Showing posts with label सम्बोधन. Show all posts
Showing posts with label सम्बोधन. Show all posts

Thursday, December 8, 2016

गुडगाँव पर ‘द्रोण’ कैमरा


अ
च्छा ख़ासा द्रोण था, घिस-घिस कर दोना रह गया। गुरु कितना ही गुरुतर रहा हो, भाषा के अखाड़े में ऐसी रगड़-घिसाई हुई कि जब हिनहिनाकर खड़ा हुआ तो गुड़ हो चुका था। यह भी कौरवी का ही चमत्कार था जिसके दाँव-पेच से चुस्त होकर खरी-बोली भी एकदम से खड़ी हो गई और देशभर में आज तक हिन्दी का झण्डा खड़ा किया हुआ है।

तो ये भाषा के मामले हैं, सियासी चश्मे से समझ नहीं आएँगे। बाकी तो इण्डिया को भारत या जम्बूद्वीप करने के प्रयास भी शुरू हो गए हैं। हम अपने देश भारत का नाम दुष्यन्त-शकुन्तला के बेटे भरत की सन्तति से हट कर अगर ‘भरत’ समूह से जोड़ कर देखेंगे तो शायद ज्यादा बेहतर होगा।


कुछ दिनों पहले क्राइम रिपोर्टर को खबर मिली थी कि मणिकर्णिका घाट पर विदेशियों ने ‘द्रोण’ कैमरे से तस्वीरें उतारी हैं। यह अष्टाङ्गुल ‘द्रोण’ कैमरा इसी रूप में उनकी कलम से भी उतरता रहा। श्रीमानजी बोलते अब भी ‘द्रोण’ ही हैं 😀

बहरहाल, गुड़गाँव के गुरुग्राम हो जाने पर ज्यादा व्याकुल होने की ज़रूरत नहीं है। स्टालिनग्राद और लेनिनग्राद को याद कर लें। आज वोल्गोग्राद और पीटर्सबर्ग नाम ही आबाद हैं। गुड़गाँव का गुरुग्राम तो ख़ैर व्यक्तिपूजा का मामला भी नहीं है, उच्चार का ही प्रबन्ध है।

मराठी वालों का क्या कर लेंगे जो हर नाम बदल देते हैं। 'गोहत्ती' नाम का शहर पहचान पाएं तो जानें। यह असम की राजधानी का नाम है। यही नहीं, लखनऊ को लखनौ लिखा जाता है। यूपी, असम वालों को ऐतराज हो तो हो उनकी बला से !

कुछ लोग तो गुरुग्राम के पीछे कुरुग्राम भी देख सकते हैं। भई कुरुजनपद के सारे ग्राम कुरुग्राम हो सकते हैं। भोलानाथ तिवारी ने कूड़ेभार कस्बे का सही नाम खोज निकाला था। कूड़ेभार को उसके मूल नाम ‘कूचा-ऐ-बहार’ से पुकारे जाने पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है !

इसी तरह पूर्वी उत्तरप्रदेश का जीयनपुर किसी ज़माने में ज्ञानानन्दपुर था और अंग्रेजों ने उसे G.N.PUR कर दिया जो घिस कर जीयनपुर हो गया। अब इसमें ज्ञानानन्दपुर के आनन्दी नागरिकों की क्या गलती जो उन्हें एक सुन्दर नाम से वंचित कर दिया जाए! वे अगर जीयनपुर से खुश हैं तो उसमें भी क्या बुराई !

पश्चिमोत्तर की अनेक बस्तियों को अंग्रेजों ने डीआई खान, डीजी खान जैसे नाम दे दिये थे जो मूलतः डेरा इस्माइल खान या डेरा ग़ाज़ीखान थे। क्या कर लेंगे आप! जयपुर की मिर्ज़ा इस्माइल रोड, एमआई रोड हो जाती है तो क्या लोगों की ज़बान काट लेंगे!

पूरब में मछलीशहर है तो दक्षिण में मछलीपट्टनम है। बात एक ही है। अब क्या दोनों को मत्स्यपुर कर दिया जाए! कुछ सौ साल बाद घिस-घिसा कर मच्छपुर > मछउर > मछौर हो जाएँगे। थोड़ा आगे मैसूर और इधर मछौर! अब एक शायर को तो अपने शहर से क़दर प्यार था कि नाम ही 'सलाम मछलीशहरी' रख लिया।

तो नाम में क्या रखा है। भाषा की टकसाल में छपे नाम सीधे दिलो-दिमाग़ पर दर्ज़ होते हैं। गुड़गाँव हो या गुरुग्राम, जिसे जो बोलना है, ज़बान से वही निकलेगा। अब हमें तो गुड़गाँव के अंग्रेजी हिज्जे Gurgaon के पहले पद में Gurga नज़र आ रहा है। गौरतलब है फ़ारसी के गुर्ग से ही हिन्दी का गुर्गा आया है जिसका अर्थ भेड़िया है। प्रचलित अर्थ में गुर्गा अब भाड़े के बदमाशों के लिए इस्तेमाल होता है।

इससे क्या? बाल की खाल निकालने वाले यह सब करते रहेंगे। गुरुग्राम को द्रोणाचार्य का गाँव माने या गुरु-ग्राम यानी किसी ज़माने का संकुलकेन्द्र मानते हुए उसका गुरुत्व स्वीकारें। गुरु तो गुरु ही रहेगा। चाहे गुड़ हो, शकर। अब पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो गुरु को ‘छिच्छक’ कहते हैं और शिक्षा को सिच्छा। अब बोलिये?

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, September 21, 2016

जलकुक्कड़ और तन्दूरी-चिकन


पि
छली पोस्ट में हमने वामियों के सन्दर्भ में ‘जलकुक्कड़’ का प्रयोग किया जिस पर सफ़र के साथी प्रदीप पाराशर ने जिज्ञासा दिखाई। ‘जलकुक्कड़’ एक मुहावरा है जो आमतौर पर ईर्ष्यालु के सन्दर्भ में इस्तेमाल होता है। यूँ इसमें शक, शंका, कपट, संदेह या डाह करने का भाव है। ‘सौतिया-डाह’ वाली जलन को मुहावरे में भी खूब महसूस किया जाता है। गौर करें, ये सभी भाव अग्नि से जुड़ते हैं। संदेह, शक या शंका दरअसल एक चिंगारी है। ‘डाह’ तो सीधे-सीधे दाह का ही रूपान्तर है। संस्कृत में ‘दह’ का आशय तपन, ताप, अगन, जलन, झुलसन से है।

जलकुक्कड़ में जो जल है वह ज़ाहिर है दाह या जलन वाले ‘जल’ के अर्थ में है न कि पानी वाले अर्थ में। कुक्कड़ यानी मुर्ग़। कुक्कड़ संस्कृत के कुक्कुट का देशी रूप है। कुक्कुट का कुर्कुट रूपान्तर होकर कुक्कड़ बना, ऐसा कृपा कुलकर्णी मराठी व्युत्पत्तिकोश में लिखते हैं। वैसे कुक्कुट से कुक्कड़ बनने के लिए कुर्कुट अवतार की ज़रूरत नहीं। ‘ट’ का रूपान्तर ‘ड़’ में होने से कुक्कुट सीधे ही कुक्कड़ बन जाता है।

