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Friday, January 1, 2016

2016 के आगे क्या लिखेंगे- ‘सन्’ या ‘सन’


र नया साल बदलाव को अभिव्यक्त करने वाली इकाई भर है। एक ऐसा आँकड़ा जो पिछले वर्ष की तुलना में एक अंक ज्यादा होता है। इसे हिन्दी में ज्यादातर ‘सन्’ यानी 'न' में हलन्त लगाकर अभिव्यक्त किया जाता है। यह हैरत की बात है कि इसके सही उच्चारण और वर्तनी के मामले में हिन्दी कोशों में काफ़ी अन्तर नज़र आता है। हलन्त की वजह से अनेक लोगों को भ्रम भी होता है कि यह संस्कृत का शब्द है जबकि असल में यह अरबी आप्रवासी है और हिन्दी वालों की ज़बान पर भी चढ़ा हुआ है। सन बना है س ن ة यानी सीन-नून-हा से और यह शब्द "रास अस सनाह अल हिजरियाह" رأس السنة الهجرية पद के ज़रिये भारत में आया जिसका अर्थ होता है इस्लामी नव संवत्सर।

अरबी में सीन-नून-हा س ن ة धातुक्रिया का अर्थ होता है वर्ष, साल, अवधि, समय, काल, मौका, युग, ऋतु, वर्ष, मौसम, सुअवसर आदि। एक बड़ी खूबसूरत अर्थव्यवंजना सामने आती है। इसमें समय के बीतते जाने का भाव भी है और कायम रहने का भी। ध्यान रहे, काल व्यतीत होता जाता है फिर भी रीतता नहीं। समय जाता है और आता है, हाँ, लौटता नहीं। तो यही काल-प्रवाह है 'सन'।

'सन' में एक और सुंदर आशय निहित है- गुणवत्ता में परिवर्तन। अक्सर लोग हर नए साल पर कुछ नया करने, बदलाव लाने के प्रति खुद के साथ या किन्हीं अपनों के साथ कुछ प्रस्ताव पारित करते हैं, कुछ अनुबन्ध करते हैं, कुछ पाबन्दियाँ लगाते हैं, कुछ शपथ लेते हैं और यह सब इसलिए ताकि कुछ बदलाव आए। यह जो बदलाव है यह जीवन की बेहतरी के लिए ही तो है। बस, यही है गुणवत्ता में परिवर्तन। आप जो कल थे, बेहतर भविष्य के लिए अब खुद को बदलना चाहते हैं। यह खुद में गुणात्मक बदलाव लाना है।

हिन्दी मे 'सन' को हलन्त लगाकर सन् की तरह बरता जाता है। इसकी वजह समझ से परे है जबकि मूल अरबी की वर्तनी और उच्चार سنة (सीन-नून-हा) में हलन्त नहीं, विसर्ग है और उसका उच्चार सनः या सनह होता है। अगर बिना विसर्ग के लिखना हो तो سن सन (सीन-नून) लिखा जाएगा। गौरतलब है, ये दोनों ही प्रविष्टियाँ मुहम्मद मुस्तफ़ा खाँ ‘मद्दाह’ के कोश में भी दी गई हैं। हिन्दी कोशों में भी इसे अलग अलग ढंग से दर्ज़ किया गया है। करीब नब्बे साल पुराने हिन्दी शब्दसागर में इसे हलन्त लगाकर ही दर्ज़ किया है।

इसी तरह केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा प्रकाशित उर्दू-हिन्दी परिचय कोश में सीताराम शास्त्री हलन्त लगाकर सन् लिखते हैं किन्त उर्दू वर्तनी में यह सन ही पढ़ा जाता है। गौरतलब है कि फ़ारसी, अरबी के विसर्गयुक्त शब्दों का उच्चार बोलचाल की भाषा में ‘आ’ स्वर के साथ होता है मसलन घर के अर्थ में 'खानः' का उच्चार 'खाना' हो जाता है, 'मुर्दः' का उच्चारण 'मुर्दा या मुरदा' हो जाता है इसी तरह सनः का उच्चार 'सना' हो जाता है जो एक लोकप्रिय स्त्रीवाची नाम भी है अलबत्ता वर्ष के अर्थ में इसका उच्चार 'सन' ही है। अरविन्दकुमार-कुसुमकुमार के हिन्दी थिसारस में भी ‘सन्’ के स्थान पर ‘सन’ ही दर्ज़ किया गया है।

मज़े की बात यह कि ज्ञानमण्डल के दो शब्दकोश इसकी अलग अलग वर्तनी बताते हैं। मुकन्दीलाल श्रीवास्तव/ कालिकाप्रसाद सम्पादित कोश में हलन्त रहित ‘सन’ है जबकि हरदेव बाहरी के कोश में सन् को हलन्त के साथ दर्ज़ किया गया है। गड़बड़झाला यही खत्म नहीं होता। एक ही सम्पादक के दो अलग-अलग कोशों में वर्तनी भी भिन्न है। रामचन्द्र वर्मा के बृहत कोश में भी सन का इन्द्राज बिना हलन्त लगाए हुआ है। दिलचस्प यह भी है कि रामचन्द्र वर्मा ही सबसे पुराने कोश “हिन्दी शब्दसागर” के सम्पादक मण्डल में भी शामिल थे जिसमें हलन्तयुक्त व्युत्पत्ति है।

मेरे संग्रह में पचास से ज्यादा कोश हैं और फ़िलहाल उन्हें पलटने का मौका नहीं मिला है। देखना चाहूँगा कि बरताव का यह अन्तर कहाँ कहाँ कायम है। ज़ाहिर है कुछ हलन्त लगा रहे होंगे और कुछ नहीं। कम से कम यह तो पता चलेगा कि बहुमत किस उच्चार/ वर्तनी के साथ है। इस सिलसिले में हम गूगल बाबा का सर्वे ज़रूर सामने रखना चाहेंगे। गूगल बिना हलन्त वाले सन की 4 लाख 48 हज़ार प्रविष्टियाँ उगलता है जबकि हलन्त वाला सन् लिखने पर पल भर में 50 करोड़ प्रविष्टियाँ उगल देता है। ज़ाहिर है, हलन्त लगा हुआ उच्चार ही हिन्दी में सर्वाधिक प्रचलित है मगर उसे अरविन्द कुमार का हिन्दी थिसारस भी मान्यता नहीं देता।

ऐसा लगता है कि हिन्दी सम्पादकों में हलन्त लगाने की सोच इसलिए बनी होगी क्योंकि हिन्दी में एकाधिक सन' हैं जैसे एक पौराणिक नाम, जूट के लिए प्रचलित सन अथवा ध्वनिसूचक सन आदि। अरबी के सन को उससे भिन्न दिखाने के लिए उसके साथ हलन्त लगा दिया गया होगा। इस सिलसिले में हमारा स्पष्ट मानना है कि वर्तनी अपनी जगह और सन्दर्भ अपनी जगह। वर्ष के अर्थ में सन का प्रयोग हमेशा अंकों के साथ ही होता है। किसी झमेले की गुंजाईश कहाँ ?

तो नए साल में यह भी तय कर लें कि 2016 के आगे लिखे सन के साथ हल् रखना है या नहीं। बहरहाल, सबको नया साल शुभ हो।

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Tuesday, December 9, 2014

//थाँके टिपे नी काँईं ?//


प्र

त्येक बोली-भाषा में कुछ अनोखे शब्द होते हैं। मालवी भाषा में देखने के लिए एक खास क्रिया का प्रयोग होता है- ‘टिपना’ जैसे- “थाँके कम टिपे काँई?” अर्थात तुझे कम दिखता है क्या? यह ‘टिप’ कहाँ से आ रहा है? गौर करें प्रचीनकाल से ही ऊर्जा का प्रमुख स्रोत सूर्य रहा है। अन्तरिक्ष की ओर ताकना प्रागैतिहासिक काल से मनुष्य का प्रिय शगल रहा। ऊष्मा, ऊर्जा, चमक ये सब अग्नि के गुणधर्म हैं। सूर्य उगने पर ही मनुष्य के सामने दृष्यजगत उजागर होता था। हमें कुछ भी दिखता इसलिए हैं क्योंकि वह प्रकाशित है। यानि प्रत्येक वस्तु में कुछ न कुछ भासित है क्योंकि वह दीप्त है। व्ह जो दीप्त है उसे हिन्दी में दिपना कहते हैं| यही मालवी का टिपना है| दिपना-टिपना के ज़रिये जानते हैं हिन्दी के कुछ बेहद प्रचलित शब्दों के बारे में। 

हर भाषा में किन्हीं ध्वनियों में बदलाव का अलग अंदाज़ होता है जिससे शब्दों का विकास होता है। हिन्दी-ईरानी में एक ही वर्णक्रम की ध्वनियों में बदलाव होता जाता है जैसे ‘प’ और ‘व’ में परस्पर बदलाव होता है। उदाहरण के लिए वैदिक शब्द ‘तप्’ को लें जिसमें अग्नि, चमक, ऊर्जा के साथ कष्ट, साधना, अभ्यास का भाव भी है। इससे ही तपस्वी, तपस्या, तापस जैसे शब्द बने। ‘तप’ का विकास ताप है। हिन्दी-फ़ारसी में ‘ताप’ से ‘ताव’ बनता है जिसमें गर्मी का भाव है। ‘ताव’ से ही मालवी-राजस्थानी में ‘तावड़ा’ बनता है यानी धूप। ‘तपः’ का एक रूप फारसी में तबाह बनता है जिसका अर्थ है बर्बादी, विनष्ट, जर्जर, ध्वस्त, निर्जन, वीरान आदि। समझा जा सकता है कि किसी जमाने में अग्नि से जुड़ी विभीषिका को ही तबाही कहा जाता रहा होगा।

हम जिसे दिन कहते हैं उसका एक रूप दिवस है। दिवस का मूल दिव है। गौर करें, यह दिव दरअसल दिप् रहा होगा और यह भी कि तप, ताप जैसे शब्द इसी दिप् से विकसित हैं। वैदिकी में दिप् नहीं है, दीप् क्रिया है किन्तु इसका पूर्वरूप दिप् ज़रूर रहा होगा क्योंकि कालान्तर में ऐसे अनेक वैदिक-संस्कृत शब्दरूप बने जिनका मूल दिप् ही सिद्ध होता है। यही दिप्, टिपना क्रिया का मूल है। ख्यात भाषाविद् डॉ रामविलास शर्मा “भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश-1” में ऋग्वेद के तपस् /तवस रूपों की चर्चा करते हैं। तपस् जो ऊष्मा के अर्थ में प्रयुक्त हुआ तथा तवस् जिसका प्रयोग ऊर्जा, शक्ति के अर्थ में हुआ है, इससे साबित होता है कि दिव् का पूर्वरूप भी दिप् रहा होगा जिससे दीप् क्रिया बनी होगी जिसमें जलना, ऊर्जा, ऊष्मा, चमक, प्रकाश जैसे भाव है और इससे ही दीप, दीपक, दीवाली जैसे अनेक शब्द बने। यह साबित होता है हिन्दी की ‘दिपना’ क्रिया से जिसका अर्थ चमक, प्रकाश या प्रदीपन है। मूल भाव है दिखना। यह न माना जाए कि ‘दिपना’ का अगला रूप ‘टिपना’ है। टिपना ‘टिप’ से आ रहा है और दिपना ‘दिप’ से। ‘दिप्’ के ‘टिप्’ रूप से मालवी की ‘टिपना’ क्रिया बनी।

‘दिप’ में निहित दीप्ति, चमक, प्रकाश जैसे भाव ही ‘टिप’ में भी समाहित है। कोई चीज़ जब चमकती है तो ही नज़र आती है। हाँ, संस्कृत में इसका अर्थविस्तार भी हुआ और इसमें चमक, झलक, दिखाना, व्याख्या जैसे भाव हैं। किसी वस्तु का दीप्तिमान होना या उसका दीपन, प्रदीपन होना ही उजागर होना है। टिप से ही मालवी बोली में ‘टिपना’ शब्द बना जिसका अर्थ है दिखना। हिन्दी में ‘टिप्पणी’ या टीका-टिप्पणी शब्द भी खूब प्रचलित है। टिप्पणी का अर्थ है किसी वाक्य, वस्तु, स्थान अथवा विचार को स्पष्ट करने वाला विवरण। इस में भी मूलतः उजागर करने का ही भाव है और इसीलिए इसे टिप्पणी कहा जाता है।
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Monday, November 5, 2012

