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Tuesday, September 20, 2016

बालों की दवाई, शिकाकाई, कहाँ से आई...


सा बुन जैसी चीज़ का कभी प्राचीन भारत में चलन था या नहीं, इस पर हम अलग पोस्ट लिख चुके हैं। हाँ, त्वचा और बालों की देखभाल के देसी तरीकों का उल्लेख आयुर्वेद में है। शिकाकाई, रीठा, आँवला जैसी दर्जनो वनौषधियों का प्रयोग हिन्दुस्तान में होता आया है। ख़ैर, शिकाकाई बेहद लोकप्रिय ओषधि है और इसके इस्तेमाल की विधियाँ अब विदेशी कास्मेटिक्स में भी नज़र आती हैं। मूलतः यह द्रविड़ भाषा का शब्द है और तमिळ के ज़रिये भारतीय भाषाओं में प्रसारित हुआ है।

सिगा, सिगाई और जूड़ा
जानते हैं शिकाकाई शब्द की जन्मकुण्डली। जब पढ़ते थे तब शिकाकाई शब्द जापानी भाषा का लगता था। पिछली बार जब सोलापुर गए तो इस सन्दर्भ में कुछ बातें पता चली थीं। वहाँ के पुराने बाज़ार में तरह-तरह की जड़ीबूटियाँ बिक रही थीं। कुछ दवाओं और तेल आदि के विज्ञापनों में बालों का जूड़ा प्रदर्शित था। सोलापुर का आन्ध्रप्रदेश से गहरा सम्बन्ध है। वहाँ तेलुगुभाषी बहुतायत रहते हैं। बहरहाल, एक ऐसी दुकान पर भी पहुँचे जहाँ विशुद्ध रूप से बालों की देखभाल वाली जड़ीबूटियाँ ही थीं। वहाँ जूड़े के लिए अनेक लोगों के मुँह से ‘सिगा’ अथवा ‘सिगाई’ शब्द सुना।

शिखण्डी से रिश्तेदारी
जब उन्हें बताया कि मैं मराठी हूँ तो दुकानदार ने सिर की तरफ़ इशारा किया, शेंडी शेंडी। मराठी में शेंडी का अर्थ होता है जूड़ा या सिर के बीच लपेट कर रखी चुटिया। शेंडी बना है शिखण्डिका से। शिख+ अण्ड में शिखण्ड यानी जूड़े का भाव है। शिख यानी सिर के सबसे ऊँचे हिस्से पर बालों से बनाया अण्डाकार गुच्छा यानी शिखण्ड। संस्कृत में इसके लिए चूड़ा शब्द भी है। चूड़ाकरण का अर्थ मुण्डन भी होता है। चूड़ा का ही अगला रूप जूड़ा है।

सिका, सिकु, सिक्कम्
बहरहाल, शिखण्डिका के शिख या शिखा से अचानक तेलुगू का ‘सिगा’ पकड़ में आ गया जो अन्यथा नहीं आता। चार्ल्स फिलिप ब्राऊन के तेलुगू कोश में सिगा और सिका दोनों की प्रविष्टि है और उसका अर्थ जूड़ा, चोटीगुच्छ, चूड़ा या शिखा आदि ही बताया गया है। तमिळ लैक्सिकन में इसके कई रूप प्रचलित हैं जैसे- सिका, सिक्कु, सिक्कम्, सिकाईताटू, सिकरिन, सिकुरम आदि। इनके संस्कृत रूपान्तर की कल्पना की जा सकती है मसलन शिखा, शिखु, शिखरम्, शिखरिणी आदि। द्रविड़ भाषाओँ में संस्कृत की तत्सम शब्दावली के नितान्त देसी रूप इस तरह घुले-मिले हैं कि यह कहना कठिन है कि संस्कृत ने द्रविड़ को प्रभावित किया है द्रविड़ ने संस्कृत को।

काई यानी फल, सिका यानी शिखा
गौरतलब है कि तमिल में काई यानी kay फल के अर्थ में प्रयुक्त होता है। अनेक सन्दर्भों में इसका अर्थ कच्चा फल, सूखा फल भी दिया गया है। तो सिका-काई का अर्थ हुआ शिखा- काई अर्थात चूड़ा-फल या शिखाफल। ज़ाहिर है कि इस नामकरण के पीछे बालों के काम आने वाला फल से ही तात्पर्य है। शिकाकाई का वानस्पतिक नाम अकेशिया कोनसिन्ना है।

शेखर और शिखरिणी
शिकाकाई ज्यादातर गर्म जलवायु में पैदा होने वाली झाड़ी है। इसका तेल भी बनाया जाता है और इसे पीस कर विभिन्न प्रकार की ओषधियाँ भी बनाई जाती हैं। ध्यान रहे, शिव को शेखर कहते हैं क्योंकि वे सिर पर जटा बान्धते हैं। इसका रिश्ता गंगा से है। इसीलिए उसका नाम शिखरिणी भी है। पूर्वांचल के लोग अपने नाम के साथ शेखर लगाना पसंद करते हैं।

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Friday, May 24, 2013

गाछ और पेड़

mango-tree 

पे ड़ के अर्थ में पूर्वी भारतीय बोलियों में ‘गाछ’ शब्द बहुत आम है। बांग्ला में भी ‘गाछ’ का अर्थ वृक्ष ही है। पूर्वी बोलियों में ‘गाछी’ शब्द का अभिप्राय वृक्षवाटिका भी होता है और आम्रकुंज भी। खासतौर पर आम, कटहल, पीपल जैसे पेड़ों के समूह के लिए इस शब्द का प्रयोग होता है। रतीनाथ की चाची उपन्यास में बाबा नागार्जुन ने बीजू आमों के बगीचे को गाछी कहा है। ‘बीजू’ यानी आम का वह पेड़ जिसे बीज बो कर लगाया गया हो। ‘कलमी’ आमों का बगीचा कलमी बाग कहलाता है। ‘गाछी’ का अर्थ छोटा पेड़ या पौधा भी होता है। इसी तरह ‘बाड़ी’ यानी छोटे बगीचे के लिए भी गाछी का प्रयोग देखा जाता है। कहीं कहीं गाछी और भी लघुता के चलते ‘गछिया’ हो जाती है। हिन्दी शब्दसागर में गाछ शब्द की प्रविष्टि में- “खजूर की नरम कोंपल जिसे लोग पेड़ कट जाने पर सुखाकर रख छोड़ते हैं और तरकारी के काम में लाते हैं । बोरा जो बैल आदि पशुओं की पीठ पर बोझ लादने के लिये रखा जाता है।” वैसे हिन्दी में पेड़ के लिए कई शब्द हैं जैसे अग, अगम, विटप, वृक्ष, द्रुम, अद्रि, कुट, जर्ण, झाड़, तरु, तरुवर, दरख़्त, पादप, भूजात या कुठारू आदि।
वृक्ष शब्द से कुछ नए नाम भी जन्मे हैं। वृक्ष से ‘व’ का लोप हुआ और रह गया ‘रूक्ष’। अब रूक्ष से मालवी-राजस्थानी में रूँख, रूँखड़ा जैसे कुछ नए नाम भी चल पड़े। इसी तरह वृक्ष से बिरछ, बिरिख या बिरिछ जैसे नाम भी चलन में हैं और लालित्यपूर्ण लेखन या देशी तड़का लगाने के लिए इनका प्रयोग सृजनधर्मी करते रहते हैं। वैसे वृक्ष के लिए ‘पेड़’ शब्द सर्वाधिक प्रचलित है। इसकी व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों में दो तरह के मत हैं। कुछ लोगों का मानना है कि पेड़ का जन्म प्राकृत के ‘पट्टी’ की कोख से हुआ है। ‘पट्टी’ के मूल में ‘पत्री’ है जिसका रिश्ता संस्कृत के ‘पत्र’ से है। पत्र यानी पत्ता। जॉन प्लैट्स इसी मत के हैं। इसके विपरीत कुछ विद्वानों का मानना है कि पेड़ दरअसल ‘पिण्ड’ से आ रहा है। पिण्ड से पेड़ के उपजने की बात तार्किक भी है क्योंकि संस्कृत वाङ्मय के अनेक संदर्भों में पिण्ड का आशय वृक्ष से जुड़ता रहा है। कई तरह के वृक्षों के साथ ‘पिण्ड’ शब्द प्रत्यय या उपसर्ग की तरह लगा दिखाई देता है जिसमें ‘पिण्ड’ का अर्थ वृक्ष ही है जैसे पिण्ड खजूर। पिण्ड शब्द का अर्थ ताड़ जाति का वृक्ष, अशोक वृक्ष आदि भी है। इसी तरह आयुर्वैदिक गुणों वाले बेर जाति के एक कँटीले वृक्ष विकंकत का नाम पिण्डारा है जिसमें पिण्ड साफ़ नज़र आ रहा है। पिण्ड से पेंड और पेड़ का रूपान्तर होता चला गया। इसके विपरीत पत्र से पेड़ के रूपान्तर की कल्पना नहीं की जा सकती।
गाछ की बात। ‘गाछ’ अर्थात वृक्ष के मूल में संस्कृत शब्द ‘गच्छ’ है जिसका अर्थ है जाना, चलना, बढ़ना, गति करना। बतौर वृक्ष, गच्छ में लगातार बढ़ना, गति करना, वृद्धि करना जैसे भाव है। यूँ देखा जाए तो गति न करना भी वृक्ष की खासियत है और इस वजह से ही ‘अगम’ या ‘अग’ अर्थात जो चलते-फिरते नहीं, जैसे नाम भी उसे मिले हैं। यह दिलचस्प है कि निरन्तर ऊर्ध्वाधर गति और वर्ष में कई रूप बदलने वाले अनूठे-अपूर्व गुण के चलते ही एक ही स्थान पर बने रहने के बावजूद पेड़ों में लगातार गति करने का लक्षण भी देखा गया और इसीलिए उसे ‘गच्छ’ कहा गया और फिर उससे गाछ, गाछी जैसे शब्द बने हैं। पेड़ की व्युत्पत्ति पिण्ड से होने का एक मज़बूत आधार ‘गच्छ’ से बने एक समास में छुपा है।
गौतम बुद्ध के जीवन पर आधारित प्रख्यात बौद्ध ग्रन्थ महावस्तु में ‘गच्छ-पिण्ड’ शब्द आया है। मूलतः यह समास है। डॉ सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या इसे विचित्र समास मानते हुए इसके लिए अनुवादात्मक समास पद निर्धारित करते हैं। वैसे यह द्वन्द्व समास का उदाहरण है। ‘गच्छ’ यानी पेड़, पौधा आदि। गच्छ में निहित बढ़ने के भाव से गच्छ में वृक्ष का संकेत भी शामिल हुआ जिससे गाछ, गाछी आदि बने। पिण्ड किसी ढेर, अचल, ठोस, घन जैसा पदार्थ ही पिण्ड है। इसी तरह बढ़ने के अर्थ से ही गच्छ में परिवार, कुल या कुटुम्ब का भाव भी आया। इसी तरह पिण्ड में भी परिवार या कुल का भाव है। पश्चिमोत्तर भारत की बोलियों में मनुष्यों के आबाद समूह को पिण्ड भी कहा जाता है। गाँव के अर्थ में भी पिण्ड का प्रयोग होता है। अब जब पिण्ड का अर्थ भी वृक्ष है और गच्छ में भी पेड़ का ही भाव है तब ‘गच्छ-पिण्ड’ यानी ‘पेड़-पेड़’ जैसे समास से क्या अर्थसिद्धि हो सकती है? ज़ाहिर है जिस तरह ‘अच्छा-भला’ ‘ऋषि-मुनि’, ‘भाई-बंध’ या ‘कंकर-पत्थर’ आदि द्वद्व समास के उदाहरण हैं वैसा ही ‘गच्छ-पिण्ड’ के साथ भी है। मगर बात इतनी आसान नहीं है।
मेरे विचार में ‘गच्छ’ में वृद्धि का जो भाव है उससे ही ‘गच्छ-पिण्ड’ की अलग अर्थवत्ता स्थापित होती है। कुल, परिवार का महत्व उसके बढ़ते जाने के गुण से ही है। बाँस शब्द वंश से बना है। पूर्ववैदिक युग में वंश शब्द का अर्थ बांस ही रहा होगा। प्राचीन समाज में लक्षणों के आधार पर ही भाषा में अर्थवत्ता विकसित होती चली गई। स्वतः फलने फूलने के बाँस के नैसर्गिक गुणों ने वंश शब्द को और भी प्रभावी बना दिया और एक वनस्पति की वंश-परंपरा ने मनुष्यों के कुल, कुटुंब से रिश्तेदारी स्थापित कर ली। सो ‘गच्छ’ में निहित परिवार, कुल, कुटुम्ब के अर्थ में ही अगर वृद्धि का अर्थ वंश-परम्परा से लगाया जाए तो ‘गच्छ-पिण्ड’ का सीधा सा अर्थ वंश-वृक्ष निकलता है। बौद्धग्रन्थ महावस्तुअवदानम् में बुद्ध के जातक रूपों का उल्लेख है। स्पष्ट है कि यहाँ गच्छ-पिण्ड से तात्पर्य वंश-वृक्ष से ही होगा।