जलकुक्कड़ को समझने के लिए “जल-भुन जाना” मुहावरे पर गौर करें। शरीर का कोई अंग आग के सम्पर्क में आने पर झुलस जाता है। जल-भुन वाले मुहावरे में यही जलन है। दूसरा मुहावरा देखिए- “जल-भुन कर कबाब होना”। कबाब एक ऐसा व्यंजन है जिसे सीधे तन्दूर पर या तवे पर खूब अच्छी तरह भूना जाता है। जब ज्यादा ही “अच्छी तरह” भून लिया जाए तो वह जल-भुन कर कोयला हो जाता है, कबाब नहीं रह जाता।

एक अन्य पद देखिए- “तन्दूरी-मुर्ग़”। मुर्ग़े को जब आग पर सालिम भूना जाता है उसे ही तन्दूरी-मुर्ग़ कहते हैं। कहते हैं, ये बेहद लज़ीज़ होता है। अब अगर इसका हाल भी कबाब जैसा हो जाए तो? आशय ईर्ष्याग्नि से ही है। ऐसा आवेग, उत्ताप जो मौन या मुखरता से झलके। इस कुढ़न को ही ये तमाम मुहावरे अभिव्यक्त कर रहे हैं। जलकुक्कड़ में भी यही आशय है।

कई बार पूछा जाता है कि फलाने का क्या हाल है? जवाब आता है कि खबर सुनने के बाद से “तन्दूरी-मुर्ग़” हो रहे हैं। कई लोग जो स्वभाव से दूसरों की खुशहाली देख कर कुढ़ते रहते हैं, हमेशा डाह रखते हैं या अपनी ईर्ष्या का प्रदर्शन करते रहते हैं उन्हें स्थायी तौर पर जलकुक्कड़ का ख़िताब मिल जाता है। वे हमेशा ईर्ष्या के तन्दूर पर जलते रहते हैं। ईर्ष्या की आग जिसमें तप कर कुन्दन नहीं कोयला ही बनता है। ऐसे ही लोगों के लिए हिन्दी में जलोकड़ा या जलोकड़ी जैसे विशेषण भी हैं। कभी कभी सिर्फ़ जलौक भी कह दिया जाता है।

प्रसंगवश बताते चलें कि कुक्कुट दरअसल ध्वनिअनुकरण के आधार पर बना शब्द है। संस्कृत में एकवर्णी धातुक्रिया ‘कु’ में दरअसल ध्वनि अनुकरण का आशय है अर्थात कुकु कुक या कुट कुट ध्वनि करना। कोयल, कौआ, कुक्कुट और कुत्ता में ‘कु’ की रिश्तेदारी है । दरअसल विकासक्रम में मनुष्य का जिन नैसर्गिक ध्वनियों से परिचय हुआ वे ‘कु’ से संबंद्ध थीं। पहाड़ों से गिरते पानी की , पत्थरों से टकराकर बहते पानी की ध्वनि में कलकल निनाद उसने सुना। स्वाभाविक था कि इन स्वरों में उसे क ध्वनि सुनाई पड़ी इसीलिए देवनागरी के ‘क’ वर्ण में ही ध्वनि शब्द निहित है। सो मुर्ग़ का कुक्कुट नामकरण दाना चुगने की ‘कुट-कुट’ ध्वनि के चलते हुआ। अंग्रेजी का कॉक cock भी इसी आधार पर बना है।

इसे भी देखें- कुक्कुट

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, September 16, 2016

हनक यानी उन्माद

उ त्तर प्रदेश और बिहार में 'हनक' शब्द बहुत प्रचलित है। मध्यप्रदेश में इसका बर्ताव नहीं के बराबर है। बाकी बिहार के अरवल से हरियाणा के पलवल तक इसका प्रसार है। 'हनक' का प्रयोग इन इलाकों में आमतौर पर ठसक, हेकड़ी, गर्व, अकड़, अभिमान, दर्प या मद का भाव है। मूल रूप से यह अरबी ज़बान का शब्द है और फ़ारसी के रास्ते हिन्दी में आया है। यह सेमिटिक धातु हा-नून-क़ाफ़ ح نِ ق से बना है जिसमें तेज़ी, तमक, तर्रारी, तैश, रुआब के साथ-साथ रोष, दुश्मनी, उग्रता, आगबबूला या प्रतिशोध जैसे आशय भी हैं। अक्सर अख़बारों में सियासत की गर्मी का बखान करनेवाले सन्दर्भों में इसका प्रयोग देखने को मिलता है। कुर्सी की हनक, सत्ता की हनक, वर्दी की हनक, राजनीति की हनक आदि। इससे हनकी शब्द भी बनता है जिसका अर्थ है गुस्सैल, नाराज़, क्रोधी, प्रतिशोधी, उन्मादी या पागल आदि। किन्तु यह शब्द चलन में नहीं है। गौर करें हनक में मूलतः उग्रता का भाव है और उग्रता एक किस्म की ‘अति’ है जिसे समझदारों ने वर्जित माना है। सत्ता उन्मादी बनाती है। रुआब जब अपने ज़ोर पर होता है तब उन्माद की शक्ल अख़्तियार करता है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, January 1, 2016

साहेब, साहिब, साहिबा


आ म बोलचाल में साहब का अर्थ मान्यवर, श्रीमान या महोदय की तरह होता है। अपने से बड़े, वरिष्ठ और सम्माननीय व्यक्ति को भी साहब कहा जाता है। साहब का सायबा रूप संगी, हमजोली, सहचर को सही ढंग से अभिव्यक्त करता है। दरअसल अंग्रेजी की प्रसिद्ध टर्म फ्रैंड, फ़िलास्फर, गाइड का समन्वय है अरबी का साहिब। दरअसल स्वामी, मालिक, सर्वशक्तिमान जैसे रूढ़ अर्थों में हिन्दी में साहब शब्द का प्रयोग बहुत कम होता है। साहब वह है जो पढ़ा-लिखा है। उच्चाधिकारी है। आदरणीय है।

हिन्दी में साहिब का स्त्रीवाची साहिबा होता है जबकि मराठी में साहेबीण। फ़ारसी में साहिब का साहेब रूप प्रचलित है जबकि तुर्कीश में यह साहिप हो जाता है। मराठी ने फ़ारसी के साहेब को अपनाया। यह साहेब शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे के लिए इस क़दर रूढ़ हो गया कि कई प्रगतिशील खुद को साहब कहलाना पसंद करते हैं, पर जैसे ही उन्हें साहेब कहा जाए तो बिदकते हैं। यह शब्दों का समाजशास्त्र है।

हिन्दी में संग, साथ के लिए सोहबत शब्द भी खूब इस्तेमाल होता है। अरबी/उर्दू में यह सुहबत है। सुहबत की रिश्तेदारी भी साहिब से है क्योंकि दोनों का मूल साद-हा-बा अर्थात ص/ح/ب ही है जिसमें संगत का भाव है। दुनियाभर के तमाम धर्मों में संगत का बड़ा महत्व है। ज़रूरी नहीं कि साथी कोई व्यक्ति ही हो।

संगत के आध्यात्मिक अर्थ हैं। पुस्तकों से लेकर विचारों तक का साथ मनुष्य के जीवन को उत्कर्ष की ओर ले जाता है। यह साथ पथप्रदर्शक होता है। बाइबल, गीता, कुरान अपने अपने धर्मों की पथप्रदर्शक ही हैं। सिख धर्म के प्रमुख ग्रन्थ के साथ साहिब शब्द तो सब कुछ साफ-साफ कह रहा है। ग्रन्थ ही साहिब अर्थात पथप्रदर्शक हैं। वैसे संगी का एक अर्थ जोड़ीदार भी होता है इसलिए सोहबत में संगत के साथ साथ स्त्री-पुरुष का मेल, समागम-सम्भोग जैसे भाव भी हैं।

आज से क़रीब सत्तर साल पहले तक साहब से बने दर्जनों युग्मपद हिन्दुस्तानी में प्रचलित थे जैसे साहिबे-आलम, साहिबे-दौलत, साहिबे-नसीब आदि। मद्दाह साहब के कोश में इस तरह के अस्सी से ज़्यादा युग्मपदों का इंदराज है।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, February 5, 2014

अरे...अबे...क्यों बे...


