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Wednesday, January 2, 2013

क़िस्त दर क़िस्त…

Money
हि न्दी के बहुप्रयुक्त शब्दों में क़िस्त का भी शुमार है हालाँकि अक्सर ज्यादातर लोग ‘क़िस्त’ को ‘किश्त’ लिखने और बोलने के आदी हैं । ‘प्रसाद’ तथा ‘सौहार्द’ के ग़लत रूप ( प्रशाद, सौहार्द्र ) भी इसी तरह ज्यादा प्रचलित हैं । हिन्दी में क़िस्त का आशय हिस्सा, भाग, आंशिक भुगतान, होता है । इसके अलावा इसमें न्याय या इन्साफ़ की अर्थवत्ता भी है । यूँ तो क़िस्त शब्द हिन्दी में बरास्ता फ़ारसी आया है और शब्दकोशों में इसकी हाजिरी अरबी के खाते में नज़र आती है । यह बहुरूपिया भी है और यायावर भी । खोज-बीन करने पर अरबी के कोशों में इसे ग्रीक भाषा का मूलनिवासी माना गया है । देखते हैं किस्त की जनमपत्री । 

हिन्दी में किस्त का सर्वाधिक लोकप्रिय प्रयोग कई हिस्सों में भुगतान के लिए होता है । आजकल इसके लिए इन्स्टॉलमेंट या इएमआई शब्द भी प्रचलित हैं मगर किस्त कहीं ज्यादा व्यापक है । भुगतान-संदर्भ के अलावा मोहम्मद मुस्तफ़ा खाँ मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश के अनुसार किस्त में सामान्य तौर पर किसी भी चीज़ का अंश, हिस्सा, टुकड़ा, portion या भाग का आशय है । अरबी कोशों में अंश, हिस्सा, पैमाना, पानी का जार या न्याय जैसे अर्थ मिलते हैं । न्याय में निहित समता और माप में निहित तौल का भाव किस्त में है और इसीलिए कहीं कहीं किस्त का अर्थ न्यायदण्ड या तुलादण्ड भी मिलता है । 

बसे पहले क़िस्त के मूल की बात । अरबी कोशों में क़िस्त को अरबी का बताया जाता है जिसकी धातु क़ाफ़-सीन-ता (ق س ط) है । हालाँकि अधिकांश भाषाविद् अरबी क़िस्त का मूल ग्रीक ज़बान के ख़ेस्तेस से मानते हैं जिसका अर्थ है माप या पैमाना । लैटिन ( प्राचीन रोम ) में यह सेक्सटैरियस (Sextarius) है । ग्रीक ज़बान का ख़ेस्तेस, लैटिन के सेक्सटैरियस का बिगड़ा रूप है । यूँ ग्रीक भाषा लैटिन से ज्यादा पुरानी मानी जाती है मगर भाषाविदों का कहना है कि सेक्सटैरियस रोमन माप प्रणाली से जुड़ा शब्द है । यह माप पदार्थ के द्रव तथा ठोस दोनों रूपों की है । सेक्सटेरियस दरअसल माप की वह ईकाई है जिसमें किसी भी वस्तु के 1/6 भाग का आशय है । समूचे मेडिटरेनियन क्षेत्र में मोरक्को से लेकर मिस्र तक और एशियाई क्षेत्र में तुर्की से लेकर पूर्व के तुर्कमेनिस्तान तक ग्रीकोरोमन सभ्यता का प्रभाव पड़ा । खुद ग्रीक और रोमन सभ्यताओं ने एक दूसरे को प्रभावित किया इसीलिए यह नाम मिला । 

सेक्सटैरियस में निहित ‘छठा भाग’ महत्वपूर्ण है जिसमें हिस्सा या अंश का भाव  तो है ही साथ ही इसका छह भी खास है । दिलचस्प है कि सेक्सटैरियस में जो छह का भाव है वह दरअसल भारोपीय धातु सेक्स (seks ) से आ रहा है । भाषाविदों का मानना है कि संस्कृत के षष् रूप से छह और षष्ट रूप से छट जैसे शब्द बने  । अवेस्ता में इसका रूप क्षवश हुआ और फिर फ़ारसी में यह शेश हो गया । ग्रीक में यह हेक्स हुआ तो लैटिन में सेक्स, स्लोवानी में सेस्टी और लिथुआनी में सेसी हुआ । आइरिश में यह छे की तरह ‘से’ है । अंग्रेजी के सिक्स का विकास जर्मनिक के सेच्स sechs से हुआ है । सेक्सटैरियस का बिगड़ा रूप ही ग्रीक में खेस्तेस हुआ । खेस्तेस की आमद सबसे पहले मिस्र मे हुई। 

मझा जा सकता है कि इसका अरब भूमि पर प्रवेश इस्लाम के जन्म से सदियों पहले हो चुका था क्योंकि अरब सभ्यता में माप की इकाई को रूप में क़िस्त का विविधआयामी प्रयोग होता है । यह किसी भी तरह की मात्रा के लिए इस्तेमाल होता है चाहे स्थान व समय की पैमाईश हो या ठोस अथवा तरल पदार्थ । हाँ, प्राचीनकाल से आज तक क़िस्त शब्द में निहित मान इतने भिन्न हैं कि सबका उल्लेख करना ग़ैरज़रूरी है । खास यही कि मूलतः इसमें भी किसी पदार्थ के 1/6 का भाव है जैसा कि पुराने संदर्भ कहते हैं । आज के अर्थ वही हैं जो हिन्दी-उर्दू में प्रचलित हैं जैसे फ्रान्सिस जोसेफ़ स्टैंगस के कोश के अनुसार इसमें न्याय, सही भार और माप, परिमाप, हिस्सा, अंश, भाग, वेतन, किराया, पेंशन, दर, अन्तर, संलन, संतुलन, समता जैसे अर्थ भी समाए हैं । क़िस्त में न्याय का आशय भी अंश या भाग का अर्थ विस्तार है । कोई भी बँटवारा समान होना चाहिए । यहाँ समान का अर्थ 50:50 नहीं है बल्कि ऐसा तौल जो दोनों पक्षों को ‘सम’ यानी उचित लगे । यह जो बँटवारा है , वही न्याय है । इसे ही संतुलन कहते हैं और इसीलिए न्याय का प्रतीक तराजू है । 

हाँ तक क़िस्त के किश्त उच्चार का सवाल है यह अशुद्ध वर्तनी और मुखसुख का मामला है । वैसे मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश में किश्त का अलग से इन्द्राज़ है । किश्त मूलतः काश्त का ही एक अन्य रूप है जिसका अर्थ है कृषि भूमि, जोती गई ज़मीन आदि । काश्तकार की तरह किश्तकार का अर्थ है किसान और किश्तकारी का अर्थ है खेती-किसानी । किश्तः या किश्ता का अर्थ होता है वे फल जिनसे बीज निकालने के बाद उन्हें सुखा लिया गया हो । सभी मेवे इसके अन्तर्गत आते हैं । किश्त और काश्त इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है । फ़ारसी के कश से इसका रिश्ता है जिसमें आकर्षण, खिंचाव जैसे भाव हैं । काश्त या किश्त में यही कश है । गौर करें ज़मीन को जोतना दरअसल हल खींचने की क्रिया है । कर्षण यानी खींचना । आकर्षण यानी खिंचाव । फ़ारसी में कश से ही कशिश बनता है जिसका अर्थ आकर्षण ही है ।
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Tuesday, December 25, 2012

मोदीख़ाना और मोदी

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[ शब्द संदर्भ- असबाबअहदीमुसद्दीमुनीमजागीरदार, तहसीलदारवज़ीरसर्राफ़नौकरचाकरनायबफ़ौजदार, पंसारीव्यापारीदुकानदारबनिया-बक्कालक़ानूनगोलवाजमा, चालानजमादारभंडारीकोठारीकिरानीचीज़गोदामअमीर, वायसराय ]

पिछली कड़ी- मोदी की जन्मकुंडली

मोदी की अर्थवत्ता में शामिल भावों पर गौर करें तो इसका रिश्ता आपूर्ति, भंडार, स्टोर, राशन, दुकान, रसद, मिलिट्री सप्लाई, किराना, राजस्व, कर वसूली आदि से जुड़ता है । इन आशयों से जुड़े शब्दों की एक लम्बी शृंखला सेमिटिक धातु मीम-दाल-दाल (م د د ) यानी m-d-d से बनी है जिसमें आपूर्ति, सप्लाई, सहायता, सहारा, फैलाव जैसे भाव है । गौर करें हिन्दी में सहायता का लोकप्रिय पर्याय ‘मदद’ है जो इसी कड़ी से जुड़ा है । मद्द’ में निहित आपूर्ति या सहायता के भाव का विस्तार मदद में हैं जिससे मददगार, मददख़्वाह जैसे शब्द बने हैं । इसी कड़ी में आता है ‘इमदाद’ जिसका अर्थ भी आपूर्ति, सहायता, आश्रय, हिमायत अथवा सहारा होता है ।
द्द धातु से बने शब्दों में एक और दिलचस्प सब्द की शिनाख़्त होती है । बहीखातों की पहचान लम्बे-लम्बे कॉलम होते हैं जिनमें हिसाब-किताब लिखा जाता है । अरबी में इसके लिए ‘मद्द’ शब्द है । घिसते घिसते हिन्दी में यह ‘मद’ हो गया । हिन्दी में इसका प्रयोग जिन अर्थों में होता है उसका आशय खाता, पेटा, हेड या शीर्षक है जैसे- “यह रकम किस ‘मद’ में डाली जाए” या “मरम्मत वाली ‘मद’ मे कुछ राशि बची है” आदि । मद / मद्द के कॉलम, स्तम्भ या सहारा वाले अर्थ में अन्द्रास रज्की के अरबी व्युत्पत्ति कोश में अलहदा धातु ऐन-मीम-दाल से बताई गई है । इससे बने इमादा, इमाद, अमीद, अमूद और उम्दा जैसे शब्द हैं जिनमें सहारा, मुखिया, स्तम्भ, प्रमुख, विश्वसनीय, प्रतिनिधि जैसे भाव भी हैं, अलबत्ता ये हिन्दी में प्रचलित नहीं हैं । सम्भव है यह मद्द की समरूप धातु हो ।
मोदी शब्द की व्युत्पत्ति को मद्द से मानने की बड़ी वजह है इसमें निहित वे भाव जिनसे मोदी की अर्थवत्ता स्थापित होती है । ‘मद’ तो हुआ खाता मगर इसका ‘मद्द’ रूप भी हिन्दी में नज़र आता है जैसे मद्देनज़र, मद्देअमानत आदि । मद्देनज़र का अर्थ है निग़ाह में रखना । ‘मदद’ में जहाँ सहायता का भाव है वहीं आपूर्ति भी उसमें निहित है । ‘मदद’ अपने आप में सहारा भी है सो ‘मदद’ में निहित ‘मद्द’ पहले कॉलम या स्तम्भ हुआ फिर यह बहीखातों का कॉलम या खाना हुआ और फिर इसे मदद की अर्थवत्ता मिली । अरबी में एक शब्द है ‘मद्दा’ जिसका अर्थ है विस्तार, फैलाव, सहारा वहीं इसमें सामान, वस्तु, चीज़, पदार्थ अथवा मवाद आदि की अर्थवत्ता भी है । शरीर के भीतर जख्म होने पर जब वह पकता है तो उसका आकार फूलता है । प्रसंगवश ‘मवाद’ शब्द भी अरबी का है और इसी मूल से निकला है । ‘मद्द’ में निहित फैलाव, विस्तार इसमें निहित है । ध्यान रहे आपूर्ति में भी विस्तार, फैलाव की अर्थवत्ता है । किसी स्थान पर किसी चीज़ की आपूर्ति से फैलाव होता है । गुब्बारे में हवा की आपूर्ति से समझें । भोजन करने पर पेट के फूलने से समझें । इसी तरह विशाल क्षेत्र में राशन की आपूर्ति में भी फैलाव का वही आशय है ।
यूँ मुग़लदौर में एक सरकारी विभाग ‘मोदीखाना’ भी प्रसिद्ध था जिसका अर्थ था रसद-आपूर्ति विभाग । हिन्दुस्तानी – फ़ारसी कोशों में मोदीखाना शब्द मिलता है जिसका अर्थ भण्डारगृह , किराना-स्टोर, अनाज की आढ़त, granary या commissariat ( कमिसरियत, सेना रसद विभाग ) मिलता है । हालाँकि इन्स्टीट्यूट ऑफ सिख स्टडीज़ के डॉ. कृपाल सिंह ने अपनी पुस्तक सिख्स एंड अफ़गान्स में ‘मोदी’ को अरबी शब्द माना है और इसका अर्थ “भुगतान किया जा चुका” बताया है । इसी पुस्तक में वे ‘मोदीखाना’ के बारे में बताते हैं कि यह दरअसल मुस्लिम दौर की उन सरकारों में एक महत्वपूर्ण विभाग था जहाँ किन्हीं कारणों से मौद्रिक लेन-देन कम होता था  और भू-राजस्व का भुगतान जिन्सी तौर पर किया जाता था । अर्थात मुद्रा के बदले अनाज, राशन, पशु आदि दे दिए जाते थे । सरकार इसे ही महसूल समझ कर रख लेती थी । इसी मोदीखाने का प्रमुख ‘मोदी’ कहलाता था । यह ‘मोदी’ कर वसूल करता था । उसे जमा करता था और फिर जमा की गई जिंसों को वह शासन द्वारा निर्धारित मूल्य पर बेच भी सकता था । ज़ाहिर है इस नाम के पीछे मद्दा में निहित वस्तु, सामग्री, जिंस, चीज़ जैसे आशय ही व्युत्पत्तिक आधार हैं । प्रसंगवश सुलतानपुर के नवाब दौलत खां लोधी के मोदीखाने में अपने शुरुआती जीवन में गुरुनानक भंडारी (मोदी) के पद पर थे जहाँ खाद्यान्न के रूप में लगान जमा किया जाता था ।
सेनाओं में प्राचीनकाल से ही यह परिपाटी रही है कि कूच करते वक्त उनके साथ दुनियाजहान का असबाब भी चलता था । चालू भाषा में जिसे लवाजमा या फौजफाटा कहते हैं उसका तात्पर्य यही है । मुग़ल दौर में जब फौज चलती थी उसके साथ पंसारी की दुकान भी होती थी जिसे मोदीख़ाना कहते थे । दवाईखाना, मरम्मतखाना, फराशखाना जैसे विभागों में ही एक विभाग मोदीखाना था । स्थायी तौर पर किसी श्रेष्ठी को सेना में रसद आपूर्ति का काम मिल जाता था और कभी शासन की तरफ़ से ही प्रत्येक बड़े शहर में वणिकों को फौज को राशन पहुँचाने का अनुबंध मिल जाता था । सरकार के स्वामीभक्त व्यवसायी, प्रभावशाली धनिक ऐसे करार (ठेके) पाने के लिए जोड़-तोड़ करते थे । मगर उसकी मुश्किलें भी थीं । ये काम पाने के लिए उन्हें आज की ही तरह से सरकार के असरदार लोगों की जेबें गर्म करनी पड़ती थीं । आठवीं-नवीं सदी के भारत में भ्रष्टाचार के कई नमूने शूद्रक के ‘मृच्छकटिकम’ नाटक से भी पता चलते हैं ।
चार्य विष्णुशर्मा लिखित पंचतन्त्र में इसका उल्लेख है जिससे पता चलता है कि सेना में रसद आपूर्ति का काम प्राचीनकाल से ही मोटी कमाई वाला माना जाता था । पंचतन्त्र की संस्कृत – हिन्दी व्याख्या में श्यामाचरण पाण्डेय लिखते हैं- गौष्ठिककर्मनियुक्तः श्रेष्ठी चिन्तयति चेतसा हृष्टः। वसुधा वसुसम्पूर्णा मयाSद्य लब्धा किमन्येन ।। अर्थात “मोदी का काम करने वाला व्यापारी जब किसी राजकीय सेना आदि को रसद पहुँचाने का कार्य पा जाता है तो प्रसन्न होकर अपने मन में सोचता है कि आज मैने पृथ्वी पर सम्पूर्ण धन ही प्राप्त कर लिया है । पुनः निश्चित होकर लोगों को लूटता है ।” आज के दौर के बड़े कारोबारियों के पुरखों ने प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में रसद आपूर्ति ठेकों में करोड़ों के वारे-न्यारे किए थे, यह किसी से छुपा नहीं है । सेना सहित विभिन्न विभागों के कैंटीन और रेलवे की खानपान सेवा जैसी व्यवस्थाएँ दरअसल “मोदीखाना” जैसी प्राचीन आपूर्ति सेवाओं के ही बदले हुए रूप हैं । यूँ ‘मोद’ से भी ‘मोदी’ का रिश्ता जोड़ा जा सकता है क्योंकि उसके सारे प्रयत्न खुद के आमोद-प्रमोद के लिए होते हैं ।-समाप्त 

