Showing posts with label animals birds. Show all posts
Showing posts with label animals birds. Show all posts

Tuesday, May 23, 2017

सबै भूमि गोपाल की अर्थात चार पैरों में सारी दुनिया समायी


ब्दों का सफ़र के दौरान बीते वर्षों में अनेक भाषायी सन्दर्भों से गुज़रते हुए दिलचस्प तथ्य प्रकट हुआ है जिसे आप सबसे साझा करना चाहूँगा। वह यह कि चौपायों के सम्बन्ध में एक खास बात सभी प्राचीन संस्कृतियों-भाषाओं में समान है। एक ही पशु के कई अर्थ हो सकते हैं। मसलन संस्कृत का गो। इसका अर्थ सामान्य चौपाया भी है, कोई भी गतिशील पदार्थ या संज्ञा है। गऊ तो रूढ़ है ही।

गो यानी जो भी गतिशील है
गौरतलब है वैदिक शब्दावली में ‘ग’ ध्वनि का आशय गमन से है। गम् धातुक्रिया का अर्थ गमन करना ही है। गति का ग भी यही कहता है। इसलिए ‘गो’ का आशय सिर्फ़ धेनु अथवा गाय नहीं बल्कि पशु मात्र से भी है, क्योंकि वह चलता है, गति करता है। यूँ कहें कि प्राचीन मनीषियों ने हर उस पदार्थ को ‘गो’ के दायरे में रखा जो गतिशील है। इसीलिए पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्र, तारे ये भी 'गो' ही हैं।


'गो' की गतियाँ
मन की गतियाँ भी 'गो' हैं। स्वाभाविक है तब इन्द्रियगतियाँ इसके दायरे से बाहर कैसे रहतीं? आँखों से जितना दिख रहा है वह भी गोचर और पैरों से जितना नापा जा सके वह भी गोचर। यहाँ पशुओं और मनुष्यों में फ़र्क़ न करें। पशुओं के पैर भी इन्द्री ही हैं सो कोई पशु जहाँ विचरण करे वह गोचर भूमि है। इसीलिए कहा जाता है “सबै भूमि गोपाल की”।


मृग यानी हिरन, कुत्ता, घास...
मृग का अर्थ भी मूलतः गतिशील से है। कुत्ते को मृग भी कहा गया है, गृहमृग और ग्राममृग भी। आमतौर पर हिन्दी में मृग से तात्पर्य हिरण प्रजाति के पशुओं जैसे सांभर, चीतल से है मगर इस शब्द की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। वैदिक काल में संस्कृत में मृग का अर्थ हिरण तक सीमित न होकर किसी भी पशु के लिए था। मृग शब्द का अर्थ हरी घास भी है। प्राचीनकाल में मृग शब्द में चरागाह या चरने का भाव प्रमुख था और इससे घास अर्थ की पुष्टि होती है। 


मृगया से मार्ग तक
संस्कृत शब्द मृगणा का अर्थ होता है अनुसंधान, शोध, तलाश। मृगया में शिकार का भाव है। हिन्दी का मार्ग शब्द बना है संस्कृत की मृग् धातु से जिसमें खोजना, ढूंढना, तलाशना जैसे भाव निहित हैं। मार्ग में भी खोज और अनुसंधान का भाव स्पष्ट है। कभी जिस राह पर चल कर मृगणा अर्थात अनुसंधान या तलाश की जाती थी, उसे ही मार्ग कहा गया। 


गायों का अनुसन्धान
अनुसंधान का मृगणा अर्थ उसी तरह है जिस तरह गवेषणा का अर्थ शोध-अनुसंधान हुआ। वेदों में पणियों के गाय चुरा ले जाने के उल्लेख हैं। गोपालक इनका सन्धान करने, ढूँढने निकलते थे जिसे गव+एषणा अर्थात गवेषणा कहा जाता था। कालान्तर सभ्यता के विकास के साथ मवेशियों को सामूहिक तौर पर हाँक ले जाने की प्रवृत्ति कम हो गई तो गवेषणा शब्द सिर्फ अनुसन्धान के अर्थ में रूढ़ हो गया। 


भल्लुक यानी कुत्ता और बंदर भी....
भल्लुक का अर्थ भी कुत्ता होता है। भालू तो ख़ैर है ही। इसके अलावा भल्लुक का अर्थ बंदर भी है। संस्कृत में बर्कर/वर्कर का अर्थ बकरा तो होता ही है इसके अलावा किसी कड़ियल चौपाए को भी बर्कर कहा जा सकता है। अरबी में बक्र शब्द का अर्थ भी हट्टाकट्टा ऊँट ही होता है किन्तु किसी जवान पशु को भी बक्र कहा जा सकता है। संस्कृत में जैसे गो के हवाले से सब कुछ चलायमान पदार्थ इसके दायरे में आ जाते हैं उसी तरह अरबी में बक्र का मामला है। 


मवेशी और हैवान
अरबी में मवाशी शब्द अब हिन्दी में पशु के अर्थ में मवेशी बन कर विराजमान है और इसका दूसरा विकल्प आसानी से नहीं मिलता। बलि-पशु के लिए अरबी में अज़हा शब्द है। हैवान का अर्थ यूँ तो कोई भी चौपाया है किन्तु आमतौर पर हिंस्र पशु के लिए इसका प्रयोग होता है। हिन्दी तक आते आते क्रूर, अत्याचारी और हिस्र मनुष्य को हैवान की अर्थवत्ता मिल गई। पशु के तौर पर हिन्दी में हैवान का प्रयोग कम होता है। “इन्सान हो या हैवान” जैसी अभिव्यक्ति के तहत ही इसका पशु अर्थ स्पष्ट होता होता है, अन्यथा नहीं। 


इस दिशा में अभी काम जारी है। आपके पास भी अगर कुछ महत्वपूर्ण या उल्लेखनीय लगे तो ज़रूर साझा करें।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, October 22, 2016

महिषासुर के कितने ठिकाने !!!


प्रा चीन भारतीय समाज में वृक्षों, जन्तुओं, नदियों की पहचान पर नामवाची संज्ञाएँ बनती रही हैं। चाहे व्यक्तिनाम हो, समूह नाम हो या स्थाननाम हो। जैसे सैन्धव, नार्मदीय, (सिन्धु, नर्मदा से) पीपल्या, बड़नगर, इमलिया, वडनेरकर (पीपल, इमली, वट से) गोसाईं, घोसी, गोमन्तक, गोवा (गाय से), हिरनखेड़ा, हिरनमगरी, हरनिया (हिरण से) आदि अनेक संज्ञाएँ सामने आती हैं।

ताज़ा महिषासुर प्रसंग में महिषासुर-दुर्गा को लेकर पाण्डित्य बह रहा है। आख्यानों के आख्यान रचे जा रहे हैं। इन मिथकीय आधारों का उल्लेख धार्मिक साहित्य में सर्वाधिक हुआ है। लोक ने अपनी कल्पना से इसमें बहुत कुछ जोड़ा। वह सब भी धार्मिक-सांस्कृतिक आधार बनता गया। मगर अब तो पुरातात्विक या नृतत्वशास्त्रीय स्थलों को भी मिथकों का प्रमाण मानते हुए मनमानी व्याख्या सामने आ रही हैं। यानी अगर सरस्वती देवी का दस सदी पुराना मन्दिर मिल जाए तो इसे पुरातात्विक प्रमाण मान लिया जाना चाहिए कि सरस्वती देवी थीं।

वेद-पुराण के प्रमाणों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषित करने की ज़रूरत होती है। अनेक लोगों ने यह काम किया है। परम्पराओं, मान्यताओं और आख्यानों की तह में जाकर ही जनजातीय समाज और हिन्दूसंस्कृति की गहन बुनावट को समझा जा सकेगा। इस विषय पर डॉ भगवान सिंह जैसे विद्वान ही आधिकारिक तौर पर बेहतर लिख सकते हैं।

हम सिर्फ़ यही कहना चाहते हैं कि असुर, राक्षस जैसे नामों को लेकर एक नकारात्मक कल्पना हमारे समाज का दोष है। शिक्षानीति में भी इस पर ध्यान नहीं दिया गया। मूलतः ये जातीय समूह रहे हैं और अलग अलग कालखण्डों में ये प्रभावशाली रहे हैं, बात इतनी भर है। कल की अनेक क्षत्रिय जातियाँ आज हीन सामाजिकता झेल रही हैं। बुंदेलखंड पर राज करने वाले खंगार क्षत्रिय अब कोटवार या चौकीदार के तौर पर जाने जाते हैं।

देशभर में पसरी पड़ी भैंस या महिष की संज्ञा वाली बस्तियों को आज भी पहचाना जा सकता है। स्वाभाविक है कि वहाँ भैंस प्रजाति की बहुतायत होगी। यह भी संभव है की यह किसी समूह की टोटेम पहचान हो जिसके आधार पर उस स्थान को नाम मिला। क्या देश के एक खास क्षेत्र को काऊबैल्ट या गोपट्टी नहीं कहते ? भैंस शब्द 'महिष' से निकला है जिसमें शक्ति, बल का भाव है। मूलार्थ है सूर्य। स्वाभाविक है कि कृषि के लिए जिस काल में भैंसे का प्रयोग होने लगा तब शक्ति व बल के आधार पर उसे भी यही नाम मिल गया।

यूँ महिष का मूल भी मह् से है जिससे महान शब्द बनता है। महान यानी बलवान, शक्तिवान। बिहार में महिषी, मध्यप्रदेश में भैंसदेही, भैंसाखेड़ी गढ़वाल में भैंसगाँव, पूर्वांचल में भैंसाघाट, निमाड़ में माहिष्मती, पश्चिम बंगाल में महिषादल, महेश्वर, मराठवाड़ा में म्हैसमाळ और कर्णाटक में मैसूर (महिषासुर) जैसे स्थान-नामों से क्या साबित होता है? यही कि हमारे सांस्कृतिक इतिहास में महिष एक महत्वपूर्ण जनजातीय प्रतीक रहा है।

मैं अनेक जनजातीय क्षेत्रों में गया हूँ। उन समाजों में बड़ादेव (बूढादेव< बुड्ढ < वुड्ढ < वृद्ध= सर्वोच्च) की पूजा होती है। यह बड़ादेव मूलतः शिव हैं। गौर करें, शिव को देवाधिदेव या महादेव कहते हैं। क्या ये नाम जनजातीय बड़ादेव का ही रूपान्तर नहीं? शिव जो स्वयं बलशाली हैं, ‘महा’ हैं, महेश कहलाते हैं। महेश यानी महा + ईश। वही बड़ादेव का रूपान्तर। पर मूल महेश को देखें तो यह महिष से उद्भूत है। यूँ भी महिष का अर्थ शक्तिवान, बलवान है। महिषी उसका स्त्रीवाची है। प्राचीनकाल में राजमहिषी इसीलिए रानी को कहते थे। शिव का वाहन नन्दी है।

‘साण्ड’ शब्द ‘षण्ड’ से उद्भूत है जिसका अर्थ है शिव। जो जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। प्रायः असुरों ने उन्हें तप से पाया है। अनेक कथाओं में शिव स्वयं संतान बनकर भक्तों को कृतार्थ करते नज़र आते हैं। उन्हें असुरों का देव भी कहा गया है। शिव अगर संहारक हैं तो संहार का सामना भी तो करते होंगे? गौर करें हमारे गोत्रनामों में भी भैंसा है। शाण्डिल्य गोत्र में भी यही षण्ड हो सकता है, गो कि इससे मिलते जुलते ऋषिनाम भी है। सण्डीला नाम का एक कस्बा है। राजस्थान में सांडेराव भी है। और भी मिल जाएंगे। बंगालियों का सान्याल उपनाम, शाण्डिल्य का ही रूपान्तर है।

गौवंश में भैंसे की ही तरह बलशाली बैल होता है। बल से ही बैल नाम पड़ा है। यह बैल भी गाय की तरह ही संस्कृति पर अपनी छाप छोड़ता है। तो संक्षेप में इतना ही कहना चाहूँगा कि धर्म कठिन रास्ता है। किसी भी विवाद को उस रास्ते पर न ले जाया जाए। हम संस्कृति को समझें जो निरन्तर परिवर्तनशील है। बेहद सावधानी से हमें इतिहास की परतों को टटोलते हुए उसके उन सिरों का परीक्षण करना होता है जो वर्तमान तक आते हैं। ऐसा न करने पर हमारे सामने भविष्य का रास्ता भी दिशाहीन हो जाता है।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, September 21, 2016

जलकुक्कड़ और तन्दूरी-चिकन


पि
छली पोस्ट में हमने वामियों के सन्दर्भ में ‘जलकुक्कड़’ का प्रयोग किया जिस पर सफ़र के साथी प्रदीप पाराशर ने जिज्ञासा दिखाई। ‘जलकुक्कड़’ एक मुहावरा है जो आमतौर पर ईर्ष्यालु के सन्दर्भ में इस्तेमाल होता है। यूँ इसमें शक, शंका, कपट, संदेह या डाह करने का भाव है। ‘सौतिया-डाह’ वाली जलन को मुहावरे में भी खूब महसूस किया जाता है। गौर करें, ये सभी भाव अग्नि से जुड़ते हैं। संदेह, शक या शंका दरअसल एक चिंगारी है। ‘डाह’ तो सीधे-सीधे दाह का ही रूपान्तर है। संस्कृत में ‘दह’ का आशय तपन, ताप, अगन, जलन, झुलसन से है।