हि न्दी समाज में यूँ तो ‘अबे’ सम्बोधन को हिकारत के अर्थ में लिया जाता है किन्तु इसका एक अभिप्राय निकटता जताना भी है। आमतौर पर यारी-दोस्ती और भाईचारे में अपनापा दर्शाने के लिए भी ‘अबे’ कहा जाता है। अबे से अ का लोप होकर सिर्फ ‘बे’ रह जाता है। यह भी सम्बोधन है और निकटता दरशाने के लिए प्रयुक्त होता है जैसे क्यों बे, हाँ बे, चल बे, नहीं बे आदि।

भोलानाथ तिवारी के अनुसार अबे सम्बोधनार्थी अव्यय संस्कृत के 'अयि' का रूपान्तर है। वाशि आपटे के मुताबिक यह 'अये' से आ रहा है और विस्मयबोधक अव्यय है। 'अये' में अरे का भी भाव है। कई लोगों का अरे सम्बोधन दरअसल 'अये' ही सुनाई पड़ता है। हिन्दी शब्दसागर 'अयि' रूप की बात लिखता है। हिन्दी में सही रूप 'अबे' है। हिन्दी और अन्य बोलियों में 'अबै' दरअसल अब के अर्थ में बोला जाता है। पंजाबी में ‘अबा-तबा’ भी यही है। हिन्दी में 'अबे-तुबे' करना आम मुहावरा है जिसमें बोलने वाले के अहंकार और किसी को अपमानित करने, हेयता प्रकट करने का भाव रहता है। यह जो तुबे है, अबे का अनुगामी है। अबे से दोस्ती निभाने के लिए बना लिया गया अनुकरणात्मक शब्द है।
‘अरे’ का मूल ‘आर्य’ है ऐसा कहने वाले कई नहीं ‘कुछ’ विद्वान हो सकते हैं। ईमानदारी से कहूँ तो इन में भी मेरे पास सिर्फ डॉ. भगवान सिंह का हवाला ही है जिनका मानना है कि भोजपुरी का अरे तो आर्य का ही बदला हुआ रूप है। अलबत्ता साम्य के आधार पर ‘आर्ये’ से अरे का रिश्ता तार्किक नहीं लगता। संस्कृत से जितना भी थोड़ा-बहुत परिचय है उससे लगता है कि 'आर्ये' स्त्रीवाची सम्बोधन है। सिर्फ़ स्त्रीवाची सम्बोधन से ‘अरे’ अव्यय का बनना तार्किक नहीं। दूसरी बात आर्य से अज्ज > बन ही रहा है। यह तार्किक नहीं लगता कि आर्य या आर्ये से बने अरे का प्रयोग "अरे दुष्ट, अरे मूर्ख, अरे नराधम" में जिस सहजता से हो रहा है वहाँ 'अरे' का आशय आर्य से रहा होगा। जबकि ‘जी’ या ‘अजी’ में जो ‘आर्य’ है उसके आधार पर कभी ऐसे वाक्यों की रचना दिखाई नहीं पड़ती, मसलन-'अजी दुष्ट, अजी मूर्ख' जैसे वाक्य नाटकीयता लाने के उद्धेश्य से या परिहास में, सायास तो कहे जा सकते हैं पर स्वाभाविक तौर पर नहीं। सो ‘अरे’ की रचना में जो आर्य है सम्बोधन उसमें निहित आदर, सम्मान का भाव वाक्य रचना में भी सुरक्षित रहेगा जैसे आर्य से बने ‘अजी’, ‘जी’ अव्यय वाले वाक्यों में यह सुरक्षित नज़र आता है।
उपरोक्त विवेचन को मेरा दुराग्रह न समझा जाए। वैसे भी अपने समय के शीर्ष विद्वान हिन्दी शब्दसागर से जुड़े थे, उसमें भी ‘अरे’ अव्यय के पीछे ‘आर्य’ सम्भावना पर विचार नहीं किया गया है। दरअसल संस्कृत के सातवें स्वर ऋ में एक सम्बोधनकारी अव्यय का भाव भी है जो स्वतंत्र रूप में ‘रे’ सम्बोधन में भी नज़र आता है और इससे ही बने ‘अरि’ में भी भद्र पुरुष का आशय है जो सम्बोधनकारक के रूप में प्रयुक्त हो सकता है। आर्य से अरे की तुलना में ऋ > री > रे या अरि > अरे > रे का विकास ज्यादा तार्किक लगता है। कृ.पां. कुलकर्णी के मुताबिक सम्बोधी अव्यय अरे के मूल में अरि का एकवचन रूप काम कर रहा है जिसका संक्षेप रे भी सम्बोधी अव्यय है। प्राचीन आर्यभाषाओं में इसके ही अपभ्रंश रूप प्रयुक्त हुए हैं। कुलकर्णी यह भी बताते हैं कि संस्कृत में अरि शब्द के दो रूप है नकारात्मक और सकारात्मक। नकारात्मक अरि का मूल सुमेरी शब्दावली का एरि है जिसका अर्थ शत्रु होता है।
‘अरे’, ‘रे’ के बारे में वामन शिवराम आपटे भी संबोधनात्मक अव्यय कहते हुए इसकी व्युत्पत्ति ‘ऋ’ से बताते हैं और इसका प्रयोग अपने से छोटों को सम्बोधित करने में बताते हैं। इसके अलावा इसका इस्तेमाल क्रोध, ईर्ष्या या घृणा को व्यक्त करने में भी किया जाता है। टर्नर भी ‘अरे’ को सम्बोधी अव्यय बताते हैं। वे शतपथ ब्राह्मण का हवाला भी देते हैं। पाली, प्राकृत में भी ‘अरे’ रूप हैं। इसके अलावा उत्तर भारत की अधिकांश भाषाओं में ‘अरे’ की व्याप्ति है।

यह भी देखें- जी हुजूरिया, यसमैन, जी मैन
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, May 30, 2013