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Monday, October 29, 2012

रफूगरी, रफादफा, हाजत-रफा

पिछली कड़ियाँ- 1.‘बुनना’ है जीवन.2.उम्र की इमारत.3.‘समय’ की पहचान.darn 4. दफ़ा हो जाओ 

हि न्दी की अभिव्यक्ति क्षमता बढ़ाने में विदेशज शब्दों के साथ-साथ युग्मपद और मुहावरे भी है शामिल हैं । रफ़ा-दफ़ा ऐसा ही युग्मपद है जिसका बोलचाल की भाषा में मुहावरेदार प्रयोग होता है । “रफ़ा-दफ़ा करना” यानी किसी मामले को निपटाना, किसी झगड़े को सुलझाना, विवादित स्थिति को टालना, दूर करना । रफ़ा-दफ़ा में नज़र आ रहे दोनो शब्द अरबी के हैं । यहाँ ‘दफ़ा’ का अर्थ ढकेलने, दूर करने से है । इसकी विस्तृत अर्थवत्ता के बारे में पिछली कड़ी में बात की जा चुकी है । रफा ( रफ़ा ) का मूल अरबी उच्चारण रफ़्अ है । फ़ारसी में भी इसका ‘रफ़्अ’ रूप ही इस्तेमाल होता है
फ्अ शब्द की अरबी धातु रा-फ़ा-ऐन ر-ف-ع है जिसमें मूलतः उन्नत करने, सुधारने, ठेलने का भाव है । अरबी क्रियापद है रफ़ाआ जिसमें मरम्मत करना, सुधारना, सीना, ठीक करना, उन्नत करना, तब्दील करना, हटाना जैसे भाव हैं । रफ़ा-दफ़ा में यही भाव है । आमतौर पर हाज़त-रफ़ा पद का प्रयोग भी शौच जाने के अर्थ में उत्तर भारत में इस्तेमाल होता है । जैसे “उनके लिए सुबह सुबह हाजत-रफा करना बड़ा मुश्किल काम था” । इसी कड़ी में आता है ‘रफू’ या ‘रफ़ू’ शब्द । सिलेसिलाए वस्त्र में खोंच लगने पर रफ़ू किया जाता है । इसक अन्तर्गत फटे हुए स्थान की खास तरीके से मरम्मत की जाती है । इसमें बारीक सुई से, जिस कपड़े की मरम्मत होनी है, उसी के अनावश्यक टुकड़े और धागे निकाल कर फटे हुए स्थान को इस खूबी से सिला जाता है कि सिलाई का पता नहीं चलता । यह सिलाई का हुनर है कि मरम्मतशुदा हिस्सा भी कपड़े के टैक्सचर ( बुनावट ) से मेल खाता लगता है ।
रअसल फटे कपड़ों की मरम्मत से विकसित हुई सिलाई की खास तकनीक ने धीरे धीरे कला का रूप ले लिया । फ़ारस में इसका विकास हुआ और मरम्मत के सामान्य उपाय से रफ़ू एक कलाविधा बन गई । फ़ारसी में इसे रफ़ूगरी कहते हैं । रफ़ूगरी यानी रफ़ूकारी । फ़ारसी में ‘करने’ के संदर्भ में ‘गरी’ और ‘कारी’ प्रत्यय प्रचलित हैं । भारोपीय भाषाओं में ‘क’ का रूपान्तर ‘ग’ वर्ण में होता है । वैदिक क्रिया ‘कृ’ इसके मूल में है जिसमें करने का भाव है । इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में इनका प्रयोग देखने को मिलता है जैसे - कर ( बुनकर ) , कार ( कर्मकार, कलाकार, कुम्भकार ) , कारी ( कलाकारी , गुलकारी , फूलकारी ) , गार ( गुनहगार, रोज़गार ), गर ( रफ़ूगर, कारीगर, बाजीगर ) , गरी ( कारीगरी, रफ़ूगर, बाजीगरी ) आदि उदाहरण आम हैं । सो खोंच से बने छिद्र को उसी वस्त्र के टुकड़े और उसी के धागे से पूरने, भरने, बराबर करने की हुनरकारी ही रफ़ूगरी है । इस मुक़ाम पर रफ्अ में निहित सुधारने, उन्नत करने जैसे भावों को समझना आसान होगा ।
फ़ूगरी का कला के रूप में इतना विकास हुआ कि न सिर्फ़ फटे कपड़े की मरम्मत बल्कि गोटा-किनारी कशीदाकारी, फुलकारी जैसे सजावटी हुनर के रूप में भी कपड़ों को खूबसूरत बनाने में रफ़ूगरी का उपयोग होने लगा । सामान्य समस्या से निपटने की तरकीबें कैसे मूल्यवान हो जाती हैं, यह जानना दिलचस्प है । फटे कपड़े की मरम्मत थिगला लगा कर भी होती है । यह थिगला आज पैचवर्क जैसी कलाविधा के रूप में मशहूर है जो रफ़ूगरी का ही एक रूप है । रफ़ू का महत्व इतने पर ही खत्म नहीं हुआ । रफ्अ में सुधारना, उन्नत करना जैसे भावों के चलते ही रफ़ू शब्द का प्रयोग वाग्मिता या वक्तृत्व कला में भी होने लगा है । बातों के बाजीगरों को रफ़ूगरी भी आनी चाहिए । अपने तर्कों से दो असम्बद्ध बातों को मिला देना या वाक्पटुता के चलते अलग-अलग पटरी पर चल रहे वार्तलाप को सही दिशा में ले आना या विवाद को खत्म करना इसी रफ़ूगरी में आता है । ऐसे लोगो की वजह से ही ज़बानी विवाद रफ़ा-दफ़ा हो पाते हैं । कुल मिलाकर यह भी उन्नत तकनीक का मामला है ।
शब्द का इस्तेमाल एक अन्य लोकप्रिय युग्मपद में भी बखूबी नज़र आता है । रफूचक्कर या रफ़ूचक्कर भी हिन्दी का लोकप्रिय मुहावरा है जिसका अर्थ है चम्पत हो जाना, भाग जाना अथवा गायब हो जाना । रफ़ू की अर्थवत्ता समझ लेने के बाद रफ़ूचक्कर को समझना कठिन नहीं है । खोंच लगे स्थान पर रफ़ू करने के दो तरीके होते हैं । छोटा खोंच है तो उसी वस्त्र के धागे से सिलकर छिद्र को भर दिया जाता है । खोंच बड़ा है तो फटे स्थान पर उसी कपड़े का थिगला लगा कर गोलाई में रफ़ू कर दिया जाता है । माना जा सकता है कि चकरीनुमा इस थिगले से ही रफ़ूचक्कर शब्द निकला होगा । रफ़चक्कर में खोंच के गायब हो जाने के भाव का विस्तार है । इसका प्रयोग किसी भी चीज़ के देखते देखते ग़ायब हो जाने में होने लगा । चोरों और उठाईगीरों के सन्दर्भ में आज  रफ़ूचक्कर का इस्तेमाल ज्यादा होता है ।

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Wednesday, August 22, 2012

‘मा’, ‘माया’, ‘सरमाया’ [माया-2]