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Monday, October 22, 2012

‘बुनना’ है जीवन

bayaज़रूर देखें-1. चादर. 2.प्रवीण.3. तन्तु.4. धागा. 5.बाँस.6.कातना.7. सूत 

जी वन का बुनाई से गहरा रिश्ता है । “झीनी झीनी बीनी चदरिया” वाली कबीर की जगप्रसिद्ध उक्ति में चादर ज़िंदगी का प्रतीक है । परमात्मा ने जीवनरूपी चादर को जितनी शिद्धत और मेहनत से महीन अंदाज़ में बुना था उसे सुर-नर-मुनि ने ओढ़ कर मैला कर दिया । कबीर बड़े समझदार हैं, उन्हें ज़िंदगी की कीमत पता है, सो इस चादर को उन्होंने इतने जतन से ओढ़ा कि खुद के साथ साथ पूरे ज़माने को संवार दिया । “दास कबीर जतन से ओढ़िन, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया”। कबीर जुलाहे थे, बुनकारी जानते थे । इसीलिए उन्होंने ज़िंदगी के लिए चादर जैसा सहज प्रतीक चुना । जन्म लेने के बाद हम सब महीन की बजाय मोटा कातते हैं, महीन की बजया  मोटो बुना जाता है । नतीजतन सुख नहीं मिलता । सुख की उधेड़बून में चादर मैली और जर्जर हो जाती है । इसलिए जिंदगी को सलीके से, महीन बुना जाना चाहिए । हि्न्दी के ‘वय’ शब्द का बुनाई से गहरा रिश्ता है ।
म्र या आयु के लिए हिन्दी में ‘वय’ शब्द भी प्रचलित है । मराठी में उम्र, आयु की तुलना में वय शब्द ज्यादा प्रचलित है । संस्कृत कोशों के अनुसार ‘व’ वर्ण में गति (वह > वहन > बहना या वेग), घर ( वास > आवास, निवास ), कपड़ा ( वस् > वस्त्र ) और बुनना (वयन) जैसे भाव हैं । इसके अतिरिक्त भुजा जो भार उठाती है ( वाह > बांह ) भी इसका अर्थ है । संस्कृत की ‘वे’ धातु में गूँथने, बुनने, बटने और बांधने का भाव प्रमुख है । वे का एक अर्थ पक्षी भी होता है क्योंकि वे चुन-चुन कर तिनकों को गूँथते हैं और अपना आवास बनाते हैं । ‘वे’ से ही बनता है वयन जिससे बयन > बउन > बुन > बुनन > बुनना जैसे रूप बने हैं । इससे ही बुनाई, बुनावट, बुनकर शब्दों का विकास हुआ । वस्त्र के अर्थ में बाना शब्द भी इसी कड़ी में आता है ।
मोनियर विलियम्स के अनुसार ‘वे’ धातु से ही बना है संस्कृत का वय शब्द जिसका अर्थ है वह जो बुनता है अर्थात जुलाहा, बुनकर । तन्तुवाय भी तत्सम शब्दावली में आता है जिसका अर्थ है तन्तुओं को बुनने वाला अर्थात जुलाहा । तन्तु से ही ताँत बना है जिसका मतलब होता है धागा और ताँती बुनकरों की एक जाति है । इसी तरह वय में आयु, उम्र का भाव भी है । वय की अगली कड़ी है वयस् आता है जिसका अर्थ है एक विशेष चिड़िया, कोई भी पक्षी, यौवन, आयु की कोई भी अवस्था, शारीरिक ऊर्जा, शक्ति, बल आदि । वय के जुलाहा और वयस के विशिष्ट चिड़िया वाले वाले अर्थ पर गौर करें । एक विशेष चिडिया को बया कहते हैं जो बेहद करीने और सुथरेपन के साथ तिनकों से अपना घोसला बनाती है मानो कलाकृति हो । बया को कारीगर चिड़िया अथवा जुलाहा की संज्ञा भी दी जाती है । बया, वय से ही बना है । घरोंदा किसी भी प्राणी के लिए जीवन को बचाए रखने का ठिकाना होता है । प्रत्येक को घर में ही शरण मिलती है । जीव कोख में पलता है । पैदा होने के बाद भी आश्रय में ही हम जीवन बुनते है । आयु की सार्थकता बीत जाने में नहीं, बुने जाने में है ।
वे में निहित गूँथना, बुनना, बटना जैसे भावों पर गौर करें । इससे ही बना है संस्कृत का वेन् शब्द । इसका एक अन्य रूप है वेण जिसका अर्थ है बाँस का सामान बनाने वाला कारीगर, संगीतकार । वेण से वेणी याद आती है ? वेणी अर्थात लम्बे बालों को गूँथकर बनाई गई शिखरिणी या चोटी । गूँथना भी बुनकारी है । इसी तरह बाँसो की खपच्चियों को भी गूँथकर, बुनकर डलिया, चटाई आदि बनाई जाती हैं । वंशकार जाति के लोग यह काम करते हैं । वेणु यानी बाँस, लम्बी घास की एक प्रजाति, सरकंडा । वेणु का एक अर्थ बाँसुरी भी होता है और चोटी भी । कृष्ण चोटियाँ बांधते थे इसलिए उनका नाम वेणुमाधव या वेणीमाधव भी है । इसका देशी रूप बेनीमाधव हो गया जो घटते घटते सिर्फ ‘बेनी’ रह गया और उधर माधव दुबला होकर ‘माधो’ बन गया । वेणि जहाँ चोटी है वहीं वेणी में चोटी के साथ धारा, नदी का अर्थ भी है । तीन धाराओं को त्रिवेणी कहते हैं ।
सी कड़ी में चर्चा कर लेते है वीणा शब्द की । आपटे कोश में के अनुसार वीणा का अर्थ सारंगी जैसा वाद्य, बीना, बताया गया है और इसकी व्युत्पत्ति ‘वी’ से बताई गई है । इसके अलावा इसका एक अन्य अर्थ विद्युत भी है। संस्कृत की ‘वी’ धातु में जाना, हिलना-डुलना, व्याप्त होना, पहुँचना जैसे भाव हैं। बिजली की तेज गति, चारों और व्याप्ति से भी वी में निहित अर्थ स्पष्ट है। विद्युत की व्युत्पत्ति भी वी+द्युति से बताई जाती है । ‘वी’ अर्थात व्याप्ति और द्युति यानी चमक, कांति, प्रकाश आदि । संस्कृत में वेण् या वेन् शब्द भी मिलते हैं जिनका अर्थ है जाना, हिलना-डुलना या बाजा बजाना । इसी क्रम में वेण् से बने वेण का अर्थ होता है गायक जाति का एक पुरुष । वेन में निहित एँठना, बटना जैसे भावों पर एक वाद्य के संदर्भ में विचार करने से स्पष्ट होता है कि यहाँ आशय तारों को कसने से ही है । प्रायः सभी तन्त्रीवाद्यों के तार घुण्डियों से बंधे रहते हैं जिने घुमा कर, एँठ कर तारों को कसा जाता है जिससे उनमें स्वरान्दोलन होता है ।
भारतीय भाषाओं में ‘न’ का ‘ण’ रूप भी सामान्य सी बात है । जल के अर्थ में पानी को मराठी, मालवी, राजस्थानी में पाणी कहा जाता है । इसी तरह वेन् का ही एक रूप वेण भी प्राचीनकाल में ही प्रचलित रहा होगा । वेन रूप से बीन, बीना जैसे रूप बने होंगे और वेण रूप से वीणा । मूलतः किसी ज़माने में वीणा बाँस से ही बनाई जाती रही होगी । आज भी उसमें बाँस का काफ़ी प्रयोग होता है । बाँस से वेणु अर्थात बाँसुरी भी बनती है । बाँस शब्द से ही बाँसुरी भी बना है और वेणु का अर्थ भी बाँस ही होता है । सो वेणु का एक अर्थ बाँसुरी भी हुआ । इसका रूपान्तर बीन हुआ । गौर करें बाँसुरी की तरह बीन सुषिर वाद्य है । निश्चित ही बाँस से बाँसुरी का आविष्कार आदिम समाजों में बहुत पहले हो गया था । बाँस के लम्बे पोले टुकड़े को जब तन्त्रीवाद्य का रूप दिया गया तो उसे भी इसी शृंखला में वीन्, वीण्, वीणा नाम मिला । वेणु यानी बंसी तो पहले से प्रचलित थी ही । संस्कृत धातु ‘वे’ की अर्थगर्भिता महत्वपूर्ण है जिसमें गति और बुनावट  की अर्थवत्ता है और इन दोनों का मेल ही जीवन है ।