ग़फ़लत में ग़ाफ़िल

confuse

क बीर जब कहते हैं कि “रे दिल गाफिल गफलत मत कर, एक दिना जम आवेगा” तब दरअसल वे लोगों से अपनी आत्मा को जगाने की बात कहते हैं । यमलोक से बुलावा किसी भी दिन आ सकता है । जीवन अनित्य है इसलिए अंतरात्मा में ज्ञानजोत जलाने की ज़रूरत है । इसमें ग़ाफ़िल और ग़फ़लत दो शब्दों का प्रयोग किया गया है जो अरबी मूल से आए हैं । कबीर की भाषा सधुक्कड़ी यानी आम आदमी की ज़बान है । कबीर जैसे जनकवि जब ‘गाफिल-गफलत’जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं तो सहज ही समझा जा सकता है कि राज-काज की फ़ारसी भाषा का असर लोकबोलियों पर किस क़दर चढ़ चुका था । देखने की बात यह भी है कि कबीरबानी में गाफिल से बना गफिलाई शब्द भी आता है-“ ऐसा लोग न देखा भाई, भूला फिरे लिए गफिलाई।” यह गफिलाई निश्चित ही उस दौर के समाज में गाफिल का प्रचलित रूप रहा होगा। गाफिल या गफलत के शुद्ध रूप नुक़्ता लगा कर ग़फ़लत और ग़ाफिल बनते हैं ।
ग़ाफ़िल उसे कहते हैं जो बेख़बर हो । हेंस वेर और मिल्टन कोवेन की ए डिक्शनरी ऑफ़ मॉडर्न रिटन अरेबिक के मुताबिक ग़ाफ़िल के मूल में अरबी का ग़फ़ाला ghafala है जिसमें असावधानी, उपेक्षा, लापरवाही, भूल जैसे भाव हैं । इसकी धातु है ग़ैन- फ़ा-लाम (غ-ف-ل) । इससे बने ग़ाफ़िल में आत्मविस्मृत, असावधान, बेख़बर, आत्मलीन, निश्चेत, बेहोश के साथ-साथ काहिल, आलसी जैसी अर्थवत्ता भी है । गौर करें ग़फ़ाला के मूल भाव उपेक्षा या लापरवाही जैसे भावों पर । जो खुद में गुम है, जिसे ज़माने की ख़बर नहीं वह दरअसल कारोबारे-दुनिया की उपेक्षा ही तो कर रहा है । जिसे संसार की परवाह नहीं ऐसा व्यक्ति आत्मलीन योगी भी हो सकता है और अकर्मण्य, आलसी या लापरवाह भी हो सकता है ।
ग़फ़लत का प्रयोग भी हिन्दी में उधेड़बून, उलझन या गड़बड़ी के अर्थ में ज्यादा होता है । “बड़ी ग़फ़लत हो गई”, “ग़फ़लत मत करो”, “वो ग़फ़लत में रहता है” जैसे वाक्यों से यह स्पष्ट हो रहा है । गफ़लत में मूलतः - असावधानी, असतर्कता, बेख़बरी, संज्ञाहीनता, निश्चिष्टता, बेहशी, त्रुटि, भूल, चूक, उपेक्षा, आलस्य, बेपरवाही, काहिली के भाव हैं । ग़फ़ाला में निहित उपेक्षा इस शृंखला के जिस शब्द में सर्वाधिक उभर रही है वह है तग़ाफ़ुल । बोलचाल या लिखत-पढ़त की हिन्दी में तग़ाफ़ुल का इस्तेमाल नहीं होता मगर शेरो-शायरी में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए यह अजनबी भी नहीं है मसलन- “अब उसका तग़ाफ़ुल गवारा करो, मसीहा मसीहा पुकारा करो।” मोहम्मद मुस्तफ़ा खाँ मद्दाह तग़ाफ़ुल के मायने उपेक्षा, बेतवज्जोई, असावधानी, ग़फ़लत, ढील, विलम्ब, देर आदि बताते हैं ।
गफ़लत से बने कुछ ख़ूबसूरत शब्द भी हैं जिनका प्रयोग किया जा सकता है जैसे ग़फ़लतक़दा जिसमें भवसंसार की व्यंजना उभरती है , मगर व्यंग्य के नज़रिए से । बुज़ुर्गों का कहना है कि ये दुनिया गड़बड़झाला ही है । यहाँ सब कुछ बेतरतीब है , सब कुछ उलझा हुआ है । इसे दुरुस्त करने का जिम्मा इन्सान का है, मगर वह खुद ही गफ़लतज़दा यानी असावधान रहता है । इसी तरह सुस्त, आलसी या आदतन असावधान व्यक्ति के लिए ग़फ़लतआश्ना जैसा शब्द भी है और ग़फ़लतपेशा भी। इन्हें हम एहदी, सुस्तशिरोमणी या आलसीराम की उपाधियों से नवाज़ते हैं ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, April 15, 2013

घोंघाबसंत

Garden Snail (Helix aspersa).

आ लसी और महामूर्ख के अर्थ में ‘घोंघाबसन्त’ मुहावरा खूब प्रचलित है। ‘घोंघा’ शब्द भी अपने आप में ‘गावदी’ या ‘घोंचू’ प्रकृति के व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है। गुमसुम या चुपचाप रहने वालों को भी ‘घोंघा’ कहा जाता है। घोंघा के साथ ‘बसन्त’ का मेल चौंकाता है। जिस तरह से गधे के लिए बैसाखनंदन उपमा है क्या उसी तरह घोंघाबसन्त में भी ‘बसन्त’ का तात्पर्य ऋतु से ही है ? चलिए, पहले ‘घोंघा’ की खबर लेते हैं, फिर ‘बसन्त’ की भी सुध ली जाएगी। घोंघा शब्द एक नज़र में अनुकरणात्मक लगता है मगर इसमें अनुकरण का संकेत आसानी से पकड़ में नहीं आता। शब्दकोशों में घोंघा का अर्थ शंख, सीप, कवच, खोल, आवरण आदि है। घोंघा से आशय जोंक जैसे रेंगने वाले उस प्राणी से है जो दलदली, नम भूमि पर या कछारी क्षेत्र में पाया जाता है। यह शंखनुमा कवच में रहता है। चलते समय यह आवरण से बाहर निकलता है मगर इसकी रफ़्तार बहुत सुस्त रहती है। थोड़ी भी हलचल से घबराकर यह फिर अपने खोल में घुस जाता है। घोंघा शब्द में मुख्य आशय उस आश्रय से है जिसमें रेंगने वाला कीड़ा रहता है। यह आश्रय शंखनुमा घुमावदार, उभारदार वलयाकृति वाला होता है।
लिली टर्नर घोंघा शब्द की तुलना घेंघा से करते हैं। ध्यान रहे, घेंघा गले का एक रोग होता है जिसमें कण्ठनाल में एक उभार या गठान जैसा आकार बन जाता है। घोंघा की रचना में भी उभार ही प्रमुख हैं। टर्नर के कोश में घेंटु यानी गला अथवा गर्दन का उल्लेख भी है और इसकी तुलना भी गले के घुमावदार उभार से की गई है। कण्ठ (गला ), गण्ड (उभार, ग्रन्थि), कण्ड (जोड़) जैसे शब्द एक ही कड़ी के हैं। गलगण्ड यानी गले का उभार। कई लोग इसे गले की घण्टी भी कहते हैं। घूर्णन (घुमाव), घूम, घूमना, घण्टा, घण्टी, घट, घाटी जैसे कई शब्दों में इसे समझा जा सकता है। ‘घ’ ध्वनि / वर्ण में निहित घुमाव का भाव घोंघा की सर्पिल गति से भी स्पष्ट है। मराठी में एक साँप का नाम ‘घोण’ है। मोनियर विलियम्स के कोश में भी घोण नाम के सर्प का उल्लेख है। स्पष्ट है कि घोंघा या घेंघा ( गले की ग्रन्थि ) में अनुकरणात्मकता है मगर इसका तार्किक रिश्ता ‘घ’ ध्वनि में निहित घुमाव के आशय से है।
घोंघा के साथ जुड़े बसन्त शब्द को बसन्त ऋतु से न जोड़ते हुए खड़ी बोली के ‘अन्त’ प्रत्यय से बना हुआ शब्द मानना चाहिए जैसे रटन्त। गौरतलब है इस प्रत्यय से अपनी आवश्यकतानुसार मुख-सुख के शब्द बनाए जाते रहे हैं मसलन, घुसन्त, उठन्त, घुमन्त, फिरन्त, चलन्त आदि। किसी विशिष्ट भाव के लिए बनाया गया पद रूढ़ भी हो सकता है। बसन्त के ‘बस’ में बैठने, स्थिर होने का भाव है। ‘बस’ से मराठी में ‘बसना’ क्रिया बनती है जिसका अर्थ है बैठना। हिन्दी का ‘बसना’ कुछ अलग अर्थवत्ता रखता है और इसमें निवास करने, स्थिर होने का भाव है। गुजराती में बैठिए के लिए ‘बेसो’ शब्द है। संस्कृत के वस् में बसने का भाव है और हिन्दी मराठी का बसना, इसी वस् से आ रहा है। आवास, निवास जैसे शब्द इसी मूल के हैं।  मूर्ख की तरह बैठे रहने वाले अर्थ में ‘बसन्त’ इसी तरह घोंघाबसन्त में रूढ़ हो गया होगा, ऐसा लगता है। यह भी सम्भव है कि ‘घोंघाबसन्त’ का अर्थ है वह जो खोल घुस कर बैठा रहे। घरघुस्सू व्यक्ति यान घर में घुस कर बैठे रहने वाले व्यक्ति को भी समाज में अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता। बुद्ध मुद्रा में बैठे रहने वाले व्यक्ति के लिए भी आखिरकार गावदी के अर्थ में ‘बुद्धू’ शब्द रूढ़ हुआ और एकटक ताकते रहने वाले व्यक्ति को ‘मूढ़’ की संज्ञा दी गई।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, March 31, 2013

