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Saturday, February 4, 2017

चुभने-चुभाने की बातें

क्षुब्ध, विक्षोभ जैसे शब्दों का बुनियादी अर्थ है विदीर्ण,असन्तोष आदि।pain-body-mind

भी काँटे ‘चुभ’ जाते हैं कभी बातें चुभती हैं। चुभ / चुभना / चुभाना हिन्दी में सर्वाधिक प्रयुक्त क्रिया है। हिन्दी शब्दसागर इसे अनुकरणात्मक शब्द बताता है जो अजीब लगता है। अनुकरणात्मक शब्द वह है जो ध्वनि साम्य के आधार पर बनता है जैसे रेलगाड़ी के लिए छुकछुक गाड़ी। हिनहिनाना, टनटनाना, मिनमिनाना जैसे अनेक शब्द हमारे आसपास है। अब सोचें कि चुभ, चुभना को किस तरह से अनुकरणात्मक शब्द माना जाए ! इसी कड़ी के दो और शब्द है खुभ / खुभना या खुप / खुपना जिसे समझे बिना चुभना की जन्मकुण्डली नहीं समझी जा सकती।
मेरे विचार में चुभना संस्कृत की ‘क्षुभ्’ क्रिया से आ रहा है जिससे क्षोभ, विक्षोभ बना है। क्षुब्ध, विक्षुब्ध, क्षोभ, विक्षोभ जैसे शब्दों का बुनियादी अर्थ है विदीर्ण, चीर, दबाव, धक्का, भयभीत, कम्पन, आन्दोलन, बखेड़ा, असन्तोष, गड़बड़ी, कोप आदि। मगर रूढ़ अर्थों में हिन्दी में अब क्षोभ या क्षुब्ध का प्रयोग ज्यादातर नाराज़गी, कोप, गुस्सा के अर्थ में ही होता है और उक्त सारे भाव विक्षोभ से व्यक्त होते हैं। गौर करें मौसमी सूचनाओं में अक्सर ‘पश्चिमी विक्षोभ’ टर्म का प्रयोग होता है जो दरअसल वेस्टर्न डिस्स्टर्बेंस का अनुवाद है। इसका अभिप्राय समन्दर पर या ऊपरी आसमान में हवाओं के ऐसे उपद्रव से है जिसकी वजह से कहीं बवण्डर या चक्रवात बनते हैं तो कहीं हवा अचानक शान्त हो जाती है जिसे कम दबाव क्षेत्र भी कहते हैं।
ख़ैर, बात चुभने-चुभाने की हो रही थी। गौर करें चुभना किसी तीक्ष्ण वस्तु का भीतर घुसना है। इसका भावार्थ भीतर की हलचल, मन्थन, हृदय की चोट, दिल की उमड़-घुमड़, किसी बात का घर कर जाना आदि है। क्षुभ् क्रिया में यही सारी बातें शामिल हैं। गौर करें विदीर्ण में दो हिस्से होने, चीर लगने का भाव है। दो हिस्सों में बाँटे बिना कोई चीज़ भीतर जा नहीं सकती। प्रत्येक आलोड़न, आन्दोलन, मन्थन, हलचल का कोई न कोई केन्द्र होता है जो इसे धारदार बनाता चलता है। यही धँसना, गड़ना,चुभना है। हिन्दी की प्रकृति है ‘क्ष’ का ‘छ’ और ‘ख’ में बदलना जैसे अक्षर से ‘अच्छर’ और ‘अक्खर’ (आखर, अक्खड़ जैसे भी) जैसे रूप भी बनते हैं। पूर्वी बोलियों में ‘क्षुब्ध’ को ‘छुब्ध’ भी कहा जाता है। इसी तरह ‘क्षुब्ध’ से ‘खुब्ध’ भी बनता है। गौर करें क्षुब्ध से चुभ बनने में क्ष > छ > च के क्रम में ध्वनि परिवर्तन हो रहा है जबकि क्षुब्ध से खुभ बनते हुए क्ष > ख के क्रम में परिवर्तन हो रहा है।
‘खुभना’ का अर्थ भी चुभना, गड़ना या धँसना ही है। कृ.पा. कुलकर्णी भी मराठी खुपणे जिसका अर्थ भीतर घुसकर कष्ट देना, चीरना, छेद करना आदि है, का मूल क्षुभ् से ही मानते हैं। इसका प्राकृत रूप खुप्प, खुप्पई है। सिन्धी में खुपणु, गुजराती में खुपवुँ, मराठी में खुपणे अथवा खोंपा, खोंपी जैसे शब्द इसी क्षुभ् मूल से व्युत्पन्न है। इसी कड़ी में ऊभचूभ पर भी विचार कर लें। कुछ विद्वान मानते हैं कि ऊभ के अनुकरण पर चूभ बना है, पर ऐसा नहीं है। अलबत्ता ऊभ की तर्ज़ पर चुभ का ह्रस्व ज़रूर दीर्घ होकर चूभ हो जाता है। ऊभचूभ का अर्थ होता है आस-निरास की स्थिति, डावाँडोल होना, आन्तरिक हलचल, ऊपर-नीचे होना, डूबना-उतराना आदि।
हिन्दी ‘ऊभ’ का अर्थ है ऊपर आना, उभरना। चूभ और चूभना पर तो ऊपर पर्याप्त बात हो चुकी है। मुख्य बात यह कि अनुकरण वाले शब्द की अपनी स्वतन्त्रप्रकृति नहीं होती। मुख्य पद के जोड़ का पद रच लिया जाता है। उसका कोई अर्थ नहीं होता। ऊभचूभ में जो चूभ हो वह अनुकरण नहीं बल्कि ऊभ का विलोम है। उसकी स्वतन्त्र अर्थवत्ता है। ऊभ का रिश्ता उद्भव से है जिसमें उगने, ऊपर आने का भाव है। उद् यानी ऊपर उठना भव यानी होना। प्राकृत का 'उब्भ' इसी कड़ी का है। उब्भ का ही विकास ऊभ है। उभरना, उभार भी इसी कड़ी में आते हैं।
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Friday, May 24, 2013

गाछ और पेड़

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पे ड़ के अर्थ में पूर्वी भारतीय बोलियों में ‘गाछ’ शब्द बहुत आम है। बांग्ला में भी ‘गाछ’ का अर्थ वृक्ष ही है। पूर्वी बोलियों में ‘गाछी’ शब्द का अभिप्राय वृक्षवाटिका भी होता है और आम्रकुंज भी। खासतौर पर आम, कटहल, पीपल जैसे पेड़ों के समूह के लिए इस शब्द का प्रयोग होता है। रतीनाथ की चाची उपन्यास में बाबा नागार्जुन ने बीजू आमों के बगीचे को गाछी कहा है। ‘बीजू’ यानी आम का वह पेड़ जिसे बीज बो कर लगाया गया हो। ‘कलमी’ आमों का बगीचा कलमी बाग कहलाता है। ‘गाछी’ का अर्थ छोटा पेड़ या पौधा भी होता है। इसी तरह ‘बाड़ी’ यानी छोटे बगीचे के लिए भी गाछी का प्रयोग देखा जाता है। कहीं कहीं गाछी और भी लघुता के चलते ‘गछिया’ हो जाती है। हिन्दी शब्दसागर में गाछ शब्द की प्रविष्टि में- “खजूर की नरम कोंपल जिसे लोग पेड़ कट जाने पर सुखाकर रख छोड़ते हैं और तरकारी के काम में लाते हैं । बोरा जो बैल आदि पशुओं की पीठ पर बोझ लादने के लिये रखा जाता है।” वैसे हिन्दी में पेड़ के लिए कई शब्द हैं जैसे अग, अगम, विटप, वृक्ष, द्रुम, अद्रि, कुट, जर्ण, झाड़, तरु, तरुवर, दरख़्त, पादप, भूजात या कुठारू आदि।
वृक्ष शब्द से कुछ नए नाम भी जन्मे हैं। वृक्ष से ‘व’ का लोप हुआ और रह गया ‘रूक्ष’। अब रूक्ष से मालवी-राजस्थानी में रूँख, रूँखड़ा जैसे कुछ नए नाम भी चल पड़े। इसी तरह वृक्ष से बिरछ, बिरिख या बिरिछ जैसे नाम भी चलन में हैं और लालित्यपूर्ण लेखन या देशी तड़का लगाने के लिए इनका प्रयोग सृजनधर्मी करते रहते हैं। वैसे वृक्ष के लिए ‘पेड़’ शब्द सर्वाधिक प्रचलित है। इसकी व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों में दो तरह के मत हैं। कुछ लोगों का मानना है कि पेड़ का जन्म प्राकृत के ‘पट्टी’ की कोख से हुआ है। ‘पट्टी’ के मूल में ‘पत्री’ है जिसका रिश्ता संस्कृत के ‘पत्र’ से है। पत्र यानी पत्ता। जॉन प्लैट्स इसी मत के हैं। इसके विपरीत कुछ विद्वानों का मानना है कि पेड़ दरअसल ‘पिण्ड’ से आ रहा है। पिण्ड से पेड़ के उपजने की बात तार्किक भी है क्योंकि संस्कृत वाङ्मय के अनेक संदर्भों में पिण्ड का आशय वृक्ष से जुड़ता रहा है। कई तरह के वृक्षों के साथ ‘पिण्ड’ शब्द प्रत्यय या उपसर्ग की तरह लगा दिखाई देता है जिसमें ‘पिण्ड’ का अर्थ वृक्ष ही है जैसे पिण्ड खजूर। पिण्ड शब्द का अर्थ ताड़ जाति का वृक्ष, अशोक वृक्ष आदि भी है। इसी तरह आयुर्वैदिक गुणों वाले बेर जाति के एक कँटीले वृक्ष विकंकत का नाम पिण्डारा है जिसमें पिण्ड साफ़ नज़र आ रहा है। पिण्ड से पेंड और पेड़ का रूपान्तर होता चला गया। इसके विपरीत पत्र से पेड़ के रूपान्तर की कल्पना नहीं की जा सकती।
गाछ की बात। ‘गाछ’ अर्थात वृक्ष के मूल में संस्कृत शब्द ‘गच्छ’ है जिसका अर्थ है जाना, चलना, बढ़ना, गति करना। बतौर वृक्ष, गच्छ में लगातार बढ़ना, गति करना, वृद्धि करना जैसे भाव है। यूँ देखा जाए तो गति न करना भी वृक्ष की खासियत है और इस वजह से ही ‘अगम’ या ‘अग’ अर्थात जो चलते-फिरते नहीं, जैसे नाम भी उसे मिले हैं। यह दिलचस्प है कि निरन्तर ऊर्ध्वाधर गति और वर्ष में कई रूप बदलने वाले अनूठे-अपूर्व गुण के चलते ही एक ही स्थान पर बने रहने के बावजूद पेड़ों में लगातार गति करने का लक्षण भी देखा गया और इसीलिए उसे ‘गच्छ’ कहा गया और फिर उससे गाछ, गाछी जैसे शब्द बने हैं। पेड़ की व्युत्पत्ति पिण्ड से होने का एक मज़बूत आधार ‘गच्छ’ से बने एक समास में छुपा है।
गौतम बुद्ध के जीवन पर आधारित प्रख्यात बौद्ध ग्रन्थ महावस्तु में ‘गच्छ-पिण्ड’ शब्द आया है। मूलतः यह समास है। डॉ सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या इसे विचित्र समास मानते हुए इसके लिए अनुवादात्मक समास पद निर्धारित करते हैं। वैसे यह द्वन्द्व समास का उदाहरण है। ‘गच्छ’ यानी पेड़, पौधा आदि। गच्छ में निहित बढ़ने के भाव से गच्छ में वृक्ष का संकेत भी शामिल हुआ जिससे गाछ, गाछी आदि बने। पिण्ड किसी ढेर, अचल, ठोस, घन जैसा पदार्थ ही पिण्ड है। इसी तरह बढ़ने के अर्थ से ही गच्छ में परिवार, कुल या कुटुम्ब का भाव भी आया। इसी तरह पिण्ड में भी परिवार या कुल का भाव है। पश्चिमोत्तर भारत की बोलियों में मनुष्यों के आबाद समूह को पिण्ड भी कहा जाता है। गाँव के अर्थ में भी पिण्ड का प्रयोग होता है। अब जब पिण्ड का अर्थ भी वृक्ष है और गच्छ में भी पेड़ का ही भाव है तब ‘गच्छ-पिण्ड’ यानी ‘पेड़-पेड़’ जैसे समास से क्या अर्थसिद्धि हो सकती है? ज़ाहिर है जिस तरह ‘अच्छा-भला’ ‘ऋषि-मुनि’, ‘भाई-बंध’ या ‘कंकर-पत्थर’ आदि द्वद्व समास के उदाहरण हैं वैसा ही ‘गच्छ-पिण्ड’ के साथ भी है। मगर बात इतनी आसान नहीं है।
मेरे विचार में ‘गच्छ’ में वृद्धि का जो भाव है उससे ही ‘गच्छ-पिण्ड’ की अलग अर्थवत्ता स्थापित होती है। कुल, परिवार का महत्व उसके बढ़ते जाने के गुण से ही है। बाँस शब्द वंश से बना है। पूर्ववैदिक युग में वंश शब्द का अर्थ बांस ही रहा होगा। प्राचीन समाज में लक्षणों के आधार पर ही भाषा में अर्थवत्ता विकसित होती चली गई। स्वतः फलने फूलने के बाँस के नैसर्गिक गुणों ने वंश शब्द को और भी प्रभावी बना दिया और एक वनस्पति की वंश-परंपरा ने मनुष्यों के कुल, कुटुंब से रिश्तेदारी स्थापित कर ली। सो ‘गच्छ’ में निहित परिवार, कुल, कुटुम्ब के अर्थ में ही अगर वृद्धि का अर्थ वंश-परम्परा से लगाया जाए तो ‘गच्छ-पिण्ड’ का सीधा सा अर्थ वंश-वृक्ष निकलता है। बौद्धग्रन्थ महावस्तुअवदानम् में बुद्ध के जातक रूपों का उल्लेख है। स्पष्ट है कि यहाँ गच्छ-पिण्ड से तात्पर्य वंश-वृक्ष से ही होगा।