landscape1पिछली कड़ी-सरमायादारों की माया [माया-1] से आगे  

जॉ न प्लैट्स फ़ारसी के ‘मायः’ का रिश्ता संस्कृत के ‘मातृका’ से जोड़ते हैं पर यह बात तार्किक नहीं लगती । अमरकोश के मुताबिक ‘माया’ शब्द के मूल में वैदिक धातु ‘मा’ है जिसमें सीमांकन, नापतौल, तुलना, अधीन, माप, सम्पन्न, समाप्त, प्रसन्नता, खुशी, आनंद, कटि-प्रदेश, उलझाना, बांधना, ज्ञान, प्रकाश, जादू, तन्त्र, कालगणना आदि भाव हैं । इससे ही बना है ‘माप’ शब्द । किसी वस्तु के समतुल्य या उसका मान बढ़ाने के लिए प्रायः ‘उपमा’ शब्द का प्रयोग किया जाता हैं । यह इसी कड़ी का शब्द है । इसी तरह ‘प्रति’ उपसर्ग लगने से मूर्ति के अर्थ वाला ‘प्रतिमा’ शब्द बना। प्रतिमा का मतलब ही सादृश्य, तुलनीय, समरूप होता है । दिलचस्प बात यह कि फारसी का ‘पैमाँ’, ‘पैमाना’ या ‘पैमाइश’ शब्द भी इसी मूल से जन्मा है । संस्कृत उपसर्ग ‘प्रति’ का समतुल्य फ़ारसी का ‘पैति’ है । प्रति+मान से ‘प्रतिमान’ बनता है उसी तरह ‘पैति+मा’ से ‘पैमाँ’ (पैमान, पैमाना) बनता है । जो हिन्दी में प्रतिमान है वही फ़ारसी में पैमाना है । आयाम का कुछ अप्रचलित पर्याय ‘विमा’ भी इसी ‘मा’ से जन्मा है ।
लैटिन के ‘मेट्रिक्स’ matrix में भी अंतरिक्ष की परिमाप, विस्तार और मातृ सम्बन्धी भाव है । संस्कृत ‘मातृ’ और ‘मेट्रिक्स’ में रिश्तेदारी है । इसका रिश्ता भारोपीय धातु मे ‘me’ से जुड़ता है जिसके लिए संस्कृत मे ‘मा’ धातु है । मेट्रिक्स में स्त्री योनि, उर्वरता, गर्भ जैसे भाव हैं । यहाँ माँ के अर्थ में जननिभाव प्रमुख है और निरन्तर उर्वरता पर गौर करना चाहिए । वैदिक मा में इसके अलावा भी माता, उर्वरता, पृथ्वी, काल, मांगल्य, स्वामित्व, माया, जल जैसे आशय हैं । गौर करें ‘अम्मा’ के मूल में ‘अम्बा’ और प्रकारान्तर से ‘अम्बु’ यानी जल ही है । जल समृद्धि का प्रतीक है । प्रकृति के जलतत्व से ही जीवन सिरजा है । जल में ही जीवन है । इन दोनों मूल धातुओं में नाप, माप, गणना आदि भाव हैं । यानी बात खगोलपिंडों तक पहुँचती है ।
भारतीय परम्परा में ‘मा’ धातु की अर्थवत्ता भी व्यापक है । ‘मा’ धातु में चमक, प्रकाश, माप का भाव है जो स्पष्ट होता है चन्द्रमा से । प्राचीन मानव चांद की घटती-बढ़ती कलाओं में आकर्षित हुआ । स्पष्ट तो नहीं, मगर अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ववैदिक काल में कभी चन्द्रमा के लिए ‘मा’ शब्द रहा होगा । ‘मा’ के अंदर चन्द्रमा की कलाओं के लिए घटने-बढ़ने का भाव भी अर्थात उसकी ‘परिमाप’ भी शामिल है । गौर करे कि फारसी के माह, माहताब, मेहताब, महिना शब्दों में ‘मा’ ही झाँक रहा है जो चमक और माप दोनों से सम्बन्धित है क्योंकि उसका रिश्ता मूलतः चांद से जुड़ रहा है जो घटता बढ़ता रहता है और इसकी गतियों से ही काल यानी माह का निर्धारण होता है । अंग्रेजी के मंथ के पीछे भी यही ‘मा’ है और इस मंथ के पीछे अंग्रेजी का ‘मून’ moon है ।
गौरतलब है कि सम्पत्ति का सबसे आदिम पैमाना भू-सम्पदा और पशु-सम्पदा ही रहे हैं । दौलत या सरमाया के अर्थ में बाकी चीजें तो सभ्यता के विकास के साथ-साथ शामिल होती चली गईँ । मुद्रा के आविष्कार के बाद सम्पत्ति में गणना की क्रिया भी शामिल हुई । प्राचीन काल में तो ज़मीन ही सम्पदा थी जिसका माप लिया जाता था, पैमाइश होती थी । बसाहट, खेती और अन्ततः आवास के लिए भूमि की नापजोख ज़रूरी थी ।  तो फ़ारसी के ‘सरमाया’ में जो ‘मायः’ है और संस्कृत-हिन्दी में जो ‘माया’ है उसका अभिप्राय धन-दौलत, सम्पदा से ही है । उसी अर्थ में ‘सरमाया’ शब्द का विकास ‘मायः’ से हुआ है । इन दोनो ही ‘माया’ के मूल में वैदिक ‘मा’ है । मनुष्य के पास प्रकृति को समझने लायक बुद्धि का विकास होने तक और उसके बाद भी प्रकृति उसके लिए अजूबा ही रही है । मनुष्य के ज्ञान का विकास प्रकृति को समझते हुए ही हुआ है । दुनिया को समझना ही ज्ञानी होना है । इसीलिए दुनियादारी शब्द में व्यावहारिक बुद्धि का संकेत है । दुनिया का ही व्यापक स्वरूप प्रकृति है ।
'मा' में मूलतः प्रकृति का ही भाव है । संस्कृत में ‘प्रमा’ का अर्थ होता है समझना, जानना, सच्चा ज्ञान, सही धारणा आदि । ‘प्रमा’ का एक अन्य अर्थ मातामही भी होता है । किसी चीज़ की पैमाइश करना, मापना आदि क्रियाएँ जानने-समझने का ही आयाम हैं । सो प्रकृति अपने आप में सम्पदा है । प्रकृति का निरीक्षण, माप-जोख की अभिव्यक्ति मा से होती है । मा की महिमा अपरम्पार है और इसकी अर्थवत्ता की वैविध्यपूर्ण विमाएँ ( आयाम ) ही इसे माया साबित करती है । ‘मा’ में निहित वैविध्यपूर्ण भावों से अर्थमाया की सृष्टि होती है । साफ़ है कि फ़ारसी का ‘मायः’ संस्कृत माया का समतुल्य ही है अलबत्ता मातृका, माया और ‘मायः’ तीनों के मूल में वैदिक ‘मा’ धातु ही है । [समाप्त]

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Tuesday, August 21, 2012

सरमायादारों की माया [माया-1]

अगली कड़ी-‘मा’, ‘माया’, ‘सरमाया’ [माया-2]wealth

ला लित्यपूर्ण और प्रभावी भाषा प्रयोग करते हुए अक्सर कुछ लोग धन-दौलत के अर्थ में 'सरमाया' शब्द का इस्तेमाल करते हैं । दुनिया का मूल चरित्र हमेशा पूंजीवादी समाज रहा है । पैसे के दम पर क्या नहीं हो सकता । दौलतमंद सर्वशक्तिमान होता है । इसीलिए ‘सरमाया’ शब्द की अर्थवत्ता में असर की अर्थवत्ता भी शामिल है । ‘सरमाया’ यानी पूंजी, दौलत, धन, कैपिटल इसलिए सरमायादार का अर्थ हुआ पूंजीपति, मालदार, धनी, दौलतमंद आदि । सियासत और ‘सरमाया’ का चोली-दामन का साथ है । ‘मायः’ से बने सरमाया, सरमायादार, सरमायादाराना, सरमायादारी जैसे शब्द लिखत-पढ़त की भाषा में प्रचलित हैं । इसके अलावा ‘मायादार’ जैसा शब्द भी है जिसका अर्थ भी धनी, मालदार ही है ।
हिन्दी में ‘सरमाया’ शब्द फ़ारसी से आया है । ‘सरमाया’ को अरबी का समझा जाता है पर यह भारोपीय भाषा परिवार की इंडो-ईरानी शाखा का शब्द है और फ़ारसी के सर + ‘मायः’ से मिल कर बना है । गौरतलब है कि फ़ारसी का विकास बरास्ता अवेस्ता (वैदिक संस्कृत की मौसेरी बहन), पहलवी हुआ है । संस्कृत की तरह ही अवेस्ता में भी विसर्ग लगता रहा है और वहीं से यह फ़ारसी में भी चला आया । फ़ारसी के ‘मायः’ का उच्चारण माय’ह होना चाहिए मगर विसर्ग का उच्चार अक्सर स्वर की तरह होता है इस तरह फ़ारसी का ‘मायः’ भी माया उच्चारा जाता है । हिन्दी शब्दसागर में ये दोनों ही रूप दिए हुए हैं । ‘सरमाया’ में जो ‘सर’ है वह सरदार, सरपरस्त, सरज़मीं, सरकार वाला सर ही है जिसका इस्तेमाल उपसर्ग की तरह होता है । सर का प्रयोग प्रमुख, खास, सर्वोच्च आदि की तरह होता है । यह जो फ़ारसी का ‘सर’ है उसका रिश्ता वैदिक संस्कृत के ‘शिरस्’ से है जिसका अर्थ है किसी भी वस्तु का उच्चतम हिस्सा, कपाल, खोपड़ी, मस्तक, चोटी, शिखर, शुरुआत, पीक, बुर्ज़, पराकाष्ठा, चरम आदि ।
संस्कृत में ‘शीर्ष’ का मूल भी यही है । इससे ही हिन्दी का ‘सिर’ बना है । शिरस् के समतुल्य जेंद में ‘शर’ शब्द बना जिसका पहलवी रूप ‘सर’ हुआ । फ़ारसी में यह ‘सर’ चला आया । अलबत्ता जॉन प्लैट्स की “अ डिक्शनरी ऑफ उर्दू, क्लासिकल हिन्दुस्तानी एंड इंग्लिश” के मुताबिक फ़ारसी का सर संस्कृत के ‘सिरस्’ से आ रहा है । ध्यान रहे, ‘सिर’ यानी मस्तक के अर्थ में संस्कृत के किसी कोश में ‘सिरस्’ की प्रविष्टि नहीं मिलती । प्लैट्स के ऑनलाईन कोश में सम्भवतः वर्तनी की चूक है । जहाँ तक ‘माया’ का सवाल है, जान प्लैट्स इसके जन्मसूत्र संस्कृत के ‘मातृका’ में देखते हैं । ‘माया’ की व्युत्पत्ति का ठोस संकेत ‘मातृका’ से नहीं मिलता । ध्यान रहे मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में ‘मातृका’ का अर्थ सिर्फ माँ सम्बन्धी, धात्री, माँ, जन्मदात्री अथवा पालनकर्त्री है । जबकि प्लैट्स धन-दौलत के संदर्भ में इसके अर्थ मूल, व्युत्पन्न, स्रोत दिए गए हैं साथ ही दौलत, पूंजी, नगद, भंडार, कोश, निधि जैसे अर्थ भी दिए गए हैं । समझा जा सकता है कि प्लैट्स शायद यह कहना चाहते हैं कि ‘मातृ’ शब्द में उद्गम या स्रोत का भाव है । ज़ाहिर है स्रोत अपने आप में एक कोश या भण्डार होता है । यह तर्कप्रणाली गले नहीं उतरती और खींच-तान कर मातृका का रिश्ता धन-दौलत से जोड़ने वाली कवायद जान पड़ती है ।
गौरतलब है कि संस्कृत का ‘मातृका’ स्त्रीवाची है जबकि फ़ारसी का ‘मायः’ पुरुषवाची है । उधर हिन्दी-संस्कृत में ‘माया’ की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है और इसमें न सिर्फ़ धन-दौलत का भाव है बल्कि भ्रम, छलावा, धोखा, अतीन्द्रिय शक्ति, कला, जादूविद्या, भूत-प्रेत सम्बन्धी अथवा टोना जैसे अभिप्राय भी इसमें हैं । संस्कृत में ‘माया’ का एक अर्थ दुर्गा भी है मगर यह इसमें जन्मदात्री का आशय न होकर पराशक्तियों की स्वामिनी देवी का भाव है । इसी तरह ‘माया’ का दूसरा अर्थ लक्ष्मी है जो धन-वैभव की देवी हैं । इसी भाव का विस्तार माया के धन, दौलत, रोकड़ा, रुपया-पैसा, वैभव, सम्पत्ति, निधि, माल-मत्ता आदि में होता है । धन की महिमा अपरंपार है । इसके ज़रिये सुखोपभोग का कल्पनातीत संसार रचा जा सकता है । यहाँ ‘माया’ का अर्थ अवास्तविक लीला, कल्पनालोक या छलावा सार्थक होता है क्योंकि धन के रहने पर इन सबका भी लोप हो जाता है । इसीलिए कबीर ने धन-सम्पदा के अर्थ में ही “माया महा ठगिनी हम जानि” जैसी प्रसिद्ध उक्ति कही है ।
मायाजीवी शब्द भी धन-दौलत में रुचि रखने वाले का अर्थबोध कराता है जबकि मायावी का अर्थ जालसाज़, कपटी, छली, धोखेबाज, जादूगर आदि है । यह बात समझनी मुश्किल है कि प्लैट्स फ़ारसी के ‘मायः’ का रिश्ता धन-दौलत के अर्थ में संस्कृत के मातृक से क्यों जोड़ रहे हैं जबकि संस्कृत के ही ‘माया’ शब्द में धन-दौलत, पूंजी, सम्पदा के साथ माप-जोख, देवीदुर्गा, शक्ति जैसे भाव है । अगली कड़ी में समाप्त

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Tuesday, June 19, 2012

थप्पड़ की रसीद या रसद की ?