हथियारों के साथ ‘पंचहत्यारी’

‘पंचहत्यारी’ शिवाजी की सैन्य शब्दावली का एक शब्द है जिससे ऐसा जान पड़ता है मानों इसका रिश्ता पाँच जनों की हत्या करने वाली से हो। दरअसल यह एक विशेषण, पद या उपाधि है जिसका अर्थ है बंदूक, भाला, ढाल, तलवार और तीर-कमान से सज्जित सैनिक या शिकारी पशु। यहाँ अभिप्राय मुख समेत चारों पंजों के ज़रिये शिकार को चीर-फाड़ करने से है। पंच से तो पाँच स्पष्ट है, हत्यारी क्या है ? दरअसल मराठी में हथियार को हत्यार ही लिखते और बोलते हैं। ‘पंचहत्यार’ का तात्पर्य पाँच हथियारों से है। हिन्दी में ‘हत्यार’ का आशय ‘हत्यारा’ से है और हत्यारी यानी हत्या करने वाली स्त्री।
ऐसे ही बनती है। मराठी में हथियार की 'थ' ध्वनि से 'ह' का लोप होकर 'त' शेष रहा। मध्य वर्ण 'य' चूँकि अन्तस्थ व्यंजन है इसलिए 'त' में निहित 'इ' स्वर य से जुड़ गया और 'त' का बर्ताव अर्धव्यंजन की तरह होने से हथियार का देशी रूप ‘हत्यार’ हुआ। उधर हिन्दी का ‘हत्यार’ दरअसल ‘हत्यारा’ से बन रहा है। इसके मूल में ‘हत्या’ है। जिसका अर्थ किसी के प्राण लेना है। संस्कृत के हत से हत्या का रिश्ता जोड़ा जाता है। वैसे वैदिकी में ‘हथ’ शब्द भी है जिसका अर्थ है मारना, जान लेना, धकेलना, वार करना आदि। इस हथ से साबित होता है कि वैदिक संस्कृत में भी हस्त से ‘हथ’ रूप बन चुका था जिसमें हाथ से सम्बन्धित का भाव था। गौर करें हथियार का रिश्ता दरअसल ‘हाथ’ से नज़र आता है। प्राकृत में ‘हत्थ’ शब्द का अर्थ हाथ है। ‘हत्थ’ का संस्कृत या वैदिक रूप ‘हस्त’ है। ये दोनों शब्द हिन्दी के हाथ के पुरखे हैं। हथेली, हथौड़ी, हत्था, हाथी जैसे अनेक शब्दों के मूल में हस्त ही है। ‘हथिया’ में ‘आर’ प्रत्यय लगने से हथियार बना जिसमें ऐसे उपकरण का आशय है जिसे हाथ में पकड़ कर या हाथों से फेंक कर कोई काम किया जाए या किसी पर घात किया जाए। मूलतः हथियार में शस्त्र का भाव है।
हथियार हिन्दी का बहुप्रयुक्त शब्द है। शस्त्रास्त्रों के लिए इसका इस्तेमाल आम है। मराठी में इसकी प्रकृति बदल गई और यह ‘हत्यार’ हो गया। हथियार से जुड़े कई मुहावरे प्रचलितहैं जैसे हथियार डालना यानी पराजय स्वीकार करना, हथियार चलाना यानी लड़ाई छेड़ना, हथियार बांधना या हथियार लगाना यानी संघर्ष के लिए सुसज्ज होना। चलताऊ या बाज़ारू हिन्दी में ‘हथियार’ शब्द का प्रयोग पुरुष जननेन्द्रिय के लिए भी होता। हथिया से ही ‘हथियाना’ क्रिया भी बनती है जिसका अर्थ है जबर्दस्ती कब्ज़ा करना, अपने स्वामित्व में लेना आदि।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, March 10, 2013