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Sunday, April 21, 2013

कल-कल की शब्दावली

भा षा का विकास प्राकृतिक ध्वनियों का अनुकरण करने से हुआ है। पानी के बहाव का संकेत ‘कल-कल’ ध्वनि से मिलता है। इस ‘कल’ के आधार पर देखते हैं कि हमारी भाषाओं को कितने शब्द मिले हैं। कल् की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। नदी-झरने की कल-कल और भीड़ के कोलाहल में यही कल ध्वनि सुनाई पड़ रही है। पक्षियों की चहचह और कुहुक के लिए प्रचिलत कलरव का अर्थ भी कल ध्वनि (रव) ही है। हिन्दी में गला, गली, खर्राटा, खल्ला, गरियाना, गुर्राना, कुल्ला, कल्ला, गाल आदि और अंग्रेजी का कॉल, कैलेंडर जैसे अनेक शब्द इसी कल की शृंखला से बंधे हुए हैं। चलिए, पहचानते हैं इन्हें।
प्राचीन रोम में पुरोहित नए मास की जोर-शोर से घोषणा करते थे इसे calare कहा जाता था। अंग्रेजी का call भी इससे ही बना है। रोमन में calare का अर्थ होता है पुकारना या मुनादी करना। कैलेयर से बने कैलेंडे का मतलब होता है माह का पहला दिन। माह-तालिका के लिए कैलेंडर के मूल में भी यही कैलेयर है। भाषा विज्ञान के नजरिये से calare का जन्म संस्कृत के कल् या इंडो-यूरोपीय मूल के गल यानी gal से माना जाता है। इन दोनों ही शब्दों का मतलब होता है कहना या शोर मचाना, जानना-समझना या सोचना-विचारना।
ल-कल में ध्वनिवाची संकेत से पानी के बहाव का अर्थ तय हुआ मगर ध्वनिवाचक अर्थ भी बरक़रार रहा। बहाव के अर्थ में बरसाती नाले को खल्ला / खाला कहते हैं। यह स्खल से आ रहा है जिसमें गिरने, फिसलने, बहने, टपकने, नीचे आने, निम्नता जैसे भाव हैं। ज़ाहिर है कल का अगला रूप ही स्खल हुआ जिससे नाले के अर्थ में खल्ला बना। कल का ही अगला रूप गल होता है। ज़रा सोचे पंजाबी के गल पर जिसका मतलब भी कही गई बात ही होता है। साफ़ है कि अंग्रेजी का कॉल, संस्कृत का कल् और पंजाबी का गल एक ही है।
ल् का विकास गल् है जिसका अर्थ है टपकना, चुआना, रिसना, पिघलना आदि। यह कल के बहाववाची भावों का विस्तार है। गौर करें इन सब क्रियाओं पर जो जाहिर करती हैं कि कहीं कुछ खत्म हो रहा है, नष्ट हो रहा है। यह स्पष्ट होता है इसके एक अन्य अर्थ से जिसमें अन्तर्धान होना, गुजर जाना, ओझल हो जाना या हट जाना जैसे भाव हैं। गलन, गलना जैसे शब्दों से यह उजागर होता है। कोई वस्तु अनंत काल तक रिसती नहीं रह सकती। स्रोत कभी तो सूखेगा अर्थात वहाँ जो पदार्थ है वह अंतर्धान होगा। गल् धातु से ही बना है गला जिसका मतलब होता है कंठ, ग्रीवा, गर्दन आदि। ध्यान रहे, गले से गुज़रकर खाद्य पदार्थ अंतर्धान हो जाता है।
ल् से गला बना है और गली भी। निगलना शब्द भी इसी मूल से बना है। गले की आकृति पर ध्यान दें। यह एक अत्यधिक पतला, सँकरा, संकुचित रास्ता होता है। गली का भाव यहीं से उभर रहा है। कण्ठनाल की तरह सँकरा रास्ता ही गली है। गली से ही बना है गलियारा जिसमें भी तंग, संकरे रास्ते का भाव है। गल् में निहित गलन, रिसन के भाव का अंतर्धान होने के अर्थ में प्रकटीकरण अद्भुत है। कुछ विद्वान गलियारे की तुलना अंग्रेजी शब्द गैलरी gallery से करते हैं। यूँ गुज़रने और प्रवाही अर्थ में भी सँकरे रास्ते के तौर पर कल, गल से होते हुए गला और गली के विकास को समझा जा सकता है।
गौर करें सुबह सोकर उठने के बाद मुँह में पानी भर कर गालों की पेशियों को ज़ोरदार हरक़त देने से ताज़गी मिलती है। इसे कुल्ला करना कहते हैं। यह कुल्ला मूलतः ध्वनि अनुकरण से बना शब्द है और इसमें वही कल-कल ध्वनि है जो पत्थरों से टकराते पानी में होती है। वैसे कुल्ला का मूल संस्कृत के कवल से माना जाता है। हिन्दी में जो गाल है वह संस्कृत के गल्ल से आ रहा है। फ़ारसी में गल्ल से कल्ला बनता है जिसका प्रयोग हिन्दी में भी होता है जैसे कल्ले में पान दबाना यानी मुँह में पान रखना। गल्ल और कल्ल की समानता गौरतलब है। गल्ल से हिन्दी में गाल बनता है और फ़ारसी में कल्ला। मगर दोनों ही भाषाओं में कुल्ला का अर्थ गालों में पानी भरकर उसमें खलबली पैदा करना ही है।
ताज़गी के लिए कुल्ला के अलवा गरारा भी किया जाता है। यह संस्कृत के गर्गर (गर-गर) से आ रहा है। कल कल का ही विकास गर गर है। आमतौर पर गर गर ध्वनि गले से अथवा नाक से निकलती है। इस ध्वनि के लिए नाक या गले में नमी होना भी जरूरी है। क वर्णक्रम की ध्वनियाँ आमतौर पर एक दूसरे से बदलती हैं। नींद में मुँह से निकलनेवाली आवाजों को खर्राटा कहा जाता है। इसकी तुलना गर्गर से करना आसान है। यहाँ ध्वनि में तब्दील हो रही है। ख, क ग कण्ठ्य ध्वनियाँ है मगर इनमें भी संघर्षी ध्वनि है और बिना प्रयास सिर्फ निश्वास के जरिये बन रही है। सो खर्राटा शब्द भी इसी कड़ी से जुड़ रहा है। हाँ, गुर्राने गो भी न भूल जाएँ। 
अंग्रेजी के गार्गल gargle शब्द का प्रयोग भी शहरी क्षेत्रों में आमतौर पर होने लगा है। इसकी आमद मध्यकालीन फ्रैंच भाषा के gargouiller मानी जाती है जो प्राचीन फ्रैंच के gargouille से जन्मा है जिसमें गले में पानी के घर्षण और मंथन से निकलने वाली ध्वनि का भाव निहित है। इस शब्द का जन्म गार्ग garg- से हुआ है जिसमें गले से निकलने वाली आवाज का भाव है। इसकी संस्कृत के गर्ग (रः) से समानता गौरतलब है। गार्गल शब्द बना है garg- (गार्ग) + goule (गॉल) से। ध्यान रहे पुरानी फ्रैंच का goule शब्द लैटिन के गुला gula से बना है जिसका अर्थ है गला या कण्ठ। लैटिन भारोपीय भाषा परिवार से जुड़ी है। लैटिन के गुला और हिन्दी के गला की समानता देखें।
पशब्द, निंदासूचक या फूहड़ बात के लिए हिन्दी उर्दू में गाली शब्द है। प्रायः कोशों में इसका मूल संस्कृत का गालि बताया गया है। ध्यान रहे कल् या गल् में कुछ कहने का भाव है प्रमुख है। कल्-गल् की विकास यात्रा में अपशब्द के लिए गालि का विकास भी इसी गल् से हुआ। गल् यानी ध्वनि। कहना। गाल यानी वह अंग जहाँ जीभ व अन्य उपांगों से ध्वनि पैदा होती है। गला यानी वह महत्वपूर्ण अंग जहाँ से ध्वनि पैदा होती है। गुलगपाड़ा, शोरगुल, कोलाहल, कल-कल, कॉल, गल, कलरव, गर-गर, गॉर्गल जैसे शब्दों में कहना, ध्वनि करना ही महत्वपूर्ण है। गाली का एक अन्य रूप गारी भी होता है। उलाहना, भर्त्सना, धिक्कार या झिड़कने को गरियाना भी कहते हैं। किसी को दुर्वचन कहने, लताड़ने, फटकारने के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है। जॉन प्लैट्स के कोश में गाली की व्युत्पत्ति प्राकृत के गरिहा से बताई गई है। संस्कृत में इसका मूल गर्ह् है जिसका अर्थ भर्त्सना या धिक्कार ही है। गर्ह् के मूल में भी गर् ध्वनि को पहचाना जा सकता है।
गाली बकने की क्रिया के लिए गाली-गलौज शब्द भी है। इसमें गलौज ध्वनि अनुकरण से बना है। गलौज, गलौच, गलोच में क्या सही है, क्या ग़लत इसके फेर में नहीं पड़ना चाहिए। वैसे हिन्दी कोशों में गलौज को ही सही बताया गया है। चूँकि ध्वनि अनुकरण का मामला है इसलिए अलग अलग क्षेत्रों में और का फ़र्क़ हो सकता है।  इसी कड़ी में गाली-गुफ्तार पर विचार करें। गुफ्तार मुख-सुख से नहीं आया है मगर गाली-गुफ्तार पद का प्रयोग हिन्दी में गाली-गुफ्ता की तरह होता है। अनजाने में गालीगुप्ता भी देखा जाता है।

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Sunday, March 31, 2013

हथियारों के साथ ‘पंचहत्यारी’