Receipts

पा वती या ‘बिल’ के लिए एक आम शब्द है ‘रसीद’ । यह फारसी का है मगर हिन्दी में ‘पावती’ शब्द बहुत कम इस्तेमाल होता है और ‘रसीद’ ज्यादा । हालाँकि रसीद में पावती का भाव अधिक है । पावती यानी प्राप्ति अर्थात जिसे पा लिया जाए । पावती का बिल के अर्थ में भाव है भुगतान मिलने की सूचना । यह सूचना बिल की शक्ल में आपको सौंपी जाती है । मूलतः रसीद इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और इसकी व्याप्ति भारोपीय भाषा परिवार की कई भाषाओं में देखी जा सकती है । रसीद में मूलतः पहुँचने या प्राप्त होने की क्रिया निहित है । ‘रसीद’ बना है फ़ारसी की क्रिया ‘रसीदन’ से जिसमें पाने, पहुँचने का भाव है । गए बिना कहीं भी कैसे पहुँचा जा सकता है? पहुँचना और पाना गतिवाचक क्रियाएँ हैं और रसीदन में गति का भाव ही खास है ।
विभिन्न संदर्भों को देखने से पता चलता है कि ‘रसीद’ शब्द में बुनियादी तौर पर वैदिक ध्वनि ‘ऋ’ ( जो एक शब्द भी है ) की महिमा नज़र आती है । देवनागरी का ‘ऋ’ अक्षर दरअसल संस्कृत भाषा का एक मूल शब्द भी है जिसका अर्थ है जाना, पाना । जाहिर है किसी मार्ग पर चलकर कुछ पाने का भाव इसमें समाहित है । ‘ऋ’ की महिमा से कई इंडो यूरोपीय भाषाओं जैसे हिन्दी, उर्दू, फारसी अंग्रेजी, जर्मन वगैरह में दर्जनों ऐसे शब्दों का निर्माण हुआ जिन्हें बोलचाल की भाषा में रोजाना इस्तेमाल किया जाता है । हिन्दी का ‘रीति’ या ‘रीत’ शब्द इससे ही निकला है । ‘ऋ’ का जाना और पाना अर्थ इसके ऋत् यानी रीति रूप में और भी साफ हो जाता है अर्थात् उचित राह जाना और सही रीति से कुछ पाना । हिन्दी संस्कृत का जाना-पहचाना ऋषि शब्द देखें तो भी इस की महिमा साफ समझ में आती है । ‘ऋ’ से बनी एक धातु है ‘ऋष्’ जिसका मतलब है जाना-पहुँचाना । इसी से बना है ऋषि जिसका शाब्दिक अर्थ तो हुआ ज्ञानी, महात्मा, मुनि इत्यादि मगर मूलार्थ है सही राह पर ले जाने वाला । फारसी के ‘रशद’ या ‘रुश्द’ जैसे शब्द जिसका अर्थ है सन्मार्ग, दीक्षा और गुरू की सीख । शब्दकोशों में इन्हें अरबी का बताया गया है, मगर ख्याता भाषाविज्ञानी और आलोचक डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक ये फ़ारसी से अरबी में गए हैं और का विकास ही हैं । इसी से बना ‘रशीद’ जिसके मायने हैं राह दिखानेवाला । ‘राशिद’ भी इससे ही बना है जिसके मायने हैं ज्ञान पानेवाला । यही नही ‘मुर्शिद’ यानी गुरू में भी इसी ‘ऋ’ की महिमा है ।
‘पावती’ के अर्थ में ‘रसीद’ शब्द में इसी ‘ऋष्’ की अर्थछाया नज़र आती है । जॉन प्लैट्स के कोश में फ़ारसी के ‘रस’ का विकास क्रमशः पहलवी रश और ज़ेंद के राश से हुआ है । ये शब्द वैदिक धातु ‘ऋष्’ के समतुल्य हैं । ईरान के भाषाविज्ञानी और खगोलशास्त्रज्ञ मोहम्मद हैदरी मल्येरी लिखते हैं कि फ़ारसी के प्राच्य रूपों में यह ‘रसा’ है जो वैदिक शब्द ‘अर’ से आया है जिसमें चक्रगति, परिक्रमा, भ्रमण जैसे भाव हैं । मोनियर विलियम्स के अनुसार यह ‘अर’ भी ‘ऋ’ से ही आ रहा है । हिन्दी में ‘आरी’ उस दाँतेदार यन्त्र को कहते हैं जिससे कठोर सतह को काटा जाता है । आमतौर पर इससे लकड़ी ही काटी जाती है। ‘आरी’ में यही ‘अर’ है । रहँट के मूल में भी अर है जो अरघट्ट से आ रहा है । इसे समझने के लिए किसी गरारी लगे यंत्र के चक्कों में बनें दाँतों पर गौर करें । संस्कृत में इसके लिए ही ‘अर’ शब्द है जिसके मूल में ‘ऋ’ धातु है । ‘ऋ’ में मूलतः गति का भाव है। जाना, पाना, घूमना, भ्रमण करना, परिधि पर चक्कर लगाना आदि । गरारी के दाँतों में फँसी शृंखला घूमते हुए यन्त्र के चक्के लगातार घूमते रहते हैं । सी ‘रस’ से ‘रसाई’ शब्द भी बना है जिसमें पहुँच का ही भाव है जैसे “ग़ालिब तक अपनी रसाई कहाँ ?” उर्दू का ‘रसाँ’ शब्द प्रत्यय की तरह इस्तेमाल होता है जैसे ‘चिट्ठीरसाँ’ यानी पत्रवाहक या पत्र पहुँचाने वाला । पावती के अर्थ में रसीद में रुक्का, टिकट, सील भी है जिसमें लगने, चस्पा होने, जड़ने, चिपकने, मिलने की निशानी का भाव है । इसी भाव को अभिव्यक्ति मिलती है जब किसी के गाल पर ‘थप्पड़ रसीद’ किया जाता है । गाल पर हथेली के निशान दरअसल पावती ही है जो साबित करती है कि सामने वाले को उसके किए की सज़ा मिल चुकी है ।
फ़ारसी के ‘रसीद’ और अंग्रेजी के ‘रिसीट’ शब्दों में ग़ज़ब का ध्वनिसाम्य और अर्थसाम्य है मगर इन दोनों के जन्मसूत्र अलग-अलग हैं । अंग्रेजी के ‘रिसीट’ ( receipt ) में भी बुनियादी तौर पर पाने , प्राप्त करने का आशय है इसका आधार रिसीव है जो बना है लैटिन के रेसपिअर recipere से । इसका अर्थ है लेना, पाना । लैटिन के रेसपिअर में री + सिपेअर हैं । री अर्थात पुनः, फिर और सिपेअर यानी प्राप्त करना । इस तरह लैटिन के रेसपिअर का भूतकालिक रूप होता है रिसेप्टा recepta जिसमें प्राप्त हो चुकने का भाव है । इसके एंग्लो-फ्रैंच रूप से का लोप होकर receite बना । अंग्रेजी की वर्तनी में की मौजूदगी बनी रही मगर उच्चारण फ्रैंच प्रभावित रहा अर्थात रिसीट हुआ । आज हिन्दी में अंग्रेजी का रिसीट और फ़ारसी का रसीद दोनों शब्द बेहद प्रचलित हैं । गौरतलब है कि मरीज़ का मुआयना करने के बाद डॉक्टर जो पर्चा ( प्रेस्क्रिप्शन ) लिखते हैं उस पर “Rx” चिह्न दर्ज़ करते हैं जिसका भाव यही रहता है कि मरीज़ को देख कर उसके लिए उपचार-विधि लिखी जा चुकी है । यह जो नुस्खा है , यही डॉक्टर द्वारा मरीज़ को दी गई प्राप्ति है । यह  मूलतः  recipe का संक्षेपीकरण है । कहने की ज़रूरत नहीं कि पाक-विधि के लिए आज हिन्दी में ज्यादातर प्रयुक्त रेसपी शब्द भी यही है जिसमें नुस्खा या विधि का भाव है । 
फ़ारसी की रसीदन क्रिया से ही निकला है एक और जाना-पहचाना शब्द जिसका इस्तेमाल फौजी शब्दावली में ज्यादा होता है , वह है ‘रसद’ । फौजी राशन या कच्ची खाद्य सामग्री जो सैनिकों में बराबर बाँटी जाती है । आमतौर पर फौज के लाव-लश्कर में रसद सबसे महत्वपूर्ण सामग्री होती है । ‘रसद’ में पाने का भाव यहाँ भी स्पष्ट है । आहार वह है जिसे उदरस्थ किया जाए मगर रसद वह कच्ची सामग्री है जिससे आहार तैयार किया जाता है । रसद में नून, तेल, लकड़ी सब कुछ शामिल है । जॉन प्लैट्स के कोश में रसद के गल्ला, राशन, खाद्यान्न, आपूर्ति, राशन-भत्ता, हिस्सा, कोटा, अंश, प्राप्त, आयात, राजस्व, खाद्य भण्डार जैसे अर्थ शामिल हैं ।

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Friday, April 27, 2012

लोबान की महक

Olibanum

दु निया में शायद ही कोई होगा जिसे खुशबू नापसन्द होगी । सुवास से न सिर्फ़ तन-मन बल्कि आसपास का माहौल भी महक उठता है । सुगन्धित पदार्थ की एक लम्बी फ़ेहरिस्त है और इसमें लोबान का नाम भी शामिल है । अगरबत्ती, धूप और हवन सामग्री के निर्माण में लोबान का प्रयोग होता है । लोबान का प्रयोग दवा के रूप में भी होता है । इसे सुलगते हुए कंडे या अंगारे पर रख कर जलाया जाता है । इसका धुआँ सुगन्धित होता है । लोबान दरअसल एक क़िस्म की राल या वृक्ष से निकलने वाला पारदर्शी स्राव है जो सूख कर सफेद या पीली आभा वाले छोटे छोटे पिण्डों में रूपान्तरित हो जाता है । इसे हवन, पूजन के दौरान या अन्य आयोजनों में सुगन्धित वातावरण बनाने के लिए जलाया जाता है । इसके धुएँ से माहौल महक उठता है ।
लोबान या लुबान दरअसल असल भारत में फ़ारसी के ज़रिये आया है मूलतः यह सेमिटिक भाषा परिवार की धातु ल-ब-न ( l-b-n ) से बना अरबी शब्द है । यह एक अनोखा शब्द है जिसके भीतर बहुत सारे आशय छुपे हैं । इसके मूल में एक देश का नाम है । श्वेत अर्थात सफेदी के विविध आयाम इसमें नज़र आते हैं । इसमें एक विशिष्ट वृक्ष का स्पर्श भी है । देखतें है लोबान के वंशवृक्ष को । अधिकांश राल आधारित सुगन्धित पदार्थों की तरह ही लोबान भी एक विशिष्ट पेड़ बोसवेलिया सेरेटा Boswellia serrata से निकलने वाला दूध है । सेमिटिक धातु ल-ब-न में सफेदी या दुग्ध जैसे स्राव का भाव है । इससे बने अल-लुबान में भी दूध या सफेद पदार्थ का आशय है जिसमें वृक्ष से निकली सुगन्धित राल का अर्थ ही उभरता है । लुबान या लोबान का रिश्ता हिब्रू से भी है । ए जनरल सिस्टम ऑफ़ बॉटनी एंड गार्डनिंग में जॉर्ज डॉन अरेबिक al-luban के हिब्रू सजातीय lebonah का उल्लेख करते हैं । लेबोनाह का अर्थ होता है श्वेतकण या सफेदी का ढेर । इससे ही ग्रीक भाषा में लिबेनोस libanos बना, जिसका आशय भी लोबान ही है । ओलिबेनम का इतालवी रूप ओलिबेनो है ।
सी तरह लैटिन का ओलिबेनम olibanumशब्द ओषधिविज्ञान का जाना पहचाना पदार्थ है जिसका उपयोग प्रायः सिरदर्द की दवा बनाने में होता रहा है । इसका आशय भी गोंद, राल या लोबान से ही है । कई संदर्भ इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि लैटिन का ओलिबेनम दरअसल अरबी के अल-लुबान al-luban का सीधा सीधा लिप्यंतरण है जिसमें उच्चारण भिन्नता की वजह से हलका बदलाव आया । लोबान या ओलिबेनम का रिश्ता कई तरह से एशिया के सुदूर पश्चिमी छोर पर स्थित लेबनान से भी जुड़ता है । ऑक्सफोर्ड इन्साक्लोपीडिया के अनुसार ओलिबेनम दरअसल “ऑइल ऑफ़ लेबेनोज” या लेबेनान टर्म का संक्षेप है जिसका अर्थ है “लेबनान का तेल” । मगर यह बहुत पुख्ता आधार नहीं है । कुछ भाषाविदों का मानना है कि प्राचीनकाल से ही लेबनान में पाए जाने वाले ख़ास देवदार से निकलने वाले सुगन्धित पदार्थ की माँग भूमध्यसागरीय क्षेत्रों के बाज़ार में खूब रही है । इसीलिए लेबनान से आने वाले राल को लोबान नाम मिला । कुछ हद तक स्वीकार्य होते हुए भी यह व्युत्पत्ति सही नही है ।
रअसल लेबनान lebanon शब्द भी सेमिटिक मूल का ही है और इसा जन्म भी ल-ब-न से हुआ है । पश्चिमी एशिया के इस पहाड़ी प्रान्त में बर्फ़ से लदी चोटियाँ हैं । शुष्क अरब क्षेत्र में बर्फीली चोटियों वाले लेबनान को ल-ब-न में निहित सफेदी, शुभ्रता की वजह से ही पहचान मिली । लेबनान यानी लुब + नान अर्थात सफेद धरती । तात्पर्य बर्फ़ से ढकी चोटियों से ही है । यहाँ का सबसे ऊँची चोटी का नाम भी माऊंट लेबनान ही है । स्पष्ट है कि लेबनान से ‘लोबान’ नहीं बना है बल्कि ल-ब-न से ही लेबनान और लोबान बने हैं । दोनों में खास बात सफेदी है । प्राचीन अरब के सौदागरों का दूर दराज़ तक व्यापार करने में कोई सानी नहीं था । दरअसल अफ्रीका और पूर्वी एशिया के देशों से भारी मात्रा में अरब के सौदागर लोबान loban खरीदते थे और उसे लेबनान में साफ़ किया जाता था । वहाँ से उसे फिर दुनियाभर के बाज़ारों में बेचा जाता था । लेबनान से लोबान का रिश्ता इसलिए है क्योंकि वह लोबान की बड़ी मण्डी थी ।
स संदर्भ में अल्बानिया, एल्प्स जैसे क्षेत्रों को भी याद कर लेना चाहिए । सेमिटिक धातु ल-ब-न से मिलती जुलती धातु है a-l-b ( कुछ लोग इसे गैर भारोपीय धातु भी मानते हैं)। एल्ब *alb- का अर्थ है श्वेत, सफेद, धवल, पहाड़, पर्वत । इससे मिलती जुलती प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा परिवार की एक धातु है *albho-जिसमें भी यही भाव है और माना जाता है कि इसका विकास *alb-से हुआ है । पूर्व से पश्चिम तक फैली यूरोप की प्रसिद्ध पर्वत शृंखला का नाम एल्प्स है । यह नाम इसी मूल से आ रहा है । ध्यान रहे आल्प्स के न सिर्फ उच्च शिखरों पर हमेशा बर्फ जमी रहती है । alps में alb धातु साफ दिखाई पड़ रही है । पर्वतीय या पहाड़ी के अर्थ में एल्पाईन शब्द भी इसी मूल से आ रहा है ।