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Friday, August 24, 2012

सपड़-सपड़ सूप

soup

चु स्की के लिए हिन्दी में सिप शब्द बेहद आसानी से समझा जाता है । सिप करने, चुसकने की लज़्ज़त जब ज्यादा ही बढ़ जाती है तब बात सपड़-सपड़ तक पहुँच जाती है जिसे अच्छा नहीं समझा जाता है । कहने की ज़रूरत नहीं की सिप करना, चुसकना और सपड़-सपड़ करने का रिश्ता किसी सूप जैसे पतले, तरल, शोरबेदार पदार्थ का स्वाद लेने की प्रक्रिया से जुड़ा है । सिप से सपड़ का सफर शिष्टता से अशिष्टता की ओर जाता है । सिप और सपड़-सपड़ तरल पदार्थ को सीधे बरास्ता होठ, जीभ के ज़रिये उदरस्थ करने की क्रिया है। सिप के ज़रिये ज़ायक़ा सिर्फ़ पीने वाले को महसूस होता है वहीं सपड़-सपड़ का चटखारा औरों को भी बेचैन कर देता है । गौरतलब है कि सूप शब्द आमतौर पर अंग्रेजी का समझा जाता है । हकीक़त यह है कि पाश्चात्य आहार-शिष्टाचार का प्रमुख हिस्सा सूप मूलतः भारतीय है । सूप, सिप, सपर, सपड़, सापड़ जैसे तमाम शब्द आपस में रिश्तेदार हैं । यही नहीं, इस शब्द शृंखला के शब्द विभिन्न यूरोपीय भाषाओं में भी हैं जिनमें चुसकने, सुड़कने, सिप करने का भाव है ।
चुस्की के लिए सिप शब्द याद आता है । सूप शब्द भारोपीय मूल का है और इसका मूल भी संस्कृत का सूप शब्द ही माना जाता है । जिसे सिप किया जाए, वह सूप। इसी कड़ी में सपर भी है । द्रविड़ में सामान्य भोजन सापड़ है और इंग्लिश में सिर्फ़ रात का भोजन सपर है। ध्वनिसाम्य और अर्थसाम्य गौरतलब है । यह सामान्य बात है विभिन्न भाषिक केन्द्रों पर अनुकरणात्मक ध्वनियों से बने शब्दों का विकास एक सा रहा है। अंग्रेजी में रात के भोजन को सपर इसलिए कहा गया क्योंकि इसमें हल्का-फुल्का, तरल भोजन होता है। कई लोग रात में सिर्फ़ सूप ही लेते हैं । सपर का मूल सूप है । आप्टे और मो.विलियम्स के कोश में सूप का अर्थ रस, शोरबा, झोल, तरी जैसा पदार्थ ही कहा गया है । अंग्रेजी में यह तरल भोजन है । आप्टे कोश में सू+पा के ज़रिए इसे तरल पेय कहा गया है । यानी पीने की क्रिया से जोड़ा गया है । पकोर्नी इसकी मूल भारोपीय धातु सू seue बताते हैं जिसमें पीने की बात है । संस्कृत का सोम भी सू से ही व्युत्पन्न है । इसका अवेस्ता रूप होम है जिसमें पीने का आशय है । आदि-जर्मन रूप सप्प है । ज़ाहिर है प्राकृत, अपभ्रंश के ज़रिए हिन्दी का सपड़ रूप अलग से विकसित हुआ होगा और द्रविड़ सापड़ रूप अलग ।
वाशि आप्टे और मोनियर विलियम्स के कोश में सूप शब्द का अर्थ सॉस, तरी, शोरबा या झोलदार पदार्थ बताया गया है । हिन्दी शब्दसागर में इसे मूल रूप से संस्कृत शब्द बताते हुए इसके कई अर्थ दिए हैं जैसे मूँग, मसूर, अरहर आदि की पकी हुई दाल । दाल का जूस । रसा । रसे की तरकारी जैसे व्यंजन । संस्कृत में सूपक, सूपकर्ता या सूपकार जैसे शब्द हैं जिनका आशय भोजन बनाने वाला, रसोइया है । एटिमऑनलाईन के मुताबिक चौदहवीं सदी के उत्तरार्ध में अंग्रेजी में सिप शब्द दाखिल हुआ । संभवतः इसकी आमद चालू जर्मन के सिप्पेन से हुई जिसका अर्थ था सिप करना । पुरानी अंग्रेजी में इसका रूप सुपेन हुआ जिसमें एकबारगी मुँह में कुछ डालने का भाव था । रॉल्फ़ लिली टर्नर के मुताबिक महाभारत में आहार के तरल रूप में ही सूप शब्द का उल्लेख हुआ है । हिन्दी शब्दसम्पदा में एक अन्य सूप भी है । बाँस से बनाए गए अनाज फटकने के चौड़े पात्र के रूप में इसकी अर्थवत्ता से सभी परिचित हैं । आम भारतीय रसोई के ज़रूरी उपकरणों में इसका भी शुमार है । अनाज फटकने का मक़सद मूलतः दानों और छिलकों को अलग करना है । भक्तियुगीन कवियों ने सूप शब्द का दार्शनिक अर्थों में प्रयोग किया है । कबीर की “सार सार सब गहि लहै, थोथा देहि उड़ाय ” जैसी इस कालजयी सूक्ति में सूप की ओर ही इशारा है ।
चूसना, चुसकना बहुत आम शब्द हैं और दिनभर में हमें कई बार इसके भाषायी और व्यावहारिक क्रियारूप देखने को मिलते हैं। यही बात चखना शब्द के बारे में भी सही बैठती है। ये लफ्ज भारतीय ईरानी मूल के शब्द समूह का हिस्सा हैं और संस्कृत के अलावा फारसी, हिन्दी और उर्दू के साथ ज्यादातर भारतीय भाषाओं में बोले-समझे जाते हैं। चूसना, चुसकना, चुसकी शब्द बने हैं संस्कृत की चुष् या चूष् धातु से जिसका क्रम कुछ यूँ रहा- चूष् > चूषणीयं > चूषणअं > चूसना। इस धातु का अर्थ है पीना, चूसना । चुष् से ही बना है चोष्यम् जिसके मायने भी चूसना ही होते हैं । मूलत: चूसने की क्रिया में रस प्रमुख है । अर्थात जिस चीज को चूसा जाता वह रसदार होती है । जाहिर है होठ और जीभ के सहयोग से उस वस्तु का सार ग्रहण करना ही चूसना हुआ । चुस्की, चुसकी, चस्का या चसका जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं । गौरतलब है कि किसी चीज का मजा लेने, उसे बार-बार करने की तीव्र इच्छा अथवा लत को भी चस्का ही कहते हैं । एकबारगी होठों के जरिये मुँह में ली जा चुकी मात्रा चुसकी / चुस्की कहलाती है । बर्फ के गोले और चूसने वाली गोली के लिए आमतौर पर चुस्की शब्द प्रचलित है। बच्चों के मुंह में डाली जाने वाली शहद से भरी रबर की पोटली भी चुसनी कहलाती है। इसके अलावा चुसवाना, चुसाई, चुसाना जैसे शब्द रूप भी इससे बने हैं ।
सी कतार में खड़ा है चषक जिसका मतलब होता है प्याला, कप, मदिरा-पात्र, सुरा-पात्र अथवा गिलास । एक खास किस्म की शराब के तौर पर भी चषक का उल्लेख मिलता है । इसके अलावा मधु अथवा शहद के लिए भी चषक शब्द है। इसी शब्द समूह का हिस्सा है चष् जिसका मतलब होता है खाना । हिन्दी में प्रचलित चखना इससे ही बना है जिसका अभिप्राय है स्वाद लेना । अब इस अर्थ और क्रिया पर गौर करें तो इस लफ्ज के कुछ अन्य मायने भी साफ होते हैं और कुछ मुहावरे नजर आने लगते हैं जैसे कंजूस मक्खीचूस अथवा खून चूसना वगैरह । किसी का शोषण करना, उसे खोखला कर देना, जमा-पूंजी निचोड़ लेना जैसी बातें भी चूसने के अर्थ में आ जाती हैं । यही चुष् फारसी में भी अलग अलग रूपों में मौजूद है मसलन चोशीद: या चोशीदा अर्थात चूसा हुआ । इससे ही बना है चोशीदगी यानी चूसने का भाव और चोशीदनी यानी चूसने के योग्य ।