चारों ‘ओर’ तरफ़दार

direction

दिन भर के कार्यव्यवहार में इंगित करने, दिशा बताने के संदर्भ में हम कितनी बार ‘तरफ़’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, अन्दाज़ लगाना मुश्किल है । इस तरफ़, उस तरफ़, हर तरफ़ जैसे वाक्यांशों में तरफ़ के प्रयोग से जाना जा सकता है कि यह बोलचाल की भाषा के सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में एक है । ‘तरफ़’ अरबी ज़बान का शब्द है और बज़रिये फ़ारसी इसकी आमद हिन्दी में हई है । ‘तरफ़’ की अर्थवत्ता के कई आयाम हैं मसलन- ओर, दिशा, जानिब, पक्ष, किनारा, सिरा, पास, सीमा, पार्श्व , बगल, बाजू आदि । तरफ़ का बहुप्रयुक्त पर्याय हिन्दी में ओर है जैसे ‘इस ओर’, ‘उस ओर’, ‘चारों ओर’, ‘सब ओर, ‘चहुँ ओर’ आदि । ओर में भी इंगित करने या दिशा-संकेत का लक्षण प्रमुखता से है ।
रबी धातु T-r-f ता-रा-फ़ा [ ف - ر ط - ] में संकेत करने का आशय है । मूलतः इस संकेत में निगाह घुमाने, रोशनी डालने, पलक झपकाने, झलक दिखाने जैसी क्रियाएँ शामिल हैं । अरबी में इससे बने तरफ़ / तराफ़ में दिशा ( पूरब की तरफ़, उत्तर की तरफ़), ( मेरी तरफ़, तेरी तरफ़ ), किनारा ( नदी के उस तरफ़) का आशय है । इसके अलावा उसमें सिरा, छोर, पास, कोना, जानिब जैसी अर्थवत्ता भी है । तरफ़ में दिशा-संकेत का भाव आँख की पुतलियों के घूमने से जुड़ा है । सामने देखने के अलावा पुतलियाँ दाएँ-बाएँ घूम सकती हैं । आँख के दोनो छोर, जिसे कोर कहते हैं, तरफ़ का मूल आशय उससे ही है । पुतलियाँ जिस सीमा तक घूम सकती हैं, उससे बिना बोले या हाथ हिलाए किसी भी ओर इंगित किया जा सकता है । आँख के संकेत से दिशा-बोध कराने की क्रियाविधि से ही तरफ़ में दिशा, ओर, छोर, किनारा, पास, साइड side जैसे अर्थ स्थापित हुए । तरफ़ में फ़ारसी का बर प्रत्यय लगने से बरतरफ़ शब्द बनता है जिसका आशय बर्खास्तगी से है ।
रफ़ में पार्श्व, पक्ष या पास जैसी अर्थवत्ता भी है । अरबी के तरफ़ में फ़ारसी का ‘दार’ प्रत्यय लगने से तरफ़दार युग्मपद बना जिसका अर्थ है समर्थक, पक्ष लेने वाला अथवा हिमायती । जो आपके साथ रहे वह पासदार कहलाता है और तरफ़दार में भी साथी का भाव है । इससे ही तरफ़दारी बना जिसमें किसी का पक्ष लेने, पासदारी करने का आशय है । किसी को अपने पक्ष में करने के लिए कहा जाता है कि उसे अपनी तरफ़ मिला लो । सामान्यतया किसी एक का पक्ष लेने वाला व्यक्ति पक्षपाती कहलाता है । तरफ़दार निश्चित ही किसी एक पक्ष का समर्थनकर्ता होता है । हिन्दी के पक्षपाती में जहाँ नकारात्मक अर्थवत्ता नज़र आती है वहीं तरफ़दार में ऐसा नहीं है । उचित-अनुचित का विचार करने के बाद किसी पक्ष का समर्थन करने वाला तरफ़दार है । दोनों पक्षों की थाह लिए बिना मनचाहे पक्ष की आँख मूँद कर हिमायत करने वाला पक्षपाती है । चीज़ के दो पहलू होते हैं । तरफ़ में जो पक्ष का भाव है वह और अधिक स्पष्ट होता है उससे बने एकतरफ़ा, दोतरफ़ा जैसे युग्मपदों से । एकतरफ़ा में पक्षपात हो चुकने की मुनादी है जैसे एकतरफ़ा फ़ैसला । जबकि दोतरफ़ा में दोनों पक्षो का भाव है ।
ब्दों के सफ़र में अब चलते हैं उस दिशा में जहाँ खड़ा है तरफ़ का पर्याय 'ओर' । भाषाविदों के मुताबिक ओर का जन्म संस्कृत के ‘अवार’ से हुआ है जिसमें इस पार, निकटतम किनारा, नदी के छोर या सिरा का आशय है । मोनियर विलियम्स के मुताबिक अवार का ही पूर्वरूप अपार है । गौरतलब है कि आर्यभाषा परिवार की ‘व’ ध्वनि में या में बदलने की वृत्ति है । संस्कृत के अप में दूर, विस्तार, पानी, समुद्र आदि भाव हैं । इसी का एक रूप अव भी है जिसमें दूर, परे, फ़ासला, छोर जैसे भाव हैं । अवार के ‘वार’ में भी ‘पार’ का भाव है । इस किनारे के लिए पार और उस किनारे के लिए वार । ज़ाहिर है कि उस किनारे वाले व्यक्ति के लिए किनारों के संकेत इसके ठीक उलट होंगे । 
पार का ही अन्य रूप अवार है और अवार से ओर का निर्माण हुआ जिसमें छोर, किनारा, दिशा, दूरी, अन्तराल जैसे आशय ठीक अरबी के ‘तरफ़’ जैसे ही हैं । पारावार और वारापार शब्दों में यही भाव है । ‘वार’ और में ‘पार’ में मूलतः व और प ध्वनियों का उलटफेर है । पार का निर्माण पृ से हुआ है और वार का ‘वृ’ से । पार के मूल में जो पृ धातु है उसमें गति का भाव है सो इसका अर्थ आगे ले जाना, उन्नति करना, प्रगति करना भी है । आगे बढ़ने के भाव का ही विस्तार पार में । पार यानी किसी विशाल क्षेत्र का दूसरा छोर । वैसे पार का सर्वाधिक प्रचलित अर्थ नदी का दूसरा किनारा ही होता है । पार शब्द भी हिन्दी के सर्वाधिक इस्तेमालशुदा शब्दों में है । आर-पार को देखिए जिसमें मोटे तौर पर तो इस छोर से उस छोर तक का भाव है, मगर इससे किसी ठोस वस्तु को भेदते हुए निकल जाने की भावाभिव्यक्ति भी होती है । आर-पार में पारदर्शिता भी है यानी सिर्फ़ भौतिक नहीं, आध्यात्मिक, मानसिक भी ।
संबंधित शब्द- 1. पक्ष. 2. पारावार. 3. वारापार. 4. वस्तु. 5. नदी. 7. आँख. 9. वार.

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Thursday, October 25, 2012

‘समय’ की पहचान

time

क्त अपने साथ ताक़त और रफ़्तार दोनो लेकर चलता है । यह साबित होता है हिन्दी के उन कई कालसूचक शब्दों से जो गतिवाची, मार्गवाची क्रियाओं से बने हैं । कहने की ज़रूरत नही कि गति का स्वाभाविक सम्बन्ध शक्ति से है । गति, प्रवाह, वेग दरअसल शक्ति को ही दर्शाते हैं । देवनागरी का ‘इ’ वर्ण संस्कृत में क्रिया भी है जिसमें मूलतः गति का भाव है, जाना, बिखरना, फैलना, समा जाना, प्रविष्ट होना आदि ‘इ’ क्रिया का का विशिष्ट रूप अय् है और इसमें भी गति है । अय् में सम् उपसर्ग लगने से बनता है समय । ‘सम’ यानी साथ-साथ ‘अय’ यानी जाना यानी साथ-साथ चलना, जाना । दरअसल हमारे आसपास का गतिमान परिवेश ही समय है अर्थात समूची सृष्टि, ब्रह्माण्ड, प्रकृति जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य हमारे इर्दगिर्द गतिमान है, वह सब काल के दायरे में है । जो कुछ घट रहा है, वह काल है । मनुष्य के लिए उससे तादात्म्य बिठाना ही समय है । बिहारी ने कहा है- समै समै सुंदर सबै, रूप कुरुप न कोय । मन की रुचि जैति जितै, तित तैति रुचि होय ।।
प्रकृति की लय में लीन हो जाना ही जीवन है । मोनियर विलियम्स के कोश में सम + इ के मेल से समय बनता है । ‘इ’ का समरूप अय् इसमें निहित है । जिसमें समागम, मिलन, एक होना, व्यवस्थित होना जैसे भाव इसमें हैं । इसके अलावा मौसम, अवधि, युग, काल, ऋतु, अवसर, सीमा, परिधि, संकेत, अवकाश, अन्तराल जैसे भाव भी इसमें हैं । समयोचित और सामयिक जैसे शब्दों में समय पहचाना जा रहा है समय में गति है इसीलिए हम कहते हैं कि वक्त बीत रहा है या बीत गया । समय का सम्बन्ध परिवेश में होने वाले बदलावों से है । “समय को पहचानों” का तात्पर्य संसार को पहचानने से है । “समय बदल रहा है” में दुनिया की रफ़्तार से रफ़्तार मिलाने की नसीहत है । स्पष्ट है कि समय में परिवेश का भाव प्रमुख है । जो घट रहा है, जो बीत रहा है के संदर्भ में ‘दुनिया मेरे आगे” ही समय है । संस्कृत के वीत में जाने का भाव है । इससे बना एक शब्द है वीतराग अर्थात सौम्य, शान्त, सादा, निरावेश । राग का अर्थ कामना, इच्छा, रंग, भावना होता है । वीतराग वह है जिसने सब कुछ त्याग दिया हो । एक पौराणिक ऋषि का नाम भी वीतराग था। वीतरागी वह है जो संसार से निर्लिप्त रहता है ।
सी कड़ी में आता है चरैवेति जो चर + वेति का मेल है । चर यानी चलना, आगे बढ़ना । वेति में ढकेलना, उकसाना, ठेलना ( सभी में शक्ति ), पास आना, ले जाना, प्रेरित करना, प्रोत्साहित करना, बढ़ाना, भड़काना, उठाना जैसे अर्थों को चरैवेति के सकारात्मक भाव से जोड़ कर देखना चाहिए ।सभी धर्मों में, संस्कृतियों में काल की गति को सर्वोपरि माना गया है मगर इसके साथ जीवन को, मनुष्यता को लगातार उच्चतम स्तर पर ले जाने की अपेक्षा भी कही गई है । चलना एक सामान्य क्रिया है । चर के साथ वेति अर्थात प्रेरणा ( ठेलना, ढकेलना ) का भाव सौद्धेश्य है । प्रेरित व्यक्ति एक दिशा में चलता है । उच्चता के स्तर पर मनुष्य लगातार अनुभवों से गुज़रते रहने पर ही पहुँचता है । “चरैवेति-चरैवेति” की सीख भी यही कह रही है कि निरंतर गतिमान रहो । ज्ञानमार्गी बनो । ज्ञान एक मार्ग है जिस पर निरंतर गतिमान रहना है । अनुभव के हर सोपान पर, हर अध्याय पर मनुष्य कुछ और शिक्षित होता है, गतिमान होता है, कुछ पाठ पढ़ता है ।
देवनागरी के ‘व’ वर्ण में ही गति का भाव है । इससे बनी ‘वा’ क्रिया में प्रवाह, गति का आशय है । हिन्दी की तत्सम शब्दावली का वेग इसी कड़ी में है । मार्गवाची शब्दों के निर्माण में भी ‘व’ की भूमिका है । वर्त्मन यानी राह । बाट इसी वर्त्मन का देशज रूप है । अंग्रेजी का वे way को देखें जिसका अर्थ पथ, रास्ता, मार्ग है । यह भारोपीय मूल की ‘वे’ wegh से बना है जिसका समरूप विज् है जिससे संस्कृत का वेग बना है । राह कहीं ले जाती है । लिथुआनी के वेजू में ले जाने का आशय । रूसी में भी यह वेग और वेगात ( भागना ) है । संस्कृत वात ( फ़ारसी बाद ) यानी वायु , वह् से हवा आदि । वीत में जाना और आना दोनों हैं । वीथि यानी रास्ता इससे ही बनता है । रामविलास शर्मा संस्कृत की ‘वा’ के समानान्तर ‘या’ क्रिया का उल्लेख करते हैं । इनमें गति के साथ जलवाची अर्थवत्ता भी है । जल के साथ हमेशा ही गतिबोध जुड़ता है । मोनियर विलियम्स के कोश से इसकी पुष्टि होती है । संस्कृत का वारि जलवाची है तो रूसी के वोद ( वोदका ) का अर्थ पानी है । तमिल में नदी के लिए यारू शब्द है । ‘या’ में जाना, चलना, गति करना निहित है साथ ही इसमें खोज, अन्वेषण भी है । चलने पर ही कुछ मिलता है । चलने की क्रिया मानसिक भी हो सकती है । ‘या’ में ध्यान का भाव भी है । ‘आया’, ‘गया’ में इस गति सूचक ‘या’ को पहचानिए ।
संस्कृत में यान का एक अर्थ मार्ग तो दूसरा वाहन भी है । हीनयान, महायान, वज्रयान, सहजयान में रीति, प्रणाली की अर्थवत्ता है । किन्हीं व्याख्याओं में वाहन के प्रतीक को भी उठाया गया है । दोनों में ही ले जाने का भाव है । तमिल में इसके प्रतिरूप यानई और आनई हैं । कभी इनका अर्थ वाहन रहा होगा, अब ये हाथी के अर्थ में रूढ़ हैं । एक शब्द है याम जिसमें भी मार्ग के साथ वाहन का भाव है । याम में कालवाची भाव भी है अर्थात रात का एक पहर यानी तीन घण्टे की अवधी याम है । महादेवी वर्मा ने यामा का प्रयोग रात के अर्थ में किया है । दक्ष की एक पुत्री, और एक अप्सरा का नाम भी यामा, यामी, यामि मिलता है । इसी तरह यव का अर्थ द्रुत गति के अलावा महिने का पहला पखवाड़ा भी है । इसी कड़ी में आयाम भी है । आयाम अब  पहलू के अर्थ में रूढ़ हो गया है । इसका अर्थ है समय के अर्थ  में विस्तार । किसी चीज़ की लम्बाई या चौड़ाई । किसी  विषय के आयाम का आशय उस विषय के विस्तार से है ।
फिर समय पर लौटते हैं । समय के अय् में गमन, गति का भाव है, जिसकी व्याख्या ऊपर हो चुकी है । इस अय से अयन बनता है । अयन यानी रास्ता, मार्ग, वीथि, बाट, जाने की क्रिया आदि । इसका अर्थ आधे साल की अवधि भी है । दक्षिणायन और उत्तरायण में अवधि का संकेत है । दक्षिणायन में सूर्य के दक्षिण जाने की अवधि और गति का आशय है जिसके ज़रिये सर्दियों का आग़ाज़ होता । तब सूर्य कर्क रेखा से दक्षिण की ओर मकर रेखा की ओर बढ़ता है । सूर्य की उत्तरायण अवस्था इसके उलट होती है । इससे गर्मियों का आग़ाज़ होता है । संस्कृत का वेला, तमिल का वरई, कन्नड़ वरि, हिन्दी का बेला, मराठी का वेळ ये तमाम शब्द भी इसी कड़ी में हैं और समय सूचक हैं । संझाबेला, सांझबेला जैसे शब्द कालवाची ही हैं ।
काल यानी समय अपने आप में गति का पर्याय है। दार्शनिक अर्थों में चाहे समय को स्थिर साबित किया जा सकता है पर लौकिक अर्थो में तो समय गतिशील है। हर गुज़रता पल हमें अनुभवों से भर रहा है। हर अनुभव हमें ज्ञान प्रदान कर रहा है, हर लम्हा हमें कुछ सिखा रहा है । आज के प्रतिस्पर्धा के युग में हम अनुभवों की तेज रफ्तारी से गुज़र रहे हैं। आज से ढाई हजार साल पहले भी इसी ज्ञान की खातिर भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को यही सीख दी थी– चरत्थ भिक्खवे चारिकम । बहुजन हिताय , बहुजन सुखाय । हे भिक्षुओं, सबके सुख और हित के लिए चलते रहो….।

