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Monday, February 4, 2013

“हिन्दी सराय” से गुज़रते हुए

स बार पेश है डॉक्टर पुरुषोत्तम अग्रवाल की ताज़ा पुस्तक "हिन्दी सरायः अस्त्राखान वाया येरेवान" की चर्चा । पुस्तक सोलहवीं-सत्रहवी सदी के उन भारतीय व्यापारियों की जड़ों की तलाश के बहाने से समूची भारतीय / हिन्दू संस्कृति की वैश्विक धरातल पर विद्वत्तापूर्ण पड़ताल करती है जो भारत से रूस के अस्त्राखान जा बसे थे।
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क़रीब दो साल पहले की बात है । अगस्त महिने की 21-22 तारीख़ की दरमियानी रात डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल को फ़ैसबुक पर मैसेज किया कि 11 सितम्बर 2011 को मै दिल्ली पहुँच रहा हूँ, क्या मुलाक़ात मुमकिन है ? 22 अगस्त की खुशनुमा सुबह । सात बजे डॉक्टसाब के फोन से ही नींद खुली । पता चला कि वे तो उन दिनों दिल्ली से बहुत दूर येरेवान-अस्त्राख़ान में होंगे ।
paggBपुरुषोत्तम अग्रवाल भारतीय इतिहास, साहित्य और संस्कृति के गंभीर अध्येता हैं । जेएनयूँ में सत्रह बरस पढ़ाने के बाद इन दिनों संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य हैं।
मध्यएशिया के इन दो शहरों का नाम सुनते ही रोमांचित हो उठा । पुलक के साथ डॉक्टसाब से अनुरोध किया कि वे यात्रावृतान्त ज़रूर लिखें और तस्वीरें भी लें । डॉक्टसाब ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा था-“ कोशिश पूरी होगी बंधु, अगर सब कुछ ठीक रहा तो क्योंकि वक़्त बहुत कम है ।” सात-आठ दिन का दौरा कर डॉक्टसाब लौट आए पर उनकी यात्रा तब तक अधूरी रहनी थी जब तक उनकी खोज-यात्रा के अनुभव जिल्द में बंध नहीं जाते । खुशी की बात है कि क़रीब एक साल के भीतर डॉक्टसाब ने येरेवान-अस्त्राख़ान यात्रा-वृत्तान्त पूरा कर लिया और बीते नवम्बर माह में उसका धूमधाम से लोकार्पण भी हो गया । हिन्दी जगत में आज इस क़िताब की खूब चर्चा है । ये सिर्फ़ यात्रावृत्तान्त नहीं बल्कि सांस्कृतिक अध्ययन है । एक संस्कृतिकर्मी के द्वारा वोल्गा और गंगा के बीच की दूरी को पाटने वाले उन पदचिह्नों की तलाश का आख्यान है जो सदियों से इस विशाल भूक्षेत्र में उभरते रहे ।
ब्दों का सफ़र करते हुए अपन बरसों से भूमध्य सागर समेत एशिया के मध्य, पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों का मानचित्र पर्यटन करते रहे हैं । हिन्दी-उर्दू समेत इस मुल्क़ की तमाम बोलियों में पूरा संसार नुमांया होता है । मग़रिब में छुपा मोरक्कों, ब्रुनेई में छुपा वरुण अगर सामान्यतौर पर नज़र नहीं आता तो यह भी कहाँ पता चलता है कि खजानेवाला कारूँ तुर्की का सनकी क्रोशस था और जिस शाबाशी की थपकी पीठ पर महसूस होती है उस शाबाश का रिश्ता फ़ारस की खाड़ी में स्थित बंदरअब्बास के संस्थापक शाहअब्बास से भी हो सकता है । शब्दों का सफ़र करते हुए ही इन तमाम इलाक़ों से परिचय होता गया ।  बृहत्तर भारतीयता का सांस्कृतिक परागण पूरी दुनिया में सदियों से होता रहा है । चाहे पूर्व में कम्बोडिया जैसा देश हो जहाँ अवध के अयोध्या की छाया अयुथाया में नज़र आती है या फिर सुदूर पश्चिमोत्तर का पेशावर हो जिसका नाम कनिष्क के ज़माने में पुरुषपुर था । बहरहाल, डॉक्टसाब ने अपनी किताब का नाम प्रतीकात्मक रखा है- हिन्दी सरायः अस्त्राखान वाया येरेवान । हिन्दी में एक तो वैसे ही सफ़रनामे कम लिखे जाते हैं । ऐसा नहीं कि हिन्दी वाले यात्रा नहीं करते मगर उस दृष्टि का क्या कीजे जो एक सच्चे लेखक के मन में होती है । लेखक अपने दौर का कालयात्री होता है । उसकी लिखी एक एक इबारत अपने समय की सच्चाई होती है । अपनी कल्पना से वह ऐसे अनेक पुलों का सृजन करता है जिससे समाज को विभिन्न समयावधियों के बीच से गुज़रने का मौका सुलभ होता है ।
स्त्राख़ान की जो यात्रा वाया येरेवान दिल्ली से शुरू हुई उसका बीज तो लेखक की चर्चित कृति “अकथ कहानी प्रेम की” की सृजनयात्रा के दौरान ही पड़ गया था । इसका ज़िक़्र लेखक ने अनेक स्थानों पर किया भी है । अस्त्राख़ान से अपना परिचय भी ऐतिहासिक भाषा विज्ञान पर भोलानाथ तिवारी के विद्वत्तापूर्ण लेखन के ज़रिये हुआ था । उन्होंने हिन्दी में समाए विदेशज मूल के अनेक शब्दों की पड़ताल की थी इसके लिए उन्होंने मध्यएशिया के अनेक देशों की यात्रा भी की । डॉ अग्रवाल की यह यात्रा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है । सदियों पहले दक्षिणी रूस में वोल्गा के मुहाने पर बसा अस्त्राखान मध्यएशिया का बड़ा व्यापारिक केन्द्र था । हिन्दुस्तान के सिंध, मारवाड़ और पंजाब से कई व्यापारी वहाँ जाकर बसते रहे थे जो मूलतः वैष्णवपंथी थे । ऐसे समाज में जहाँ व्यापार के लिए सात समंदर पार करना निषिद्ध हो, ये कौन वैष्णव व्यापारी थे जिन्होंने सुदूर रूस के अस्त्राखान शहर को अपने पुरुषार्थ और व्यवसाय बुद्धि का अखाड़ा बनाने की सोची ? लेखक ने इस संदर्भ में विद्वत्तापूर्वक स्थापित किया है कि दूर-देशों की यात्रा करना भारतीयों का स्वभाव रहा है । पश्चिम की ओर जो व्यापारी जत्थे गए दरअसल वे रामानुज सम्प्रदाय से अलग हुए रामानंदी वैष्णव थे जिन्होंने रूढ़ धार्मिक मान्यताओँ के आगे अपने पुरुषार्थ और आस्था का ऐसा सन्तुलन बनाया जिसने भारत-रूस व्यापार का एक नया रास्ता खोल दिया ।
स्त्राख़ान बरास्ता येरेवान यह सफ़र लेखक के लिए एक तीर्थयात्रा जैसा था । पुरखों की खोज में की गई एक यात्रा जिसका मक़सद था अपनी जड़ों की तलाश । प्राचीनकाल से ही समूची दुनिया में जितने भी फेरबदल, उथल-पुथल और सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव आए हैं उनमें कारोबारी गतिविधियों की भूमिका ख़ास रही है । सौदागरों के ज़रिये ही न सिर्फ जिन्सों और माल-असबाब का कारोबार हुआ बल्कि उससे कई गुना ज्यादा और स्थायी व्यापार हुआ शब्दों, भाषाओं हिन्दी सरायऔर रिवायतों का । सदियों पहले भारत से अस्त्राखान जा बसे व्यापारी समुदाय के बारे में इतिहासकारों की दिलचस्पी कभी क्यों नहीं जागी, लेखक को यह सवाल लगातार मथता रहता है । इसके कारणों का चिन्तन-पक्ष भी बड़ी प्रमुखता से किताब में उभर कर आया है । तथ्यों को दर्ज़ करने की हमारी उदासीनता एक तरह से भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है । हमें अपने अतीत के गौरवगान में इतना आनंद आता है कि क्या कहें । शायद इसीलिए हम वास्तविक तथ्यों को अगली पीढ़ियों के लिए संजो कर, उनका दस्तावेजीकरण करने में कोताह हैं । सुविधानुसार अपने सुनहरे अतीत के पन्नों को जब चाहें और चमकीला बना कर नयी पीढ़ी के सामने रख देते हैं । अतीत के विवरणों को दर्ज़ न करने की भारतीयों की विशिष्ट प्रवृत्ति के बारे में ‘हिन्दी सराय’ में डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल लिखते हैं, “...किसी घटना या अनुभव को ...लिखित दस्तावेज का रूप देने में हिन्दुओं की रुचि क्यों नहीं थी ? क्या इसलिए कि हिन्दू चित्त को, किसी सामाजिक अनुभव की स्मृति से जो सीखने योग्य है, उसे मौखिक परम्परा के जरिये अगली पीढ़ी के संस्कारों तक पहुँचा देना ज्यादा सुहाता था ...”
डॉक्टसाब की बात में काफ़ी हद तक सच्चाई है । अस्त्राख़ान के सैकड़ों गुमनाम भारतीय व्यापारियों के बारे में उनकी गहन पड़ताल के सारथी बने मास्कों में रहने वाले हिन्दी कवि अनिल जनविजय, जिन्होंने लेखक के लिए अस्त्राखान के अभिलेखागार में रूसी भाषा में दर्ज़ अनेक महत्वपूर्ण दस्तावेजों का हिन्दी अनुवाद कर बेशक़ीमती मदद की । डॉक्टसाब ने किताब में अनेक स्थानों पर इस यात्रा में अनिलजी की महती भूमिका को याद किया है । अस्त्राखान के भारतीय व्यापारियों की खोज यात्रा के सम्बन्ध में मैं ज्यादा नहीं कहना चाहूँगा क्योंकि उनके बारे में जो भी जानकारियाँ हैं वे पहले ही बहुत कम हैं । डॉक्टसाब ने हर उपलब्ध जानकारी का बेहद रचनात्मक प्रयोग कर लिया है इसलिए चाहूँगा कि सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के इन व्यापारियों चाहे वो मशहूर मारवाड़ी बारायेव हो या टेकचंद लालायेव अथवा बगारी आलमचंदोफ़, इनके बारे में जानने के लिए आपको क़िताब खऱीद कर पढ़नी होगी । अगर अपने इस बयान-हाल में उनके बारे में ज़रा सा भी लिखा तो पढ़ने का मज़ा जाता रहेगा । यहाँ मैं क़िताब की दूसरी खूबियों के बारे में भी कुछ कहना चाहूँगा । भूमिका ने डॉक्टसाब ने इस किताब को ट्रैवेलॉग के साथ थॉटलॉग की संज्ञा भी दी है । व्यक्तिगत तौर पर मुझे ‘हिन्दी सराय’ के ट्रैवेलॉग वाले स्वरूप से थॉटलॉग वाले रूप ने ज्यादा मुतासिर किया । किताब के पहले सर्ग यानी बयान येरेवान में उन्होंने आर्मीनिया के लाड़ले कवि चॉरेन्त्स के बहाने आर्मीनिया के सामाजिक, सास्कृतिक और राजनीतिक इतिहास पर जो कुछ भी लिखा है वो बेहद दिलचस्प तब्सरा है । पाठक को बांध कर रखने वाला साथ ही ज्ञानवर्धक । कमाल ये कि चॉरेन्त्स के बारे में पढ़ते हुए लगता नहीं कि यह क़िस्सा रूसी क्रान्ति के महान नायकों में एक त्रात्स्की, उनके मैक्सिको निर्वासन और वहाँ उनकी हत्या तक जाएगा । रूस ही क्यों, समूचे पूर्वी यूरोप में अपने समाज नायकों से प्रेम करना एक तरह से सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है । ख़ास तौर पर कलाजीवियों के लिए उस समाज में सैकड़ों साल पहले ही कुलीन-समझ विकसित हो चुकी थी । येरेवान की माश्तोज स्ट्रीट पर वे आर्मीनियाई लेखक विलियम सारोयान की प्रतिमा देखते हुए याद करते हैं “दिल्ली में प्रेमचंद के नाम पर कोई सड़क नहीं है ।”
किताब का चिन्तन पक्ष इतना ताक़तवर है कि एक बार में इस क़िताब को सिर्फ़ फ्लैप पर दी गई तहरीर के मद्देनज़र ही पढ़ा जा सकता है, वरना इसे बार बार पढ़ना होगा । किसी ट्रैवेलॉग में सन्दर्भ ग्रन्थ की सिफ़त होनी चाहिए, मगर जैसा कि भारतीय लेखकों का स्वभाव है, उनके सफ़रनामे अक़्सर दिनांक-वृत्त या डायरी बन कर रह जाते हैं । येरेवान प्रसंग में ही डॉक्टसाब ने जरथुस्त्रवादी विचारधारा यानी शुभाशुभ संघर्ष, बाइबल के ओल्ड टेस्टामेंट के प्रसंग, इस्लामी कट्टरवाद, प्रसाद का आनंदवाद बनाम दुखवाद, ऋग्वैदिक सोच और एकेश्वरवाद बनाम बहुदेववाद आदि मुद्दों पर पृष्ठ 33 से 43 के बीच इतने दिलचस्प विमर्श का मुज़ाहिरा किया है कि कुछ कहा नहीं जा सकता । मेरी निग़ाह में ये सफ़हे किताब का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं । बेहद कठिन चीज़ों को उन्होंने इतनी आसानी से समझा दिया है कि मैं सिर्फ उनके प्रति आभार जता सकता हूँ । किताब में किन्हीं स्थानों और वस्तुओं की व्युत्पत्तियों की चर्चा भी डॉक्टसाब करते रहे हैं । हाँ, भारतीय व्यापारियों की जारज संतानों के अगरिजान नाम नें मुझे काफ़ी परेशान किया है । इसके पीछे पड़ा हूँ । इस बात पर दृढ़ हूँ कि इस शब्द का संदर्भ भारतीय भाषाओं से नहीं है । अस्त्राखानी तातारों के बीच या वहाँ के रूसियों के बीच अगरिजान नाम हिकारत भरा सम्बोधन था, ऐसा लगता है । अग्निपुत्र जैसी व्यंजना इसमें तलाशना उचित नहीं लगता । इस पर विस्तार से लिखने की इच्छा है । काम चल रहा है । इंडो-यूरोपीय या तुर्किक-तातारी धरातल में इस शब्द के बीज दबे हुए हैं, फ़िलहाल यही मान कर चल रहा हूँ ।
लते चलते यही कि ये सिर्फ़ पुस्तक चर्चा है । इसमें आलोचना या समीक्षा के तत्व न तलाशे जाएँ । इसके प्रारूप में कई खामियाँ होंगी । यूँ ही, जो मन में आया, ईमानदारी से लिख दिया । समाज-संस्कृति में रुचि रखने वाले हिन्दी पाठकों के लिए यह पुस्तक बेहद उपयोगी है । इसे ख़रीदने की सलाह दूँगा । प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या –131, मूल्य-395 (हार्डकवर)