‘पंचहत्यारी’ शिवाजी की सैन्य शब्दावली का एक शब्द है जिससे ऐसा जान पड़ता है मानों इसका रिश्ता पाँच जनों की हत्या करने वाली से हो। दरअसल यह एक विशेषण, पद या उपाधि है जिसका अर्थ है बंदूक, भाला, ढाल, तलवार और तीर-कमान से सज्जित सैनिक या शिकारी पशु। यहाँ अभिप्राय मुख समेत चारों पंजों के ज़रिये शिकार को चीर-फाड़ करने से है। पंच से तो पाँच स्पष्ट है, हत्यारी क्या है ? दरअसल मराठी में हथियार को हत्यार ही लिखते और बोलते हैं। ‘पंचहत्यार’ का तात्पर्य पाँच हथियारों से है। हिन्दी में ‘हत्यार’ का आशय ‘हत्यारा’ से है और हत्यारी यानी हत्या करने वाली स्त्री।
ऐसे ही बनती है। मराठी में हथियार की 'थ' ध्वनि से 'ह' का लोप होकर 'त' शेष रहा। मध्य वर्ण 'य' चूँकि अन्तस्थ व्यंजन है इसलिए 'त' में निहित 'इ' स्वर य से जुड़ गया और 'त' का बर्ताव अर्धव्यंजन की तरह होने से हथियार का देशी रूप ‘हत्यार’ हुआ। उधर हिन्दी का ‘हत्यार’ दरअसल ‘हत्यारा’ से बन रहा है। इसके मूल में ‘हत्या’ है। जिसका अर्थ किसी के प्राण लेना है। संस्कृत के हत से हत्या का रिश्ता जोड़ा जाता है। वैसे वैदिकी में ‘हथ’ शब्द भी है जिसका अर्थ है मारना, जान लेना, धकेलना, वार करना आदि। इस हथ से साबित होता है कि वैदिक संस्कृत में भी हस्त से ‘हथ’ रूप बन चुका था जिसमें हाथ से सम्बन्धित का भाव था। गौर करें हथियार का रिश्ता दरअसल ‘हाथ’ से नज़र आता है। प्राकृत में ‘हत्थ’ शब्द का अर्थ हाथ है। ‘हत्थ’ का संस्कृत या वैदिक रूप ‘हस्त’ है। ये दोनों शब्द हिन्दी के हाथ के पुरखे हैं। हथेली, हथौड़ी, हत्था, हाथी जैसे अनेक शब्दों के मूल में हस्त ही है। ‘हथिया’ में ‘आर’ प्रत्यय लगने से हथियार बना जिसमें ऐसे उपकरण का आशय है जिसे हाथ में पकड़ कर या हाथों से फेंक कर कोई काम किया जाए या किसी पर घात किया जाए। मूलतः हथियार में शस्त्र का भाव है।
थियार हिन्दी का बहुप्रयुक्त शब्द है। शस्त्रास्त्रों के लिए इसका इस्तेमाल आम है। मराठी में इसकी प्रकृति बदल गई और यह ‘हत्यार’ हो गया। हथियार से जुड़े कई मुहावरे प्रचलितहैं जैसे हथियार डालना यानी पराजय स्वीकार करना, हथियार चलाना यानी लड़ाई छेड़ना, हथियार बांधना या हथियार लगाना यानी संघर्ष के लिए सुसज्ज होना। चलताऊ या बाज़ारू हिन्दी में ‘हथियार’ शब्द का प्रयोग पुरुष जननेन्द्रिय के लिए भी होता। हथिया से ही ‘हथियाना’ क्रिया भी बनती है जिसका अर्थ है जबर्दस्ती कब्ज़ा करना, अपने स्वामित्व में लेना आदि।

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Friday, March 15, 2013

ऐश-ओ-आराम से ऐषाराम से

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भी ‘ऐषाराम’ सुना है ? संस्कृत शब्दावली का शब्द लगता है। बौद्ध विहारों के संदर्भ में सुने हुए ‘संघाराम’ जैसा । यह हिन्दी का नहीं बल्कि मराठी का शब्द है और इसका आशय हिन्दी के ऐशो-आराम से है । यूँ हिन्दी का ऐशो-आराम मूलतः फ़ारसी के ‘ऐश-ओ-आराम’ से आ रहा है जिसमें आनंद, विलास या सुखोपभोग का आशय है। मराठी के ऐषाराम में ऐश और आराम है। हिन्दी वाले इसी तर्ज़ पर ऐशाराम सपने में भी नहीं लिखेंगे। ‘ऐश’ अरब का शब्द है और आराम फ़ारसी का। यूँ भारत ईरानी परिवार का होने के नाते आराम संस्कृत, हिन्दी में भी मौजूद है। मज़े की बात देखिए कि अरबी के ‘ऐश’ में शकर वाला ‘श’ है और षट्कोण वाला ‘ष्’ संस्कृत की अपनी खूबी है। इसके बावजूद मराठी ने ऐश औ आराम से ‘ऐषाराम’ यूँ बना लिया कि किसी को इसके विदेशी होने का शक भी न होगा। यूँ माधव ज्यूलियन के मराठी-फ़ारसी कोश में ‘ऐषाराम’ का ‘ऐशाराम’ रूप ही दिया गया है मगर यू.एम.पठाण के मराठी-फ़ारसी कोश में इसका रूप “ऐषाराम’ है।
ज हर कोई ऐश करने की जुगत में लगा हुआ है। बिना काम किए अच्छी गुज़र बसर, यानी ऐश। फ़ारसी ने हमें ‘ऐश’ सिखाया अलबत्ता शब्द फ़ारसी में भी अरबी से दाखिल हुआ। अरबी में इसकी धातु ऐन-या-शीन (ع-ى-ش) है जिसमें सुख के साथ जीना, चैन की गुज़र-बसर या विलासयुक्त जीवन का आशय है और इससे बनी आश क्रिया में रोज़, रोटी, जीवनचर्या जैसे भाव हैं। दिलचस्प बात यह कि किसी ज़माने में ऐश का वह मतलब नहीं था जो आज प्रचलित हो चुका है। अरबी में ऐश का मूल अर्थ था रोटी, रोज़ी, आजीविका, जीवन, किसी के साथ रहना आदि। ऐश के दार्शनिक अर्थ पर विचार करें तो यह सच भी है। इन्सान को हवा-पानी तो ईश्वर ने मुफ्त में दिया। मगर इसके बूते उसकी जिंदगी चलनी मुश्किल थी। उसने तरकीब लगाई। मेहनत की और रोटी बना ली। बस, उसकी ऐश हो गई। हर तरह से वंचित व्यक्ति के लिए सिर्फ रोटी ही जीवन है। रोटी जो अन्न का पर्याय है, अन्न से बनती है। लेकिन बदलते वक्त में ऐश में वे तमाम वस्तुएँ भी शामिल हो गईं जिनमें से सिर्फ रोटी को गायब कर दिया जाए तो उस तथाकथित ऐश से हर कोई तौबा करने लग जाए।
श के मूल आश के साथ अरबी उपसर्ग ‘म’ लगने से बनता है मआश जो इसी कड़ी से जुड़ता है। मद्दाह के कोश में मआश का अर्थ है जीविका, रोज़ी, जागीर जो किसी काम के इनामस्वरूप मिले। मआशदार यानी जागीरवाला। मआशी यानी जीविका सम्बन्धी और मआशियात यानी अर्थशास्त्र। मआश की मौजूदगी वाला फ़ारसी का हिन्दी का एक मज़ेदार शब्द हिन्दी में आकर रच-बस गया है- बदमाश। इसमें फारसी के बद उपसर्ग की भी मौजूदगी देखी जा सकती है। इस बद् यानी bad शब्द का अंग्रेजी के bad बैड से अर्थसाम्य का रिश्ता तो है मगर दोनों का जन्म से रिश्ता नहीं है। बद् यानी बुरा, निकृष्ट, अशुभ, खराब, अपवित्र, अमंगल, गिरा हुआ, बिगड़ा हुआ आदि। भाषा विज्ञानियों के मुताबिक बद् शब्द पुरानी फारसी के ‘वत’ से बना है । यह भी सम्भव है कि इसकी व्यत्पत्ति का आधार संस्कृत की ‘पत्’ धातु हो जिसमें नैतिक रूप से गिरना, अधःपतन, नरक में जाना जैसे भाव शामिल हैं। पतित, पातकी, पतन जैसे शब्द भी इससे ही बने हैं। बहुत सम्भव है कि फारसी के बद् की रिश्तेदारी पत् से हो। अरबी के ‘मआश’ का मतलब होता है आजीविका, जीवन, रोज़ी। इस तरह बदमाश का शुद्ध रूप हुआ बदमआश जिसका मतलब है गलत रास्ते पर चलनेवाला, बुरे काम करनेवाला, ग़लत तरीक़ों से रोज़ी कमाने वाला, जिसके जीने का ढंग ग़लत हो। मआशदार का अर्थ अय्याश है।
श से ही बनता है अय्याश (ऐयाश) जिसका अर्थ है विलासिता से रहने वाला, कामुक, लम्पट, ऐश करने वाला। अय्याश के लिए एक और प्रचलित शब्द ऐशबाज भी है। ऐशबाजी, अय्याशी जैसे शब्द आरामतलबी और आडम्बरपूर्ण जीवन शैली के संदर्भ में इस्तेमाल होते हैं। अय्याश का जिक्र होते ही एक नकारात्मक भाव उभरता है। सुखविलास के सभी साधनों का अनैतिक प्रयोग करनेवाले के को आमतौर पर अय्य़ाश कहा जाता है। मद्दाह साहब के शब्दकोश में तो लोभी, भोगी के साथ व्यभिचारी को भी अय्याश की श्रेणी में रखा गया है। यह अय्याश शब्द भी ऐश की ही कतार में खड़ा है और उसी धातु से निकला है जिसका मूलार्थ जीवन का आधार रोटी थी मगर जिसका अर्थ समृद्धिशाली जीवन हो गया। उर्दू-फारसी-अरबी में लड़कियों का एक नाम होता है आएशा / आयशा ayesha जो इसी कड़ी का शब्द है मगर इसमें सकारात्मक भावों का समावेश है। आयशा का मतलब होता है समृद्धिशाली, सुखी, जीवन से भरपूर। पैगम्बर साहब की छोटी पत्नी का नाम भी हजरत आय़शा था और उन्हें इस्लाम के अनुयायियों की माँ का दर्जा मिला हुआ है।
शो-आराम का दूसरा पद यूँ तो फ़ारसी शब्द है मगर यह इसी अर्थवत्ता अर्थात खुशी, प्रसन्नता या इन्द्रिय आनंद के साथ संस्कृत और हिन्दी में भी है। आराम: मूलत: रम् धातु से बना है जिसमें आराम, अन्त, उपसंहार, बंद करना, स्थिर होना, रुकना, ठहरना जैसे भाव शामिल हैं। इन्द्रियों को शिथिल करने अथवा उनकी क्रियाशीलता को रोकने से शांति उपजती है। यह शांति ही आनंद, उल्लास, प्रसन्नता और तृप्ति का सृजन करती है। आराम शब्द के मूल में यही सब बाते हैं। इसमें ‘वि’ उपसर्ग लगाने से बने विराम शब्द में भी थमना, रुकना, बंद करना, उपसंहार जैसे भाव हैं मगर इसका अर्थ आराम नहीं होता है बल्कि किन्हीं क्रियाओं या स्थितियों के अंत का इसमें संकेत है। आराम को भी विराम दिया जाता है अर्थात विराम दरअसल सक्रियता की भूमिका भी हो सकती है। भगवान राम के नाम का मूल भी यह रम् धातु ही है। राम का अर्थ भी आनंद देने वाला ही होता है। इसके अलावा रमण, रमणीय, रमणी, रमा, राम, संघाराम, रम्य, सुरम्य, मनोरम, रमाकान्त, रमानाथ, रमापति जैसे शब्द भी इसी कड़ी में हैं। अवेस्ता यानी ईरान की प्राचीन भाषा ने आरामः को ज्यों का त्यों अपना लिया। फिर ये आधुनिक फारसी में भी जस का तस रहा। फारसी से ही उर्दू में भी आराम आया। यहां इस शब्द का अर्थ बाग-बगीचा न होकर शुद्ध रूप से विश्राम के अर्थ में है।