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Tuesday, October 23, 2012

उम्र की इमारत

stoneAgeपिछली कड़ी-‘बुनना’ है जीवन

यु के लिए हिन्दी का सबसे लोकप्रिय शब्द उम्र है । इसके अलावा अंग्रेजी का एज शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है । इसके उमर, उमिर, उमरिया जैसे रूप भी हिन्दी की विभिन्न शैलियों में प्रचलित हैं । उम्र मूलतः सेमिटिक परिवार की अरबी भाषा का शब्द है और बरास्ता फ़ारसी इसकी आमद हिन्दी में हुई है । हिन्दी में सर्वाधिक बोले जाने शब्दों में यह भी एक है । गौर करें कि किन किन सन्दर्भों में हम सुबह से शाम तक उम्र / उमर शब्द का प्रयोग करते हैं । अरबी में उम्र का अर्थ जीवन, जीवनकाल है । प्रायः सभी भाषाओं में जीवन, ज़िंदगी के साथ निर्माण या रचना जैसे शब्दों का प्रयोग होता है । “ज़िंदगी बनाना”, “ज़िंदगी बनना”, “जीवन सँवारना”, “जीवननिर्माण” आदि वाक्यों से यह स्पष्ट हो रहा है । वय शब्द में बुनावट वाले भाव का आशय जिस तरह से जीवन को सँवारने से जुड़ रहा है वही बात उम्र की मूल सेमिटिक धातु अम्र में भी है जिसमें निर्माण का भाव प्रमुख है ।
रबी में उम्र का आशय जीवन या जीवनकाल से है । जीवनकाल यानी व्यतीत किया हुआ जीवन । बिताई गई आयु । अन्द्रास रज्की के मुताबिक फ़ारसी में इसका उच्चारण ओम्र की तरह है तो अज़रबैजानी और तुर्की में ऊमूर, हिन्दी यह उमर या उम्र है तो स्वाहिली में उम्री, उज़्बेकी में यह उम्र है और तातारी में गोमेर । अल सईद एम बदावी की अरेबिक इंग्लिश डिक्शनरी ऑफ कुरानिक यूसेज़ के मुताबिक । अम्र से ही अमारा बनता है जिसका अर्थ है बसना, बसाना, सभ्य होना, शिष्ट होना, सुधारना आदि । गौर करें, आदिम युग से ही तमाम मानव समूहों की ये आरम्भिक क्रियाएँ रही हैं । जन्म लेना भर जीवन नहीं है । जन्म लेने के बाद का शारीरिक विकास ही जीवन नहीं है । बीहड़ इलाके को रहने योग्य बनाना, फिर भोजन के लिए बंजर भूमि को खेती योग्य बनाना, फिर समूह में रहते हुए रीति-नीति का विकास जिससे सभ्यता और संस्कृति का निर्माण होता है । यह है अमारा का मूल भाव । सिर्फ़ जी भर लेने से उम्र नहीं गिनी जाती बल्कि युग की तरह जीवन का निर्माण करने में उम्र की सार्थकता है । इसीलिए महान व्यक्तियों के जीवनकाल को युग कहा जाता है क्योंकि वे जीवन जीते नही हैं , बल्कि निर्माण करते हैं । अंग्रेजी के एज  age शब्द में जहाँ उम्र की अर्थवत्ता है वहीं युग और काल का आशय भी है ।
रबी के  तामीर और इमारत शब्दों का हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है । तामीर यानी निर्माण, पुनर्निर्माण, रचना, सृजन आदि । यह तामीर भी इसी मूल से उपजा शब्द है । अपना जीवन अपने काम आने के साथ साथ औरों के काम आए, उसे ऐसा गढ़ना पड़ता है । जीवन को जीने लायक बनाने का भाव ही उम्र में है । तामीर अच्छी होगी तो इमारत भी बुलंद होगी । इल्म, हुनर, लियाक़त और क़ाबिलियत से ज़िंदगी को बेहतरीन बनाना ही असल बात है । यूँ अमारा में आवास और जीवन दोनो है । मूलतः आवास पहले, जीवन बाद में । मकान, भवन के अर्थ वाला इमारत शब्द इसी मूल से निकला है । ज़िंदगी की इमारत सिर्फ़ दीर्घायु (उम्रे-दराज़ ) से बुलंद नहीं होती क्योंकि उम्रे-दराज़ का जीवन की कठिनाइयों ( उम्रे-परीशाँ ) से गहरा रिश्ता है । जीवन के हर कालखण्ड का निर्माण करना पड़ता है । इसे ही ज़िंदगी बनाना कहते हैं । आजकल लोग इसमें “लाइफ़ बनना” देखते हैं ।
ब आते हैं आयु पर । उम्र के अर्थ में आयु शब्द का प्रयोग भी खूब होता है । मराठी में उम्र के लिए वय शब्द का प्रयोग अधिक होता है ठीक उसी तरह हिन्दी में आयु का । हिन्दी में उम्र के अर्थ में अकेले वय का प्रयोग दुर्लभ है अलबत्ता वयःसंधि, अल्पवय, मध्यवय, किशोरवय जैसे युग्मपदों का प्रयोग ज्यादा होता है । कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी कोश के मुताबिक आयु की व्युत्पत्ति आयुस् से है जिसका अर्थ है जीवनीशक्ति, जीवनकाल । वाशि आप्टे आयुस की व्युत्पत्ति आ + इ + उस से बताते हैं जिसमें जीवनावधि, जीवनदायक शक्ति जैसे भाव हैं । गौरतलब है कि संस्कृत की ‘इ’ धातु में मूलतः गति का भाव है, जाना, बिखरना, फैलना, समा जाना, प्रविष्ट होना आदि । मोनियर विलियम्स के मुताबिक ‘इ’ का विशिष्ट रूप अय् से भी व्यक्त होता है जिसमें भी गति का भाव है । ध्यान रहे, जीवन का मूल लक्षण गति ही है । अय का रिश्ता ‘या’ धातु से भी है जिसमें भी जाने, गति करने का भाव है । यान, यात्री जैसे शब्द इसी कड़ी से निकले हैं । 
स ‘अय’ की व्याप्ति हिन्दी के कई शब्दों में है जैसे अयन् जिसका संस्कृत रूप है अयनम् या अयणम् जिसमें जाने, हिलने, गति करने का भाव है । अयनम् का अर्थ रास्ता, मार्ग, पगडण्डी, पथ आदि भी होता है । अवधि या संधिकाल जैसे भाव भी इसमें निहित हैं । अयनम् बना है अय् धातु से । इसमें फलने-फूलने, निकलने का भाव है जो गतिवाचक हैं । जाहिर है अयनम् में निहित गति, राह, बाट का आशय तार्किक है । रामायण या कृष्णायन पर गौर करें जिसमें राम की राह पर चलने या कृष्ण की बाट जाने का भाव है । कुल मिला कर आयु का अर्थ जीवन के फलने-फूलने, उसे सभ्य-संस्कारी बनाने से है । वही भाव, जो उम्र में व्यक्त हो रहा है । चिरायु, शतायु, दीर्घायु जैसे अन्य कई शब्दों से यह ज़ाहिर है । भारोपीय भाषाओं में और आपस में रूपान्तरित होते हैं । भाषाविदों ने भारोपीय भाषा परिवार में एक धातु अयु aiw की कल्पना की है जो संस्कृत आयु की समरूप है । का रूपान्तर में होने से अंग्रेजी का एज age इसी से बनता है जिसमें परिपक्वता, प्रौढ़ता, जीवनकाल जैसे भाव हैं । एज में काल और युग जैसी अर्थवत्ता भी है ।

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Friday, September 7, 2012

नाम में ही धरा है सब-कुछ !!

