Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

Tuesday, January 15, 2013

चर्चा कैसी कैसी !!

talk

हि न्दी से प्यार करने वालों का उसके साथ बर्ताव और व्यवहार भी अनोखा होता है । मिसाल के तौर पर चर्चा की बात करें । उर्दू-हिन्दी में बातचीत, कथन, उल्लेख, ज़िक़्र के संदर्भ में चर्चा शब्द का प्रयोग होता है । यह बहुत प्रचलित शब्द है । अक्सर यह बहस भी चलती रहती है कि चर्चा स्रीवाची है या पुरुषवाची । “चर्चा चलती है” या “चर्चा चलता है” । “चर्चा रही” या “चर्चा रहा” । कुछ लोग कह देते हैं कि कथन, ज़िक़्र या उल्लेख की तरह चर्चा के प्रयोग में पुलिंग लगना चाहिए जबकि कुछ लोग इसे स्त्रीवाची कहते हैं और इस तरह चर्चा पर चर्चा चलती ही रहती है । जो हिन्दीप्रेमी नुक़्ते से परहेज़ करते हैं उनका कहना है कि चर्चा के साथ उर्दू वाला पुल्लिंग लगाया जाए । इसके बरख़िलाफ़ जिन हिन्दीप्रेमियों को मुसलमानी बिन्दी से लगाव है वो चाहते हैं कि चर्चा को उर्दू का न माना जाए और इसके साथ स्त्रीलिंग का प्रयोग किया जाए । उर्दू में चर्चा से चर्चे बना लिया गया है जो बहुवचन है ।
बसे पहले तो एक बात साफ़ कर दें कि चर्चा हिन्दी की अपनी ज़मीन पर तैयार हुआ शब्द है और स्त्रीवाची है । यह मूलतः तत्सम शब्द है । इसमें और संस्कृत के चर्चा शब्द में अगर कोई मूलभूत फ़र्क़ है तो सिर्फ़ यही कि संस्कृत-वैदिक शब्दावली का चर्चा पुरुषवाची है और हिन्दी का चर्चा स्त्रीवाची । संस्कृत का चर्चा लोकभाषा में स्रीवाची चरचा था और हिन्दी की ज़मीन पर भी इसी रूप में सामने आया । आज से क़रीब छह सौ सात सौ साल पहले हिन्दी की विभिन्न शैलियों में चर्चा के चरचा रूप का स्त्रीवाची प्रयोग के लिखित साक्ष्य बड़े पैमाने पर उपलब्ध हैं । ज़ाहिर है बोलचाल में इसकी रचबस कई सदी पहले हो चुकी होगी । कबीर अपनी सधुक्कड़ी में कहते हैं - “संगत ही जरि जाव न चरचा नाम की । दुलह बिना बरात कहो किस काम की।।” वहीं विनयपत्रिका में तुलसी की अवधी में भी चरचा है- “जपहि नाम रघुनाथ को चरचा दूसरी न चालु।” तो उधर राजस्थानी में मीराँ के यहाँ भी चरचा है - “राम नाम रस पीजै मनुआँ, राम नाम रस पीजै । तज कुसंग सतसंग बैठ णित, हिर चरचा सुण लीजै ।।
र्चा शब्द में विभिन्न आशय शामिल हैं मगर आमतौर पर इसका अर्थ बहस या विचार-विमर्श ही है । चर्चा में मूलतः दोहराव का भाव है । तमाम कोश चर्चा के अनेक अर्थ बताते हैं मगर रॉल्फ़ लिली टर्नर कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ़ इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़ में चर्चा प्रविष्टि के आगे सिर्फ़ रिपीटीशन यानी दोहराव लिखते हैं । ज़ाहिर है, बाकी आशय बाद में विकसित हुए हैं विलियम व्हिटनी पाणिनी धातुपाठ की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि चर्च् धातु दरअसल चर् धातु में निहित भाव की पुनरावृत्ति दिखाने वाला रूप है । चर् का मूल भाव गति है (करना, अनुष्ठान, व्यवहार, आचरण, अभ्यास आदि । इससे ही चलने की क्रिया वाला चर बना है) । चर्चर (चर-चर) में दोहराव है । बहरहाल, चर्चा के मूल में चर्च् धातु है जिसका मूलार्थ है दोहराव । आप्टे कोश के मुताबिक इसमें पढ़ना, अनुशीलन करना, अध्ययन करना, विचार-विमर्श करना जैसे भाव हैं । इसी के साथ इसमें गाली देना, धिक्कारना, निन्दा करना, बुरा-भला कहना जैसे आशय भी हैं । इससे बने चर्चा में आवृत्ति, तर्क-वितर्क, स्वरपाठ, अध्ययन, सम्भाषण, वाद-विवाद, अनुशीलन, परिशीलन, अनुसंधान के साथ-साथ शरीर पर उबटन लगाना, मालिश करना, लेपन करना जैसे भाव भी हैं ।