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Thursday, March 22, 2012

खाली हाथ खलासी

पिछली कड़ी-खुलासे का खुलासा

coupleहिन्दी के सर्वाधिक प्रयुक्त शब्दों में ‘खाली’ का शुमार भी है जिसमें रिक्तता, शून्यता, रीतापन जैसे भाव हैं । जिसमें कुछ न हो, शून्य हो उस स्थान को खाली कहते हैं । ‘खाली’ शब्द की मुहावरेदार अर्थवत्ता की वजह से इसमें अकेला, केवल, सिर्फ जैसे अर्थ भी विकसित हुए जैसे “वहाँ खाली एक आदमी था…” । यहाँ सिर्फ़ और अकेले का भाव साफ़ है । “खाली बैठना” हिन्दी का प्रसिद्ध मुहावरा है जिसका अर्थ है हाथ में कोई काम न होना । अलग अलग सन्दर्भों में बेकारी या निकम्मेपन का अभिप्राय इससे सिद्ध होता है । “खाली हाथ” जैसा सर्वमान्य मुहावरा भी इसी कड़ी में आता है । किसी प्रयोजन के लिए पास में मुद्रा, वस्तु या उपहार न होने की स्थिति में खाली हाथ मुहावरे का प्रयोग किया जाता है, जैसे-“बुलावा तो आया है पर ‘खाली हाथ’ जाना उचित नहीं समझता ।” मुम्बइया हिन्दी के प्रभाव में “खाली-पीली” जैसा मुहावरा भी युवा पीढ़ी ने अपना लिया है जिसमें व्यर्थ या फिज़ूल की बात करने का भाव है ।
खाली का रिश्ता सेमिटिक धातु kh-l-w से है जिसमें शून्यता, रिक्तता, अकेलापन, एकान्त, निर्जन, उजाड़, अलग-थलग जैसे भाव हैं । उर्दू-फ़ारसी शायरी में एकान्त के अर्थ में प्रयुक्त ‘खल्वत’ शब्द भी इसी मूल का है । ग़ालिब साहब लिखते हैं – “देखा असद को जल्वतो-खल्वत में बारहा । दीवाना गर नहीं तो हुशियार भी नहीं ।।” खल्वत यानी अकेले में, जल्वत यानी सबके बीच । इस्लामी दौर में खल्वतखाना, ख़ल्वतक़दा या खल्वतगाह भी होते थे जहाँ वो एकान्त चर्चा करते थे । ‘मजलिसे-खल्वत’ जैसी एक व्यवस्था भी थी । सम्भवतः यह कैबिनेट जैसी विशिष्ट सलाहकारों की समिति होती थी । मराठी में ‘खल्वत’ का रूप ‘खलबत’ हो जाता है जिसका अर्थ है एकान्त वार्ता । फ़ारसी का ‘खलेवतखाना’ मराठी में ‘खलबतखाना’ है । ‘खल्वत’ का ‘खिल्वत’ रूप भी मिलता है । ‘खाली’ में सिर्फ़ या अकेले का भाव भी है जैसे- “खाली एक आदमी आया” । एकाकी, एकान्तप्रिय व्यक्ति को इसीलिए ‘ख़लवतपसंद’ या ‘खलवतदोस्त’ कहा जाता है । चलताऊ तौर पर एकाकी व्यक्ति को ‘खल्वती’ भी कहा जाता है ।
रबी ज़बान में एक शब्द है ‘ख़ला’ जिसके मायने होते हैं अंतरिक्ष, आसमान, रिक्त स्थान, शून्य आदि। इसके अलावा एकाकीपन, एकान्त आदि भाव भी इसमें समाहित है। ‘खला’ रिश्तेदारी ‘खालीपन’ से है । ‘ख़ला’ में व्याप्त आसमान और अंतरिक्ष के भाव का विस्तार भी शामिल है अर्थात यह संसार या सभी कुछ जड़-जंगम दृष्टिगोचर इसमें आ जाते हैं। गौर करें ‘ख़ला’ मे निहित अंतरिक्ष वाले अर्थ पर । मूलतः यही अर्थ व्यापक है। अंतरिक्ष क्या है ? अंग्रेजी में इसे स्पेस कहते हैं यानी खाली जगह । ‘ख़ला’ से ही जुड़ा है अरबी, फारसी और उर्दू का ख़ाली शब्द जिसका अर्थ होता है रिक्त स्थान । अंतरिक्ष भी रिक्त स्थान ही है। दार्शनिक अर्थों में इसे शून्य भी कहा जाता है। अरबी शबद खला का एक रूप ‘खुलू’ भी है जिसका मतलब भी खाली होना, रिक्त होना है।
‘ख़ाली’, ‘खला’ की कड़ी में ही आता ‘खलास’ अर्थात रिक्त करना, मुक्त करना, छुटकारा, रिहाई वगैरह । हिन्दी में रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और मंडियों में एक शब्द अक्सर सुनाई पड़ता है वहा है ‘खलासी’ या ‘खल्लासी’ । आमतौर पर ये कामगारों के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द है जिसका मतलब होता है सामान उतारने वाला श्रमिक । खलासी पूरे भारत में प्रचलित शब्द है। ‘खलासी’ शब्द से जुड़े की शब्द आज हिन्दी–उर्दू में प्रचलित हैं जिनके दार्शनिक अर्थ और व्याख्याएं भी हैं। सफ़र के साथी लंदन निवासी राजेश प्रियदर्शी बताते हैं कि अरबी में सामान्य बातचीत के दौरान ‘खलास’ का प्रयोग अच्छा, ठीक, ओके की तरह होता है । हर वाक्य के अंत में लोग आईसी, ओके, राइट, फाइन की तरह ‘खलास’ का प्रयोग कहते हैं, कुछ इस तरह की ये बात तो साफ़ हो गई अब अगली बात ।
ब्दों का सफ़र में कुछ अर्सा पहले “अच्छा” शब्द पर लिखी पोस्ट का ध्यान कर लें । यहाँ ‘खलास’ के प्रयोग में भाव ग्रहण की वही प्रक्रिया है जो हिन्दी के ‘अच्छा’ में है । अच्छा का मूल ‘अच्छ’ है । ‘अच्छ’ में जो ‘छ’ है वह ‘छत’ अर्थात ‘छाया’ का प्रतीक है। मोनियर विलियम्स के कोश के मुताबिक यह अच्छ है। इसमें अ+‘च्छ’ है वह ‘छद्’ से आ रहा है। इस तरह ‘अच्छ’ का अर्थ हुआ जो ढका हुआ न हो, जो उजागर है, पूरी तरह स्पष्ट है, पारदर्शी है, साफ है । इस तरह संवाद होने के बाद अन्त में जब ‘अच्छा’ कहा जाता है तब अभिप्राय यही होता है कि अब सब कुछ स्पष्ट है, कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। इसी तरह सफर की एक अन्य साथी दुबई निवासी मीनाक्षी धन्वन्तरि ने हमें बताया कि खजूर की एक किस्म को भी खलास कहते हैं । ईरान में किसी प्रियजन के न होने पर भी खाली शब्द का इस्तेमाल होता है- “जा ए शोमा खाली "... “आपकी जगह खाली है” यानि उस व्यक्ति की कमी महसूस की जा रही है ।
प्राचीनकाल से ही अरब लोग सौदागरी में माहिर थे और सामुद्रिक व्यापार में खूब बढ़े-चढ़े थे । देश-विदेश के माल से लदे उनके जहाज़ बंदरगाहों पर आ टिकते और मज़दूरों का ख़ास तबका इन्हें ‘ख़ाली’ करने के काम में जुटता । जहाज़ को खाली करानेवाले ही ‘खलासी’ कहलाए। भारत में खलासी सामान्य मज़दूर भी कहलाता है और ट्रक को अनलोड कराने वाला श्रमिक भी । गोदी ( बंदरगाह ) पर काम करनेवाला श्रमिक भी खलासी कहलाता है और रेलवे के एक निम्न वर्ग में इसी पदनाम से चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती भी होती है । अब रिक्त कराने या खाली कराने के अर्थ मे तो खलास का अर्थ स्पष्ट हुआ मगर मुंबइया ज़बान में किसी को मारने , कत्ल करने जैसे अर्थ में भी खल्लास जैसा शब्द चलता है। गौर करें खलास में शामिल मुक्ति या छुटकारा दिलाने जैसे भाव पर । खल्लास यहां आकर कत्ल का अर्थ लेता है। ‘खलासी’ या ‘खलासी करना’ का अर्थ भी खाली करना है ।