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Saturday, February 9, 2013

होशियारी की बातें

ganesha

हि न्दी के प्रचलित शब्द भंडार में होशियार, होशियारी जैसे शब्द भी हैं जिसका इस्तेमाल रोज़मर्रा की भाषा में खूब होता है । होशियार शब्द दरअसल फ़ारसी मूल से भारतीय भाषाओं में दाख़िल हुआ है जिसका प्रयोग बतौर विशेषण सजग और बुद्धिमान के अर्थ में किया जाता है । चतुर, निपुण, कुशल, सावधान, समझदार और दक्ष की व्यंजना भी इसमें निहित है । होशियारी एक संज्ञा है और इसकी अर्थवत्ता में होशियार के सभी गुण शामिल हैं । हिन्दी में होशियार के होश्यार, हुशियार, होश्यार, हुस्यार, होशयार जैसे रूप प्रचलित हैं । मराठी में इसे हुशार कहा जाता है ।
होशियार या होशियारी के मूल में फ़ारसी का होश है जो इंडो-ईरानी परिवार का शब्द है । जोसेफ़ एच पीटरसन की डिक्शनरी ऑफ़ मोस्ट कॉमन अवेस्ता वर्ड्स में उषी शब्द है । जॉन प्लैट्स के कोश में इसका पहलवी रूप हुश या होश है जबकि डी.एन.मैकेन्जी की पहलवी डिक्शनरी के मुताबिक अवेस्ता उशी का पहलवी रूप ओश होता है जिसका एक अर्थ है ज्ञान, बोध, दूसरा अर्थ है मृत्यु और तीसरा अर्थ है उदय, प्रभात, सवेरा आदि । भाषाविज्ञानी एकमत है कि उशी, ओश जैसे शब्द वैदिक भाषा के उषः, उषा जैसे शब्दों के समरूप हैं जिसमें प्रभात, उदय या सवेरा का भाव है । वैदिक उष् धातु में ताप, तपाना जैसे भाव भी हैं । पहलवी ओश में पूर्व दिशा का भाव भी है । सूर्योदय के साथ ही ताप का एक नाम उष्मा भी है । उष्मा के मूल में भी यही उष् है । उष्मा से प्रकाश निकलता है । प्रकृति में उष्मा और प्रकाश का आदिप्रतीक सूर्य ही है जो पूर्व दिशा से उगता है । यही सारे संकेत वैदिक उष और पहलवी ओश में हैं ।
फ़ारसी में आकर ओश का रूपान्तर होश होता है और इसमें ज्ञान, बोध जैसे भाव स्थायी हो जाते हैं तथा सूर्योदय, प्रभात जैसे भाव इसमें से विलीन हो जाते हैं । पहलवी में सतर्क, जागरुक, सचेत के लिए ओशयार (osyar) शब्द है । इसका अगला रूप फ़ारसी का होशयार है । हिन्दी-उर्दू में यह होशियार बनता है । मुहम्मद मुस्तफ़ा खां मद्दाह के कोश में होश का अर्थ बुद्धि, समझ, अक़्ल, चेतना, संज्ञा, ख़बरदारी, विवेक, तमीज़ और नशे में उतार की अवस्था जैसे अर्थ बताए गए हैं । होशयार शब्द में जो यार है वह भी इंडो-ईरानी परिवार का शब्द है । यार शब्द का अर्थ है मित्र, दोस्त, बंधु, सखा, साथी आदि। यार शब्द की अर्थवत्ता में प्रेमी, आशिक , माशूक भी समाए हैं। इसके अलावा यह शब्द मददगार, सहायक का भाव भी रखता है। जॉन प्लैट्स के उर्दू इंग्लिश हिन्दुस्तानी कोश के मुताबिक यार शब्द की संभावित व्युत्पत्ति जारः से बताई गई है। संस्कृत के जारः शब्द में मूलतः प्रेमी, आशिक, उपपति का भाव है। किसी स्त्री के आशिक के अर्थ में जारः शब्द की अर्थवत्ता फारसी के यार में भी कायम है । यार शब्द बाद में सामान्य मित्र के अर्थ में समाज में रूढ़ हुआ । फ़ारसी का बे उपसर्ग लग कर बेहोश शब्द बनता है जिसका अर्थ है जिसमें चेतना न हो, अचेत ।
होशयार का अर्थ है जिसकी अक्ल से दोस्ती हो । अक़्ल का दुश्मन मुहावरा भी हिन्दी में प्रचलित है । ऐसे व्यक्ति के लिए उर्दू में होशबाख़्ता शब्द है । इसके अलावा होशमंद, होशमंदी जैसे शब्द भी प्रचलित हैं । होशरुबा शब्द का अर्थ है चेतना हर लेने वाला, होश उड़ा देने वाला । हुशंग या होशांग का आशय है बुद्धिमान, विवेकी, अक़्लमंद। हिन्दी में होशो-हवास पद भी खूब प्रचलित है । यह संकर पद है अर्थात होश फ़ारसी से आया है और हवास अरबी से । हवास शब्द अरबी धातु हा-सीन-सीन से बना है (ح س س ) जिसमें स्पर्श, संवेदना या समझ का भाव है । इससे बने हास्सः का अर्थ होता है इन्द्रियाँ जो स्पर्श, संवेदना की वाहक हैं । हास्सः का बहुवचन है हवास । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक इसका अर्थ है इन्द्रियाँ, संवेदना, चेतना, संज्ञा, होश आदि । ज़ाहिर है होश-हवास में वही भाव है जो हिन्दी के सुध-बुध में है । सुधि और बोध दोनो जहाँ स्थित हो वही होश-हवास की स्थिति है ।
होश से जुड़े अनेक मुहावरे व कहावतें हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे होश उड़ना, होश गुम होना या होश फ़ाख़्ता होना । इन सभी में भय, आशंका, चिन्ता या फ़िक़्र से सुध-बुध खोने या डर जाने की अभिव्यक्ति होती है । होश आना यानी ग़लती सुधार लेना, समझदार हो जाना आदि । होश दंग होना यानी चकित रह जाना । होश ठिकाने आना अर्थात सबक मिलना, बुद्धि जाग्रत होना, अधीरता या व्याकुलता मिटना, होश की दवा करना यानी अक्ल हासिल करना, समझदारी पाना आदि ।

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Sunday, January 13, 2013

कोहरा और कुहासा

fog

र्दियों में शाम से ही धुंध छाने लगती है जिसे कोहरा या कुहासा कहते हैं । ठंड के मौसम में आमतौर पर हवा भारी होती है जिसकी वजह वातावरण में नमी का होना है । धरती की ऊपरी परत जब बेहद ठण्डी हो जाती है तो हवा की नमी सघन होकर नन्हें-नन्हें हिमकणों में बदल जाती है इसे ही कोहरा जमना कहते हैं । कोहरा बनने की प्रक़्रिया लगभग बादल बनने जैसी ही होती है । कभी-कभी बादलों की निचली परत भी पृथ्वी की सतह के क़रीब आकर कोहरा बन जाती है । कुल मिलाकर कोहरे में कुछ नज़र नहीं आता । धुँए में जिस तरह से दृश्यता कम हो जाती है उसी तरह हवा की नमी हिमकणों में बदल कर माहौल की दृश्यता को आश्चर्यजनक रूप से कम कर देती है । कोहरे के आवरण में समूचा दृश्यजगत ढक जाता है । देखी जा सकने वाली हर शै गुप्त हो जाती है, लुप्त हो जाती है, छुप जाती है, छलावे की तरह ग़ायब हो जाती है । कोहरा की अर्थवत्ता के पीछे भी गुप्तता या लुप्तता का भाव ही प्रमुख है ।
किसी भी किस्म का आवरण मूल रूप से सुरक्षा कवच होता है । कोहरा भी एक तरह से किन्हीं फ़सलों के लिए लाभदायक ही होता है । शत्रु से खुद को बचाने के लिए युद्ध के प्राचीनतम तरीक़ों में कैमोफ्लैज या छद्मावरण शैली भी है । कोहरा भी एक तरह से प्रकृति का कैमोफ्लैज है । संस्कृत में एक धातु है गुह् जिसमें ढकने, छिपाने, परदा डालने, गुप्त रखने का भाव है । गुहा और गुफा जैसे शब्दों के मूल में यही गुह् धातु है । आदिकाल से प्राणियों को आश्रय की खोज रही है । आदिम युग में आश्रय का अर्थ सुरक्षित स्थान से था सो आश्रय का अर्थ था गुप्त जगह, जहाँ खुद को छुपाकर बचाव किया जा सके । गुहा में गुप्तता का भाव प्रमुख है जो बाद में संरक्षित-सुरक्षित स्थान हुआ आप्टेकोश के मुताबिक बंद या सुरक्षित स्थान के अर्थ में गुहा का एक अर्थ हृदय भी होता है क्योंकि यह छाती के भीतर है ।
गुह् का पूर्ववैदिक रूप कुह् रहा होगा । याद रहे ‘क’ वर्णक्रम में ही ‘ग’ भी आता है। निश्चित ही ‘कुह्’ में वही भाव थे जो ‘गुह्’ में हैं । मोनियर विलियम्स के मुताबिक कुह् से कुहयते क्रिया बनती है जिसका अर्थ है to surprise or astonish or cheat by trickery or jugglery अर्थात छलावरण या मायाजाल फैलाना जिसका उद्धेश्य वास्तविकता छुपाना हो । इसीलिए कुह से कोहरा के अर्थ में ही संस्कृत में कोहरा के अर्थ में ही संस्कृत में कुहेलिका शब्द भी है जिसका अर्थ भी अंधकार, धुंधलापन, कोहरा आदि है । कुहेलिका में मुहारवरेदार आशय भी हैं जिसमें मिथ्यावरण या छलावरण की अभिव्यक्ति होती है । हिन्दी के कोहरा के जन्मसूत्र संस्कृत के कुहेड़िका या कुहेड़ से जुड़ते हैं जिसका अर्थ कोहरा, धुंध, तुषार, fog, mist, कुहासा आदि है । कुह का मतलब छली या फ़रेबी भी होता है । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक कुबेर का अन्य नाम भी कुह है । कुहक यानी मायाजाल, इन्द्रजाल । कुहककार याना माया अथवा प्रपंच रचने वाला । कुहासा भी इसी मूल से निकला है
छिपने-छिपाने, गुप्त-लुप्त जैसी अभिव्यक्ति की वजह से ही गुह् या कुह से पहाड़ की अर्थवत्ता वाले शब्द बने । संस्कृत में कुहरम् शब्द है जिसका मतलब है गुफा, गढ़ा आदि । आप्टेकोश में इसका एक अर्थ गला या कान भी बताया गया है । जाहिर है, इन दोनों ही शरीरांगों की आकृति गुफा जैसी है । नाभि के साथ नाभिकुहर जैसी उपमा भी मिलती है । संस्कृत के पूर्वरूप यानी वैदिकी या छांदस की ही शाखा के रूप में अवेस्ता का भी विकास हुआ जिससे फ़ारसी का जन्म माना जाता है । फ़ारसी में पहाड़ के लिए कोह शब्द है जो इसी मूल से आ रहा है । बरास्ता अवेस्ता कुह् में निहित गुप्त स्थान या गुफा का अर्थ विस्तार फ़ारसी में कोह के रूप में सामने आया अर्थात वह स्थान जहाँ बहुत सी गुफाएँ हों । स्पष्ट है कि गुफाएँ पहाड़ों में ही होती हैं, सो कुह् से बने कोह का अर्थ हुआ पहाड़ ।
गुफा के लिए हिन्दी में खोह शब्द भी खूब प्रचलित है । गौर करें कुह्-गुह् के अगले क्रम खुह् पर । इस खोह शब्द की फ़ारसी के कोह से समानता भी देखें । वैसे कोह से गोह भी बनता है जिसका अर्थ भी गुफा है । मोनियर विलियम्स इसका अर्थ गुप्तस्थान बताते हैं । हिन्दी शब्दसागर खोह की व्युत्पत्ति के लिए गोह का संकेत भर देते हैं । मेरे विचार में खोह का निर्माण कुह्, कोह की कड़ी में ही हुआ होगा । फ़ारसी में कोहसार का अर्थ पहाड़ ही होता है । पर्वतीय भूमि के लिए कोहिस्तान एक प्रचलित नाम है । ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में इस नाम के कई स्थान हैं । पाकिस्तान में कोहमरी नाम का एक पर्यटन स्थल भी है जिसका लोकप्रिय नाम अब सिर्फ़ मरी रह गया है ।
कोहिनूर जैसे मशहूर हीरे के नामकरण के पीछे भी यही कुह् धातु है । कोहिनूर बना है कोह-ए-नूर से अर्थात रोशनी का पहाड़ । याद रहे, कोहिनूर ( अन्य लोकप्रिय उच्चारण कोहनूर, कोहेनूर भी हैं ) सदियों पहले गोलकुंडा की हीरा खदान से निकाला गया था, जो सदियों पहले दुनिया की इकलौती हीरा खदान थी । कोहिनूर दुनिया का सबसे विशाल हीरा था और इसके आकार की वजह से ही मुगलकाल में इसे रोशनी का पहाड़ जैसा नाम मिला । अंग्रेजी में गुफा को केव कहते हैं जो भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है और इसकी रिश्तेदारी भी कुह् से है । डगलस हार्पर की एटिमआनलाइन के मुताबिक केव CAVE बना है प्रोटो इंडोयूरोपीय धातु क्यू keue- से जिसका अर्थ है मेहराब या पहाड़ के भीतर जाता ऐसा छिद्र जो भीतर से चौड़ा हो ।