र्च् में निहित दोहराव वाले भाव पर गौर करें तो चर्चा के अन्य आशय भी स्पष्ट हो जाते हैं । बार-बार या दोहराव वाली बात विमर्श के दौरान भी उभरती है और विचार मन्थन में भी । अनुसंधान या खोज के दौरान भी बार बार उन्हीं रास्तों, विधियों, प्रविधियों से गुज़रना होता है । बहस-मुबाहसों में एक ही बिन्दू पर लौटना होता है या किसी एक मुद्दे का बार बार उल्लेख होता है । चर्चा में अफ़वाह, गपशप, चुग़लख़ोरी जैसी बातें भी शामिल हैं । अफ़वाह में आवर्तन की वृत्ति होती है । किसी भी क़िस्म की गप्प, गॉसिप या अफ़वाह जैसी बातें लौट-लौट कर आती हैं । सो बारम्बारता चर्चा का ख़ास गुणधर्म है । यही बारम्बारता मालिश, मसाज़ या लेपन में भी है । मालिश या लेपन करना यानी बार-बार किसी एक सतह पर दूसरी सतह फेरना सो चर्चित का आशय लेपित से भी है । बृहत हिन्दी शब्दकोश में इसका उदाहरण दिया है चन्दन-चर्चित काया । लेपन की क्रिया को चर्चन भी कहते हैं । चर् में निहित गति की पुनरावृत्ति ही ‘चर्चन’ है ।
र्च् से ही बना है चर्चित जिसका अर्थ है- ऐसा कुछ जिस पर लोग बातें करतें हैं । इसमें वस्तु, व्यक्ति, विचार कुछ भी हो सकता है । चर्चित यानी जिस पर चर्चाएँ चल रही हों । कोशों के मुताबिक चर्चित का अर्थ है जिस पर विचार किया गया हो, जिस पर चर्चा हुई हो, जिसे खोजा गया हो। इसके अलावा चर्चित वह भी है जिसकी मालिश हुई हो, जिस पर लेप किया हुआ हो, जो सुगंधित, सुवासित, अभ्यंजित हो । चर्चित के दोनों ही अर्थों में दोहराव की प्रक्रिया स्पष्ट है । आम अर्थों में चर्चित चेहरा वह होता है जो खबरों में हो । खबर को चर्चा का पर्याय मानें । बार बार कोई मुद्दा या व्यक्ति जब चर्चा में आता है तो वह चर्चित कहलाता है । चर्चा योग्य के लिए मुखसुख के आधार पर चर्चनीय शब्द भी बना लिया है । चर्चा करने वाले को वार्ताकार की तर्ज पर चर्चाकार कहते हैं । संस्कृत नाटकों की परम्परा में दो अंकों के बीच दृष्यविधान बदलते हुए दर्शकों के मनोरंजन के लिए गाया जानेवाला गीत चर्चरिका कहलाता था । फ़ाग, होली, बुआई, कटाई जैसे अवसरों पर भी चर्चरिका का चलन था । लोक भाषा में इसे चाँचर, चँचरी या चाँचरी कहते हैं । चाँचरी एक पहाड़ी लोकनृत्य की शैली भी है ।
र्चा प्रायः आर्यपरिवार की सभी भारतीय भाषाओं में है । लोगों की ज़बान पर जब किसी बात का उल्लेख आम हो जाए तो उसे मराठी में जनचर्चा या लोकचर्चा कहा जाता है । इसी तरह रामचर्चा पद है जिसका शाब्दिक अर्थ तो राम का नाम लेना है मगर इसमें मुहावरेदार अर्थवत्ता है । मोल्सवर्थ का इंग्लिश-मराठी कोश इसके बारे में कहता है - A phrase used emphatically or expletively in a speech expressing any positive and utter denial. 

