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Friday, January 15, 2016

सुब्हान तेरी कुदरत यानी ‘सुभानअल्ला’



मो हतसिब तस्बीह के दाने पे ये गिनता रहा
किन ने पी, किन ने न पी, किन किन के आगे जाम था

मुमकिन है इस मशहूर शेर को पढ़ कर आप सुभानअल्ला कह उठें। ये है ही इस लायक। पर आप ‘सुभानअल्ला’ ये सुनकर भी कहेंगे कि ‘तस्बीह’ और ‘सुभान’ दोनो बहन-भाई हैं। ‘सुभानअल्ला’ को बतौर प्रशस्तिसूचक अव्यय हिन्दी में भी बरता जाता है। यूँ इसका प्रयोग विस्मयकारी आह्लाद प्रकट करने के लिए भी होता है। यह लगभग ‘क्याब्बात’, ‘अद्भुत’ या ‘ग़ज़ब’ जैसा मामला है। यूँ सुभानअल्ला में बहुत अच्छा, धन्य-धन्य अथवा वाह-वाह जैसी बात है। ऐसा भी कह सकते हैं कि सुभानअल्ला में vow factor भी है। जानते हैं सुभानअल्ला की जन्मकुण्डली।

सुभानअल्ला अरबी से बरास्ता फ़ारसी हिन्दी में आया है। यह एक शब्द नहीं बल्कि संयुक्त पद है। मूल रूप से अरबी का ‘सुब्हान’ ही हिन्दी में सुभान बन कर ढल गया। अरबी सुब्हान बना है त्रिवर्णी मूलक्रिया सबाहा ح ب س
यानी सीन-बा-हा से जिसमें परमेश्वर के गुणगान और प्रशस्ति का भाव है। इसका ही विकसित रूप है सुब्हान سبحان (सीन बा हा अलिफ़ नून) जिसका फ़ारसी रूप सोब्हान होता है और हिन्दी सुभान।

दरअसल सबाहा यानी सीन-बा-हा में जो मूल भाव है उसमें अनंत का भाव है मसलन विशाल जलराशि में तैरना, वह सब जो दृष्टिपटल के सामने है, जो नज़रों में है उसके वैभव को अनुभव करना। तैरते हुए देखने के इस भाव को हिन्दू संस्कृति में संसार को भवसागर मानने के रूपक से समझा जा सकता है। उस अनंत को निहारना, उसकी विशालता को अनुभव करते हुए उसमें बने रहने का भाव ही सबाहा का मूल है। और हासिल ? हासिल वह है जो बलदेवप्रसाद मिश्र की इस कविता के ज़रिये ज़ाहिर होता है-

जिस ओर निगाहें जाती हैं
उसके ही दर्शन पाती हैं
सम्पूर्ण दिशाएं सुख -सानी
उसका ही गौरव गाती हैं
तो सबाह से बने सुब्हान में सचमुच सुब्हान तेरी कुदरत का ही आशय है। प्रकृति से कोई पार नहीं पा सका है। प्रकृति ही ईश्वर है। जो कुछ हमने नहीं रचा, पर जो सब हमारे लिये है। ऐसी अनुभूति के बाद अगर सुभानअल्ला जैसी उक्ति ही निकलती है।

इसी सबाहा से विकसित हुआ एक और शब्द है तस्बीह यानी सुमिरनी जिसका जन्म सुमिरन से हुआ। विश्व की कई प्राचीन संस्कृतियों में नाम स्मरण की परम्परा रही है। इस्लाम में भी नाम स्मरण का रिवाज़ है। परम्परा के अनुसार सुमिरनी को हाथ में पकड़ कर उस पर एक छोटी सफेद थैली डाल ली जाती है। तर्जनी उंगली और अंगूठे की मदद से नाम स्मरण करते हुए सुमिरनी के दानों को लगातार आगे बढ़ाया जाता है। सुमिरनी दरअसल एक उपकरण है जो नामस्मरण की आवृत्तियों का स्मरण भक्त को कराती है।

संस्कृत के स्मरण से विकसित है सुमिरन। स्मरण > सुमिरण > सुमिरन के क्रम में इसका विकास हुआ। पंजाबी में इसका रूप है ‘सिमरन’ जहाँ प्रॉपर नाऊन की तरह भी इसका प्रयोग होता है। व्यक्तिनाम की तरह स्त्री या पुरुष के नाम की तरह सिमरन का प्रयोग होता है। बहुतांश हिन्दीवाले पंजाबी के ‘सिमरन’ की संस्कृत के ‘स्मरण’ से रिश्तेदारी से अनजान हैं क्योंकि सुमिरन की तरह से पंजाबी के सिमरन का प्रयोग हिन्दीवाले नहीं करते हैं बल्कि उसे सिर्फ व्यक्तिनाम के तौर पर ही जानते हैं। स्मरण शब्द बना है संस्कृत की ‘स्मर्’ धातु से। मोनियर विलियम्स के संस्कृत इंग्लिश कोश के मुताबिक स्मर् में याद करना, न भूलना, कंठस्थ करना, याददाश्त जैसे भाव हैं। अंग्रेजी के मेमोरी से इसकी रिश्तेदारी है। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक लैटिन के मैमॉर् अर्थात स्मृति में ‘मर्’ के स्थान पर मॉर है। संस्कृत के स्मर, स्मरण, स्मृति में स-युक्त यही मर् है।

तो जब कभी किसी अनिवर्चनीय अनुभव से गुज़रें, किसी अनोखेपन के लिए मुँह से प्रशस्तिसूचक ‘वाह’ निकले तो सुभानअल्ला कहने में गुरेज़ न करें। और हाँ, खुदा की कुदरत को भी सुब्हान कहें और “मेरे महबूब को किसने बनाया” ये पहेली खुदा को बूझने दीजिए।
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Thursday, November 19, 2015

पत्थर के सनम...



बॉलीवुड के फिल्मी गीतों ने भी आम आदमी के शब्दज्ञान को बढ़ाया है। ‘सनम’ भी ऐसा ही एक शब्द है जिसका साबका आम आदमी से किसी न किसी फिल्मी गीत के ज़रिये ही हुआ है जिनमें आमतौर पर इसका अर्थ प्यारा, प्रिय, प्रियतम के अर्थ में ही प्रयोग होता आया है मसलन “ओ मेरे सनम, ओ मेरे सनम” या “आजा सनम मधुर चान्दनी में हम”। मगर सनम का इसका मूल अर्थ है बुत या प्रतिमा। हालाँकि “पत्थर के सनम...तुझे हमने मुहब्बत का खुदा माना...” जैसे गीतों में बुत के अर्थ में भी इसका प्रयोग देखने को मिलता है। सनम फ़ारसी के रास्ते हिन्दी में आया मगर है अरबी ज़बान का।

सेमिटिक मूल का ‘सनम’ صنم बनता है साद-नून-मीम ص ن م से मिलकर। इस्लाम से पहले सामी संस्कृति मूर्तिपूजक थी। अगर यूँ कहे कि मनुष्य का धार्मिक रुझान बुतपरस्ती के ज़रिये ही उजागर होता आया है तो भी ग़लत न होगा। प्रतीक, प्रतिमा, सनम या बुत तब तक निर्गुण-निराकारवादियों को नहीं खटकते जब तक वे धर्म के सर्वोच्च प्रतीक के तौर पर पूजित न हों। सनम का सन्दर्भ भी प्रतिमा के ऐसे ही रूप का है। कुरान की टीकाओं व अरबी कोशों भी सनम को “ईश्वर के अलावा पूजित वस्तु” के तौर पर ही व्याख्यायित करते हैं। हालाँकि अरबी सन्दर्भ सनम को किसी विदेशी भाषा से आयातित शब्द बताते हैं पर उस ज़बान का हवाला नहीं देते।

अनेक सन्दर्भों से पता चलता है कि सनम का व्युत्पत्तिक आधार हिब्रू भाषा का है और वहाँ से अरबी में दाखिल हुआ। हिब्रू में यह स-ल-म अर्थात salem है जिसमें बिम्ब, छाया अथवा प्रतिमा का आशय है। इस्लाम से पहले काबा में पूजी जाने वाली प्रतिमाओं के लिए भी सनम शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है। चूँकि “ईश्वर के अलावा पूजित वस्तु” इस्लाम की मूल भावना के विरुद्ध है इसलिए सनम, सनमक़दा और सनमपरस्ती का उल्लेख इस्लामी के परवर्ती सन्दर्भों में तिरस्कार के नज़रिये से ही आता रहा है।

प्राचीन सेमिटिक भाषाओं में अक्कद प्रमुख है जिसकी रिश्तेदारी हिब्रू और अरबी से रही है। उत्तर पश्चिमी अक्कद और उत्तरी अरबी के शिलालेखों में भी सनम का ‘स-ल-म’ रूप मिलता है। दरअसल न और ल में बदलाव भारतीय आर्यभाषाओं में भी होता रहा है। मिसाल के तौर पर पश्चिमी बोलियों में लूण ऊत्तर-पूर्वी बोलियों में नून, नोन हो जाता है। इसी तरह नील, नीला जैसे उत्तर-पूर्वी उच्चार पश्चिम की राजस्थानी या मराठी में जाकर लील, लीलो हो जाते हैं। नीलाम का मराठी रूप लिलाँव है। यही बात सलम के सनम रूपान्तर में सामने आ रही है।

इस सन्दर्भ में s-l-m से यह भ्रम हो सकता है कि इस्लाम की मूल क्रिया धातु s-l-m और सनम वाला s-l-m भी एक है। दरअसल इस्लाम वाले स-ल-म में सीन-लाम-मीम س ل م‎ है जिसमें सर्वव्यापी, सुरक्षित और अखंड जैसे भाव हैं। जाहिर है ये वही तत्व हैं जिनसे शांति उपजती है। जबकि प्रतिमा के अर्थ वाले स-ल-म का मूल साद-लाम-मीम है। ख़ास बात यह कि प्राचीन सामी सभ्यता में देवी पूजा का बोलबाला था। लात, मनात, उज्जा जैसी देवियों की प्रतिमाओं की पूजा प्रचलित थी। इसलिए बतौर सनम अनेक बार इन देवियों की प्रतिमाओं का आशय रहा। बाद के दौर में सनम प्रतिमा के अर्थ में रूढ़ हो गया।

इस सिलसिले की दिलचस्प बात ये है कि जहाँ बुत, मूर्ति या प्रतिमा जैसे शब्दों का प्रयोग ‘प्रियतम’ के अर्थ में नहीं होता मगर प्रतिमा के अर्थाधार से उठे शब्द में किस तरह प्रियतम का भाव भी समा गया। यहाँ समझने की बात यह है कि भारतीय संस्कृति में ईश्वर आराधना की प्रमुख दो शैलियाँ रही हैं- पहली है सगुण साकार और दूसरी है निर्गुण निराकार। सगुण साकार पन्थ में ईश्वर की उपासना करने वाले समूह में भी प्रतिमा, परमशक्ति का रूप नहीं है। जिस प्रतीक को परमशक्ति माना गया, उसकी प्रतिमा को ईश्वर की तरह पूजा जाता है। सनम में प्रियतम की अर्थस्थापना का सम्बन्ध दरअसल इस्लाम की प्रेममार्गी रहस्यवादी विचारधारा के विकास से है। इस धारा के प्रवर्तक सूफी थे। खासबात है कि सूफ़ीमत का जन्म सामी ज़मीन पर नहीं हुआ बल्कि गैरइस्लामी और बुतपरस्त इलाक़ों में हुआ। सूफ़ियों की इबादत के दो प्रमुख सोपान थे इश्क़ मजाज़ी और इश्क़ हक़ीक़ी।

लौकिक प्रेम को ही आध्यात्मिक प्रेम की सीढ़ी मानने वाले सूफ़ियों के भीतर ईश्वरप्राप्ति की अन्तर्धारा तो सनमपरस्ती की ही बह रही थी। इस्लाम के पैग़ाम को आमजन तक पहुँचाने में सूफ़ियों ने गीत-संगीत का मार्ग चुना और इस्लाम को स्वीकारने की राह खुल गई। अरब में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के लिए प्रचलित सनम शब्द तो उनके ख़ज़ाने में पहले से था। इश्क के ‘मजाज़ी’ पड़ाव पर जो सनम प्रियतम की तरह दिलो-दिमाग़ पर असर करता था, ‘हकीक़ी’ पड़ाव पर वही सनम रुहानी बन जाता। फ़ारसी और हिन्दुस्तानी में इस तरह सनम शब्द का प्रवेश हुआ। कहना न होगा कि बॉलीवुड के लोकप्रिय गीतकारों में पंजाब के शायरों का बड़ा योगदान रहा है जिनकी रूह में सूफ़ियाना शायरी थी। ‘सनम’ का हासिल मुकाम ‘प्रियतम’ ही था।

 

जासूस की जासूसी    हैलो हाय प्रणाम नमस्ते    सलामत रहे अदब ऐ सलाम  जासूस की जासूसी