‘बिलंदर’ की बुलंदी

buland

प त्रकार एम. हुसैन ज़ैदी की मुंबई माफ़िया पर लिखी क़िताब डोंगरी टू दुबई मराठी अनुवाद पढ़ते हुए एक नए शब्द से साबका पड़ा- बिलंदर। दाऊद इब्राहिम के अंडरवर्ल्ड में बढ़ते असर के संदर्भ में उसे बिलंदर कहा गया। कुछ कुछ अंदाज़ तो था कि इस बिलंद का हिन्दी-फ़ारसी के बुलंद से रिश्ता होना चाहिए। जिसमें पक्का, परम, कारगुज़ार, कद्दावर, असली जैसी अर्थवत्ता है। फ़ारसी शब्द चोला बदल कर जिस तरह से मराठी भाषा में पैठ गए हैं, वैसा हिन्दी में नहीं है। इस पर विस्तार से कभी लिखेंगे, फ़िलहाल बात बुलंद की। हिन्दी में भी बुलंद का एक रूप बिलंद होता है पर यह क़रीब-क़रीब अप्रचलित है। हिन्दी फ़ारसी में जहाँ बुलंद, बुलंदी में सकारात्मक भाव हैं वहीं वहीं मराठी के बिलंदर में आमतौर पर ठग, लुच्चा, चोर, भामटा या नीच जैसी अर्थवत्ता है। अर्थात बुलंद में निहित तमाम विशेषताएँ निम्न श्रेणी में प्रयुक्त होती हैं। हालाँकि सकारात्मक प्रयोग भी होता है पर कम है। देखा जाए तो बिलंदर का इस्तेमाल हिन्दी में किया जा सकता है।
हिन्दी-उर्दू के बुलंद, बुलंदी में ऊँचाई, उच्चता का भाव है। बुलंद इरादे, बुलंद हौसला जैसे वाक्याँश की मुहावरेदार अर्थवत्ता से यह ज़ाहिर है। इसके अलावा गुरुतर, भव्य, शीर्ष, उत्तुंग, मुख्य, भारी, प्रमुख, प्रतिष्टित, प्रतापी जैसे आशय भी इसमें हैं। मराठी में बुलंद अल्पप्रचलित है और बिलंद, बिलंदी या बिलंदर जैसे शब्द यहाँ मौजूद हैं। बिलंद रूप हिन्दी में भी है। बिलंदर मराठी का अपना आविष्कार है। फ़ारसी में बिलंदर नहीं है। वहाँ बुलंद ही चलता है। तब भी शुद्धता के नज़रिये से बलंद उच्चार ज़्यादा सही माना जाता है। बुलंद फ़ारसी ज़बान का शब्द है और इसके मूल में जो उच्चता, श्रेष्ठता, परम या खरा असल जैसा भाव है इसका रिश्ता बहुत गहराई से न सिर्फ इंडो-ईरानी भाषा परिवार से जुड़ता है बल्कि इसकी अर्थछायाएं पश्चिम एशियाई सांस्कृतिक आधार वाली भाषाओं यानी सुमेरी ( मेसोपोटेमियाई), बाबुली (बेबिलोनियन) और इब्रानी (हिब्रू) में भी नजर आती है।
सुमेरी यानी मेसोपोटेमियाई भाषा में यह शब्द बेल है और हिब्रू में बाल Baal के रूप में मिलता है। बाल शब्द बहुत महत्वपूर्ण है और इसकी अर्थवत्ता बहुत व्यापक है जिसमें शीर्षस्थ, प्रकाशमान, ऊपरी, बड़ा, परम शक्तिमान, भव्य, देवता अथवा स्वामी जैसे भाव समाए हैं। हिन्दी, उर्दू व फारसी में भी यह प्रचलित है। बाल में निहित ऊँचाई दूध की ऊपरी परत बालाई में नज़र आती है। हिन्दी में इसे मलाई कहते हैं जो फ़ारसी बालाई से ही बना है। लोगों को रत्ती भर खबर हुए बिना अंजाम दी गई कारगुजारी को बाले बाले (बाला) कहते हैं। यहाँ ऊपर ऊपर मामले को निपटाने का भाव ही प्रमुख है। पुराने ज़माने में मकान की ऊपरी मंजिल को बालाखाना कहते थे। बाला यानी ऊपर और खाना यानी स्थान या कोष्ठ। अग्रेजी की बालकनी में भी ऊँचाई का ही भाव है और बालाख़ाना से बालकनी का ध्वनिसाम्य भी गौरतलब है।
सुमेर और अक्कादी मूल से उठ कर ही बाल शब्द फ़ारसी में भी दाख़िल हुआ। बाला ऐ ताक़ का अर्थ है किसी चीज़ को ऊपर रख देना। बालानशीं का अर्थ होता है सर्वश्रेष्ठ, सर्वोच्च, सर्वोत्तम। मराठी में कही हुई बात, उल्लेख, ज़िक़्र, चर्चा के लिए फ़ारसी के मज़क़ूर शब्द का खूब प्रयोग होता है। उर्दू में मज़क़ूरे-बाला टर्म का प्रयोग ‘उपरोक्त’ यानी ऊपर लिखी हुई बात की तर्ज़ पर किया जाता है। प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार की ‘भ’ ध्वनि फारसी, ईरानी समेत सेमिटिक भाषाओं में जाकर ‘ब’ में बदलती रही है। संस्कृत के भर्ग में भी ऊँचाई का भाव है। इसका फारसी रूप बुर्ज होता है जिसका अर्थ मीनार या ऊंचा गुम्बद है। बुर्ज का huangshan ही यूरोपीय भाषाओं में बर्ग, बरो में रूपांतर होता है। कई स्थान नामों में यह जुड़ा नजर आता है। प्राचीन मनुष्य की शब्दावली और उसकी अर्थवत्ता का विकास प्रकृति के अध्ययन से ही हुआ था।
प्रायः ऊँचाई को इंगित करनेवाले शब्दों का मूलार्थ रोशनी, चमक, दीप्ति था। प्रकाशमान वस्तु के रूप में मनुष्य ने आसमान में चमकते खगोलीय पिण्डों को ही देखा था। पूर्व वैदिक भाषाओं में ‘भा’ ध्वनि में इसीलिए ऊंचाई के साथ चमक, कांति का भाव भी निहित है। संस्कृत के भर्गस् में एक साथ चमक, प्रकाश, भव्यता का भाव निहित है। The Nostratic macrofamily: a study in distant linguistic relationship पुस्तक में एलन बोम्हार्ड, जॉन सी कर्न्स ने विभिन्न भाषा परिवारों में प्रकाश और ऊंचाई संबंधी समानता दर्शानेवाले कई शब्द एक साथ रखे हैं। प्रोटो एफ्रोएशियाटिक भाषा परिवार की धातुओं bal और bel का अर्थ भी यही है और प्रोटो सेमिटिक के bala / bale में भी यही भाव है।
स्पष्ट है कि प्राचीन भारोपीय ध्वनि भा यहां बा में बदल रहा है। गहराई से देखें तो भा ध्वनि में निहित चमक का भाव विभा, विभाकर, भास्कर जैसे शब्दों में साफ है। तमिल-तेलुगू के pala pala में भी कांति, दीप्ति, चमक का भाव है। भा के बा में बदलने की मिसाल वजन के अर्थ में हिन्दी के भार और फारसी के बर या बार (बारदान, बारदाना, बोरी) से भी स्पष्ट है। ध्यान दें, बहुत महीन अर्थ में यहां भी ऊँचाई का भाव है। जिसे ऊपर उठाया जाए, वही भार है। अंग्रेजी के बर्डन में यही बार छुपा हुआ है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। रूस की बोल्शेविक क्रांति दुनिया में प्रसिद्ध है। बोल्शेविक का शाब्दिक अर्थ हुआ बहुसंख्यक। मगर इसमें भी बाल यानी सर्वशक्तिमान की महिमा नजर आ रही है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, March 1, 2013

असली ‘दारासिंह’ कौन?