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Sunday, August 5, 2012

सेवा का फल नमकीन

SEV

हि न्दी में दो तरह के सेव प्रचलित हैं । पहले क्रम पर है बेसन से बने नमकीन कुरकुरे सेव और दूसरा है मीठा-रसीला सेवफल जिसे सेव या सेब भी कहते हैं । खाने-पीने की तैयारशुदा सामग्री में सर्वाधिक लोकप्रिय अगर कोई वस्तु है तो वह है नमकीन सेव । प्रायः हर गली, हर दुकान और हर घर में यह मिल जाएगा । सुबह के नाश्ते में चाय के साथ और कुछ न हो तो सेव चलेगा । मालवी आदमी को तो सुबह शाम खाने के साथ भी सेव चाहिए । भारतीय खान-पान संस्कृति दुनिया भर में निराली है । सेव के साथ सिवँइयाँ अथवा सेवँई जैसे खाद्य पदार्थ भी रसोई की अहम् चीज़ें हैं । सेवँई या सिवँइयाँ मैदे से बनती हैं । शकर और दूध के साथ उबाल कर बनई गई सेवँई की खीर बेहद लज़ीज़ मीठा पकवान है । ध्यान रहे, सेव, सेवँई या सिवँईं जैसे नामों में मीठे या नमकीन होने की महिमा नहीं है बल्कि उनका धागे या सूत्रनुमा आकार ही ख़ास है ।
दिलचस्प बात यह भी है कि दोनो तरह के सेव का सम्बन्ध बोल-चाल की भाषा में बेहद प्रचलित सेवा, सेवक, सेविका जैसे शब्दों से भी हैं जिनमें सेवा करने का मूल भाव है और इनकी व्युत्पत्ति भी संस्कृत की सेव् धातु से हुई है । संस्कृत की सेव् धातु में मूलतः करना, रहना, बारम्बार जैसे भाव हैं । मोनियर विलियम्स, रॉल्फ़ लिली टर्नर और वाशि आप्टे के कोशों के मुताबिक सेव् में सानिध्य, टहल, बहुधा, उपस्थिति, आज्ञाकारिता, पालना, बढ़ाना, विकसित करना, उत्तरदायित्व, समर्पण, खिदमत, देखभाल अथवा सहायता जैसे भाव हैं । इससे बने सेवा का मूलार्थ है देखभाल करना, सहकारी होना, समर्पित कर्म, टहल में रहना आदि । सेवक में उक्त सभी क्रियाओं में लगे रहने वाले व्यक्ति का भाव है । यूँ सेवक का अर्थ नौकर-चाकर, परिचर, सहकर्मी, अनुगामी, भक्त, अनुचर, आज्ञाकारी, भ्रत्य, वेतनभोगी आदि होता है । सेवक का स्त्रीवाची सेविका होता है । सेवा सम्बन्धी शब्दावली में अनेक शब्द हैं जैसे सेवा-पंजिका, सेवा-पुस्तिका, सेवाकर्मी, सेवानिवृत्त, सेवावधि, सेवामुक्त, समाजसेवा, समाजसेवी आदि । इसी कड़ी में सेवाशुल्क जैसा शब्द भी खड़ा है जिसका मूलार्थ है किसी काम के बदले किया जाने वाला भुगतान मगर अब सेवाशुल्क का अर्थ रिश्वत के अर्थ में ज्यादा होने लगा है ।
प्रश्न उठता है इस सेवाभावी सेव् से आहार शृंखला के सेव से सम्बन्ध की व्याख्या क्या हो सकती है ? सेव के आकार और उसे बनाने की प्राचीन विधि पर गौर करें । पुराने ज़माने में बेसन के आटे को गूँथ कर उसकी छोटी लोई को चकले पर रख कर हथेलियों से बारीक-बारीक बेला जाता था । बेलना शब्द का रिश्ता संस्कृत की बल् या वल् धातु से है जिसमें घुमाना, फेरना, चक्कर देना जैसे भाव हैं । लोई को घुमाने वाले उपकरण को भी बेलन इसीलिए कहते हैं क्योंकि इससे बेलने की क्रिया सम्पन्न होती है । जिससे बेला जाए, वह बेलन । गौर करें कि पत्थर या लकड़ी के जिस गोल आसन पर रख कर रोटी बेलते हैं उसे चकला कहते हैं । यह चकला शब्द चक्र से आ रहा है जिसमें गोल, घुमाव, राऊंड या सर्कल का भाव है । बेलने के आसन को चकला नाम इसलिए नहीं मिला क्योंकि वह गोल होता है बल्कि इसलिए मिला क्योंकि उस पर रख कर रोटी को चक्राकार बनाया जाता है । बेलने की क्रिया से कोई वस्तु चक्राकार, तश्तरीनुमा बनती है । तश्तरीनुमा आकार में बेलने के लिए आधार का समतल, ठोस होना ज़रूरी है न कि उसका गोल होना । अक्सर सभी चकले गोल नहीं होते । रोटी बनाने के लिए चकला और बेलन की ज़रूरत होती है, सेव या सेवँईं बनाने के लिए बेलन के स्थान पर चपटी सतह जैसे हथेली, होनी ज़रूरी है ।
राठी में सेवँई के लिए शिवई शब्द है जिसका मूल वही है जो हिन्दी सेवँई का है । मेरा मानना है कि नरम पिण्ड को चपटी सतह पर गोल गोल फिरा कर उसके सूत्र बनाने की तरकीब बाद में ईज़ाद हुई होगी, पहले ऐसा अंगूठे और उंगलियों की मदद से किया जाता रहा होगा । हाथ या उंगलियों लगे किसी चिपचिपे पदार्थ से छुटकारा पाने के लिए हाथों को आपस में मसलने या अंगूठे को उंगलियों पर रगड़ने की तरकीब की जानकारी मनुष्य को आदिमकाल में ही हो गई थी । इस तरह चिपचिपे पदार्थ पर दबाव पड़ने से उसके वलयाकार सूत्र बन कर हाथ से अलग हो जाते हैं । सेवँई के जन्मसूत्र का कुछ पता इसके मराठी पर्यायों से चलता है । मराठी में सेवँई को शेवई कहते हैं इसकी व्युत्पत्ति भी वही है जो हिन्दी में है । मराठी में शेवई के दो प्रकार हैं- हातशेवई और पाटशेवई । जैसा की नाम से ही स्पष्ट है, हातशेवई लोई को हथेली से रगड़ कर बनाए गए सूत्र को कहते हैं । इसका एक नाम बोटी भी है । मराठी में उंगली को बोट कहते हैं । उंगलियों से रगड़ कर बनाए गए महीन सूत्र के लिए बोटी नाम सार्थक है । प्रसंगवश, सेवँई को अंग्रेजी में वर्मीसेली कहते हैं जो मूलतः इतालवी भाषा से आयातित शब्द है और लैटिन के वर्मिस vermis से बना है जिसका मतलब होता है कृमी या रेंगनेवाला नन्हा कीड़ा । एटिमऑनलाइन के मुताबिक वर्म के मूल में भारोपीय भाषा परिवार की धातु wer है जिसमें घूमने, मुड़ने का भाव है । वृ बने वर्त या वर्तते में वही भाव हैं जो प्राचीन भारोपीय धातु वर् wer में हैं । गोल, चक्राकार के लिए हिन्दी संस्कृत का वृत्त शब्द भी इसी मूल से बना है । इतालवी वर्मीसेली  और हिन्दी के सेवँई का शब्द-निर्माण ध्यान देने योग्य है ।
रोटी के लिए मराठी में पोळी शब्द है । पूरणपोळी शब्द में यही पोळी है । पोळी बना है पल् धातु से जिसमें विस्तार, फैलाव, संरक्षण का भाव निहित है इस तरह पोळी का अर्थ हुआ जिसे फैलाया गया हो। बेलने के प्रक्रिया से रोटी विस्तार ही पाती है । पत्ते को संस्कृत में पल्लव कहा जाता है जो इसी धातु से बना है । पत्ते के आकार में पल् धातु का अर्थ स्पष्ट हो रहा है । पेड़ का वह अंग जो चपटा और विस्तारित होता है । हिन्दी का पेलना, पलाना, पलेवा जैसे शब्द जिनमें विस्तार और फैलाव का भाव निहित है इसी शृंखला में आते हैं । पालना शब्द पर गौर करें इसमें बारम्बारता, विस्तार, संरक्षण जैसे सभी भाव स्पष्ट हैं । कहने का तात्पर्य यह कि पल् धातु में जो भाव आटे की लोई को पोळी (रोटी) के रूप में विस्तारित करने में उभर रहा है वैसा ही कुछ सेव् धातु से बने सेव या सेवँई में भी हो रहा है । स्पष्ट है कि सेव् धातु से बने सेव में निहित बारम्बारता, बढ़ाना, विकसित करना और पालना जैसे अर्थ भी पल् की तरह हैं । बेसन या मैदे की लोई को चकले पर गोल-गोल घुमाने से  पतले, लम्बे,  धागेनुमा सूत्र के रूप में उसका आकार बढ़ता जाता है । यही सेव या सेवँई है । बेलने या घुमाने की क्रिया में बारम्बारता पर गौर करें तो भी सेव् क्रिया का अर्थ स्पष्ट होता है ।
सेवफल की बात । जिस तरह सेव या सेवँई में विस्तार, वृद्धि का भाव है, और सेव और सेवँई के आकार से यह अर्थ साफ़ नज़र भी आता है वहीं सेवफल को देखने से यह स्पष्ट नहीं होता । मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में सेवि या सेव शब्द है जिसका अर्थ है सेवफल । मोनियर विलियम्स के कोश में सेवि शब्दान्तर्गत सेव का अर्थ बदरी यानी बेर भी बताया गया है । apple के अर्थ में हिन्दी सेव की व्युत्पत्ति संस्कृत की सिव् धातु से है जिसमें जिसमें नोक, काँटा जैसे भाव हैं । टर्नर कोश के मुताबिक फ़ारसी में सेव का सेब रूप है । इसी तरह उड़िया और गुजराती में भी सेब ही है इसलिए यह निश्चयूर्वक नहीं कहा जा सकता की भारतीय भाषाओं में सेव के सेब रूप के पीछे फ़ारसी का सेब है ।