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Monday, February 25, 2013

क़िस्सा दक़ियानूस का

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दु नियाभर में प्रचलित मुहावरों-कहावतों में शासकों या प्रभावशाली लोगों का अत्याचारी, सनकी चरित्र भी झलकता है। ऐसे क़िरदारों में रावण, कंस, नीरो या तुग़लक जैसे नाम स्पष्ट पहचाने जा सकते हैं। कुछ नामों के पीछे न तो कहानी नज़र आती है न ही क़िस्सा। ऐसा ही एक नाम है दक़ियानूस जो सिर्फ़ एक संज्ञा भर नहीं बल्कि एक प्रसिद्ध रोमन सम्राट था। आज के तुर्की और प्राचीन अनातोलिया का इफ़ेसस शहर इसके राज्य में शामिल था। अंधविश्वासी या पुरानी सोच वाले व्यक्ति को दक़ियानूस कहते हैं। बोलचाल की हिन्दी में यह शब्द खूब प्रचलित है। इसी तरह दकियानूसी शब्द के तहत पुरानी सोच वाला, रूढ़ीवादी और अधिक उम्र वाला, कोई बेकार, पुरानी और मनहूस चीज़ या पुरातनपंथी विचारधारा आती है। मसलन दक़ियानूसी लोग, दक़ियानूसी बातें, दक़ियानूसी चीज़े। अरबी-फ़ारसी में दक़ियानूस शब्द का सही रूप दक़्यानूस है।
हिन्दी-फ़ारसी के कोशों में अव्वल तो दक़ियानूस के संदर्भ में ज्यादा जानकारियाँ नहीं मिलतीं। कुछ कोशों में तो इसका संदर्भ बतौर रोमन शासक भी नहीं मिलता और कहीं पर उसके अत्याचारी सम्राट होने जितनी ही संक्षिप्त जानकारी मिलती है। ग्रीक संदर्भों में दकियानूस का उल्लेख बतौर देसियस मिलता है। पश्चिम एशिया के समाज-संस्कृति पर यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों की गहरी छाप पड़ी है। ईसाइयत पर यहूदी धर्म का असर और इस्लाम पर अपने पूर्ववर्ती यहूदी और ईसाई चिन्तन का असर नज़र आता है। बाईबल के गोस्पेल और कुरान के सूरों (सुरह) की अनेक कथाओं में समानता से यह साबित भी होता है। बाइबल और कुरान दोनों में ही थोड़ी बहुत भिन्नता के साथ देसियस या दक़्यानूस के बारे में लगभग एक जैसी ही कहानी है।
ईसा के जन्म के वक़्त पश्चिम एशिया और समूचे यूरोप में मूर्तिपूजा का ही बोलबाला था। ईसा के बाद भी रोमन साम्राज्य में मूर्तिपूजा का चलन था। किन्हीं संदर्भों में इतिहास प्रसिद्ध इस निरंकुश सम्राट को 359 ईपू. का बताया गया है मगर यह भ्रामक है। दक्यानूस यानी देसियस का काल ईसा के क़रीब ढाई सदी बाद का है। रोमन साम्राज्य में शासकों की मूर्तिपूजा सम्बन्धी सनक, अत्याचार और उत्पीड़न का इतिहास ईसा के सूली पर चढ़ने के बाद सातवीं आठवीं सदी तक भी जारी रहा रहा। देसियस या दक़्यानूस का रिश्ता अनातोलिया से जोड़ा जाता है और माना जाता है कि तुर्की के प्रसिद्ध तारसस और इफ़ेसस शहरों पर उसका शासन था। ईसाई धर्म के महान प्रचारक सेंट पॉल का जन्म तारसस में ही हुआ था। माना जाता है कि कि तारसस का नाम तार्कु के आधार पर पड़ा है जो हित्ती भाषा का शब्द है। इस इलाके में बसने वाले आदिजन हिट्टाइट ही थे। तार्कु एक देवता था जिसकी पूजा हित्तीजन करते थे। वैसे अधिकांश संदर्भो में इफ़ेसस से इसका सम्बन्ध जोड़ा जाता है। यह वही इफ़ेसस है जहाँ का आर्टेमिस का मंदिर सात अजूबों में गिना जाता है। अरब-फ़ारसी संदर्भों में इफ़ेसस को अफ़सूस कहा जाता है।
देसियस मूर्तिपूजा में विश्वास रखता था। उसका शासन बड़ा सख़्त और पूजा-विधान के आधार पर चलता था। कहने की ज़रूरत नहीं कि ईसाइयत के बढ़ते प्रभाव की वजह से रोमन साम्राज्य में मूर्तिपूजा के लिए आग्रह ज्यादा बढ़ा-चढ़ा था। देसियस का नज़रिया इस सिलसिले में ज्यादा सख़्त था। पूरे राज्य में उसके जासूस फैले हुए थे जो राई-रत्ती की खबरें देते थे। मूर्तिपूजा के विरोधियों को देसियस बर्दाश्त नहीं करता था। ईश्वर एक है और अदेखा है जैसी बातों पर यक़ीन करने वालों को वह आनन-फ़ानन में सज़ाए मौत सुना देता था जिसके तहत दोषियों को ज़िंदा जलाने, ज़मीन में गाड़ देने, हाथ-पैर काट कर पशुओं का ग्रास बनाने जैसे अमानवीय तरीके  शामिल थे। बहरहाल, बाइबल में वर्णित कथा के अनुसार इफ़ेसस के सात युवा लोगों ने शहर की देवी के मंदिर में सिर झुकाने से इनकार कर दिया। किन्हीं संदर्भों में यह घटना 156ईस्वी की भी बताई गई है। देसियस के कोप से बचने के लिए उन्होंने शहर के बाहर पहाड़ी गुफा में शरण ली। थके हारे सातों लोग गुफ़ा में जाते ही नींद के आग़ोश में चले गए। उधर देसियस को जब ख़बर लगी तो उसने गुफ़ा का दरवाज़ा चट्टानों से बंद करवा दिया ताकि वे अंदर ही मर-खप जाएँ। गोस्पेल के मुताबिक ये लोग दो सदियों तक सोते रहे। इसके आगे क्या हुआ ये जानने से पहले इस कहानी के इस्लामी संस्करण का जायज़ा लिया जाए।
गोस्पेल की तरह कुरान के अध्यायों को सूरा (सुरह) कहा जाता है। गुफ़ा में सोए लोगों की कहानी कुरान के सूरह-कह्फ़ (18वाँ अध्याय) में आती है। कहानी के मुताबिक अफ़सूस शहर (ग्रीक इफ़ेसस) में सात लोगों का एक समूह था जो ईसाइयत में भरोसा रखते थे। दक्यानूस के कहर से बचने के लिए उन्होंने गुफ़ा में शरण ली, जिसका दरवाज़ा उसके ही हुक्म से बंद करा दिया गया। इस्लामी संदर्भों में इन सात लोगों को अस्हाबे-कह्फ़ कहा गया है। अस्हब का अर्थ होता है पैग़म्बर के कृपापात्र, मोहम्मद के दोस्त। मूलतः अस्हब, साहिब का बहुवचन है जिसका अर्थ है साहिबान, मान्यवर आदि। इसी तरह कह्फ़ का अर्थ होता है गुफ़ा, कंदरा, गार आदि। कह्फ़ अरबी का शब्द है लेकिन, गुहा, गुफा, कोह, खोह जैसे इंडो-ईरानी परिवार के शब्दों से इसकी साम्यता गौरतलब है।
गोस्पेल के मुताबिक क़रीब दो सौ साल ये लोग सोते रहे जबकि सूरह् के मुताबिक इनकी नींद 309 साल बाद टूटी। जो भी हो, नींद टूटने पर इनमें से कुछ लोग भोजन की तलाश में पास की बस्ती तक पहुँचे। उन्होंने कुछ रोटियाँ खरीदी। जब नानबाई को इन्होंने कुछ सिक्के दिए तो वह हैरत में पड़ गया। सिक्के उसके लिए अनजाने थे। धीरे-धीरे ये बात पूरे बाज़ार में फैल गई कि कुछ अनोखे लोग वहाँ आए हैं। जानकारों ने देख-परख कर पहचाना कि इन सिक्कों पर दक़्यानूस नाम के राजा की तस्वीर छपी है जो क़रीब तीन सदी पहले हुआ था और बेहद ज़ालिम था। नींद से जागने वालों के लिए अब हैरत में पड़ने की बारी थी। उन्होंने बताया कि बेशक दक़्यानूस ज़ुल्मी है और उससे बचने के लिए ही तो वे कल शहर छोड़ कर भागे थे। वो तो झपकी लग गई और वे नींद में ग़ाफ़िल हो गए। तीन सदी लम्बी नींद उनके लिए ही नहीं, सबके लिए बड़ी ख़बर थी। फिर यह हुआ कि वे सातों लोग वहीं रहने लगे। उनकी यही चाहत थी कि जिस काल की गुफा में सदियों तक सोते हुए उन्हें ईश्वरीय अनुभूति हुई है, उनकी उम्र पूरी होने के बाद वे हमेशा के लिए भी उसी गुफा में सोएँ। शहरवासियों ने उनकी यह इच्छा भी पूरी की। बाद के दौर में आम लोगों में भी यह धारणा बनी कि उस गुफा में दफ़नाए जाने पर उन्हें मोक्ष मिलेगा।  पुरातत्ववेत्ताओं को एशिया व यूरोप में तुर्की, जॉर्डन से लेकर चीन के उईगुर प्रान्त तक में ऐसी गुफाएँ मिली हैं जिन्हें स्थानीय लोग अस्हाबे-कह्फ कहते हैं। इन सभी स्थानों पर कब्रें हैं। 
क़िस्सा-कोताह यह कि इस्लाम और ईसाई दोनों ही धर्मों में इस कहानी का प्रयोग अपने अपने पैग़म्बर की महानता स्थापित करने में किया। लोगों को यह पता चला कि कुल मिला कर एकेश्वरवाद ही सही रास्ता है। ईश्वर एक है और उन्होंने ही ज़ालिम के कहर से बचाने के लिए अपने सात नेक बंदों को सदियों तक सुलाए रखा। कहानी जो भी कहती हो, धर्मों की बात धर्मोपदेशक जानें, शब्दों के सफ़र में हमें तो दक़ियानूस लफ़्ज का सफ़र जानना था, जो जान लिया। अल्लाह के उन सात नेक बंदों का नाम आज कोई नहीं जानता। हाँ, जुल्मी दक़ियानूस को हम क़रीब क़रीब रोज़ ही याद कर लेते हैं।

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Thursday, October 18, 2012

पग-पग पैग़म्बर

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सं देश के अर्थ में फ़ारसी का पैग़ाम शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है ।  पैग़म्बर का रिश्ता भी पैग़ाम से ही है यानी वो जो पैग़ाम लाए । पैग़ाम का ही दूसरा रूप पयाम payam भी होता है । पैग़म्बर की तरह ही इससे पयम्बर बनता है । यह उर्दू में अधिक प्रचलित है । संवाद से जुड़े विभिन्न शब्द दरअसल किसी भी भाषा की आरम्भिक और मूलभूत शब्दावली का हिस्सा होते हैं । भाषा का जन्म ही संवाद माध्यम बनने के लिए हुआ है । पुराने ज़माने में पदयात्रियों के भरोसे ही सूचनाएँ सफ़र करती थीं । बाद में इस काम के लिए हरकारे रखे जाने लगे । ये दौड़ कर या तेज चाल से संदेश पहुँचाते थे । आगे चलकर घुड़सवार दस्तों ने संदेशवाहकों की ज़िम्मेदारी सम्भाली । इसके बावजूद शुरुआती दौर से लेकर आज तक पैदल चल कर संदेश पहुँचाने वालों का महत्व बना हुआ है । हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी के शब्दकोशों में पैग़ाम के बारे में व्युत्पत्तिमूलक जानकारी नहीं मिलती ।