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Tuesday, November 27, 2012

किताब के बहाने ‘ख्वाब के दो दिन’

bookhhBookss[5]राजकमल प्रकाशन/ मूल्य-175रु./ पृ.284
दो ही तरह की किताबों को पढ़ने में हमें ज्यादा वक़्त लगता है । एक वे जो महत्वपूर्ण तो होती हैं, मगर बुनावट की दृष्टि से बोझिल होती हैं, पाठक को बांध कर नहीं रख पातीं । दूसरी वे जो महत्वपूर्ण तो होती ही हैं साथ ही उनकी भाषा, कथ्य और रचना-विधान भी विशिष्ट होता है । इन सभी चीज़ों का एक साथ आनंद लेते हुए एक बैठक में उस कृति को पढ़ पाना मुश्किल होता है । पहली किस्म की महत्वपूर्ण पुस्तकें कई बार लम्बे लम्बे अंतराल के बाद खत्म की जाती हैं । हाँ, दूसरी किस्म की कृतियों के साथ लम्बा अंतराल तो नहीं आता, मगर उन्हें एक बैठक में भी खत्म नहीं किया जा सकता । क्योंकि वे आपको सोचने का मौका देती हैं । वरिष्ठ पत्रकार यशवंत व्यास की हाल ही में प्रकाशित ‘ ख़्वाब के दो दिन ’ दूसरी किस्म की किताब है ।

yashwant 60यशवंत व्यास 'अहा ज़िंदगी', ‘दैनिक भास्कर’ और ‘नवज्योति’ के सम्पादक रह चुके हैं । इन दिनों ‘अमर उजाला’ के समूह सलाहकार । विभिन्न विषयों पर दस किताबें प्रकाशित