जलकुक्कड़ में जो जल है वह ज़ाहिर है दाह या जलन वाले ‘जल’ के अर्थ में है न कि पानी वाले अर्थ में। कुक्कड़ यानी मुर्ग़। कुक्कड़ संस्कृत के कुक्कुट का देशी रूप है। कुक्कुट का कुर्कुट रूपान्तर होकर कुक्कड़ बना, ऐसा कृपा कुलकर्णी मराठी व्युत्पत्तिकोश में लिखते हैं। वैसे कुक्कुट से कुक्कड़ बनने के लिए कुर्कुट अवतार की ज़रूरत नहीं। ‘ट’ का रूपान्तर ‘ड़’ में होने से कुक्कुट सीधे ही कुक्कड़ बन जाता है।

जलकुक्कड़ को समझने के लिए “जल-भुन जाना” मुहावरे पर गौर करें। शरीर का कोई अंग आग के सम्पर्क में आने पर झुलस जाता है। जल-भुन वाले मुहावरे में यही जलन है। दूसरा मुहावरा देखिए- “जल-भुन कर कबाब होना”। कबाब एक ऐसा व्यंजन है जिसे सीधे तन्दूर पर या तवे पर खूब अच्छी तरह भूना जाता है। जब ज्यादा ही “अच्छी तरह” भून लिया जाए तो वह जल-भुन कर कोयला हो जाता है, कबाब नहीं रह जाता।

एक अन्य पद देखिए- “तन्दूरी-मुर्ग़”। मुर्ग़े को जब आग पर सालिम भूना जाता है उसे ही तन्दूरी-मुर्ग़ कहते हैं। कहते हैं, ये बेहद लज़ीज़ होता है। अब अगर इसका हाल भी कबाब जैसा हो जाए तो? आशय ईर्ष्याग्नि से ही है। ऐसा आवेग, उत्ताप जो मौन या मुखरता से झलके। इस कुढ़न को ही ये तमाम मुहावरे अभिव्यक्त कर रहे हैं। जलकुक्कड़ में भी यही आशय है।

कई बार पूछा जाता है कि फलाने का क्या हाल है? जवाब आता है कि खबर सुनने के बाद से “तन्दूरी-मुर्ग़” हो रहे हैं। कई लोग जो स्वभाव से दूसरों की खुशहाली देख कर कुढ़ते रहते हैं, हमेशा डाह रखते हैं या अपनी ईर्ष्या का प्रदर्शन करते रहते हैं उन्हें स्थायी तौर पर जलकुक्कड़ का ख़िताब मिल जाता है। वे हमेशा ईर्ष्या के तन्दूर पर जलते रहते हैं। ईर्ष्या की आग जिसमें तप कर कुन्दन नहीं कोयला ही बनता है। ऐसे ही लोगों के लिए हिन्दी में जलोकड़ा या जलोकड़ी जैसे विशेषण भी हैं। कभी कभी सिर्फ़ जलौक भी कह दिया जाता है।

प्रसंगवश बताते चलें कि कुक्कुट दरअसल ध्वनिअनुकरण के आधार पर बना शब्द है। संस्कृत में एकवर्णी धातुक्रिया ‘कु’ में दरअसल ध्वनि अनुकरण का आशय है अर्थात कुकु कुक या कुट कुट ध्वनि करना। कोयल, कौआ, कुक्कुट और कुत्ता में ‘कु’ की रिश्तेदारी है । दरअसल विकासक्रम में मनुष्य का जिन नैसर्गिक ध्वनियों से परिचय हुआ वे ‘कु’ से संबंद्ध थीं। पहाड़ों से गिरते पानी की , पत्थरों से टकराकर बहते पानी की ध्वनि में कलकल निनाद उसने सुना। स्वाभाविक था कि इन स्वरों में उसे क ध्वनि सुनाई पड़ी इसीलिए देवनागरी के ‘क’ वर्ण में ही ध्वनि शब्द निहित है। सो मुर्ग़ का कुक्कुट नामकरण दाना चुगने की ‘कुट-कुट’ ध्वनि के चलते हुआ। अंग्रेजी का कॉक cock भी इसी आधार पर बना है।

इसे भी देखें- कुक्कुट

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, August 6, 2016

कुछ ‘दन्द-फन्द’ कर लिया जाए


हि न्दी में दो दन्द चलते हैं। एक दंद (दन्द) है जो तद्भव रूप है और दूसरा फ़ारसी आप्रवासी। एक का अभिप्राय युद्ध, संघर्ष, रस्साकशी, हलचल आदि है। यह दंद संस्कृत के द्वन्द्व से आ रहा है। दूसरा दंद फ़ारसी का है जिसका अर्थ है दाँत, दाँतेदार, तीखा, नोकदार। हिन्दी में दंद का अकेला प्रयोग बहुत कम होता है। दंद-फंद मुहावरे के साथ ही यह देखने में आता है।

दन्द यानी जोड़ा या जद्दोजहद

संस्कृत क्रियामूल द्व / द्वि में दो का आशय है और द्वन्द्व इससे ही बना है जिसका का अर्थ है संग्राम, लड़ाई, झगड़ा, हाथापाई, संघर्ष वग़ैरह। इसमें दो का भाव साफ़ नज़र आ रहा है। हिन्दी का दो भी द्व से ही बना है। द्वक, द्वय, द्वन्द्व, जैसे शब्दों में दो और दो, सम्मुख, जोड़ा, युगल, जद्दोजहद, परस्पर, स्पर्धा, होड़, तकरार, अनबन, आज़माइश जैसे भाव हैं। यही नहीं, मूलतः द्वन्द्व में परस्पर विपरीत जोड़ी का आशय भी है इसलिए इसका अर्थ स्त्री-पुरुष युगल भी है। व्याकरण में द्वन्द्व समास होता है। समास युग्मपद है। परस्पर विलोम या विपरीतार्थी शब्द भी द्वन्द्व की मिसाल है मसलन सुख-दुख, रात-दिन वगैरह।

फन्द यानी गिरह
दंद की तर्ज़ फर फंद का इसमें जोड़ा जाना लोकअभिव्यक्ति की सफलता है। भाषा ऐसे पदों से ही समृद्ध होती है। यह जो फंद है, यह दन्द का अनुकरणात्मक पद न होते हुए स्वतन्त्र शब्द है जो ‘फंदा’ वाली शृंखला से आ रहा है। फन्द यानी बन्धन या पाश। देवनागरी में प > फ > ब > भ की शृंखला के शब्द स्थानीय प्रभाव के चलते विभिन्न बोलियों में एकदूसरे की जगह लेते हैं। बन्ध का लोकरूप फन्द हो जाता है। बन्ध में जहाँ किसी भी किस्म के अवरोध, रोक, गिरह या गाँठ का भाव है वहीं फन्दा सिर्फ़ गाँठ है। बान्धने की क्रिया सिर्फ़ गाँठ से ही व्यक्त नहीं होती। पानी को रोकने वाली व्यवस्था बान्ध इसलिए कहलाती है क्योंकि उसे बान्ध दिया गया है। फन्दा भी एक किस्म का बन्धन है पर हर बन्धन फन्दा नहीं। अलबत्ता फन्दा जहाँ गाँठ है वही इसी तर्ज़ पर बन्धा गाँठ न होकर डैम या बान्ध को कहते हैं।

जी-तोड़ प्रपंच
अब दंद-फंद की बात। मूल रूप से अपने मक़सद की कामयाबी के लिए हर मुमकिन और हर तरह के प्रयासों को अभिव्यक्त करने वाला पद है दंद-फंद पर अब इसका प्रयोग नकारात्मक अर्थ में ही ज़्यादा होता है। आज की हिन्दी में इस पद में चालबाजी, षड्यन्त्र, हथकण्डा, दाँव-पेच, खटराग, कूटनीति जैसी अभिव्यक्तियाँ समा गई हैं। द्वन्द्व से बने दन्द से यहाँ ज़ोर-आज़माइश प्रमुख है वहीं फन्द में फँसाने का भाव है। कुल मिला कर उचित-अनुचित का विचार किए बिना उद्धेश्यपूर्ति का प्रयत्न दरअल दंद-फंद की श्रेणी में आता है। हालाँकि सामान्य तौर पर जी-तोड़ मेहनत के अर्थ में भी इसका प्रयोग होता है जैसे- “सारे दन्द-फन्द कर लिए, तब कहीं काम मिला” या “वहाँ किराए के मकान के लिए बड़े दन्द-फन्द करने पड़ते हैं” वगैरा वगैरा।

दन्दाँ तुर्श करदन
जिस तरह संस्कृत में विसर्ग का उच्चार ‘ह’ होता है पर अक्सर वह ‘आ’ में परिवर्तित हो जाता है। फ़ारसी में शब्द के अन्त में ‘हे’ का प्रयोग इसी तरह होता है। संस्कृत के दन्त यानी दाँत का फ़ारसी समानार्थी दंदानह دندانه है जो दाल, नून, दाल,अलिफ़, नून, हे से मिलकर बना है। हिन्दी में इसका उच्चार दंदाना होता है जिसका अर्थ हुआ दाँता, दाँतेदार, नुकीला, नोकदार आदि। फ़ारसी में कहावत है “दन्दाँ तुर्श करदन” इसकी तर्ज़ पर हिन्दी में दाँत खट्टे करना कहावत बनाई गई। दन्द-फन्द वाले दन्द से दाँतेदार दन्द का कुछ लेना-देना नहीं।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें



अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, April 15, 2013

घोंघाबसंत

Garden Snail (Helix aspersa).

लसी और महामूर्ख के अर्थ में ‘घोंघाबसन्त’ मुहावरा खूब प्रचलित है। ‘घोंघा’ शब्द भी अपने आप में ‘गावदी’ या ‘घोंचू’ प्रकृति के व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है। गुमसुम या चुपचाप रहने वालों को भी ‘घोंघा’ कहा जाता है। घोंघा के साथ ‘बसन्त’ का मेल चौंकाता है। जिस तरह से गधे के लिए बैसाखनंदन उपमा है क्या उसी तरह घोंघाबसन्त में भी ‘बसन्त’ का तात्पर्य ऋतु से ही है ? चलिए, पहले ‘घोंघा’ की खबर लेते हैं, फिर ‘बसन्त’ की भी सुध ली जाएगी। घोंघा शब्द एक नज़र में अनुकरणात्मक लगता है मगर इसमें अनुकरण का संकेत आसानी से पकड़ में नहीं आता। शब्दकोशों में घोंघा का अर्थ शंख, सीप, कवच, खोल, आवरण आदि है। घोंघा से आशय जोंक जैसे रेंगने वाले उस प्राणी से है जो दलदली, नम भूमि पर या कछारी क्षेत्र में पाया जाता है। यह शंखनुमा कवच में रहता है। चलते समय यह आवरण से बाहर निकलता है मगर इसकी रफ़्तार बहुत सुस्त रहती है। थोड़ी भी हलचल से घबराकर यह फिर अपने खोल में घुस जाता है। घोंघा शब्द में मुख्य आशय उस आश्रय से है जिसमें रेंगने वाला कीड़ा रहता है। यह आश्रय शंखनुमा घुमावदार, उभारदार वलयाकृति वाला होता है।
लिली टर्नर घोंघा शब्द की तुलना घेंघा से करते हैं। ध्यान रहे, घेंघा गले का एक रोग होता है जिसमें कण्ठनाल में एक उभार या गठान जैसा आकार बन जाता है। घोंघा की रचना में भी उभार ही प्रमुख हैं। टर्नर के कोश में घेंटु यानी गला अथवा गर्दन का उल्लेख भी है और इसकी तुलना भी गले के घुमावदार उभार से की गई है। कण्ठ (गला ), गण्ड (उभार, ग्रन्थि), कण्ड (जोड़) जैसे शब्द एक ही कड़ी के हैं। गलगण्ड यानी गले का उभार। कई लोग इसे गले की घण्टी भी कहते हैं। घूर्णन (घुमाव), घूम, घूमना, घण्टा, घण्टी, घट, घाटी जैसे कई शब्दों में इसे समझा जा सकता है। ‘घ’ ध्वनि / वर्ण में निहित घुमाव का भाव घोंघा की सर्पिल गति से भी स्पष्ट है। मराठी में एक साँप का नाम ‘घोण’ है। मोनियर विलियम्स के कोश में भी घोण नाम के सर्प का उल्लेख है। स्पष्ट है कि घोंघा या घेंघा ( गले की ग्रन्थि ) में अनुकरणात्मकता है मगर इसका तार्किक रिश्ता ‘घ’ ध्वनि में निहित घुमाव के आशय से है।
घोंघा के साथ जुड़े बसन्त शब्द को बसन्त ऋतु से न जोड़ते हुए खड़ी बोली के ‘अन्त’ प्रत्यय से बना हुआ शब्द मानना चाहिए जैसे रटन्त। गौरतलब है इस प्रत्यय से अपनी आवश्यकतानुसार मुख-सुख के शब्द बनाए जाते रहे हैं मसलन, घुसन्त, उठन्त, घुमन्त, फिरन्त, चलन्त आदि। किसी विशिष्ट भाव के लिए बनाया गया पद रूढ़ भी हो सकता है। बसन्त के ‘बस’ में बैठने, स्थिर होने का भाव है। ‘बस’ से मराठी में ‘बसना’ क्रिया बनती है जिसका अर्थ है बैठना। हिन्दी का ‘बसना’ कुछ अलग अर्थवत्ता रखता है और इसमें निवास करने, स्थिर होने का भाव है। गुजराती में बैठिए के लिए ‘बेसो’ शब्द है। संस्कृत के वस् में बसने का भाव है और हिन्दी मराठी का बसना, इसी वस् से आ रहा है। आवास, निवास जैसे शब्द इसी मूल के हैं।  मूर्ख की तरह बैठे रहने वाले अर्थ में ‘बसन्त’ इसी तरह घोंघाबसन्त में रूढ़ हो गया होगा, ऐसा लगता है। यह भी सम्भव है कि ‘घोंघाबसन्त’ का अर्थ है वह जो खोल घुस कर बैठा रहे। घरघुस्सू व्यक्ति यान घर में घुस कर बैठे रहने वाले व्यक्ति को भी समाज में अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता। बुद्ध मुद्रा में बैठे रहने वाले व्यक्ति के लिए भी आखिरकार गावदी के अर्थ में ‘बुद्धू’ शब्द रूढ़ हुआ और एकटक ताकते रहने वाले व्यक्ति को ‘मूढ़’ की संज्ञा दी गई।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, December 9, 2012