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Wednesday, June 27, 2012

फरारी, फुर्र और फर्राटा

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वि भिन्न समाज-संस्कृतियों में शब्द निर्माण की प्रक्रिया न सिर्फ़ एक समान होती है बल्कि उनका विकास क्रम भी एक जैसा ही होता है । हिन्दी में भाग छूटना, निकल भागना, पलायन करना जैसे अर्थों में ‘फ़रार’ शब्द का सर्वाधिक प्रयोग भी किया जाता है । ‘फ़रार’ अपने आप में क्रिया भी है और संज्ञा भी । वैसे हिन्दी में इसका क्रियारूप ‘फ़रारी’ ज्यादा प्रचलित है । ‘फ़रार’ वह व्यक्ति है जो प्रतिबन्ध के बावजूद भाग खड़ा हुआ है । अचानक गायब हो जाने, भाग खड़ा होने के लिए हिन्दी में अन्य अभिव्यक्तियाँ भी हैं जैसे “रफ़ूचक्कर हो जाना”, “नौ-दो-ग्यारह होना” या “फ़ुर्र हो जाना” आदि । इनमें “फ़ुर्र हो जाना” बेहद सहज मुहावरा है जिसकी अभिव्यक्ति दिन भर में न जाने कितनी दफ़ा इन्ही अर्थों में होती है । कहने की ज़रूरत नहीं है कि फुर्र हो जाना इस अभिव्यक्ति का रिश्ता उड़ जाने से है । ध्यान रहे उड़ जाने का रिश्ता गायब हो जाने से है । यूँ भी चलने-दौड़ने की क्रिया की बनिस्बत उड़ना में तीव्रता का भाव है । इसलिए तेज गति वाली वस्तु निगाहों से बहुत जल्दी ओझल हो जाती है । इसे ही गायब होना कहते हैं । इत्र की शीशी से रिस कर सुगंध हवा में तैरती है । शीशी से जब सुगंध खत्म हो जाती है तो उसे इत्र का उड़ना कहा जाता है ।
फुर्र या ‘फ़रार’ जैसे शब्दों का रिश्ता मूलतः उड़ने से है । ‘फ़रार’ या ‘फ़रारी’ जैसे शब्द हिन्दी में फ़ारसी से होते हुए आए हैं । इनका मूल ठिकाना अरबी ज़बान है । ‘फ़ुर्र’ शब्द हिन्दी का देशज है या अरबी, फ़ारसी की अभिव्यक्ति है यह कहना मुश्किल है मगर इतना तय है कि फुर्र और फ़रार शब्द सेमिटिक और इंडो-ईरानी परिवारों के बीच रिश्तेदारी के पुख्ता सबूत पेश करते हैं । ‘फुर्र’ से जुड़ी शब्दावली पर गौर करें-फड़फड़ाना, फड़कना, फरफर, फरफराना, फहर-फहर, फहराना आदि । ये सभी शब्द डैनों के ज़रिये उड़ने की आवाज़ से पैदा होने का बोध कराते हैं । हिन्दी में ‘डैना’, ‘पंख’ और ‘पर’ दोनों शब्द प्रचलित हैं । ‘पंख’ हिन्दी का अपना है और ‘पर’ फ़ारसी से आया है । संस्कृत के ‘पक्ष’ से ‘पंख’ के जन्मसूत्र जुड़े हैं जिसका अर्थ है किसी वस्तु, स्थान या विचार के दो प्रमुख भाग या हिस्से । पंख का विकास पक्ष > पक्ख > पंख के क्रम में हुआ । पंख को पंजाबी में 'खंब' भी कहते हैं । गौर करें कि पंख का वर्ण विपर्यय ही खंब में हो रहा है ।
वैदिक शब्दावली के ‘पर्ण’ से फ़ारसी के पर की रिश्तेदारी है । संस्कृत के ‘पर्ण’ की धातु ‘पृ’ है जिसमें सरपास करना, आगे बढ़ जाना, दूर चले जाना या मात कर देना जैसे भाव हैं । संस्कृत में ‘प’ वर्ण अपने में उच्चता का भाव समेटे है। उड़ान का ऊँचाई से ही रिश्ता है । परम, परमात्मा जैसे शब्दों से यह जाहिर हो रहा है । पंख की उच्चता का संकेत इस बात से भी मिलता है कि सभी प्राचीन संस्कृतियों में पंखों से ही मुकुट बनाए जाते थे ।  ‘पर’ में भी यही उच्चता लक्षित हो रही है। संस्कृत की पत् धातु का अभिप्राय है उड़ना, फहराना, उड़ान आदि । पत का रिश्ता अंग्रेजी के 'फैदर' ( feather) से है जिसका अर्थ पंख होता है । द्रविड़ परिवार की कोत भाषा में पर्न या पर्नद का मतलब भी उड़ना ही है । यहाँ संस्कृत के ‘पर्ण ‘से सादृश्यता पर विचार करना चाहिए । द्रविड़ और फारसी में एक जैसा रूपांतर यह भी स्थापित करता है कि किसी ज़माने में द्रविड़ भाषाओं का प्रसार सुदूर उत्तर पश्चिम तक था । ‘पर’ से ही बना है फ़ारसी का ‘पर्चः’  जिसका अर्थ काग़ज़ का टुकड़ा या पुर्जा । इस पर्चः का उच्चारण हिन्दी में परचा या पर्चा होता है जिसका रिश्ता पर्चम / परचम से भी जुड़ रहा है जिसका अर्थ है झंडा, झंडे का कपड़ा। ‘पर्चम’ किसी भी राष्ट्र, समाज या संगठन का सर्वोच्च प्रतीक होता है । पुर्जा या काग़ज़ का टुकड़ा पर्चा कहलाता है जो इसी शब्दावली से जुड़ा है ।
रबी के ‘फ़रार’ का विकास फ़र्रा से हुआ है जिसका अर्थ है उड़ना या उड़ान । अल सईद एम बदावी की कुरानिक डिक्शनरी के मुताबिक इसकी धातु फ़े-रे-रे अर्थात (फ़-र-र) है । भाषाविज्ञानियों के मुताबिक इसका विकास सेमिटिक धातु पे-रे-रे (प-र-र) से हुआ है । प्राचीन सेमिटिक भाषा अक्कद में एक शब्द ह पररू (पर्रू) जिसमें छिटकने, दूर जाने, विभक्त होने का भाव है । इन तथ्यों के मद्देनज़र संस्कृत के ‘पृ’ , फ़ारसी के ‘पर’ और अरबी-सेमिटिक ‘फ़-र-र’ और ‘प-र-र’ समतुल्य जान पड़ते हैं । संस्कृत की ‘पृ’ धातु और सेमिटिक ‘प-र-र’ धातुओं में समानता है न सिर्फ़ ध्वनिसाम्य बल्कि अर्थसाम्य भी है । दोनों का अर्थ छिटकना, दूर जाना है । दूर जाने, छिटकने के लिए हिन्दी में “परे हटो”, “परे जाओ” कहा जाता है जिसमें उपरि वाला ‘परि’ ही नज़र आ रहा है । इसका रिश्ता परिधी वाले ‘परि’ से भी हो सकता है ।  दूसरी तरफ़ ‘प’ वर्ण में निहित उच्चता पर ध्यान दें । ‘पंख’ ऊँचाई पर ले जाते हैं । पंख के अर्थ में ‘डैना’ शब्द पर गौर करें । यह संस्कृत के उड्डीन से आर रहा है जिसमें उड़ने का भाव है । उड़ान, उड़ना, उड़ाका, उड़न, उड्डयन जैसे शब्दों के मूल में ‘उड्डीन’ ही है जिसकी धातु ‘उद्’ है और इसका प्रयोग उपसर्ग की तरह भी होता है जिसकी उपस्थिति ‘उदीयमान’, ‘उच्चाटन’, ‘उत्पात’ आदि अनेक शब्दों में नज़र आती है । ‘उद्’ में भी छिटकने, विभक्त होने, दूर जाने, ऊपर उठने का भाव है । कहने का तात्पर्य है है  कि उड़ने से जुड़े जितने भी शब्द हैं, उनमें मूल भाव छिटकने, पृथक होने का है । यह पार्थक्य धरातल से दूर जाने में प्रकट होता है ।
ड़फड़ाहट हर तरह से छिटकने-छिटकाने की क्रिया है । पंखों के गतिशील होने, धरातल से दूर हवा में उठने के लिए यह क्रिया होती है । पंख फड़फड़ाकर पक्षी खुद को सुखाते हैं अर्थात पानी को दूर छिटकाते हैं, खुद को साफ करते हैं । इस छिटकने में गति है । मूल अवस्था या बिन्दू से लगातार दूर जाने का भाव । एन्ड्रास रज्की के कोश में अरबी के ‘फ़र्राटा’ farrata शब्द का उल्लेख है (हिन्दी के फर्राटा से इसके रिश्ते पर सोचें) जिसका अर्थ है सीमा पार कर जाना, आगे बढ़ जाना । हिन्दी के फर्राटा में सरपट, बहुत शीघ्रता  जैसे भाव हैं । इसी तरह उड़ने की क्रिया और ‘फरफर’ ध्वनि के आधार पर अरबी में एक चिड़िया का नाम भी फ़ुरफ़ुर है । अल सईद एम बदावी के कोश में फ-र-र का अर्थ पलायन, स्थान छोड़ना, जल्दबाजी में होना आदि है । पलायन का यही भाव फ़रार ( फ़िरार ) में आता है जिसका मूल अरबी अर्थ है दौड़ जाना, भाग जाना, बच निकलना, छोड़ जाना, गच्चा देना या उड़ जाना आदि । हिब्रू में भी छिटकने, दूर जाने के अर्थ में प-र-र धातु ही है ।
इंडो-ईरानी शब्द सम्पदा के ‘पर्ण’ से फ़ारसी में ‘पर’ का विकास पंख के अर्थ में हुआ । यूँ संस्कृत का ‘पर्ण’ पत्ता है जिसमें छा जाने, रक्षा करने का भाव है । इसकी मूल धातु ‘पृ’ में दूर जाने, छिटकने, ऊँचे उठने, पार जाने की अर्थवत्ता है । पत्तों के ऊँचाई पर स्थित होने, हवा में फड़फड़ाने, उड़ने जैसे लक्षणों से फ़ारसी के ‘पर’ में पंख की अर्थवत्ता स्थापित होती है । सेमिटिक बाराखड़ी में ‘प’ वर्ण है जबकि अरबी में ‘प’ वर्ण नहीं है । अक्कद भाषा अरबी से भी प्राचीन है और प्राचीन सुमेरियाई सभ्यता में इसका चलन था । भाषाविज्ञानियो का स्पष्ट मत है कि प्राचीन सुमेर संस्कृति का प्राचीन भारत से गहरा सरोकार था । उड़ने, छिटकने, पलायन के अर्थ में अरबी के फरार ( फ़र्रा ) का रिश्ता एन्ड्रास रज्की सेमिटिक ‘प-र-र’ से जोड़ते हुए इसका विकास अक्कद भाषा के ‘पररू’ से बताते हैं । अरबी में ‘पर्रू’ का रूप फर्रा हुआ । संस्कृत के पृ > पर्ण का विकास फ़ारसी में ‘पर’ हुआ । समझा जा सकता है कि आर्य परिवार की ध्वनियों का प्रभाव उस दौर में आज के इराक तक रहा होगा ।  शब्दों का अध्ययन विश्व भाषाओं की अनेकता से ज्यादा उनकी एकता को पहचानने का सफ़र है ।