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Friday, January 4, 2013

अहाते में…

round

हि न्दी में अहाता शब्द इतना प्रचलित है कि गाँव-देहात से शहरों तक लोगों की ज़बान पर ये शब्द किसी भी घिरे हुए स्थान के संदर्भ में फ़ौरन ज़बान पर आता है । इसकी मिसाल देखिए कि सरकार ने आबक़ारी नीति के तहत शराब की हर दुकान की बगल में अहाता खोलने का प्रावधान करके इस शब्द को हर आदमी की ज़बान पर ला दिया है । अब मध्यप्रदेश के मयक़शों की ज़बान पर अहाता शब्द चढ़ा हुआ है । देश के मध्य में स्थित यह सूबा लगता है जल्दी ही मद्यप्रदेश बन जाएगा । बहरहाल, अहाता निहायत देशी रंग-ढंग वाला शब्द है । चलताऊ तौर पर इसे हाता भी कहा जाता है । इसीलिए ज़रा भी शुबहा नहीं होता कि अहाता अरब से चला और फ़ारसी के रास्ते हिन्दुस्तानी ज़बानों में दाख़िल हुआ ।
हाता का मूल रूप इहाता है और इसका जन्म अरबी धातु हा-वाव-थे यानी  ط – و -ح के पेट से हुआ है । अहाता को हाता कहने का चलन दरअसल भारतीय ज़मीन पर इस शब्द के बिगड़ने का प्रमाण नहीं है बल्कि अरबी में ही इहाता के अलावा हाता, हीता जैसे संक्षिप्त रूप पहले से मौजूद थे और ये भी जस के तस हिन्दी में चले आए । इहाता या अहाता के हाता, हीता जैसे संक्षिप्त रूप दरअसल शब्द-चलन की मुख-सुख प्रक्रिया से नहीं बने हैं बल्कि इन रूपों से इहाता, अहाता का व्युत्पत्तिक या धात्विक आधार मज़बूत होता है । अहाता की तुलना में h-w-t अर्थात ह-व-थ ध्वनियों से حاطه हाता का निर्माण होता है । अरबी में का स्वरूप स्वर के ज्यादा निकट है । हाता में स्वरागम की प्रक्रिया से इहाता या अहाता जैसे रूप बनते हैं ।
ल सईद एम बदावी की कुरानिक डिक्शनरी के मुताबिक अरबी धातु हा-वाव-थे में मूलतः दीवार, घेरा, बाड़ा, समेटना, समाविष्ट करना, सुरक्षा, रखवाली करना, आरक्षित करना जैसे भाव हैं । इससे बने अहाता / इहाता जैसे शब्दों में घेरा हुआ, बाड़ा लगाना, हर तरफ़ से आरक्षित जैसे भाव हैं । भारतीय परिवेश में इसका प्रयोग आंगन, दालान की तरह ही ज्यादा होता रहा है । जैसे मेम्वार्ज ऑन द हिस्ट्री, फोकलोर, एंड डिस्ट्रीब्यूश ऑफ द रेसेस ऑफ द नॉर्थ वेस्टर्न प्रॉविन्सेज़ ऑफ इंडिया (1869) में सर हेनरी मायर्स इलियट ने हाता के लिए परिसर, दालान, आंगन, प्रिमिसेस, कम्पाऊंड जैसे शब्द बताते हुए इसे अरबी के इहाता का बिगड़ा रूप बताया है ।
जॉन शेक्सपियर की हिन्दुस्तानी – इंग्लिश डिक्शनरी के मुताबिक इसमें फेंसिंग, बंद, घिरे हुए या अवरुद्ध क्षेत्र का भाव है । मोहम्मद मुस्तफ़ा खाँ मद्दाह के कोश के मुताबिक अरबी का इहाता एक घर भी हो सकता है या चारदीवारी भी । इसमें वेष्ठन, प्राचीर के अलावा इलाक़ा, प्रदेश क्षेत्र या हलक़ा जैसे आशय भी वे बताते हैं । हिन्दी शब्दसागर में भी चारदीवारी के साथ साथ हाता में क्षेत्रवाची व्यापक अर्थवत्ता बताई गई है । इसका अर्थ प्रान्त, हलका या सूबा भी होता है जैसे बंबई हाता, या बंगाल हाता । इसके अलावा इसमें सरहद, सीमान्त या रोक जैसे भाव भी हैं । बाडा, चकला, मोहाल, कटरा, चक जैसा ही इलाक़ाई विशेषण भी हाता में है जैसे पंडित हाता, बाभन हाता, कुरमी हाता, हाता चौक आदि ।
हाता, हाता, इहाता आश्रय व्यवस्था से जुड़ी शब्दावली के शब्द हैं । दुनियाभर की सभ्यताओं में मनुष्य ने विकासक्रम में सबसे पहले घिरे हुए स्थान में ही आश्रय तलाशा । प्राकृतिक रूप से किसी जगह के घिरे होने की वजह से उसे उस स्थान का रक्षात्मक महत्व समझ में आया और फिर आगे चल कर वह खुद भी किसी स्थान के चारों ओर उसी तरह के सुरक्षात्मक सरंजाम जुटाने लगा । पहले कंदरा, फिर बाड़ा, फिर झोपड़ी और कालान्तर में भवन, क़िले आदि भी वह बनाने लगा । इस सबके मूल में सुरक्षा का भाव ही प्रमुख था । अरबी धातु हा-वाव-थे यानी ط- و- ح की कोख से एक और महत्वपूर्ण शब्द जन्मा है एहतियात जिसमें सावधानी, ख़बरदारी, होशयारी का भाव है । यूँ भी कह सकते हैं कि अहाते की तामीर इन्सान ने एहतियातन की । “ एहतियात बरतना”या “एहतियात बरतते हुए” जैसे वाक्य आम बोल-चाल में सुने जाते हैं ।

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Monday, December 31, 2012

चक्र, चक्कर, चरखा

हिन्दी के तीन चकले-1circles
हिन्दी में तीन चकले बहुत प्रसिद्ध हैं । पहला ‘चकला’ है रसोई का जिसका साथ निभाता है बेलन । दूसरा ‘चकला’ स्थानवाची अर्थवत्ता रखता है जैसे चकला-खानपुर या नरवर-चकला । तीसरा चकला  है रूपजीवाओं का ठिकाना जो कला-व्यापार से ज्यादा देह-व्यापार के लिए कुख्यात है । तीनों ही तरह के चकलों का आज भी अस्तित्व है बल्कि ये भाषा-प्रयोग में भी बने हुए हैं । ये अलग बात है कि रसोई वाले चकले को छोड़ कर दोनो चकलों का सम्बन्ध भारत-ईरानी भाषा परिवार की फ़ारसी भाषा से है । गौरतलब है कि चक्कर, व्हील, साइकल, सर्कल जैसे शब्द इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार से सम्बद्ध हैं और एक ही गर्भनाल से जुड़े हैं और इनका रिश्ता वैदिक / संस्कृत शब्दावली के ‘चक्र’ से है । चकले के भीतर दाखिल होने से पहले जायज़ा लेते हैं चक्र का । भाषाविदों का मानना है कि वैदिक चक्र का पूर्वरूप चर्क रहा होगा और इसी वजह से वे चक्र की ‘चर्’ क्रिया में निहित निरन्तर गति का भाव देखते है । निरन्तर गति सीधी दिशा में हमेशा मुमकिन नहीं है किन्तु वलयाकार परिभ्रमण करते हुए इस निरन्तरता को सौफ़ीसद सम्भव बनाया जा सकता है । इसी लिए ‘चक्र’ के पूर्वरूप ‘चर्क’ से निरन्तर ‘चर्’ ( चल् = चलना ) वाली क्रिया सिद्ध होती है । अक्ष पर चारों दिशाओं में घूमना ही ‘चक्र’ है ।

इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की भाषाओं में रोमन ध्वनियां ‘c’ और ‘k’ के उच्चारण में बहुत समानता है और अक्सर ये एक दूसरे में बदलती भी हैं । इसी तरह अंग्रेजी का कैमरा camara, चैम्बर और हिन्दी का कमरा  एक ही मूल के हैं मगर मूल c (स) वर्ण की ध्वनि यहाँ अलग-अलग है । यह जानना ज़रूरी है कि ग्रीक और आर्यभाषाओं के ‘च’ और ‘क’ वर्णों से बनने वाले शब्दों में आपसी रूपान्तर होने की प्रवृत्ति है । भारोपीय धातु kand ( कैंड / कंद ) का एक रूप cand ( चैंड / चंद् ) भी होता है। इससे बने चंद्रः का मतलब भी श्वेत, उज्जवल, कांति, प्रकाशमान आदि है । डॉ. रामविलास शर्मा ‘भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी’ में लिखते हैं - “संस्कृत चक्र का ग्रीक प्रतिरूप कुक्लॉस है । चक्र का पूर्वरूप चर्क होगा; वर्णविपर्यय से र् का स्थानान्तरण हुआ । कुक्लॉस का पूर्वरूप कुल्कॉस होगा; यहाँ भी वर्णविपर्यय से ल् का स्थानान्तरण हुआ । कुल्, कुर् क्रिया का पूर्वरूप घुर् होगा । कर्, सर्, चर् परस्पर समबद्ध हैं । सर्, चर् वाले रूप द्रविड़ भाषाओं में उल्लेखनीय हैं ।” एमिनो-बरो के द्रविड़ व्युत्पत्ति कोश के चुनींदा शब्दों के ज़रिये वे इसे साबित भी करते हैं मसलन । तेलुगु सारि (आवर्तन), सुरगालि (बवंडर), कन्नड़ सुळि, (घूमना), सुरुळि (छल्ला), तुलु सुळि (भंवर), सुत्तु (चक्कर खाना), तमिल चुर्रू ( चक्कर खाना), चूरई (बवंडर) आदि । किक्लोस से लैटिन के प्राचीन रूप में साइक्लस शब्द बना जिसका अंग्रेजी रूप साइकल cycle है । चक्र और साइकल एक ही है ।