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Friday, March 9, 2012

बनिया-बक्काल यानी प्रोविज़न स्टोर वाला

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मतौर पर किसी शब्द की पहचान इसलिए उभर नहीं पाती क्योंकि वह किसी शब्दयुग्म का हिस्सा होता है । बक्काल ऐसा ही एक शब्द है जिसका स्वतंत्र प्रयोग शायद ही हिन्दी में होता हो । किसी के सामने बोलने पर वह भी इसकी शिनाख़्त शायद ही कर पाए । मगर बनिया-बक्काल के रूप में इसे सब जानते हैं । भारतीय समाज में व्यवसायगत पहचान ही सदियों बाद जातीय पहचान बन कर उभरी । इस प्रक्रिया में कई ऐसे शब्द बने हैं जिनका जन्म सामान्य बोलचाल में हुआ मगर कालान्तर में उन्हें जातीय पहचान के हीन दृष्टिकोण से देखा जाने लगा । भारत के व्यापारी समुदाय मे बनिया वर्ग भी शामिल है । बनिया शब्द की अर्थवत्ता में इज़ाफ़ा हुआ और यह शब्द ऐसे लोगों के लिए भी प्रयोग होने लगा जो जोड-गुणा-भाग के साथ जीवन जीते हैं । बेहद कंजूस, कृपण व्यक्ति को भी बनिया कहा जाने लगा और चतुर, व्यवसाय बुद्धिवाला व्यक्ति भी बनिया हो गया । इस शब्द के मेल से कई विशेषण भी बने जिनका मुहावरेदार प्रयोग हम आए दिन करते हैं मसलन बनिया-बुद्धि, बनिया-मानिसिकता, बनिया-मेन्टैलिटी , बनियाटाइप, बनियापन जैसे प्रयोगों ने हमारी अभिव्यक्ति को नया आयाम दिया है । ऐसा ही एक शब्दयुग्म है बनिया-बक्काल । यह भी सच है कि इन प्रयोगों की बदौलत ही बनिया की जातीय पहचान रखने वाले लोगों में असन्तोष भी है और वे इस शब्द से खुद की शिनाख्त नही कराना चाहते । एक सदी से भी पहले ब्रिटिशकाल में बनिया-बक्काल विशेषण के स्थान पर वैश्य शब्द का प्रयोग करने की माँग की थी ।
बसे पहले बक्काल की बात । बक्काल हिन्दी का अपना नहीं है बल्कि सेमिटिक शब्दावली का हिस्सा है और फ़ारसी और उर्दू पर सवार होकर यह हिन्दी के कारवाँ में दाखिल हुआ है । सेमिटिक परिवार की अरबी के ज़रिये यह न सिर्फ हिन्दी बल्कि यूरोपीय भाषाओं में भी शामिल हुआ । बक्काल के बारे में हिन्दी के कोश  कामचलाऊ जानकारी ही देते हैं सिर्फ़ इतना ही कि यह बनिया शब्द का पर्याय है और रोज़मर्रा की चीज़ें बेचनेवाला छोटा दुकानदार, किरानी आदि का भाव इसमें है । सेमिटिक मूल के बिकाला का अरबी भाषा में अर्थ होता है ताज़ा बने सामान की दुकान जैसे दूध, मक्खन, पनीर, घी, सब्ज़ी आदि । इससे ही बना है बक्क़ाल जिसका अर्थ है दूध, पनीर, सब्ज़ी आदि बेचने वाला । हिन्दी में सब्ज़ी, डेरी प्रॉडक्ट या ताज़ा वस्तुओं की दुकान के लिए कोई शब्द नहीं मिलता । अंग्रेजी का फ्रेश-मार्ट शब्द शहरों में चल पड़ा है । सब्ज़ी बेचनेवाले को सब्ज़ीवाला ही कहते हैं, मगर वह दूध, दही या पनीर नहीं रखता । बतौर सब्ज़ीवाला, अरविन्दकुमार के सहज समान्तर कोश में बक्काल भी एक पर्याय है । हिन्दी का कुँजड़ा शब्द सिर्फ़ देहात में बोला समझा जाता है । कुँजड़ा सब्ज़ी बेचनेवाले को कहते हैं । यह जातीय विशेषण भी है । कुँजड़ावर्ग में मुस्लिम ज्यादा हैं । सब्ज़ीवाला एक सामान्य सम्बोधन है और सब्ज़ीफ़रोश अप्रचलित शब्द है । माली शब्द बहुत व्यापक है क्योंकि इसका आशय बाग़वानी करनेवाले उस समुदाय से है जो मुख्यतः बाग़ीचे की देखभाल करता है, फूल उगाता है और सब्ज़ी भी उगाता है । इसके बावजूद इन विक्रेताओं के यहाँ हम दूध, दही, पनीर मिलने की कल्पना नहीं कर सकते । इसीलिए ताज़ा बने सामान के विक्रेता के लिए बक्काल शब्द की अर्थवत्ता काफ़ी व्यापक है और एशिया से लेकर पूर्वी यूरोप तक अब बक्क़ाल के मायने किराने की दुकान या किरानी होता है ।
बिक़ाला में मूलतः हरी-ताज़ा वस्तुओं की दुकान का भाव है । इसे सब्ज़ी की दुकान भी कहा जा सकता है । इसी कड़ी में आता है बक़्ल जिसका अर्थ है जड़ी-बूटी । इसका एक रूप है बक़ाला यानी बीज । बक्काल को कही छोटा बाज़ार कहा जाता है तो कहीँ छोटी दुकान । बक्क़ाल दरअसल पुराने ज़माने का सुपर मार्केट था जहाँ एक ही स्थान पर बहुत सी चीज़ें मिल जाती थीं । आज भी छोटे छोटे गाँवों में किराने की एक ही दुकान होती है जहाँ प्याज-लहसुन से लेकर दूध-दही, आटा-दाल से लेकर नमक-मिर्च तक सारी वस्तुएँ मिलती हैं । अरब के रेगिस्तान में दूरदराज़ के सैलानी ऐसी ही दुकानों से सौदा-सुलफ़ लिया करते थे । बिक़ाल का जन्म ब-क़-ल धातु से माना जाता है जिसमें अंकुरण, वृद्धि, खिलना, बढ़ना, फूलना जैसे भाव हैं । ज़ाहिर है ये सभी भाव ताज़गी में भी हैं । अंकुरित बीज, ताज़ा दूध, नमक, मिर्च, आटा-दाल जैसी चीज़ें ही प्राचीन क़बाइली समाज की प्रमुख ज़रूरत थी । यह सब बिक़ाला में मिल जाता था । बिक़ाला यानी किराना या जनरल स्टोर और बक्क़ाल यानी किरानी, पंसारी या बनिया ।
बक्काल शब्द अरबी से तुर्की में गया जहाँ किराने की दुकान के भाव को और विस्तार मिला और तुर्की भाषा में इसकी व्याख्या हुआ बाक़-आल । बाक ( bak )यानी देखना और आल ( aal ) यानी चुनना अर्थात ऐसी जगह जहाँ रोजमर्रा का सामान मिलता है । इस व्याख्या से पुराने ज़माने के किसी छोटे-मोटे सुपरमार्केट की कल्पना दिमाग़ में आती है । हॉब्सन-जॉब्सन कोश से पता चलता है कि उन्नीसवीं सदी के भारत में सेकंड हैंड वस्तुओं के व्यापारी या कबाड़ी के लिए भी बक्क़ाल शब्द प्रचलित था । व्यु्त्पत्ति के सेमिटिक आधार को मज़बूत करने की एक वजह और है । बक़्ल की तर्ज़ पर अरबी में ब-क-ल धातु से बना है बक्र जिसका अर्थ है शुरुआत, दिन की शुरुआत, ताज़ा, पवित्र, शुद्ध या प्राकृतिक वगैरह । ताज़गी का भाव यहाँ भी उभर रहा है ।  बक्ल और बक्र में और का अन्तर है । और ध्वनियों में रूपान्तर की वृत्ति होती है । ज़ाहिर सी बात है कि बक्र और या बक्ल, दोनों में बात ताज़गी की है । सुबह सो कर उठने के साथ, दिन की शुरुआत दूध-ब्रेड से होती है । सबसे पहले इन्हीं पदार्थों की दुकानें खुलती हैं । दिन चढ़ने के साथ साथ ये दुकानें जनरल स्टोर में तब्दील हो हो जाती हैं और दूध, दही, सब्ज़ी की बिक्री कम होती जाती है । सो बक्काल में मूलतः सब्ज़ी-दूध की दुकान का भाव था जो बाद में किराने की दुकान में तब्दील हो गया । आज के किराने के दुकान को प्रोविज़न स्टोर कहते हैं  जहाँ बक्काल की प्राचान अवधारणा के तहत दूध, दही, पनीर, सब्ज़ी से लेकर खाने-पीने की पैक बन्द सामग्री और किराने का दूसरा सामान भी मिलता है ।
ब बनिया की बात । उत्तर वैदिककाल के उल्लेखों में पण, पण्य, पणि जैसे शब्द आए हैं। पण या पण्य का अर्थ हुआ वस्तु, सामग्री, सम्पत्ति। बाद में पण का प्रयोग मुद्रा के रूप में भी हुआ । पणि से तात्पर्य व्यापारी समाज के लिए भी था। पणि उस दौर के महान व्यापारिक बुद्धिवाले लोग थे। पणियों की रिश्तेदारी आज के बनिया शब्द से है। पणि (फिनीशियन) आर्यावर्त में व्यापार करते थे। उनके बड़े-बड़े पोत चलते थे। वे ब्याजभोजी थे। आज का 'बनिया' शब्द वणिक का अपभ्रंश ज़रूर है मगर इसके जन्मसूत्र पणि में ही छुपे हुए हैं। दास बनाने वाले ब्याजभोजियों के प्रति आर्यों की घृणा स्वाभाविक थी। आर्य कृषि करते थे, और पणियों का प्रधान व्यवसाय व्यापार और लेन-देन था। पणिक या फणिक शब्द से ही वणिक भी जन्मा है । आर्यों ने पणियों का उल्लेख अलग अलग संदर्भों में किया है मगर हर बार उनके व्यापार पटु होने का संकेत ज़रूर मिलता है । हिन्दी में व्यापार के लिए वाणिज्य शब्द भी प्रचलित है । वाणिज्य की व्युत्पत्ति भी पण् से ही मानी जाती है। यह बना है वणिज् से जिसका अर्थ है सौदागर, व्यापारी अथवा तुलाराशि। गौरतलब है कि व्यापारी हर काम तौल कर ही करता है। वणिज शब्द की व्युत्पत्ति आप्टे कोश के मुताबिक पण+इजी से हुई है । इससे ही बना है “वाणिज्य” और “वणिक” जो कारोबारी, व्यापारी अथवा वैश्य समुदाय के लिए खूब इस्तेमाल होता है । पणिक की वणिक से साम्यता पर गौर करें। बोलचाल की हिन्दी में वणिक के लिए बनिया शब्द कहीं ज्यादा लोकप्रिय है जो वणिक का ही अपभ्रंश है इसका क्रम कुछ यूं रहा- वणिक > बणिक > बनिअ > बनिया
वियोगी हरि संपादित हमारी परंपरा पुस्तक में शौरिराजन द्रविड़ इतिहास के संदर्भ में पणिज समुदाय की दक्षिण भारत मे उपस्थिति का उल्लेख करते हैं और इस संबंध में क्रय-विक्रय, व्यापारिक वस्तु और एक मुद्रा के लिए पणि , पणम , फणम जैसे शब्दों का हवाला भी देते हैं। तमिल में बिक्री की वस्तु को पण्णियम् कहा जाता है। तमिल, मलयालम और मराठी में प्राचीनकाल में वैश्यों को वाणिकर, वणिकर या वाणि कहा जाता था। पणिकर भी इसी क्रम में आता है। इस उपनाम के लोग मराठी, तमिल और मलयालम भाषी भी होते हैं। पणिकर को पणिक्कर भी लिखा जाता है।

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Saturday, February 25, 2012

काफ़ी नहीं किफ़ायती होना

वश्यकता के मुताबिक उपलब्धता के भाव को अभिव्यक्त करने के लिए हिन्दी में ‘यथेष्ट’ और ‘पर्याप्त’ शब्दों का प्रयोग होता है । ‘यथेष्ट’ की तुलना में पर्याप्त का प्रयोग ज्यादा है मगर इन दोनों की तुलना में हिन्दी में ‘काफ़ी’ शब्द का इस्तेमाल आम है । ‘काफ़ी’ सर्वाधिक बोले जाने वाले शब्दों में शामिल है । इन तीनों ही शब्दों में मात्रा या परिमाण का बोध होता है । काफ़ी लोग, पर्याप्त धन या यथेष्ट अनुभव जैसे पदों से यह ज़ाहिर भी होता है । ‘काफ़ी’ सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है मगर बोलचाल में यूँ रचाबसा है जैसे हिन्दी मूल का ही हो । फ़ारसी के रास्ते ‘काफ़ी’ शब्द हिन्दी में दाखिल हुआ । मूलतः यह अरबी भाषा का शब्द है । ‘किफ़ायत’ भी इसी शब्द-शृंखला का हिस्सा है । ‘किफ़ायत’ का मूलार्थ है पर्याप्त, यथेष्ट मगर इसकी अर्थवत्ता में आमतौर पर बचत, मितव्ययिता या कमखर्च का भाव देखा जाता है ।
रबी में ‘काफ़ी’ के मायने हैं पर्याप्त, यथेष्ट, समुचित, यथोचित, योग्य आदि । यूँ ‘काफ़ी’ का प्रयोग अधिक, बहुत या ज़्यादा की तरह भी होता है जो कि ग़लत है । ‘काफ़ी’ में निहित यथेष्ट या ज़रूरत के मुताबिक वाला भाव ही पकड़ना चाहिए । ‘काफ़ी’ बना है अरबी के ‘काफ़’ से जिसमें यही सारे भाव हैं । काफ़ की मूल धातु है k-f-y जिसमें पर्याप्तता के भाव के साथ साथ रोज़गार, खुराक, बचत करना, सुरक्षा जैसे भावों का समावेश है । गौर करें कि आवश्कतानुरूप उपलब्धता में ही सुखमय जीवन है । साईँ इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय । मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय ।। स्पष्ट है कि पर्याप्तता में ही बचत का भी आधार है । यथेष्टता में बचत है । परिवार की क्षुधाशान्ति के बाद भी एक व्यक्ति के पेट लायक भोजन बचता ही है । ज़रूरत के मुताबिक पदार्थ होने पर ही कुछ बचाया जा सकता है । सो ‘काफी है’ वाक्य में यह बात निहित है कि कुछ न कुछ बच ही जाएगा । k-f-y में यही भाव है । इससे बने ‘काफ़ी’ शब्द में प्रकारान्तर से सन्तोष का भाव महत्वपूर्ण है । ‘काफ़ी’ शब्द का इस्तेमाल कई तरह से होता है जैसे- “इतना काफी है”, “काफ़ी-कुछ ठीक हो गया” , “काफ़ी से ज्यादा है”, “काफ़ी से कम है”, “काफ़ी ज्यादा है” इत्यादि । फ़ारसी का ‘ना’ उपसर्ग लगा कर ‘नाकाफ़ी’ शब्द बनता है जिसका अर्थ होता है अपर्याप्त ।
किफ़ायत शब्द अरबी के ‘किफ़ायाह’ से बना है जिसके मूल में भी सेमिटिक धातु k-f-y है । किफ़ायत को हिन्दी में बचत के अर्थ में ही लिया जाता है पर इसके मूलभाव को पकड़ें तो इसमें भी पर्याप्तता और प्रचुरता ही खास है । अधिक अंश को ही बचत कहा जाता है सो ‘किफ़ायत’ से बने किफ़ायती में मूल्य से कम अर्थात सस्तेपन का भाव है । किफ़ायती का अर्थ मितव्ययी भी होता है । कमखर्च वाला सामान भी ‘किफ़ायती’ कहलाता है । किफ़ायतशार उस व्यक्ति को कहते हैं जो गुणा-भाग लगा कर खर्च करता है, हिसाबी-किताबी है । किफ़ायतशारी का मतलब है बचत करना, कम खर्च करना या मितव्ययिता दिखाना । किफ़ायती व्यक्ति भी हो सकता है और वस्तु भी । ऐसी वस्तु जो कम मूल्य पर खरीदी जाए, किफ़ायती दाम वाली कहलाएगी । कम खर्च पर संचालित होने वाली व्यवस्था या वस्तुएँ भी किफ़ायती कहलाती हैं जैसे बिजली बचाने वाला उपकरण भी किफ़ायती कहलाएगा ।
काफ़ी के अर्थ में ‘पर्याप्त’ शब्द का प्रयोग भी खूब होता है । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक ‘पर्याप्त’ के प्रचलित मायने हैं- पूरा, काफी, यथेष्ट मगर इसमें प्राप्त, मिला हुआ जैसे अर्थ भी निहित हैं । इसके साथ ही जिसमें शक्ति हो, शक्तिसंपन्न, जिसमें सामर्थ्य हो जैसे भाव भी हैं । ‘पर्याप्त’ बना है परि (पर्य) + आप्त से जिससे इसका अर्थ निकलता है जो पूरी या अच्छी तरह से प्राप्त हो । ‘परि’ उपसर्ग में समग्रता का भाव है और ‘आप्त’ का अर्थ है पाना, मिलना, प्रदत्त आदि । बाद में ‘काफी’ या ‘यथेष्ट’ के अर्थ में ऐसी मात्रा या परिमाण जिससे ज़रूरत पूरी हो रही हो, के आशय में पर्याप्त शब्द हिन्दी में रूढ़ हो गया । अब इसी रूप में में हिन्दी में इसका प्रयोग होता है । पर्याप्त में आवश्यकता और उसकी पूर्ति का भाव ही प्रमुख है अर्थात आवश्यकता के अनुरूप प्राप्ति ही पर्याप्तता है ।
र्याप्त के अर्थ में ‘यथेष्ट’ शब्द परिनिष्ठित हिन्दी में प्रयोग होता है । बोली-भाषा में इसका प्रयोग कम है मगर लेखन में यह नज़र आता है । ‘यथेष्ट’ बना है ‘यथा + इष्ट’ से । अर्थात इच्छा के अनुरूप । ‘यथा’ यानी जितना और ‘इष्ट’ यानी जिसकी कामना की जाए । इस तरह यथेष्ट में इच्छापूर्ति की बात उभर रही है । ‘यथेष्ट’ का प्रयोग देखिए- “नौकरी मिलने के बाद उसने यथेष्ट साधन जुटा लिए ।” पर यथेष्ट के साथ भी अधिकता या प्रचुरता वाली अर्थवत्ता जुड़ी हुई है जैसे- “उनके पास यथेष्ट संसाधन थे फिर भी कई काम अधूरे रह गए ।” यहाँ मनमाफिक साधनों के साथ प्रचुर साधनों की बात भी उभर रही है ।

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Monday, February 20, 2012

किसी कंपेश को जानते हैं आप ? [कम-3]

पिछली कड़ियाँ-Balance1.‘काम’ में ‘कमी’ की तलाश [कम-1] 2.पहचानिए हिन्दी के दो कमीनों को…[कम-2]