पैग़ाम शब्द की रिश्तेदारी निश्चित रूप से संदेशवाहन की पैदल प्रणाली से होनी चाहिए । जॉन प्लैट्स के फ़ारसी, हिन्दुस्तानी, इंग्लिश कोश में पैग़ाम paigham शब्द को संस्कृत के प्रतिगम्  pratigam शब्द का सगोत्रीय बताया गया है जिसमें किसी की ओर जाना, मिलने जाना, वापसी जैसे भाव हैं । संस्कृत की बहन अवेस्ता में प्रति उपसर्ग का समरूप पैति है । डॉ अली नूराई द्वारा बनाए गए इंडो-यूरोपीय भाषाओं के रूटचार्ट में पैति-गम शब्द मिलता है मगर उन्होंने इसका रिश्ता न तो संस्कृत के प्रतिगम् से और न ही फ़ारसी के पैग़ाम जोड़ा, अलबत्ता एक अलग प्रविष्टि में पयाम ज़रूर दिया है । नूराई पैतिगम का अर्थ बताते हैं- निकलना ( संदेश के साथ ) ।  स्पष्ट है कि यह फ़ारसी पैग़ाम से पैतिगम का संदेशवाची रिश्ता जोड़ने का प्रयास है मगर  इससे कुछ पता नहीं चलता । यह ध्वनिसाम्य पर आधारित व्युत्पत्ति है । भारोपीय भाषाओं में पैर के लिए पेड ped तथा इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में इसका रूप पद् होता है । पद् से ही संस्कृत में पद, पदम्, पदकम् जैसे शब्द बनते हैं । अवेस्ता में भी पद का अर्थ पैर है । इसका एक अर्थ चतुर्थांश भी होता है । अंग्रेजी के फुट foot, ped, गोथिक के फोटस fotus, लैटिन के pes जैसे शब्दों में ये धातुरूप नज़र आते हैं । भारोपीय धातु पेड ped से बनने वाले शब्दों की लम्बी शृंखला है । गौर करें कि प्रतिगम में सिर्फ़ गति उभर रही है, साधन गौण है जबकि संदेशवाहक मूलतः सेवक है और इस आशय वाले शब्दों के मूल में पैदल चलना एक आवश्यक लक्षण है ।  प्यादा, हरकारा, प्यून, धावक, अनुचर, परिचर आदि शब्दों में चलना (पैदल) एक अनिवार्य ज़िम्मेदारी है ।
संस्कृत में पैदल चलने वाले को पादातिक / पदातिक कहते हैं । मूलतः इसमें अनुचर, सिपाही या संदेशवाहक का आशय है । हिन्दी की तत्सम शब्दावली में पदातिक रूप प्रचलित है । संस्कृत में इसका अन्य रूप पायिक भी होता है । मोनियर विलियम्स इसका अर्थ a footman , foot-soldier , peon बताते हैं । वे पायिक को पादातिक का ही संक्षिप्त रूप भी बताते हैं । पद में पैर और कदम दोनो भाव हैं । इससे बने पदक, पदकम् का अर्थ कदम, डग, एक पैर द्वारा चली गई दूरी है । पदक का प्राकृत रूप पअक  है जिससे इसका अगला रूप पग बनता है । हिन्दी की बोलियों में में पग-पग, पगे-पगे या पैग-पैग जैसे रूप भी चलते हैं । मीरां कहती हैं- “कोस कोस पर पहरा बैठ्या पैग पैग  बटमार।”  इसी तरह मलिक मुहम्मद जायसी लिखते हैं – “पैग पैग पर कुआँ बावरी । साजी बैठक और पाँवरी ।” हमारा मानना है कि पैगाम में यही पैग उभर रहा है । निश्चित ही फ़ारसी के पूर्व रूपों में भी पदक से पैग रूपान्तर हुआ होगा ।
सबसे पहले पादातिक का पायिक रूप संस्कृत में ही तैयार हो गया था । मैकेन्जी के पहलवी कोश के मुताबिक फ़ारसी के पूर्वरूप पहलवी में यह पैग payg है । पायिक की तर्ज़ पर इसे पायिग भी उच्चारा जा सकता है, मगर पहलवी में यह पैग ही हुआ है । पायिक से बने पायक का अर्थ हिन्दी में  पैदल सैनिक, या हरकारा होता है । इसी ‘पैग’ से संदेश के अर्थ वाला पैगाम शब्द तैयार होता है । कोशों में पैगाम और नुक़ते वाला पैग़ाम दोनो रूप मिलते हैं । मद्दाह के कोश में नुक़ते वाला पैग़ाम है । गौर करें कि अवधी का पैग, फ़ारसी में पैक के रूप में मौजूद है जिसका अर्थ है चिट्टीरसाँ, दूत, पत्रवाहक, डाकिया, हरकारा, प्यादा या एलची । पैग, फ़ारसी में सिर्फ़ पै रह जाता है जिसका अर्थ पदचिह्न या पैर है । फ़ारसी में पै के साथ ‘पा’ भी है जैसे पापोश, पाए-तख्त या पाए-जामा (पाजामा), पाए-दान (पायदान) आदि ।
पैगाम से ही ईश्वरदूत की अर्थवत्ता वाला पैग़म्बर शब्द बनता है । आमतौर पर पैग़म्बर नाम से इस्लाम धर्म के संस्थापक हज़रत मुहम्मद का बोध होता है । इंडो-ईरानी भाषाएँ बोलनेवाले समूहों में ईश्वरदूत, मुक्तिदाता के अर्थ में मुहम्मद के लिए पैग़म्बर शब्द रूढ़ हो गया । यूँ मूलतः इसमें संदेश लाने वाले का भाव ही है । दरअसल पैग़म्बर में वही अर्थवत्ता है जो हिन्दी के विभूति शब्द में है । दुनियseभर में जितनी भी विभूतियाँ पैदा हुई हैं, उनका दर्ज़ा ईश्वरदूत का ही रहा है । ग़लत राह पर चलते हुए कष्ट पाते मनुष्य को मुक्ति दिलाने के लिए समय समय पर ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने मानवता को राह दिखाई है । दुनिया ने ऐसे लोगों को ईश्वर का संदेश लाने वाले के तौर पैगम्बर माना । कृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईसा, मुहम्मद सब ईश्वरदूत, पथप्रदर्शक या धर्मप्रवर्तक थे । पैगम्बर शब्द बना है पैग़ाम में फ़ारसी का ‘बर’ उपसर्ग लगने से । मूलतः पैग़ाम में संदेश भिजवाने का भाव है । संदेश भिजवाने की अत्यन्य प्राचीन तकनीक पग-पग या पैग-पैग ही थी सो पैग़ाम में संदेश की अर्थवत्ता पग-पग चल कर गन्तव्य तक मन्तव्य पहुँचाने की क्रिया से उभर रही है ।
भारोपीय धातु इंडो-यूरोपीय धातु bher से जिसमें बोझ उठाना, या ढोना जैसे भाव हैं । संस्कृत में एक धातु है ‘भृ’ जिसकी व्यापक अर्थवत्ता है मगर मोटे तौर पर उसमें संभालने, ले जाने, भार उठाने आदि का भाव है । इससे ही बना है भार शब्द जिसका अर्थ होता है वज़न, बोझ आदि । भार का एक रूप भर  है । यह वज़न की इकाई भी है । फ़ारसी में यह बर है जिसका आशय उठाना, ले जाना है । बर अपने आप में प्रत्यय है । पैग़ाम के साथ जुड़ कर इसमें “ले जाने वाला” का आशय पैदा हो जाता है । इस तरह पैग़ाम के साथ बर लगने से बनता है पैग़ाम-बर अर्थात संदेश ले जाने वाला । पैगामबर का ही रूप पैगंबर या पैगम्बर हुआ । पैग़म्बरी का अर्थ है पैग़म्बर होने का भाव या उसके जैसे काम । पैग़म्बरी यानी एक मुहिम जो इन्सानियत के रास्ते पर चलने को प्रेरित करे । इन्सानियत पर चलना ही ईश्वर प्राप्ति है । पैगम्बर भी डगर-डगर चल कर औरों के लिए राह बनाता है । सो पैगम्बर सिर्फ़ पैग़ाम लाने वाला नहीं बल्कि पैग-पैग चलाने वाला, पार उतारने वाला भी है । संदेशवाहक के लिए पैग़ामगुजार शब्द भी है ।
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5.
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Friday, September 21, 2012

मुनीमजी की खोजखबर

nawabसंबंधित शब्द-1.तहसीलदार. 2.वजीर. 3.वायसराय. 4.जागीरदार. 5.कानूनगो. 6.श्रीमंत. 7.नौकर. 8.चाकर. 9.मुसद्दी. 10.एहदी. 11.अमीर. 12.फौजदार. 13.क्षत्रप 

हि न्दी की खूबी है कि उसने अन्य भाषाओं से ख़ासतौर पर अरबी-फ़ारसी से आए शब्दों को उनके शुद्धतम रूप में स्वीकार किया है । बहुत कम शब्द ऐसे हैं जिनके देसी रूपों को बोल-चाल और लिखत-पढ़त में जगह मिली है अन्यथा अरबी-फ़ारसी के शब्दों को अलग से पहचाना जाता है । मुनीम भी ऐसे ही दुर्लभ शब्दों में है जिससे यह अंदाज़ नहीं लगता कि यह हिन्दी में अरबी से आयात हुआ है । आज़ादी के बाद सिनेमा और साहित्य ने मुनीम के ज़रिए ही औपनिवेशिक काल के संघर्षशील और शोषित समाज की तकलीफ़, बदक़िस्मती, दुश्वारी और दुर्दशा को उजागर किया । सामन्ती समाज के निरंकुश चरित्र को सामने लाने वाला कारिन्दा था मुनीम जिसकी संवेदना सिर्फ़ वसूली, कब्ज़ा और दोहन से जुड़ी थी । आम आदमी के लिए बुरे सपने समान था का मुनीम । कम्पनीराज में जब सामन्तों को नवाब की उपाधियाँ रेवड़ियों की तरह बँट रही थीं, तब उनके नायब की ज़िम्मेदारी इन्हीं मुनीमों ने बखूबी सम्भाली । मौकापरस्ती इनकी खूबी थी और वह दौर भी आया जब नवाबों की बदचलनी का फ़ायदा उठा कर कुछ मुनीम खुद नवाब बन बैठे । आख़िर नवाब, नायब और मुनीम में रिश्तेदारी जो ठहरी ।
सेमिटिक भाषा परिवार की एक धातु है नून-वाव-बा (n-w-b) । मूल रूप से इसमें घूमना, मुड़ना, परिवर्तन, लौटना, फिरना, बारी, बदली जैसे भाव हैं । अल सईद एम बदावी की अरेबिक इंग्लिश डिक्शनरी ऑफ कुरानिक यूज़ेज़ में जिसके कब्ज़ा, वसूली, अधिग्रहण, दुर्दशा, विपत्ति, निरीक्षण जैसे अर्थ दिए गए हैं । सहायक या डिप्टी के अर्थ में हिन्दी में अरबी मूल का नायब शब्द भी प्रचलित है जो इसी धातु से जन्मा है । इसका अरबी रूप नाइब है । ध्यान दीजिए नून-वाव-बा की अर्थवत्ता पर जिसमें मूल रूप से स्थानापन्न का भाव उभर रहा है । कब्ज़ा या अधिग्रहण क्या है ? किसी ओर का काबिज हो जाना । सहायक, नायब या डिप्टी कौन है ? जो प्रमुख व्यक्ति के स्थान पर काम करे । किसी बदले काम करने वाला व्यक्ति ही नायब होता है । नायब का अर्थ है प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा तैनात अफ़सर । वरिष्ठ अधिकारी । नून-वाव-बा (n-w-b) घूमने, लौटने, मुड़ने के भावों का विस्तार मुआइना, निरीक्षण, बारी, अवसर, पाली, बदली में होता है और नायब की ड्यूटी में ये सभी काम शामिल हैं । किसी ज़माने में तहसील ही रियासतों की सबसे बड़ी ईकाई होती थी । तब तहसीलदार का रुतबा कलेक्टर का होता था । तहसीलदार का प्रमुख सहकारी नायब तहसीलदार कहलाता था । आज़ादी के बाद तहसील से ऊपर ज़िला बना और कलेक्टर, तहसीलदार से ऊपर हो गया । इस तरह तहसीलदार को डिप्टी कलेक्टर कहा जाने लगा । मगर नायब तहसीलदार अपनी जगह कायम रहा ।
इसी तरह नवाब शब्द भी इसी कड़ी में आता है । नवाब की व्युत्पत्ति भी n-w-b से हुई है और इसका एक रूप नव्वाब भी है । आमतौर पर नवाब शब्द को हिन्दी में शासक, राजा या बादशाह का पर्याय समझा जाता है पर ऐसा नहीं है । नवाब दरअसल एक उपाधि है और यह नाइब (नायब) का रूपान्तर है । इस्लामी शासकों की मान्यता के मुताबिक दुनिया पर खुदा की बादशाहत है और वे महज़ उसके प्रतिनिधि हैं । नवाब इसी रूप में शासक शब्द का प्रतिनिधित्व करता है । नवाब में भी प्रतिनिधि, नुमाइंदा, अहलकार, मुख्तार जैसे भाव हैं । मुस्लिम शासकों ने कई सूबेदारों को नवाब की इज़्ज़त बख़्शी क्योंकि वे उस सूबे में केन्द्रीय सत्ता के प्रतिनिधि थे । राज्यपाल के अर्थ में भी नवाब शब्द प्रचलित रहा । अंग्रेजों ने भी नवाब की पदवियाँ बाँटीं । कई घरानों ने नवाब शब्द को पैतृक उपाधि की तरह अपने नाम के साथ जोड़ लिया । नवाबजादा, नवाबजादी जैसे शब्दों में मुहावरेदार अर्थवत्ता कायम हुई जिसका अर्थ था शानशौकत, दिखावापंसद औलादें । कुल आशय बिगड़ैल संतान से है ।
नून-वा-बा से बने मूल नाब शब्द में प्रतिनिधित्व, सूचना जैसे भाव हैं । उर्दू फारसी का नौबत शब्द हिन्दी में भी सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में शामिल है । नौबत आना, नौबत पहुँचना, या नौबत बजना जैसे मुहावरे खूब प्रचलित हैं। नौबत का सीधा सीधा मतलब है घड़ी, अवसर, बारी, दशा इत्यादि । इसका अन्यार्थ सचेत होना, सतर्क होना भी है क्योंकि बारी, घड़ी या अवसर एक तय आवृत्ति के बाद आता है जिसके लिए हम तैयार रहते हैं । इसी तरह नबाहा शब्द भी इसी कड़ी में आता है । नौबत वैसे अरबी ज़बान के नौबा से बना है जिसमें बारी, अवसर जैसे ही भाव थे मगर बाद में इसमें ईश्वर की आऱाधना (बारंबार), धार्मिक कर्तव्यों का पालन करना जैसे भाव भी शामिल हो गए । इस रूप में समय का बोध कराने के नियत समय पर लिए नक्कारा बजाया जाता था जिसे नौबत कहा जाने लगा । आमतौर पर यह परंपरा ईश्वरआराधना के लिए सावधान करने के लिए थी मगर ऐसा लगता है कि राज्यसत्ता ने बाद में इसे अपना लिया। फिर समाज के प्रभावशाली व्यक्ति अपने घर के दरवाजे पर किसी भी किस्म की सूचना करने के लिए नौबत बजवाने लगे और बजानेवाला नौबती या नौबतचीं कहलाने लगा ।
समय चक्र पर गौर करें । सूरज का उगना, ढलना, फिर उगना । यह चक्र है । समय सूचक घड़ी के काँटे भी गोल घूमते हैं । यानी निरन्तर गति । हर बार उसी स्थान पर लौटना । स्थानापन्न होना । अरबी में घड़ी के लिए मुनब्बिह शब्द है । ‘मु’ उपसर्ग लगने से मुनीब शब्द बनता है । जॉन प्लैट्स की अ डिक्शनरी ऑफ उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एंड इंग्लिश डिक्शनरी के अनुसारी मुनीब का अर्थ “to make (one) supply the place (of another),' iv of ناب (for نوب) 'to supply the place (of another)'), s.m. One who appoints a deputy; a patron; master; client; constituter; constituent;—one appointed to conduct a business, foreman, factor, agent, headman.” दिया गया है । ज़ाहिर है मुनीब सहायक भी है, मातहत भी है, नायब भी है । कार्यपालन अधिकारी की शक्तियाँ उसमें निहित होने के चलते वही सरपरस्त है, मालिक और प्रशासक भी है । मुस्लिम शासन के दौरान मुनीब ये सब काम करते थे । मूलतः राजस्व अधिकारी की तरह ये काम करते थे और दौरा करते थे । धीरे-धीरे इनका काम हिसाब-किताब देखने तक सीमित हो गया और इनकी हैसियत सामान्य बाबू की हो गई । मोहम्मद मुस्तफ़ा खाँ मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश में मुनीब का अर्थ है प्रतिनिधि, नुमाइदः, अभिकर्ता, एजेंट या गुमाश्ता । जहाँ तक मुनीब के मुनीम में तब्दील होने का सवाल है, तो हमें अम्मा शब्द पर विचार करना चाहिए । हिन्दी में अन्त्य वर्ण में अनुनासिकता की वृत्ति है । अम्मा का एक रूप अम्ब भी है । यहाँ ब का लोप होकर म ध्वनि शेष है । यही बात मुनीब के मुनीम रूप में भी हो रही है ।