चिन्ताघर और ‘कामरेड गोडसे’ यशवंत व्यास की चर्चित औपन्यासिक कृतियाँ हैं । दोनों के लिए उन्हें अनेक सम्मान – पुरस्कार मिल चुके हैं । ‘चिंताघर’ 1992 में लिखा गया । ज़ाहिर है इसके कथा-फ़लक में 1992 से पहले के दो दशक समाए हुए हैं । इसी तरह ‘कामरेड गोडसे’ 2006 में प्रकाशित हुआ और इसमें भी 2006 से पूर्व के दो दशकों की छाया है । दोनों उपन्यासों में ख़बरनवीसी की दुनिया के समूचे तन्त्र की पड़ताल है ।‘चिंताघर’ से ‘कामरेड गोडसे’ तक का समय धर्मयुग, दिनमान जैसी पत्रिकाओं और नई दुनिया जैसे अखबारों से होते हुए क्षेत्रीय पत्रकारिता के उभार का काल है । इन दोनों उपन्यासों में लेखक ने लीक से हटकर रचे गए कथा-विधान के ज़रिये, उन चूहा सम्पादकों और गोबर ( गणेश ) मालिकों की कारगुज़ारियाँ उजागर की हैं जो सर्कुलेशन के आँकड़ों पर बाजीगरी दिखाते हुए, लोकल से ग्लोबल बनने की होड़ में आपराधिक जोड़-तोड़ से भी गुरेज़ नहीं करते । पत्रकारीय फ़लक पर लिखे गए दोनो कथानकों को अब उन्होंने एक छोटी भूमिका के ज़रिये एक साथ रख दिया है । ख़्वाब के दो दिन एक तरह से दोनों कृतियों का पुनर्पाठ है , जिन्हें  राजकमल प्रकाशन ने शाया किया है ।
बाज दफ़ा लेखक जो कुछ भोगता-देखता है उसे रोचक अंदाज़ में सामने रखता है । कभी वह अलग किस्म का शिल्प-विधान रचता है और कभी सहज क़िस्साग़ोई के ज़रिये कहानी कहता है । यशवंत व्यास का अपना अलग अंदाज़ है । उनके अनुभवों का केनवास बहुत बड़ा है । वे कई आयामों से दुनिया को देखते हैं । कभी दुनिया उनके आगे से गुज़रती है और कभी वे खुद उसका हिस्सा बन जाते हैं । सिर्फ़ कथ्य को समझ लेने की जल्दबाजी वाले गोष्ठीटाइप बुद्धिजीवियों के लिए यह उपन्यास बौद्धिक कसरत साबित हो सकता है । यही नहीं, बहुत मुमकिन है उन्हें रचना-विधान जटिल और अराजक तक नज़र आए । किन्तु पत्रकारीय नज़रिये से समसामयिक राजनीतिक परिदृष्य को समझने वालों और गंभीर लेखन करने वालों के लिए इस पुस्तक में भरपूर आधार-सूत्र मौजूद हैं ।
किसी नए फ़ारमेट के लिए भाषा का तेवर भी अनूठा होना चाहिए सो यशवंत व्यास यहाँ तो जैसे अपने तरकश के सारे तीरों के साथ नज़र आते हैं । ‘चिंताघर’ की जटिल संरचना की जिन्हें शिकायत है सो होती रहे । अपन को उनकी कतई चिन्ता नहीं । ‘ख्वाब के दो दिन’ के पहले ख़्वाब से गुज़रनें में अगर हमने ज्यादा वक़्त लगाया तो इसलिए नहीं क्योंकि वह जटिल था बल्कि इसलिए क्योंकि लेखक के भाषायी तिलिस्म में हम उलझ-उलझ जाते रहे । आलोचक टाईप लोगों के लिए यह उलझाव शब्द नकारात्मक हो सकता है मगर हम सकारात्मक अर्थ में इसे लिख रहे हैं । आप भूलभुलैयाँ में क्यों जाते हैं ? खुद हो कर जाते हैं और बार बार जाते हैं । सुलझाव की खातिर । सुलझाव के मज़े की खातिर । सुलझाव का यह मज़ा दरअसल चिन्ताघर के लेखक द्वारा खुद रचे गए नए मुहावरे को समझने पर आता है । इसीलिए लेखक के भाषायी तिलिस्म को समझने के लिए चिन्ताघर की कई-कई पेढ़ियाँ हमने बार-बार चढ़ीं और बहुत से गलियारों में देर तक ठिठके रहे । रिवायती अंदाज़ में कथानक से परिचित कराना यशवंत व्यास जैसी व्यंग्य दृष्टि रखने वाले लेखकों के लिए दायरे में बंधने जैसा होता है । दायरा तोड़े बिना व्यंग्य का पैनापन नहीं उभर सकता । उनकी भाषा हर बीतते क्षण और रचे जाते वर्तमान में मौजूद व्यंग्य-तत्व को स्कैन कर लेती है । व्यासजी का ऑटोस्कैनर जो नतीजे देता है वे अक्सर मुहावरों और सूक्तियों की शक्ल में सामने आते हैं – हिन्दी को समृद्ध करते नए भाषाई तेवर से आप रूबरू होते हैं । मगर ऐसा प्रयोगशीलता के आग्रह की वजह से नहीं बल्कि इसलिए क्योंकि चिन्ताघर जिस रचना-प्रक्रिया से जन्मा है, उसके बाद इस कृति का रूप यही होना था । वैसे भी इसमें आख्यायिका शैली या वर्णनात्मकता के लिए गुंजाइश नहीं थी ।
भाषायी तेवर की मिसालें ही अगर देना चाहें तो अपन ‘ख्वाब के दो दिन’ की समूची ज़िल्द ही कोट कर देंगे । कुछ बानगियाँ पेश हैं । 1.“मेरे पास प्रतिष्ठा रूपी जो कुछ था उससे एक चूहे को इस क़दर स्वस्थ रख पाना मुश्किल था” 2.”साफ़ करने के बाद भी मुँछें अन्तरात्मा की तरह उगना चाहती हैं । जो समझदार होते हैं वे प्रतिदिन शेव करते हैं, इस तरह अन्तरात्मा से भी मुकाबला किया जा सकता है । ” 3.“अच्छा मुख्य अतिथि स्थिर, गम्भीर और (कुछ एक अंगों को छोड़कर ) गतिहीन होता है । उससे उम्मीद की जाती है कि समारोह को गति प्रदान करे ।” 4. “समूचा तन्त्र भक्तिकालीन साहित्य की तरह पवित्र और रसमय हो जाता” 5. “उद्यमशीलता का सार्वजनिक शील प्रतिभावानों से सुरक्षित रहता है । लेकिन प्रतिभा की सार्वजनिक प्रतिष्ठा उद्यम के कुल टर्नओवर से वाजिब दूरी बनाए रखती है । इस प्रकार उद्यमी उद्यमशील बना रहता है और प्रतिभा, प्रतिभा ही रह जाती है – हिन्दी फिल्मों में हीरो की बहन जैसी । ”
bookचिन्ताघर वस्तुतः क्या है ? एक प्रतीक जो किताब के प्रथम सर्ग में छाया हुआ है । ‘चिन्ताघर’ अखबार का न्यूज़ रूम है । किसी औघड़ पत्रकार की खोपड़ी है । ‘चिन्ताघर’ किसी का भी हो सकता है । फ़िक़्रे-दुनिया में सिर खपाते उस आदमी का भी जिसके ख़्वाबों में चांद है और उसका भी जो रोटी के आगे किसी चांद की सच्चाई नहीं जानता । मौजूदा राजनीति के उदारवादी नटनागर भी किन्हीं चिन्ताघरों की रचना जनता को उलझाने के लिए करते हैं । अलबत्ता वहाँ सुलझाव का कोई प्रयत्न उसके नियामकों की तरफ़ से नहीं होता । इसी तरह ‘कामरेड गोडसे’ दरअसल किसी गोडसे और कामरेड का गड़बड़झाला नहीं बल्कि 1947 से पहले के भारतीय मानस का स्वप्नलोक, आज़ादी का यथार्थ और फिर पोस्ट मॉडर्निज्म- यानी ‘उआ युग’ (उत्तर आधुनिकता, जिसे लेखक ने जगह-जगह पोमो कहा है ) के मिले-जुले प्रभाव से पैदा हुआ एक बिम्ब है जिसके और भी कई आयाम पहचाने जाने अभी बाकी हैं । कवि, नेता, पत्रकार, अफ़सर, व्यापारी इन सबकी वीभत्स आकृतियाँ जब एक साथ सत्ता सुंदरी का शृंगार करती नज़र आती हैं तब न गाँधी शब्द चौंकाता है और न गोडसे ।
‘ख्वाब के दो दिन’ में ‘ चिंताघर ’ के रचना-विधान की जटिलता दूसरे सर्ग ‘ कामरेड गोडसे ’ में टूटती है । जैसा कि यशवंत व्यास भूमिका में बताते हैं कि दोनों कृतियों में डेढ़ दशक का लम्बा समयान्तराल है । 14 साल का यह अन्तर केवल पत्रकारिता के संदर्भ में ही नहीं है । भीष्म साहनी के ‘तमस’ का कथानक रावलपिंडी की एक मस्जिद के बाहर कटे सूअर की लाश मिलने के बाद दंगे की आशंका से शुरू होता है । वह 1946 का दौर था । 20वीं सदी के अंतिम दशक में या 21वी सदी के पहले दशक के पूर्वार्ध में ‘कामरेड गोडसे’ की शुरुआत मस्जिद के बाहर एक मुस्लिम सुधारवादी के कत्ल की खबर से होती है । उसकी लाश के पास सूअर का ब्रोशर बरामद होता है जिसे प्रख्यात चित्रकार ने बनाया था । अखबार का राठी रिपोर्टर कहता है कि-“अब सूअर काट कर फेंकने की ज़रूरत नहीं रही । सूअर का एक ब्रोशर ही काफ़ी है।” इस कृति को पढ़ते हुए राजनीति, कला, साहित्य की दुनिया के कई नामी लोगों के हवाले भी मिलते हैं । मगर यह भी मुमकिन है कि आपको अपने इर्द-गिर्द के चेहरे याद आ जाएँ ।
‘ख्वाब के दो दिन’ पढ़ते हुए लगातार धर्मवीर भारती का बहुचर्चित उपन्यास “सूरज का सातवाँ घोड़ा’, कृशन चंदर का ‘एक गधे की आत्मकथा’, श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’ और मनोहर श्याम जोशी का ‘कुरु कुरु स्वाहा’ याद आता रहा । इसलिए नहीं कि इनके लेखन के स्मृतिचिह्न हमें यशवंत व्यास के लेखन में नज़र आ गए, बल्कि इसलिए क्योंकि आख्यायिका शैली से ऊपर उठते हुए, सपाटबयानी को बरतरफ़ करते हुए ये कृतियाँ अपने अपने समय में नई ज़मीन तोड़ने के लिए चर्चित हुईं । इसी तरह कथ्य के नएपन, भाषायी तेवर और अनूठे रचना विधान के लिए ‘ख़्वाब के दो दिन’ ( चिन्ताघर, कामरेड गोडसे समाहित) हिन्दी कथा साहित्य में महत्वपूर्ण दखल है । पत्रकारिता की उथली सतह पर चहल-क़दमी कर जिन लोगों ने मंच पर वाहवाहियाँ लूटीं, जिनसे पत्रकारिता के नए नए धनुर्धारी प्रेरित होते रहे और उनका अनुकरण कर गौरवान्वित होते रहे, ऐसे द्रोणाचार्यों और उनके एकलव्यों को भी एक बार सही, ‘ख़्वाब के दो दिन’ पढ़ने की ईमानदार कोशिश करनी चाहिए ।  
ब्दो का सफ़र के वे साथी जो विचारोत्तेजक लेखन पसंद करते हैं, उन्हें यही सलाह है कि किताब ज़रूर पढ़ें ।