things

ना म में क्या रखा है ? शेक्सपीयर के प्रख्यात प्रेम-कथानक की नायिका जूलियट के मुँह से रोमियो के लिए निकला यह जुमला इस क़दर मक़बूल हुआ कि आज दुनियाभर में इसका इस्तेमाल मुहावरे की तरह किया जाता है । चूँकि ये बात इश्क के मद्देनज़र दुनिया के सामने आई और इश्क में सिवाय इश्क के कुछ भी ज़रूरी नहीं होता...तब रोमियो के इश्क में मुब्तिला जूलियट के इस जुमले को ज्यादा तूल नहीं दिया जाना चाहिए । दुनियादारी में तो नाम ही सबकुछ है । यानी “बदनाम हुए तो क्या, नाम तो हुआ” जैसा नकारात्मक आशावाद आज ज्यादा चलन में है । ये नाम की महिमा है कि हर आशिक रोमियो, फरहाद, मजनू जैसे नामों से नवाज़ा जाता है और हर माशूक को जूलियट, शीरीं, लैला का नाम मिल जाता है । नाम दरअसल क्या है ? हमारी नज़रों के सामने, समूची सृष्टि में जितने भी पदार्थ हैं उनका परिचय करानेवाला शब्द ही नाम है । इसे संज्ञा भी कहा जाता है । संज्ञा हिन्दी का जाना पहचाना शब्द है । प्राथमिक व्याकरण के ज़रिए हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति इससे परिचित है । संज्ञा के दायरे में हर चीज़ है । जड-गतिशील, स्थूल-सूक्ष्म, दृष्य-अदृष्य, वास्तविक-काल्पनिक, पार्थिव-अपार्थिव इन सभी वर्गों में जो कुछ भी हमारी जानकारी में है, उसे संज्ञा कहा जा सकता है । संज्ञा के मूल में सम + ज्ञा है । सम अर्थात बराबर, पूरी तरह, एक जैसा आदि । अर्थात जिससे किसी पदार्थ के रूप, गुण, आयाम का भलीभाँति पता चले, वही संज्ञा है । संज्ञा यानी नाम ।
संस्कृत की ज्ञा धातु में जानने, समझने,बोध होने, अनुभव करने का भाव है । बेहद लोकप्रिय और बहुप्रचलिशब्द नाम के मूल में यही ज्ञा धातु है । अंग्रेजी के नेम name का भी इससे गहरा रिश्ता है । संस्कृत में ज्ञ अपने आप में स्वतंत्र अर्थ रखता है जिसका मतलब हुआ जाननेवाला, बुद्धिमान, बुध नक्षत्र और विद्वान। ज्ञा क्रिया का मतलब होता है सीखना, परिचित होना, विज्ञ होना, अनुभव करना आदि । संज्ञा में चेतना का भाव है और होश का भी । ये दोनो ही शब्द बोध कराने से जुड़े हैं । अचेत और बेहोश जैसे शब्दों में कुछ भी जानने योग्य न रहने का भाव है । संज्ञाशून्य, संज्ञाहीन यानी जिसे कुछ भी बोध न हो । ज्ञ दरअसल संस्कृत में ज+ञ के मेल से बनने वाली ध्वनि है । इसके उच्चारण में क्षेत्रीय भिन्नता है । मराठी में यह ग+न+य का योग हो कर ग्न्य सुनाई पड़ती है तो महाराष्ट्र के ही कई हिस्सों में इसका उच्चारण द+न+य अर्थात् द्न्य भी है। गुजराती में ग+न यानी ग्न है तो संस्कृत में ज+ञ के मेल से बनने वाली ञ्ज ध्वनि है। दरअसल इसी ध्वनि के लिए मनीषियों ने देवनागरी लिपि में ज्ञ संकेताक्षर बनाया मगर सही उच्चारण बिना समूचे हिन्दी क्षेत्र में इसे ग+य अर्थात ग्य के रूप में बोला जाता है । भाषा विज्ञानियों ने प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार में इसके लिए जो धातु ढूंढी है वह है gno यानी ग्नो । 
ज़रा गौर करें इस ग्नों से ग्न्य् की समानता पर । ये दोनों एक ही हैं। अब बात इसके अर्थ की । ज्ञा से बने ज्ञान का भी यही मतलब होता है। ज+ञ के उच्चार के आधार पर ज्ञान शब्द से जान अर्थात जानकारी, जानना जैसे शब्दों की व्युत्पत्ति हुई। अनजान शब्द उर्दू का जान पड़ता है मगर वहां भी यह हिन्दी के प्रभाव में चलने लगा है । मूलतः यह हिन्दी के जान यानी ज्ञान से ही बना है जिसमें संस्कृत का अन् उपसर्ग लगा है । ज्ञा धातु में ठानना, खोज करना, निश्चय करना, घोषणा करना, सूचना देना, सहमत होना, आज्ञा देना आदि अर्थ भी समाहित हैं । यानी आज के इन्फॉरमेशन टेकनोलॉजी से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें अकेले इस वर्ण में समाई हैं । इन तमाम अर्थों में हिन्दी में आज अनुज्ञा, विज्ञ, प्रतिज्ञा और विज्ञान जैसे शब्द प्रचलित हैं। ज्ञा से बने कुछ अन्य महत्वपूर्ण शब्द ज्ञानी, ज्ञान, ज्ञापन खूब चलते हैं। गौर करें जिस तरह संस्कृत-हिन्दी में वर्ण में बदल जाता है वैसे ही यूरोपीय भाषा परिवार में भी होता है। प्राचीन भारोपीय भाषा फरिवार की धातु gno का ग्रीक रूप भी ग्नो ही रहा मगर लैटिन में बना gnoscere और फिर अंग्रेजी में ‘ग’ की जगह ‘क’ ने ले और gno का रूप हो गया know हो गया । बाद में नालेज जैसे कई अन्य शब्द भी बने। रूसी का ज्नान ( जानना ), अंग्रेजी का नोन ( ज्ञात ) और ग्रीक भाषा के गिग्नोस्को ( जानना ), ग्नोतॉस ( ज्ञान ) और ग्नोसिस (ज्ञान) एक ही समूह के सदस्य हैं । गौर करें हिन्दी-संस्कृत के ज्ञान शब्द से इन विजातीय शब्दों के अर्थ और ध्वनि साम्य पर ।
ब आते हैं नाम पर । संस्कृत में भी नाम शब्द है । इसका आदिरूप ज्ञाम अर्थात ग्नाम ( ग्याम नहीं ) रहा होगा, ऐसा डॉ रामविलास शर्मा समेत अनेक विद्वानों का मत है । ग्नाम से आदि स्थानीय व्यंजन का लोप होकर सिर्फ नाम शेष रहा । ज्ञाम से नाम के रूपान्तर का संकेत संस्कृत रूप नामन् से भी मिलता है । अवेस्ता में भी यह नाम / नामन् है । फ़ारसी में यह नाम / नामा हो जाता है । इसका लैटिन रूप नोमॅन है जो संस्कृत के नामन के समतुल्य है । नामवाची संज्ञा के अर्थ में अंग्रेजी का नेम name का विकास पोस्ट जर्मनिक के नेमॉन namon से हुआ । वाल्टर स्कीट के मुताबिक इसका सम्बन्ध लैटिन के नोमॅन और ग्रीक ग्नोमेन से है । लैटिन नोमॅन, ग्रीक ग्नोमेन gnomen से निकला है । मोनियर विलियम्स नामन् के मूल में ज्ञा अथवा म्ना धातुओं की संभाव्यता बताते हैं । विलियम व्हिटनी जैसे भारोपीय भाषाओं के विद्वानों के मुताबिक म्ना चिन्तन, मनन, दर्शन का भाव है । गौर करें कि ज्ञा और म्ना दोनो की अनुभूति एक ही है । नाम शब्द ज्ञा और ग्ना शब्दमूल से बना है ऐसा डॉ रामविलास शर्मा का मानना है । ज्ञा अर्थात gna । इसका एक रूप jna भी बनता है और kna भी (know में ) । ख्यात प्राच्यविद थियोडोर बेन्फे संस्कृत नामन् का एक रूप ज्नामन भी बताते हैं जो पूर्व वैदिक ग्नामन की ओर संकेत करता है । नाम का पूर्व रूप ग्नाम रहा होगा, यही बात डॉ रामविलास शर्मा भी कह रहे हैं । वाल्टर स्कीट की इंग्लिश एटिमोलॉ डिक्शनरी में भी ये दोनों रूप मिलते हैं । रूसी में इसका रूप ज्नामेनिए है ।
पनाम के लिए हिन्दी में सरनेम शब्द अपना लिया गया है । इसमें नेम वही है जो नाम है और अंग्रेजी के सर उपसर्ग में ऊपर, परे, उच्च वाला आशय है । सरनेम से आशय कुलनाम या समूह की उपाधि से है जो उसके सदस्यों की पहचान होती है । नाम से बने अनेक शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं मसलन नामक  का भी खूब इस्तेमाल होता है जिसमें नामधारी का भाव है । नामधारी यानी उस नाम से पहचाना जाने वाला । नाम रखने की प्रक्रिया नामकरण कहलाती है । गौर करें, संज्ञाकरण का अर्थ भी नाम रखना होता है । किसी सूची या दस्तावेज़ में नाम लिखवाने को नामांकन कहते हैं । मनोनयन के लिए नामित शब्द भी प्रचलित है । इसका फ़ारसी रूप नामज़द है । नामराशि शब्द भी आम है यानी एक ही नाम वाला । नामवर यानी प्रसिद्ध । नाममात्र यानी थोड़ी मात्रा में । नाम शब्द की मुहावरेदार अर्थवत्ता भी बोली-भाषा में सामने आती है । नामकरण तो नवजात का नाम रखने की क्रिया है पर नाम धरना या नाम रखना में नकारात्मक अर्थवत्ता है जिसका अर्थ होता है बुराई करना, निंदा करना आदि । नाम उछालना या नाम निकालना में भी ऐसे ही भाव हैं । नाम रोशन करना यानी अच्छे काम करना । कीर्ति बढ़ाना । प्रसिद्ध होना । नाम बिकना यानी खूब प्रभावी होना । नामो-निशां मिटना यानी सब कुछ खत्म हो जाना । नाम जपना यानी किसी का नाम रटना । किसी के प्रति आस्था जताना ।

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Wednesday, August 22, 2012

‘मा’, ‘माया’, ‘सरमाया’ [माया-2]