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Tuesday, September 4, 2012

बेफजूल आलिम-फ़ाज़िल

teaching

ह हमारे आस-पास जो दुनिया है वह दरअसल बाज़ार है और ये बाज़ार ही भाषा की टकसाल भी है । आए दिन न जाने कितने शब्दों की यहाँ घिसाई, ढलाई होती है । न जाने कितने शब्दों का यहाँ रूप, रंग, चरित्र बदल जाता है । भोलानाथ तिवारी के शब्दों में कहें तो कुछ मोटे हो जाते हैं तो कुछ दुबले । यहाँ तक कि कुछ शब्द तो यहाँ गुम भी हो जाते हैं । हिन्दी में अरबी-फ़ारसी शब्दों की बड़ी रेलमपेल लगी रहती है । कई शब्द जस के तस हमने अपना लिए तो कई का चेहरा बदल दिया  जैसे व्यर्थ, निरर्थक की अर्थवत्ता वाला ‘फिजूल’ शब्द । दरअसल अरबी का मूल शब्द ‘फ़ुज़ुल’ है मगर मोहम्मद मुस्तफ़ा खाँ मद्दाह साहब ने अपने कोश में इसका एक रूप फ़िज़ूल भी दिया है । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक इसका हिन्दी रूप ‘फुजूल’ है,मगर आज़ादी के बाद की हिन्दी ने ‘फुजूल’ नहीं, फिजूल / फ़िज़ूल को अपनाया है । हाँ, देहाती अंदाज़ में इसे फजूल भी कहा जाता है । फ़ारसी के ‘बे’ उपसर्ग में रहित का भाव होता है सो ग्रामीण समाज ने फिजल को और ज़ोरदार बनाने के लिए ‘बेफजूल’ शब्द भी बना डाला । हमारा मानना है कि नुक़ते के बिना अरबी-फ़ारसी शब्दों के साथ न्याय नहीं हो पाता । ‘फ़ुज़ूल’ बोलना हिन्दी में नाटकीय लगेगा इसलिए प्रचलित ‘फुजूल’ या ‘फजूल’ की बजाय ‘फिजूल’ ही चलना चाहिए । चाहें तो नुक़ता लगा कर इसे ‘फ़िज़ूल’ लिख सकते हैं ।
किसी व्यक्ति की विद्वत्ता का उल्लेख करते हुए हम ‘आलिम-फ़ाज़िल’ पद का प्रयोग भी करते हैं । यह हिन्दी साहित्य में भी मिलता है और बोलचाल बोलचाल की भाषा में भी इसका प्रयोग होता है । ‘आलिम-फ़ाज़िल’ में मूलतः खूब पढ़े-लिखे होने का भाव है । शाब्दिक अर्थ की दृष्टि से देखें तो ‘आलिम’ यानी शिक्षक, जानकार । जिसने बुनियादी तालीम ली हो । इस तरह आलिम का अर्थ स्नातक होता है । ‘फ़ाज़िल’ में उत्कृष्टता का भाव है ज़ाहिर है ‘फ़ाज़िल’ यानी उच्चस्नातक । इस तरह आलिम-फ़ाज़िल की मुहावरेदार अर्थवत्ता बनी खूब पढ़ा-लिखा, विद्वान, काबिल आदि । जहाँ तक आलिम-फ़ाज़िल वाले फ़ाज़िल का प्रश्न है, यह सेमिटिक धातु f-z-l (फ़ा-ज़ा-लाम) का शब्द है इसका सही रूप ‘फ़ज़्ल’ है जिसमें मेहरबानी, कृपा, दया, योग्यता, क़ाबिलियत, गुणवत्ता के साथ साथ आधिक्य, श्रेष्टत्व, अत्युत्तम जैसे भाव हैं । '”खुदा के फ़ज़ल से” या “अल्लाह के फ़ज़ल” से जैसे वाक्यों में हम इसे समझ सकते हैं । f-z-l के भीतर सम्मानित करना, विभूषित करना जैसे भाव हैं । ‘फ़ज़्ल’ की कड़ी में ही आता है ‘अफ़ज़ल’ जो चर्चित व्यक्तिनाम है जिसका अर्थ है आदरणीय, सम्मानित, मेहरबान, कृपालु, गुणवान, सर्वोत्तम आदि । स्पष्ट है कि आलिम यानी होने के बाद फ़ाज़िल होना भी ज़रूरी है । यह उससे ऊँची उपाधि है । इल्म की तालीम लेने के बाद आप आलिम बनते हैं । यह ज्ञान जब चिन्तन की ऊँचाई पर पहुँचता है तो ‘आलिम’ आगे जाकर  ‘फ़ाज़िल’ बनता है ।
इसी कड़ी में ‘फ़ुज़ूल’ भी आता है । ‘फ़िज़ूल’ का सबसे ज्यादा प्रयोग अत्यधिक खर्च सम्बन्ध में होता है जैसे ‘फ़िज़ूलखर्च’ या ‘फ़िज़ूलखर्ची’ आदि । दिलचस्प यह है कि यह फ़िज़ूल दलअसल फ़ज़ल या फ़ज्ल के पेट से निकला है जिसका अर्थ है कृपा, दया, सम्मान, मेहरबानी, विद्वत्ता, श्रेष्ठत्व आदि । फ़ज़्ल में निहित तमाम सकारात्मक भावों से फ़ुज़ूल / फ़िज़ूल में निहित अनावश्यक, अत्यधिक, बेकार, बेमतलब, बेकार, निकम्मा जैसे भावों से साम्य नहीं बैठता । जान प्लैट्स के अ डिक्शनरी ऑफ उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एंड इंग्लिश के मुताबिक यह फ़ज़्ल का बहुवचन है । फ़ज़्ल में निहित अत्यधिक के भाव पर गौर करें । हर पैमाने पर जो अपने चरम पर हो, उसका बहुवचन कैसा होगा ? अति सर्वत्र वर्जयेत । अत्यधिक मिठास दरअसल कड़ुआ स्वाद छोड़ती है । फ़ज़्ल के फ़ुज़ूल बहुवचन का लौकिक प्रयोग दरअसल इसी भाव से प्रेरित है । अत्यधिक श्रेष्ठत्व दम्भ पैदा करता है । दम्भ के आगे श्रेष्ठत्व फ़िज़ूल हो गया । बहुत सारी चीज़ों का संग्रह भी बेमतलब का जंजाल हो जाता है । फ़िज़ूल में यही भाव है ।
आलिम शब्द का ‘इल्म’ से रिश्ता है । अन्द्रास रज्की के अरबी व्युत्पत्ति कोश में आलिम के मूल में ‘अलामा’ शब्द है जिसमें ज्ञान का भाव है । जिस तरह विद्वत्ता का विद्या से रिश्ता है और विद्या के मूल में ‘विद्’ धातु है जिसमें मूलतः ज्ञान का भाव है । वह बात जो उजागर हो, पता चले । इसीलिए ‘ज्ञानी’ को ‘जानकार’ कहते हैं । ‘ज्ञान’ का ही देशी रूप ‘जान’ है जिससे ‘जानना’, ‘जाना’ (तथ्य), ‘जानी’ (बात) या ‘जानकारी’ जैसे शब्द बने हैं । अरबी मूल का है इल्म जिसमें जानकारी होना, बतलाना, ज्ञान कराना, विज्ञापन जैसे भाव है । सेमिटिक धातु अलीफ़-लाम-मीम (a-l-m) में जानना, मालूम होना, अवगत रहना, ज्ञान देना या सूचित करना जैसे भाव हैं । इससे बने कई शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं । ‘आलिम’ का मूल अर्थ है अध्यापक, पंडित, अध्येता, विद्वान आदि । महाकवि सर मोहम्मद इक़बाल की ख्याति एक दार्शनिक कवि की थी और इसीलिए उन्हें ‘अल्लामा’ की उपाधि मिली हुई थी जिसका अर्थ है सर्वज्ञ, सर्वज्ञाता, पंडित आदि । इसी कतार में आता है ‘उलेमा’ जिसका अर्थ भी ज्ञानी, जानकार, शिक्षक होता है । इसका सही रूप है ‘उलमा’ ulama मगर हिन्दी में इसे उलेमा ही लिखा जाता है । बहुत सारे आलिम यानी उलमा यानी विद्वतजन । मगर हिन्दी के बड़े-बड़े ज्ञानी भी का बहुवचन ‘उलेमाओं’ लिखते हैं । यह ग़लत है । उलेमा अब धार्मिक शिक्षक के अर्थ में रूढ़ हो गया है ।
हिन्दी में ‘तालीम’ talim शब्द भी शिक्षा के अर्थ में खूब चलता है । ‘तालीम’ भी ‘इल्म’ से जुड़ा है और इसके मूल में अरबी का ‘अलीमा’ है । अन्द्रास रजकी के कोश के मुताबिक अरबी के ‘अलामा’ और ‘अलीमा’ शब्दों में मूलतः ज्ञान का आशय है । तालीम शब्द के मूल में अलीमा है जिसमें अलिफ़-लाम-मीम ही है मगर ‘ता’ उपसर्ग लगा है जिसमें परस्परता, सहित या तक का भाव है । कृपा कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश के मुताबिक इसका अर्थ अध्यापन, अनुशासन, नियम, व्यायाम और प्रशिक्षण है । इसका मूल रूप तअलीम t’alim है । इधर मराठी में शारीरिक व्यायाम के अर्थ में तालीम शब्द रूढ़ हो गया है । मराठी में तालीमखाना यानी व्यायामशाला या अखाड़ा होता है और तालीमबाज यानी व्यायामप्रिय । जबकि हिन्दी में तालीम से बने तालीमगाह यानी पाठशाला और तालीमयाफ़्ता यानी पढ़ा-लिखा जैसे शब्द हिन्दी के जाने-पहचाने हैं । आजकल हमारे शिक्षा संस्थानों में भी दरअसल दाव-पेच ज्यादा होते हैं । उन्हें तालीमगाह की बज़ाय तालीमखाना यानी अखाड़ा कहना  बेहतर होगा ।
झंडे को अरबी में अलम alam कहा जाता है । सेमिटिक धातु a-l-m में निहित जानकारी कराने के भाव पर गौर करें । कोई भी ध्वज दरअसल किसी न किसी समूह या संगठन की पहचान होता है । अलम का अर्थ चिह्न, निशान इस मायने में सार्थक है । ध्वजवाहक के लिए हिन्दी में झंडाबरदार शब्द है जिसकी मुहावरेदार अर्थवत्ता है । यह हिन्दी के झंडा के साथ फ़ारसी का बरदार लगाने से बना है । मुखिया, नेता या अगुवा के अर्थ में भी झंडाबरदार शब्द प्रचलित है । ध्यान रहे किसी संगठन या समूह की इज़्ज़त, पहचान उसके मुखिया से जुड़ी होती है । उसे बरक़रार रखने वाला ही झंडाबरदार कहलाता है । हालाँकि इसमें भाव ध्वज थामने वाले का ही है । अरबी के अलम के साथ फ़ारसी का बरदार लगाने से बना है जिसका ‘वाला’ का भाव है । इस तरह अलमबरदार का अर्थ भी पताका थामने वाले के लिए प्रचलित है ।
जिस तरह अलीमा अर्थात ज्ञान में ‘ता’ उपसर्ग लगने से तालीम बनता है उसी तरह ‘मा’ उपसर्ग लगने से ‘मालूम’ बनता है । अवगत रहने, पता रहने, जानकारी होने के अर्थ में मालूम शब्द रोज़मर्रा की हिन्दी के सर्वाधिक प्रयुक्त शब्दों में शुमार है । मालूम में ज्ञात अर्थात known का भाव है । अलीमा में know का भाव है तो ‘मा’ उपसर्ग लगने से यह ज्ञात में बदल जाता है । उत्तर प्रदेश के देवबंद में इस्लामी शिक्षा का विख्यात केन्द्र ‘दारुलउलूम’ है जिसका अर्थ है विद्यालय यानी वह स्थान जहाँ ज्ञान मिलता हो । इसमें जो उलूम है उसका अर्थ है विविध विद्याएँ, विषय अथवा ज्ञान की बातें । दरअसल यह इल्म यानी ज्ञान का बहुवचन है । जिस तरह आलिम का बहुवचन उलमा हुआ वैसे ही इल्म का बहुवचन उलूम हुआ अर्थात विविध आयामी सांसारिक और आध्यात्मिक ज्ञान । हमें जिस चीज़ का भी इल्म है, दरअसल वह सब संसार और भवसंसार से सम्बन्धित है इसलिए इसी कड़ी में आता है आलम यानी संसार । जो कुछ भी ज्ञात है, वही संसार है ।

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Saturday, August 11, 2012

तिलस्मी दुनिया

talism
च मत्कारी, जादुई, रहस्यम और अबूझ किस्म की बात, घटना या वस्तु के संदर्भ में तिलस्म हिन्दी का जाना-पहचाना शब्द है । यह भी दिलचस्प है कि हिन्दी साहित्य की शुरुआती रचनाओं का आधार भी यही शब्द यानी तिलस्म था । उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जो महानुभाव हिन्दी गद्य में आज़माईश कर रहे थे, उसके कथानकों का सफल फार्मूला तिलस्मी दुनिया का ही था । राजा-रानी की पारम्परिक प्रेम-कथा अब गौण थी और राजा-रानी के किस्से अब राजनीति के प्रपंच का हिस्सा बनते थे जिन्हें तिलस्मी दुनिया के तहखानों, ऐयारों के कारनामों और जासूसी दाव-पेचों से गुज़रते हुए दिलचस्प अंदाज़ में परोसा जाता था । इस विधा के सिद्धहस्त लेखक बाबू देवकीनंदन खत्री थे । जासूसी और तिलस्मी लेखन करने वाले वे पहले ही लेखक हैं जिनकी रचनाओं को साहित्य का दर्जा मिला । उनकी लिखी चन्द्रकान्ता संतति आज भी खूब बिकती है । बहरहाल, तिलस्म शब्द से प्रायः हर हिन्दी प्रेमी का परिचय खत्री जी के उपन्यासों के ज़रिये होता है ।