पने कभी कंपेश पढ़ा या सुना है? ‘लंकेश’, ‘सुकेश’, ‘मुकेश’, ‘काकेश’, ‘लोकेश’, राकेश जैसे संज्ञा-नाम हमारे आस-पास रोज देखने सुनने को मिलते हैं, मगर ‘कंपेश’ शायद कभी नहीं सुना होगा । वैसे ‘कंपेश’ इन शब्दों की तरह संज्ञा न होकर, सामासिक शब्द है । मराठी ने फ़ारसी के ‘कमोबेश’ का ऐसे देशी संस्कार में ढाला कि यह ‘कंपेश’ हो गया । देशी संस्कार मिलने के बाद शब्दों का इतना रूपान्तर हो जाता है कि उनकी शिनाख्त मुश्किल होती है कि इनका मूल क्या था । ‘लालटेन’ ( लैन्टर्न ), ‘लपटन’ ( लैफ्टीनेंट ), पलटन ( प्लाटून ) या ‘गिरमिट’  (एग्रीमेन्ट) जैसे शब्दों से यह अंदाज़ नहीं लगता कि ये मूल रूप से अंग्रेजी के हैं । ऐसे शब्दों के लिखित रूप स्थिर होने के बाद परिनिष्ठित भाषा में भी जगह पा लेते हैं । मगर बोलियों में एक ही शब्द के कई रूप प्रचलित रहते हैं और जब उसी रूप में इन्हें लिखा जाता है जैसे- कंपेश, कम्बेश, कमबेश, कंबेस आदि तो दिलचस्प मामला बनता है । इन्हें पढ़ कर यह अंदाज़ लगाना कठिन है कि ये फ़ारसी के ‘कमोबेश’ शब्द के बहुरूप हैं । ‘कमोबेश’ हिन्दी में खूब प्रचलित है जो कमज्यादा, न्यूनाधिक या थोड़ा-बहुत के अर्थ में प्रयुक्त होता है। मालवी-राजस्थानी में इसके थोड़ा-घणा या थोड़ो-घणों रूप प्रचलित हैं। मराठी में यह ‘उणे-अधिक’ या ‘अधिक-उणे’ है जिस पर विस्तार से पिछली कड़ी में चर्चा हो चुकी है ।
कमोबेश के बेश का आधार
फ़ारसी का ‘कमोबेश’ शब्द मूलतः सामासिक पद है और फ़ारसी के ‘कम’ और ‘बेश’ शब्दों से मिल कर बना है। ‘कम’ की व्युत्पत्ति अवेस्ता के ‘कम्ना’ से हुई है । मूलतः ‘कम्ना’ का ‘कम्’ उसी पूर्ववैदिक भाषा से जन्मा है जिससे इच्छा, चाह, अभिलाषा के अर्थ वाला वैदिक भाषा का कम् जन्मा । ‘कम्’ से ही ‘कामना’ शब्द बनता है, ‘काम’ यानी इच्छा है । ‘कम्’ में अवेस्ता का ‘उन’ प्रत्यय लगने से ‘कम्ना’ बनता है । यह ‘उन’ भी पूर्ववैदिक रूप है और वैदिकी में इसका ‘ऊण’ रूप देखने को मिलता है जिसका अर्थ है अल्प, थोड़ा, न्यून आदि । इस तरह ‘कम्ना’ में इच्छा से ‘कम’ का भाव स्थिर होता है और बाद में फ़ारसी के ‘कम’ शब्द में सिर्फ़ ‘कमी’ का भाव रूढ़ हो जाता है । यह तो हुई ‘कमोबेश’ के ‘कम’ के बारे में संक्षिप्त सी बात क्योंकि विस्तार से चर्चा पहली कड़ी में हो चुकी है । सवाल है कि कमोबेश के ‘बेश’ का आधार क्या है ?
बेहतर हुआ ‘बेश’
बेश फ़ारसी मूल का शब्द है और हिन्दी समेत भारत की अनेक बोली-भाषाओं में प्रचलित है । कमोबेश के विभिन्न रूपान्तरों की ऊपर चर्चा हो ही चुकी है । अधिक, ज्यादा के अर्थ में ‘बेशी’, ‘बेसी’, ‘बेश’, ‘बेस’ जैसे शब्द हिन्दी वाक्यों में प्रचलित हैं । ‘बेश’ का मूलाधार भी ‘कम्ना’ की तरह ही अदृष्य है । बेश के दो आधार नज़र आते हैं । पहला है वशिष्ट > बहिश्त > की अगली कड़ी बेश के रूपान्तर का । बहिश्त का अर्थ अवेस्ता में श्रेष्ठ होता है । दूसरा आधार । ‘बेश’ दरअसल फ़ारसी का ‘बेह’ है जिससे हम ‘बेहतर’, ‘बेहतरीन’ जैसे शब्दों के ज़रिए खूब परिचित हैं । ‘बेह’ का मतलब होता है बढ़िया, भला, अच्छा आदि। ‘बेह’ की व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘भद्र’ bhadra से मानी जाती है जिसका मतलब, शालीन, भला, मंगलकारी आदि होता है। फारसी में इसका रूप ‘बेह’ हुआ। अंग्रेजी में गुड good के सुपरलेटिव ग्रेड( second ) वाला ‘बेटर’ better अक्सर हिन्दी-फारसी के ‘बेहतर’ का ध्वन्यात्मक और अर्थात्मक प्रतिरूप लगता है । इसी तरह ‘बेस्ट’ best को भी फारसी ‘बेहस्त’ beh ast पर आधारित माना जाता है। अंग्रेज विद्वानों का मानना है कि ये अंग्रेजी पर फारसी, प्रकारांतर से इंडो-ईरानी प्रभाव की वजह से ही है ।
‘बेश’ में है अधिकाई
यूँ बैटर-बेस्ट को प्राचीन जर्मन लोकशैली ट्यूटानिक का असर माना जाता है जिसमें इन शब्दों के क्रमशः बेट bat (better) और battist (best) रूप मिलते हैं। इस ‘बेहस्त’ का ही रूपान्तर ‘बेश’ हुआ है जिसमें ‘बेह’ की अर्थवत्ता सुरक्षित बनी रही है । फैलन के उर्दू-इंग्लिश कोश के मुताबिक ‘बेश’ में बेहतर का भाव है । उत्तम का भाव है । ‘बेश’ में आधिक्य, अधिकाई, वृद्धि, ज़ोर जैसे भाव भी हैं । ‘बेशी ज़मीन’ यानी ज्यादा भूमि (सरप्लस लैंड), ‘बेशी माल’ यानी ज़रूरत से ज्यादा सम्पदा, बेशी जुर्माना यानी गैरकानूनी सज़ा आदि शब्दों में बेशी की पहचान आसानी से हो रही है । अत्यधिक मूल्यवान वस्तु के लिए आए दिन हम ‘बेशकीमती’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं । इस समास का पहला हिस्सा ‘बेश’ है जिसमें आधिक्य का भाव बेशकीमती के अत्यधिक मूल्यवान अर्थ में स्पष्ट हो रहा है । सो, स्पष्ट है कि कमोबेश का बेश भी आखिर इंडो-ईरानी परिवार का और संस्कृत-हिन्दी का नज़दीकी रिश्तेदार निकला । ‘कमोबेश’ शब्द थोड़े-बहुत फ़र्क़ के साथ प्रायः देश की सभी आर्य भाषाओं में प्रचलित है ।
कम-ज्यादा भी डटा है
मोबेश की तरह ही ‘कम-ज्यादा’ पद भी हिन्दी में खूब वापरा जाता है । मराठी-मालवी में यह ‘कम-जास्त’ हो जाता है । ‘कम’ शब्द जहाँ भारत-ईरानी भाषा परिवार की फ़ारसी ज़बान से आया है वहीं ‘ज्यादा’ शब्द सेमिटिक भाषा परिवार की अरबी ज़बान से हिन्दी में दाखिल हुआ है जिसमें अधिकता, आधिक्य का भाव है । ज्यादा सेमिटिक धातु z-y-d से बना है जिसमें वृद्धि का भाव है । इसका सही रूप है ‘ज़ियादह्’ दरअसल अपने सेमिटिक रूप में तो यह ‘ज़िआदा’ ( ज़ादा ) है मगर फ़ारसी में पहले से ही ‘ज़ादा’ मौजूद है जिसकी वजह से अरबी के ‘ज़ादा’ का फ़ारसीकरण ‘ज़ियादह्’ हुआ । अरबी में ज़ियादत का हिन्दी में जियाज़त और फिर ज़ियासत होते हुए जास्ती यह रूप स्थिर हुआ । बोलचाल की भाषा में जास्ती भी अधिकता, आधिक्य के अर्थ में बोला जाता है । वैसे जास्ती नक्को, जास्ती खाने का, जास्ती पढ़ने का जैसे वाक्य-प्रयोगों वाला जास्ती मुम्बइया असर है । वैसे जास्ती शब्द हिन्दी की विभिन्न बोलियों में स्वतंत्र रूप में है । ज़ियादह् से बना ‘ज्यादा’ हिन्दी में ज्यादा चलता है । जबर्दस्ती के अर्थ में ज़्यादती शब्द भी खूब प्रचलित है । कम – ज्यादा की तरह थोड़-ज्यादा भी चलता है । ‘ज़िआदा’ का एक रूप ‘ज़ाइद’ भी होता है जिसका अर्थ है अधिक, बहुत अधिक, प्रचूर ।
न्यूनता में ‘ऊनता’ 
मोबेश में जो ‘कम’ है वह अवेस्ता के ‘कम्ना’ से बना है, इस पर पिछली कड़ी में विस्तार से कहा जा चुका है । ‘कम्ना’ में ‘उन्’ प्रत्यय का प्रयोग हुआ है और यह ‘कम् + उन्’ से बना है । ‘कम्ना’ में निहित ‘न्यून’, ‘कुछ’, ‘थोड़ा’ या ‘कमी’ का भाव दरअसल ‘कम्’ से नहीं बल्कि ‘उन्’ प्रत्यय से आ रहा है । कोश में इसकी तुलना अपूर्ण, त्रुटिपूर्ण, अतिरिक्त, कुछ, अपर्याप्त या न्यून की अर्थवत्ता वाले संस्कृत विशेषण ‘ऊन’ से की गई है । गौरतलब है कि वैदिकी और अवेस्ता लगभग जुड़वाँ प्रकृति की भाषाएँ हैं। फिर भी विद्वान वैदिक भाषा को अवेस्ता से कुछ प्राचीन ठहराते हैं । ज़ाहिर है गाथाअवेस्ता का ‘उन’ और वैदिक भाषा का ‘ऊन’ एक ही है । कम के अर्थ में संस्कृत-हिन्दी का जो ‘न्यून’ शब्द है उसकी अर्थवत्ता और व्युत्पत्ति भी इसी ‘ऊन’ से सिद्ध होती है। ‘न्यून’ बना है नि + ऊन ‘अच्’ प्रत्यय लगने से । इस तरह फ़ारसी के ‘कम’ और संस्कृत के ‘न्यून’ के बीच समीकरण भी बनता है और व्युत्पत्तिक रिश्ता भी ।
फ़र्क़ ‘उन्नीस-बीस’ का
संस्कृत में ‘ऊन’ का प्रयोग प्रत्यय की तरह भी होता है जिसका अर्थ है अभाव, अधूरा कम, अपर्याप्त, अपूर्ण आदि । इस ‘ऊन’ का एक रूप मराठी का उणे है जिसका अर्थ भी कम होता है । ‘कम-ज्यादा’ या ‘कमोबेश’ की तर्ज़ पर मराठी में ‘उणे-अधिक’ पद प्रचलित है । संख्यावाचक कमी दर्शाने के लिए भी ऊन का प्रयोग भी संस्कृत में खूब होता है और हिन्दी संख्याओं में भी यह नज़र आता है जैसे उन्नीस, उन्तीस, उनचालीस, उनपचास, उनसाठ, उन्हत्तर आदि । यह जो उन है इसमें निहित कमी के भाव पर विचार करें तो उपरोक्त संख्याओं का अभिप्राय एक कम बीस, एक कम तीस, एक कम चालीस यहाँ अचानक स्पष्ट हो जाता है । संस्कृत में यह क्रिया और भी स्पष्टता से नज़र आती है । एक + ऊन = एकोन अर्थात एक कम , विंशति = बीस । एकोनविंशति > उनविंशति ( पाली ) एकूनवीस > एकूनवीसती ( प्राकृत) ऊणवीसई > ऊनवीसा > उनवीसई ( अपभ्रंश ) एगूणवीस > एगूणीस > उणवीस > उन्नीस । मराठी में उन्नीस के स्थान पर एकोणीस का चलन है और इसमें भी ‘एकोन’ यानी एक + ऊन ( एक कम ) को साफ़ पहचाना जा सकता है । किन्ही दो चीज़ों में न्यूनाधिक फ़र्क़ बताने के लिए उन्नीस-बीस का अन्तर जैसा मुहावरा बोला जाता है । गौर करें, यहाँ भी एक-कम का ही महत्व अर्थात ऊन की ही महत्ता पता चल रही है । 

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Monday, February 6, 2012

‘काम’ में ‘कमी’ की तलाश [कम-1]