landscape1पिछली कड़ी-सरमायादारों की माया [माया-1] से आगे  

जॉ न प्लैट्स फ़ारसी के ‘मायः’ का रिश्ता संस्कृत के ‘मातृका’ से जोड़ते हैं पर यह बात तार्किक नहीं लगती । अमरकोश के मुताबिक ‘माया’ शब्द के मूल में वैदिक धातु ‘मा’ है जिसमें सीमांकन, नापतौल, तुलना, अधीन, माप, सम्पन्न, समाप्त, प्रसन्नता, खुशी, आनंद, कटि-प्रदेश, उलझाना, बांधना, ज्ञान, प्रकाश, जादू, तन्त्र, कालगणना आदि भाव हैं । इससे ही बना है ‘माप’ शब्द । किसी वस्तु के समतुल्य या उसका मान बढ़ाने के लिए प्रायः ‘उपमा’ शब्द का प्रयोग किया जाता हैं । यह इसी कड़ी का शब्द है । इसी तरह ‘प्रति’ उपसर्ग लगने से मूर्ति के अर्थ वाला ‘प्रतिमा’ शब्द बना। प्रतिमा का मतलब ही सादृश्य, तुलनीय, समरूप होता है । दिलचस्प बात यह कि फारसी का ‘पैमाँ’, ‘पैमाना’ या ‘पैमाइश’ शब्द भी इसी मूल से जन्मा है । संस्कृत उपसर्ग ‘प्रति’ का समतुल्य फ़ारसी का ‘पैति’ है । प्रति+मान से ‘प्रतिमान’ बनता है उसी तरह ‘पैति+मा’ से ‘पैमाँ’ (पैमान, पैमाना) बनता है । जो हिन्दी में प्रतिमान है वही फ़ारसी में पैमाना है । आयाम का कुछ अप्रचलित पर्याय ‘विमा’ भी इसी ‘मा’ से जन्मा है ।
लैटिन के ‘मेट्रिक्स’ matrix में भी अंतरिक्ष की परिमाप, विस्तार और मातृ सम्बन्धी भाव है । संस्कृत ‘मातृ’ और ‘मेट्रिक्स’ में रिश्तेदारी है । इसका रिश्ता भारोपीय धातु मे ‘me’ से जुड़ता है जिसके लिए संस्कृत मे ‘मा’ धातु है । मेट्रिक्स में स्त्री योनि, उर्वरता, गर्भ जैसे भाव हैं । यहाँ माँ के अर्थ में जननिभाव प्रमुख है और निरन्तर उर्वरता पर गौर करना चाहिए । वैदिक मा में इसके अलावा भी माता, उर्वरता, पृथ्वी, काल, मांगल्य, स्वामित्व, माया, जल जैसे आशय हैं । गौर करें ‘अम्मा’ के मूल में ‘अम्बा’ और प्रकारान्तर से ‘अम्बु’ यानी जल ही है । जल समृद्धि का प्रतीक है । प्रकृति के जलतत्व से ही जीवन सिरजा है । जल में ही जीवन है । इन दोनों मूल धातुओं में नाप, माप, गणना आदि भाव हैं । यानी बात खगोलपिंडों तक पहुँचती है ।
भारतीय परम्परा में ‘मा’ धातु की अर्थवत्ता भी व्यापक है । ‘मा’ धातु में चमक, प्रकाश, माप का भाव है जो स्पष्ट होता है चन्द्रमा से । प्राचीन मानव चांद की घटती-बढ़ती कलाओं में आकर्षित हुआ । स्पष्ट तो नहीं, मगर अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ववैदिक काल में कभी चन्द्रमा के लिए ‘मा’ शब्द रहा होगा । ‘मा’ के अंदर चन्द्रमा की कलाओं के लिए घटने-बढ़ने का भाव भी अर्थात उसकी ‘परिमाप’ भी शामिल है । गौर करे कि फारसी के माह, माहताब, मेहताब, महिना शब्दों में ‘मा’ ही झाँक रहा है जो चमक और माप दोनों से सम्बन्धित है क्योंकि उसका रिश्ता मूलतः चांद से जुड़ रहा है जो घटता बढ़ता रहता है और इसकी गतियों से ही काल यानी माह का निर्धारण होता है । अंग्रेजी के मंथ के पीछे भी यही ‘मा’ है और इस मंथ के पीछे अंग्रेजी का ‘मून’ moon है ।
गौरतलब है कि सम्पत्ति का सबसे आदिम पैमाना भू-सम्पदा और पशु-सम्पदा ही रहे हैं । दौलत या सरमाया के अर्थ में बाकी चीजें तो सभ्यता के विकास के साथ-साथ शामिल होती चली गईँ । मुद्रा के आविष्कार के बाद सम्पत्ति में गणना की क्रिया भी शामिल हुई । प्राचीन काल में तो ज़मीन ही सम्पदा थी जिसका माप लिया जाता था, पैमाइश होती थी । बसाहट, खेती और अन्ततः आवास के लिए भूमि की नापजोख ज़रूरी थी ।  तो फ़ारसी के ‘सरमाया’ में जो ‘मायः’ है और संस्कृत-हिन्दी में जो ‘माया’ है उसका अभिप्राय धन-दौलत, सम्पदा से ही है । उसी अर्थ में ‘सरमाया’ शब्द का विकास ‘मायः’ से हुआ है । इन दोनो ही ‘माया’ के मूल में वैदिक ‘मा’ है । मनुष्य के पास प्रकृति को समझने लायक बुद्धि का विकास होने तक और उसके बाद भी प्रकृति उसके लिए अजूबा ही रही है । मनुष्य के ज्ञान का विकास प्रकृति को समझते हुए ही हुआ है । दुनिया को समझना ही ज्ञानी होना है । इसीलिए दुनियादारी शब्द में व्यावहारिक बुद्धि का संकेत है । दुनिया का ही व्यापक स्वरूप प्रकृति है ।
'मा' में मूलतः प्रकृति का ही भाव है । संस्कृत में ‘प्रमा’ का अर्थ होता है समझना, जानना, सच्चा ज्ञान, सही धारणा आदि । ‘प्रमा’ का एक अन्य अर्थ मातामही भी होता है । किसी चीज़ की पैमाइश करना, मापना आदि क्रियाएँ जानने-समझने का ही आयाम हैं । सो प्रकृति अपने आप में सम्पदा है । प्रकृति का निरीक्षण, माप-जोख की अभिव्यक्ति मा से होती है । मा की महिमा अपरम्पार है और इसकी अर्थवत्ता की वैविध्यपूर्ण विमाएँ ( आयाम ) ही इसे माया साबित करती है । ‘मा’ में निहित वैविध्यपूर्ण भावों से अर्थमाया की सृष्टि होती है । साफ़ है कि फ़ारसी का ‘मायः’ संस्कृत माया का समतुल्य ही है अलबत्ता मातृका, माया और ‘मायः’ तीनों के मूल में वैदिक ‘मा’ धातु ही है । [समाप्त]

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Tuesday, August 21, 2012

सरमायादारों की माया [माया-1]

अगली कड़ी-‘मा’, ‘माया’, ‘सरमाया’ [माया-2]wealth

ला लित्यपूर्ण और प्रभावी भाषा प्रयोग करते हुए अक्सर कुछ लोग धन-दौलत के अर्थ में 'सरमाया' शब्द का इस्तेमाल करते हैं । दुनिया का मूल चरित्र हमेशा पूंजीवादी समाज रहा है । पैसे के दम पर क्या नहीं हो सकता । दौलतमंद सर्वशक्तिमान होता है । इसीलिए ‘सरमाया’ शब्द की अर्थवत्ता में असर की अर्थवत्ता भी शामिल है । ‘सरमाया’ यानी पूंजी, दौलत, धन, कैपिटल इसलिए सरमायादार का अर्थ हुआ पूंजीपति, मालदार, धनी, दौलतमंद आदि । सियासत और ‘सरमाया’ का चोली-दामन का साथ है । ‘मायः’ से बने सरमाया, सरमायादार, सरमायादाराना, सरमायादारी जैसे शब्द लिखत-पढ़त की भाषा में प्रचलित हैं । इसके अलावा ‘मायादार’ जैसा शब्द भी है जिसका अर्थ भी धनी, मालदार ही है ।
हिन्दी में ‘सरमाया’ शब्द फ़ारसी से आया है । ‘सरमाया’ को अरबी का समझा जाता है पर यह भारोपीय भाषा परिवार की इंडो-ईरानी शाखा का शब्द है और फ़ारसी के सर + ‘मायः’ से मिल कर बना है । गौरतलब है कि फ़ारसी का विकास बरास्ता अवेस्ता (वैदिक संस्कृत की मौसेरी बहन), पहलवी हुआ है । संस्कृत की तरह ही अवेस्ता में भी विसर्ग लगता रहा है और वहीं से यह फ़ारसी में भी चला आया । फ़ारसी के ‘मायः’ का उच्चारण माय’ह होना चाहिए मगर विसर्ग का उच्चार अक्सर स्वर की तरह होता है इस तरह फ़ारसी का ‘मायः’ भी माया उच्चारा जाता है । हिन्दी शब्दसागर में ये दोनों ही रूप दिए हुए हैं । ‘सरमाया’ में जो ‘सर’ है वह सरदार, सरपरस्त, सरज़मीं, सरकार वाला सर ही है जिसका इस्तेमाल उपसर्ग की तरह होता है । सर का प्रयोग प्रमुख, खास, सर्वोच्च आदि की तरह होता है । यह जो फ़ारसी का ‘सर’ है उसका रिश्ता वैदिक संस्कृत के ‘शिरस्’ से है जिसका अर्थ है किसी भी वस्तु का उच्चतम हिस्सा, कपाल, खोपड़ी, मस्तक, चोटी, शिखर, शुरुआत, पीक, बुर्ज़, पराकाष्ठा, चरम आदि ।
संस्कृत में ‘शीर्ष’ का मूल भी यही है । इससे ही हिन्दी का ‘सिर’ बना है । शिरस् के समतुल्य जेंद में ‘शर’ शब्द बना जिसका पहलवी रूप ‘सर’ हुआ । फ़ारसी में यह ‘सर’ चला आया । अलबत्ता जॉन प्लैट्स की “अ डिक्शनरी ऑफ उर्दू, क्लासिकल हिन्दुस्तानी एंड इंग्लिश” के मुताबिक फ़ारसी का सर संस्कृत के ‘सिरस्’ से आ रहा है । ध्यान रहे, ‘सिर’ यानी मस्तक के अर्थ में संस्कृत के किसी कोश में ‘सिरस्’ की प्रविष्टि नहीं मिलती । प्लैट्स के ऑनलाईन कोश में सम्भवतः वर्तनी की चूक है । जहाँ तक ‘माया’ का सवाल है, जान प्लैट्स इसके जन्मसूत्र संस्कृत के ‘मातृका’ में देखते हैं । ‘माया’ की व्युत्पत्ति का ठोस संकेत ‘मातृका’ से नहीं मिलता । ध्यान रहे मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में ‘मातृका’ का अर्थ सिर्फ माँ सम्बन्धी, धात्री, माँ, जन्मदात्री अथवा पालनकर्त्री है । जबकि प्लैट्स धन-दौलत के संदर्भ में इसके अर्थ मूल, व्युत्पन्न, स्रोत दिए गए हैं साथ ही दौलत, पूंजी, नगद, भंडार, कोश, निधि जैसे अर्थ भी दिए गए हैं । समझा जा सकता है कि प्लैट्स शायद यह कहना चाहते हैं कि ‘मातृ’ शब्द में उद्गम या स्रोत का भाव है । ज़ाहिर है स्रोत अपने आप में एक कोश या भण्डार होता है । यह तर्कप्रणाली गले नहीं उतरती और खींच-तान कर मातृका का रिश्ता धन-दौलत से जोड़ने वाली कवायद जान पड़ती है ।
गौरतलब है कि संस्कृत का ‘मातृका’ स्त्रीवाची है जबकि फ़ारसी का ‘मायः’ पुरुषवाची है । उधर हिन्दी-संस्कृत में ‘माया’ की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है और इसमें न सिर्फ़ धन-दौलत का भाव है बल्कि भ्रम, छलावा, धोखा, अतीन्द्रिय शक्ति, कला, जादूविद्या, भूत-प्रेत सम्बन्धी अथवा टोना जैसे अभिप्राय भी इसमें हैं । संस्कृत में ‘माया’ का एक अर्थ दुर्गा भी है मगर यह इसमें जन्मदात्री का आशय न होकर पराशक्तियों की स्वामिनी देवी का भाव है । इसी तरह ‘माया’ का दूसरा अर्थ लक्ष्मी है जो धन-वैभव की देवी हैं । इसी भाव का विस्तार माया के धन, दौलत, रोकड़ा, रुपया-पैसा, वैभव, सम्पत्ति, निधि, माल-मत्ता आदि में होता है । धन की महिमा अपरंपार है । इसके ज़रिये सुखोपभोग का कल्पनातीत संसार रचा जा सकता है । यहाँ ‘माया’ का अर्थ अवास्तविक लीला, कल्पनालोक या छलावा सार्थक होता है क्योंकि धन के रहने पर इन सबका भी लोप हो जाता है । इसीलिए कबीर ने धन-सम्पदा के अर्थ में ही “माया महा ठगिनी हम जानि” जैसी प्रसिद्ध उक्ति कही है ।
मायाजीवी शब्द भी धन-दौलत में रुचि रखने वाले का अर्थबोध कराता है जबकि मायावी का अर्थ जालसाज़, कपटी, छली, धोखेबाज, जादूगर आदि है । यह बात समझनी मुश्किल है कि प्लैट्स फ़ारसी के ‘मायः’ का रिश्ता धन-दौलत के अर्थ में संस्कृत के मातृक से क्यों जोड़ रहे हैं जबकि संस्कृत के ही ‘माया’ शब्द में धन-दौलत, पूंजी, सम्पदा के साथ माप-जोख, देवीदुर्गा, शक्ति जैसे भाव है । अगली कड़ी में समाप्त