तिलस्म शब्द की आमद हिन्दी में फ़ारसी के ज़रिये हुई है । तिलस्म शब्द के दायरे में मायालोक, इंद्रजाल, जादू, चमत्कार, अद्भुत कार्य-व्यापार, क़रामाती बातें आती हैं । यह तावीज भी हो सकता है, गंडा भी हो सकता है या अभिमंत्रित पत्थर भी । इसका इस्तेमाल कई तरह से होता है जैसे समूचा स्थान यानी तिलस्मी तहखाना, कोई मार्ग जैसे तिलस्मी रास्ता, कोई वस्तु जैसे तिलस्मी हार आदि । ई. जे. ब्रिल्स के फर्स्ट इन्साइक्लोपीडिया ऑफ इस्लाम के मुताबिक इसके तिलसम, तिलस्म, तिलसिम, तालिस्म और तिलिस्म जैसे रूप भी अरबी में प्रचलित हैं । हिन्दी में तिलस्माती, तिलस्मानी, तिलस्मात, तिलस्मी जैसे रूप प्रचलित हैं । प्राचीनकाल से ही प्रायः हर संस्कृति में परस्पर विरोधी पक्ष एक-दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए ओझाओं और नजूमियों के ज़रिये एक दूसरे के खिलाफ तंत्र-मंत्र, जादू-टोना आदि शक्तियों का प्रयोग करते रहे हैं जिनका मक़सद विरोधी का सर्वनाश ही था ।
गौरतलब है कि ताबीज के अर्थ वाला अंग्रेजी का टेलिस्मन अरबी के तिलस्म से प्रभावित है जबकि खुद अरबी में तिलस्म शब्द के पीछे बाइजेंटीनी-ग्रीक का तेलेस्मा ( telesma ) है । तुर्की की वर्तमान राजधानी इस्ताम्बुल का प्राचीन नाम कुस्तुन्तुनिया Kostantiniyye था जिसे ग्रीक भाषा में कांस्टेंटिनोपल कहते थे । किसी ज़माने में प्राचीन ग्रीक साम्राज्य का विस्तार वर्तमान इस्ताम्बुल तक था । भूमध्यसागर की धुर पूर्वी सीमा अरब क्षेत्रों को छूती है । ग्रीस और अरब के बीच व्यापारिक संबंध भी रहा है इसलिए अरब और ग्रीस में भाषायी अन्तर्सम्बन्ध भी गहरा है । इस क्षेत्र को तब बाइजेंटाइन कहते थे और यहाँ बोली जाने वाली भाषा बाइजेंटीनी-ग्रीक कहलाती थी जिसका खासा असर तुर्की और अरबी भाषाओं पर पड़ा है । ग्रीक भाषा के टेलिन telein शब्द से तेलेस्मा बना जिसमें धार्मिक अनुष्ठान, समापन, पूर्णाहुति जैसे भाव थे । भाषाविज्ञानियों का मानना है कि टैलेन के मूल में टेलोस शब्द है जिसमें जिसका अर्थ है खात्मा, सर्वनाश, परिणति, निजात, अन्त, अंजाम या मृत्यु आदि । यह जो टेलोस है, इसका रिश्ता ग्रीक भाषा की प्रसिद्ध धातु टेली tele- से है जिसमें दूर, सिरा, अन्तराल जैसे आशय हैं और इससे टेलीविज़न, टेलीफोन, टेलीपैथी, टेलीकास्ट जैसे बोलचाल के कई आमफ़हम शब्द बने हैं । कई भाषाओं में इसके रूपान्तर प्रचलित हैं जैसे ग्रीक में टेलेस्मा, हिन्दी में तिलस्म, स्वाहिली में तलासिमु, हिब्रू में तिलस्म आदि ।
तिलस्म यानी कोई जादुई चिह्न या रहस्यमय व्यवस्था मूलतः किसी अलौकिक शक्ति के असर को बताती है । तिलस्म का सृजन जो भी करता है, यह उसके हित में असरदार होता है । इसमें सौभाग्य चिह्न का भाव है । मंत्र शक्ति, जादुई करामात, गंडा, ताबीज़ आदि का प्रयोग किसी मुश्किल हालात से निजात पाने अथवा मनोवांछित फल पाने के लिए किया जाता है । मूल भाव है मनचाहा हो जाना, जो सामान्य प्रयासों से होना सम्भव नहीं है । तिलिस्म शब्द का हिब्रू रूप तालिस्म होता है । “द डिक्शनरी दैट रिवील द हिब्रू सोर्स ऑफ इंग्लिश’ में इसाक ई. मोज़ेस तालिस्म की दिलचस्प व्युत्पत्ति बताते हैं जो ग्रीक टेलोस पर आधारित ही हैं । मोजेज के अनुसार हिब्रू तालिस्म, अरबी तिलस्म से ही आया है । वे बाइजेंटीनी-ग्रीक के तैलिस्मा telesma को टेलिन और स्लैम मिलन का नतीजा मानते हैं । अंग्रेजी के slam में मूलतः पटाक्षेप या चरम परिणति का ही भाव है । खेल स्पर्धाओं में ग्रैंडस्लैम के रूप में इसे देखा जा सकता है । हालाँकि भाषाविद् स्लैम की व्युत्पत्ति पर स्थिर नहीं हैं और इसे उत्तरी यूरोप के प्राचीन नॉर्स परिवार का शब्द मानते हैं ।
अंग्रेजी के स्लैम से सेमिटिक धातु सलम का रिश्ता तार्किक भी लगता है और भाषायी अन्तर्सम्बन्ध यहाँ भी नज़र आता है । सेमिटिक भाषा परिवार की धातु स – ल - म ( अरबी लिपि में सीन –लाम- मीम ) जिसमें समर्पण, स्वीकार जैसे भावों के साथ अन्ततः शान्ति का आशय प्रकट होता है । नमस्कार या सेल्यूट के अर्थ वाले प्रसिद्ध अभिवादन “अस्सलाम अलैकुम” और “वालैकुम अस्सलाम” में यही सलम है जिसका एक रूप सलाम हुआ । कुशल, मंगल का प्रतीक यह अभिवादन मूलतः शान्ति कामना ही है । हिब्रू में इसका रूप शॉलोम shalom होता है । मोज़ेस के अनुसार बाइबल में शॉलाम शब्द का आशय भी पूर्णत, परमत्व और शान्ति ही है । अपने अभीष्ट की कामना में प्राचीनकाल से ही मनुष्य किन्ही अनुष्ठानों का आयोजन करता रहा है जिनमें से कुछ ऐसे होते हैं जो वह सामान्य पुरोहितो से हट कर ओझा, बैगा, तान्त्रिक, मान्त्रिक आदि से सम्पन्न कराता है । कुल मिला कर किसी मायावी शक्तियों से इष्टफल प्राप्ति का प्रयास ही तिलस्म है ।  इसका हासिल भी चित्त की शान्ति ही होता है । मगर इसमें अहंभाव की तुष्टि भी होती है ।
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Tuesday, July 31, 2012

मीरासियों के वारिस

miras

हि न्दी में नाचने-गाने वालों, वाचिक व आंगिक चेष्टाओं के जरिये मनोरंजन करने वालों को भांड-मीरासी कहा जाता है । यह शब्दयुग्म दरअसल सामंती व्यवस्था में ज्यादा प्रयोग में आता था । आज के दौर में इसका प्रयोग मुहावरे की तरह होता है जिसमें चाटूकारिता और खुश करने की चेष्टाओं का संकेत है । प्राचीनकाल मे भी इस पद का सम्बन्ध दरबार संस्कृति से जुड़ता था और आज भी किसी राजनेता के टहलुओं, चमचों, चापलूसों को भांड-मीरासी कह कर ही नवाज़ा जाता है । इस शब्दयुग्म का पहला पद भाण्ड हिन्दी की तद्भव शब्दावली का है तो मीरासी शब्द फ़ारसी से आया है जिसके जन्मसूत्र सेमिटिक परिवार की अरबी से जुड़ते हैं । हिन्दी में मीरासी शब्दको ह्रस्व इ लगा कर मिरासी लिखने की प्रवृत्ति ज्यादा है जबकि यह शब्द बना है अरबी के मीरास से जिसका अर्थ है विरासत या वंशानुगत प्राप्ति । ग़ालिब ने दुखों को मीरास-ऐ-ज़िंदगी कहा है अर्थात जीवन का अनिवार्य तत्व । ज़िन्दगी की विरासत । मीरासी में सीन का प्रयोग भी मिलता है और शीन का भी । मराठी में मीराशी भी लिखा जाता है और मीरासी भी जबकि हिन्दी में ज्यादातर मीरासी ही चलता है ।
सबसे पहले बात करते हैं मीरासी की । मीरासी का प्रयोग उत्तर और दक्षिण भारत में अलग-अलग तरह से होता है । उत्तर भारत का मीरासी नचैया-गवैया-बजैया होने के साथ-साथ मूलतः संगीतजीवी-कलाजीवी तबका है, जिसका काम लोकरंजन है मगर जो लोक उपेक्षा और उपहास का पात्र भी था । दूसरी तरफ़ दक्कन का मीरासी ऐसा प्रभावशाली ज़मींदार तबका था । खासतौर पर मध्यभारत के खानदेश से लेकर कर्नाटक तक फैले शिवाजी के विस्तृत मराठा साम्राज्य की ज़मीन-बंदोबस्त और भू-राजस्व प्रणाली का अहम हिस्सा था मीरासी वर्ग । मीरासी बना है मीरास से जिसके मूल में है अरबी का मीराथ । गौरतलब है कि अरबी के “थ” वर्ण का उच्चार उर्दू में “स” की तरह होता है । जैसे हदीथ को उर्दू में हदीस कहते हैं । इसलिए मूल सेमिटिक उच्चारण वाले मीराथ का उर्दू रूप मीरास होता है जिसका अर्थ है विरासत । मीराथ के मूल में वारिथा waritha अथवा वारिसा है जिसमें परम्परा से पाने का भाव है जैसे उत्तराधिकार में पाना, विरासत में पाना, स्वामी या वारिस बनना आदि ।
उत्तराधिकारी के लिए हिन्दी में वारिस शब्द आमतौर पर इस्तेमाल होता है । इसीतरह उत्तराधिकार, वंशाधिकार, कुलाधिकार जैसे आशयों के लिए विरासत बेहद सामान्य शब्द है । इसी कड़ी से मीराथ का जन्म हुआ है जिसमें विरासत का ही भाव है । इसी कड़ी में अरबी का एक शब्द है मूरिस । अगर उत्तराधिकार पाने वाला वारिस है तो उत्तराधिकार सौंपनेवाला कौन ? ज़ाहिर है वसीयतकर्ता ही मूरिस है इसके अलावा पुरखा, वंश प्रवर्तक या पूर्वज भी इसकी अर्थवत्ता में आते हैं । हिन्दुस्तानी ज़बान से हिन्दी को यह शब्द उत्तराधिकार में तो नहीं मिला मगर शेरो-शायरी में यह मूरिस चलता है जैसे, अकबर इलाहाबादी साहब ने फ़र्माया है – डारविन साहब हक़ीक़त से निहायत दूर थे । मैं न मानूंगा कि मूरिस आप के लंगूर थे ।। हाँ, मूरिस की कड़ी में मौरुस ज़रूर नज़र आता है जिसका इस्तेमाल अदालती भाषा में आज भी खूब होता है और बोलचाल में भी इसका दख़ल बना हुआ है । मौरुस का शुद्ध अरबी रूप मौरुथ है जिसका अर्थ है पैतृक या उत्तराधिकार में प्राप्त । हिन्दी में उत्तराधिकार, विरासत आदि अर्थों में इसका मौरूसी रूप ज्यादा प्रचलित है ।
इतिहासविद् डॉ. रहीस सिंह अपनी पुस्तक मध्यकालीन भारत में लिखते हैं कि “मध्यकालीन दक्कन की मीरासी व्यवस्था भूमि-व्यवस्था में सबसे प्रमुख और प्रथम श्रेणी की थी । यह कृषक स्वामित्व की व्यवस्था थी । भू-व्यवस्था के तहत मीरास का तात्पर्य उस भूमि से है जिस पर व्यक्ति का एकछत्र पुश्तैनी अदिका हो । मराठी दस्तावेजों में इसका प्रयोग ऐसे किसी पुश्तैनी और हस्तान्तरित अधिकार के लिए किया गया है जिसे व्यक्ति ने उत्तराधिकार में खरीदकर या उपहार द्वारा प्राप्त किया हो ।” महाराष्ट्र में वंशानुगत रूप से भूमि स्वामित्व अधिकार प्राप्त व्यक्ति को मीरासदार (मीराज़दार) कहते हैं और जागीरदार, जमीनदार की तरह मीरासदार का प्रयोग कुलनाम के तौर पर भी होता है । मोल्सवर्थ के कोश में मीरासी का एक रूप मीराशी भी बताया गया है । मध्यकालीन दक्कन में मीरासी का तात्पर्य खुदकाश्त के सम्बन्ध में चार वर्गों से भी था जिसमें सबसे क्रमशः ‘वतनदार’, ‘मीरासदार’, ‘ऊपरी’ और ‘ओवांडकरू’ शामिल थे । महारों के लिए भी ‘मिरासी’ नाम प्रचलित था जो गांव की चौकीदारी करते थे ।
उत्तर भारत में ‘भांड-मीरासी’ युग्म के दोनो ही शब्दों को जातीय पहचान भी मिली हुई है । उस्ताद रजब अली खाँ पर लिखी अपनी पुस्तक में अमीक हनफ़ी कहते हैं- “मीरासी शब्द का अर्थ आनुवंशिक है । ऐसी संगीतजीवी जातियाँ जिन्होने कालान्तर में धर्म-परिवर्तन कर लिया और मुसलमान हो गईं, मीरासी कहलाने लगीं ।” जब राजे-रजवाड़े न रहे, इन कलाजीवी वर्ग के लोगों की अवनति हुई और ये गाने-बजाने वाले कहलाने लगे । कोठों के साज़िन्दों को भी मीरासी कहते हैं । मज़हबी तौर पर ये मुसलमान होते हैं मगर मुस्लिमों में भी इनकी जात नीच समझी जाती है । शेरो-सुख़न की भूमिका में अयोध्याप्रसाद गोयलीय लखनऊ के वाजिदअली शाह के दरबार का वर्णन करते हुए लिखते हैं –“उनके दरबार में शायरों-गवैयों का तो बोलबाला था ही, नचैयों, भांडों, मसख़रों और लतीफ़े कहनेवालों की भी एक बहुत बड़ी जमाअत थी । ‘भड़ुवे-मीरासी’ मीर साहब कहलाए जाते थे ।” ऐसा भी माना जाता है कि मीरासियों का रिश्ता पैगम्बर मोहम्मद की शिक्षाओं को सुनने वाले शुरुआती लोगों के समूह से है । इनमें से कुछ लोग इस्लाम के प्रचारक बने और ईरान, अफ़गानिस्तान तक आए । सूफ़ी-सन्तों के काफ़िलों में के साथ ये मीरासी चलते थे । ख़्वाज़ा मोईनुद्दीन चिश्ती के साथ भी ऐसे ही मीरासी जत्थे आए जो बाद में राजस्थान में बस गए । इनके डेरो प्रायः आबादी के बाहर होते थे और इनका मुखिया मीर कहलाता था
अब बात भांड की । संस्कृत में कहने, सुनने, पुकारने, शोर मचाने के आशय वाली धातु भण् है । कहने की ज़रूरत नहीं कि दरबारों में राजाओं की कीर्ति का बखान करनेवाले भांड समुदाय का नाम भी इसी भण् धातु से हुआ है। भण् से बने भाण्डकः का मतलब होता है घोषणा करनेवाला। किसी ज़माने में भाण्ड सिर्फ विरुदावली ही गाते थे और वीरोचित घोषणाएं करते थे ताकि सेनानियों में शौर्य और वीरता का भाव जागे। कालांतर में एक समूचा वर्ग राज्याश्रित व्यवस्था में शासक को खुश करने के लिए झूठा स्तुतिगान करने लगा । इसे समाज ने भँड़ैती कहा और शौर्य का संचार करनेवाला पुरोहित भाण्ड बनकर रह गया। जोर-शोर से मुनादी करनेवाले को जिस तरह से ढ़िंढोरची, भोंपू आदि की उपमाएँ मिलीं जिनमें चुगलखोर, इधर की उधर करनेवाला, एक की दो लगानेवाला और गोपनीयता भंग करनेवाले व्यक्ति की अर्थवत्ता थी उसी तरह भांड शब्द की भी अवनति हुई और भाण्ड समाज में हँसी का पात्र बन कर रह गया। स्वांग करनेवाले व्यक्ति, हास्य कलाकार, विदूषक भी भाण्ड की श्रेणी में आ गए । इसके अलावा चुगलखोर और ढिंढोरापीटनेवाले को भी भाण्ड कहा जाने लगा। यही नहीं, चाटूकार और चापलूस व्यक्ति को दरबारी भांड की उपाधि से विभूषित किया जाने लगा जो किसी ज़माने में दरबार का सम्मानित कलाकार का पद होता था । जब बहुत कुछ कहने-सुनने को कुछ नहीं रहता तब भी अक्सर हम कुछ न कुछ कहते ही हैं जिससे भुनभुनाना कहते हैं ।