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Saturday, June 9, 2012

‘वक्ष’ और ‘बॉक्स’

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पि छले दिनों बक्सा, बकस, बॉक्स जैसे शब्दों के बारे में एक पोस्ट लिखी थी । 'शब्दों का सफर' के पहले पड़ाव की समीक्षा में हिन्दी के ख्यात विद्वान डॉ भगवान सिंह ने ‘बॉक्स’ की व्युत्पत्ति के बारे में महत्वपूर्ण बात कही है । उनका कहना है कि ‘संस्कृत का ‘वक्ष’ शब्द जिसे हम सीना, छाती के रूप में पहचानते हैं, उसकी अंग्रेजी के ‘बॉक्स’ से रिश्तेदारी है । वे कहते हैं- “वृक्ष का अर्थ है फैलना, ढकना, छाया देना...इसी से इसका एक अर्थ पेटी बना । ‘वृक्ष’ से ही ‘वक्ष’ बना । वक्ष ही अंग्रेजी का बॉक्स है ।“ बॉक्स बना है लैटिन के बक्सिस buxis या बक्सस buxus से जिनमें लकड़ी के संदूक या एक किस्म की झाड़ी का भाव है । विभिन्न संदर्भों के मुताबिक यह ग्रीक भाषा के पाइक्सोस pyxos से बना है । पाइक्सोस का एक और ग्रीक रूप पाइक्नोस भी है । वहीं चैम्बर्स डिक्शनरी में पाइक्नोस का अर्थ भरा हुआ, भीड़, समूह,  संकुल आदि बताया गया है । अंग्रेज़ी में एक बक्सम buxom भी है जो भरे हुए वक्षो का अर्थ देता है ।
मोनियर विलियम्स के कोश में ‘वृक्ष’ के पारम्परिक अर्थ अर्थात ऐसा पेड़ जिसमें फल, फूल, पत्ती आदि हों, के अलावा ‘वृक्ष’ के कुछ अन्य अर्थ भी है जैसे पेड़ का तना, शवपेटिका या एक ढाँचा (पेटी ?) आदि । मुझे ‘वृक्ष’ से ‘वक्ष’ की व्युत्पत्ति के प्रमाण न तो मोनियर विलियम्स के कोश में मिले और न ही वाशि आप्टे को कोश में । अलबत्ता ‘वृक्ष’ के तने वाले भाव का अर्थविकास वही है जो ‘पाइक्सोस’ या ‘पाइक्नोस’ से ‘बॉक्स’ या पेटिका का भाव ग्रहण करने में हुआ है । यह एक सहज प्रक्रिया है जो अलग अलग स्थानों के लोगों द्वारा प्राकृतिक चीज़ों के प्रति एक नज़रिये को दर्शाती है । ‘वक्ष’ में भी फैलने, विकसित होने, फूलने का भाव है । इसके अलावा हृदय-स्थल के तौर पर इसे एक कोटर भी समझा जाता है । इसी अर्थ में अंग्रेजी का ‘चेस्ट’ शब्द है जिसका अर्थ सीना भी है और पेटी भी । ‘वक्ष’ और ‘बॉक्स’ की साम्यता हो सकती है , पर ‘बॉक्स’ का विकास ‘पाइक्सोस’ या ‘पाइक्नोस’ से हुआ है । सीधे संस्कृत के ‘वक्ष’ से तो ‘बॉक्स’ बना नहीं होगा । इसी मुकाम पर पाश्चात्य भाषाविज्ञानियों की यह कल्पना ज्यादा तार्किक लगती है कि किसी काल में प्रोटो भारोपीय भाषा रही होगी जिसके विकास की दो दिशाएँ थीं-पूर्व और पश्चिम । ‘वक्ष’ या ‘बॉक्स’ का प्रोटो इंडो-यूरोपीयन मूल निश्चित ही काल्पनिक होगा, पर यह माना जा सकता है कि इन दोनों ही शब्दों का विकास एक ही प्राच्यभारोपीय भाषा से हुआ होगा ।
‘वक्ष’ के ‘वक्षस्’ रूप को देखें तो समझा जा सकता है कि ‘वक्ष’ का आदि रूप ‘वक्षस्’ रहा होगा । ‘वक्षस्’ और पाइक्सोस/ पाइक्सस में काफी समानता है । ये विकासक्रम की दो दिशाएँ हैं । ‘वक्षस’ से ‘वक्ष’ और ‘पाइक्सस’ से ‘बॉक्स’ । न कि सीधे ‘वक्ष’ से ‘बॉक्स’ की रचना । ‘पाइक्नोस’ शब्द में मूलतः सघनता पिण्ड का भाव था इसका पुख़्ता संकेत वाल्टर.पी. राइट के “इन्साक्लोपीडिया ऑफ़ गार्डनिंग” से मिलता है । वाल्टर के मुताबिक ‘पाइक्नोस’ का अर्थ है गहन, घनीभूत, भरपूर जिसे आमतौर पर लकड़ी के तने की चौड़ाई और उसकी मोटाई के संदर्भ में लिया जाता है । कुल मिलाकर संदूक निर्माण के लिए ‘वृक्ष’ को मुख्य स्रोत मानते हुए उसकी गुणवत्ता के ये आधार महत्वपूर्ण हैं और किसी बॉक्स ट्री में लकड़ी का भरपूर उपलब्धता सिद्ध होती है । यह भी स्पष्ट होता है कि ग्रीक के ‘पाइक्नोस’ से ‘पाइक्सोस’ बना । इससे ही लैटिन का ‘बक्सस’ बना जिससे अंग्रेजी का ‘बॉक्स’ शब्द बना । मैं डॉ. भगवान सिंह की बात को अत्यंत महत्व देते हुए इस रूप में ‘बॉक्स’ का रिश्ता वक्ष से तार्किक मानता हूँ । साथ ही यह भी कहूँगा कि अपने तमाम शोध के दौरान मुझे कहीं भी ‘वक्ष’ और ‘बॉक्स’ की रिश्तेदारी का संदर्भ नहीं मिला ।

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Friday, April 27, 2012

लोबान की महक

Olibanum

दु निया में शायद ही कोई होगा जिसे खुशबू नापसन्द होगी । सुवास से न सिर्फ़ तन-मन बल्कि आसपास का माहौल भी महक उठता है । सुगन्धित पदार्थ की एक लम्बी फ़ेहरिस्त है और इसमें लोबान का नाम भी शामिल है । अगरबत्ती, धूप और हवन सामग्री के निर्माण में लोबान का प्रयोग होता है । लोबान का प्रयोग दवा के रूप में भी होता है । इसे सुलगते हुए कंडे या अंगारे पर रख कर जलाया जाता है । इसका धुआँ सुगन्धित होता है । लोबान दरअसल एक क़िस्म की राल या वृक्ष से निकलने वाला पारदर्शी स्राव है जो सूख कर सफेद या पीली आभा वाले छोटे छोटे पिण्डों में रूपान्तरित हो जाता है । इसे हवन, पूजन के दौरान या अन्य आयोजनों में सुगन्धित वातावरण बनाने के लिए जलाया जाता है । इसके धुएँ से माहौल महक उठता है ।
लोबान या लुबान दरअसल असल भारत में फ़ारसी के ज़रिये आया है मूलतः यह सेमिटिक भाषा परिवार की धातु ल-ब-न ( l-b-n ) से बना अरबी शब्द है । यह एक अनोखा शब्द है जिसके भीतर बहुत सारे आशय छुपे हैं । इसके मूल में एक देश का नाम है । श्वेत अर्थात सफेदी के विविध आयाम इसमें नज़र आते हैं । इसमें एक विशिष्ट वृक्ष का स्पर्श भी है । देखतें है लोबान के वंशवृक्ष को । अधिकांश राल आधारित सुगन्धित पदार्थों की तरह ही लोबान भी एक विशिष्ट पेड़ बोसवेलिया सेरेटा Boswellia serrata से निकलने वाला दूध है । सेमिटिक धातु ल-ब-न में सफेदी या दुग्ध जैसे स्राव का भाव है । इससे बने अल-लुबान में भी दूध या सफेद पदार्थ का आशय है जिसमें वृक्ष से निकली सुगन्धित राल का अर्थ ही उभरता है । लुबान या लोबान का रिश्ता हिब्रू से भी है । ए जनरल सिस्टम ऑफ़ बॉटनी एंड गार्डनिंग में जॉर्ज डॉन अरेबिक al-luban के हिब्रू सजातीय lebonah का उल्लेख करते हैं । लेबोनाह का अर्थ होता है श्वेतकण या सफेदी का ढेर । इससे ही ग्रीक भाषा में लिबेनोस libanos बना, जिसका आशय भी लोबान ही है । ओलिबेनम का इतालवी रूप ओलिबेनो है ।
सी तरह लैटिन का ओलिबेनम olibanumशब्द ओषधिविज्ञान का जाना पहचाना पदार्थ है जिसका उपयोग प्रायः सिरदर्द की दवा बनाने में होता रहा है । इसका आशय भी गोंद, राल या लोबान से ही है । कई संदर्भ इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि लैटिन का ओलिबेनम दरअसल अरबी के अल-लुबान al-luban का सीधा सीधा लिप्यंतरण है जिसमें उच्चारण भिन्नता की वजह से हलका बदलाव आया । लोबान या ओलिबेनम का रिश्ता कई तरह से एशिया के सुदूर पश्चिमी छोर पर स्थित लेबनान से भी जुड़ता है । ऑक्सफोर्ड इन्साक्लोपीडिया के अनुसार ओलिबेनम दरअसल “ऑइल ऑफ़ लेबेनोज” या लेबेनान टर्म का संक्षेप है जिसका अर्थ है “लेबनान का तेल” । मगर यह बहुत पुख्ता आधार नहीं है । कुछ भाषाविदों का मानना है कि प्राचीनकाल से ही लेबनान में पाए जाने वाले ख़ास देवदार से निकलने वाले सुगन्धित पदार्थ की माँग भूमध्यसागरीय क्षेत्रों के बाज़ार में खूब रही है । इसीलिए लेबनान से आने वाले राल को लोबान नाम मिला । कुछ हद तक स्वीकार्य होते हुए भी यह व्युत्पत्ति सही नही है ।
रअसल लेबनान lebanon शब्द भी सेमिटिक मूल का ही है और इसा जन्म भी ल-ब-न से हुआ है । पश्चिमी एशिया के इस पहाड़ी प्रान्त में बर्फ़ से लदी चोटियाँ हैं । शुष्क अरब क्षेत्र में बर्फीली चोटियों वाले लेबनान को ल-ब-न में निहित सफेदी, शुभ्रता की वजह से ही पहचान मिली । लेबनान यानी लुब + नान अर्थात सफेद धरती । तात्पर्य बर्फ़ से ढकी चोटियों से ही है । यहाँ का सबसे ऊँची चोटी का नाम भी माऊंट लेबनान ही है । स्पष्ट है कि लेबनान से ‘लोबान’ नहीं बना है बल्कि ल-ब-न से ही लेबनान और लोबान बने हैं । दोनों में खास बात सफेदी है । प्राचीन अरब के सौदागरों का दूर दराज़ तक व्यापार करने में कोई सानी नहीं था । दरअसल अफ्रीका और पूर्वी एशिया के देशों से भारी मात्रा में अरब के सौदागर लोबान loban खरीदते थे और उसे लेबनान में साफ़ किया जाता था । वहाँ से उसे फिर दुनियाभर के बाज़ारों में बेचा जाता था । लेबनान से लोबान का रिश्ता इसलिए है क्योंकि वह लोबान की बड़ी मण्डी थी ।
स संदर्भ में अल्बानिया, एल्प्स जैसे क्षेत्रों को भी याद कर लेना चाहिए । सेमिटिक धातु ल-ब-न से मिलती जुलती धातु है a-l-b ( कुछ लोग इसे गैर भारोपीय धातु भी मानते हैं)। एल्ब *alb- का अर्थ है श्वेत, सफेद, धवल, पहाड़, पर्वत । इससे मिलती जुलती प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा परिवार की एक धातु है *albho-जिसमें भी यही भाव है और माना जाता है कि इसका विकास *alb-से हुआ है । पूर्व से पश्चिम तक फैली यूरोप की प्रसिद्ध पर्वत शृंखला का नाम एल्प्स है । यह नाम इसी मूल से आ रहा है । ध्यान रहे आल्प्स के न सिर्फ उच्च शिखरों पर हमेशा बर्फ जमी रहती है । alps में alb धातु साफ दिखाई पड़ रही है । पर्वतीय या पहाड़ी के अर्थ में एल्पाईन शब्द भी इसी मूल से आ रहा है ।