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Saturday, August 11, 2012

तिलस्मी दुनिया

talism
मत्कारी, जादुई, रहस्यम और अबूझ किस्म की बात, घटना या वस्तु के संदर्भ में तिलस्म हिन्दी का जाना-पहचाना शब्द है । यह भी दिलचस्प है कि हिन्दी साहित्य की शुरुआती रचनाओं का आधार भी यही शब्द यानी तिलस्म था । उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जो महानुभाव हिन्दी गद्य में आज़माईश कर रहे थे, उसके कथानकों का सफल फार्मूला तिलस्मी दुनिया का ही था । राजा-रानी की पारम्परिक प्रेम-कथा अब गौण थी और राजा-रानी के किस्से अब राजनीति के प्रपंच का हिस्सा बनते थे जिन्हें तिलस्मी दुनिया के तहखानों, ऐयारों के कारनामों और जासूसी दाव-पेचों से गुज़रते हुए दिलचस्प अंदाज़ में परोसा जाता था । इस विधा के सिद्धहस्त लेखक बाबू देवकीनंदन खत्री थे । जासूसी और तिलस्मी लेखन करने वाले वे पहले ही लेखक हैं जिनकी रचनाओं को साहित्य का दर्जा मिला । उनकी लिखी चन्द्रकान्ता संतति आज भी खूब बिकती है । बहरहाल, तिलस्म शब्द से प्रायः हर हिन्दी प्रेमी का परिचय खत्री जी के उपन्यासों के ज़रिये होता है ।

तिलस्म शब्द की आमद हिन्दी में फ़ारसी के ज़रिये हुई है । तिलस्म शब्द के दायरे में मायालोक, इंद्रजाल, जादू, चमत्कार, अद्भुत कार्य-व्यापार, क़रामाती बातें आती हैं । यह तावीज भी हो सकता है, गंडा भी हो सकता है या अभिमंत्रित पत्थर भी । इसका इस्तेमाल कई तरह से होता है जैसे समूचा स्थान यानी तिलस्मी तहखाना, कोई मार्ग जैसे तिलस्मी रास्ता, कोई वस्तु जैसे तिलस्मी हार आदि । ई. जे. ब्रिल्स के फर्स्ट इन्साइक्लोपीडिया ऑफ इस्लाम के मुताबिक इसके तिलसम, तिलस्म, तिलसिम, तालिस्म और तिलिस्म जैसे रूप भी अरबी में प्रचलित हैं । हिन्दी में तिलस्माती, तिलस्मानी, तिलस्मात, तिलस्मी जैसे रूप प्रचलित हैं । प्राचीनकाल से ही प्रायः हर संस्कृति में परस्पर विरोधी पक्ष एक-दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए ओझाओं और नजूमियों के ज़रिये एक दूसरे के खिलाफ तंत्र-मंत्र, जादू-टोना आदि शक्तियों का प्रयोग करते रहे हैं जिनका मक़सद विरोधी का सर्वनाश ही था ।
गौरतलब है कि ताबीज के अर्थ वाला अंग्रेजी का टेलिस्मन अरबी के तिलस्म से प्रभावित है जबकि खुद अरबी में तिलस्म शब्द के पीछे बाइजेंटीनी-ग्रीक का तेलेस्मा ( telesma ) है । तुर्की की वर्तमान राजधानी इस्ताम्बुल का प्राचीन नाम कुस्तुन्तुनिया Kostantiniyye था जिसे ग्रीक भाषा में कांस्टेंटिनोपल कहते थे । किसी ज़माने में प्राचीन ग्रीक साम्राज्य का विस्तार वर्तमान इस्ताम्बुल तक था । भूमध्यसागर की धुर पूर्वी सीमा अरब क्षेत्रों को छूती है । ग्रीस और अरब के बीच व्यापारिक संबंध भी रहा है इसलिए अरब और ग्रीस में भाषायी अन्तर्सम्बन्ध भी गहरा है । इस क्षेत्र को तब बाइजेंटाइन कहते थे और यहाँ बोली जाने वाली भाषा बाइजेंटीनी-ग्रीक कहलाती थी जिसका खासा असर तुर्की और अरबी भाषाओं पर पड़ा है । ग्रीक भाषा के टेलिन telein शब्द से तेलेस्मा बना जिसमें धार्मिक अनुष्ठान, समापन, पूर्णाहुति जैसे भाव थे । भाषाविज्ञानियों का मानना है कि टैलेन के मूल में टेलोस शब्द है जिसमें जिसका अर्थ है खात्मा, सर्वनाश, परिणति, निजात, अन्त, अंजाम या मृत्यु आदि । यह जो टेलोस है, इसका रिश्ता ग्रीक भाषा की प्रसिद्ध धातु टेली tele- से है जिसमें दूर, सिरा, अन्तराल जैसे आशय हैं और इससे टेलीविज़न, टेलीफोन, टेलीपैथी, टेलीकास्ट जैसे बोलचाल के कई आमफ़हम शब्द बने हैं । कई भाषाओं में इसके रूपान्तर प्रचलित हैं जैसे ग्रीक में टेलेस्मा, हिन्दी में तिलस्म, स्वाहिली में तलासिमु, हिब्रू में तिलस्म आदि ।
तिलस्म यानी कोई जादुई चिह्न या रहस्यमय व्यवस्था मूलतः किसी अलौकिक शक्ति के असर को बताती है । तिलस्म का सृजन जो भी करता है, यह उसके हित में असरदार होता है । इसमें सौभाग्य चिह्न का भाव है । मंत्र शक्ति, जादुई करामात, गंडा, ताबीज़ आदि का प्रयोग किसी मुश्किल हालात से निजात पाने अथवा मनोवांछित फल पाने के लिए किया जाता है । मूल भाव है मनचाहा हो जाना, जो सामान्य प्रयासों से होना सम्भव नहीं है । तिलिस्म शब्द का हिब्रू रूप तालिस्म होता है । “द डिक्शनरी दैट रिवील द हिब्रू सोर्स ऑफ इंग्लिश’ में इसाक ई. मोज़ेस तालिस्म की दिलचस्प व्युत्पत्ति बताते हैं जो ग्रीक टेलोस पर आधारित ही हैं । मोजेज के अनुसार हिब्रू तालिस्म, अरबी तिलस्म से ही आया है । वे बाइजेंटीनी-ग्रीक के तैलिस्मा telesma को टेलिन और स्लैम मिलन का नतीजा मानते हैं । अंग्रेजी के slam में मूलतः पटाक्षेप या चरम परिणति का ही भाव है । खेल स्पर्धाओं में ग्रैंडस्लैम के रूप में इसे देखा जा सकता है । हालाँकि भाषाविद् स्लैम की व्युत्पत्ति पर स्थिर नहीं हैं और इसे उत्तरी यूरोप के प्राचीन नॉर्स परिवार का शब्द मानते हैं ।
अंग्रेजी के स्लैम से सेमिटिक धातु सलम का रिश्ता तार्किक भी लगता है और भाषायी अन्तर्सम्बन्ध यहाँ भी नज़र आता है । सेमिटिक भाषा परिवार की धातु स – ल - म ( अरबी लिपि में सीन –लाम- मीम ) जिसमें समर्पण, स्वीकार जैसे भावों के साथ अन्ततः शान्ति का आशय प्रकट होता है । नमस्कार या सेल्यूट के अर्थ वाले प्रसिद्ध अभिवादन “अस्सलाम अलैकुम” और “वालैकुम अस्सलाम” में यही सलम है जिसका एक रूप सलाम हुआ । कुशल, मंगल का प्रतीक यह अभिवादन मूलतः शान्ति कामना ही है । हिब्रू में इसका रूप शॉलोम shalom होता है । मोज़ेस के अनुसार बाइबल में शॉलाम शब्द का आशय भी पूर्णत, परमत्व और शान्ति ही है । अपने अभीष्ट की कामना में प्राचीनकाल से ही मनुष्य किन्ही अनुष्ठानों का आयोजन करता रहा है जिनमें से कुछ ऐसे होते हैं जो वह सामान्य पुरोहितो से हट कर ओझा, बैगा, तान्त्रिक, मान्त्रिक आदि से सम्पन्न कराता है । कुल मिला कर किसी मायावी शक्तियों से इष्टफल प्राप्ति का प्रयास ही तिलस्म है ।  इसका हासिल भी चित्त की शान्ति ही होता है । मगर इसमें अहंभाव की तुष्टि भी होती है ।
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Thursday, March 22, 2012