सुरख़ाब के पर

surkhab

कि सी अद्वितीय गुण, ध्यान आकर्षित करने वाली विशेषता या विलक्षणता की अभिव्यक्ति के लिए “सुरखाब के पर” मुहावरा बोलचाल की भाषा में खूब इस्तेमाल होता है मसलन “ इंदौर में क्या सुरख़ाब के पर लगे हैं जो भोपाल में गुज़र नहीं हो सकती? ” सुरख़ाब यानी हंस की प्रजाति का एक पक्षी जिसके पखों की खूबसूरती की वजह से प्राचीनकाल से इस पखेरु को ख़ास रुतबा मिला हुआ है । हंस जहाँ सफेद रंग के होते हैं वहीं सुरखाब अपनी पीली, नारंगी, भूरी, सुनहरी व काली रंगत के पंखों की वजह से अत्यधिक आकर्षक होते हैं । ख़ूबसूरत, मुलायम, रंगीन पंखों का उपयोग कई तरह के परिधानों में होता रहा है जिसकी वजह से दुनियाभर में इनका अंधाधुंध शिकार होने से अब सुरख़ाब दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों में हैं और इसके शिकार पर पाबंदी है ।
सुऱखाब को अंग्रेजी में रूडी शेलडक Ruddy Shelduck कहते हैं जिसका अर्थ है रंगीन हंस । अंग्रेजी के रूडी शब्द में रक्ताभ, सुर्ख या चटक का भाव है । डक यानी बतख । यूँ देखें तो इसे सुर्ख़+आब यानी सुर्खाब कहना ग़लत नहीं है । मगर यह इसकी व्युत्पत्ति का आधार नहीं है । रंगों के संदर्भ मे चटक, गहरा या तेज़ भाव वाला सुर्ख़ शब्द हिन्दी में फ़ारसी से आया और यह संस्कृत के शुक्र का रूपान्तर है । रंग से ताल्लुक रखती एक और महत्वपूर्ण बात । वैदिक शब्दावली में अनेक शब्द हैं जिनमें एक साथ सफ़ेद, पीला, लाल, हरा और कभी कभी भूरे रंग का भाव उभरता है । संदर्भों के अनुसार उस रंग का आशय स्वतः स्पष्ट होता जाता है । इसीलिए कांति या दीप्ति की अर्थवत्ता वाले शब्दों में प्रायः इन सभी रंगों का भी बोध होता है । संस्कृत के शुक्र में जहाँ श्वेताभ, पीताभ, रक्ताभ जैसी अर्थवत्ता रखता है वहीं फ़ारसी में शुक्र से बने सुर्ख़ में चटकीला लाल ही रूढ़ हुआ । सुरख़ाब में सुर्ख़ की कोई भूमिका नहीं है । जिस तरह चक्र से सुर्ख़ बना उसी तरह इसी सुरख़ाब के मूल में संस्कृत का चक्रवाक है ।
संस्कृत में सुरख़ाब chakravak का एक नाम हिरण्य हंस भी है । हिरण्य यानी सोना अर्थात सुनहरी हंस । सुरख़ाब के संस्कृत में अन्य कई नाम भी हैं जैसे चक्रवाक, रथचरण, वियोगिन, द्विक, अवियुक्त, हरिहेतिहूति, द्वन्द्वचर, निशाचर, भूरिप्रेमन्, द्वन्द्वचारिन्, गोनाद, रथाङ्ग, नादावर्त आदि । इसी तरह हिन्दी में इसे कोक, कोकहर, कोकई, चकई, चक्कवा, चाकर, चकवाह कहते हैं । प्राकृत में इसे रहंग कहा गया है और मराठी में इसका एक नाम ब्राह्माणी बदक Brahminy Duck भी है । सुरख़ाब दरअसल संस्कृत के चक्रवाक का फ़ारसी रूपान्तर है । ध्वनिपरिवर्तन के साथ अनुमानित विकासक्रम– चक्रवाक > शक्रवाक > शर्कवाब > सर्खवाब होते हुए सुरख़ाब हुआ होगा ।
हिरण्य हंस या सुनहरी हंस के चक्रवाक नामकरण के पीछे दरअसल रंग नहीं बल्कि उसकी विशेष आवाज़ है । मराठी संदर्भों के मुताबिक चक्रवाक नामकरण के पीछे संस्कृत में ‘चक्र इव वाक् शब्दोऽस्य रथाङ्गतुल्यावयन’ कारण बताया गया है । इसका मतलब हुआ रथ के चक्के में चिकनाई (लुब्रिकेंट) न डाले जाने पर जिस तरह किर-किर, खर-खर ध्वनियाँ पैदा होने से किरकिराहट की आवाज़ आती है, चक्रवाक भी अपने गले से वैसी ही आवाज़ निकालता है । संस्कृत में चक्र यानी चक्का और वाक् यानी आवाजा इस तरह चक्र + वाक = चक्के जैसी (रथ के पहिए समान) आवाज़ निकालने वाला पक्षी । चक्रवाक का एक अन्य नाम रथाङ्ग से भी यह स्पष्ट है । कर्नाटक संगीत में इस पक्षी के नाम पर एक राग-चक्रवाकम् Chakravakam भी है । 
प्राचीन कवियों के शृंगार-वर्णन में चक्रवाक का कई बार उल्लेख आता है । नर पक्षी को चक्रवाक और मादा को चक्रवाकी कहते हैं । हिन्दी में चकवा, चकवी (चक्रवाक > चक्कवा > चकवा / चक्रवाकी > चक्कवी > चकवी-चकई ) जैसे शब्द इससे ही बने हैं । चकवा-चकवी शाश्वत प्रेम प्रतीक हैं । दिनभर साथ रहने के बाद चक्रवाक और चक्रवाकी अलग अलग हो जाते हैं और रातभर विरह की अकुलाहट में कुर-कुर ध्वनि करते रहते हैं । मराठी संदर्भों में यह ध्वनि “ आंङ्ग-आङ्ग” बताई गई है । हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य का इतिहास में “चक्रवाक-मिथुन (चकवा-चकई)” शीर्षक आलेख में इस पक्षी के बारे में विस्तार से लिखा है । चक्रवाक chakravak  शरत्काल में भारत के जलाशयी क्षेत्रों में नज़र आता है और शेषकाल में यह अपने पर्यावास में लौट जाता है । स्वभावतः ये जोड़े में रहने वाला पक्षी ( रूडी शेल्डक ) है और मादा एक बार में 50-60 अंडे देती है ।
सम्बन्धित कड़ी- सुर्ख़ियों में शुक्र 

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, October 27, 2012

‘दफा’ हो जाओ …

पिछली कड़ियाँ-kicked out1.‘बुनना’ है जीवन.2.उम्र की इमारत.3.‘समय’ की पहचान.
मयवाची शब्दों की कड़ी में इस बार अरबी के ‘दफा’ शब्द की बात । रोजमर्रा की बोली भाषा में ‘बार-बार’ इस्तेमाल होने वाले शब्दों में ‘बार-बार’ का ‘बार’ भी शामिल है जैसे - ‘इस बार’, ‘उस बार’, ‘कई बार’, ‘हर बार’, ‘मेरी बारी’, ‘तेरी बारी’, ‘उसकी बारी’, ‘बारी-बारी’ आदि । इसी कड़ी में ‘बार’ का एक और पर्याय है ‘दफा / दफ़ा’ जिसका इस्तेमाल भी बार की तर्ज़ पर ही होता है मसलन ‘इस दफ़ा’, ‘उस दफ़ा’, ‘हर दफ़ा’, मगर ‘दफ़ा’ का इस्तेमाल और अलग अर्थों में भी होता है । किसी को चलता करने के लिए कहा जाता है “दफ़ा हो जाओ” । अगर कोई ‘दफ़ा’ होने को राज़ी न हो तो मुमकिन है कानून की ‘दफ़ा’ लगाने की नौबत आ जाए । ये सभी दफ़ा एक ही सिलसिले की कड़ियाँ हैं । दफ़ा का प्रयोग दफे की तरह भी होता है जैसे “पहली दफ़े…”।

हिन्दी में ‘दफ़ा’ शब्द का प्रयोग फ़ारसी के ज़रिए शुरू हुआ । फ़ारसी में इसकी आमद अरबी से हुई जिसमें इसका सही रूप ‘दफ्अ’ है । दफ़्अ की व्युत्पत्ति अरबी की d-f-a ( दा-फ़ा-ऐन ) त्रिअक्षरी धातु से हुई है । भाषाविज्ञानियों का मानना है कि मूलतः यह अक्कादी भाषा का शब्द है । अक्कादी में ‘प’ ध्वनि  है और अरबी में ‘फ’ है , ‘प’ नहीं । अक्कादी में इसका रूप d-p-a ( दा-पे-ऐन ) है जिसमें धकेलने ( बाहर की ओर ) की बात उभरती है । अरबी में दफ़्अ में भी धकेलने ( बाहर निकालने ) का भाव है । गौरतलब है कि संस्कृत की समयवाची क्रियाओं में भी गति, शक्ति, प्रवाह के आशय निकलते हैं । संस्कृत की वा-या क्रियाओं में गतिवाची भाव है मगर इनसे समयवाची शब्द भी बने हैं ।  अरबी के दफ़ा शब्द की अर्थवत्ता के नज़रिए से काफी पेचीदा है । कहीं यह प्रवाहवाची नज़र आता है और प्रकारान्तर से कही इसी वजह से इसमें समूहवाची अर्थवत्ता उभर आती है ।