वैदिक चक्र और बरास्ता अवेस्ता, पहलवी होते हुए फ़ारसी के चर्ख रूप में वर्णविपर्यय स्पष्ट नज़र आ रहा है । जिस तरह वैदिक ‘शुक्र’ से फ़ारसी में ‘सुर्ख़’ बनता है, ‘चक्रवाक’ का ‘सुरख़ाब’ होता है उसी तरह ‘चक्र’ से ‘चर्ख़’ बनता है । हिन्दी की पश्चिमी बोलियों में यही रूप सुरक्षित रहा और इससे ही गोल, वलयाकार यन्त्र के लिए ‘चर्ख’ शब्द बना जिसका एक रूप ‘चरख’ भी है । मानक बृहद हिन्दी कोश के मुताबिक फ़ारसी के ‘चर्ख़’ का अर्थ घूमने वाला गोल चक्कर, खराद, गोफन, तोपगाड़ी, रथ, करघा आदि होता है । करघे के लिए चरखा शब्द के मूल में चर्ख़ / चरख ही है । ध्यान रहे कलफ़ किए हुए विशाल आकार के सूती कपड़ों को चरख किया जाता है । दरअसल यह इसी चर्ख़ से निकला है । एक विशाल चरखी पर कपड़े को लपेटने की क्रिया ही चरख़ कहलाती है । ऐसा करने से कपड़े की सिलवटें दूर हो जाती हैं । पहिये या स्टीयरिंग को चक्का कहते हैं । चरखा, चरखी, चकरी, चक्की जैसे नाम पहिए, झूले, यन्त्र, उपकरण के होते हैं । सिर घूमने को चकराना कहते हैं । यह चक्कर से बना है । जो आपको चक्कर में डाल दे ऐसे व्यक्ति को ‘चक्रम’ की संज्ञा दी जाती है । चक्कर, चकराना, चकरम (चक्रम) जैसे शब्दों के मूल में चक्र ही है ।
हले जानते हैं ‘चक’ को जो फ़ारसी से हिन्दी में दाखिल हुआ । गाँव-देहात की जानकारी रखने वाले लोग ‘चक’ से खूब परिचित हैं । चक्र का ही रूपान्तर है चक जिसका अर्थ है ज़मीन का एक विशाल टुकड़ा । बड़ी आबादी से बसा हुआ क्षेत्र । कृषि भूमि या किसी भी किस्म की गोचर ज़मीन पर बसी आबादी । उपत्यका भूमि अथवा घाटी, दर्रा या तराई का क्षेत्र । व्यवस्थित बसाहट वाला गाँव । सतपुड़ा और मैकल पर्वत की तराई के एक क्षेत्र को बैगाचक कहते हैं । यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यहाँ बैगा जाति की दर्जनों बस्तियाँ हैं । किन्हीं गाँवों के नामों के साथ भी यह शब्द लगा रहता है जैसे चक-चौबेवाला या चक-माजरा । यहाँ चक का अर्थ है चक्र अर्थात घेरा, वर्तुल, वृत्त आदि । पुराने ज़मानें से ही दुनियाभर में उपनिवेशन होता आया है । कृषिभूमि और जलस्रोतों के इर्दगिर्द आबादियाँ बसती रहीं । घिरी हुई जगह पर लोग बसते रहे । प्रायः शक्तिशाली व्यक्ति या शासक अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए निर्जन स्थानों पर लोगों को बसाया करते थे । खेतों के निकट अनुपजाऊ भूमि पैमाइश कर लोगों को बाँट दी जाती थी । इसी तरह प्रत्येक परिवार को खेत भी दिए जाते थे । भूमि के चौकोर टुकड़ों की पैमाइश होती थी, मगर चारों ओर से घिरे होने की वजह से उन्हें चक्र अर्थात ‘चक’ कहा जाने लगा था । सिलसिलेवार राज्यसत्ता के विकास के बाद भूक्षेत्र के रूप में चक शब्द का प्रयोग रूढ़ हुआ होगा । राजस्व शब्दावली के अंतर्गत हिन्दी में चक की आमद फ़ारसी से मानी जाती है । यूँ भी कह सकते हैं कि भारत-ईरानी परिवार की पश्चिमोत्तर बोलियों में प्राकृत चक्क के कई रूप प्रचलित होंगे जिनका सम्बन्ध वैदिक ‘चक्र’ से था । ऐसे कई चक होते थे जो बस्तियों में तब्दील हो जाते थे । किसी एक के स्वामित्व वाला खेतों का समूह भी चक कहलाता है जो अलग अलग मेड़ों के बावजूद मूलतः भूमि का एक ही खण्ड हो। इसी कड़ी का शब्द है चकबंदी जिसका अभिप्राय भूमि का सीमांकन या हदबंदी है । छोटी जोतों वाले खेतों को मिलाना या बड़े खेत में तब्दील करना ही चकबंदी है।
चकले की चर्चा । चक्कर ( चक्र ) और साइकल एक ही है । इसी तरह चक्र और सर्कल भी एक ही है । cycle में ‘c’ के लिए ‘स’ के स्थान पर ‘च’ का उच्चारण करें तो हमें अंदाज़ होता है इन दोनों में ( चक्कर ) ज्यादा अंतर नहीं है । साइकल भी एक वृत्त है और चक्कर भी मूलतः एक वृत्त ही है । डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार- संस्कृत में चक्र का एक ग्रीक प्रतिरूप और है- किरकॉस । ग्रीक भाषा में ही इसका एक वैकल्पिक रूप क्रिकॉस है । ‘कर’, ‘कल’ दोनो क्रियारूप ग्रीक में हैं । कॅर, कॉर, ये दोनो रूप उस भाषा में हैं । किरकॉस से इस बात की पुष्टि होती है कि कुक्लॉस का पूर्वरूप कुल्कॉस था । इसी प्रकार फ़ारसी चर्ख से इस बात की पुष्टि होती है कि संस्कृत चक्र का पूर्वरूप चर्क था । लैटिन किर्कुस (चक्र), किर्रुस (छल्लेदार बाल) का आधार कॅर है ।” जो भी हो, चक्र के पूर्वरूप चर्क की बात करें या र के ल रूपान्तर पर सोचें, चकला शब्द का रिश्ता चक्र से ही जुड़ता है । चक्र को अगर खोला जाए तो च-क-र हाथ लगता है । चकला में भी च-क-ल ध्वनियाँ हैं । 'र’ का रूपान्तर ‘ल’ में होता है और इस तरह सीधे सीधे चक्र से चकला ( बरास्ता चक्ल ) हासिल हो रहा है । रॉल्फ़ लिली टर्नर की कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ़ इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़ में चकला की व्युत्पत्ति संस्कृत के चक्रल से मानी है । भारत का ‘चकराला’ और पाकिस्तान के ‘चकलाला’ नाम के स्थानों के मूल में यही ‘चक्रल’ है । अन्य कोशों में भी चकला का रिश्ता चक्रल से जोड़ा गया है । यह चक्रल वही है जो अंग्रेजी में सर्कल है । अगर चक्र का पूर्व रूप चर्क माने तो अंगरेज़ी सर्कल के आधार पर इंडो-ईरानी परिवार में चर्कल जैसे रूप की कल्पना भी की जा सकती है अर्थात संस्कृत के चक्रल का पूर्ववैदिक बोलियों में चर्कल ( सर्कल सदृश ) जैसा रूप रहा होगा । सर्कल की कड़ी में सर्कस भी है । –जारी
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Sunday, December 9, 2012

सुरख़ाब के पर

surkhab

कि सी अद्वितीय गुण, ध्यान आकर्षित करने वाली विशेषता या विलक्षणता की अभिव्यक्ति के लिए “सुरखाब के पर” मुहावरा बोलचाल की भाषा में खूब इस्तेमाल होता है मसलन “ इंदौर में क्या सुरख़ाब के पर लगे हैं जो भोपाल में गुज़र नहीं हो सकती? ” सुरख़ाब यानी हंस की प्रजाति का एक पक्षी जिसके पखों की खूबसूरती की वजह से प्राचीनकाल से इस पखेरु को ख़ास रुतबा मिला हुआ है । हंस जहाँ सफेद रंग के होते हैं वहीं सुरखाब अपनी पीली, नारंगी, भूरी, सुनहरी व काली रंगत के पंखों की वजह से अत्यधिक आकर्षक होते हैं । ख़ूबसूरत, मुलायम, रंगीन पंखों का उपयोग कई तरह के परिधानों में होता रहा है जिसकी वजह से दुनियाभर में इनका अंधाधुंध शिकार होने से अब सुरख़ाब दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों में हैं और इसके शिकार पर पाबंदी है ।
सुऱखाब को अंग्रेजी में रूडी शेलडक Ruddy Shelduck कहते हैं जिसका अर्थ है रंगीन हंस । अंग्रेजी के रूडी शब्द में रक्ताभ, सुर्ख या चटक का भाव है । डक यानी बतख । यूँ देखें तो इसे सुर्ख़+आब यानी सुर्खाब कहना ग़लत नहीं है । मगर यह इसकी व्युत्पत्ति का आधार नहीं है । रंगों के संदर्भ मे चटक, गहरा या तेज़ भाव वाला सुर्ख़ शब्द हिन्दी में फ़ारसी से आया और यह संस्कृत के शुक्र का रूपान्तर है । रंग से ताल्लुक रखती एक और महत्वपूर्ण बात । वैदिक शब्दावली में अनेक शब्द हैं जिनमें एक साथ सफ़ेद, पीला, लाल, हरा और कभी कभी भूरे रंग का भाव उभरता है । संदर्भों के अनुसार उस रंग का आशय स्वतः स्पष्ट होता जाता है । इसीलिए कांति या दीप्ति की अर्थवत्ता वाले शब्दों में प्रायः इन सभी रंगों का भी बोध होता है । संस्कृत के शुक्र में जहाँ श्वेताभ, पीताभ, रक्ताभ जैसी अर्थवत्ता रखता है वहीं फ़ारसी में शुक्र से बने सुर्ख़ में चटकीला लाल ही रूढ़ हुआ । सुरख़ाब में सुर्ख़ की कोई भूमिका नहीं है । जिस तरह चक्र से सुर्ख़ बना उसी तरह इसी सुरख़ाब के मूल में संस्कृत का चक्रवाक है ।
संस्कृत में सुरख़ाब chakravak का एक नाम हिरण्य हंस भी है । हिरण्य यानी सोना अर्थात सुनहरी हंस । सुरख़ाब के संस्कृत में अन्य कई नाम भी हैं जैसे चक्रवाक, रथचरण, वियोगिन, द्विक, अवियुक्त, हरिहेतिहूति, द्वन्द्वचर, निशाचर, भूरिप्रेमन्, द्वन्द्वचारिन्, गोनाद, रथाङ्ग, नादावर्त आदि । इसी तरह हिन्दी में इसे कोक, कोकहर, कोकई, चकई, चक्कवा, चाकर, चकवाह कहते हैं । प्राकृत में इसे रहंग कहा गया है और मराठी में इसका एक नाम ब्राह्माणी बदक Brahminy Duck भी है । सुरख़ाब दरअसल संस्कृत के चक्रवाक का फ़ारसी रूपान्तर है । ध्वनिपरिवर्तन के साथ अनुमानित विकासक्रम– चक्रवाक > शक्रवाक > शर्कवाब > सर्खवाब होते हुए सुरख़ाब हुआ होगा ।
हिरण्य हंस या सुनहरी हंस के चक्रवाक नामकरण के पीछे दरअसल रंग नहीं बल्कि उसकी विशेष आवाज़ है । मराठी संदर्भों के मुताबिक चक्रवाक नामकरण के पीछे संस्कृत में ‘चक्र इव वाक् शब्दोऽस्य रथाङ्गतुल्यावयन’ कारण बताया गया है । इसका मतलब हुआ रथ के चक्के में चिकनाई (लुब्रिकेंट) न डाले जाने पर जिस तरह किर-किर, खर-खर ध्वनियाँ पैदा होने से किरकिराहट की आवाज़ आती है, चक्रवाक भी अपने गले से वैसी ही आवाज़ निकालता है । संस्कृत में चक्र यानी चक्का और वाक् यानी आवाजा इस तरह चक्र + वाक = चक्के जैसी (रथ के पहिए समान) आवाज़ निकालने वाला पक्षी । चक्रवाक का एक अन्य नाम रथाङ्ग से भी यह स्पष्ट है । कर्नाटक संगीत में इस पक्षी के नाम पर एक राग-चक्रवाकम् Chakravakam भी है । 
प्राचीन कवियों के शृंगार-वर्णन में चक्रवाक का कई बार उल्लेख आता है । नर पक्षी को चक्रवाक और मादा को चक्रवाकी कहते हैं । हिन्दी में चकवा, चकवी (चक्रवाक > चक्कवा > चकवा / चक्रवाकी > चक्कवी > चकवी-चकई ) जैसे शब्द इससे ही बने हैं । चकवा-चकवी शाश्वत प्रेम प्रतीक हैं । दिनभर साथ रहने के बाद चक्रवाक और चक्रवाकी अलग अलग हो जाते हैं और रातभर विरह की अकुलाहट में कुर-कुर ध्वनि करते रहते हैं । मराठी संदर्भों में यह ध्वनि “ आंङ्ग-आङ्ग” बताई गई है । हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य का इतिहास में “चक्रवाक-मिथुन (चकवा-चकई)” शीर्षक आलेख में इस पक्षी के बारे में विस्तार से लिखा है । चक्रवाक chakravak  शरत्काल में भारत के जलाशयी क्षेत्रों में नज़र आता है और शेषकाल में यह अपने पर्यावास में लौट जाता है । स्वभावतः ये जोड़े में रहने वाला पक्षी ( रूडी शेल्डक ) है और मादा एक बार में 50-60 अंडे देती है ।
सम्बन्धित कड़ी- सुर्ख़ियों में शुक्र 