darius_relief

स मूचे भारतीय उपमहाद्वीप में ‘दारा’ नाम शक्ति का प्रतीक माना जाता है। पश्चिम में पेशावर से लेकर पूर्व में पूर्णिया तक ‘दारा’ नामधारी लोग मिल जाएँगे जैसे हिन्दुओं में दारा के साथ ‘सिंह’ का प्रत्यय जोड़ कर दारासिंह जैसा प्रभावी नाम बना लिया जाता है वहीं मुस्लिमों में ‘खान’ या ‘अली’ जैसे प्रत्ययों के साथ दाराख़ान या दाराअली जैसे नाम बन जाते हैं। कहते हैं यह ख्यात पहलवान, अभिनेता दारासिंह के नाम का प्रभाव है कि ‘दारा’ नाम के साथ ताक़त जुड़ गई। चलिए मान लिया। इसमें कोई दो राय नहीं कि पाँचवे-छठे दशक में उनके नाम का वो ज़हूरा था कि वे एक चलती-फिरती किंवदंती बन गए थे। उनका नाम मुहावरे की तरह इस्तेमाल होने लगा और कहावतें तक चल पड़ीं। सवाल यह है कि वो ‘दारा’ कौन था जिससे प्रभावित होकर दारासिंह के पिता ने अपने बेटे का नाम रखा और इस नाम के मायने क्या हैं ?
शब्दों का सफ़र में अक़्सर इतिहास में गोते लगाने की नौबत आ जाती है। इतिहास में ऐसे क़िरदार या प्रतीक मशहूर हो जाते हैं जिनकी खूबियाँ मनुष्य खुद में देखना चाहता है। नतीजतन वे लोग प्रतीक / संज्ञा-नाम में बदल जाते हैं। लोग अपनी संतानों, नायक-नायिकाओं को उन नामों से बुलाने लगते हैं। ऐसा ज्यादातर पुरुषवाची नामों के साथ ही होता है। उदाहरण कई हैं जैसे राम ( रामदयाल, रामकृपाल, रामनरेश, आयाराम, गयाराम आदि), कृष्ण (रामकृष्ण, हरिकृष्ण, रामकिशन आदि), बहादुर (वीरबहादुर, रामबहादुर), सिंह (रामसिंह, वीरसिंह, बहादुरसिंह) आदि कई नाम हैं। इसी कड़ी में दारा का नाम भी आता है जो ईरान के प्रसिद्ध हखामनी वंश के संस्थापक साइरस प्रथम जितना ही महान, वीर और महत्वाकांक्षी नरेश था। इस राजवंश का चौथा शासक था। दरहक़ीक़त हम जिस दारा की बात कर रहे हैं, वह इतिहास में डेरियस प्रथम के नाम से जाना जाता है। फ़ारस के इतिहास में दो साइरस और तीन डेरियस हुए हैं।
यूँ तो तीनों ही डेरियस वीर, लड़ाके थे मगर इतिहास में दारा के नाम से जो डेरियस प्रसिद्ध हो गया वह चौथा हखामनी शासक डेरियस प्रथम ( 521- 486 ) ही था। इतिहास में फ़ारस के हख़ामनी वंश को ही भारत पर चढ़ाई करने वाला पहला विदेशी वंश माना जाता है। इस वंश के संस्थापक साइरस ने 551-530 के बीच अपना साम्राज्य पेशावर से लेकर ग्रीस तक फैला लिया था। डेरियस का पिता विष्तास्पह्य भी हखामनी राजवंश का क्षत्रप था। समझा जाता है कि उसने साइरस के अधीन भी काम किया था। बहरहाल, डेरियस ने साइरस महान की आन, बान और शान को कायम रखा था इसीलिए उसके जीवनकाल में ही उसे भी डेरियस महान कहा जाने लगा था। हखामनी वंश की राजधानी पर्सेपोलिस के शिलालेखों पर ऐसा ही दर्ज है। पुरातत्व पर्यटन के लिए मशहूर पर्सेपोलिस शहर डेरियस की राजधानी हुआ करता था। ऐसा माना जाता है कि यह शहर उसने ही बसाया था। पर्सेपोलिस का अर्थ हुआ परशियनों का शहर। ध्यान रहे ईरान का पुराना नाम फ़ारस था जिसके मूल में अवेस्ता का पार्श (संस्कृत का पर्शु) शब्द था। पार्श से ही फ़ारस बना। ग्रीक संदर्भों में इसे पर्शिया कहा गया। ग्रीक भाषा के पोलिस प्रत्यय का अर्थ वही होता है जो हिन्दी में पुर या पुरी का होता है। इस तरह पर्सेपोलिस का अर्थ हुआ पर्शुपुरी अर्थात पारसिकों की राजधानी हुआ।
प्राचीन फ़ारसवासी अग्निपूजक थे। भारत के पारसी उन्हें के वंशज हैं। इस्लाम की आंधी में उजड़ कर वे भारत आ बसे, फ़ारस के पारसी मुसलमान होते चले गए। दारा का मूल दरअसल डेरियस भी नहीं है। पर्सेपोलिस के शिलालेख के मुताबिक उसका शुद्ध पारसिक उच्चारण दारयवौष है। शिलालेख में दर्ज़ कीलाक्षर लिपि वाले मज़मून का रोमन और देवनागरी उच्चार इस तरह है- Dârayavauš दारयवौष xšâyathiya क्षायथिय vazraka वज्रक xšâyathiya क्षायथिय xšâyâthiânâm क्षायथियानाम xšâyathiya क्षायथिय dahyunâm दह्युनाम Vištâspahya विष्तास्पह्य Haxâmanišiya पुश puça हक्ष्मनिषिय hya ह्य imam इमम taçaram तशराम akunauš अकौनष। इसका अर्थ है- “यह प्रासाद हखामनी वंश के विस्ताष्पह्य के पुत्र और महाराज, राजाधिराज, राज्याधिपति दारयवौष के द्वारा बनवाया गया है”। विद्वानों ने इसे पहलवी का प्राचीन रूप बताया है जो अवेस्ता के क़रीब थी। अवेस्ता को संस्कृत की मौसेरी बहन समझा जाता है।
यह समझना आसान है कि अवेस्ता के दारयवौष का ही ग्रीक रूप डेरियस हुआ होगा। ग्रीक इतिहासकार हेरियोडोटस के उल्लेखों से यही रूप प्रचलित हुआ। इसी तरह वर्णसंकोच के साथ दारयवौष का परवर्ती रूप दारा हुआ। दारयवोष के रूपान्तर की दो दिशाएँ रहीं। दारयवौष > दारयवश >दारयस > दारा (फ़ारसी) > डेरियस (ग्रीक) । पश्चिम की ओर यह डेरियस हुआ जबकि पूर्व की ओर इसका रूपान्तर दारा हुआ। दरअसल का दारा रूप ही अब व्यावहारिक तौर पर प्रचलन में है। ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश आदि में दारा कई नामों में मौजूद है जैसे- दाराबख्त, दाराअली, दाराखान, वीरदारा, दारा शुकोह, दाराप्रसाद, दारानाथ, दारासिंह आदि। दारायवौष की पूर्व में दारा के नाम से प्रसिद्धी की बड़ी वजह उसके पंजाब और सिंध अभियानों की कामयाबी रही। वर्तमान पाकिस्तान का पेशावर प्रान्त दारा के आधिपत्य में था। पश्चिम में मिस्र, ग्रीस, उत्तर में आमू दरिया और पूर्व में पंजाब-सिंध दारा के साम्राज्य की सीमाएँ थीं। यही उस काल का ज्ञात विश्व भी था।
देखते हैं दारा का, प्रकारान्तर से दारियवौष का अर्थ क्या है, इसका जन्मसूत्र क्या है। आज की फ़ारसी में दारा का दाराब रूप भी मिलता है। भारत-ईरानी भाषाओं के अध्येता क्रिश्चियन बार्थोलोमिए ने (1855-1925) ने दारयवौष को अवेस्ता का शब्द माना है और इसे जरथ्रुस्ती शब्दावली में स्थान दिया है। इसका अर्थ है धारण करने वाला। राज्य को धारण करना, प्रजा को धारण करना, शासन को धारण करना, नायकोचित गुणों को धारण करना और सद्गुणों को धारण करना इसमें निहित है। दारियवौष के मूल में प्रोटो भारोपीय धातु dher है। भाषाविद् जूलियस पकोर्नी इसका रिश्ता वैदिक धातु धर् से जोड़ते हैं। धर् में उठाने, सम्भालने, देखभाल करने, अंगीकार करने जैसे भाव है। धारण करने में ये सारे भाव निहित हैं। धर् से संस्कृत, हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के अनेक शब्द बने हैं। पृथ्वी को धारिणी कहा जाता है। धरती में यही धर है। आधार यानी टिकाव, पड़ाव, फाऊंडेशन में भी यही ‘धर’ है जिसमें स्थिरता है। डॉ रामविलास शर्मा ‘धर्’ के एक रूप ‘स्थर’ की कल्पना करते हैं। संस्कृत ‘दारु’, ‘द्रुम’, ‘तरु’, ग्रीक ‘द्रुस’, अंग्रेजी के ‘ट्री’ में दरअसल धर् के रूपान्तर ‘दर्’ और ‘तर्’ हैं । यह भी दिलचस्प है की ‘धर’ में निहित स्थिरतामूलक धारण करने के भाव से ही गतिवाचक धारा शब्द भी बनता है । धारा वह जो धारण करे, अपने साथ ले जाए । धर, धरा के मूल में धृ धातु है । स्थिरता का परम प्रतीक ध्रुव का जन्म भी इसी धृ धातु से हुआ है । दारयवौष् से बने दारा का अर्थ हिन्दी फ़ारसी में सर्वशक्तिमान, भगवान, राजा, पालक आदि है।
स्पष्ट है कि ताक़त, वीरता आदि के पर्याय के रूप में दारा नाम डेरियस अर्थात दारयवौष् से आ रहा है। इसका प्रचार अनेक देशों में हुआ। नायकोचित नामकरण की अभिलाषा में अनेक दारा सामने आए मगर भारत में तो पंजाब के दारासिंह की ख्याति ने डेरियस द ग्रेट को भी पछाड़ दिया।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, February 25, 2013