फ़्अ का हिन्दी, फ़ारसी में दफ़ा रूप प्रचलित है । हिन्दी में नुक़ता नहीं होता तो भी दफा में नुक़ता लगाया जाना चाहिए । अलसईद एम बदावी की कुरानिक डिक्शनरी के मुताबिक दा-फ़ा-ऐन में प्रवाह, झोंका, बौछार, धारा, धावा जैसे भाव हैं । इससे बने दफ्अ में धावा, हमला या चढ़ दौड़ने, टूट पड़ने के साथ-साथ बचाव करने, रोकने का आशय भी है । मराठी में भी दफा शब्द है । करीब साढ़े तीन सौ साल पहले शिवाजी ने पंडित रघुनाथ हणमंते से शासन-व्यवहार में प्रचलित अरबी-फ़ारसी शब्दों की सूची बनवाई थी ( राजव्यवहार कोश ), उसमें भी दफा शब्द का उल्लेख है । कृ.पा. कुलकर्णी के कोश के मुताबिक इसमें समय और पाली का आशय है साथ ही दफ़ा शब्द का अर्थ सेना की पंक्ति, टुकड़ी भी है । खासतौर पर घुड़सवार टुकड़ी का इसमें आशय है ।
हिन्दी-मराठी-गुजराती में दफ़ेदार एक उपनाम भी होता है जिसका रिश्ता मुग़लदौर की सैन्य शब्दावली से हैं । दफ़ा शब्द का अर्थ प्रभावी या ताक़तवर व्यक्ति भी है । फ़ैलन के कोश में इसका एक फ़ारसी रूप दफ़े  है जिसमें फौजी टुकडी, सेना का घुड़सवार दस्ता अथवा पैदल टुकड़ी का आशय है । इससे ही दफ़ेदार शब्द बना है अर्थात किसी सैन्य दल का सरदार । रियासती दौर में दफ़ेदार होना सम्मान की बात थी । जनरल से जरनैलसिंह और कर्नल से करनैलसिंह की तरह ही सैन्य जातियों में ‘दफ़ेदार’ नाम रखने की परम्परा भी रही है । गौर करें ये सभी आशय मूलतः अरबी के ‘दफ्अ’ में निहित प्रवाहवाची ( धकेलना ) अर्थ से ही विकसित हुए हैं । सेना की टुकड़ी धावा ही करती है । गति, वेग और प्रवाह को फौजी धावे के सन्दर्भ में समझा जा सकता है ।
फ़ा में निहित समय, बारी, समूह, धक्का, वेग, टुकड़ी, पिण्ड, हटाना, हमला जैसे तमाम अर्थों को देखने पर मूल दफ्अ में निहित धकेलने का आशय ही उभर कर आता है । ध्यान रहे  धकेलने की क्रिया से दबाव बनता  है । दबाव से जमाव पैदा होता है । यही बात दफ़ा में समूह, टुकड़ी, खण्ड, पिण्ड आदि की अर्थवत्ता पैदा करती है । अरबी में दफ़्अ का एक अर्थ हाथी की लीद ( पिण्ड )भी होता है । इसमें जमाव और धकेल कर बाहर निकाले जाने के भाव को समझा जाना चाहिए । फ़ौजी टुकड़ी के मुखिया को दफ़ेदार इसलिए कहा जाता है क्योंकि दफ़ा में समूह का भाव है । यह टुकड़ी दुश्मन की फोज को पीछे धकेलती है । तेजी से आगे बढ़ती है ।  छत्तीसगढ़ के कोयलांचल में मज़दूर बस्ती को दफाई कहा जाता है । यह दफाई मनुष्यों का समूह या दल ही है । स्टैंगास की अरेबिक डिक्शनरी के मुताबिक दफ़ाफ का अर्थ परिवार, बस्ती या समूह है । अरबी में जमाअत का अर्थ भी दल या समूह है । दलपति या दलनायक को जमाअतदार कहा जाता था । बाद में इसका रूपान्तर जमादार हो गया । कहने का तात्पर्य यही कि दफ़ेदार में जमादार का ही भाव है ।
फ़ा का हिन्दी-उर्दू में कालवाची अर्थ में ही ज्यादातर प्रयोग होता है । दफ़ा के समूहवाची अर्थ में ढलने की प्रक्रिया को समझने के बाद दफ़ा यानी बार-बार, बारी अर्थात turn, मौका अवसर, समय आदि भावों को समझना आसान है । समय की गति सीधी सपाट नहीं बल्कि घुमावदार है । दिन-रात 12-12 घंटों में विभाजित है और 24 घंटों बाद यही क्रम फिर शुरू होता है । सप्ताह सात दिन का और महिना तीस दिन का । एक अन्तराल के बाद फिर वही क्रम शुरू होता है । यह वृत्ताकार है । यह जो मुड़ कर लौटने की क्रिया  है, यही बारी या टर्न है । पहला क्रम खत्म होने के बाद फिर वही क्रम शुरू होने को बारी कहते हैं । इस तरह ‘बारी’ समय का वह अंश, हिस्सा या खण्ड है जिसकी पुनरावृत्ति हो रही है । ध्यान दें, पुनरावृत्ति में ‘वृत्त’ ही है जिसके मूल में वर् है । वर् में घुमाव है जिससे एक दिन के अर्थ वाला वार बन रहा है । वार का फ़ारसी रूप ही ‘बार बार’  वाला बार है । पुनरावृत्ति का वृत्त या मोड़ वही है जिसे ‘बारी’ कहते हैं, इसका आशय कालांश, कालखंड से भी लगाया जा सकता है । बारम्बारता के लिए दफ्अतन का प्रयोग भी होता है, जिसमें दफ्अ या दफ़ा साफ़ पहचाना जा सकता है। दफ़ा का बहुवचन दफ़ात होता है। उसमें ‘अन’ प्रत्यय जुड़ने से कर्मकारक दफ्अतन बनता है जिसका अर्थ है समय समय पर, अक्सर, हमेशा, बार-बार, बहुधा आदि।
ई समूह किसी न किसी बड़ी रचना के हिस्से होते हैं । सो दफ़ा एक टुकड़ी भी है, समूह भी है, जमाव भी है, दल भी है । कई इकाइयों से समूह बनता है और कई समूहों की स्थिति में हर समूह एक इकाई होता है । समूह के रूप में इकाई एक पिण्ड, खण्ड, अनुच्छेद, प्रभाग आदि है । दफ़ा का अर्थ अनुच्छेद, धारा, अनुभाग, भाग आदि भी होता है । न्याय व्यवस्था में दफ़ा शब्द का प्रयोग होता है । हिन्दी में जिसे धारा हैं, रियासती दौर में उसे दफ़ा कहा जाता था । आज भी यह प्रचलित है । दफ़ा 302 का आशय भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 से है । हिन्दी-उर्दू में दफ़ा ( दफ्अ ) शब्द का एक अर्थ दूर करना, चले जाने का आदेश देना । मूलतः इसमें धकेलने वाले भाव का विस्तार ही है । धकेलने की क्रिया में दूर करने का भाव है । व्यावहारिक रूप में यह तिरस्कार है । ‘दफ़ान हो जाओ,’ ‘दफ़ा हो जाओ’ वाक्यों में तिरस्कार की नाटकीय अभिव्यक्ति देखने को मिलती है । इसका प्रयोग खुद चले जाने जाने के लिए भी होता है जैसे “मैं तो दफ़ा होता हूँ”अगली कड़ी में-  ‘रफ़ा-दफ़ा’ की बात
इन्हें भी देखें-1.फसल के फ़ैसले का फ़ासला.2.सावधानी हटी, दुर्घटना घटी.3.क़िस्मत क़िसिम-क़िसिम की.4.चरैवेति-चरैवेति.5.दुर्र-ऐ-दुर्रानी.6.कमबख़्त को बख़्श दो !.7.चोरी और हमले के शुभ-मुहूर्त.8.मौसम आएंगे जाएंगे.9.बारिश में स्वयंवर और बैल.10.साल-दर-साल, बारम्बार.11.नीमहकीम और नीमपागल.12.कै घर , कै परदेस !.13.सरमायादारों की माया [माया-1] .14.‘मा’, ‘माया’, ‘सरमाया’
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, October 22, 2012

‘बुनना’ है जीवन

bayaज़रूर देखें-1. चादर. 2.प्रवीण.3. तन्तु.4. धागा. 5.बाँस.6.कातना.7. सूत 

जी वन का बुनाई से गहरा रिश्ता है । “झीनी झीनी बीनी चदरिया” वाली कबीर की जगप्रसिद्ध उक्ति में चादर ज़िंदगी का प्रतीक है । परमात्मा ने जीवनरूपी चादर को जितनी शिद्धत और मेहनत से महीन अंदाज़ में बुना था उसे सुर-नर-मुनि ने ओढ़ कर मैला कर दिया । कबीर बड़े समझदार हैं, उन्हें ज़िंदगी की कीमत पता है, सो इस चादर को उन्होंने इतने जतन से ओढ़ा कि खुद के साथ साथ पूरे ज़माने को संवार दिया । “दास कबीर जतन से ओढ़िन, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया”। कबीर जुलाहे थे, बुनकारी जानते थे । इसीलिए उन्होंने ज़िंदगी के लिए चादर जैसा सहज प्रतीक चुना । जन्म लेने के बाद हम सब महीन की बजाय मोटा कातते हैं, महीन की बजया  मोटो बुना जाता है । नतीजतन सुख नहीं मिलता । सुख की उधेड़बून में चादर मैली और जर्जर हो जाती है । इसलिए जिंदगी को सलीके से, महीन बुना जाना चाहिए । हि्न्दी के ‘वय’ शब्द का बुनाई से गहरा रिश्ता है ।
म्र या आयु के लिए हिन्दी में ‘वय’ शब्द भी प्रचलित है । मराठी में उम्र, आयु की तुलना में वय शब्द ज्यादा प्रचलित है । संस्कृत कोशों के अनुसार ‘व’ वर्ण में गति (वह > वहन > बहना या वेग), घर ( वास > आवास, निवास ), कपड़ा ( वस् > वस्त्र ) और बुनना (वयन) जैसे भाव हैं । इसके अतिरिक्त भुजा जो भार उठाती है ( वाह > बांह ) भी इसका अर्थ है । संस्कृत की ‘वे’ धातु में गूँथने, बुनने, बटने और बांधने का भाव प्रमुख है । वे का एक अर्थ पक्षी भी होता है क्योंकि वे चुन-चुन कर तिनकों को गूँथते हैं और अपना आवास बनाते हैं । ‘वे’ से ही बनता है वयन जिससे बयन > बउन > बुन > बुनन > बुनना जैसे रूप बने हैं । इससे ही बुनाई, बुनावट, बुनकर शब्दों का विकास हुआ । वस्त्र के अर्थ में बाना शब्द भी इसी कड़ी में आता है ।
मोनियर विलियम्स के अनुसार ‘वे’ धातु से ही बना है संस्कृत का वय शब्द जिसका अर्थ है वह जो बुनता है अर्थात जुलाहा, बुनकर । तन्तुवाय भी तत्सम शब्दावली में आता है जिसका अर्थ है तन्तुओं को बुनने वाला अर्थात जुलाहा । तन्तु से ही ताँत बना है जिसका मतलब होता है धागा और ताँती बुनकरों की एक जाति है । इसी तरह वय में आयु, उम्र का भाव भी है । वय की अगली कड़ी है वयस् आता है जिसका अर्थ है एक विशेष चिड़िया, कोई भी पक्षी, यौवन, आयु की कोई भी अवस्था, शारीरिक ऊर्जा, शक्ति, बल आदि । वय के जुलाहा और वयस के विशिष्ट चिड़िया वाले वाले अर्थ पर गौर करें । एक विशेष चिडिया को बया कहते हैं जो बेहद करीने और सुथरेपन के साथ तिनकों से अपना घोसला बनाती है मानो कलाकृति हो । बया को कारीगर चिड़िया अथवा जुलाहा की संज्ञा भी दी जाती है । बया, वय से ही बना है । घरोंदा किसी भी प्राणी के लिए जीवन को बचाए रखने का ठिकाना होता है । प्रत्येक को घर में ही शरण मिलती है । जीव कोख में पलता है । पैदा होने के बाद भी आश्रय में ही हम जीवन बुनते है । आयु की सार्थकता बीत जाने में नहीं, बुने जाने में है ।
वे में निहित गूँथना, बुनना, बटना जैसे भावों पर गौर करें । इससे ही बना है संस्कृत का वेन् शब्द । इसका एक अन्य रूप है वेण जिसका अर्थ है बाँस का सामान बनाने वाला कारीगर, संगीतकार । वेण से वेणी याद आती है ? वेणी अर्थात लम्बे बालों को गूँथकर बनाई गई शिखरिणी या चोटी । गूँथना भी बुनकारी है । इसी तरह बाँसो की खपच्चियों को भी गूँथकर, बुनकर डलिया, चटाई आदि बनाई जाती हैं । वंशकार जाति के लोग यह काम करते हैं । वेणु यानी बाँस, लम्बी घास की एक प्रजाति, सरकंडा । वेणु का एक अर्थ बाँसुरी भी होता है और चोटी भी । कृष्ण चोटियाँ बांधते थे इसलिए उनका नाम वेणुमाधव या वेणीमाधव भी है । इसका देशी रूप बेनीमाधव हो गया जो घटते घटते सिर्फ ‘बेनी’ रह गया और उधर माधव दुबला होकर ‘माधो’ बन गया । वेणि जहाँ चोटी है वहीं वेणी में चोटी के साथ धारा, नदी का अर्थ भी है । तीन धाराओं को त्रिवेणी कहते हैं ।
सी कड़ी में चर्चा कर लेते है वीणा शब्द की । आपटे कोश में के अनुसार वीणा का अर्थ सारंगी जैसा वाद्य, बीना, बताया गया है और इसकी व्युत्पत्ति ‘वी’ से बताई गई है । इसके अलावा इसका एक अन्य अर्थ विद्युत भी है। संस्कृत की ‘वी’ धातु में जाना, हिलना-डुलना, व्याप्त होना, पहुँचना जैसे भाव हैं। बिजली की तेज गति, चारों और व्याप्ति से भी वी में निहित अर्थ स्पष्ट है। विद्युत की व्युत्पत्ति भी वी+द्युति से बताई जाती है । ‘वी’ अर्थात व्याप्ति और द्युति यानी चमक, कांति, प्रकाश आदि । संस्कृत में वेण् या वेन् शब्द भी मिलते हैं जिनका अर्थ है जाना, हिलना-डुलना या बाजा बजाना । इसी क्रम में वेण् से बने वेण का अर्थ होता है गायक जाति का एक पुरुष । वेन में निहित एँठना, बटना जैसे भावों पर एक वाद्य के संदर्भ में विचार करने से स्पष्ट होता है कि यहाँ आशय तारों को कसने से ही है । प्रायः सभी तन्त्रीवाद्यों के तार घुण्डियों से बंधे रहते हैं जिने घुमा कर, एँठ कर तारों को कसा जाता है जिससे उनमें स्वरान्दोलन होता है ।
भारतीय भाषाओं में ‘न’ का ‘ण’ रूप भी सामान्य सी बात है । जल के अर्थ में पानी को मराठी, मालवी, राजस्थानी में पाणी कहा जाता है । इसी तरह वेन् का ही एक रूप वेण भी प्राचीनकाल में ही प्रचलित रहा होगा । वेन रूप से बीन, बीना जैसे रूप बने होंगे और वेण रूप से वीणा । मूलतः किसी ज़माने में वीणा बाँस से ही बनाई जाती रही होगी । आज भी उसमें बाँस का काफ़ी प्रयोग होता है । बाँस से वेणु अर्थात बाँसुरी भी बनती है । बाँस शब्द से ही बाँसुरी भी बना है और वेणु का अर्थ भी बाँस ही होता है । सो वेणु का एक अर्थ बाँसुरी भी हुआ । इसका रूपान्तर बीन हुआ । गौर करें बाँसुरी की तरह बीन सुषिर वाद्य है । निश्चित ही बाँस से बाँसुरी का आविष्कार आदिम समाजों में बहुत पहले हो गया था । बाँस के लम्बे पोले टुकड़े को जब तन्त्रीवाद्य का रूप दिया गया तो उसे भी इसी शृंखला में वीन्, वीण्, वीणा नाम मिला । वेणु यानी बंसी तो पहले से प्रचलित थी ही । संस्कृत धातु ‘वे’ की अर्थगर्भिता महत्वपूर्ण है जिसमें गति और बुनावट  की अर्थवत्ता है और इन दोनों का मेल ही जीवन है ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, July 12, 2012