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Thursday, November 8, 2012

मनहूस और तहस-नहस

bcat

पशकुनी की अर्थवत्ता वाला मनहूस शब्द हिन्दी में बहुत प्रचलित है । मनहूस का प्रयोग बहुत व्यापक है । तिथि, वार, जगह, नाम, वस्तु, ग्रह-नक्षत्र आदि वे सब चीज़ें जो शकुन-विचार के दायरे में आती हैं उनके साथ मनहूस का प्रयोग होता है । जो कुछ भी अशुभ, अलाभकारी है उसे हम मनहूस कहते हैं । हिन्दी में ‘मनहूस शक्ल’, ‘मनहूस आदमी’, ‘मनहूस घड़ी’, ‘मनहूस ख्याल’, ‘मनहूस बात’, ‘मनहूस लोग’ और ‘मनहूस ख्वाब’ जैसे संदर्भ नज़र आते हैं । अरबी का मनहूस शब्द फ़ारसी से होता हुआ हिन्दी में आया है । मनहूस के मूल में अरबी क्रिया-विशेषण नह्स / नहूसा है जिसका अर्थ है अशुभ, दुर्भाग्यशाली, अपशकुन आदि । अल सईद एम बदावी के कुरानिक कोश में नह्स / नहूसा के मूल में सेमिटिक धातु नून-हा-सीन ( n-h-s) है जिसमें मुसीबत, कठिनाई, दुख, विपत्ति जैसे भाव हैं । अरबी के नह्स में ‘म’ उपसर्ग लगने से मनहूस बनता है । मुहम्मद मुस्तफ़ा खाँ मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश के मुताबिक मनहूस में अशुभ, अनिष्ट, अकल्याणकारी, बद, अभागा, बदक़िस्मत जैसे आशय हैं ।
नहूस के मूल में जो नहूसा है वह नहूसत बनकर उर्दू में विराजमान है । हिन्दी में अब यह अल्पप्रचलित है अलबत्ता आज़ादी से पहले की हिन्दोस्तानी में यह चलता था । नहूसत में भी मनहूसी का ही भाव है । निस्तेज, उदासीनता, दीनता, असहायता, क्लेश, आत्मदया, दुख या खिन्नता के भाव इसमें हैं । नहूसा में धूल, गर्द का भाव भी है । गौर करें कि किसी चीज़ की परवाह न की जाए तो उस पर धूल जम जाती है यानी वह वस्तु अपनी आभा या तेज खो देती है । चेहरा निस्तेज तभी होता है जब उस पर दुख या चिन्ता की छाया हो । चीज़ों पर धूल जमना बुरे दिनों का संकेत है । खुशहाली में चमक है, बदहाली को गर्दिश कहते हैं । चीज़ों पर धूल जमना अपशकुन है । यही नहूसा है । उर्दू में गर्दे-नहूसत भी एक पद है जिसका अर्थ है दुर्भाग्य की धूल, अशुभ लक्षण आदि । अस्त-व्यस्त में भी गर्दे-नहूसत को देखा जा सकता है । अस्त-व्यस्त के ‘अस्त’ में निहित निस्तेजता ( सूर्यास्त ) साफ़ पहचानी जा सकती है । परास्त में यही अस्त है । हार भी अपशकुन है । प्रेमचंद और उनके दौर की भाषा में नहूसत शब्द मिलता है ।
धूल जमने वाले लक्षण की तरह अन्य लक्षणों के आधार पर भी मनहूसियत को समझा जा सकता है । निकम्मे, कामचोर, आलसी, सुस्त लोगों को भी मनहूस कहा जाता है, क्योंकि उनकी वजह से परिवार, समूह, समाज में बरक्कत की उम्मीद नहीं रहती । अक्सर किसी भी संस्थान की बदहाली की वजह निठल्लों की जमात होती है । हाथ पर हाथ धरे बैठना, उंगलियाँ चटकाना, असमय सोना, उबासियाँ लेना, गुमसुम रहना, ऊँघना, नाखून से ज़मीन कुरेदना, आसमान ताकना, शून्य में देखना, निश्चेष्ट बैठे रहना, देर से जागना समेत दैनंदिन कार्य-व्यवहार के अनेक ऐसे संकेत हैं जिन्हें नहूसत या मनहूसी के दायरे में समझा जाता है क्योंकि इनमें गति अथवा क्रिया नहीं है । निष्क्रियता विकास को अवरुद्ध करती है । यही सबसे बड़ा अपशकुन है ।
नेस्तनाबूद, नष्ट-भ्रष्ट या बरबादी के संदर्भ में हिन्दी का तहस-नहस मुहावरा आम लोगों की ज़बान पर है । यह भी इसी कड़ी में आता है और तहस + नहस से मिलकर बना है । अ डिक्शनरी ऑफ़ उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एंड इंग्लिश में जॉन प्लैट्स तहस-नहस का मूल नह्स-तह्स ( naḥs + taḥs ) बताते हैं । नह्स के तौल पर तह्स शब्द की रचना अनुकरण और साम्य का नतीजा है । स्वतंत्र शब्द के रूप में इसकी कोई अर्थवत्ता नहीं है । अरबी की नह्स-तह्स टर्म का हिन्दुस्तानी में विपर्यय होकर तहस – नहस रूपान्तर हुआ । नहूसा में निहित दुर्भाग्य, बदक़िस्मती, अशुभ जैसे आशय नहस में खराबी, बिगाड़, विनष्ट, खंडित, बरबाद, तितर-बितर, विध्वस्त में अभिव्यक्त हो रहे हैं । दुर्भाग्यपूर्ण जैसी अर्थवत्ता यहाँ सुरक्षित है । नहूसा में निहित गर्द वाला भाव अगर देखे तो तहस-नहस का हिन्दी पर्याय धूल-धूसरित सर्वाधिक योग्य नज़र आता है ।

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Monday, November 5, 2012

चारों ‘ओर’ तरफ़दार

direction

दिन भर के कार्यव्यवहार में इंगित करने, दिशा बताने के संदर्भ में हम कितनी बार ‘तरफ़’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, अन्दाज़ लगाना मुश्किल है । इस तरफ़, उस तरफ़, हर तरफ़ जैसे वाक्यांशों में तरफ़ के प्रयोग से जाना जा सकता है कि यह बोलचाल की भाषा के सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में एक है । ‘तरफ़’ अरबी ज़बान का शब्द है और बज़रिये फ़ारसी इसकी आमद हिन्दी में हई है । ‘तरफ़’ की अर्थवत्ता के कई आयाम हैं मसलन- ओर, दिशा, जानिब, पक्ष, किनारा, सिरा, पास, सीमा, पार्श्व , बगल, बाजू आदि । तरफ़ का बहुप्रयुक्त पर्याय हिन्दी में ओर है जैसे ‘इस ओर’, ‘उस ओर’, ‘चारों ओर’, ‘सब ओर, ‘चहुँ ओर’ आदि । ओर में भी इंगित करने या दिशा-संकेत का लक्षण प्रमुखता से है ।
रबी धातु T-r-f ता-रा-फ़ा [ ف - ر ط - ] में संकेत करने का आशय है । मूलतः इस संकेत में निगाह घुमाने, रोशनी डालने, पलक झपकाने, झलक दिखाने जैसी क्रियाएँ शामिल हैं । अरबी में इससे बने तरफ़ / तराफ़ में दिशा ( पूरब की तरफ़, उत्तर की तरफ़), ( मेरी तरफ़, तेरी तरफ़ ), किनारा ( नदी के उस तरफ़) का आशय है । इसके अलावा उसमें सिरा, छोर, पास, कोना, जानिब जैसी अर्थवत्ता भी है । तरफ़ में दिशा-संकेत का भाव आँख की पुतलियों के घूमने से जुड़ा है । सामने देखने के अलावा पुतलियाँ दाएँ-बाएँ घूम सकती हैं । आँख के दोनो छोर, जिसे कोर कहते हैं, तरफ़ का मूल आशय उससे ही है । पुतलियाँ जिस सीमा तक घूम सकती हैं, उससे बिना बोले या हाथ हिलाए किसी भी ओर इंगित किया जा सकता है । आँख के संकेत से दिशा-बोध कराने की क्रियाविधि से ही तरफ़ में दिशा, ओर, छोर, किनारा, पास, साइड side जैसे अर्थ स्थापित हुए । तरफ़ में फ़ारसी का बर प्रत्यय लगने से बरतरफ़ शब्द बनता है जिसका आशय बर्खास्तगी से है ।
रफ़ में पार्श्व, पक्ष या पास जैसी अर्थवत्ता भी है । अरबी के तरफ़ में फ़ारसी का ‘दार’ प्रत्यय लगने से तरफ़दार युग्मपद बना जिसका अर्थ है समर्थक, पक्ष लेने वाला अथवा हिमायती । जो आपके साथ रहे वह पासदार कहलाता है और तरफ़दार में भी साथी का भाव है । इससे ही तरफ़दारी बना जिसमें किसी का पक्ष लेने, पासदारी करने का आशय है । किसी को अपने पक्ष में करने के लिए कहा जाता है कि उसे अपनी तरफ़ मिला लो । सामान्यतया किसी एक का पक्ष लेने वाला व्यक्ति पक्षपाती कहलाता है । तरफ़दार निश्चित ही किसी एक पक्ष का समर्थनकर्ता होता है । हिन्दी के पक्षपाती में जहाँ नकारात्मक अर्थवत्ता नज़र आती है वहीं तरफ़दार में ऐसा नहीं है । उचित-अनुचित का विचार करने के बाद किसी पक्ष का समर्थन करने वाला तरफ़दार है । दोनों पक्षों की थाह लिए बिना मनचाहे पक्ष की आँख मूँद कर हिमायत करने वाला पक्षपाती है । चीज़ के दो पहलू होते हैं । तरफ़ में जो पक्ष का भाव है वह और अधिक स्पष्ट होता है उससे बने एकतरफ़ा, दोतरफ़ा जैसे युग्मपदों से । एकतरफ़ा में पक्षपात हो चुकने की मुनादी है जैसे एकतरफ़ा फ़ैसला । जबकि दोतरफ़ा में दोनों पक्षो का भाव है ।
ब्दों के सफ़र में अब चलते हैं उस दिशा में जहाँ खड़ा है तरफ़ का पर्याय 'ओर' । भाषाविदों के मुताबिक ओर का जन्म संस्कृत के ‘अवार’ से हुआ है जिसमें इस पार, निकटतम किनारा, नदी के छोर या सिरा का आशय है । मोनियर विलियम्स के मुताबिक अवार का ही पूर्वरूप अपार है । गौरतलब है कि आर्यभाषा परिवार की ‘व’ ध्वनि में या में बदलने की वृत्ति है । संस्कृत के अप में दूर, विस्तार, पानी, समुद्र आदि भाव हैं । इसी का एक रूप अव भी है जिसमें दूर, परे, फ़ासला, छोर जैसे भाव हैं । अवार के ‘वार’ में भी ‘पार’ का भाव है । इस किनारे के लिए पार और उस किनारे के लिए वार । ज़ाहिर है कि उस किनारे वाले व्यक्ति के लिए किनारों के संकेत इसके ठीक उलट होंगे । 
पार का ही अन्य रूप अवार है और अवार से ओर का निर्माण हुआ जिसमें छोर, किनारा, दिशा, दूरी, अन्तराल जैसे आशय ठीक अरबी के ‘तरफ़’ जैसे ही हैं । पारावार और वारापार शब्दों में यही भाव है । ‘वार’ और में ‘पार’ में मूलतः व और प ध्वनियों का उलटफेर है । पार का निर्माण पृ से हुआ है और वार का ‘वृ’ से । पार के मूल में जो पृ धातु है उसमें गति का भाव है सो इसका अर्थ आगे ले जाना, उन्नति करना, प्रगति करना भी है । आगे बढ़ने के भाव का ही विस्तार पार में । पार यानी किसी विशाल क्षेत्र का दूसरा छोर । वैसे पार का सर्वाधिक प्रचलित अर्थ नदी का दूसरा किनारा ही होता है । पार शब्द भी हिन्दी के सर्वाधिक इस्तेमालशुदा शब्दों में है । आर-पार को देखिए जिसमें मोटे तौर पर तो इस छोर से उस छोर तक का भाव है, मगर इससे किसी ठोस वस्तु को भेदते हुए निकल जाने की भावाभिव्यक्ति भी होती है । आर-पार में पारदर्शिता भी है यानी सिर्फ़ भौतिक नहीं, आध्यात्मिक, मानसिक भी ।
संबंधित शब्द- 1. पक्ष. 2. पारावार. 3. वारापार. 4. वस्तु. 5. नदी. 7. आँख. 9. वार.

