरा या एनसेस्ट्री ही है। पूर्ववैदिक युग में वंश शब्द का अर्थ बांस ही रहा होगा। प्राचीन समाज में लक्षणों के आधार पर ही भाषा में अर्थवत्ता विकसित होती चली गई। स्वतः फलने फूलने के बांस के नैसर्गिक गुणों ने वंश शब्द को और भी प्रभावी बना दिया और एक वनस्पति की वंश परंपरा ने मनुश्यों के कुल, कुटुंब से रिश्तेदारी स्थापित कर ली। इस नाते वंशज शब्द का मतलब सिर्फ संतान या रिश्तेदार ही नहीं मान लेना चाहिये बल्कि इसका मतलब बांस का बीज भी हुआ। बांस की यह रिश्तेदारी यहीं खत्म नहीं हो जाती । बांसुरी के रूप में भी यह नज़र आती है। संस्कृत के वंशिका से बनी बांसुरी ने भगवान श्रीकृष्ण से संबंध जोड़ा इसी लिए वे बंसीधर भी कहलाए। यही नहीं वेणु का मतलब भी बांस ही होता है और प्रकारांतर से इसका एक अन्य अर्थ मुरली हो जाता है इसीलिए श्रीकृष्ण का एक नाम वेणुगोपाल भी है।
वंश से जुड़े कुछ अन्य शब्द है बंसकार, बंसोड़ या बंसौर जो बांस से जुड़ी अर्थव्यवस्था वाले समूदाय हैं। बांस की टोकरियां , चटाई या सूप बनानेवाले लोग। 
अंग्रेजी में बांस के लिए बैम्बू शब्द प्रचलित है। देसी बोलियों और फिल्मी गीतों संवादों में बम्बू का प्रयोग साबित करता हैं कि बांस का यह अंग्रेजी विकल्प भी हिन्दी का घरबारी बन चुका है। दरअसल कुछ लोग बैम्बू का रिश्ता वंश से ही जोड़ते हैं। यह शब्द अंग्रेजी में आया डच भाषा के bamboe से जहां इसकी आमद पुर्तगाली जबान के mambu से हुई। पुर्तगाली ज़बान में यह मलय या दक्षिण भारत की किसी बोली से शामिल हुआ होगा।
वंश की मूल धातु पर गौर करें तो यह पहेली कुछ सुलझती नज़र आती है। वंश का धातु मूल है वम् जिसके मायने हैं बाहर निकालना, वमन करना, बाहर भेजना , उडेलना, उत्सर्जन करना आदि। इससे ही बना है वंश जिसके कुलवृद्धि के भावार्थ में उक्त तमाम अर्थों की व्याख्या सहज ही खोजी जा सकती है। इस वम् की मलय भाषा के मैम्बू से समानता काबिलेगौर है।
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Tuesday, September 4, 2007
उस आंगन का चांद
मेरे प्रिय शायर इब्ने 
इंशाजी की इस रचना का आनंद लीजिए। हर इक इन्सान की एक खयाली दुनिया होती है-कल्पनालोक। इंशाजी की खासियत है उनका चांद। यही उनकी फैंटेसी है और यही ख्वाबगाह। चांदनगर की खोज में वो दुनियाभर की खाक छानते फिरे। उन्होनें क्या पाया जानने के लिए इसे पूरा पढ़ जाइए।
(१)
शाम समय इक ऊंची सीढ़ियों वाले घर के आंगन में
चांद को उतरे देखा हमने चांद भी कैसा पूरा चांद!
इंशाजी इन चाहने वाली, देखने वाली आंखों ने
मुल्कों-मुल्कों, शहरों-शहरों , कैसा-कैसा देखा चांद?
हर इक चांद की अपनी धज थी, हर इक चांद का अपना रूप
लेकिन ऐसा रोशन-रोशन, हंसता बातें करता चाद?
दर्द की टीस तो उठती थी पर इतनी भी भरपूर कभी?
आज से पहले कब उतरा था , दिल में इतना गहरा चांद!
हमने तो किस्मत के दर से जब पाए अंधियारे पाए
यह भी चांद का सपना होगा, कैसा चांद , कहां का चांद?
(२)
इंशाजी दुनिया वालों में बे-साथी ,बे-दोस्त रहे
जैसे तारों के झुरमुट में तनहा चांद, अकेला चांद
उनका दामन इस दौलत से खाली का खाली ही रहा
वर्ना थे दुनिया में कितने चांदी चांद और सोना चांद 
जग के चारों कूट में घूमा, सैलानी हैरान हुआ
इस बस्ती के इस कूचे के इस आंगन मे एसा चांद?