‘मानसर’ की खोज में

Manasarovar

मा नसर का उल्लेख जायसी के पद्मावत में आता है । दरअसल यह ‘मानसरोवर’ का लोकरूप है । ‘मानसरोवर’ ऐसा शब्द है जिससे लगभग हर पढ़ा-लिखा भारतीय परिचित है । मानसरोवर सुनते ही हिमाच्छादित उपत्यका में स्थित नील-प्रशान्त झील की छवि उभरती है । तिब्बत की मानसरोवर झील और कैलाश-पर्वत एक दूसरे के पर्याय हैं । ‘मानसरोवर’ का महत्व इस बात में है कि इसे भारतीय मनीषा के हर आयाम में देखा जाता है । आध्यात्मिक-दार्शनिक अर्थों में ‘मानसर’ परम उपलब्धि का प्रतीक है । पौराणिक युग से कैलास-मानसरोवर की यात्रा का लक्ष्य, मोक्ष-प्राप्ति ही था । खुद जायसी ने ‘मानसर’ को परमतत्व बताया है । ‘मानसर’ का ‘सर’, सरोवर का पूर्वरूप है । संस्कृत में ‘सर’ का अर्थ होता है बहाव, आवेग, तरल आदि । इसकी मूल धातु ‘सृ’ है जिसमें बहाव, गति, तरलता जैसे भाव हैं । पंजाब की सतलुज और असम की ब्रह्मपुत्र नदियाँ इसी झील से निकली हैं ।
मानसर के संदर्भ में मेरे मन में दो विचार आते हैं । यह जो ‘सर’ है वह सरोवर से आ रहा है या ‘सायर’ से क्योंकि मानसरोवर का उल्लेख कई संदर्भों में मान-सायर भी हुआ है । ‘सायर’ दरअसल सागर का प्राकृत रूप है । लोकबोलियों में सागर का रूप ‘सायर’ ही मिलता है । मानसरोवर की कल्पना इतनी ख्यात है कि जिस तरह से गंगा नाम वाले कई जलस्रोत देशभर में हैं उसी तरह ‘मानसर’ भी कई हैं । सवाल है कि यह ‘मानसर’ दरअसल ‘मान-सायर’ तो नहीं ? ध्यान रहे, ‘सागर’ यूँ तो समुद्र को कहते हैं मगर जलभंडार के रूप में सामान्यतः झील, जलाशय के लिए भी हिन्दी में ‘सागर’ शब्द का प्रयोग होने लगा । जलस्रोतों के किनारे जनसमूहों के बसने से ही बस्तियों ने आकार लिया । मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक शहर सागर का नाम दरअसल एक झील की वजह से पड़ा जिसके इर्दगिर्द  इसकी बसाहट है ।
ध्यान रहे ‘मानसर’ या ‘मानसरोवर’ के नाम की दो प्रमुख झीलें प्रसिद्ध हैं । मानसर जम्मू के पास है जबकि मानसरोवर तिब्बत में है । ‘सर’ की गुत्थी सुलझाने से पहले यह जानें की ‘मानसर’ या ‘मानसरोवर’ दोनों में जो ‘मान’ है, वह कहाँ से आ रहा है । ‘मानसरोवर’ के पौराणिक महत्व ने इस शब्द को अर्थविस्तार दिया । मानसरोवर परमउपलब्धि, परमलक्ष्य का प्रतीक बना । भौतिक रूप में मानसरोवर की दैहिक यात्रा आज भी बेहद श्रमसाध्य है । प्राचीनकाल में तो और भी कष्टकर रही होगी । तीर्थयात्राएँ हमारे लिए दुखों से त्राण पाने का ज़रिया थीं । माना जाता था कि तीर्थयात्रा से कोई लौट कर नहीं आता । दूसरी ओर दैहिक यात्रा के सूक्ष्म रूप की कल्पना कर ‘मानसरोवर’ की परम उपलब्धि में मानस की कल्पना की गई । ‘मानस’ यानी मन की विवेक-बुद्धि और उससे उपजा अध्यात्म । हमारे जीवन का उद्धेश्य ही मन में विवेक को जागृत करना है । जिसे विवेकबोध हो गया, उसका जीवन सफल । इस तरह मानसरोवर को मानस + सरोवर के रूप में लिया जाने लगा ।
जो भी हो, मानसरोवर का आध्यात्मिक भाव भी मानसरोवर भौतिक यात्रा से ही उपजा है और एक झील के तौर पर इसके साथ मानस शब्द का कोई तर्क नहीं मिलता है । यूँ देखें तो जम्मू वाला ‘मानसर’ और तिब्बत वाला ‘मानसरोवर’ दोनो ही बर्फीले क्षेत्र हैं । बौद्ध साहित्य में मानसरोवर को पृथ्वी का स्वर्ग कहा गया है । भाषा वैज्ञानिक नज़रिए से हमें ‘मानसरोवर’ और ‘मानसर’ के साथ जुड़े ‘मान’ का तार्किक जवाब मिलता है । हिन्दी की तत्सम शब्दावली में बर्फ़ के लिए ‘हिम’ शब्द है । संस्कृत के ‘हिम’ में पाला, तुषार, बर्फ़ आदि भाव हैं । मूल भाव सर्दी का है । ध्यान रहे सर्दी के मौसम को ‘हेमन्त’ कहा जाता है । ‘हिम’ की कड़ी में ही हेमन् है । ‘मोनियर विलियम्स कोश के मुताबिक इसका अर्थ होता है आवेग, बुधग्रह, कांति, कनक और पानी । इसी मूल के ‘हेम’ में इन्ही तमाम भावों के साथ एक अर्थ नदी अथवा जलधारा का भी जुड़ता है । ‘हेमन्’ की कतार में ही हेमन्त भी खड़ा है जिसका अर्थ है शीतऋतु । रॉल्फ लिली टर्नर की कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज़ के मुताबिक दार्द परिवार की ही कई भाषाओं में इसके प्रतिरूप प्रमुखता से मौजूद हैं जैसे तिराही भाषा में इसका रूप ऐमन तो इसी परिवार षुमास्ती में येमन है, निंगारामी में यह ईमन्द है तो गावार-बाती और सावी में यह हेमान्द है । दार्द परिवार की प्रमुख भाषा खोवार में इसका रूप योमून है तो बाश्करीक में हामन, गौरो में यह हेवान्द है तो पंजाबी कांगड़ी में हियुन्द, हियुन्धा है और पश्चिमी पहाड़ी में इसकी अनुनासिकता गायब हो जाती है और इसकी ध्वनि सिर्फ़ ह्यूत रह जाती है ।
सी तरह संस्कृत में ‘हैम’ शब्द भी है जिसका अर्थ शीत सम्बन्धी, हिमाच्छादित है । इसका एक रूप ‘हैमन’ भी है । ‘हिम’  अर्थात बर्फ़ भी इसी शृंखला का शब्द है । विश्व की सबसे बड़ी पर्वत शृंखला का नाम हिमालय इसीलिए है क्योंकि वह बर्फ़ का ठिकाना है । यह ‘हेम’ भी ‘हिम्’ से ही आ रहा है। हेमन्त से ‘त’ का लोप होकर पहाड़ी बोलियों में हिमन्, हेमन्, हिम्ना, हिमान्, एमन, खिमान् जैसे रूप भी बनते हैं। सर्दी का, बर्फ़ीला या शीत सम्बन्धी अर्थों में इन शब्दों का प्रयोग होता है। कश्मीरी में हिमभण्डार के लिए मॉन / मोनू शब्द भी है। जाहिर है यहाँ ‘ह’ का भी लोप हो गया है । उत्तर पूर्वांचल में मॉन, मुनमुन जैसे कोमल शब्द खूब सुनाई पड़ते हैं । इनमें और हिमाचल, उत्तराखण्ड, कश्मीर क्षेत्रों में हिमन्, हेमन् का मन, मोन, मॉन नज़र आ रहा है । हिमालय, हिमाल से ही शिमला रूप है, ऐसी सम्भावना रामविलास शर्मा जता चुके हैं । मराठी में हिंवाँळ और गुजराती में हिमालु का अर्थ भी बर्फ सम्बन्धी, शीत सम्बन्धी  होता है । बर्फीले क्षेत्रों में पाया जाना वाला एक रंगबिरंगा पक्षी है जिसका नाम ‘मोनाल’ है । उत्तर-पूर्वांचल में भी एक चिड़िया का नाम ‘मुनमुन’ है । यहाँ ‘मोनाल’ पक्षी का अर्थ बर्फीला या हिम क्षेत्र का सार्थक हो रहा है । ‘मोनाल’ का आल् प्रत्यय आलय यानी आश्रय, निवास का द्योतक है । हिमालय से हिमाल या हिमाला में भी आलय ही है ।  आलय से बना ‘आल्’ प्रत्यय निश्चित ही पहाड़ी बोलियों में भी प्रचलित है । ‘हेमन’ से ‘ह’ का लोप और मन से ‘आल्’ जुड़ कर पहाड़ी और बर्फीले क्षेत्र के तीतर, मुर्गेनुमा पक्षी के लिए मोनाल नाम सार्थक है ।
हुत सम्भव है कि ‘मानसरोवर’ और ‘मानसर’ दोनो के ही साथ जो मान है वह इसी मोन से आ रहा हो । जहाँ तक सागर > सायर का प्रश्न है, ध्यान रहे कि हिमालय क्षेत्र की सारी नदियाँ बर्फीले ग्लेशियरों से निकलती हैं । ग्लेशियर यानी हिमवाह या हिमप्रवाह । गंगा का उद्गम गंगोत्री मूलतः ग्लेशियर ही है । इसमें निहित प्रवाही भाव सृ से बने सर मे निहित है । हालाँकि ‘सर’ अब ‘सरोवर’ का पर्याय हो गया है किन्तु सरोवर भी किसी न किसी जलस्रोत से बहते पानी से ही बनते हैं । अलबत्ता जलाशय के अर्थ में ‘सर’ और ‘सायर’ का प्रयोग स्थानीय प्रभाव है । जम्मू के पास की झील को कुछ लोग ‘मानसर’ कहते हैं कुछ ‘मान-सायर’ । कुल मिला कर मान में शीत या बर्फ़ का आशय है । इसका प्रमाण कुमाऊँ अंचल के प्रसिद्ध पर्यटनस्थल मुन्स्यारी में मिलता है । इसमें भी मान/मोन और सायर साफ़ नज़र आ रहा है । गौरतलब है कि इस क्षेत्र में हिमवाह भी हैं । मोन यानी हिम और सर में निहित प्रवाही भाव से यह भी स्पष्ट होता है कि इसमें हिमवाह का आशय भी रहा होगा ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, June 27, 2012