खाली हाथ खलासी

पिछली कड़ी-खुलासे का खुलासा

coupleहिन्दी के सर्वाधिक प्रयुक्त शब्दों में ‘खाली’ का शुमार भी है जिसमें रिक्तता, शून्यता, रीतापन जैसे भाव हैं । जिसमें कुछ न हो, शून्य हो उस स्थान को खाली कहते हैं । ‘खाली’ शब्द की मुहावरेदार अर्थवत्ता की वजह से इसमें अकेला, केवल, सिर्फ जैसे अर्थ भी विकसित हुए जैसे “वहाँ खाली एक आदमी था…” । यहाँ सिर्फ़ और अकेले का भाव साफ़ है । “खाली बैठना” हिन्दी का प्रसिद्ध मुहावरा है जिसका अर्थ है हाथ में कोई काम न होना । अलग अलग सन्दर्भों में बेकारी या निकम्मेपन का अभिप्राय इससे सिद्ध होता है । “खाली हाथ” जैसा सर्वमान्य मुहावरा भी इसी कड़ी में आता है । किसी प्रयोजन के लिए पास में मुद्रा, वस्तु या उपहार न होने की स्थिति में खाली हाथ मुहावरे का प्रयोग किया जाता है, जैसे-“बुलावा तो आया है पर ‘खाली हाथ’ जाना उचित नहीं समझता ।” मुम्बइया हिन्दी के प्रभाव में “खाली-पीली” जैसा मुहावरा भी युवा पीढ़ी ने अपना लिया है जिसमें व्यर्थ या फिज़ूल की बात करने का भाव है ।
खाली का रिश्ता सेमिटिक धातु kh-l-w से है जिसमें शून्यता, रिक्तता, अकेलापन, एकान्त, निर्जन, उजाड़, अलग-थलग जैसे भाव हैं । उर्दू-फ़ारसी शायरी में एकान्त के अर्थ में प्रयुक्त ‘खल्वत’ शब्द भी इसी मूल का है । ग़ालिब साहब लिखते हैं – “देखा असद को जल्वतो-खल्वत में बारहा । दीवाना गर नहीं तो हुशियार भी नहीं ।।” खल्वत यानी अकेले में, जल्वत यानी सबके बीच । इस्लामी दौर में खल्वतखाना, ख़ल्वतक़दा या खल्वतगाह भी होते थे जहाँ वो एकान्त चर्चा करते थे । ‘मजलिसे-खल्वत’ जैसी एक व्यवस्था भी थी । सम्भवतः यह कैबिनेट जैसी विशिष्ट सलाहकारों की समिति होती थी । मराठी में ‘खल्वत’ का रूप ‘खलबत’ हो जाता है जिसका अर्थ है एकान्त वार्ता । फ़ारसी का ‘खलेवतखाना’ मराठी में ‘खलबतखाना’ है । ‘खल्वत’ का ‘खिल्वत’ रूप भी मिलता है । ‘खाली’ में सिर्फ़ या अकेले का भाव भी है जैसे- “खाली एक आदमी आया” । एकाकी, एकान्तप्रिय व्यक्ति को इसीलिए ‘ख़लवतपसंद’ या ‘खलवतदोस्त’ कहा जाता है । चलताऊ तौर पर एकाकी व्यक्ति को ‘खल्वती’ भी कहा जाता है ।
रबी ज़बान में एक शब्द है ‘ख़ला’ जिसके मायने होते हैं अंतरिक्ष, आसमान, रिक्त स्थान, शून्य आदि। इसके अलावा एकाकीपन, एकान्त आदि भाव भी इसमें समाहित है। ‘खला’ रिश्तेदारी ‘खालीपन’ से है । ‘ख़ला’ में व्याप्त आसमान और अंतरिक्ष के भाव का विस्तार भी शामिल है अर्थात यह संसार या सभी कुछ जड़-जंगम दृष्टिगोचर इसमें आ जाते हैं। गौर करें ‘ख़ला’ मे निहित अंतरिक्ष वाले अर्थ पर । मूलतः यही अर्थ व्यापक है। अंतरिक्ष क्या है ? अंग्रेजी में इसे स्पेस कहते हैं यानी खाली जगह । ‘ख़ला’ से ही जुड़ा है अरबी, फारसी और उर्दू का ख़ाली शब्द जिसका अर्थ होता है रिक्त स्थान । अंतरिक्ष भी रिक्त स्थान ही है। दार्शनिक अर्थों में इसे शून्य भी कहा जाता है। अरबी शबद खला का एक रूप ‘खुलू’ भी है जिसका मतलब भी खाली होना, रिक्त होना है।
‘ख़ाली’, ‘खला’ की कड़ी में ही आता ‘खलास’ अर्थात रिक्त करना, मुक्त करना, छुटकारा, रिहाई वगैरह । हिन्दी में रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और मंडियों में एक शब्द अक्सर सुनाई पड़ता है वहा है ‘खलासी’ या ‘खल्लासी’ । आमतौर पर ये कामगारों के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द है जिसका मतलब होता है सामान उतारने वाला श्रमिक । खलासी पूरे भारत में प्रचलित शब्द है। ‘खलासी’ शब्द से जुड़े की शब्द आज हिन्दी–उर्दू में प्रचलित हैं जिनके दार्शनिक अर्थ और व्याख्याएं भी हैं। सफ़र के साथी लंदन निवासी राजेश प्रियदर्शी बताते हैं कि अरबी में सामान्य बातचीत के दौरान ‘खलास’ का प्रयोग अच्छा, ठीक, ओके की तरह होता है । हर वाक्य के अंत में लोग आईसी, ओके, राइट, फाइन की तरह ‘खलास’ का प्रयोग कहते हैं, कुछ इस तरह की ये बात तो साफ़ हो गई अब अगली बात ।
ब्दों का सफ़र में कुछ अर्सा पहले “अच्छा” शब्द पर लिखी पोस्ट का ध्यान कर लें । यहाँ ‘खलास’ के प्रयोग में भाव ग्रहण की वही प्रक्रिया है जो हिन्दी के ‘अच्छा’ में है । अच्छा का मूल ‘अच्छ’ है । ‘अच्छ’ में जो ‘छ’ है वह ‘छत’ अर्थात ‘छाया’ का प्रतीक है। मोनियर विलियम्स के कोश के मुताबिक यह अच्छ है। इसमें अ+‘च्छ’ है वह ‘छद्’ से आ रहा है। इस तरह ‘अच्छ’ का अर्थ हुआ जो ढका हुआ न हो, जो उजागर है, पूरी तरह स्पष्ट है, पारदर्शी है, साफ है । इस तरह संवाद होने के बाद अन्त में जब ‘अच्छा’ कहा जाता है तब अभिप्राय यही होता है कि अब सब कुछ स्पष्ट है, कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। इसी तरह सफर की एक अन्य साथी दुबई निवासी मीनाक्षी धन्वन्तरि ने हमें बताया कि खजूर की एक किस्म को भी खलास कहते हैं । ईरान में किसी प्रियजन के न होने पर भी खाली शब्द का इस्तेमाल होता है- “जा ए शोमा खाली "... “आपकी जगह खाली है” यानि उस व्यक्ति की कमी महसूस की जा रही है ।
प्राचीनकाल से ही अरब लोग सौदागरी में माहिर थे और सामुद्रिक व्यापार में खूब बढ़े-चढ़े थे । देश-विदेश के माल से लदे उनके जहाज़ बंदरगाहों पर आ टिकते और मज़दूरों का ख़ास तबका इन्हें ‘ख़ाली’ करने के काम में जुटता । जहाज़ को खाली करानेवाले ही ‘खलासी’ कहलाए। भारत में खलासी सामान्य मज़दूर भी कहलाता है और ट्रक को अनलोड कराने वाला श्रमिक भी । गोदी ( बंदरगाह ) पर काम करनेवाला श्रमिक भी खलासी कहलाता है और रेलवे के एक निम्न वर्ग में इसी पदनाम से चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती भी होती है । अब रिक्त कराने या खाली कराने के अर्थ मे तो खलास का अर्थ स्पष्ट हुआ मगर मुंबइया ज़बान में किसी को मारने , कत्ल करने जैसे अर्थ में भी खल्लास जैसा शब्द चलता है। गौर करें खलास में शामिल मुक्ति या छुटकारा दिलाने जैसे भाव पर । खल्लास यहां आकर कत्ल का अर्थ लेता है। ‘खलासी’ या ‘खलासी करना’ का अर्थ भी खाली करना है ।

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Thursday, January 14, 2010

मीन-मेख निकालना…

 

zodiacहि न्दी में एक मुहावरा बड़ा आम है। मीन मेख निकालना। इसका एक रूप मीन-मेख करना भी है। मीन-मेख यानी एक सहज मानवीय वृत्ति जिसका मतलब है छिन्द्रान्वेषण। किसी तथ्य की गैरजरूरी पड़ताल और विवेचना। मुफ्त की नसीहतें देना और किसी के काम में खामियां तलाशना ये दो खास शगल हैं जो कमोबेश सभी समाज के लोगों में हैं। मीन-मेख निकालने में कमियां उजागर करना, व्यर्थ के दोष ढूंढना जैसी बाते शामिल हैं। न करने के बहाने से आपत्तियां खड़ी करना भी इसका एक अर्थ है। किसी मुद्दे पर बहुत ज्यादा सोचविचार या असमंजस की स्थिति भी इसमें शामिल है। इस कहावत के मूल में ज्योतिष शास्त्र है। गौर करें कि भारतीय ज्योतिष शास्र में बारह राशियां मानी गई हैं। प्राचीन काल में कोई भी कार्य करने से पहले शगुन-विचार की परम्परा थी। इसके लिए तिथि, काल, मुहूर्त निकाले जाते थे ताकि किसी किस्म का व्यवधान न आ सके।
मीन-मेख का अर्थ समझने के लिए राशिचक्र को समझना जरूरी है। राशिचक्र की बारह राशियों के नाम इस प्रकार हैं- मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धन, मकर, कुंभ और मीन। राशि का अर्थ है पुंज, समूह, ढेर आदि। राशि का प्रयोग वस्तुओं के ढेर के लिए होता है, अंकों के समूह के रूप में भी होता है और मुद्रा के समुच्चय को भी राशि कहते हैं। इसी लिए तारामंडल या तारों का समुच्चय भी राशि कहलताता है। मोटे तौर पर राशि का अर्थ आज मौद्रिक सम्पदा के रूप में स्थिर हो गया है। राशि शब्द के बारे में वाशि आप्टे के कोश में लिखा है- अश्नुते व्याप्नोति-अश्+इञ्, धातोरुडागमश्च। राशि की व्युत्पत्ति अश् धातु से हुई है जिसमें व्याप्त होने, समाने, भरने, प्रविष्ट होने का भाव है। अश् धातु का एक अन्य अर्थ खाना, स्वाद लेना, उपभोग करना आदि भी है। दूसरा अर्थ अश् धातु के पहले अर्थ का ही विस्तार है। उपभोग सुख प्राप्ति के लिए होता है। पदार्थों का उपभोग जब इन्द्रियों में व्याप्त हो जाता है उसे सुख कहते हैं। खाने की क्रिया दरअसल मुंह के जरिये उदर में भोजन की व्याप्ति ही है। अशनम् का अर्थ भी खाना ही होता है। अशनम् में जब अन् उपसर्ग लगता है तो बनता है अनअशनम् जिसका हिन्दी रूप हुआ अनशन यानि निराहार रहना। भूख हड़ताल करना। अनशन आज की हिन्दी के सर्वाधिक प्रयुक्त शब्दों में शामिल है। राशिचक्र में   शामिल राशियां दरअसल विशिष्ट तारों का समूह है जिनसे होकर सूर्य परिक्रमा करता है। वैज्ञानिक रूप में सूर्य का स्थान स्थिर है। पृथ्वी से देखने पर सूर्य और तारों की स्थिति बदलती नजर आती है क्योंकि पृथ्वीm गतिमान है। मनीषियों ने इसी रूप में विभिन्न तारा-पथों से सूर्य के परिभ्रमण की कल्पना की। पृथ्वी से देखने पर प्रत्येक तारासमूह में जो आकृति नजर आई, वही उसका नाम हो गया जैसे मेष यानी मेढ़े की आकृति का तारासमूह मकर राशि कहलाया अथवा जिस तारासमूह में मनीषियों को कुंभ का आकार नजर आया उसका नामकरण कुंभ स्थिर हुआ।
राशिचक्र की पहली राशि मेष और अंतिम मीन। किसी चक्र या अध्याय के पूरा होने को हम इतिवृत्त कहते हैं। इस संदर्भ में आदि से अंत अथवा शुरु से आखिर तक जैसा मुहावरा भी प्रयोग किया जाता है। मीन-मेख में भी समूचे राशिचक्र का भाव है अर्थात मेष से मीन तक समस्त राशियां। मीन-मेख निकालना मुहावरा आज चाहे नकारात्मक अभियक्ति लिए हुए है अर्थात किसी बात में कमियां ढूंढना मगर इसका सही अर्थ है गुण-दोष निकालना। बहुत ज्यादा सोच-विचार करना। सीधी सी बात है, मध्यकालीन रूढिवादी समाज में धर्मकर्म, ज्योतिष-तंत्र और झाड़-फूंक का बोलबाला था। पंडितों-पुरोहितों ने इस भाव को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अपनी महत्ता साबित करने के लिए वे हर काम में शुभ-अशुभ विचार करने पर जोर देते थे। चूंकि ज्योतिष और पौरोहित्य विशिष्ट विद्याएं थीं जिन पर ब्राह्मणों का एकाधिपत्य सा था, इसलिए लोगों के भविष्य बांचने से लेकर मुहूर्त और शगुन-विचार के लिए लोग उन्हीं पर आश्रित थे। किसी कार्य में सफलता के लिए उसका शुभ मुहूर्त में सम्पन्न होना आवश्यक होता है सो ज्योतिषी पोथी-पत्रा-जंत्री लेकर राशियों के गुण-भाग में जुटे रहते थे। बहुत ज्यादा सोच-विचार, गवेषणा या तर्क-कुतर्क को गुणा-भाग, जोड़-घटाव, हिसाब-किताब करना जैसे मुहावरों में अभिव्यक्त किया जाता है। इसी तरह मेष राशि से मीन राशि तक शुभ-अशुभ और गुण-दोष विचार की प्रक्रिया को मुख-सुख में मेष-मीन न कह कर मीन-मेष कहा गया। भाव यही था कि किसी कार्य के सभी पहलुओं पर विचार करना। क्ष, ष और ध्वनियों का उच्चारण  लोकबोलियो में अक्सर  ध्वनि में बदलता है। बाद में मीन-मेख निकालने का अर्थ सिर्फ कमियां तलाशना या आलोचना के बिंदुओं की खोज भर रह गया।