आंखों में भी चितवन में भी चांद ही चांद चमकते हैं
चांद ही टीका, चांद ही झूमर, चेहरा चांद और माथा चांद
एक यह चांदनगर का बासी जिससे दूर रहा संजोग
वर्ना इस दुनिया में सबने चाहा चांद और पाया चांद
(३)
अम्बर ने धरती पर फेंकी नूर की छींट उदास-उदास
आज की शब तो अंधी शब थी, आज किधर से निकला चांद!
इंशाजी यह और नगर है , इस बस्ती की रीत
यही सबकी अपनी-अपनी आंखें, सबका अपना-अपना चांद!
अपने सपने के मतले पर जो चमका वो चांद हुआ
जिसने मन के अंधियारे में आन किया उजियारा चांद
चंचल मुसकाती-मुसकाती गोरी का मुखडा़ महताब
पतझड़ के पेड़ों मे अटका पीला सा इक पत्ता चांद
दुख का दरिया , सुख का सागर उसके दम से देख लिए
हमको अपने साथ ही लेकर डूबा चांद और उभरा चांद
(४)
झुकी-झुकी पलकों के नीचे नमनाकी का नाम न था
यह कांटा जो हमें चुभा है काश तुझे भी चुभता चांद
रोशनियों की पीली किरचें , पूरब-पच्छिम फैल गईं
तूने किस शै के धोखे में पत्थर पर दे पटका चांद
हमने तो दोनों को देखा दोनों ही बेदर्द कठोर
धरती वाला, अंबर वाला, पहला चांद और दूजा चांद
चांद किसी का हो नहीं सकता , चांद किसी का होता है?
चांद की खातिर जिद नहीं करते ऐ मेरे अच्छे इंशा चांद
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वटवृक्ष की छाया में है ज़ायका

भारतीय शैली के व्यंजनों में एक बेहद आम शब्द है-बड़ा। उत्तर भारत में यह बड़ा के रूप में प्रचलित है तो दक्षिण भारत में यह वड़ा कहलाता है। इसके वडा और वड़ी रूप भी प्रचलित हैं। इस नाम वाले कितने ही खाद्य पदार्थ प्रचलित हैं मसलन मिर्चीबड़ा, भाजीबड़ा, पालकबड़ा , मूंगबडी या बटाटावड़ा वगैरह । इसी तरह दक्षिण भारत में वड़ासांभर, दालवड़ा या वड़ापाव मशहूर हैं। गौरतलब है कि इस बड़ा या वड़ा में न सिर्फ रिश्तेदारी है बल्कि बाटी और सिलबट्टा जैसे शब्द भी इनके संबंधी हैं ।
संस्कृत का एक शब्द है वट् जिसके मायने हैं घेरना, गोल बनाना , या बांटना-टुकड़े करना। गौर करें वटवृक्ष के आकार
पर । इसकी शाखाओं का फैलाव काफी अधिक होता है और दीर्घकाय तने के आसपास की परिधि में काफी बड़ा क्षेत्र इसकी शाखाएं घेरे रहती हैं इसीलिए इसका नाम वट् पड़ा जिसे हिन्दी में बड़ भी कहा जाता है। वट् से बने वटक: या वटिका शब्द के मायने होते हैं गोल आकार का एक किस्म का खाद्य-पिण्ड जिसे हिन्दी में बाटी कहा जाता है। इसे रोटी का ही एक प्रकार भी माना जाता है। वटिका शब्द से ही बना टिकिया शब्द। संस्कृत वटक: का अपभ्रंश रूप हुआ वड़अ
जिसने हिन्दी मे बड़ा और दक्षिण भारतीय भाषाओं में वड़ा का रूप लिया। वट् से ही विशाल के अर्थ में हिन्दी में बड़ा शब्द भी प्रचलित हुआ।
अब आते हैं खलबत्ता या सिलबट्टा पर । ये दोनों शब्द भी वट् से ही बने हैं। औषधियों, अनाज अथवा मसालों को कूटने - पीसने के उपकरणों के तौर पर प्राचीनकाल से आजतक खलबत्ता या सिलबट्टा का घरों में आमतौर पर प्रयोग होता है। हिन्दी में खासतौर पर मराठी में खलबत्ता शब्द चलता है्। यह बना है खल्ल: और वट् से मिलकर। संस्कृत में खल्ल: का मतलब है चक्की, गढ़ा। हिन्दी का खरल शब्द भी इससे ही बना है। वट् का अर्थ यहां ऐसे पिण्ड से है जिससे पीसा जाए। यही अर्थ सिलबट्टे का है। सिल शब्द बना है शिला से जिसका अर्थ पत्थर, चट्टान या चक्की होता है। जाहिर है पत्थर की छोटी सिल्ली पर बट्टे से पिसाई करने के चलते सिलबट्टा शब्द बन गया।