फरारी, फुर्र और फर्राटा

jb

वि भिन्न समाज-संस्कृतियों में शब्द निर्माण की प्रक्रिया न सिर्फ़ एक समान होती है बल्कि उनका विकास क्रम भी एक जैसा ही होता है । हिन्दी में भाग छूटना, निकल भागना, पलायन करना जैसे अर्थों में ‘फ़रार’ शब्द का सर्वाधिक प्रयोग भी किया जाता है । ‘फ़रार’ अपने आप में क्रिया भी है और संज्ञा भी । वैसे हिन्दी में इसका क्रियारूप ‘फ़रारी’ ज्यादा प्रचलित है । ‘फ़रार’ वह व्यक्ति है जो प्रतिबन्ध के बावजूद भाग खड़ा हुआ है । अचानक गायब हो जाने, भाग खड़ा होने के लिए हिन्दी में अन्य अभिव्यक्तियाँ भी हैं जैसे “रफ़ूचक्कर हो जाना”, “नौ-दो-ग्यारह होना” या “फ़ुर्र हो जाना” आदि । इनमें “फ़ुर्र हो जाना” बेहद सहज मुहावरा है जिसकी अभिव्यक्ति दिन भर में न जाने कितनी दफ़ा इन्ही अर्थों में होती है । कहने की ज़रूरत नहीं है कि फुर्र हो जाना इस अभिव्यक्ति का रिश्ता उड़ जाने से है । ध्यान रहे उड़ जाने का रिश्ता गायब हो जाने से है । यूँ भी चलने-दौड़ने की क्रिया की बनिस्बत उड़ना में तीव्रता का भाव है । इसलिए तेज गति वाली वस्तु निगाहों से बहुत जल्दी ओझल हो जाती है । इसे ही गायब होना कहते हैं । इत्र की शीशी से रिस कर सुगंध हवा में तैरती है । शीशी से जब सुगंध खत्म हो जाती है तो उसे इत्र का उड़ना कहा जाता है ।
फुर्र या ‘फ़रार’ जैसे शब्दों का रिश्ता मूलतः उड़ने से है । ‘फ़रार’ या ‘फ़रारी’ जैसे शब्द हिन्दी में फ़ारसी से होते हुए आए हैं । इनका मूल ठिकाना अरबी ज़बान है । ‘फ़ुर्र’ शब्द हिन्दी का देशज है या अरबी, फ़ारसी की अभिव्यक्ति है यह कहना मुश्किल है मगर इतना तय है कि फुर्र और फ़रार शब्द सेमिटिक और इंडो-ईरानी परिवारों के बीच रिश्तेदारी के पुख्ता सबूत पेश करते हैं । ‘फुर्र’ से जुड़ी शब्दावली पर गौर करें-फड़फड़ाना, फड़कना, फरफर, फरफराना, फहर-फहर, फहराना आदि । ये सभी शब्द डैनों के ज़रिये उड़ने की आवाज़ से पैदा होने का बोध कराते हैं । हिन्दी में ‘डैना’, ‘पंख’ और ‘पर’ दोनों शब्द प्रचलित हैं । ‘पंख’ हिन्दी का अपना है और ‘पर’ फ़ारसी से आया है । संस्कृत के ‘पक्ष’ से ‘पंख’ के जन्मसूत्र जुड़े हैं जिसका अर्थ है किसी वस्तु, स्थान या विचार के दो प्रमुख भाग या हिस्से । पंख का विकास पक्ष > पक्ख > पंख के क्रम में हुआ । पंख को पंजाबी में 'खंब' भी कहते हैं । गौर करें कि पंख का वर्ण विपर्यय ही खंब में हो रहा है ।
वैदिक शब्दावली के ‘पर्ण’ से फ़ारसी के पर की रिश्तेदारी है । संस्कृत के ‘पर्ण’ की धातु ‘पृ’ है जिसमें सरपास करना, आगे बढ़ जाना, दूर चले जाना या मात कर देना जैसे भाव हैं । संस्कृत में ‘प’ वर्ण अपने में उच्चता का भाव समेटे है। उड़ान का ऊँचाई से ही रिश्ता है । परम, परमात्मा जैसे शब्दों से यह जाहिर हो रहा है । पंख की उच्चता का संकेत इस बात से भी मिलता है कि सभी प्राचीन संस्कृतियों में पंखों से ही मुकुट बनाए जाते थे ।  ‘पर’ में भी यही उच्चता लक्षित हो रही है। संस्कृत की पत् धातु का अभिप्राय है उड़ना, फहराना, उड़ान आदि । पत का रिश्ता अंग्रेजी के 'फैदर' ( feather) से है जिसका अर्थ पंख होता है । द्रविड़ परिवार की कोत भाषा में पर्न या पर्नद का मतलब भी उड़ना ही है । यहाँ संस्कृत के ‘पर्ण ‘से सादृश्यता पर विचार करना चाहिए । द्रविड़ और फारसी में एक जैसा रूपांतर यह भी स्थापित करता है कि किसी ज़माने में द्रविड़ भाषाओं का प्रसार सुदूर उत्तर पश्चिम तक था । ‘पर’ से ही बना है फ़ारसी का ‘पर्चः’  जिसका अर्थ काग़ज़ का टुकड़ा या पुर्जा । इस पर्चः का उच्चारण हिन्दी में परचा या पर्चा होता है जिसका रिश्ता पर्चम / परचम से भी जुड़ रहा है जिसका अर्थ है झंडा, झंडे का कपड़ा। ‘पर्चम’ किसी भी राष्ट्र, समाज या संगठन का सर्वोच्च प्रतीक होता है । पुर्जा या काग़ज़ का टुकड़ा पर्चा कहलाता है जो इसी शब्दावली से जुड़ा है ।
रबी के ‘फ़रार’ का विकास फ़र्रा से हुआ है जिसका अर्थ है उड़ना या उड़ान । अल सईद एम बदावी की कुरानिक डिक्शनरी के मुताबिक इसकी धातु फ़े-रे-रे अर्थात (फ़-र-र) है । भाषाविज्ञानियों के मुताबिक इसका विकास सेमिटिक धातु पे-रे-रे (प-र-र) से हुआ है । प्राचीन सेमिटिक भाषा अक्कद में एक शब्द ह पररू (पर्रू) जिसमें छिटकने, दूर जाने, विभक्त होने का भाव है । इन तथ्यों के मद्देनज़र संस्कृत के ‘पृ’ , फ़ारसी के ‘पर’ और अरबी-सेमिटिक ‘फ़-र-र’ और ‘प-र-र’ समतुल्य जान पड़ते हैं । संस्कृत की ‘पृ’ धातु और सेमिटिक ‘प-र-र’ धातुओं में समानता है न सिर्फ़ ध्वनिसाम्य बल्कि अर्थसाम्य भी है । दोनों का अर्थ छिटकना, दूर जाना है । दूर जाने, छिटकने के लिए हिन्दी में “परे हटो”, “परे जाओ” कहा जाता है जिसमें उपरि वाला ‘परि’ ही नज़र आ रहा है । इसका रिश्ता परिधी वाले ‘परि’ से भी हो सकता है ।  दूसरी तरफ़ ‘प’ वर्ण में निहित उच्चता पर ध्यान दें । ‘पंख’ ऊँचाई पर ले जाते हैं । पंख के अर्थ में ‘डैना’ शब्द पर गौर करें । यह संस्कृत के उड्डीन से आर रहा है जिसमें उड़ने का भाव है । उड़ान, उड़ना, उड़ाका, उड़न, उड्डयन जैसे शब्दों के मूल में ‘उड्डीन’ ही है जिसकी धातु ‘उद्’ है और इसका प्रयोग उपसर्ग की तरह भी होता है जिसकी उपस्थिति ‘उदीयमान’, ‘उच्चाटन’, ‘उत्पात’ आदि अनेक शब्दों में नज़र आती है । ‘उद्’ में भी छिटकने, विभक्त होने, दूर जाने, ऊपर उठने का भाव है । कहने का तात्पर्य है है  कि उड़ने से जुड़े जितने भी शब्द हैं, उनमें मूल भाव छिटकने, पृथक होने का है । यह पार्थक्य धरातल से दूर जाने में प्रकट होता है ।
ड़फड़ाहट हर तरह से छिटकने-छिटकाने की क्रिया है । पंखों के गतिशील होने, धरातल से दूर हवा में उठने के लिए यह क्रिया होती है । पंख फड़फड़ाकर पक्षी खुद को सुखाते हैं अर्थात पानी को दूर छिटकाते हैं, खुद को साफ करते हैं । इस छिटकने में गति है । मूल अवस्था या बिन्दू से लगातार दूर जाने का भाव । एन्ड्रास रज्की के कोश में अरबी के ‘फ़र्राटा’ farrata शब्द का उल्लेख है (हिन्दी के फर्राटा से इसके रिश्ते पर सोचें) जिसका अर्थ है सीमा पार कर जाना, आगे बढ़ जाना । हिन्दी के फर्राटा में सरपट, बहुत शीघ्रता  जैसे भाव हैं । इसी तरह उड़ने की क्रिया और ‘फरफर’ ध्वनि के आधार पर अरबी में एक चिड़िया का नाम भी फ़ुरफ़ुर है । अल सईद एम बदावी के कोश में फ-र-र का अर्थ पलायन, स्थान छोड़ना, जल्दबाजी में होना आदि है । पलायन का यही भाव फ़रार ( फ़िरार ) में आता है जिसका मूल अरबी अर्थ है दौड़ जाना, भाग जाना, बच निकलना, छोड़ जाना, गच्चा देना या उड़ जाना आदि । हिब्रू में भी छिटकने, दूर जाने के अर्थ में प-र-र धातु ही है ।
इंडो-ईरानी शब्द सम्पदा के ‘पर्ण’ से फ़ारसी में ‘पर’ का विकास पंख के अर्थ में हुआ । यूँ संस्कृत का ‘पर्ण’ पत्ता है जिसमें छा जाने, रक्षा करने का भाव है । इसकी मूल धातु ‘पृ’ में दूर जाने, छिटकने, ऊँचे उठने, पार जाने की अर्थवत्ता है । पत्तों के ऊँचाई पर स्थित होने, हवा में फड़फड़ाने, उड़ने जैसे लक्षणों से फ़ारसी के ‘पर’ में पंख की अर्थवत्ता स्थापित होती है । सेमिटिक बाराखड़ी में ‘प’ वर्ण है जबकि अरबी में ‘प’ वर्ण नहीं है । अक्कद भाषा अरबी से भी प्राचीन है और प्राचीन सुमेरियाई सभ्यता में इसका चलन था । भाषाविज्ञानियो का स्पष्ट मत है कि प्राचीन सुमेर संस्कृति का प्राचीन भारत से गहरा सरोकार था । उड़ने, छिटकने, पलायन के अर्थ में अरबी के फरार ( फ़र्रा ) का रिश्ता एन्ड्रास रज्की सेमिटिक ‘प-र-र’ से जोड़ते हुए इसका विकास अक्कद भाषा के ‘पररू’ से बताते हैं । अरबी में ‘पर्रू’ का रूप फर्रा हुआ । संस्कृत के पृ > पर्ण का विकास फ़ारसी में ‘पर’ हुआ । समझा जा सकता है कि आर्य परिवार की ध्वनियों का प्रभाव उस दौर में आज के इराक तक रहा होगा ।  शब्दों का अध्ययन विश्व भाषाओं की अनेकता से ज्यादा उनकी एकता को पहचानने का सफ़र है ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, March 4, 2012