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Friday, November 2, 2012

तारीफ़ अली उर्फ़…

praising

प्र शंसा के अर्थ में हिन्दी मे तारीफ़ शब्द बोलचाल में रचा-बसा है । प्रशंसा क्या है ? हमारे आस-पास जो कुछ खास है उसकी शैली, गुण, वृत्ति, स्वभाव के बारे में सकारात्मक उद्गार । तारीफ़ दरअसल किसी व्यक्ति, वस्तु के गुणों का बखान ही होता है । हिन्दी की विभिन्न बोलियों समेत मराठी, गुजराती, बांग्ला में भी तारीफ़ शब्द है । तारीफ़ सबको अच्छी लगती है । कई लोग सिर्फ़ तारीफ़ सुनने के आदी होते हैं और कई लोग तारीफ़ करना जानते हैं ।  ज़रा सी तारीफ़ दो लोगों के बीच मनमुटाव खत्म कर सकती है । इसलिए तारीफ़ ज़रिया है, रिश्ता है, पुल है । खुशामदी लोग अक्सर तारीफ़ों के पुल बांध देते हैं । कहना न होगा कि झूठी तारीफ़ के रिश्ते इसलिए जल्दी ढह जाते हैं । वैसे तारीफ़ों के पुल ही नहीं बनते, तारीफ़ो की बरसात भी होती है ।
तारीफ़ सेमिटिक मूल का शब्द है और अरबी से बरास्ता फ़ारसी बोलचाल की हिन्दी में दाखिल हुआ । तारीफ़ के मूल में अराफ़ा क्रिया है जिसका जन्म अरबी धातु ऐन-रा-फ़ा [ع-ر-ف] से हुआ है । ऐन-रा-फ़ा [ 'a-r-f ] में पहचानना, मानना, स्वीकार करना जैसे भाव हैं । प्रकारान्तर से इसके साथ ज्ञान, बोध, अनुभूति, परिचय जैसे भाव जुड़ते हैं । “आपकी तारीफ़” जैसे वाक्य में परिचय का आशय है, न कि सामने वाले के मुँह से उसकी प्रशंसा सुनने की मांग ।  कुछ कोशों में इसका अर्थ गन्ध दिया हुआ है । यूँ देखा जाए तो गन्ध से ही किसी चीज़ की पहचान, बोध या ज्ञान होता है । अरबी का ‘ता’ उपसर्ग लगने से तारीफ़ बनता है जिसमें मूलतः किसी घोषणा, उद्गार (सकारात्मक) का भाव है । तारीफ़ में विवरण, वर्णन भी होता है । तारीफ़ में प्रशंसाभर नहीं बल्कि इसका एक अर्थ गुण भी है । सिर्फ़ प्रशंसा झूठी हो सकती है, मगर गुण का बखान झूठ की श्रेणी में नहीं आता । सो गुण ( परिचय ) की जानकारी, उसकी व्याख्या, विवरण, प्रकटन, बखान आदि तारीफ़ के दायरे में है ।
सामान्यतया परिचय के अर्थ में हम तआरुफ़ शब्द का प्रयोग करते हैं । ताआरुफ़ सिर्फ़ किन्ही दो लोगों को एक दूसरे से मिलाना अथवा किन्ही दो लोगों का आपस में परिचय भर नहीं है । अराफ़ा में जानने का भाव है, जो सीखने के लिए ज़रूरी है । इसी तरह औरों को योग्य बनाने के लिए सीखना ज़रूरी है । हमने जो कुछ जाना है, वही दूसरे भी जान लें, यही तआरुफ़ है । बुनियादी तौर पर तआरुफ़ में समझने-समझाने, शिक्षित होने का भाव है । इसका एक रूप तअर्रुफ़ भी है जिसका अर्थ जान-पहचान, समझना आदि है । इसी शृंखला के कुछ और शब्द हैं जो हिन्दी क्षेत्रों में इस्तेमाल होते हैं जैसे संज्ञानाम आरिफ़ जिसका अर्थ है जानकार, विशेषज्ञ, प्रवीण, निपुण, चतुर आदि । इसी तरह एक अन्य नाम है मारूफ़ । संज्ञानाम के साथ यह विशेषण भी है । मारूफ़ वह है जिसे सब जानते हों । ख्यात । प्रसिद्ध । नामी । जाना-माना । बहुमान्य । मशहूर आदि । साहित्य में मारूफो-मोतबर ( नामी और विश्वसनीय ) या मारूफ़ शख्सियत जैसे प्रयोग जाने-पहचाने हैं ।
सी कड़ी में उर्फ़ भी है । हिन्दी में उर्फ़ शब्द का प्रयोग भी बहुतायत होता है । उर्फ़ तब लगाते हैं जब किसी व्यक्ति के मूल नाम के अलावा अन्य नाम का भी उल्लेख करना हो । उर्फ़ यानी बोलचाल का नाम, चालू नाम । जैसे राजेन्द्रसिंह उर्फ़ ‘भैयाजी’ । ज़ाहिर है मूल नाम के अलावा जिस नाम को ज्यादा लोकमान्यता मिलती है वही ‘उर्फ़’ है । उस शख्सियत का बोध समाज को प्रचलित नाम से जल्दी होता है बजाय औपचारिक नाम के । इसलिए उर्फ़ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि समाज में उसी नाम से लोग उसे पहचानते हैं । फ़ारसी में इसका उच्चार ‘ओर्फ़’ की तरह होता है । लोग कहतें है, ज़रा सी तारीफ़ करने में क्या जाता है ? अर्थात तारीफ़ में कोई मेहनत नहीं लगती, अपनी जेब से कुछ नहीं जाता । एक धेला खर्च किए बिना तारीफ़ से काम हो जाता है । ऐसी तारीफ़ खुशामद कहलाती है । 
रबी, तुर्की में ही तारीफ़ का तारिफ़ा रूप भी है जिसका अर्थ किसी चीज़ का मूल्य अथवा किराया है । करें कि जिस तरह किसी चीज़ की गन्ध ही उसका परिचय होती है या यूँ कहें कि किसी चीज़ के अस्तित्व का बोध उसकी गंध से होता है । मनुष्य जीवन में मूल्यवान अगर कुछ है तो वह गुण ही हैं । गुणों से ही स्व-भाव विकसित होता है । मूल्य बना है ‘मूल’ से जिसमें मौलिक, असली, खरा का भाव है । जो जड़ में है । जो उसका स्व-भाव है । जब हम किसी चीज़ का मूल्य आँकते हैं तब गुणवत्ता की परख ही महत्वपूर्ण होती है । गुण ही मूल्य हैं । गुण ही किसी चीज़ को विशिष्ट बनाते हैं, मूल्यवान बनाते हैं । मनुष्य के आचार-विचार ही उसके गुण हैं । वही उसके जीवनमूल्य होते हैं । कहते हैं कि सिर्फ़ तारीफ़ से पेट नहीं भरता । इसका अर्थ यह कि गुण का मूल्यांकन करने के बाद ज़बानी प्रशंसा काफ़ी नहीं है ।
सी तरह किसी चीज़ का मूल्य दरअसल उसका परिचय ही है । भौतिकवादी ढंग से सोचें तो किसी चीज़ का मूल्य अधिक होने पर हम फ़ौरन उसकी खूबी ( गुण ) जानना चाहते हैं । यानी मूल्य का गुण से सापेक्ष संबंध है । तारिफ़ा में मूल्य का जो भाव है उसका अर्थ भी प्रकारान्तर से परिचय ही है । अरबी के तारिफ़ा में जानकारी, सूचना जैसे भावों का अर्थसंकोच हुआ और इसमें मूल्य, मूल्यसूची, खर्रा, फेहरिस्त समेत दाम, दर, शुल्क, भाव, मूल्य, कर जैसे आशय समाहित हो गए । यह जानना भी दिलचस्प होगा कि अंग्रेजी के टैरिफ़  tariff शब्द का मूल भी अरबी का तारिफ़ा ही है । अरब सौदागरों का भूमध्यसागरीय क्षेत्र में दबदबा था । मूल्यवाची अर्थवत्ता के साथ तारिफ़ा लैटिन में दाखिल हुआ और फिर अंग्रेजी में इसका रूप टैरिफ़ हो गया जिसमें मूलतः शुल्क, दर या कर वाला अभिप्राय है ।

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Monday, October 29, 2012

रफूगरी, रफादफा, हाजत-रफा

पिछली कड़ियाँ- 1.‘बुनना’ है जीवन.2.उम्र की इमारत.3.‘समय’ की पहचान.darn 4. दफ़ा हो जाओ 

हि न्दी की अभिव्यक्ति क्षमता बढ़ाने में विदेशज शब्दों के साथ-साथ युग्मपद और मुहावरे भी है शामिल हैं । रफ़ा-दफ़ा ऐसा ही युग्मपद है जिसका बोलचाल की भाषा में मुहावरेदार प्रयोग होता है । “रफ़ा-दफ़ा करना” यानी किसी मामले को निपटाना, किसी झगड़े को सुलझाना, विवादित स्थिति को टालना, दूर करना । रफ़ा-दफ़ा में नज़र आ रहे दोनो शब्द अरबी के हैं । यहाँ ‘दफ़ा’ का अर्थ ढकेलने, दूर करने से है । इसकी विस्तृत अर्थवत्ता के बारे में पिछली कड़ी में बात की जा चुकी है । रफा ( रफ़ा ) का मूल अरबी उच्चारण रफ़्अ है । फ़ारसी में भी इसका ‘रफ़्अ’ रूप ही इस्तेमाल होता है
फ्अ शब्द की अरबी धातु रा-फ़ा-ऐन ر-ف-ع है जिसमें मूलतः उन्नत करने, सुधारने, ठेलने का भाव है । अरबी क्रियापद है रफ़ाआ जिसमें मरम्मत करना, सुधारना, सीना, ठीक करना, उन्नत करना, तब्दील करना, हटाना जैसे भाव हैं । रफ़ा-दफ़ा में यही भाव है । आमतौर पर हाज़त-रफ़ा पद का प्रयोग भी शौच जाने के अर्थ में उत्तर भारत में इस्तेमाल होता है । जैसे “उनके लिए सुबह सुबह हाजत-रफा करना बड़ा मुश्किल काम था” । इसी कड़ी में आता है ‘रफू’ या ‘रफ़ू’ शब्द । सिलेसिलाए वस्त्र में खोंच लगने पर रफ़ू किया जाता है । इसक अन्तर्गत फटे हुए स्थान की खास तरीके से मरम्मत की जाती है । इसमें बारीक सुई से, जिस कपड़े की मरम्मत होनी है, उसी के अनावश्यक टुकड़े और धागे निकाल कर फटे हुए स्थान को इस खूबी से सिला जाता है कि सिलाई का पता नहीं चलता । यह सिलाई का हुनर है कि मरम्मतशुदा हिस्सा भी कपड़े के टैक्सचर ( बुनावट ) से मेल खाता लगता है ।
रअसल फटे कपड़ों की मरम्मत से विकसित हुई सिलाई की खास तकनीक ने धीरे धीरे कला का रूप ले लिया । फ़ारस में इसका विकास हुआ और मरम्मत के सामान्य उपाय से रफ़ू एक कलाविधा बन गई । फ़ारसी में इसे रफ़ूगरी कहते हैं । रफ़ूगरी यानी रफ़ूकारी । फ़ारसी में ‘करने’ के संदर्भ में ‘गरी’ और ‘कारी’ प्रत्यय प्रचलित हैं । भारोपीय भाषाओं में ‘क’ का रूपान्तर ‘ग’ वर्ण में होता है । वैदिक क्रिया ‘कृ’ इसके मूल में है जिसमें करने का भाव है । इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में इनका प्रयोग देखने को मिलता है जैसे - कर ( बुनकर ) , कार ( कर्मकार, कलाकार, कुम्भकार ) , कारी ( कलाकारी , गुलकारी , फूलकारी ) , गार ( गुनहगार, रोज़गार ), गर ( रफ़ूगर, कारीगर, बाजीगर ) , गरी ( कारीगरी, रफ़ूगर, बाजीगरी ) आदि उदाहरण आम हैं । सो खोंच से बने छिद्र को उसी वस्त्र के टुकड़े और उसी के धागे से पूरने, भरने, बराबर करने की हुनरकारी ही रफ़ूगरी है । इस मुक़ाम पर रफ्अ में निहित सुधारने, उन्नत करने जैसे भावों को समझना आसान होगा ।
फ़ूगरी का कला के रूप में इतना विकास हुआ कि न सिर्फ़ फटे कपड़े की मरम्मत बल्कि गोटा-किनारी कशीदाकारी, फुलकारी जैसे सजावटी हुनर के रूप में भी कपड़ों को खूबसूरत बनाने में रफ़ूगरी का उपयोग होने लगा । सामान्य समस्या से निपटने की तरकीबें कैसे मूल्यवान हो जाती हैं, यह जानना दिलचस्प है । फटे कपड़े की मरम्मत थिगला लगा कर भी होती है । यह थिगला आज पैचवर्क जैसी कलाविधा के रूप में मशहूर है जो रफ़ूगरी का ही एक रूप है । रफ़ू का महत्व इतने पर ही खत्म नहीं हुआ । रफ्अ में सुधारना, उन्नत करना जैसे भावों के चलते ही रफ़ू शब्द का प्रयोग वाग्मिता या वक्तृत्व कला में भी होने लगा है । बातों के बाजीगरों को रफ़ूगरी भी आनी चाहिए । अपने तर्कों से दो असम्बद्ध बातों को मिला देना या वाक्पटुता के चलते अलग-अलग पटरी पर चल रहे वार्तलाप को सही दिशा में ले आना या विवाद को खत्म करना इसी रफ़ूगरी में आता है । ऐसे लोगो की वजह से ही ज़बानी विवाद रफ़ा-दफ़ा हो पाते हैं । कुल मिलाकर यह भी उन्नत तकनीक का मामला है ।
शब्द का इस्तेमाल एक अन्य लोकप्रिय युग्मपद में भी बखूबी नज़र आता है । रफूचक्कर या रफ़ूचक्कर भी हिन्दी का लोकप्रिय मुहावरा है जिसका अर्थ है चम्पत हो जाना, भाग जाना अथवा गायब हो जाना । रफ़ू की अर्थवत्ता समझ लेने के बाद रफ़ूचक्कर को समझना कठिन नहीं है । खोंच लगे स्थान पर रफ़ू करने के दो तरीके होते हैं । छोटा खोंच है तो उसी वस्त्र के धागे से सिलकर छिद्र को भर दिया जाता है । खोंच बड़ा है तो फटे स्थान पर उसी कपड़े का थिगला लगा कर गोलाई में रफ़ू कर दिया जाता है । माना जा सकता है कि चकरीनुमा इस थिगले से ही रफ़ूचक्कर शब्द निकला होगा । रफ़चक्कर में खोंच के गायब हो जाने के भाव का विस्तार है । इसका प्रयोग किसी भी चीज़ के देखते देखते ग़ायब हो जाने में होने लगा । चोरों और उठाईगीरों के सन्दर्भ में आज  रफ़ूचक्कर का इस्तेमाल ज्यादा होता है ।

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