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हि न्दी के बहुप्रचलित शब्दों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा नज़र आता है ‘अल्प’, ‘न्यून’, ‘थोड़ा’, ‘छोटा’, ‘कुछ’ के सन्दर्भ में इस्तेमाल होने वाला ‘कम’ शब्द । इसकी तुलना में ‘न्यून’ या ‘अल्प’ का प्रयोग विरल है । ‘कम’ के अर्थ में ‘कमती’ शब्द भी चलता है। ‘कम’ शब्द बरास्ता अवेस्ता होते हुए फ़ारसी में आया और फिर हिन्दी में इसने आसन जमा लिया। ‘कम’ शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में बहुत ‘कम’ जानकारी उपलब्ध है, बल्कि कहना चाहिए कि हिन्दी-उर्दू में प्रचलित ‘कम’, कमती शब्दों के फ़ारसी मूल के मद्देनज़र इनकी व्युत्पत्ति जानने के प्रयास सम्भवतः नहीं हुए हैं । भाषा सम्बन्धी पुस्तकों, कोशों आदि में इसका सन्दर्भ नहीं मिलता । विभिन्न सन्दर्भ सिर्फ़ इतना ही बताते हैं कि यह फ़ारसी मूल का शब्द है । दिलचस्प यह भी है कि ‘कम’ में निहित ‘कमी’ वाला जो भाव है वह हिन्दी में ‘कम’ के समानार्थी ‘न्यून’ शब्द से इसे जोड़ता है । व्युत्पत्तिक नज़रिये से । कहाँ ‘न्यून’ और कहाँ ‘कम’ । न एक स्वर समान और न ही किसी व्यंजन का मिलान फिर भी व्युत्पत्तिक साम्य की बात अजीब लगती है । यही तो है शब्दों का सफ़र ।

‘कम’ नहीं, ‘कुछ’ का भाव
‘कम’ की व्युत्पत्ति के बारे में जो भी थोड़ी-बहुत जानकारी मिलती है वह अवेस्ता में लिखित पारसियों के प्रसिद्ध धार्मिक काव्य “गाथा” के उन्हीं अंशों के जरिये मिलती है, जिनकी विवेचना फ़ारसी के विद्वानों और ईरान-विशेषज्ञों ने की है । स्टूअर्ट ई मैन की “एन इंडो-यूरोपियन कम्पैरटिव डिक्शनरी” में दर्ज़ फारसी ‘कम’ की मूल धातु ‘kamma, quomn’ का उल्लेख डॉ अली नूराई द्वारा बनाए गए इंडो-यूरोपीय भाषाओं के रूटचार्ट में हुआ है जिसके मुताबिक अवेस्ता के ‘कम्ना’, ‘कम्नो’ जैसे शब्द इसी मूल से आए हैं जिनका अर्थ ‘कुछ’, few, ‘न्यून’, ‘थोड़ा’, ‘छोटा’ है । इन्हीं से फ़ारसी के ‘कम’, ‘कमी’, ‘कमीन’ जैसे शब्द बने हैं । वैसे पुरानी फ़ारसी के वक्त से ही ‘कम’ शब्द का प्रयोग उपसर्ग, प्रत्यय की तरह होता रहा है । फ़ारसी में भी ‘कम’ का यही रूप विद्यमान है । मूलतः यह विशेषण है । फ़ारसी शब्द ‘कम’ का विकास अवेस्ता के ‘कम्ना’ से हुआ है, इस बारे में ज़्यादातर विद्वान एकमत हैं । अवेस्तन-गाथा में इस शब्द का उल्लेख है जिसमें इसका उल्लेख बतौर ‘कम्नानर’ हुआ है जिसका अर्थ है- कुछ लोग । यहाँ ‘कम्नानर’ का विग्रह किया जाए तो ‘कम्ना’ और ‘नर’ निकल कर आते हैं । ‘नर’ यानी आदमी और ‘कम्ना’ में ‘कुछ’ अर्थात few का आशय स्पष्ट है । ‘कम्ना’ से यह साफ़ नहीं होता कि यह आया कहाँ से । जॉन प्लैट्स के अनुसार भी फ़ारसी का ‘कम’, ज़ेंद ( अवेस्ता ) के ‘कम्ना’ से आया है । भाषाविद् ब्रूस लिंकन, “डेथ वार एन्ड सेक्रिफाइसः स्टडीज़ इ आइडिऑलॉजी एन्ड प्रैक्टिस” पुस्तक में लिखते हैं कि पुरानी फ़ारसी में ‘कम्नानर’- शब्द का अक्सर प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है “योद्धाओं की कमी” । इसकी व्याख्या किन्हीं सन्दर्भों में “कुछ लोग” भी मिलती है । गौरतलब है कि ‘कम्नानर’ शब्द भी इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । मोनियर विलियम्स के कोश में ‘काम’ की प्रविष्टि के अन्तर्गत भारतीय पौराणिक सन्दर्भों के मुताबिक विभिन्न अर्थछटाएँ दर्ज़ है। इनमें अवेस्तन पद ‘काम्नानर’ के अर्थ से मेल खाते वैदिक शब्द ‘काम’ का एक अर्थ महत्वपूर्ण है – “कुछ पुरुष या कुछ लोग” ( या उनकी संख्या, तादाद )।
वैदिकी से रिश्तेदारी
भाषाविद् स्टूअर्ट ई मैन लिखते हैं कि ‘कम्ना’ का प्रयोग कहीं उपसर्ग तो कहीं प्रत्यय की तरह हुआ है । उपसर्ग की तरह ‘कम्ना’ शब्द का एक अन्य उदाहरण है ‘कम्नाफ्स्व’ शब्द जिसका अर्थ है “पशुधन की कमी” । गाथा में एक पुरोहित अपना दारिद्र्य प्रदर्शित करते हुए मवेशियों की कमी का दुखड़ा रोते हुए ‘कम्नाफ्स्व’ शब्द का प्रयोग करता है। गौरतलब है कि वैदिक समाज की तरह प्राचीन ईरान में भी पुरोहितों को जीवनयापन के लिए पशु दक्षिणा ही दी जाती थी। यह जो ‘–फ्स्व’ है यह दरअसल वैदिक भाषा के ‘पशु’ का का रूपान्तर है जिसका आदिस्त्रोत वैदिक शब्दावली का ‘पाश’ है । पाश, यानी बन्धन या रस्सी । पशुओं को पाश से फाँसा जाता था इसीलिए वे ‘पशु’ कहलाए । ‘कम्नाफ्स्व’ का अर्थ हुआ सीमित पशुधन । इसी तरह अल्पाहार के लिए भी प्राचीन फ़ारसी में ‘कम्नाख्वार्या’ शब्द का प्रयोग हुआ है । अवेस्ता और पुरानी फ़ारसी में ‘कम्ना’ शब्द का प्रयोग कुछ के सन्दर्भ में होता था मगर बाद में फ़ारसी में ‘कम्ना’ का रूपान्तर ‘कम’ हुआ और उसका प्रयोग ‘न्यून’, ‘थोड़ा’ के लिए होने लगा। “द अवेस्तन हिम टू मिथ्रा” में इल्या गिलक्रिस्ट और कार्ल फ्रेड्रिक गेल्डनर अवेस्ता के ‘कम्ना’ का रिश्ता संस्कृत के ‘कम्ब’ से जोड़ते हैं । लगता है यह ‘कम्ना’ का ही कोई व्याकरणिक रूप होगा क्योंकि इस शब्द की कोई विवेचना संस्कृत कोश में नहीं मिलती जिससे इसे अवेस्ता के ‘कम’ से जोड़ा जा सके । मगर नूराई के चार्ट में भी sqombh-no- धातु का हवाला मिलता है, इसका अर्थ ‘छोटा’, ‘लघु’ या ‘न्यून’ बताया गया है । इसका उल्लेख फारसी ‘कम’ की मूल धातु kamma, quomn के क्रम में ही हुआ है ।
बात कुछ और है
ह तो साफ़ है कि अवेस्ता और प्राचीन फ़ारसी के ‘कम्ना’ में कुछ, थोड़ा का भाव था जो बाद में ‘कम’, ‘न्यून’ के अर्थ में प्रचलित हुआ । अवेस्ता प्राचीन वैदिक भाषा की सहोदरा थी, यह रिश्तेदारी निर्विवाद है । इस नाते संस्कृत के ‘काम’ में निहित “कुछ पुरुष” या “कुछ लोग” ( या उनकी संख्या, तादाद ) जैसा आशय इस बात का प्रमाण है कि गाथाअवेस्ता के ‘कम्ना’ से उद्भूत ‘कम’ शब्द का रिश्ता वैदिक शब्दावली वाले ‘कम’, ‘काम’ जैसे शब्दों से भी हो सकता है । सवाल उठता है कि ‘कम’ में मूलतः इच्छा, आकांक्षा, अभीष्ठ का भाव है, तब उसमें न्यूनता या कमी जैसी अर्थवत्ता कैसे विकसित हुई होगी ? इसका उत्तर मिलता है अवेस्ता (गाथाअवेस्ता) के प्राचीन कोश “फ़रहंग ई ओइम एवक” से । इस कोश में गाथाअवेस्ता के एक प्रत्यय ‘ऊनम्’ की प्रविष्टि है जिसे ‘कम्ना’ के ज़रिए समझाया गया है । इसका एक और रूप अवेस्ता में ‘उन्’ मिलता है जिसका अर्थ है अपूर्ण, अधूरा, रिक्त आदि । ‘कम्ना’ में ‘उन्’ प्रत्यय का प्रयोग हुआ है और यह ‘कम् + उन्’ से बना है । ‘कम्ना’ में निहित ‘न्यून’, ‘कुछ’, ‘थोड़ा’ या ‘कमी’ का भाव दरअसल ‘कम्’ से नहीं बल्कि ‘उन्’ प्रत्यय से आ रहा है । कोश में इसकी तुलना अपूर्ण, त्रुटिपूर्ण, अतिरिक्त, कुछ, अपर्याप्त या न्यून की अर्थवत्ता वाले संस्कृत विशेषण ‘ऊन’ से की गई है । गौरतलब है कि वैदिकी और अवेस्ता लगभग जुड़वाँ प्रकृति की भाषाएँ हैं। फिर भी विद्वान वैदिक भाषा को अवेस्ता से कुछ प्राचीन ठहराते हैं । ज़ाहिर है गाथाअवेस्ता का ‘उन’ और वैदिक भाषा का ‘ऊन’ एक ही है । मोनियर विलियम्स भी अपने कोश में ‘ऊन’ के निम्न अर्थ बताते हैं- wanting , deficient , defective , short of the right quantity , less than the right number , not sufficient. यही नहीं, इस प्रविष्टि के आगे वे “कम्पेयर टू ज़ेन्द ऊन” भी लिखते हैं ।
कम के पेट में ऊन
‘कम्ना’ में निहित ‘न्यून’, ‘कुछ’, ‘थोड़ा’ जैसे भावों का रहस्य खुलने के बाद ‘कम्’ शब्द का तिलिस्म भी टूटता है और इसका रिश्ता वैदिक भाषा की ‘कम्’ धातु से जुड़ता है जिसमें इच्छा, अभिलाषा, कामना, वांछा, लालसा और वासना जैसे भाव निहित हैं । मोनियर विलियम्स के कोश में दर्ज़ काम की प्रविष्टि के अन्तर्गत अवेस्तन पद ‘कम्नानर’ ( कुछ लोग या योद्धाओं की कमी ) के अर्थ से मेल खाते– “कुछ पुरुष” या “कुछ लोग” ( या उनकी संख्या, तादाद ) पर अगर ध्यान दें तो ‘कम्ना’ शब्द की वैदिकी या संस्कृत के ‘कम्’ से रिश्तेदारी स्पष्ट हो जाती है और उसका तिलिस्म खुल जाता है । ‘कम् + उन्’ से बने ‘कम्ना’ का मूलार्थ है निकलता है “इच्छा से अल्प” । “ज़रूरत से कम ( कुछ )” आदि । ऊपर दिए सन्दर्भों ‘कम्नानर’, ‘कम्नाफ्स्व’, ‘कम्नाख्वार्या’ में यही भाव हैं । अगर हम वैदिक भाषा के ‘कम्’, ‘काम’, ‘कामना’ जैसे शब्दों में ‘कम्ना’ का अर्थ खोजेंगे तो निराशा ही हाथ लगती है मगर ‘कम्ना’ से जुड़े ‘ऊनम्’ प्रत्यय का अस्तित्व जैसे ही स्पष्ट होता है, ‘कम्’ की व्युत्पत्ति का सूत्र भी नज़र आने लगता है ।
कम-न्यून, भाई-भाई
स सन्दर्भ में यह जान लेना ज़रूरी है कि वैदिक प्रत्यय ‘ऊन’ का अस्तित्व निश्चित ही भारतीय बोलियों में कहीं न कहीं होगा, मगर ‘कम’ के अर्थ में यह मराठी में स्पष्ट रूप से मौजूद है । जिस तरह ‘कमोबेश’ शब्द का इस्तेमाल हिन्दी में ‘कम-ज्यादा’, ‘थोड़ा-बहुत’ का आशय प्रकट करने के लिए आम है वैसे ही मराठी में, आज भी और फ़ारसी प्रभाव बढ़ने से पहले भी उन पर आधारित ‘उणे’ शब्द प्रचलित था। कमोबेश के अर्थ में ‘उणे-अधिक’ या ‘अधिक-उणे’ जैसे मुहावरे हैं। कमी के लिए मराठी में ‘उणीव’ शब्द है जो गाथाअवेस्ता के ‘ऊनम्’ और संस्कृत के ‘ऊन’ का ही रूपान्तर है और प्रकारान्तर से ‘कम’ में निहित कमी वाले भाव का जन्मदाता भी यही ‘ऊन’ है । कम के अर्थ में संस्कृत-हिन्दी का जो ‘न्यून’ शब्द है उसकी अर्थवत्ता और व्युत्पत्ति भी इसी ‘ऊन’ से सिद्ध होती है। ‘न्यून’ बना है नि + ऊन ‘अच्’ प्रत्यय लगने से । इस तरह फ़ारसी के ‘कम’ और संस्कृत के ‘न्यून’ के बीच समीकरण भी बनता है और व्युत्पत्तिक रिश्ता भी ।
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