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, May 28, 2012

कमाल तकियाकलाम का

speechपिछली कड़ी- तकिये की ताकत
ब आते हैं तकियाक़लाम पर । तकियाक़लाम एक ऐसा अनावश्यक शब्दयुग्म या पद होता है जिसे बोलने की आदत कई लोगों में होती है । इसका असर शुरुआत में नाटकीय किन्तु अक्सर चिढ़ पैदा करने वाला होता है, मगर बोलने वाले को इसका अहसास नहीं होता । मिसाल के तौर पर – “जो है सो”, “क्या बात है,” “माने की”, “आप जानो कि,” “क्या कहते हो, “आप तो जानते हो”, “नई यार”,“अब क्या बताएँ” आदि आदि । तकियाकलाम के आदी क़िरदार अक्सर समाज में मज़ाक का पात्र बनते हैं । अंग्रेजी में इसे कैचफ़्रेज़  catchphrase कहते हैं । तकियाक़लाम बना है फ़ारसी के तक्या और अरबी के क़लाम से मिल कर । इसका सही रूप भी तक्याकलाम ही होता है । तकियाकलाम के लिए उर्दू में सखुनतकिया शब्द भी है जो किसी ज़माने में हिन्दुस्तानी में भी प्रयुक्त होता था, अब कि हिन्दी में इसका चलन नहीं है । चाहे जो हो, ये “कलाम” का “तकिया” भी कमाल का होता है । देखते हैं इसकी जन्मपत्री ।

तकिया

किया की आमद हिन्दी में फ़ारसी से हुई है और इसका सही रूप है तक्या takya जो हिन्दी में दीर्घीकरण के चलते तकिया हो गया । तकिया शब्द हिन्दी में फ़ारसी से आया । तकिया शब्द में मुलायमियत, गद्देदार या नरमाई का लक्षण महत्वपूर्ण नहीं है । तकिया की रिश्तेदारी हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी, अरबी भाषाओं में मौजूद कई अन्य शब्दों से भी जुडती है जैसे ताक़ यानी आला, आलम्ब, म्याल अथवा मेहराब । शक्ति के अर्थ में ताक़त भी इसी कड़ी में है । मुतक्का यानी आलम्ब या सहारा भी इसी क़तार में खड़ा नज़र आता है । तकिया ( फ़ारसी तक्या ) के मूल में भी ताक शब्द ही नज़र आता है जिसमें मेहराब, म्याल, आलम्ब, आधार का भाव है जिस पर छत टिकती है । अरबी में यह ताक़ है और फ़ारसी से ही गया है । इस पर पिछले आलेख में विस्तार से चर्चा हो चुकी है । स्पष्ट है कि सिर के नीचे इस्तेमाल होने वाले जिस तकिया से हम सबसे ज्यादा परिचित हैं उसमें मूल भाव सिर को सहारा देने का है । प्रकारान्तर से इसमें आराम का भाव भी जुड़ जाता है ।
क़लाम
रबी का क़लाम शब्द भी हिन्दी में खूब बोला-समझा जाता है जिसमें मूलतः कही गई बात का आशय है जैसे वचन, कथन, उक्ति, वक्तव्य आदि । कलाम बना है सेमिटिक धात k-l-m से जिसमें कहने का भाव है । कलाम का अर्थ हिन्दी में आम तौर पर काव्यगत उक्ति या छंदबद्ध उक्ति से लगाया जाता है । किसी शायर की रचना से उठाई गई बात कलाम कही जाती है । जॉन प्लैट्स के कोश के मुताबिक कलाम में तर्क, बहस, दलील, विवेचना, विवाद जैसे भाव भी हैं,
मुम्बइया फिल्मों में तो हास्य पैदा करने के लिए ऐसे क़िरदार घड़े जाने की रिवायत आज तक चली आ रही है और साधारण सी फिल्में भी फूहड़ तकियाक़लाम बोलने वाले क़िरदारों की वजह से सुपरहिट हो गईं
इसका मूलार्थ है मुसलमान बनना । इस्लाम के प्रति धर्मनिष्ठ होना । इस्लाम की दीक्षा लेना । मगर हिन्दी में इसका प्रयोग किसी के प्रति खास अनुराग या निष्ठा दिखाने के आशय से भी होता है जैसे- “शर्माजी आजकल वर्माजी के नाम का कलमा पढ़ रहे हैं ।” मगर हिन्दी में इस आशय के प्रयोग कलाम के संदर्भ में कम देखने को मिलते हैं । कलाम की कतार में ही कलीम जिससे हिन्दी वाले व्यक्तिनाम के तौर पर परिचित हैं जैसे कलीमुल्ला, कलीमुद्दीनकलीम का अर्थ होता है कहने वाला, वक्ता । इसी तरह कलमा शब्द भी है जिसका आशय वचन, उक्ति से ही है मगर इसका रूढ़ अर्थ है । अरबी में कलमा नहीं बल्कि कलीमा है । कलीमा से आशय मुख्यतः इस्लाम धर्म के प्रसिद्ध बोधवाक्य “ ला इलाहा इलिल्लाह” जिसमें “ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, दूसरा कोई नहीं” जैसी बात कही गई है । हिन्दी में कलमा पढ़ना या कलमा पढ़ाना  प्रसिद्ध मुहावरे हैं भी है ।
तकियाकलाम
किया और कलाम दोनों पदों की अर्थवत्ता जानने के बाद तकियाकलाम पद का आशय साफ़ हो जाता है । ऐसा वाक्य या शब्द जिसका सहारा लिए बिना कोई (व्यक्ति) खुद को अभिव्यक्त ही न कर सके । यह शब्द या वाक्य निरर्थक होता है, मगर कहने वाला इसे बोलने का इतना आदी हो चुका होता है कि प्रत्येक संवाद के दौरान वह एक ख़ास क़लाम यानी शब्द या वाक्यांश का तकिया यानी सहारा लेता है । इसीलिए उस विशिष्ट शब्द या वाक्यांश को तकियाकलाम नाम मिल गया । मुम्बइया फिल्मों में तो हास्य पैदा करने के लिए ऐसे क़िरदार घड़े जाने की रिवायत आज तक चली आ रही है और साधारण सी फिल्में भी फूहड़ तकियाक़लाम बोलने वाले क़िरदारों की वजह से सुपरहिट हो गईं । -समाप्त
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें


अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, June 9, 2010

प्रस्ताव और स्तुति

किसी योजना की शुरुआत प्रस्ताव रखने से होती है अर्थात कार्ययोजना का परिचय, उसकी तारीफ ही प्रस्ताव है। यूं आप्टे कोश के मुताबिक प्रस्ताव का अर्थ है प्रवचन का प्रयोजन।
किसी योजना अथवा कार्यक्रम के परिचय के लिए हिन्दी में प्रस्तावना, भूमिका या आमुख जैसे शब्द प्रचलित हैं जिनमें प्रस्तावना का सर्वाधिक इस्तेमाल होता है। यह बना है। प्रस्तावना में शुरुआत या आरम्भ का भाव है। किसी भाषण, आलेख या अन्य दस्तावेजों के आरम्भिक अंश को भी प्रस्तावना कहते हैं। नाटक की प्रस्तावना आमतौर पर नट-नटी या सूत्रधार के द्वारा पेश की जाती है। प्रस्तावना के मूल में मूलतः प्रशंसा या तारीफ का भाव है। प्रस्तावना शब्द के मूल में है संस्कृत का स्तवः जिसका अर्थ है प्रशंसा करना, विख्यात करना, जानकारी देना आदि। स्तवः शब्द बना है स्तु धातु से जिसमें सराहना, तारीफ, प्रशंसा का भाव है। किसी की कीर्ति बखानना भी इसके अंतर्गत आता है। परिचित होना, जानकारी कराना भी इसके दायरे में आता है। याद रहे जब भी हम किसी व्यक्ति का परिचय कराते हैं या जानना चाहते हैं तो यही कहा जाता है-आपकी तारीफ! जाहिर है किसी समाज में किसी व्यक्ति का औपचारिक परिचय उस व्यक्ति के गुणों के जरिये ही होता है। दुर्गुण कभी किसी व्यक्ति का परिचय नहीं हो सकते। इसमें यह भाव भी निहित है कि हमें लोगों के सद्गुण ही देखने चाहिए, दुर्गुण नहीं। इसी तरह परिचय के दौरान नाम जानने के लिए भी शुभनाम शब्द का प्रयोग किया जाता है। नाम में छुपी अच्छाई से शुभता के साथ जानने का यह मंगलकारी भाव जाहिर करता है कि मनुष्य को जानने के लिए उसके उज्जवल पक्ष का सामने आना ही महत्वपूर्ण है। कलुषता तो छुपती नहीं है। दुर्गुण जल्दी ही सामने आ जाते हैं और बुराई सिर चढ़ कर बोलती है।
स्तु धातु से ही स्तुति शब्द बना है जिसका मूलार्थ प्रशंसा ही है। आत्मस्तुति यानी आत्म प्रशंसा। जो कुछ काबिले तारीफ है उसे हिन्दी में स्तुत्य कहते हैं। स्तुति का अर्थ ऐसी काव्यरचना भी है जिसमें किसी की प्रशंसा हो। स्तोत्रम् शब्द इसी कड़ी में आता है। यह संस्कृत का श्लोक होता है जिसे गाया जाता है। इसे स्तुतिगान भी कह सकते हैं। आजकल स्तुतिगान की अर्थवत्ता में  चमचागीरी का भाव भी शामिल हो गया है। हिन्दी में इसके लिए स्तोत्र शब्द प्रचलित है। स्तु में निहित प्रशंसा, जानकारी जैसे भावों पर गौर करें। स्तु से बने स्तवः में प्र उपसर्ग लगने बनते हैं प्रस्ताव और प्रस्तावना जैसे शब्द। किसी योजना की शुरुआत प्रस्ताव रखने से होती है अर्थात कार्ययोजना का परिचय, उसकी तारीफ ही प्रस्ताव है। यूं आप्टे कोश के मुताबिक प्रस्ताव का अर्थ है प्रवचन का प्रयोजन। जाहिर है प्रस्ताव किसी कार्य-कारण की वजह से ही रखा जाता है। पेश करने के लिए प्रस्तुत शब्द भी हिन्दी में आमफहम है। प्रस्तुत का मूलार्थ है जिसकी प्रशंसा की गई हो किन्तु अब इसका अर्थ है किसी चीज या तथ्य को सामने लाना, उजागर करना अथवा पेश करना। इसमें शुरुआत करने या आरम्भ करने का भाव स्पष्ट है। जिसे पेश किया जाए उसे प्रस्तुति कहते हैं। आजकल यह रचनाधर्म से जुड़ा शब्द बनता जा रहा है जैसे नाटक की प्रस्तुति। किसी भी रचना को प्रस्तुति कहा जा सकता है जो प्रदर्शित है। इसमें नाटक, कविता, गीत, चित्र से लेकर शिल्प तक आ जाते हैं।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, April 21, 2010