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Sunday, April 8, 2012

ट्रंक का खानदान

trपिछली कड़ियाँ-1.बक्सा, बकसिया और बॉक्सिंग.2कनस्तर और पीपे में समाती थी गृहस्थी.3

क्से की तरह ही ट्रंक trunk भी कई दशकों से भारतीय गृहस्थी की एक ज़रूरी व्यवस्था बना हुआ है । चीज़ों को उनके लक्षणों के आधार पर ही नाम मिलता है । शरीर को तन इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें लगातार वृद्धि होती है । संस्कृत की तन् धातु में विस्तार, वृद्धि का भाव है । तानना यानी विस्तार करना क्रिया के मूल में तन् धातु ही है । जो लगातार विस्तारित हो, वही तन है । पेड़ के मुख्य हिस्से को भी तना कहते हैं जो सम्भवतः इसी कड़ी का शब्द है । पेड़ के तने का भी लगातार विस्तार होता है । तने में ही काष्ठ का भण्डार होता है । तने की लकड़ी से ही विभिन्न वस्तुएँ बनती हैं । बॉक्स के मूल पाइक्सोन में मुख्य भाव ठोस, सघन और भरपूर मात्रा का संकेत है । लकड़ी के संदर्भ में ये सारी बातें पेड़ के तने की और इशारा करती हैं जिसे ट्रंक कहते हैं । भारत में आमतौर पर धातु की पेटी को ट्रंक कहा जाता है । किसी ज़माने में ट्रंक भी लकड़ी के ही बनते थे । भारत में भी रईसों के यहाँ पहले लोहे के कब्ज़े वाले लकड़ी के ट्रंक इस्तेमाल होते थे मगर जब आम आदमी के पास ट्रंक पहुँचा, तब तक इसकी काया लौहावरण में ढल चुकी थी । आज भी कई घरों में खानदानी चीज़ों की तरह ट्रंक सहेज कर रखे जाते हैं । ज़ाहिर है ट्रंक यानी तने की लकड़ी से निर्मित बक्से को भी ट्रंक नाम ही मिला । जानते हैं, कैसे ।
ट्रंक मूलतः भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है और वाल्टर स्कीट की कन्साइज़ एटिमोलॉजिकल डिक्शनरी के मुताबिक अंग्रेजी में इसकी आमद पुरानी फ्रैंच के ट्रांक tronc से हुई है जिसका मूल लैटिन ज़बान का त्रुंकस / ट्रंकस truncus शब्द है जिसका अर्थ है वह मुख्य हिस्सा, जिससे उसके सहायक हिस्से अलग किए जा चुके हैं । ज्यादातर संदर्भों में लैटिन के त्रुंकस का आशय पेड़ के ऐसे भारी तने से लगाया गया है जिससे उसके उसके उपांग अलग किए जा चुके हों अर्थात ऐसा तना जिससे जड़ और शाखाएँ का अलग की जा चुकी हों । त्रुंकसमें धड़ का भाव है । धड़ शरीर के उस मुख्य हिस्से को कहते हैं जिससे हाथ, पैर और सिर जुड़े रहते हैं । 1724 में प्रकाशित नैथन बैली की यूनिवर्सल एटिमोलॉजिकल डिक्शनरी में ट्रंकस का आशय हृदय की ओर रक्त ले जाने वाली महाधमनी और महाशिरा से भी है और किसी जगह का मुख्य आधार स्तम्भ से भी है । ध्यान रहे शरीर यानी तन का मुख्य आधार भी धड़ ही होता है । ट्रंक में धड़ का आशय भी है । हिन्दी का धड़ शब्द भी संस्कृत के धर् से बना है जिसका अर्थ है जो धारण करे । धड़ सभी अंगों को धारण करता है ।
ट्रंकस में मूलतः वृक्ष का अर्थ निहित है, न कि उपांगों से काट कर अलग किया जा चुका मुख्य आधार । विलियम फ्रॉली के इंटरनैशनल एन्साइक्लोपीडिया ऑफ लिंग्विस्टिक्स के मुताबिक त्रुंकसका मूल है dru-n [वृक्ष, काष्ठ] + -iko-s[ उपांग, हिस्से ] स्पष्ट है कि ट्रंकस से आशय उस मुख्यआधार से है जिसके साथ उसके दूसरे हिस्से भी जुड़े हों । बाद के दौर में त्रुंकस से बने ट्रंक में सिर्फ़ धड़ की अर्थवत्ता जुड़ गई । संस्कृत-हिन्दी में वृक्ष के लिए तरुवर, तरु, दारुकः, द्रु, द्रुम जैसे शब्द हैं जो इनके एक ही मूल की ओर इशारा करते हैं । संस्कृत में एक धातु है द्रु जिसमें वृक्ष का भाव है। मूलतः यह गतिवाचक धातु है । इससे बने द्रुत का मतलब है तीव्रगामी, फुर्तीला, आशु गामी आदि होता है । वृक्ष के अर्थ में द्रु धातु का अभिप्राय भी गति से वृद्धि से ही है । इससे ही बना है द्रुमः शब्द जिसका अर्थ भी पेड़ ही होता है और द्रुम के रूप में यह परिनिष्ठित हिन्दी में भी प्रचलित है । कल्पद्रुम शब्द साहित्यिक भाषा में कल्पवृक्ष के लिए प्रचिलत है । द्रु से ही बना है दारुकः शब्द जो एक प्रसिद्ध पहाड़ी वृक्ष

जेब शृंखला की ये कड़ियाँ ज़रूर देखें... peti1. पाकेटमारी नहीं जेब गरम करवाना [जेब-1]
2 टेंट भी ढीली, खीसा भी खाली
3 बटुए में हुआ बंटवारा
4 अंटी में छुपाओ तो भी अंटी खाली
5 आलमारी में खजाने की तलाश
6 कैसी कैसी गांठें
7 थैली न सही , थाली तो दे[जेब-7]