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Tuesday, March 22, 2011

कृति सम्मान की कुछ छवियाँ, कुछ बातें

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न दिनों शब्दों का सफ़र लगभग अनियमित है क्योंकि मैं सचमुच दूरियाँ नाप रहा हूँ। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के बीच। छह माह से यह क्रम जारी है। पहले सफ़र के पुस्तकाकार आने की तैयारी की व्यस्तता और अब दफ्तरी व्यवस्तता। छह साल के सतत सफ़र का प्रकाशित रूप सामने आया। किताब का विमोचन भोपाल में हुआ। सबने इसे सराहा। इस बीच पुस्तक के अगले खण्ड की पाण्डुलिपि के लिए राजकमल प्रकाशन का प्रतिष्ठित कृति सम्मान भी बीती अट्ठाईस फरवरी को मिला। कई साथियों को शिकायत थी कि इस आयोजन की विस्तार से ब्लॉगजगत में चर्चा नहीं हुई। अब इसके पीछे भी मेरी व्यस्तता ही वजह बनी। हालांकि कुछ अखबारों में इसके समाचार छपे। पुरस्कार के चयनकर्ताओं में ख्यात आलोचक नामवरसिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी और प्रसिद्ध कोशकार अरविन्द कुमार थे। नामवरसिंह का वक्तव्य तो जानकी पुल ब्लॉग पर एक अलग संदर्भ में प्रकाशित हो चुका है। बाकी दोनों महानुभावों के वक्तव्य हमें कल ही प्राप्त हुए हैं जिन्हें सफ़र के साथियों से यहाँ साझा कर रहा हूँ। नुक्कड़ पर श्री अविनाश वाचस्पति ने समारोह की चित्रमय झाँकी पहले ही दिखा दी है। उससे भी पहले महाखबर के जरिए इस सम्मान पर ही प्रश्न भी खड़े हो चुके थे। यहाँ पेश हैं चंद और छवियाँ-

 

002कमलकान्त बुधकर, हरिकृष्ण देवसरे, विभा देवसरे के साथ 020पल्लव बुधकर तस्वीर लेते हुए
028लेले साहब, अशोक वाजपेयी और कमलकान्त बुधकर 033ख्यात आलोचक विश्वनाथ मिश्र के साथ
037पंकज बिष्ट और राजेन्द्र यादव 056अशोक माहेश्वरी और नामवरसिंह के साथ
005कृति-पाण्डुलिपि  के साथ 014पल्लव बुधकर के साथ
151समारोह से पहले-त्रिवेणी सभागार, दिल्ली 046मंच पर....
060अपनी बात 040नामवरसिंह, अविनाश वाचस्पति और राजेन्द्र यादव
156समारोह से पहले गपशप 170अनामिका, कमलकान्त बुधकर, अनिता ताटके व विश्वनाथ त्रिपाठी
177विश्वनाथ त्रिपाठी, वसंत बुधकर व कमलकान्त बुधकर 164रवीन्द्र शाह, नीलाभ मिश्र, मैत्रेयी पुष्पा व अन्य
उपन्यास का आनंद है सफ़र में
मैं श्री अजित वडनेरकर की पुस्तक शब्दों का सफर हाथ में आते ही उसे रुचिपूर्वक पढ़ गया। पुस्तक यद्यपि भाषा शास्त्र से सम्बन्धित है लेकिन पढ़ने में उपन्यास का आनन्द देती है। कहते हैं कि सच्चा ज्ञान आनन्द के द्वारा प्राप्त होता है। इस पुस्तक के पाठक भी मनोरंजन और कथा रस के आस्वाद की प्रक्रिया से ज्ञान-लाभ करेंगे। ऐसी पठनीय पुस्तकें आए दिन पढ़ने को नहीं मिलती जिसमें इतने सहज और अनायास पाठकों को जानकारी काखजाना मिले और यह समझने का मौका मिले कि भाषा में देश जाति धर्म आदि का बन्धन नहीं रहता। और वे मुक्त भाव से परस्पर आदान-प्रदान करते हुए विकसित और समृद्ध होती हैं। हमारी भाषा हिन्दी भी इसी प्रक्रिया से फलती-फूलती हुई हमें प्राप्त हुई हैं। शब्दों का सफर निःसन्देह एक उल्लेखनीय प्रकाशित पुस्तक है जो पाठकों को पसन्द आएगी।
-विश्वनाथ त्रिपाठी
अपने से लगते हैं वडनेरकर
ब से पहले राजकमल पुरस्कार पाने पर भाई अजित वडनेरकर को बधाई। मैंने अजित को कभी देखा नहीं है, लेकिन वह बहुत जाने-पहचाने से, अपने से लगते हैं। कारण हिन्दी विमर्श पर उनका शब्दों कासफर मैं नियमित पढ़ता रहा हूं। उनकी हर मेल अपने कम्प्यूटर पर सेव कर के संजो कर रखता रहा हूं। नम्बर दो पर - राजकमल प्रकाशन के अशोकजी को बधाई कि उन्हें अजित की किताब छापने को मिली। साथ ही धन्यवाद भी कि उन्होंने यह किताब छापी। छापी में कोई अनोखपन नहीं है। अब तक जितना मैंने उन्हें जाना है। उनकी नज़र बढ़ी पारखी है। वह देखते ही ताड़ लेते हैं कि असली माल कहां है। उनके पास शब्दों कासफर कैसे पहुंची यह मैं तो नहीं जानता, लेकिन उसमें भरे असली माल को पहचानने में देर नहीं लगी।
प्रसंगवश एक और उदाहरण। 1990 के आसपास हंस पत्रिकामें शब्दों पर मेरी लेखमाला छप रही थी। एक सुबह एक अनजान नौजवान मेरे घर आ पहुंचा, मेरी आने वाली किताब को छापने काप्रस्ताव लिए। तब उसके पास लगभग कुछ नहीं था। बस भविष्य था। वह था। अशोक माहेश्वरी। मैंने उससे वादा किया कि पूरा होने पर मेरा कोश उसे मिलेगा। ऐसा नहीं हुआ इसके कारण विचित्र थे। यह सबूत है कि अशोक दूर तक देख पाते हैं।
कुछ ऐसा ही गुण अजित वडनेरकर में भी है। वह दूर तक देख पाते हैं। न केवल भविष्य में बल्कि भूत में भी। एक संस्कृति से दूसरी तक शब्दों का सफर में। पता नहीं कैसे वह इतनी गहराई से देख पाते हैं। फिर इस सफर काबयान हाल बेहद आसान भाषा में रोचक तरीके से, कमाल है। आप लोग कई जाने-माने विदेशी कोश देखिए। कई में शब्दों के बारे में अलग से बॉक्स बना होता है। अजित उन से आगे, बहुत आगे जाते हैं। व्युत्पति बताते हैं, कई देशों, समाजों में कोई शब्द कैसे पहुंचा, बदला, रंगा, संवरा सब दिखाते हैं। कुल तीन-चार हद से हद पांच-छह पैरों में। पाठक के ऊबने से पहले विदा हो जाते हैं। जाते-जाते शब्दों में पैठने की हमारी रुचि, हमारी तमन्ना जगा जाते हैं।
उन के शब्दों के सफर केतीन खण्ड तैयार हैं। ऐसा मुझे बताया गया है। पर मैं कल्पना कर सकता हूं की उनके पास अभी और तीस खण्डों का मसाला तैयार होने को होगा। मैं उन सब लोगों को, जिन्हें हिन्दी डूबती नज़र आती है और आप सबको आश्वस्त करना चाहता हूं, भरोसा दिलाना चाहता हूं कि मेरा दावा 125 प्रतिशत सही निकलेगा कि 2050 तक हिन्दी संसार कीसमृद्धतम भाषा में होगी। आंखें खोलकर देखिए, हिन्दी पढ़ने वाले बढ़ रहे हैं, हिन्दी वालों के पास पैसा बढ़ रहा है। हाल ही में मुझे पता चला कि अकेले एक प्रमुख हिन्दी दैनिक के पास देशभर में फैला पांच हजार कम्प्यूटर से जुड़ा पत्रकारों कामहाजाल है। आज कम से कम 50 हजार हिन्दी पत्रकार तो हैं ही, पांच लाख भी हो सकते हैं। और लेखक गांव-गांव में, अनजाने अनचीन्हे लोग हिन्दी लिखने में लगे हैं। अन्त में बस इतना ही... हिन्दी रुकेगी नहीं, बढ़ती रहेगी। अजित वडनेरकर और उन की यह किताब इस बात काएक और सबूत है। दूसरा सबूत है राजकमल कीयह पुरस्कार योजना। मुझे भरोसा है, और आप को भी यह भरोसा दिलाता हूं कि धीरे-धीरे अशोक माहेश्वरी इस पुरस्कार को हिन्दी कानहीं भारत का सबसे बड़ा अवॉर्ड बनाकर रहेंगे। हिन्दी के और भारत के बढ़ते रहने का यह दूसरा सबूत होगा।
-अरविन्द कुमार, 26 फरवरी, 2011