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Monday, September 3, 2007
डॉक्टर दीक्षित और चिकित्सक
हिन्दी अंग्रेजी के ये दोनों शब्द एक दूसरे के पर्याय है और हिन्दी में खूब प्रचलित हैं। दिलचस्प बात ये है कि औषधि और उपचार से जुड़े इन दोनो ही शब्दों का जन्म इंडो-यूरोपीय मूल से हुआ है।
सबसे पहले बात चिकित्सक की। इसकी उत्पत्ति संस्कृत की प्राचीन धातु कित् से हुई जिसमें जानने का भाव छुपा है साथ ही स्वस्थ करने का भी। इससे बने केतु शब्द का अर्थ है कांति , प्रकाश आदि। जाहिर है ज्ञान और प्रकाश दोनों का भाव भी एक ही है। कित् का ही एक लोकप्रिय रूपान्तर चित् भी है जिसका अर्थ हुआ प्रज्ञा-बुद्धि-ज्ञान। इससे बने चित्त का अर्थ है मन-हृदय, जाना हुआ, समझा हुआ आदि। चेतन शब्द भी इसी से बना है जिसका अर्थ हुआ स्वस्थ, जागरूक मनुश्य। रोगोपचार का उद्धेश्य भी अस्वस्थ मनुश्य में चेतना लाना ही है। जाहिर है इन तमाम शब्दों के सन्दर्भ में चिकित्सा का जो अर्थ निकलता है वह है रोग का निदान, औषधि-उपचार और चिकित्सक का अर्थ हुआ वैद्य, हकीम या डाक्टर।
अब बात डाक्टर की। अंग्रेजी का यह शब्द इंडो-यूरोपीय मूल के शब्द dek से जन्मा है जिसका अर्थ भी शिक्षा, ज्ञान से जुड़ता है। इस डेक की रिश्तेदारी संस्कृत की धातु दीक्ष् से है जिससे बने दीक्षक:,दीक्षणम् और दीक्षित जैसे शब्दों के अर्थ हैं शिक्षक, शिक्षा देना तथा शिक्षित। इंडो-यूरोपीय धातु डेक से बना लैटिन में डाक्ट्रीना शब्द जिसने अंग्रेजी में डाक्टर यानी चिकित्सक के अर्थ में अपनी जगह बनाई।
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Sunday, September 2, 2007
गर्ल्ज कॉलेज की लॉरी
हिन्दुस्तान के मशहूर शायर जांनिसार अख्तर साहित्यिक घराने से ताल्लुक रखते थे।
वे तीस के दशक के शुरूआती सालों में अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी में पढ़ा करते थे जहां उनकी रूमानी शायरी ने एक शायर के रूप मे उन्हें शोहरत दिलानी शुरू की। मुझे उनकी एक खास नज्म बहुत पसंद है। प्रकाश पंडित उनके बारे में लिखते हैं- उसकी पहली नज्म जिसने उसे ख्याति की सीढ़ी पर ला खड़ा किया, ‘गर्ल्ज कॉलेज की लॉरी’ थी। यह एक वर्णनात्मक नज्म थी और जांनिसार अख्तर के कथनानुसार,
‘ जवानी की इक शरारत के सिवा कुछ न थी’। इसे अख्तर साहब ने १९३५ में युनिवर्सिटी के मॉरिस हॉल में एक मुशायरे में पढ़ा और उस पर खूब हंगामा हुआ। मूल नज्म में सत्तर अस्सी शेर हैं। प्रकाश पंडित द्वारा अख्तर साहब पर लिखी किताब में इनमें से कुछ शेर दिए गए हैं जो मैं आपके आनंद के लिए यहां छाप रहा हूं। जिस किसी साथी के पास ये नज्म पूरी उपलब्ध हो , उसे अगर पूरी की पूरी देवनागरी में ब्लागर बिरादरी को उपलब्ध कराए तो बड़ा एहसान होगा। करीब १९७२-७३ की बात होगी। मैं तब छोटा था, हमारे कस्बे के गर्ल्ज हाई स्कूल के पास एक विक्टोरियन स्टाइल की लॉरी थी। मैं उसके लिए बड़े लड़कों के मुंह से हुस्न का डिब्बा नाम सुना करता था। बात तब पल्ले नहीं पड़ती थी। कॉलेज में जाकर जब इस नज्म को पढ़ा तो समझ में आ गई।
फ़जाओं में है सुब्ह का रंग तारी
गई है अभी गर्ल्ज कालेज की लॉरी
गई है अभी गूंजती गुनगुनाती
ज़माने की रफ्तार का राग गाती