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Wednesday, July 4, 2012

बेहुदा हिदायतें …

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दो चीज़ों के मेल से हमेशा नई बात पैदा हो जाती है । इस दुनिया में जो कुछ भी सरल है, सुपाच्य है, सुंदर है , सुग्राह्य है वह सब किन्ही दो या दो से अधिक चीज़ों के सुमेल से ही प्रकाश में आया है । अरबी के बहुत से शब्द इसीलिए हिन्दी के सर्वाधिक प्रचलित शब्दों में शुमार हुए हैं क्योंकि उन्हें भारतीय प्रकृति के अनुकूल बनने के लिए फ़ारसी का संस्कार मिला । रहित के अर्थ वाला बे उपसर्ग कई अरबी शब्दों में लगने से नया शब्द बना है । ऐसा ही एक शब्द है बेहुदा जो हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है । बेहुदा यानी अशिष्ट, बदतमीज़, असभ्य, अभद्र, अशालीन, बुरा और खराब । बेहुदा का स्त्रीवाची बेहुदी बनता है । इसी तरह अशिष्टता के लिए बेहूदगी शब्द प्रचलित है ।
बेहुदा शब्द बना है अरबी के हुदा में फ़ारसी के निषेधात्मक उपसर्ग ‘बे’ लगने से । गौरतलब है कि फ़ारसी का ‘बे’ वैदिक भाषा के वि का जोड़ीदार है । ध्यान रहे इंडो-ईरानी परिवार में ‘व’ का रूपान्तर ‘ब’ होता है । अरबी में अल-हुदा पद प्रचलित है जिसका अर्थ है राह दिखाना, निर्देशित करना, मार्गदर्शन करना, निर्वाण, मुक्ति, मोक्ष प्रदान करना आदि । इसके मूल में सेमिटिक धातु हा-दा-ये (h-d-y) से जिसमें अगुवाई, नेतृत्व, स्पष्टता, प्रदर्शन, निदर्शन जैसे भाव हैं । इस तरह अरबी के हुदा में किसी को समर्थ बनाना, उसमें सही-गलत की समझ पैदा करना, जीने का सही मार्ग बतलाना, आत्मरक्षा की तरकीब सिखाना जैसे भाव हैं । हुदा से पहले ‘बे’ लगाने से इन सब भावों का निषेध होने का आशय पैदा हो जाता है । ध्यान रहे, हुदा में निहित सभी भाव मूलतः किसी भी व्यक्ति को शिष्ट और शालीन बनाते हैं सो जिस व्यक्ति में इनका अभाव है वह स्वतः अशिष्ट या अशालीन की श्रेणी में आ जाएगा । इसीलिए अभद्र के अर्थ में ही हमेशा बेहुदा शब्द का प्रयोग होता है ।
सेमिटिक धातु हा-दा-ये (h-d-y) से बने कुछ और शब्द भी हैं जो इसी शब्दार्थ शृंखला से जुड़े हैं जैसे हादी । हिन्दी में हादी अल्प प्रचलित मगर जानी पहचानी टर्म है । हादी का अर्थ है पथप्रदर्शक, मार्गदर्शक, नेता, अगुवा, प्रमुख, गुरु आदि । हादी एक उपाधि भी थी । इस्लाम धर्म के तहत धार्मिक आध्यात्मिक शिक्षाएँ देने वाले प्रमुख व्यक्ति को हादी कहा जाता था । मिर्ज़ा हादी रुस्वा पिछली सदी में उर्दू-फ़ारसी के मशहूर लेखक हुए हैं । उनकी लिखी उमराव जान अदा पुस्तक बहुत आज भी लोकप्रिय है । इस पर एक मशहूर फिल्म भी बन चुकी है । राह दिखाना दरअसल सिर्फ़ हाथ से किसी दिशा में जाने का इशारा भर करना नहीं होता । पथप्रदर्शक दरअसल ज़िंदगी जीने का ढंग सिखाता है । वह नसीहत देता है, परामर्श देता है । अपने अनुभवों का निचोड़ बताता है और उस पर आधारित दिशा-निर्देश देता है ।
हुदा की कड़ी में खड़ा है अरबी का हिदाया शब्द जिसका उर्दू, फ़ारसी और हिन्दी रूप है हिदायत जिसका अर्थ है निर्देश, संचालन, सलाह या परामर्श । हिदायत हिन्दी में खूब प्रचलित है । उर्दू में हिदायत का बहुवचन हिदायात बनता है जबकि हिन्दी में हिदायतों या हिदायतें जैसे रूप बनते हैं । “हिदायत करना”, “हिदायत देना” जैसे वाक्यांशों का आशय किसी ज़माने में जीवन-दर्शन के बारे में बताना था । इसके धार्मिक या आध्यात्मिक आशय एकदम स्पष्ट थे । अब सामान्य परामर्श या निर्देश के तौर पर हिदायत शब्द का प्रयोग होता है । इसीलिए अब हिदायतें भी बेहुदा होने लगी हैं । जिस तरह हुदा शब्द अरबी का प्रसिद्ध स्त्रीवाची संज्ञानाम है उसी तरह हादी पुरुषवाची संज्ञा है । हिदायत का प्रयोग भी पुरुषवाची संज्ञानाम की तरह होता है जैसे हिदायतअली, हिदायतउल्ला या हिदायतखाँ ।

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Sunday, July 1, 2012

‘दीन’ में समाया ‘ध्यान’ [2]

पिछली कड़ी-‘दीन’ में समाया ‘ध्यान’ [1] से आगेworld-religions2

मे केंजी के पहलवी कोश के अनुसार जरथ्रुस्ती साहित्य में उल्लेखित ‘दाएना-वंगुही’ का विपर्यय होकर ‘वेह-दीन’ शब्द सामने आया और फिर इसका रूप वेह-दीन > विहदीन > बिहदीन हो गया । हालाँकि फ़ारसी के ‘बिह’ का अधिकांश रूप ‘बेह’ उच्चारा जाता है । गौरतलब है कि ‘बेह’ का अर्थ भी फ़ारसी में अच्छा होता है और इसके जन्मसूत्र वैदिक भाषा के ‘भद्र’ से जुड़े हैं । बेहतर, बेहतरीन वाला ‘बेह’ भद्र से निकला ‘बेह’ है । अवेस्तन डिक्शनरी के अनुसार वंगुही का अर्थ है भला, अच्छा, सदाचारी, अच्छी चीज़ वगैरह और इससे निकला ‘बिह’ भी ‘बेह’ के रूप में सामने आया । ‘बेह-दीन’ से यह स्पष्ट है । जॉन प्लैट्स के मुताबिक ‘दाएना’ का मूल अवेस्ता की ‘दी’ धातु है जो संस्कृत ( या वैदिक ) शब्दावली के ‘धी’ का प्रतिरूप है । वैदिक ‘धी’ में मूलतः चिन्तन, विचार, ध्यान, मेडिटेशन जैसे भाव हैं । मोनियर विलियम्स कोश के मुताबिक ‘धी’ स्वतंत्र शब्द है, धातु नहीं और उसका मूल ‘धा’ है जिसमें रखने, धारण करने के साथ-साथ उपरोक्त सारे भाव हैं ।
मेरे विचार में अवेस्ता के ‘दाएनम’ शब्द को वैदिक भाषा के ‘ध्यानम्’ के समतुल्य देखना चाहिए । जेनी रोज़ की “जोरास्टरियनिज़्म: एन इंट्रोडक्शन” में ‘दाएनम’ का रिश्ता ऐसी धातु से सम्भावित बताया है जिसमें परख (अन्तर्चक्षुओं से) का भाव है और इस तरह ‘दाएना’ शब्द में धार्मिक अन्तर्ज्ञान का भाव आता है । गौरतलब है कि जॉन प्लैट्स, अवेस्ताई धातु दी = धी ( वैदिकी ) की बात करते हैं, जबकि वामन शिवराम आप्टे ‘धी’ की धातु ‘ध्यै’ बताते हैं जिसका अर्थ है सोचना, चिन्तन करना, मनन करना आदि । ‘ध्यै’ से बने ‘ध्यानम्’ में इन्हीं सब भावों के समावेश से जो अर्थ उभरता है, वह है दिव्य अन्तर्ज्ञान या अन्तर्विवेक । इसी तरह 1860 में प्रकाशित “आइरिश ग्लॉसेसः मिडाइवल ट्रैक्ट ऑन लैटिन डिक्लैंशन” में आइरिश प्राच्यविद् डॉ रुडोल्फ़ थॉमस सीगफ्रीड के हवाले से ‘दाएना’ की धातु भी ‘ध्यै’ ही बताई गई है । ‘ध्यानम्’ और अवेस्ता के ‘दाएनम’ में ध्वनिसाम्य और अर्थसाम्य यहाँ समतुल्य हैं और इनमें व्युत्पत्तिक रिश्ता भी नज़र आ रहा है ।
‘मज़हबी’ के संदर्भ जिस तरह ‘धर्म’ से ‘धार्मिक’ बनता है उसी तरह ‘दीन’ से ‘दीनी’ शब्द बनता है । मैंकेन्जी के कोश में पहलवी के ‘दैनीग’ शब्द का उल्लेख जिसका अर्थ ‘दीनी’ यानी धार्मिक है । मेरे विचार में यह वैदिक ‘ध्यानिक’ का सहोदर है जिसका अर्थ धार्मिक (आचार) होता है । वामन शिवराम आप्टे के कोश में ‘ध्यानिक’ का अर्थ है “सूक्ष्म चिन्तन से प्राप्त” ( आचार, विचार, नीति ) । गौरतलब है बौद्धधर्म के प्रभाव में ‘ध्यान’ शब्द का प्रसार अलग-अलग रूपों में पूर्वी देशों में हुआ । चीनी, तिब्बती, कोरियाई, वियेतनामी और जापानी में ‘ध्यान’ के विविध रूप मौजूद है । बौद्ध विचार-सरणी में ‘ध्यान’ शब्द में व्यापक विस्तार हुआ और सूक्ष्म चिंतन का भाव भी इसमें शामिल हुआ । भगवान बुद्ध ने ध्यान के ‘ञ्झान’ या झान रूप को ग्रहण किया । गौरतलब है कि अधिकांश बौद्ध साहित्य पालि भाषा में ही है और उनमें ध्यान के लिए ‘ञ्झान’ रूप ही मिलता है । राजेशचंद्रा लिखित बुद्ध का चक्रवर्ती साम्राज्य पुस्तक के अनुसार बुद्ध ने जिस ‘ञ्झान’ का प्रयोग किया, कालांतर में पंडितो नें उसका परिष्कार कर उससे ‘ध्यान’ बना लिया।
भारत से पूर्व दिशा में सबसे पहले बौद्ध धर्म चीन पहुँचा जहाँ ञझान का रूप ‘चियान’, ‘चान’ अथवा ‘चा’आन’ हुआ जिसने एक पंथ का रूप लिया। ‘ञ्झान’ के कोरियाई भाषा में भी ‘सिओन’, ‘सोन’ अथवा ‘सॉनजान’ जैसे रूप बने। वियतनामी में ‘ञ्झान’ का रूप हुआ ‘थियेन’ और जापानी में यह ‘ज़ेन zen’ हो गया । बौद्ध धर्म के उपपंथ के रूप मे आज दुनियाभर में ‘ज़ेन’ को ही सर्वाधिक जाना जाता है । स्पष्ट है कि वैदिक शब्दावली ‘ध्यै’ से ‘ध्यानम्’ और इसके समकक्ष अवेस्ता के किसी पूर्वरूप ‘ध्यै’ से अवेस्ताई शब्दावली के ‘दाएनम’ का जन्म हुआ । पंथ, मार्ग, विचार-सरणी, चिन्तन-धारा, अन्तर्चेतना, अन्तर्ज्ञान और अन्ततः धर्म के रूप में इस ‘दाएनम’ से ‘दाएना’, ‘दैन’ और फिर ‘दीन’ जैसा रूपान्तर हुआ । इसी रूप का प्रसार अरबी में भी हुआ । अरबी नामों के साथ अन्तिम सर्ग के रूप में ‘दीन’ शब्द का प्रयोग आम है जैसे ‘अल-दीन’ या ‘उद-दीन’ और इसमें “ जिस पर भरोसा हो” इनसे बने नाम भारत में जाने पहचाने हैं जैसे अलाउद्दीन, मुईनुद्दीन, अमीनुद्दीन, आलमुद्दीन आदि ।