मोची, मोजा, विमोचन और जुराब

stock-photo-christmas-socks-41734432

प्र कृति में हर वस्तु का एक आवरण होता है और हर चीज़ का अनावरण होता ही है । आए दिन मूर्तियों के, पुस्तकों के अनावरण होते हैं । अनावरण के लिए विमोचन भी एक शब्द है जो मूलतः नई किताब की रिलीज़ के सन्दर्भ में खूब आम है । विमोचन में भी अनावरण का, लोकार्पण का भाव है । हमारी पृथ्वी के चारों और वातावरण अर्थात वायुमण्डल है । प्रायः हर खगोलपिण्ड के आसपास कोई न कोई आवरण है । चाहे वनस्पति का जन्म हो या किसी जीव का, जीवन का प्रथम स्पन्दन किसी न किसी आवरण के भीतर ही होता है । बीज एक आवरण ही है इसीलिए उसे बीजावरण कहते हैं । अंकुर फूटना दरअसल बीजावरण से मुक्ति है । भ्रूण के लिए गर्भ एक आवरण है । गर्भमुक्ति ही जन्म लेना है । शरीर का संचालन कई अवयव करते हैं । ये सभी काया में स्थित रहते हैं अर्थात काया एक आवरण है, कलेवर है । शरीर की ऊपरी परत को त्वचा कहते हैं । यह भी आवरण है । आवरण रक्षाकवच है । प्रकृति ने हर वस्तु को इसी तरह खूबसूरती से पैक कर मनुष्य के लिए भेजा है ताकि जिस दिन वह सबके सामने आए, तरोताज़ा और नई लगे । अनावरण का दिन ही लोकार्पण का दिन होता है । बाज़ार में भी हर उत्पाद पैकबंद अर्थात आवरण के भीतर होता है ।
विमोचन बना है मुच् धातु में वि उपसर्ग लगने । संस्कृत की मुच् धातु में ढीला करना, खोलना, मुक्त करना, अलग करना, छोड़ना, बाँटना, सिपुर्द करना जैसे भाव हैं । संस्कृत के वि उपसर्ग में वैसे तो निषेध का भाव है किन्तु इसके प्रयोग का दायरा विस्तृत है । वि का प्रयोग विशिष्ट, समझबूझ के साथ, भली प्रकार से, दो हिस्सों में, खोलने आदि अर्थों में भी होता है । इस तरह विमोचन का अर्थ हुआ मुक्त करना, बाहर लाना, सबके सामने लाना, अर्पण करना आदि । विमोचन का प्रयोग अब सिर्फ़ पुस्तक  को लोकार्पण के सन्दर्भ में ही होता है अन्यथा इसका प्रयोग किसी भी संज्ञा को सामने लाने के सन्दर्भ में होता है जैसे-भावविमोचन यानी अपने भीतर के भावों के सामने लाना । अश्रुविमोचन यानी आँसुओं को बाहर आने देना, शृद्धाविमोचन आदि । पुस्तक विमोचन की प्रक्रिया से भी यह स्पष्ट होता है । विमोचनकर्ता या विमोचक आवरण में लिपटी पुस्तक का अनावरण करता है और उपस्थितों को उसका दर्शन करवाता है । यूँ देखें तो किताब के विमोचन में जो खास भाव है वह है प्रकाशित पुस्तक का मुख्य अतिथि द्वारा सबसे पहले खोला जाना । गौर करें, किताब दो हिस्सों में खुलती है । उसके द्वारा पुस्तक की सामग्री को सबसे पहले देखा जाना । रचनाकार द्वारा पुस्तक-अंश का पाठन यानी कथानक को लोगों के सामने उद्घाटित करना जैसी बातें विमोचन में निहित भाव को पूर्णता प्रदान करती हैं । प्रकाशन ही उद्घाटन है । प्रकाशन यानी किसी चीज़ को उजाले में लाना यानी सबके सामने लाना ।
विघ्नहर्ता, दुखहर्ता के अर्थ में संकटमोचक शब्द का भी प्रयोग होता है । यहाँ जो मोचक है वह भी इसी मुच् से आ रहा है । भाव यही है कि भक्त को संकट से मुक्त करना । मोचन में छुटकारा, मुक्ति का भाव है अतः मोचक वह व्यक्ति है जो छुटकारा दिलाए, या मुक्ति दिलाए । मरे हुए जानवरों की खाल उतारने की क्रिया चर्म-मोचन कहलाती है । पशुओं की खाल उतारने वाले समुदाय के लिए मोची शब्द इसी मुच् से आ रहा है । जूते के लिए राजस्थानी में एक शब्द है मोजड़ी । यह दरअसल नोकदार जूती होती है । संस्कृत में मोचिका का अर्थ है एक किस्म का जूता । मोजड़ी शब्द में मुच् को पहचाना जा सकता है । वर्णक्रम में ही वर्ण आता है और ये ध्वनियाँ एक दूसरे से बदलती हैं । मोचक का एक अर्थ चमड़ा उतारनेवाला जब स्थिर हुआ तब मोच, मुच जैसे शब्द चमड़े के पादत्राण के अर्थ में रूढ़ हो गए । अवेस्ता में इसका रूप मौच होता है । पहलवी में यह मोज़ग़ या मुचक हुआ जिसका अर्थ जूता ही है । पर्शियन में इसका मुजेह , मोजाह या मोजः रूप मिलता है जिसका अर्थ होता है पैरों से ऊपर पिण्डलियों तक पहना जाने वाला एक कपड़ा । इसे पायताबा भी कहते हैं और जुराब भी । यह दिलचस्प है कि मुक्त, अनावरण, खोलना, बन्धन मुक्त करना जैसे भावों वाली मुच् धातु से बने शब्दों के रूपान्तर मोजा, मोजड़ी जैसी संज्ञाएँ बनीं जिनमें आवरण या कवर का भाव आता है ।
water-skin
मोजे के लिए जुराब शब्द का भी हिन्दी में खूब प्रयोग होता है । बरास्ता फ़ारसी होते हुए उर्दू और फिर हिन्दी में जुराब शब्द दाखिल हुआ । जुराब के सन्दर्भ में दो धारणाएँ हैं । पहले मत के मुताबिक जुराब ईरानी मूल का शब्द है । डॉ अली नूराई के फ़ारसी-अंग्रेजी कोश में दी गई धातु तालिका के मुताबिक पर्शियन धातु गुर्ब से बना है जिसका अर्थ मोजा या पायताबा होता है । डॉ मोहम्मद मोईन के फरहंग ए मोइन के हवाले से वे इसी धातु से अरबी के जौराब की व्युत्पत्ति बताते हैं । पुरानी फ़ारसी में इससे रूप गोराब था । आज की फ़ारसी में यह जुराब है । नूराई के कोश में गोराब की अर्थवत्ता की कोई व्याख्या नहीं मिलती । दूसरी व्युत्पत्ति के मुताबिक यह सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है इसकी मूल धातु ग-र-ब (g-r-b) है । डॉ मोइन के मुताबिक यह j-r-b है । अरबी में और ध्वनियाँ आपस में बदलती हैं । बेवर्ली ई क्लैरिटी की अरेबिक – इंग्लिश डिक्शनरी में ग-र-ब में नज़दीक, छुपाना, लिपटना, चुस्त जैसे भाव हैं ।
रबी में गुरुब, गौराब, गर्राब , तग़र्रब जैसे शब्द इससे बनते है जिनमें निकटता, सटना, सामीप्य जैसे भाव है । इसका एक रूप गिराब है जिसका अर्थ है मशक, चमड़े से बनी पानी की थैली । इसका एक रूप और है जिसका अर्थ है ज्राब यानी चमड़े की थैली । गौर करें कि मशक भी चमड़े की थैली ही होती है । जिस तरह मुच् धातु में मुक्त करना , छुटकारा दिलाना आदि क्रिया करने वाला व्यक्ति मोची है । अर्थात चमड़ा उतारने वाले की संज्ञा मोची है । बाद में चमड़े से बनी वस्तु की संज्ञा भी इन्हीं ध्वनियों से बनी । मोजा, मोजड़ी इसके उदारहरण हैं । कुछ वही बात इस गिराब में है । ध्यान रहे, शरीर से खाल चिपकी रहती है, सटी रहती है । खाल के भीतर तमाम अवयव छुपे रहते हैं । ग-र-ब में निहित नज़दीक, छुपाना, लिपटना, चुस्त जैसे तमाम भाव यहाँ व्यक्त हैं । सो चमड़े या खाल से बनी थैली को गिराब नाम मिला । इसका एक रूप जिराब हुआ । यह जुराब का पूर्वरूप था । जुराब की खासियत है कि वह शरीर से एकदम चिपकी रहती है । जिराब के विभिन्न रूपान्तर कई भाषाओं में भी हुए मसलन- अरबी के जौराब का एक रूप होता है गौराब । जौराब का पूर्वरूप है जिराब । अल्बानी में यह कोराप होता है तो अज़रबैजानी में कोराब, बुल्गारी में यह चोराप और और फ़ारसी में जोराब, जुराब । रोमानी में यह सिओराब है, सीरियाई में चरापा है, ताजिक में जुरोब है तो तुर्की में यह कोराप है ।
स्पष्ट है कि गिराब अगर थैली है तो मोज़ा यानी जुराब भी एक थैली है । चमड़े की थैली । चमड़े का पादत्राण से रिश्ता सदियों पुराना है । निश्चित ही पैर ढकने के चमड़े के आवरण को भी जिराब कहा गया । यह जूता था । अरबी में मूलतः शरीर की खाल को जिल्द कहते हैं मगर हिन्दी में जिल्द का रूढ़ार्थ अब आवरण हो गया है । खाल भी आवरण ही है । सो समझा जा सकता है कि जुराब मूलतः पैरों का रक्षा कवच था । बाद में इसमें मोजे की अर्थवत्ता भी जुड़ गई और तब चमड़े के स्थान पर खूबसूरत सूत और ऊन  से बुने हुए मोजे बनने लगे ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, February 19, 2012

महावत की महिमा

mahavat

ब्द ही ब्रह्म है और शब्द की सत्ता हमेशा कायम रहती है। यह बात बिलकुल सही है किन्तु शब्दों की दुनिया में भी सत्ता परिवर्तन होता है। कल तक किसी खास अर्थवत्ता को वहन करने वाले शब्द के आज प्रचलित न हो पाने के कई कारण हो सकते हैं। इसमें सबसे खास है सामाजिक परिवर्तन। निरन्तर परिवर्तनशील समाज में लोक-व्यवहार से लेकर तकनीकी प्रगति जैसे कारण प्रमुख होते हैं। तकनीक बदलने के साथ ही उससे जुड़े शब्द भी अपनी अर्थवत्ता या तो खो देते हैं अथवा नई तकनीक के सन्दर्भ में पुराने शब्द की अर्थवत्ता बदल जाती है। प्राचीन काल में मनुष्य पशुओं की पीठ पर सवारी करता था या उन पशुओं द्वारा खींचे जाने वाले वाहनों के ज़रिये यात्रा करता था। ऐसे में इन वाहन चालकों या पशुओं को निर्देशित करने वाले लोगों के लिए अलग अलग नाम होते थे जैसे रथ को चलाने वाला सारथी कहलाता था। बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी चलाने वाले को गाड़ीवान, कोचवान कहते थे। रथ चाहे चलन से बाहर हो गए, मगर सारथी शब्द ने अपनी अर्थवत्ता बदल ली और अब सारथी का अर्थ साथी, पथप्रदर्शक जैसे भावों को व्यक्त करने के लिए होने लगाया है। ड्राइवर या चालक के रूप में सारथी शब्द अब दुर्लभ है। हाथी को नियन्त्रित करने वाले को संस्कृत हिन्दी में महावत कहते हैं। किसी ज़माने में हाथी को काबू में करने का काम बेहद महत्वपूर्ण था और इसके लिए कई शब्द थे जैसे-आंकुशिक, करीपति, गजचालक, फ़ीलवान, महामात्र, गजपाल, अधिरोह आदि । अब हाथियों का प्रयोग सीमित हो जाने से ये तमाम शब्द भी बोल-व्यवहार से लापता हो गए हैं इसके बावजूद महावत शब्द हिन्दी में बना हुआ है ।
प्राचीनकाल में राजा-महाराजाओं के लिए हाथी की सवारी सबसे आलीशान होती थी। जंगल का राजा चाहे शेर हो पर वहां भी हाथी की स्वतंत्र-स्वायत्त सत्ता रही है। हाथी को हाँकने वाला, नियन्त्रित करने वाला सक्षम व्यक्ति अधिकारी का दर्ज़ा रखता था । उसे महामात्र कहते थे । किन्हीं सन्दर्भों में महामात्र को महामात्य के समकक्ष भी बताया गया है । मौर्यकाल में अमात्य मन्त्री स्तर का अधिकारी होता था । महामात्य प्रधानमन्त्री को कहते थे । मोनियर विलियम्स के कोश में महामात्र को अत्यन्त उच्च पदस्थ अधिकारी,जो प्रधानमन्त्री भी हो सकता है, बताया गया है। प्रधानमन्त्री की पत्नी को महामात्री कहा जाता था । हाथियों का व्यवस्थापक, प्रबन्धक और संरक्षक भी महामात्र कहलाता था । इसमें उन्हें हाँकने वाले सक्षम व्यक्ति का भाव भी निहित है । सामासिक पद है और महा + मात्र से मिल कर बना है । महामात्र में सर्वोच्चता का भाव है । महा अर्थात भव्य, विशाल, बड़ा, प्रधान या उच्च । मात्र शब्द परिमाणवाची है अर्थात पद, आकार, साइज का इससे बोध होता है । लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई, ऊँचाई, गहराई जैसे आयामों के परिमाप का आशय इससे प्रकट होता है । मात्र में बेजोड़, अतुलनीय, सिर्फ या बहुतों में विशिष्ट जैसा भाव भी है । मात्रा का अर्थ कोई वस्तु, तत्व या भौतिक पदार्थ भी है । कुल मिला कर संज्ञा के अर्थ में जब मात्रा से पूर्व महा उपसर्ग लगता है तो उसमें निहित सर्वोच्चता का आशय एकदम स्पष्ट है । महामात्र यानी शासन की ओर से नियुक्त सर्वोच्च अधिकारी । पुराने ज़माने में बाद में प्रशासनिक सुविधा के लिए विभिन्न विभागों के सर्वोच्च अधिकारी को महामात्र कहा जाने लगा ।
गौरतलब है कि अशोक कालीन प्रशासनिक व्यवस्था सम्बन्धी शिलालेखों में महामात्र शब्द का प्रयोग हुआ है । मूलतः महामात्र शासनाधिकारी का पद था । राजस्व, सीमांकन, धर्मशास्त्र, रनिवास आदि के प्रबन्ध-कर्म से जुड़े उच्चाधिकारियों को महामात्र कहा जाता था । पुराने ज़माने में शासन के पास हाथियों की समूची वाहिनी होती थी । सैन्यकर्म के अतिरिक्त इनसे कई तरह के काम लिए जाते थे । हाथीखाना, फीलखाना जैसे शब्दों से जाहिर है कि हाथियों को सम्भालने वाला विभाग भी अत्यंत महत्व का था । इस विभाग के प्रमुख को भी महामात्र का दर्जा मिला हुआ था । महामात्र न सिर्फ हाथियों की व्यवस्था देखता था बल्कि हाथियों पर नियन्त्रण करने में भी वह निष्णात होता था । महामात्र से महावत बनने का क्रम कुछ यूँ रहा होगा- महामात्र > महामात्त > महावत्त > महावत । संस्कृत की पृष्ठभूमि वाले कुछ अन्य शब्द भी हैं जिनका आशय महावत से है जैसे अधिरोह । हालाँकि अधिरोह शब्द में सिर्फ हाथी की सवारी जैसी कोई बात नहीं है मगर इसका अर्थ हाथी-सवार होता है । रोह यानी चढ़ना, आसीन होना । इससे में अधि उपसर्ग लगने से अधिरोह बना है । अंकुशी या अंकुसी भी ऐसा ही एक शब्द है । हाथी पर नियन्त्रण रखने के लिए उसके सिर में चुभोने वाले काँटे को अंकुश कहते हैं , अंकुशी यानी जिसके पास अंकुश हो । अंकुश के आशय से महावत के लिए एक अन्य देशी शब्द बना है गड़दार अर्थात जो गड़ाने का काम करता है, यानी महावत । आप्टेकोश में महावत के अर्थ में हास्तिकः शब्द भी मिलता है । अमरकोश में हास्तिकम् का अर्थ है हाथियों का समूह । इसी तरह महावत के लिए नागवारिकः भी शब्द भी है । हाथियों के समूह के नेता को भी यह नाम दिया जाता है । यही नहीं, किसी भी समाज का प्रमुख व्यक्ति भी नागवारिक कहला सकता है । हाथी को हाँकने वाले के लिए हस्तिचारिन शब्द सबसे सही है ।
हिन्दी में महावत के लिए फ़ीलवान और हाथीवान शब्द भी है । हाथी को फ़ारसी में फ़ीला कहा जाता है और इसमें वान प्रत्यय लगा कर फ़ीलवान संज्ञा बनी । यूँ फ़ीला शब्द भारत-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और इसका रिश्ता संस्कृत से है । राजस्थानी में फ़ीलवान का रूप पीलवाण हो जाता है । फीला शब्द का रिश्ता संस्कृत की पील् धातु से है, जिसमें एक साथ सूक्ष्मता और समष्टि दोनो का भाव है। इसका अर्थ होता है अणु या समूह। सृष्टि अणुओं का ही समूह है। चींटी सूक्ष्मतम थलचर जीव है। चींटे के लिए संस्कृत में पिपिलकः, पिलुकः जैसे शब्द हैं। बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में भी चींटी को पिपिलिका ही कहा जाता है। जो लोग पुराने अंदाज़ वाले शतरंज के शौकीन हैं वे इसके मोहरों का नाम भी जानते होंगे। इसमें हाथी को फीलः या फीला कहा जाता है। यह फारसी का शब्द है और अवेस्ता के पिलुः से बना है। संस्कृत में भी यह इसी रूप में है। इसमें अणु, कीट, हाथी, ताड़ का तना, फूल, ताड़ के वृक्षों का झुण्ड आदि अर्थ भी समाये हैं। गौर करें इन सभी अर्थों में सूक्ष्मता और समूहवाची भाव हैं। फाईलेरिया एक भीषण रोग होता है जिसमें पाँव बहुत सूज कर खम्भे जैसे कठोर हो जाते हैं। इस रोग का प्रचलित नाम है फीलपाँव जिसे हाथीपांव या शिलापद भी कहते हैं। यह फीलपाँव शब्द इसी मूल से आ रहा है। महावत को फारसी, उर्दू या हिन्दी में फीलवान भी कहते हैं।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, January 21, 2012