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Sunday, January 30, 2011

आधी रात का सच...गैस त्रासदी का दस्तावेज़

logo_thumb202_thumb6_thumb3रविवारी पुस्तक चर्चा में इस बार शामिल किया है वरिष्ठ पत्रकार विजयमनोहर तिवारी की हाल में प्रकाशित पुस्तक-भोपाल गैस त्रासदी-आधी रात का सच को। हिन्दी में इस विषय पर लिखी गई अपने ढंग कीVMT_ यह अनूठी पुस्तक है।  इसके पैपरबैक, पॉकेटबुक साईज के संस्करण का मूल्य 195 रु है और पृष्ठ संख्या 300 है ।
भो पाल गैस त्रासदी पर यूँ तो बीते पच्चीस बरसों में हज़ारों दस्तावेज़gas विभिन्न संगठनों ने जुटाए और उन्हें न्यायालय ने देखा-परखा। बहुत सामान्य सी, नितांत भारतीय परम्परा के तहत इस मामले में दर्ज़ आपराधिक मुकदमे का फैसला दुर्घटना या हादसे के ठीक पच्चीस साल छह महिने बाद आया। आधी रात का सच एक ऐसी क़िताब है जो हिन्दी में शायद अपनी क़िस्म का अनूठा और पहला दस्तावेज़ है जो भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े तमाम पहलुओं पर बेबाकी से नज़र डालता सा लगता है। त्रासदी के जिम्मेदार लोगों और सरकार के बीच के आपराधिक-षड्यंत्रों, प्रशासन और पुलिस की शर्मनाक लापरवाहियों, पीड़ितों को न्याय दिलाने के नाम पर सामाजिक संगठनों की बेशर्म खींचतान के बीच मीडिया के सकारात्मक रोल की पड़ताल है यह क़िताब, जिसका महत्व इस त्रासदी पर अब तक लिखी गई तमाम पुस्तकों से किसी मायने में कम इसलिए नहीं है, क्योंकि यही इसके लिखे जाने का सही वक़्त था। यह अलग बात है कि त्रासदी के वक़्त भोपाल में मौजूद तमाम जाने-माने पत्रकारों-सम्पादकों नें टीवी चैनलों, विदेशी अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं को आधिकारिक रूप से इस त्रासदी के विभिन्व पहलुओं के बारे में बताया। कभी साक्षात्कारों के जरिए तो कभी खुद की कलम से, मगर सिलसिलेवार कथानक वाली कोई पुस्तक हिन्दी के पत्रकारों ने नहीं लिखी। जो अगर लिखी जाती तो आधी रात का सच जैसी क़िताब अपने मुकाम पर बहुत पहले पहुँच चुकी होती।
फ़ैसला आने के दो हफ़्तों का यह कवरेज इस हादसे से जुड़ी तमाम साजिशों और जानबूझकर की गई लापरवाहियों और अनदेखियों का एक सिलसिलेवार दस्तावेज़ है। यह दस्तावेज़ पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए एक ऐसी अभ्यास-पुस्तिका है जो उन्हें उस पत्रकारिता के माएने समझा पाने में कामयाब होगी, जिसे कई बाबूसिफ़त gasमानसिकता के नवागत पत्रकारों ने सिर्फ़ नौकरी का ज़रिया समझ लिया है। इस किताब में विजय बताते हैं कि सौद्देश्य पत्रकारिता से जुड़े संस्थान का न्यूज़ रूम विशिष्ट अवसरों पर किस तरह काम करता है। विजय की लेखकीय प्रतिभा ने यह साबित किया है कि वे एक सिद्धहस्त लेखक हैं और कवितेतर साहित्य की तमाम विधाओं पर उनकी प्रतिभा की सफल आजमाइश के अवसर निकट भविष्य में हमें मिलेंगे। लेखक के रूप में विजय के भीतर का सजग पत्रकार हमेशा हस्तक्षेप करता चलता है फिर चाहे वे साध्वी की सत्ता कथा जैसा उपन्यास लिख रहे हों या हरसूद के विस्थापितों की पीड़ा का लेखाजोखा पेश कर रहे हों।
ताज़ा किताब आधी रात का सच में भी विजय मूलतः एक पत्रकार के रूप में सामने आते हैं। विजय न तो गैस पीड़ित हैं और न ही गैस रिसाव और उसके बाद के दौर के वे कभी चश्मदीद रहे हैं। इसके बावजूद इस भीषणतम औद्योगिक त्रासदी की चौथाई सदी बीतने के बाद जब उन्हें इस त्रासदी के भुक्तभोगियों से रूबरू होने का मौका मिला, उनके भीतर का पत्रकार कसमसा उठा। भोपाल गैस त्रासदी पर यूँ तो कई किताबें बीते ढाई दशक में सामने आई हैं, पर यह विडम्बना ही है कि भोपाल के किसी हिन्दी पत्रकार ने इसे दस्तावेजी रूप देने की कोशिश नहीं की, मानवीय संवेदनाओं को उकेरते हुए किसी और फॉर्मेट में लिखने की तो बात ही अलग है। इसीलिए विजय ने गैस त्रासदी का विलम्बित फैसला आने पर दैनिक भास्कर के नेशनल न्यूज़ रूम की टीम का एक हिस्सा रहते हुए इस त्रासदी को जिस तरह समझा, उसे किताब की शक्ल में पेश किया है।
क रचनाधर्मी, चाहे वह किसी भी क्षेत्र या विधा से संबंधित हो, किसी घटना विशेष पर भावग्रहण के स्तर पर उसकी संवेदनाएं सामान्यजन से कहीं अधिक सघन और संप्रेषण के स्तर पर कहीं अधिक तरल होती हैं। संवेदनशील रचनाधर्मी के मनोमस्तिष्क में हमेशा एक टाईममशीन रहती है जिसके जरिए वह घटना से जुड़े पहलुओं को परखने के लिए कालातीत यात्रा करता है और फिर उसकी कलम इस निराली यायावरी को किसी भी रूप में अभिव्यक्त करती है। विजय ने भी पच्चीस सालों कें घटनाक्रम को टाइममशीन में बैठकर एकबारगी देखा, समझा और फिर एक पत्रकार की डायरी की शक्ल में बेबाकी से सबके सामने ला रखा है। किताब लिखते हुए जो अनुभूति विजय को हुई उसे विजय खुद बयान करते हैं-
"सत्ता के शिखरों पर चलनेवाली धोखेबाजी, सौदेबाजी, साजिशो और बईमानी की अंतहीन कहानी का यह एक नमूना भर है। इसमें एक हाईप्रोफाइल सनसनीखेज धारावाहिक का पूरा पक्का मसाल है। गैस त्रासदी आज़ाद भारत का अकेला ऐसा मामला है, जिसने लोकतंत्र के तीनो स्तंभों को सरे बाज़ार नंगा किया है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कई अहम ओहदेदार एक ही हमाम के निर्लज्ज नंगों की क़तार में खड़े साफ़ नज़र आए।"
gasविजय इस किताब को दो सप्ताह की डायरी कहते हैं। सच है। डायरी में सचाई पैबस्त होती है और इस किताब की हर इबारत सच्ची है। मगर फ़ारमेट के स्तर पर यह किताब डायरी से अलहदा एक ऐसी विधा है जिसका नामकरण करने के लिए समालोचकों को शायद माथापच्ची करनी पड़े, मगर रचनाकर्म से जुड़े लोगों के लिए अभिव्यक्ति का एक रास्ता और खुल गया है। तीनसौ पृष्ठ की इस किताब को प्रकाशित किया है भोपाल के ही बेन्तेन बुक्स ने जो प्रकाशन की दुनिया में एकदम नया नाम है। बेन्तेन के प्रवर्तक, अंतर्राष्ट्रीय स्तर की साज-सज्जा और सुरुचि के साथ पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में उतरे हैं। इनके पास अत्याधुनिक मुद्रण तकनीक, उच्चस्तरीय डिज़ाइनिंग भी है और ये जानी-मानी पुस्तक वितरण व्यवस्था से जुड़े हैं। संस्थान से भविष्य में इसी तरह के सुरुचिपूर्ण प्रकाशनों की उम्मीद की जानी चाहिए।
विशेष-रविवारी पुस्तक चर्चा स्तम्भ आज से बंद किया जा रहा है। अन्यान्य व्यस्तताओं के चलते हम इसे नियमित नहीं रख पा रहे है। उधर नई पुस्तकों से गुज़रना लगातार जारी है पर उनकी समीक्षा लिखने का वक़्त निकालना दुश्वार हो रहा है। जल्द ही इसकी जगह सिर्फ़ पुस्तक चर्चा स्तम्भ फिर शुरु होगा जिसमें एकाधिक पुस्तकों के बारे में बात होगी।
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Saturday, January 1, 2011

छह साल से लिया है शब्दों से पंगा

baljeet-basi_thumb6_thumb... सफ़र के पाठक बलजीत बासी को सिर्फ़ एक साथी के तौर पर जानते हैं। बासी जी मूलतः पंजाबी के कोशकार हैं। पंजाब विश्वविद्यालय के अंतर्गत पंजाबी-अंग्रेजी कोश की एक बड़ी परियोजना से दो दशकों तक जुड़े रहे। ज़ाहिर है शब्द व्युत्पत्ति में उनकी गहन रुचि है।बाद में वह प्रोजेक्ट पूरा हो जाने पर वे अमेरिका के मिशिगन स्टेट में जा बसे। अब कभी कभार ही इधर आना होता है। वहाँ भी वे अपना शौक बरक़रार रखे हैं। अमेरिका में खासी तादाद में पंजाबीभाषी बसे हैं और इसीलिए वहाँ कई अख़बार, मैग़ज़ीन आदि इस भाषा में निकलते हैं। इनमें से एक है शिकागो, न्यूयॉर्क और सैनफ्रान्सिस्को से प्रकाशित होने वाला साप्ताहिक पंजाब टाइम्स, जिसमें वे नियमित स्तम्भ लिखते हैं। बासी जी ने इसके ताज़ा अंक में सफ़र के पुस्तकाकार आने के संदर्भ में एक परिचयात्मक आलेख लिखा है जिसका गुरुमुखी से देवनागरी में किया मशीनी अनुवाद खुद उन्होंने हमें भेजा है। उन्होंने ताक़ीद किया है कि इसमें से हम जो चाहें काट सकते हैं, सिवाय उन अल्फ़ाज़ के जो उन्होंने हमारी तारीफ़ में कहे हैं। हम पूरा आलेख दो किस्तों में छाप रहे हैं। आप समझ ही गए होंगे क्यों। अब सेल्फ प्रमोशन और मार्केटिंग का ज़माना है, सो हम भी पूरी बेशर्मी से अपने ही ब्लॉग पर मियाँ मिट्ठू बनने की हिमाक़त दिखा रहे हैं। पिछली कड़ी आपने पढ़ी-अमेरिकी पंजाबी पत्रिका में शब्दों का सफ़र अब अगली कड़ी पेशे ख़िदमत है।