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Saturday, June 30, 2012

‘दीन’ में समाया ‘ध्यान’ [1]

religion

ए क-सी ध्वनि वाले शब्द भी भिन्न अर्थवत्ता की वजह से भाषा को समृद्ध बनाते हैं । हिन्दी में दो “दीन” बसे हुए हैं । एक “दीन” वह है जिसका साथ देना मानवता का धर्म है । ‘दीन’ यानी दुखी, वंचित, विपन्न व्यक्ति । एक अन्य ‘दीन’ वह है  जिसका पालन कर हम मानवीय बने रह सकते हैं । ‘दीन’ यानी धर्म । पहला ‘दीन’ हिन्दी की तत्सम शब्दावली का हिस्सा है और दूसरा ‘दीन’ विदेशज शब्दावली में शामिल है । अक्सर ईमानदारी, नैतिकता को अभिव्यक्त करते हुए हम “दीनो-ईमान” और “दीन-धर्म”, “दीन-मज़हब” जैसे मुहावरों का प्रयोग करते हैं । “दीन-दुनिया” भी ऐसा ही मुहावरा है जिसका अर्थ है धर्म और समाज । तात्पर्य यह कि जीवनयापन करते हुए धर्म और समाज दोनो का ध्यान रखना । जो ऐसा नहीं करता, उसे गाफिल, बेफिक्र, बेगाना, बेहोश, पागल समझा जाता है । ऐसे लोगों के बारे में ही “दीन-दुनिया का होश न रहना” जैसा मुहावरा कहा जाता है । हिन्दी शब्दसागर में “दीन-दुनिया” का अर्थ लोक-परलोक बताया गया है, जो मेरे विचार में सही नहीं है । इन सभी मुहावरों में ‘दीन’ शब्द बराबर मौजूद है जिसमें नैतिक कर्तव्य या धर्म का भाव है और प्रस्तुत आलेख में इसी ‘दीन’ की बात होगी ।
शब्दकोशों में ‘दीन’ को अरबी ज़बान का बताया गया है । प्लैट्स संकेत करते हैं कि ‘दीन’ का रिश्ता सम्भवतः पहलवी के ‘देन’ dēn से हो सकता है जबकि रज़ाकी के कोश में निश्चयपूर्वक ‘दीन’ को फ़ारसी से आयातित शब्द कहा गया है । पारसी साहित्य में दाएनम पद का प्रयोग भी धर्म के अर्थ में में हुआ है जिससे दीन का विकास हुआ है । ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की दृष्टि से भी ‘दीन’ शब्द का विकास इंडो-ईरानी भाषा परिवार में हुआ नज़र आता है और अन्य भाषाओं में इसका व्यापक प्रसार हुआ है । धर्म, पंथ, मज़हब, कर्तव्य जैसे अर्थों में ‘दीन’ शब्द की व्याप्ति स्वाहिली, फ़ारसी, हिन्दी, पहलवी, किरगिज़ी, तुर्की, अज़रबैजानी, उज़्बेकी आदि अनेक भाषाओं में है । मेरे विचार में ‘दीन” का रिश्ता संस्कृत के “ध्यानम्” से है या यूँ कहें कि दाएनम और ध्यानम् समतुल्य हैं ।
दरअसल ‘दीन’ शब्द की फ़ारसी में स्वतंत्र अर्थवत्ता है और इसका विकास अवेस्ता के ‘दाएना’ से हुआ जिसमें पंथ, आस्था, मत, भरोसा, धर्म जैसे भाव हैं । इनसाइक्लोपीडिया इरानिका समेत विभिन्न स्रोत इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि ‘दाएना’ पहलवी ज़बान के ‘दैन’ में रूपान्तरित होता हुआ फ़ारसी में ‘दीन’ बना । प्रो.डी. एन. मेकेन्जी की “कनसाइज़ पहलवी डिक्शनरी” में ‘दैन’ (dēn ) का अर्थ रिलीजन दिया हुआ है । कोश में ‘दैन-आस्तवान’ और ‘दैन-बुरदार’ जैसे शब्दयुग्म भी हैं जिनका अर्थ “धर्म में भरोसा रखने वाला” बताया गया है । अवेस्ता के ‘आस्तवन’ शब्द पर गौर करें तो यह संस्कृत के ‘आस्थावान’ का ही रूपान्तर नज़र आता है । मगर इसे संस्कृत ‘आस्थावान’ का रूपान्तर न कहते हुए वैदिक भाषा के ‘आस्थावान’ का सहोदर कहना ज्यादा सही होगा । ‘दैन-आस्तवान’ यानी ‘दीन’ में आस्था रखने वाला । ‘दैन-बुरदार’ का बुरदार वही प्रसिद्ध सर्ग है जो फ़ारसी में ‘बरदार’ (उठाने वाला, थामने वाला) के रूप में हिन्दी के कई प्रचलित शब्दों में नज़र आता है जैसे अलमबरदार या हुक्काबरदार जिसका अर्थ क्रमशः ध्वजवाहक या हुक्का उठाने वाला होता है ।
पारसियों ( प्राचीन ज़रथ्रुस्ती) के साहित्य में “दाएनम वंगुहिम मज़्दायस्निम” पद का उल्लेख आता है । “जोरास्ट्रियन हेरिटेज” में के. ई. एडुलजी बताते हैं कि इसमें ‘मज़्दायस्निम’ का अर्थ है ईश्वर की आराधना । ध्यान रहे, पारसी लोग अहुरमज्द की उपासना करते हैं । ‘मज़्दायस्निम’ में उसका ही उल्लेख है । ‘दाएनम वंगुहिम’ का अर्थ है विवेकयुक्त आस्था । भलीभाँति विचार किया हुआ, सुचिन्तित विश्वास । इस तरह इस पूरे पद का अर्थ हुआ- ईश्वर ( अहुरमज़्द ) की आराधना में सम्यक आस्था । ‘दाएनम् वंगुहिम’ बाद में अवेस्ता में ‘दाएना-वंगुही’ के रूप में ‘उत्तम-धर्म’ के अर्थ में अभिहित हुआ । अवेस्ता का वंगुही पहलवी में ‘वेह’ हुआ । मध्यकालीन फ़ारसी में इसका रूप ‘विह’ और फिर फ़ारसी में ‘बिह’ हुआ । इसी तरह दाएनम > दाएना > दैन होते हुए ‘दीन’ बन गया ।
–अगली कड़ी में समाप्त

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Thursday, June 28, 2012

मंगोल नौकर, तुर्की चाकर [2]

पिछली कड़ी-मंगोल नौकर, तुर्की चाकर [1]

अ ब आते हैं चाकर / चाकुर पर । ‘चाकर’ शब्द हिन्दी में नौकर की तुलना में अल्प प्रचलित है अलबत्ता ‘नौकर-चाकर’ शब्दयुग्म का बहुधा प्रयोग होता है । अकेले ‘चाकर’ का इस्तेमाल हिन्दी की लोकबोलियों में ज्यादा होता है, परिनिष्ठित हिन्दी में कम । दरअसल यह शब्दयुग्म एक व्यवस्था का नाम है जिससे सेवकों के वरिष्ठता-क्रम का पता चलता है । उच्च स्तरीय सेवक ‘नौकर’ के दायरे में आते हैं जैसे मुंशी, गुमाश्ता आदि और निम्नस्तरीय सेवक ‘चाकर’ जैसे रसोइया अथवा माली । मध्यकाल में ‘नौकर’ को मुसाहब समझा जाता था जबकि ‘चाकर’ की श्रेणी में टहलुआ और भृत्य आते हैं । ये अलग बात है कि अब ‘नौकर’ और ‘चाकर’ में कोई अंतर नहीं है ।
हिन्दी साहित्य के इतिहास सम्बन्धी विविध ग्रन्थों में ‘चाकर’ को तुर्की-फ़ारसी मूल का ही बताया गया है । सेवक के अर्थ में ‘चाकर’ का रिश्ता संस्कृत के ‘चक्र’ से किसी ने नहीं जोड़ा है । मराठी में भी ‘चाकर’ शब्द का इस्तेमाल होता है और मित्र, स्नेही, सोहबती जैसे विशिष्ट अभिप्रायों से गुज़रता हुआ यह सेवक, भृत्य में अर्थान्तरित हुआ है । ईरानदोख़्त और विकीपीडिया के मुताबिक घरेलु सेवक को ‘चाकर’ बताया गया है और हिन्दी में इसकी आमद फ़ारसी से हुई है । ‘चाकर’ शब्द हिन्दी में नौकर जितना प्रचलित नहीं इसकी गवाही हॉब्सन-जॉब्सन कोश में भी मिलती है । हेनरी यूल लिखते है कि ‘चाकर’ शब्द का स्वतंत्र प्रयोग अब कम हो गया है । ध्यान रहे यह कोश एक सदी पहले प्रकाशित हुआ था यानी उस वक्त के एंग्लो-इंडियन समाज में ‘चाकर’ शब्द का प्रयोग कम हो चुका था, अलबत्ता ‘नौकर-चाकर’ मुहावरा आज की तरह ही ठाठ से डटा हुआ था ।
ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा 1855 में प्रकाशित और एच.एच. विल्सन द्वारा सम्पादित ‘ए ग्लॉसरी ऑफ जुडिशियल एंड रेवेन्यु टर्म्स’ में चक्र से सम्बन्धित गोल, घेरा, दायरा जैसे अर्थों वाले अनेक शब्द दर्ज़ हैं जैसे चकबंदी, चक, चकबंदी, चाक, चकरी, चकली, चाकी, चक्का आदि । इसी सूची में शामिल ‘चाकर’, ‘चाकुर’ का इन्द्राज भी मिलता है जिसे फ़ारसी मूल का बताते हुए इसका अर्थ सेवक दिया गया है । मुग़ल दौर में बंगाल प्रान्त की राजस्व व्यवस्था में करमुक्ति के संदर्भ में ‘चाकरान’, ‘पीरान’, ‘फ़क़ीरान’ जैसी शब्दावलियाँ थीं जिसका आशय ऐसी ज़मीनों की आय को करमुक्त करने से था जिनसे चाकरों, पीरों या फ़कीरों का पोषण होता था । ‘नुकुर’ या ‘नौकर’ की तर्ज़ पर ही तुर्की ‘चाकुर’ में भी योद्धा का ही भाव है । याकोव लेव सम्पादित ‘वार एंड सोसाइटी ऑफ़ ईस्टर्न मेडिटरेनियन’ में कहा गया है कि मंगोल ‘नुकुर’ की तरह ही तुर्की में ‘चाकुर’ शब्द का प्रयोग सरदार के प्रमुख योद्धा, सहयोगी अथवा अंगरक्षक होता था ।
एलेना बोइकोवा और रोस्तीस्लाव रिबाकोव लिखित ‘किनशिप इन द आल्ताइक वर्ल्ड’ में ‘चाकुर’ शब्द पर विस्तार से चर्चा की है । ‘चाकुर’ शब्द चीनी मूल से उठकर तुर्की में आया और फिर सोग्दियन भाषा के जरिये ईरान की अन्य ज़बानों में भी गया । सोग्दियन भाषा तुर्को-ईरानी परिवार की प्राचीन भाषा है । ‘चाकुर’ का अर्थ है खाकान की रक्षा करने वाला प्रमुख बहादुर योद्धा या अंगरक्षक । ‘नुकुर’ की ही तरह ही कभी कभी ‘चाकुर’ भी राजवंश से जुड़े लोग ही होते थे और उन्हें खाकान के खास सहकारी की जिम्मेदारी दी जाती थी । धीरे धीरे यह संस्था कमजोर होती गई । ‘नुकुर’ जैसा हश्र ही ‘चाकुर’ का भी हुआ । खुद को ‘चाकुर’ कहने में गौरव महसूस करने वाले कुछ समूह आज भी अफ़गानिस्तान, ईरान, उत्तर – पश्चिमी पाकिस्तान में हैं ।
बलूचिस्तान के लोग पंद्रहवीं सदी में हुए महान बलूच योद्धा मीर ‘चाकुर खान’ को देवता की तरह पूजते हैं । यहाँ का रिन्द कबीला खुद को ‘चाकुर’ या ‘चाकर’ कहता है । ये लोग जबर्दस्त लड़ाके होते हैं । पंद्रहवीं सदी के इस महान नायक का नाम ‘चाकर खान’ या ‘चाकुर खान’ उसी तरह है जिस तरह तुर्की शब्द ‘बहादुर’ का प्रयोग होता है । चाकर एक सम्बोधन, उपाधि या पद था इसका पता इससे भी चलता है कि बलूचियों ने उसे ‘चाकरे-आज़म’ भी कहा जाता है । अर्थात चाकरों में सर्वश्रेष्ठ । ज़ाहिर है चाकर अगर चक्र से जन्मा और चक्कर लगाने को अभिषप्त सेवक है तो उनके मुखिया के लिए ‘चाकरे-आज़म’ जैसा नाम तो लोकप्रिय नहीं होगा । ‘चाकर’ में निहित योद्धा की अर्थवत्ता ही यहाँ उभर रही है । अर्थात ‘नायक योद्धा’ । नाम के साथ गुलाम या दास लगाने की चर्चा ऊपर हो चुकी है । गौर तलब है दायरा, घेरा के अर्थ में बलूच भाषा में भी ‘चाकर’ शब्द की स्वतंत्र अर्थवत्ता है, मगर उसका रिश्ता योद्धा ‘चाकर’ से कहीं नहीं जोड़ा गया है ।
भारत में इस्लामी शासन का सबसे लम्बा दौर मुग़लों का रहा है जो तुर्क़ थे । इतिहास की किताबों में दर्ज़ है कि बाबर के खानदान में फ़ारसी नहीं बल्कि तुर्की बोली जाती थी । मुग़ल शब्द मंगोल का अपभ्रंश है । स्पष्ट है कि मुग़ल कुटुम्ब तुर्क़ और मंगोल जातीय पहचानवाला था । ज़ाहिर है मंगोलों की ‘नुकुर’ और उसी तर्ज़ पर बनी तुर्कों की ‘चाकुर’ जैसी संस्थाओं की अलग पहचान मुग़लों के यहाँ एक हो गई और कालान्तर में सेवकवर्ग के तौर पर ‘नौकर-चाकर’ का प्रयोग मुग़लों ( सीमित अर्थ में शासक परिवार नहीं, वरन समूचा मुग़ल समाज ) के यहाँ हुआ । इसी मुहावरेदार अर्थवत्ता को हिन्दी की पूर्ववर्ती शैलियों ने भी अपनाया । यह नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दी के बुनियादी शब्द भण्डार में अरबी, तुर्की, फ़ारसी के शब्द बड़ी संख्या में हैं । आम हिन्दी भाषी के लिए इनकी शिनाख़्त करना आसान नहीं है और इसकी ज़रूरत भी नहीं है । साहब, हजूर, फिकर, बाजू, मरजी, हाजिरी जैसे कितने ही शब्द मध्यकालीन कवियों की रचनाओं में रवानी के साथ इस्तेमाल हुए हैं । मलिक मोहम्मद जायसी ने ‘पद्मावत’ महाकाव्य फ़ारसी लिपि में लिखा था । सिर्फ़ इस वजह से उसे फ़ारसी साहित्य की कृति तो नहीं मान लिया गया ? पद्यावत हिन्दी साहित्य का स्तम्भ है । इसी तरह चौदहवीं सदी में हुए मीरा या कबीर के साहित्य में चाकर शब्द का प्रयोग मिलता है तो सिर्फ़ इसी वजह से इसे हिन्दी आधार से उपजा नहीं कहा जा सकता ।
भारतीय संदर्भों में ‘चाकर’ के विदेशज मूल का होने के बारे में सबसे पुख़्ता साक्ष्य ख़ुसरो की ‘ख़ालिकबारी’ से मिलता है । अमीर खुसरो के साहित्यिक व्यक्तित्व की पहचान सिर्फ़ कवि की नहीं है बल्कि वे एक कोशकार भी थे । फ़ारसी-तुर्की और हिन्दी का छंदबद्ध कोश ‘खालिक-बारी’ अब निर्विवाद रूप से खुसरो की रचना माना जाता है । हिन्दी कोशों की परम्परा में यह काफ़ी पुराना कोश है । करीब बारह सौ शब्दों के अर्थ बताने वाले इस कोश का निर्माण खुसरो ने तेरहवीं सदी में किया था । सन् खुसरो का जन्म ईस्वी 1252-53 माना जाता है । खुसरो के पिता तुर्क थे जबकि माँ एक नवमुस्लिम मगर मूलतः हिन्दू आचार-विचार वाले परिवार से ताल्लुक रखती थीं जहाँ हिन्दी का चलन था । खुसरो के नाना अमादुल्मुल्क ने इस्लाम कुबूल कर लिया था । अपने नाम के आगे वे राजपूतों की उपाधि रावल लगाते थे । यहाँ हम खालिक-बारी, अमीर खुसरो और उनके परिवार के बारे में जिन तथ्यों का ज़िक्र कर रहे हैं, चाकर को तुर्की-फ़ारसी मूल का सिद्ध करने के संदर्भ में उनका महत्व है ।
खालिक-बारी में ‘चाकर’ शब्द के बारे में भी खुसरो ने लिखा है- दूद काजल सुर्मह् अंजन कीमत मोल । चाकर सेवक बंदह चेरा क़ौल सो बोल ।। इस पद की व्याख्या में खुसरो ने चाकर शब्द को फ़ारसी का बताया है । देखें- [ दूद ( फ़ा., धुआँ, धुंध) = काजल (सं. कज्जल) सुर्मह् ( फ़ा., सुर्मा ) = अंजन (हिन्दी)। क़ीमत ( अरबी ) = मोल ( हिं. सं. मूल्य) । चाकर (फ़ा. नौकर ) = सेवक ( हिं )। बंदह् ( फ़ा. सेवक) = चेरा ( हिं. सेवक ) । क़ौल ( अर., वचन = बोल ( हिं.) ] कुछ पीढ़ियों से भारत आकर बस चुके और उस दौर के अरब, तुर्क और ईरानी लोगों के लिए भारतीय परिवेश में संवाद स्थापित करने के लिए बोलचाल की ज़बान जानना ज़रूरी था । खालिक-बारी मूलतः ऐसे ही लोगों के लिए की गई रचना थी । गौरतलब है कि तेरहवीं सदी में खुसरो इस अनूठे कोश में चाकर शब्द को बतौर सेवक का पर्याय समझा रहे थे, यह समझना मुश्किल नहीं है कि उस वक्त की हिन्दी ( लोकबोली ) में ‘चाकर’ की रच-बस नहीं हुई थी ।
यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि खुसरो अपने ननिहाल से हिन्दू संस्कारों वाले थे । उनके नाना नवमुस्लिम थे और उनका पूरा परिवार रावल उपनाम लगाता था । ज़ाहिर है ख़ुसरो खूब जानते थे कि कौन सा शब्द हिन्दी का है और कौन सा फ़ारसी का । उस ज़माने में चाकर शब्द आमफ़हम नहीं था इसीलिए खालिकबारी में खुसरो नें सेवक शब्द से परिचय कराने के लिए तुर्की-फ़ारसी के चाकर को चुना जो कि उस दौर के तुर्क-मुस्लिमों में आम चलन में था । यह कहा जा सकता है कि क्या ख़ुसरो चाकुर के तुर्की मूल को नहीं जानते थे जो उन्होंने इसे फ़ारसी शब्द बताया है । इस पर इतना ही कह सकते हैं कि खुसरो विद्वान थे पर भाषा विज्ञानी नहीं । सदियों पहले तुर्की से फ़ारसी में आ बसे इस शब्द को उन्होंने फ़ारसी का ही माना है । इसके उलट देखें कि ‘चाकर’ भी हिन्दी और ‘सेवक’ भी हिन्दी का शब्द है तब खालिकबारी में ख़ुसरो किस शब्द से और आखिर किसे परिचित करा रहे थे ?