रैली, रेवड़ और रेड़ मारना

stock

रै ली, रेला और रेवड़ में क्या फ़र्क़ है ? मूलतः ये सभी शब्द समुच्चयवाची हैं। पतनशील राजनीति के इस दौर में मनुष्य और जानवर में ज्यादा अन्तर नहीं रह गया है । चुनावी दौर की राजनीतिक सभाओं-सम्मेलनों में श्रोताओं की भीड़ जुटाने के लिए सभी राजनीतिक दल गाँव देहात के सीधे-सादे लोगों के सामने तरह-तरह के प्रलोभन देकर (चारा डाल कर) , उन्हें हाँक कर अपने आयोजनों की सफलता का डंका पीटते हैं । राजनीतिक सभाओं के लिए आजकल रैली शब्द बहुत आम हो गया है । रैली स्त्रीवाची संज्ञा है। जब रैली से भी बड़े समूह या जमाव का आयोजन होता है तो उसे रेला कहा जाता है । आजकल मीडिया-सनसनी के दौर में हर चीज़ के आगे “महा” शब्द लगाने का चलन बढ़ा है । रेला से भी बड़े जनसमूह के लिए महारेला शब्द चल पड़ा है । ये तीनों शब्द भारोपीय भाषा परिवार के हैं और रेला और रेवड़ में तो क़रीबी रिश्तेदारी भी है। रैली शब्द में मूलतः कतारबद्ध, अनुशासित लोगों का भाव है वहीं रेला में भी समूह का भाव है मगर इसमें अनुशासन का अभाव है । रेला में धक्कम-धक्का, भीड़-भड़क्का वाला भाव है। रैली या रेला जहाँ मनुष्यों के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है वहीं रेवड़ समूहवाची होते हुए भी सिर्फ़ मवेशियों के जत्थे के लिए प्रयुक्त होता है । रेवड़ का मूलार्थ है मवेशियों की लम्बी कतार ।
बसे पहले रैली की बात । रैली शब्द आज चाहे हिन्दी का जाना-पहचाना और बहुप्रयुक्त शब्द है मगर यह अंग्रेजी से हिन्दी में आया है । रैली का अर्थ है किसी खास उद्धेश्य के लिए मनुष्यों का एक स्थान पर इकट्ठा होना या एक जगह से दूसरी जगह जाना । अमेरिकन हेरिटेज डिक्शनरी के मुताबिक अंग्रेजी का रैली शब्द प्राचीन फ्रैंच के रैलियर आ रहा है जो दो शब्दों re- + alier से मिल कर बना है। अंग्रेजी का re- प्रसिद्ध उपसर्ग है जिसमें फिर से, दोबारा जैसे भाव है । रैलियर के दूसरे पद alier में एकत्र होने का भाव है। प्रसिद्ध जर्मन भाषाविज्ञानी जूलियस पकोर्नी के मुताबिक प्रोटो भारोपीय भाषा परिवार के leig- शब्द से एलियर बना है जिसमें संगठित करना, समूह बनाना, जकड़ना, बान्धना जैसे भाव हैं। अंग्रेजी के कई शब्द इस धातु से बने है जिनमें से कुछ हिन्दी में भी प्रचलित हैं जैसे ऐली / ऐलाई / ऐलाइज़ यानी मित्र, संगी, साथी, मित्रपक्ष, मित्र राष्ट्र, सहयोगी आदि। मिश्रधातु को अंग्रेजी में ऐलॉय कहते हैं, जो इसी मूल से आ रहा है । मिलाने, संगठित होने और प्रकारान्तर से समूवाची संज्ञा का

crowdरेड़ मारना- हिन्दी का एक आम मुहावरा है रेड़ मारना । रेड़ मारना का सामान्य अर्थ है किसी व्यवस्था या वस्तु को बिगाड़ देना, उसका बिगड़ जाना। किसी चीज़ को सही ढंग से प्रयोग नहीं करना। किसी व्यवस्था में अनावश्यक छेड़छाड़ करते हुए उसके मूल स्वरूप को बिगाड़ देना जैसी बातें रेड़ मारना, रेड़ करना या रेड़ पीटना जैसे मुहावरों में व्यक्त होती है। रेल के रेड़ रूप के सन्दर्भ में इसमें निहित धकियाने का भाव रेड़ मारना मुहावरे में गौरतलब है। भाव यही है कि किसी चीज़ के मूल स्वभाव के विपरीत उसके साथ की जाने वाली जोर-जबर्दस्ती या छेड़छाड़ ही रेड़ मारना है। भीड़ के मूल चरित्र यानी अस्तव्यस्तता, अव्यवस्था की नुमाइंदगी करने वाला रेड़ शब्द उसी रेल शब्द से निकला है जिससे भीड़ के अर्थ में रेला शब्द जन्मा है।

भाव यहाँ साफ़ नज़र आ रहा है। संघ, महासंघ, सभा, संघठन, दल, पार्टी, टीम, समूह आदि के अर्थ में लीग league शब्द हिन्दी में खूब जाना-पहचाना है और लगभग हिन्दी-उर्दू का ही जान पडता है । हिन्दी में लीग शब्द मुस्लिम लीग के सन्दर्भ में या खेल की टीमों के सन्दर्भ में इस्तेमाल होता है। लीग में भी मूलतः एक दूसरे के साथ आना, बराबरी से ले जाना, साथ बैठना जैसे भाव हैं। इसके अलावा रिलीज़न जैसा शब्द भी इसी मूल से आ रहा है। धार्मिक, सामाजिक या नैतिक आधार पर बाध्य करने के लिए अंग्रेजी में ओब्लाइज़ शब्द है। हिन्दी इसका प्रयोग अहसान जताने के अर्थ में खूब होता है। यह भी इसी मूल का है ।
ब बात हिन्दी के रेला, महारेला की । हिन्दी के विभिन्न शब्दकोशों में रेला देशज शब्द समूहवाची है। रेला का सम्बन्ध रेल से है जिसके सामासिक रूपों रेल-पेल, रेलमपेल, रेल-ठेल से हिन्दी समाज बखूबी वाकिफ़ है। हिन्दी के रेल शब्द में बहाव या प्रवाह का आशय निहित है। रेल-पेल या रेलमपेल जैसे शब्दों में ऐसे जन-जमाव या भीड़-भड़क्के का भाव है जहाँ लोग एक दूसरे को ठेल रहे हों। रेला शब्द में भी प्रवाह, धारा या बहाव का भाव है। पानी का रेला यानी प्रचण्ड आवेग के साथ गतिमान जलराशि। लोगों का रेला यानी आगे बढ़ता जन समूह। रेला शब्द की व्युत्पत्ति राल्फ़ लिली टर्नर संस्कृत के रय से मानते हैं जिसका अर्थ है तेज बहाव, तेज गति, द्रुतगामी, शीघ्रता आदि। रय बना है से। देवनागरी का अक्षर दरअसल संस्कृत भाषा का एक मूल शब्द भी है जिसका अर्थ है जाना, पाना। जाहिर है किसी मार्ग पर चलकर कुछ पाने का भाव इसमें समाहित है। इसी तरह के मायने गति या वेग से चलना है जाहिर है मार्ग या राह का अर्थ भी इसमें छुपा है। की महिमा से कई इंडो यूरोपीय भाषाओं जैसे हिन्दी , उर्दू, फारसी अंग्रेजी, जर्मन वगैरह में दर्जनों ऐसे शब्दों का निर्माण हुआ जिन्हें बोलचाल की भाषा में रोजाना इस्तेमाल किया जाता है।
में निहित आगे बढ़ने का भाव ही फ़ारसी के रौ शब्द में भी झलक रहा है। फ़ारसी का रौ धुन, लगन, गति, प्रवाह या धारा का सूचक है। अपनी ही रौ में लगे रहना जैसे वाक्य से इसका आशय स्पष्ट है। सिन्धी में इसका रूप रौ / राऊ है तो हिन्दी में यह रौ ही है। मैथिली में यह रेड़ है जिसका अर्थ है धक्का देना। गुजराती में रेड़वु है जिसका अर्थ है बाढ़, तेज धार आदि। सिन्धी में एक रूप रेलो है तो नेपाली में यह रेलणु है। इसी कड़ी में आता है रेवड़ शब्द जिसका अर्थ है मवेशियों का समूह। इसमें पशुओं का कतारबद्ध आगे गति करने का भाव है। जॉन प्लैट के हिन्दुस्तानी, उर्दू, इंग्लिश कोश के मुताबिक यह संस्कृत की रेव् धातु से आ रहा है। यह भी से सम्बन्धित है। रेव् में कतार, गति, जाने का भाव है साथ ही इसमें छलांग लगाने, उछलने कूदने के अर्थ भी निहित हैं। रेवड़ के परिप्रेक्ष्य में ये सभी अर्थछटाएँ तार्किक हैं। रेला और रेवड़ में धकेलने का का भाव भी है। रेले में लोग एक दूसरे को धकेलते हैं और रेवड़ में पशु धक्कामुक्की करते हुए आगे बढ़ते हैं। आज की चुनावी राजनीति भी विभिन्न दलों का महारेला या महारेवड़ हैं जहाँ लोकतन्त्र के नाम पर एक दूसरे को धकियाते हुए सब आगे बढ़ रहे हैं।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


Blog Widget by LinkWithin