शब्दों का मुसाफ़िर-2/बलजीत बासी
जीव-विकास सिद्धांत के अनुसार आदिकाल में सारी मानवजाति की एक ही भाषा होनी चाहिए। निरुक्त विषय ही ऐसा है, इसका साधक एक समय-स्थान पर स्थिर हो गया, समझो गया। वडनेरकर जाति का ब्राह्मण है और उसका मानना है कि ब्राह्मणों का असली काम ज्ञान ढूँढना और आम लोगों में बाँटना है। वह रात एक बजे ड्यूटी से फ़ारिग होते सीधे घर पहुंचता है जहाँ मेज़ पर खुले दो दरजन कोश और ढेर सारी और पुस्तकें उसका इन्तज़ार रही होती हैं। वह पाँच बजे तक लिखता है और फिर सफ़र की ताज़ा कड़ी ब्लॉग के हवाले करता है। फिर दस-ग्यारह बजे उठकर पोस्टिंग की कमियाँ दूर करता है। बस, इस के बाद घंटा डेढ़ घंटा और सो कर परिवार के साथ खाना खाता और फिर दफ़्तर दौड़ जाता है। टुकड़ों में बँटी नींद कभी पूरी नहीं होती। 'शहर सूता, ब्रह्म जागे' वाली नाथों-जोगियों वाली कहावत उस पर लागू होती है।
डनेरकर ने शब्दों का यह पंगा कोई छह साल से लिया हुआ है जब से दैनिक भास्कर में उस का यह कालम लगातार छप रहा है। उस का कहना है-
" शौक तो पच्चीस साल पुराना है। अपने करम ही हमें मारते हैं, उन्हें ही भुगतना है। बस, गलत नहीं कर रहा, ये सुकून है। जो लिया-सीखा, उसे सबको लौटाना भी चाहिए, इसीलिए इतनी मेहनत। बदले माहौल में पहाड़ पर जाकर सन्यासी तो बन नहीं सकता। धन-सपत्ति है नहीं जो उसके जरिये लोगों का भला कर सकेूं। जन्म से ब्राह्मण, कर्म से ब्राह्मण....यही कर सकता हूँ"
ब्दों को ही परनाये इस शख्स ने दोस्तों-मित्रों को मिलने-जुलने और ज़िंदगी के ओर झमेलों से एक तरह सन्यास लिया हुआ है। उस के इस जुनून बारे में किसी ने कटाक्ष किया था कि 26 नवंबर, 2008 को बम्बई में दहशतगर्दों के हमले दौरान जब सभी भारत में हाहाकार मच मच गई थी तब भी उसने मेज़ से उठकर अपना चिट्ठा लिखना न छोड़ा। वह त्रिकाल और समूचे ब्रह्माण्ड के दर्शन शब्दों से ही कर लेता है। अपनी भाषा के प्रति इतनी लगन और प्रतिबद्धता कम ही देखने को मिलती है। शब्द-निरुक्ति का ऐसा शैदायी मुझे अपने पूर्व सहकर्मी जी.एस. रयाल में देखने को मिला था, जिसने इस काम में मेरी भी रुचि जगाई थी। रयाल साहब का अधिक ज्ञान कोशों तक ही सीमित थी जब कि वडनेरकर ने इसको मौलिक अध्ययन के साथ समृद्ध बनाया है। कई बार तो इस तरह लगता है कि एक ही शब्द को गहराई में समझने के लिए उसे कई किताबें और संदर्भ टटोलने पड़े होंगे।
पंजाब के शहर कसूर के नाम बारे प्रचलित धारणा है कि यह राम के बेटे कुछ से बना है। punjab timesपरन्तु वडनेरकर की दलील है कि इसका शुरू अरबी का धातू कस्र है, जिस का मतलब काटना, छिलना तराशना होता है, इसी से विकसित ढिंढोरे अर्थ खुंटे बनाने की तरफ चले गया है। यह बात मानने योग्यहै, कसूर में 12 बड़े गढ़ हैं जो यहाँ के शासकों ने अफगान हमलों से रोकनो के लिए बनाऐ। इतिहास में और भी कई कसूर आते हैं। सिक्खों को यह जानके अचंभा होगा कि जिस कारसेवा को वह अपने धर्म की विशेषता समझते हैं, वह करसेवा के रूप में महाराष्ट्र के मन्दिरों में पुराने समय से चल रही है। कारसेवा से भाव कारजसेवा या सरोवर में से कअर (अरबी शब्द, भाव कीचड़) निकालने की सेवा नहीं जैसा कि कोशकर्ता बताते हैं, बल्कि हाथों (कर = हाथ) की सेवा है। शब्दों के अतीत से यह बात भली भाँति दृढ़ हो जाती है कि शब्द सही मायनों में मानव जाति की एकता उजागर करते हैं। इन की पेशकदमी के आगे देश, धर्म, भाषा की हदे रुकावट नहीं। वडनेरकर के चिट्ठों में असंख्य मिसालें मौजूद हैं जो शब्दों की यायावरी सिफ़त और उनकी गहराई बताती हैं। मुझे यह लिखने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि मैं अपने लेखों में उस की लिखतें से भी सहायता लेता हूँ।
ह लेख लिखने का संयोग इस लिए बना क्योंकि पढ़ने वालों की सुविधा के लिए वडनेरकर ने बहुत से आलेखों को संकलित करके पुस्तक रूप में प्रकाशित कर दिया है। उस की यह प्राप्ति सिर्फ़ हिंदी के लिए ही लाभपरक नहीं बल्कि भारत की सभी हिंद-आर्यायी भाषायों के लिए है क्योंकि प्रत्येक की प्राथमिक शब्दावली एक है। वैसे भी उसके लेखों में जगह जगह पर कई ठुक्कदार, आम पंजाबी शब्दों की भी व्याख्या मिलती है। भारत में अंग्रेज़ विद्वान मोनियर विलियमज़ ने संस्कृत शब्दों का एक विस्तृत निरुक्त तैयार किया था परन्तु हमारे किसी देसी विद्वान ने इस तरफ़ ध्यान कम ही ध्यान दिया है। पंजाबी में तो बहुत ही मामूली काम हुआ है। वडनेरकर के इस ग्रंथ में कोई 1500 शब्दों की निरुक्ति उपलब्ध हैं। उस की योजना दस खण्डों में दस हज़ार शब्दों की व्युत्पत्ति और विवेचना की है जिस के लिए दो खंड अभी तैयार पड़े हैं। राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक की कीमत 600 रुपए होने के बावजूद विमोचन समारोह के दौरान रखी सभी किताबें हाथों-हाथ बिक गईं।

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Friday, December 31, 2010

अमेरिकी पंजाबी पत्रिका में शब्दों का सफ़र

baljeet-basi_thumb6... सफ़र के पाठक बलजीत बासी को सिर्फ़ एक साथी के तौर पर जानते हैं। बासी जी मूलतः पंजाबी के कोशकार हैं। पंजाब विश्वविद्यालय के अंतर्गत पंजाबी अंग्रेजी कोश की एक बड़ी परियोजना से दो दशकों तक जुड़े रहे। ज़ाहिर है शब्द व्युत्पत्ति में उनकी गहन रुचि है।बाद में वह प्रोजेक्ट पूरा हो जाने पर वे अमेरिका के मिशिगन स्टेट में जा बसे। अब कभी कभार ही इधर आना होता है। वहाँ भी वे अपना शौक बरक़रार रखे हैं। अमेरिका में खासी तादाद में पंजाबीभाषी बसे हैं और इसीलिए वहाँ कई अख़बार, मैग़ज़ीन आदि इस भाषा में निकलते हैं। इनमें से एक है शिकागो, न्यूयॉर्क और सैनफ्रान्सिस्को से प्रकाशित होने वाला साप्ताहिक पंजाब टाइम्स, जिसमें वे नियमित स्तम्भ लिखते हैं। बासी जी ने इसके ताज़ा अंक में सफ़र के पुस्तकाकार आने के संदर्भ में एक परिचयात्मक आलेख लिखा है जिसका गुरुमुखी से देवनागरी में किया मशीनी अनुवाद खुद उन्होंने हमें भेजा है। उन्होंने ताक़ीद किया है कि इसमें से हम जो चाहें काट सकते हैं, सिवाय उन अल्फ़ाज़ के जो उन्होंने हमारी तारीफ़ में कहे हैं। हम पूरा आलेख दो किस्तों में छाप रहे हैं। आप समझ ही गए होंगे क्यों। अब सेल्फ प्रमोशन और मार्केटिंग का ज़माना है, सो हम भी पूरी बेशर्मी से अपने ही ब्लॉग पर मियाँ मिट्ठू बनने की हिमाक़त दिखा रहे हैं।