वो सड़कों पे फूलों की धारी सी बुनती
इधर से , उधर से हसीनों को चुनती
झलकते वो शीशों में शादाब चेहरे
वो कलियां सी खिलती हुई मुंह अंधेरे
वो माथे पे साडी के रंगीं किनारे
सहर से निकलती शफ़क़ के इशारे 
किसी की नज़र से अयां खुशमज़ाकी
किसी कि निगाहों में कुछ नींद बाकी
ये खिड़की से रंगीन चेहरा मिलाए
वो खिड़की का रंगीन शीशा गिराए
ये खिडकी से एक हाथ बाहर निकाले
वो जानू पे गिरती किताबे संभाले
ये चलती ज़मीं पर निगाहें जमाती
वो होंठो में अपने कलम को दबाती
किसी की वो हर बार त्योरी सी चढ़ती
दुकानों के तख्ते अधूरे से पढ़ती
कोई इक तरफ़ को सिमटती हुई सी
किनारे को साड़ी के बटती हुई सी
वो लॉरी में गूंजे हुए ज़मज़मे से
दबी मुस्कराहट सुबक क़हक़हे से
वो लहजो में चांदी खनकती हुई सी
वो नज़रों में कलियां चटकती हुई सी
वो आपस की छेड़े वो झूठे फ़साने
कोई इनकी बातों को कैसे न माने
फ़साना भी उनका तराना भी उनका
जवानी भी उनकी ज़माना भी उनका
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Saturday, September 1, 2007
फुलका भी एक फूल है ....
रोटी हिन्दी में चपाती के लिए
सर्वाधिक प्रचलित शब्द है । रोटी के बारे में सफर की पिछली कड़ी में लिखा जा चुका है कि इस शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द रोटिका से हुई है जिसके मूल में इंडो-यूरोपीय अर्थात भारोपीय भाषा परिवार का रोटो शब्द है जिससे संस्कृत ,हिन्दी, अग्रेजी के वृत्त, रथ, रोटिका, रोटी, रोटेशन और रोटरी जैसे अनेक शब्द बने हैं जो सभी गोलाई का भाव लिए है। अब देखते हैं कि फुलका और चपाती का आधार क्या है।
फुलका पूरे देश में रोटी के सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले प्रकार का नाम है । जैसा कि नाम से जाहिर है यह कि तवे या सीधीं आंच पर सिंकने की वजह से गर्म भाप भर जाने से रोटी फूल जाती है इसी वजह से इसे फुलका भी कहते हैं।
जाहिर है जबतक इसमें भाप है तब तक ही यह फुलका है, बाद में यह सामान्य चपाती या रोटी ही कहलाएगी। गर्मागर्म खाने में ही फुलके का आनंद है। फुलका शब्द का जन्म हुआ है संस्कृत की फु धातु से जिसका मतलब है फुलाना, फूंक मारना , आदि। इसी से बना है संस्कृत का ही फुल्ल शब्द जिसका मतलब हुआ खिलना, फूलना, फुलाना । गौरतलब है कि पुष्प के लिए फूल शब्द का जन्म भी इसी फु से हुआ है।
अब आते हैं चपाती पर। चपाती यानी गेहूं के आटे से बनी पतली-चपटी रोटी। संस्कृत में एक शब्द है चर्पट: जिसका अर्थ है रगड़ना, दबाना आदि। इसके अलावा थप्पड़ लगाना या पिटाई करना भी मायने हैं।
चर्पट: से ही बना है चपेट (चपेट में आना या चपेट में लेना) चपेटा (लाख की गोटी जिससे चौपड़ जैसे खेल खेले जाते हैं), चपड़ा यानी लाख। इसी के साथ चपत यानी थप्पड़ और चांटा भी इससे ही बना है। चर्पटः से ही बना संस्कृत में चर्पटी जिसका मतलब हुआ चपाती। गौर करें कि आटे की लोई को हथेली पर थाप-थाप कर बनाई गई रोटी इसीलिए चपाती कहलाई क्योकिं उसे चपत लगाकर चपटा बनाया गया। संस्कृत से ही यही लफ्ज फारसी में भी गया और वहां भी चपत , चपात बनकर विराजा जिसका मतलब हुआ थप्पड़। चपत से चपाती भी फारसी में बन गया जिसका मतलब हथेलियों की थपकी से बहुत पतली और बढ़ाई गई रोटी है।
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