अकविता / शब्दार्थ-4 - तलाश

clean_sweep वि ने लिखे

कुछ शब्द

जो छिटके हुए थे अर्थ से

भाव भी था लापता

लेखक की लिखावट

में नुमांया थे शब्द

नही थी व्याख्या।

 

नोरम था

कथावाचक का

कथा बांचना

पर उसमें सार नहीं

इतिवृत्त था खुद का।

ब्द को ब्रह्म मान

पूजते रहे उसे

ईश्वर को

तलाशा नहीं गया

अर्थ में।

देखें-अकविता/ शब्दार्थ –1 अकविता/ शब्दार्थ –2 अकविता/ शब्दार्थ –3

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, April 11, 2010

अकविता/ शब्दार्थ –3 गढ़ा किसने!!!!

aaशाश्वत है,

अनश्वर है

ब्रह्म है

शब्द

किसने गढ़ा उसे

जानता नहीं कोई।

ब्द में

अर्थ की स्थापना

अलबत्ता

मनुष्य ने की

और उसे भूल गया।

याद रहा

सिर्फ शब्द

और यह पूछना

इसे गढ़ा किसने!!!!

अकविता/ शब्दार्थ –1 अकविता/ शब्दार्थ –2

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

अकविता/ शब्दार्थ –2 बुढ़ाती पीढ़ियां

fig

शब्दों को

रटते हुए

बुढ़ाती रहीं

पीढ़ियां

शब्दों को

अर्थ से जोड़ कर

बरतना

उन्हें

तब भी न आया

-7 अप्रैल, 2010

 अकविता/शब्दार्थ –1

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

अकविता/ शब्दार्थ –1

 

warहर युग में हुई

सभ्यताओं की जंग

शब्दों को

तलवार की तरह

भांजते रहे सब

 

बच पाए

वही

जो पड़े रहे दम साधे

खोजते रहे

युद्ध के भावी अर्थ

-सात अप्रैल, 2010 भोपाल

अकविता/ शब्दार्थ –2 बुढ़ाती पीढ़ियां

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


Blog Widget by LinkWithin