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Monday, January 4, 2010

नववर्ष-2 / साल-दर-साल, बारम्बार

castl पिछली कड़ी-नववर्ष-1 / बारिश में स्वयंवर और बैल

4159994350_cc29b27175र्ष की रिश्तेदारी जिस तरह वर्षा ऋतु से है उसी तरह अंग्रेजी के ईयर year शब्द का संबंध भी वर्षा से ही है। यह शब्द मूलतः इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का है। इसी तरह वर्ष और बरस के साम्य पर साल के लिए ग्रीक भाषा में ओरस (oros) शब्द है। स्पष्ट है कि वर्षा पर ही वर्ष का ज्ञान आधारित था। अंग्रेजी का ईयर year प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार का शब्द ही है। इसकी मूल धातु है yer-o जिसमें वर्ष या ऋतु का भाव है। अवेस्ता में इसका रूप है यारे yare जिसमें वर्ष का भाव है। प्रोटो जर्मनिक धातु है jer जिसमें फसलों की बुवाई वाले मौसम का भाव है। वर्षा शब्द का रिश्ता मूलतः वृ धातु से है। साफ है कि प्राचीन काल से ही काल या अवधि की बड़ी इकाइयों की गणना मनुष्य ने  ऋतु परिवर्तन और सूर्य-चंद्र के उगने और अस्त होने के क्रम की आवृत्ति यानी दोहराव को ध्यान में रखते हुए की। प्रकृति में दोहराव का क्रम महत्वपूर्ण है। यहां नया कुछ नहीं है बल्कि हर क्षण जो लौट कर आ रहा है, नया सा लगता है। दोहराव को नया समझने का भ्रम सुखद है। सृष्टि का अर्थ ही पुनर्निर्माण है। सृष्टि एक चक्र में बंधी है। काल-गणना में यह चक्रगति या दोहराव महत्वपूर्ण है। वर्षम् या वर्षः शब्द के मूल में वृष् या वृ धातु है जिसमें ऊपर उठना, तर करना, अनुदान देना, बौछार करना, आवर्तन  आदि। यहां वर्षा या बारिश का भाव स्पष्ट है। वृष् का पूर्व रूप वर् था जिसमें ऊपर उठना, चुनना, वितरित करना, नियंत्रित करना जैसे भाव हैं। प्रोटो जर्मनिक धातु  jer की समानता संस्कृत वर् से ध्यान देने योग्य है।
4159994350_cc29b27175 गौरतलब है कि प्राचीनकाल की सभी संस्कृतियों में वर्षाकाल में ही बुवाई होती थी। स्पष्ट है कि प्रोटो जर्मनिक  jer  धातु में भी वर्षा का भाव ही है। मौसम के दोहराव के क्रम में विभिन्न संस्कृतियों ने अपने अपने वर्ष बनाए। मौजूदा जनवरी से शुरु होनेवाली परम्परा ईसाई संस्कृति की देन है। अन्यथा सर्दी, गर्मी और बरसात के आधार पर ही वर्ष के बारह महिनों की गणना होती रही है। ग्रीक के ओरस (oros) से अंग्रेजी के आवर (hour) की साम्यता है। संस्कृत वर्, अवेस्ता के yare की कड़ी में ग्रीक के ओरस से बाद में होरा hora बना जिसका भी अर्थ  वर्ष या वर्ष का कोई भी हिस्सा है। इसीलिए अंग्रेजी के आवर का अर्थ घड़ी, घंटा में रूढ़ हो गया। यह विकास बाद में हुआ। हालांकि स्लोवानी में यह jaru हो जाता है जिसका अर्थ वसंत है। तब तक इस धातु में वर्ष का भाव स्थिर हो चुका था इसीलिए स्लोवानी में इसका अर्थ वसंत भी है। 
4159994350_cc29b27175ह्लवी में एक शब्द है दुश-यारम् dus-yaram जिसके मायने हैं खराब मौसम। यहां भाव पूरे वर्ष की अवधि के खराब रहने से है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था प्राचीनकाल में सभी समाजों में थी। अवर्षा की स्थिति में फसल न होने से अकाल की स्थिति निर्मित होती थी। इसे ही दुश-यारम् कहा गया है अर्थात बुरा साल। यहां सामान्य अर्थ निकाला जा सकता है, बुरा वक्त। हिन्दी मे काल का मतलब भी वक्त ही होता है इस तरह अकाल भी बुरा समय ही हुआ। संस्कृत में दुस्/दुश् उपसर्ग का मतलब होता है बुरा, निम्न, नीच आदि। इसके यही रूप फारसी में भी हैं और वहां से इसका प्रवेश अरबी में भी हुआ। दुश्मन शब्द के संदर्भ में इसे समझा जा सकता है। दुश्-यारम् का फारसी रूप हुआ दुश्वार या दुश्वारी। यह हिन्दी-उर्दू में भी प्रचलित है जिसमें कठिनाई, मुश्किल हालात या वक्त के संदर्भ में इस्तेमाल होता है। दुश्वार में वर् एकदम साफ नजर आ रहा है। इसे दुश+वार की तरह देखें तो भी अर्थ स्पष्ट है। दुश यानी बुरा और वार यानी दिन। वृ से बने वर् में मूलतः काल का भाव है चाहे वह वर्ष हो, माह हो या दिन। सप्ताह के दिनों के पीछे लगे वार शब्द से यह स्पष्ट है। संस्कृत वारः से बना है हिन्दी का वार जो इसी वृ से आ रहा है जिसका अर्थ है सप्ताह का एक दिन, समूह, आवृत्ति, घेरा, बड़ी संख्या आदि। वृ धातु में निहित आवृत्ति का
nyres प्रकृति में दोहराव का क्रम महत्वपूर्ण है। यहां नया कुछ नहीं है बल्कि हर क्षण लौट कर आ रहा है।
भाव चौबीस घंटों में सूर्य को घूमने की गति में समझ सकते हैं जिससे एक दिन बनता है।  तीस दिनों में एक माह और बारह मासिक-चक्रों से एक वर्ष तय होता है। यही आवृत्ति ऋतु कहलाती है। वृ धातु में संस्कृत का भी छुपा है। वार का ही फारसी रूप बारः होता है जिसमें दोहराव, दफा, मर्तबा जैसे भाव है। संस्कृत के अनुस्वार की प्रवृत्ति ही अवेस्ता और फारसी में भी है। अक्सर के अर्थ में भी जिस बारहा का प्रयोग हम हिन्दी उर्दू में देखते हैं वह यही बारः है। बार-बार के अर्थ में  हिन्दी में बहुधा शब्द है। संस्कृत में इसके लिए वारंवारम शब्द है जिससे हिन्दी का बारम्बार शब्द बना है।
4159994350_cc29b27175हिन्दी उर्दू में वर्ष के लिए साल शब्द का इस्तेमाल भी बहुतायत में होता है। साल मूलतः फारसी का शब्द है जिसकी रिश्तेदारी इंडो-ईरानी भाषा परिवार से है। संस्कृत के शरदः का अवेस्ता में रूप होता है sareda. पहलवी में यह सालक हुआ और फिर फारसी में इसका रूपांतर साल हुआ। अवेस्ता का फारसी के में बदल रहा है। ताजिक, पश्तों और साखी ज़बानों में भी यह साल ही है जो उत्तर पूर्वी ईरान, ताजिकिस्तान आदि इलाकों में बोली जाने वाली भाषाए हैं। पामीर, चित्राल आदि इलाकों में इसका रूप सालोह हो जाता है। तुर्किक या तातारी जैसी जबानों में इसके सुल, सिल जैसे रूप हैं जबकि किरगिजी में यह zhil के रूप में विद्यमान है। इंडो-ईरानी भाषा परिवार के इस शब्द की व्याप्ति मंगोल  भाषा में भी हुई है जहां यह बतौर zhil मौजूद है। किसी जमाने में शरद माह से वर्ष-गणना की परिपाटी रही होगी। इससे बनें सालो-साल, साल-दर-साल (साल-ब-साल) सालाना, सालगिरह, हरसाल, पारसाल जैसे शब्द हिन्दी के बहुप्रयुक्त शब्दों में शुमार हैं। फौजी शब्दावली में सालार या सालारजंग जैसे शब्द भी हैं जो हिन्दी में परिचित हैं। सालार का अर्थ होता है उम्रदराज, वरिष्ठ या बुजुर्ग व्यक्ति। इन अर्थों में सालार का जो अर्थ रूढ़ हुआ वहा है मुखिया, कप्तान या सरदार। राज्यपाल, प्रधानमंत्री जैसे अर्थों में भी इसका प्रयोग होता है। इसका महत्व विशेषण के तौर पर भी है जिसका प्रयोग बतौर उपाधि भी होता रहा है। –जारी

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Wednesday, May 13, 2009

गुरु से जुपिटर तक…

…सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह की गुरुता यानी उसके आकार, चमक और कांति ही उसे महत्ता प्रदान करते हैं …. Jupiter_Detail
प्रा चीन भारतीय मनीषियों ने खगोलिकी पर बहुत चिन्तन किया था। ग्रह-नक्षत्रों, उनकी गतियों, ग्रहणों और उसके मानव जीवन पर प्रभावों के बारे में वे लगातार सोचते थे। खगोल संबंधी भारतीय ज्ञान फारस होते हुए अरब पहुंचा और फिर वहां से यूनानी, ग्रीक और रोमन समाज तक पहुंचा। हालांकि ज्ञान के आदान-प्रदान का यह सिलसिला दोनो तरफ से था।
सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह का नाम गुरु है। इसे बृहस्पति भी कहते हैं जिसका अंग्रेजी नाम है जुपिटर। सप्ताह के सात दिनों में एक गुरु का होता है इसीलिए उसे गुरुवार कहते हैं। गुरु शब्द में ही गुरुता का भाव है। गुरु शब्द की व्युत्पत्ति भी ग्र या गृ जैसी प्राचीन भारोपीय ध्वनियों से मानी जा सकती है जिनमें पकड़ने या लपकने का भाव रहा। गौर करें गुरु में समाहित बड़ा , प्रचंड, तीव्र जैसे भावों पर। हिन्दी में आकर्षण का अर्थ होता है खिंचाव। ग्रह् का अर्थ भी खिंचाव ही है, इससे ही ग्रहण बना है। घर के अर्थ में ग्रह या गृह भी इसी मूल के हैं। ध्यान दें कि गृहस्थी और घर में जो खिंचाव और आकर्षण है जिसकी वजह से लोग दूर जाना पसंद नहीं करते। ग्रहों – खगोलीय पिंडों की खिंचाव शक्ति के लिए भी गुरुत्वीय बल शब्द प्रचलित है जिसे अंग्रेजी में ग्रैविटी कहते हैं जो इसी मूल से उपजा है।
फारसी का एक शब्द है बिरजिस जिसका अभिप्राय तारामंडल के सर्वाधिक चमकीले तारे गुरु से ही है। यह इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और बृहस्पति से बना है। संस्कृत में बृह् धातु है जिसमें उगना, बढ़ना, फैलना जैसे भाव हैं। आकार और फैलाव के संदर्भ में इससे ही बना है बृहत् (वृहद) शब्द जो बृह+अति के मेल से बना है। इसका मतलब होता है विस्तृत, प्रशस्त, प्रचुर, शक्तिशाली, चौड़ा, विशाल, स्थूल आदि। बृहत्तर शब्द भी इससे ही बना है। संस्कृत में इसके वृह, वृहत् और वृहस्पति, वृहत्तर जैसे रूप भी हैं जो हिन्दी में भी प्रचलित हैं। ऋषि-मुनियों ने गुरु के अत्यधिक प्रकाशमान होने से
"..संस्कृत में बृह् धातु है जिसमें उगना, बढ़ना, फैलना जैसे भाव हैं.."
उसके बड़े आकार की कल्पना की और उसे बृहस्पति कहा। पुराणों में बृहस्पति को देवताओं का गुरु भी कहा गया है। बृहस् ही ईरानी के प्राचीन रुपों में बिरहिस हुआ और फिर बिरजिस बना। वाजिदअली शाह के शहजादे का नाम बिरजिस कद्र था।
बृहस्पति के बड़े आकार, उसकी द्युति अर्थात चमक ही इसके अंग्रेजी नाम जुपिटर के मूल में हैं। भाषाविज्ञानियों ने इसे प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार का शब्द माना है। यह दो धातुओ के मेल से बना है। द्युस dyeu + पेटर peter = जुपिटर Jupiter जिसका मतलब होता है देवताओं के पिता जो बृहस्पति में निहित देवताओं के गुरु वाले भाव का ही विस्तार है। ग्रीक पुराकथाओं में जिऊस का उल्लेख है जो देवताओं का पिता था। प्राचीन भारोपीय धातु dyeu की संस्कृत धातु दिव् से समानता देखें जिसमें चमक, उज्जवलता, कांति, उजाला जैसे भाव हैं। इसी तरह पेटर की पितृ से। प्राचीनकाल से ही मनुष्य ने चमक, प्रकाश द्युति में ही देवताओं की कल्पना की है। सो द्युस-पेटर में जुपिटर अर्थात बृहस्पति का भाव स्पष्ट है। दिव् से ही बना है दिवस अर्थात दिन या दिवाकर यानी सूर्य। दिव् का एक अर्थ स्वर्ग भी होता है क्योंकि यह लोक हमेशा प्रकाशमान होता है। इन्द्र का एक नाम दिवस्पति भी है।

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