है जिसका प्रचलित नाम देवदारु है । द्रु से ही बना है द्रव जिसका मतलब हुआ घोड़े की भांति भागना, पिघलना, तरल, चाल, वेग आदि । द्रु के तरल धारा वाले रूप में जब शत् शब्द जुड़ता है तो बनता है शतद्रु अर्थात् सौ धाराएँ । पंजाब की प्रमुख नदी का सतलुज नाम इसी शतद्रु का अपभ्रंश है । अंग्रेजी का ट्री और फारसी का दरख्त इसी मूल से जन्में हैं ।
ध्यान रहे भारत-ईरानी परिवार में द्रु में बहाव, गति, ले जाने के साथ साथ स्थिरता का भाव भी है । द्रु काएक अर्थ अगर वृक्ष है तो इसमें वृद्थि के साथ साथ स्थिरता भी है । वृक्ष अपने स्थान पर दृढ़ होते हैं, अडिग होते हैं । जूलियस पकोर्नी  भारोपीय धातु deru में वृक्ष का भाव देखते हैं और कुछ अन्य भाषाशास्त्रियों नें tru धातु की कल्पना करते हुए इसमें दृढ़ता, पक्कापन, ठोस और मज़बूत जैसे भावों को देखा है । पुरानी आइरिश के derb में पक्का, भरोसा का भाव है तो अल्बानी के dru का अर्थ लकड़ी या छाल है । हित्ती भाषा के ता-रू , अवेस्था के द्रवेना, दारु, संस्कृत के द्रु, वेल्श के दरवेन, गोथिक के त्र्यु , ओल्ड इंग्लिश के ट्रेवो समेत कई यूरोपीय भाषाओं के इन शब्दों का अर्थ लकड़ी या पेड़ है । हाथी की सूंड को भी ट्रंक कहते हैं ।
डॉ रामविलास शर्मा एक और दिशा में संकेत करते हैं । वे स्थिरता के अर्थ में स्थर् की कल्पना करते हैं और उसके एक पूर्व रूप धर् के होने की बात कहते हैं जिससे धारिणी के रूप में धरती शब्द बना । संस्कृत दारु, द्रुम, तरु, ग्रीक द्रुस, अंग्रेजी के ट्री में दरअसल धर् के रूपान्तर दर् और तर् हैं । प्राकृत धड, हिन्दी धड़, पेड़ के तने की तरह, मानव शरीर के शीशविहीन भाग का अर्थ देते हैं । संस्कृत तण्डक ( तना ), तन् ( शरीर ), हिन्दी तना, अंग्रेजी स्टौक, ( तना ), आदि स्थिरताबोधक हैं । यह भी दिलचस्प है की धर में निहित स्थिरतामूलक धारण करने के भाव से ही गतिवाचक धारा शब्द भी बनता है । धारा वह जो धारण करे, अपने साथ ले जाए । धर, धरा के मूल में धृ धातु है । धरा यानी धरती को देखें तो यह स्थिर जान पड़ती है मगर यह न सिर्फ़ अक्ष पर घूमती है बल्कि सूर्य की परिक्रमा भी करती है । स्थिरता का परम प्रतीक ध्रुव का जन्म भी इसी धृ धातु से हुआ है । धृ की ही समानधर्मा धातु दृ बाद में विकसित हुई होगी ।
स तरह स्पष्ट है कि अंग्रेजी के ट्रंक में मुख्य आधार का भाव है । यह आधार कहीं मार्ग है, कहीं स्तम्भ है और कहीं तना है तो कहीं धड़ है । ट्रंक शब्द का प्रयोग महामार्ग के रूप में भी होता है जैसे ग्रांड ट्रंक रोड । देश के सुदूर पश्चिमोत्तर को धुर पूर्वी छोर से जोड़नेवाला जो महामार्ग सदियों तक हिन्दुकुश के पार से आने वाले कारवाओं से गुलजार रहा, उसे शेरशाह सूरी ने व्यवस्थित राजमार्ग का रूप दिया था । अंग्रेजों ने उसका नाम ग्रांड ट्रंक रोड रखा जो पेशावर से कलकत्ता तक जाता था । इसे अब जीटी रोड कहा जाता है । रेलवे में भी ट्रंक लाईन होती है । जीटी एक्सप्रेस एक प्रसिद्ध ट्रेन का नाम है । ट्रंक का प्रयोग दूरसंचार प्रणाली में भी होता है । संचार नेटवर्क का खास रूट ट्रंक कहलाता है । पुराने ज़माने में दूरदराज स्थानों पर टेलीफ़ोन क़ॉल के लिए ट्रंक लाईन का इस्तेमाल होता था जिसे ट्रंककॉल कहा जाता था । ट्रंक में निहित बक्से का भाव वृक्ष के मोटे पुष्ट तने से स्पष्ट हो रहा है । ज़ाहिर है ट्रंक यानी तने की लकड़ी से निर्मित बक्से को भी ट्रंक नाम ही मिला ।

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Saturday, April 7, 2012

बक्सा, बकसिया और बॉक्सिंग

box

सामान रखने की व्यवस्थाओं, उपकरणों के लिए हिन्दी में कई शब्द प्रचलित हैं जिनमें बक्सा, डिब्बा, संदूक, ट्रंक, पेटी, कनस्तर ऐसे नाम हैं जो हिन्दी में सदियों से प्रचलित हैं । ध्यान रहे कि इन सभी में किसी भी तरह का सामान भरा जा सकता है । अटैची, ब्रीफ़केस, सूटकेस जैसी चीज़ें भी बक्से की श्रेणी में ही आती हैं मगर इनमें सिर्फ़ कपड़े या दस्तावेज़ रखे जा सकते हैं । इनका आकार छोटा होता है जबकि ट्रंक बड़े बक्से को कहते हैं । बड़े संदूक को संदूकचा और छोटे को संदूकची कहा जाता है । इसी तरह बॉक्स box बड़ा और छोटा भी हो सकता है । बक्से में बेशकीमती सामान से लेकर कपड़े, बर्तन और किराना जैसी गृहस्थी की हर तरह की सामग्री रखी जा सकती है ।
हिन्दी में बॉक्स का चलन कम से कम दो सदी पुराना है और अन्य कई आप्रवासी शब्दों की तरह यह भी यूरोपीय कारोबारियों के जरिये भारतीय बोलियों में प्रचलित हुआ । जहाजों से लद कर जो माल भारतीय तटों पर उतारा जाता था वह लकड़ी के बड़े बड़े संदूकों में भर कर लाया जाता था जिन्हें बॉक्स कहते थे । हिन्दी में यह शब्द बहुत लोकप्रिय हुआ और इसके कई रूपान्तर सामने आए जैसे- बॉक्स, बाक्स, बकसा, बक्स, बकस, बकसी, बक्सा, बकसिया आदि । बॉक्स में जहाँ बड़ा आकार है वहीं संदूकची के अर्थ में देशी भाषा में बकसिया शब्द भी बना लिया गया । बॉक्स मूलतः लकड़ी से बना एक पात्र है जिसमें बहुत सारा सामान रखा जाता है । पुराने ज़माने से ही हल्की लकड़ी से डब्बे बनाए जाते थे क्योंकि उनमें माल ढोने में सुविधा होती थी ।
बॉक्स बना है लैटिन के बक्सिस buxis या बक्सस buxus से जिनमें लकड़ी के संदूक या एक किस्म की झाड़ी का भाव है । विभिन्न संदर्भों के मुताबिक यह ग्रीक भाषा के पाइक्सोस pyxos से बना है । एटिमऑनलाइन के मुताबिक ग्रीक पाइक्सोस का मूल अज्ञात है मगर इसका अर्थ अंग्रेजी में बॉक्स ट्री बताया गया है अर्थात बॉक्स प्रजाति का पेड़ । कुछ सन्दर्भों में बॉक्स-ट्री का आशय ऐसी वनस्पति से है जिसकी लकड़ी से संदूक बनता है मगर ऐसा नहीं है । बक्सस से बने बॉक्स में सघनता का भाव है । पाइक्सोस का एक और ग्रीक रूप पाइक्नोस है । चैम्बर्स डिक्शनरी में पाइक्नोस का अर्थ भीड़, समूह, भरा हुआ, संकुल आदि बताया गया है वहीं जॉन ओगिल्वी की स्टूडेन्ट इंग्लिश डिक्शनरी के मुताबिक इसमें सघनता का भाव है ।
ध्यान रहे कि शुरुआती दौर में संदूक हल्की लकड़ी वाली बुश झाडियों के तने से भी बनाए गए और भारी तनों वाले वृक्षों की लकड़ी से भी । मूलतः पाइक्नोस में सघनता का भाव है जिसका रिश्ता मोटे तने वाले वृक्ष से है । प्रायः सभी सभ्यताओं में मानव विकास क्रम में समानता रही है । उपकरणों और वस्तुओं के विकास के पीछे की अवधारणा एक जैसी रही है और उनके निर्माण की प्रक्रिया भी । प्राचीन सभ्यताओं पर अगर गौर करें तो पता चलता है कि कोई भी खोखला स्थान वस्तुओं को रखने, रहने के रूप में इस्तेमाल होता रहा है । चट्टानों को खोखला कर मनुष्य ने कंदरा बनाई-खुद के रहने के लिए और लकड़ी को खोखला कर उसने पात्र बनाए । पुराने दौर में समूचे वृक्ष को खोखला कर, कुरेद कर डोंगियाँ बनाई जाती थीं । इसके लिए वृक्ष का सघन तना होना ज़रूरी था । वृक्ष के आधार वाले सबसे चौड़े हिस्से को खोखला करने ही आदिम बॉक्स बने । पानी भरने की नांद भी इसी तकनीक से बनाई जाती थीं । बक्से का शुरुआती रूप यही था । बाद में लकड़ी के फट्टों को जोड़ कर सुंदर नक्काशीदार बक्से बनने लगे । एलिजाबेथ ब्रैमब्रिज और बॉबी मेयर द्वारा बॉक्स ट्री पर लिखी किताब से पता चलता है कि लैटिन का बक्सस ग्रीक भाषा के पाइक्नोस या पाइक्सोस का रूपान्तर है जिसका अर्थ है सुंदर नक्काशी के साथ बना हुआ लकड़ी का डिब्बा ।
पाइक्नोस शब्द में मूलतः सघनता पिण्ड का भाव था इसका पुख़्ता संकेत वाल्टर पी राइट के इन्साक्लोपीडिया ऑफ़ गार्डनिंग से मिलता है । वाल्टर के मुताबिक पाइक्नोस का अर्थ है गहन, घनीभूत, भरपूर जिसे आमतौर पर लकड़ी के तने की चौड़ाई और उसकी मोटाई के संदर्भ में लिया जाता है । किन्हीं संदर्भों में पाइक्नोस को सुगठित, ठोस, मोटा भी बताया गया है । कुल मिलाकर संदूक निर्माण के लिए वृक्ष को मुख्य स्रोत मानते हुए उसकी गुणवत्ता के ये आधार महत्वपूर्ण हैं और किसी बॉक्स ट्री में लकड़ी का भरपूर उपलब्धता सिद्ध होती है । यह भी स्पष्ट होता है कि ग्रीक के पाइक्नोस से पाइक्सोस बना । इससे ही लैटिन का बक्सस बना जिससे अंग्रेजी का बॉक्स शब्द बना ।
मुक्केबाजी बेहद मशहूर खेल है जिसे बॉक्सिंग boxing कहा जाता है । बॉक्सिंग बना है बॉक्स से जिसका एक अर्थ घूँसा भी होता है । अंग्रेजी में बॉक्स का अर्थ है प्रचंड वेग, प्रचंड प्रहार । एटिमऑनलाइन के मुताबिक इसकी व्युत्पत्ति निश्चित नहीं है । सम्भवतः यह मध्यकालीन ड्यूश के बोक, मध्यकालीन जर्मन के बक या डेनिश बास्क से बना है । इन सभी का अर्थ प्रहार होता है । अंग्रेजी का बैश इसी कड़ी में आता है जिसका अर्थ है घूँसा, मुक्का । जॉन ओगिल्वी के मुताबिक घूँसे के अर्थ वाले बॉक्स का जन्म भी पाइक्नोस से हुआ है जिसमें ठोस, पुख्ता और भरपूर जैसा भाव है । ओगिल्वी बॉक्स चेहरे पर खुला छोड़ा गया ऐसा आघात बताते हैं जो कान तक जाता हो । हिन्दी में इसे ही कनचप्पा कहते हैं । बाद में यह आघात मुक्के या घूँसे के अर्थ में रूढ़ हो गया ।

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