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मंगोल नौकर, तुर्की चाकर [1]


नौ कर-चाकर या “नौकरी-चाकरी” हिन्दी के बहुप्रयुक्त शब्दयुग्म है । आमतौर पर इसे विदेशज और देशज शब्दों के मेल से बना संकर युग्म माना जाता है । कई शब्द विदेशी मूल के होते हुए भी दूसरी भाषाओं में इतने समरस हो जाते हैं कि रूप-संरचना के आधार पर उनमें भिन्नता नज़र नहीं आती । ‘चाकरी’ भी हिन्दी का अपना तद्भव या देशज शब्द ही जान पड़ता है । ‘नौकर’ शब्द तो पहली नज़र में ही अरबी-फ़ारसी मूल का नज़र आता है जबकि ‘चाकर’ शब्द को देशज समझा जाता है । दरअसल इस शब्दयुग्म के में भिन्न-भिन्न भाषाएँ हैं । ‘नौकर-चाकर’ का पहला सर्ग मंगोलियाई भाषा का है और इसका मूल ‘नुकुर’ है तो दूसरा सर्ग ‘चाकर’ तुर्किश ज़बान का शब्द है जिसका मूल ‘चाकुर’ है । फ़ारसी में आकर दोनों शब्दों का रूप ‘नौकर’, ‘चाकर’ हुआ । हिन्दी में ये दोनों ही शब्द बरास्ता फ़ारसी आए । इसीलिए हिन्दी, अंग्रेजी, सिन्धी, मराठी आदि अधिकांश शब्दकोशों में इन्हें फ़ारसी का बताया गया है । मेरी स्पष्ट मान्यता है कि नौकर और चाकर मंगोल और तुर्क कबीलों की सैन्य शब्दावली से अर्थान्तरित शब्द है ।

कई लोग ‘चाकर’ को भारतीय मूल का समझते हैं और ऐसा समझने के पीछे ‘चाकर’ की ‘चक्र’ से सादृश्यता है । ‘चक्र’ से बने ‘चाक्रिक’, ‘चक्कर’, ‘चकरी’, ‘चाकोर’, ‘चाकर’ जैसे शब्द संस्कृत, हिन्दी, मराठी, बलूच या फ़ारसी मं मौजूद हैं जिनमें कुम्हार, घेरा, घुमाव, फिरकनी, गोलाकार, जैसे भाव हैं । सेवक अपने स्वामी द्वारा सौपे गए कामों को अंजाम देने के लिए उसके इर्द-गिर्द चक्करघिन्नी बना रहता है इस भाव को लक्ष्य कर चक्र से ‘चाकर’ ( सेवक ) का रिश्ता जोड़ा जाता है, जबकि ‘चाकर’ ( सेवक ) की अर्थवत्ता इससे अलहदा है । अपने मूल रूप में ‘चाकुर’ यानी ‘चाकर’, सेवक नहीं बल्कि मित्र, सखा और स्वयंसेवक है । तुर्की ‘चाकुर’ दरअसल मंगोलियाई ज़बान के ‘नुकुर’ की तर्ज़ पर बना है । ‘चाकर’ को समझने के लिए मंगोल शब्द ‘नुकुर’ यानी ‘नौकर’ को जान लेना ज़रूरी है ।
विभिन्न संदर्भ बताते हैं कि मंगोलियाई ‘नुकुर /नोकोर’ की तर्ज़ पर ही तुर्की के ‘चाकुर / चाकर’ का जन्म हुआ है । कहीं कहीं इसका उच्चारण ‘चाकोर’ भी है । मंगोल भाषा के ‘नुकुर [ nukur / nokor- प्रोटो मंगोलियन रूप । Nuokur- औपनिवेशिक इंग्लिश ] में बंधु, सखा, मित्र का भाव है । संस्थागत रूप में इसका बहुवचन नोकोद ( nokod ) होता है । प्राचीन मंगोल कबीलों के सैन्य ढाँचे में ‘नूकुर’ का अर्थ विस्तार हुआ और इसमें मित्र-योद्धा का भाव समाहित हुआ । बाद में इसमें अंगरक्षक या निजी सहायक का आशय समाहित हुआ और धीरे-धीरे इस शब्द (नुकुर) ने एक ऐसी संस्था का रूप ले लिया जो मंगोल कबीलों के सामाजिक ढाँचे का महत्वपूर्ण हिस्सा थी । ये लोग मूलतः स्वतंत्र योद्धा होते थे खुद को खाकान की सेवा में समर्पित करते थे । मंगोल कबीलों के सरदार को खाकान कहा जाता । प्रत्येक ख़ाक़ान के साथ अनुयायियों का जमावड़ा लाज़मी था जिसमें पारम्परिक तौर पर उसकी माँ और पत्नी के पक्ष के रिश्तेदार खास होते थे । मगर कुछ समर्थक कुटुम्बी न होकर सामान्य जन होते थे । सरदार के प्रति निजी आस्था के चलते वे उसके नज़दीकी दायरे में आ जाते थे । ऐसे लोगों को ‘नुकुर’ या ‘नोकोर’ कहा जाता था । अमेरिकी अध्येता लुईस एम.जे. शर्म “ द मंगर्स ऑफ द कान्सु-तिब्बतन फ़्रन्टियर ” में लिखते हैं कि इस वर्ग के लोग स्वेच्छा से खाकान को अपनी सेवाएँ समर्पित करते थे । इनमें गुलाम भी हो सकते थे और युद्बबंदी भी । वैसे आमतौर पर ये स्वयंसेवक होते थे और युद्ध के दौरान हरावल दस्ते की तरह सबसे आगे चलते थे । चंगेज़ खान के दौर तक नुकुर / नोकोर परिपाटी ने संस्थागत रूप ले लिया था और नोकोर वर्ग के लोग राज्य में उच्चपदों पर तैनात थे । कई नुकुर /नोकोर तो सूबेदार का ओहदा तक पा लेते थे ।
नुकुर /नोकोर शब्द की व्याप्ति समूचे आल्ताइक भाषा परिवार में है और सभी में इसका आशय सखा, बंधु या अंगरक्षक का है जैसे तातार भाषा में यह नुगर है । उज्बेकी में यह नागार है जहाँ इसका अर्थ या तो खाकान का निजी सहायक है अथवा अथवा विवाह के दौरान दूल्हा-दुल्हन का बन्नायक या बेस्टमैन । तुर्किक भाषा में यह नावकर या नुकुर है जिसमें सेवक का भाव है । रशियन स्टेट यूनिवर्सिटी के एटिमोलॉजिकल डेटाबेस में संग्रहित तुर्की भाषा विज्ञानी बत्तल अप्तुल्लाह के तुर्की और मंगोल व्युत्पत्ति कोश “इब्नु मुहेन्ना लुगाती” के मुताबिक समूचे मंगोल क्षेत्र की विभिन्न भाषाओं मसलन-खाल्खा, बुरिअत, कल्मुक, ओर्दोस, दोम्खियन,बओअन, दागुर, शारी-योघुर और मंगर आदि प्रमुख भाषाओं में नुकुर /नोकोर की व्याप्ति है । गौरतलब है कि मंगोल प्रभावित क्षेत्र एशिया के सुदूर दक्षिण साइबेरिया, उत्तरी चीन से लेकर मध्यएशिया और पूर्वी यूरोप के हंगरी तक फैला है ।
औपनिवेशिक काल के एंग्लो-इंडियन समाज और कंपनीराज में जो शब्द प्रचलित थे उनका उनका संग्रह हेनरी यूल के कोश ‘हॉब्सन-जॉब्सन’ में है । इसके मुताबिक ‘नौकर’ शब्द तुर्की मूल का है । हेनरी यूल जर्मन भाषाविद् इसाक जेकब श्मिट (1779 –1847) के हवाले से बताते हैं कि ‘नौकर’ शब्द मंगोल मूल के ‘नुकुर’ से निकला है जिसका अर्थ स्वयंसेवक, मित्र या आश्रित है । मंगोल-तुर्क क्षेत्र से लगते सोग्दियाना जैसे उत्तर-पूर्वी ईरान के लोग इससे पहले से ही परिचित थे ।इसका सर्वाधिक प्रसार चंगेज़ खान के सामरिक अभियानों के दौरान ही हुआ । चंगेज की अधीनता स्वीकारने वाले सरदारों को ‘नुकुर’ का दर्जा मिला । यह लगभग अरबी के गुलाम और माम्लुकों जैसा मामला था जो अधीनस्थ होते हुए भी ऊँचे ओहदे पर थे । भारतीय ‘दास’ शब्द को भी इसी कड़ी में देख सकते हैं । रामदास, रामसेवक, रामगुलाम जैसे नामों से ज़ाहिर है कि ये नाम सर्वशक्तिमान की अधीनता की महिमा बतलाने के लिए बनाए गए । मेरे विचार में उच्चवर्ग के इस शब्द का उपहासात्मक प्रयोग आम लोगों में शुरु हुआ । बाद में मित्रयोद्धा, सहकारी, अंगरक्षक, सहचर की अर्थवत्ता वाला यह शब्द सिर्फ़ सेवक के अर्थ में रूढ़ हो गया । ‘नौकर’ से बने ‘नौकरी’ शब्द में असम्मान का वह भाव नहीं है जो ‘नौकर’ में समझा जाता है । ‘नौकरी’ आज आजीविका-कर्म का पर्याय है जबकि ‘नौकर’ को सिर्फ़ सेवाकर्मी समझा जाता है । अलबत्ता ‘नौकरशाह’ या ‘नौकरपेशा’ शब्दों में इस शब्द का महत्व सुरक्षित है । 

मंगोल नौकर, तुर्की चाकर [2]
[अगली कड़ी में समाप्त]
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