शब्दों का मुसाफ़िर-1/-बलजीत बासी
ह बुनियादी तौर पर हिंदी का पत्रकार है। पिछले पच्चीस वर्षों से प्रिंट और टीवी के साथ जुड़ा हुआ है। जन्म से मराठीभाषी है, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रहता है, ननिहाल हरिद्वार में हैं। बचपन में कुछ अर्सा पंजाब के होशियारपुर जिले के टांडा कस्बे में रहकर यहाँ के राजमा और चना-सरसों के साग का स्वाद चख चुका है। हरिद्वार में उसके ननिहाल घर के पड़ोस में गुरुद्वारा होता था, जहाँ से बचपन में  गुरबानी के कीर्तन का रस उसके कानों में दिन रात घुलता  रहता थी। वह हिंदी अख़बार दैनिक  भास्कर के भोपाल एडीशन में न्यज़ एडिटर के तौर पर काम कर रहा है,  परन्तु शब्दों की तितलियाँ पकड़ना उसका चस्का है। शब्दों की निरुक्ति दर्शाता शब्दावली नाम का उसका चिट्ठा  ( हिंदी वाले ब्लाग को चिट्ठा कहते हैं ) लगभग हर रोज़ अपडेट होता है, जिसके पाठकों की संख्या एक हज़ार पार कर चुकी है। 15000 के आसपास हिंदी के ब्लॉगों में से पाठकों की तादाद के पक्ष से उसका नंबर दूसरे स्थान पर है। यह एक चमत्कार ही है कि निपट  शब्दों के आसपास घूमते एक ब्लॉग के इतने सारे रसिया हैं।
पंजाबी के किसी मासिक त्रैमासिक की इतनी संख्या नहीं है जितने पाठक रोज़ाना इस ब्लॉग पर आते हैं। इतना ही बस नहीं, कई बड़े हिन्दी अख़बार, ब्लॉग तथा वेबसाइटें उसके आलेखों को लगातार प्रकाशित करते रहते हैं। हर रोज़ बेसब्री के साथ सफ़र की नई पोस्ट का इंतजार करनेवाले उसके पाठकों में हिंदी के साहित्यकार, भाषाविज्ञानी, प्राध्यापक, कंप्यूटर विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी शामिल हैं। उसने अपने विशाल ज्ञान, तार्किक विवेचना और क़िस्सागो शैली के साथ पाठकों के पल्ले यह बात डाल दी है कि सामान्य शब्दों के आवरण नीचे हमारी संस्कृति, इतिहास और पुरातत्व आदि का कितना कुछ छिपा पड़ा है। इस प्रतिभाशाली शब्दार्थी का नाम है अजित वडनेरकर। क़रीब दो साल पहले मुझे किसी लेख के लिए साग-सब्जी के चित्र की ज़रूरत थी। चित्र ढूँढने के लिए मैं ने गुग्गल बाण छोड़ दिया और नतीजे में अजित वडनेरकर के ब्लॉग का हवाला मेरे सामने आ खड़ा हुआ। तब हिंदी मुझसे झोली झोली ही पढ़ी जाती थी परन्तु उसकी लेखनी इतनी रोचक, जानकारीपूर्ण और तार्किक थी कि मुझे पता ही न लगा, कब हिंदी मेरे लिए एकदम सरल-सहज हो गई।punjab-times8 और तो और, मैं ने उसकी पोस्टों पर टिप्पणियाँ देनीं शुरू कर दीं। अजित भाई ने गंभीरता के साथ मेरा नोटिस लेना शुरू कर दिया। कभी कभी हमारे में नोक-झोंक भी होने लगी। वह मेरे से नाराज़ हो जाता और झीकता - “ मैं हड़बडी में रहता हूँ, ध्यान के साथ नहीं पढ़ता” वगैरह वगैरह। उस की बात अक्सर ठीक होती परन्तु मैं ने भी शब्दों पर दो दशक से ज्यादा वक्त लगाया है। वह मेरी टिप्पणियों का विस्तृत जवाब देता -ईमेल के द्वारा, निजी तौर पर भी और ब्लाग के द्वारा भी। कोश महकमों के लंबे तजुर्बो ने मुझे सिखाया था कि शब्दों के अर्थ को बहुत सावधानी के साथ खोजना चाहिए। गाँव देहात की गलियों, बोलियों में टहलते डोलते शब्दों का बाहरी चोला चाहे देशी हो, उनकी आत्मा अंतरराष्ट्रीय होती है। इन के मर्म तक पहुँचने के लिए अंतरराष्ट्रीय दृष्टि अपेक्षित है। वडनेरकर कई बारी मेरी बात मानकर अपने लेख का संशोधन कर लेता। परन्तु मुझे भी बहुत बार उलाहने झेलने पड़े। आखिरकार हमारे तेज़-तुर्श और नोक-झोक वाले रिश्तों में मधुरता आ ही गई।
डनेरकर की शब्द निभाने की ख़ूबसूरती इस बात में है कि वह निरुक्ति सुलझाने के लिए शब्द के मूल में गहरा उतर जाता है। उस का शब्द-ज्ञान सीमित नहीं बल्कि विस्तृत अध्ययन से उपजा है जिस में वेद, शास्त्र, पुराण और विश्व भर का किताबी घसमाण शामिल है। बहुत से भाषाविज्ञानी विराट जीवन से निखुट्टे शब्द जाल में ही घुसे रहते हैं, जिससे भाषा विज्ञान संबंधी लेखन खुश्क और नीरस जान पड़ता है। सुलझे हुए वडनेरकर की शैली बोझिल नहीं बल्कि सधी हुई, प्रौढ़, दुनियादार और अक्सर उदात्त है, जिस में से एक निराली विधा उदयमान हो रही प्रतीत होती है। वह भारत की तकरीबन सभी, ख़ास तौर पर उत्तरी भाषाओ की निराली रूह का वाकिफ है। मेरे देखते-देखते ही वह कहीं का कहीं पहुँच गया है ; अब तो दुनिया भर की बोलियों को सहज भाव से ही अपने मूल सफ़र के कलेवर में ले लेता है। लगातार गतिशील शब्दों के सफ़र में अब वह ग़ैर-भारोपीय भाषाओं की भारोपीय भाषाओँ के साथ साझेदारी भी प्रमाणित करने लगा है।
 -जारी

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Sunday, December 26, 2010

सुयेनच्वांग की भारत-यात्रा

logo_thumb202_thumb6रविवारी पुस्तक चर्चा में इस बार शामिल किया है छठी सदी में चीन से भारत याए प्रसिदध बौद्ध श्रमण सुयेनच्वांग के यात्रावर्णन पर लिखी जगमोहन वर्मा की पुस्तक सुयेनच्वांग की भारतयात्रा को। इसे पिलग्रिम्स पब्लिशिंग हाऊस, बनारस ने प्रकाशित किया है। इसके पैपरबैक, पॉकेटबुक साईज के संस्करण का मूल्य 75 रु है और पृष्ठ संख्या 210 है । ...

वृ हत्तर भारत की सभ्यता संस्कृति का अपने पड़ोसी
abook 002दिल्ली के प्रगति मैदान में शनिवार से पुस्तक मेंला शुरू हो चुका है। सफ़र के जो पाठक इस मौके पर वहाँ जाने की सोच रहे हैं, वे कृपया राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर ज़रूर जाएं और शब्दों का सफ़र के प्रकाशित क़िताबी रूप को भी ज़रूर देखें। हो सके तो ख़रीदें भी।
देशों जैसे चीन, भूटान, नेपाल, मंगोलिया, अफ़गानिस्तान, ईरान के जन-जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है। इसके पीछे महान बौद्ध धर्म भी एक बड़ी वजह रहा। बौद्ध धर्म देखते ही देखते पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया था जिसकी वजह थी कुरीतियों और कर्मकांडों पर उसकी शिक्षाओं की चोट। संस्कृति के चार अध्याय में रामधारीसिंह दिनकर ने लिखा है कि बौद्ध धर्म कोई नया धर्म नहीं, बल्कि हिन्दुत्व का ही संशोधित रूप है। समाज में जो वर्ण ब्राह्मण से जितना दूर था, वह बौद्ध धर्म की ओर उतनी ही तेजी से खिंचा। बौद्ध धर्म की इसी सहजता से एक सामाजिक संकट भी उत्पन्न हुआ कि समाज के हर वर्ग से लोग घरबार छोड़कर सन्यासी बनने लगे। हालांकि संन्यास की व्यवस्था हिन्दू धर्म में प्राचीनकाल से ही रही किन्तु वह आश्रम व्यवस्था के तहत क्रमिक रूप से थी जबकि बुद्ध ने क्या बालक, क्या युवा और क्या वृद्ध, सभी को संन्यास लेने का मार्ग प्रशस्त किया। पूरा देश मठों और विहारों से भर गया था। यह प्रवृत्ति चीन जैसे देश में भी थी जहाँ बुद्ध से प्रभावित भिक्षुक ज्ञान पिपासा में भारत आने लगे। चीन से भारत आने वाला ऐसा ही एक भिक्षुक था सुयेनच्वांग।
चीन देश से बौद्ध श्रमणों के भारत आने की लम्बी परम्परा रही है जिनमें फाह्यान, सुंगयुंन, इत्सिंग तथा सुयेनच्वांग विशेष रूप से प्रसिद्ध चीनी यात्री हैं। इन सभी यात्रियों ने अपने देश लौटकर दीर्घ यात्रा वृत्तांत लिखे जो आज से सैकड़ों वर्ष पहले के भारत की सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक दशा बताते हैं। संन्यास परम्परा में देशाटन का महत्व है और प्रायः सभी यात्रियों ने देश के सुदूर अंचलों तक पदयात्रा की और विभिन्न प्रान्तों, वनस्पतियों, smita ajit 010जनपदों के जनजीवन और राजनीतिक परिस्थितियों का वर्णन किया है। सुयेनच्वांग आज से करीब डेढ़ हजार साल पहले यानी छठी सदी ईस्वी में भारत आया था। इन सभी में सुयेनच्वांग का विवरण सबसे विशद है जिसका नाम चीनी भाषा में सी-यू है यानी पश्चिम देशों की पुस्तक। इसके विभिन्न रूपान्तर अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुके हैं जगमोहन वर्मा ने आम हिन्दी पाठक को ध्यान में रखते हुए सुयेनच्वांग का यात्रा वृत्त लिखा है जिसे पिलग्रिम्स ने प्रकाशित किया है। पुस्तक में बौद्ध श्रमण के जीवन से मृत्यु तक का वृत्तांत समेटा गया है। सुयेनच्वांग के पितामह का नाम कोंग था और वे पांचवीं-छठी सदी के चीन में माने हुए विद्वान थे और तत्कालीन पेकिंग के विश्वविद्यालय के प्रधान आचार्य थे। तत्कालीन चीन में राजाज्ञा से सर्वसाधारण के बीच से सर्वश्रेष्ठ भिक्षुक का चयन होता था। सर्वप्रथम भिक्षुक बनने के ले लिए परीक्षा देनी होती थी फिर भिक्षुक के लिए चयन होता था उसके बाद राजकीय खर्च पर उनका भरण-पोषण होता था। इस परीक्षा में सुयेनच्वांग अल्पवय में ही चुन लिए गए थे।
युवावस्था में ही सुयेनच्वांग के मन में भारत यात्रा की इच्छा जागी। राजाज्ञा न मिलने के बावजूद वे छुपते हुए भारत के लिए रवाना हो गए। जगमोहन वर्मा ने उनकी यात्रा के अधिकांश विवरणों को कुशलता से एक सूत्र में पिरोया है। उन्होंने अफ़गानिस्तान के रास्ते भारत में प्रवेश किया फिर कश्मीर, पंजाब, सिंध आज का हरियाणा, कन्नौज, प्रयाग, अयोध्या और काशी होते हुए वे पाटलिपुत्र पहुंचे जहाँ बोधगया और नालंदा में उन्होने दर्शन का गहन अध्ययन किया। देशाटन के दौरान सुयेनच्वांग महाराष्ट्र और द्विड़ क्षेत्रों की यात्रा पर भी निकले। इसी क्रम में वे गुजरात, मालवा और नर्मदातटीय क्षेत्रों में भी खूर रहे। यह दौर हर्षवर्धन का था। चीन लौटकर उन्होंने प्राप्त ज्ञान के आधार पर वहाँ प्रचलित बौद्धधर्म की मान्यताओं और परम्पराओं का परिष्कार किया। वे अपने साथ सैकड़ों महत्वपूर्ण ग्रन्थ ले गए थे। प्राचीन यात्रावृत्तों में दिलचस्पी रखनेवालों के लिए यह एक उपयोगी पुस्तक है।

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Saturday, December 18, 2010

“सफ़र” का विमोचन...खरीदें और पढ़ें

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ख़िरकार किताब आ ही गई। शब्दों का सफ़र नाम के ब्लॉग का परिष्कृत रूपान्तर पुस्तक की शक्ल में आए यह साध सफ़र के सभी साथियों समेत हमारे मन में भी अर्से से थी।

book realese 006इस तरह बना है कवर…कारवाँ बने हैं शब्दों के सफ़र का जरिया  book realese 012लेखक से परिचय करवाया डॉ सविता भार्गव ने book realese 025और लीजिए पुस्तक विमोचन हो गया...book realese 031...अब बारी है मंजूर साहब की...क्या बोले? book realese 070 अपन भी बोल लेते हैं...book realese 074 श्रोता झेल रहे हैं...book realese 106 जैसे ही बात समझ में आई...book realese 093...और श्रीमती जी ने सिर पकड़ लिया...कहाँ फँस गए...book realese 099श्रोताओं मे संवाद जारी रखा...book realese 110अंत में मामा कमलकांत बुधकर ने खाकसार की पोल खोली...चलिए, जो हुआ, अच्छा हुआ...

शुक्रवार शाम भोपाल के हिन्दी भवन में चल रही राजकमल प्रकाशन की पुस्तक प्रदर्शनी में ही शब्दों का सफ़र का विमोचन हिन्दी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मंज़ूर एहतेशाम ने किया। इस मौके पर ख्यात नाटककार अलखनंदन, कवि-कहानीकार गीत चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार-लेखक विजय मनोहर तिवारी, ख्यात ब्लॉगर-लेखिका मनीषा पाण्डे, ख्यात शिल्पी देवीलाल पाटीदार, कवयित्री डॉ सविता भार्गव और हरिद्वार से पधारे विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार-प्राध्यापक डॉ कमलकांत बुधकर भी मौजूद थे। डॉ सविता ने कार्यक्रम का संचालन किया। अध्यक्षता की अलखनंदन ने। करीब डेढ़ घंटे चले इस कार्यक्रम में सबसे पहले मंजूर एहतेशाम के हाथों पुस्तक की प्रतियों का विमोचन हुआ। इसके बाद लेखक से आमंत्रितों को मिलाने और पुस्तक का संक्षिप्त परिचय देने की जिम्मेदारी डॉ सविता ने निभाई। ख़ाकसार ने शब्दों का सफ़र से जुड़ी याद आने लायक और क़ाबिले ज़िक्र बातें श्रोताओं से साझा की। फिर संत शृंखला पर लिखे एक आलेख का पाठ किया गया। पाठ-सत्र के बाद श्रोताओं और लेखक के बीच सीधा संवाद हुआ। श्रोताओं में ज्यादातर शब्दों का सफ़र के किसी न किसी रूप में पाठक ही थी। चाहे वे दैनिक भास्कर के नियमित स्तम्भ के पाठक थे या चर्चित ब्लॉग शब्दों का सफ़र के। पेश है दिवाकर पाण्डेय की रिपोर्ट
यायावर हैं शब्द, माँ जाई बहने हैं भाषाएं
हिन्दी भवन में पुस्तक मेले केदौरान लेखक से मिलिए कार्यक्रम आयोजित
भाषाओें का रिश्ता बहनों जैसा है और शब्द यायावर होते हैं। भाषा में शब्दकोष तो हैं पर उनकी व्युत्पति का कई कोश मुझे नहीं दिखाई दिया। इसी ने मुझे एक ऐसा कोश तैयार करने के लिए प्रेरित किया। यह बात लेखक-पत्रकार अजित वडनेरकर ने अपनी किताब शब्दों के सफर के लोकार्पण के दौरान कही।  शुक्रवार को हिन्दी भवन में राजकमल प्रकाशन की ओर से आयोजित पुस्तक मेले में लेखक से मिलिए कार्यक्रम के दौरान लोकार्पण किया गया। पुस्तक में शब्दों की रिश्तेदारी, उनका जन्म और वर्तमान स्वरूप के लंबे इतिहास की तर्कसंगत तरीके से पड़ताल की गई है। श्री वडनेरकर ने पुस्तक से संत शृंखला में लिखे आलेख कलंदर का पाठ भी किया। उन्होंने बताया कि इस पहले खण्ड में 10 पर्व और करीब 1500 शब्द शामिल हैं। उनकी योजना बोलचाल की भाषा क दस हजार शब्दों की व्युत्पत्ति और विवेचना कोश बनाना है। इस पुस्तक का दूसरा और तीसरा खण्ड भी लगभग तैयार हैं। लोकापर्ण करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार मंजूर एहतेशाम ने कहा कि इस पुस्तक में जिस तरह सभी भाषाओं को एक दूसरे के करीब बताया गया है, यह बहुत दिलचस्प है। हिन्दी-उर्दू को मिलाने का भी यह एक सकारात्मक प्रयास है। अध्यक्षीय भाषण में वरिष्ठ रंगकर्मी-नाटककार अलखनन्दन ने कहा कि जुदा करने वाली किताबें बहुत हैं और जोड़ने वाली कम। जो लोग साहित्य में शब्द की स्वतन्त्र सत्ता में विश्वास करते हैं वे इससे जान सकेंगे कि शब्दों के इतिहास के कितने आयाम हैं। उन्होंने पुस्तक में शब्दों के जन्मसूत्र और उनकी विवेचना शैली से प्रभावित होते हुए कहा कि इसके जरिए शब्दों के अलग अलग क़िरदार सामने आ रहे हैं, वे इसमें नाट्यतत्व की तलाश कर रहे हैं। संचालन कर रहीं कवयित्री सविता भार्गव ने पुस्तक के विभिन्न अंशों का उल्लेख करते हुए उनके रोचक इतिहास पर प्रकाश डाला। इस दौरान गीत चतुर्वेदी, विजय मनोहर तिवारी, मनीषा पाण्डेय, रवि रतलामी सहित कई साहित्य रसिक लोग उपस्थित थे। प्रकाशन के जनसम्पर्क अधिकारी रमण भारती ने बताया पुस्तक मेले में शनिवार क शाम 4 बजे मनोज सिंह के उपन्यास हॉस्टल के पन्नों सें पर गोष्ठी आयोजित की जा रही है।

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