क़िस्सा दक़ियानूस का

decius1

दु नियाभर में प्रचलित मुहावरों-कहावतों में शासकों या प्रभावशाली लोगों का अत्याचारी, सनकी चरित्र भी झलकता है। ऐसे क़िरदारों में रावण, कंस, नीरो या तुग़लक जैसे नाम स्पष्ट पहचाने जा सकते हैं। कुछ नामों के पीछे न तो कहानी नज़र आती है न ही क़िस्सा। ऐसा ही एक नाम है दक़ियानूस जो सिर्फ़ एक संज्ञा भर नहीं बल्कि एक प्रसिद्ध रोमन सम्राट था। आज के तुर्की और प्राचीन अनातोलिया का इफ़ेसस शहर इसके राज्य में शामिल था। अंधविश्वासी या पुरानी सोच वाले व्यक्ति को दक़ियानूस कहते हैं। बोलचाल की हिन्दी में यह शब्द खूब प्रचलित है। इसी तरह दकियानूसी शब्द के तहत पुरानी सोच वाला, रूढ़ीवादी और अधिक उम्र वाला, कोई बेकार, पुरानी और मनहूस चीज़ या पुरातनपंथी विचारधारा आती है। मसलन दक़ियानूसी लोग, दक़ियानूसी बातें, दक़ियानूसी चीज़े। अरबी-फ़ारसी में दक़ियानूस शब्द का सही रूप दक़्यानूस है।
हिन्दी-फ़ारसी के कोशों में अव्वल तो दक़ियानूस के संदर्भ में ज्यादा जानकारियाँ नहीं मिलतीं। कुछ कोशों में तो इसका संदर्भ बतौर रोमन शासक भी नहीं मिलता और कहीं पर उसके अत्याचारी सम्राट होने जितनी ही संक्षिप्त जानकारी मिलती है। ग्रीक संदर्भों में दकियानूस का उल्लेख बतौर देसियस मिलता है। पश्चिम एशिया के समाज-संस्कृति पर यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों की गहरी छाप पड़ी है। ईसाइयत पर यहूदी धर्म का असर और इस्लाम पर अपने पूर्ववर्ती यहूदी और ईसाई चिन्तन का असर नज़र आता है। बाईबल के गोस्पेल और कुरान के सूरों (सुरह) की अनेक कथाओं में समानता से यह साबित भी होता है। बाइबल और कुरान दोनों में ही थोड़ी बहुत भिन्नता के साथ देसियस या दक़्यानूस के बारे में लगभग एक जैसी ही कहानी है।
ईसा के जन्म के वक़्त पश्चिम एशिया और समूचे यूरोप में मूर्तिपूजा का ही बोलबाला था। ईसा के बाद भी रोमन साम्राज्य में मूर्तिपूजा का चलन था। किन्हीं संदर्भों में इतिहास प्रसिद्ध इस निरंकुश सम्राट को 359 ईपू. का बताया गया है मगर यह भ्रामक है। दक्यानूस यानी देसियस का काल ईसा के क़रीब ढाई सदी बाद का है। रोमन साम्राज्य में शासकों की मूर्तिपूजा सम्बन्धी सनक, अत्याचार और उत्पीड़न का इतिहास ईसा के सूली पर चढ़ने के बाद सातवीं आठवीं सदी तक भी जारी रहा रहा। देसियस या दक़्यानूस का रिश्ता अनातोलिया से जोड़ा जाता है और माना जाता है कि तुर्की के प्रसिद्ध तारसस और इफ़ेसस शहरों पर उसका शासन था। ईसाई धर्म के महान प्रचारक सेंट पॉल का जन्म तारसस में ही हुआ था। माना जाता है कि कि तारसस का नाम तार्कु के आधार पर पड़ा है जो हित्ती भाषा का शब्द है। इस इलाके में बसने वाले आदिजन हिट्टाइट ही थे। तार्कु एक देवता था जिसकी पूजा हित्तीजन करते थे। वैसे अधिकांश संदर्भो में इफ़ेसस से इसका सम्बन्ध जोड़ा जाता है। यह वही इफ़ेसस है जहाँ का आर्टेमिस का मंदिर सात अजूबों में गिना जाता है। अरब-फ़ारसी संदर्भों में इफ़ेसस को अफ़सूस कहा जाता है।
देसियस मूर्तिपूजा में विश्वास रखता था। उसका शासन बड़ा सख़्त और पूजा-विधान के आधार पर चलता था। कहने की ज़रूरत नहीं कि ईसाइयत के बढ़ते प्रभाव की वजह से रोमन साम्राज्य में मूर्तिपूजा के लिए आग्रह ज्यादा बढ़ा-चढ़ा था। देसियस का नज़रिया इस सिलसिले में ज्यादा सख़्त था। पूरे राज्य में उसके जासूस फैले हुए थे जो राई-रत्ती की खबरें देते थे। मूर्तिपूजा के विरोधियों को देसियस बर्दाश्त नहीं करता था। ईश्वर एक है और अदेखा है जैसी बातों पर यक़ीन करने वालों को वह आनन-फ़ानन में सज़ाए मौत सुना देता था जिसके तहत दोषियों को ज़िंदा जलाने, ज़मीन में गाड़ देने, हाथ-पैर काट कर पशुओं का ग्रास बनाने जैसे अमानवीय तरीके  शामिल थे। बहरहाल, बाइबल में वर्णित कथा के अनुसार इफ़ेसस के सात युवा लोगों ने शहर की देवी के मंदिर में सिर झुकाने से इनकार कर दिया। किन्हीं संदर्भों में यह घटना 156ईस्वी की भी बताई गई है। देसियस के कोप से बचने के लिए उन्होंने शहर के बाहर पहाड़ी गुफा में शरण ली। थके हारे सातों लोग गुफ़ा में जाते ही नींद के आग़ोश में चले गए। उधर देसियस को जब ख़बर लगी तो उसने गुफ़ा का दरवाज़ा चट्टानों से बंद करवा दिया ताकि वे अंदर ही मर-खप जाएँ। गोस्पेल के मुताबिक ये लोग दो सदियों तक सोते रहे। इसके आगे क्या हुआ ये जानने से पहले इस कहानी के इस्लामी संस्करण का जायज़ा लिया जाए।
गोस्पेल की तरह कुरान के अध्यायों को सूरा (सुरह) कहा जाता है। गुफ़ा में सोए लोगों की कहानी कुरान के सूरह-कह्फ़ (18वाँ अध्याय) में आती है। कहानी के मुताबिक अफ़सूस शहर (ग्रीक इफ़ेसस) में सात लोगों का एक समूह था जो ईसाइयत में भरोसा रखते थे। दक्यानूस के कहर से बचने के लिए उन्होंने गुफ़ा में शरण ली, जिसका दरवाज़ा उसके ही हुक्म से बंद करा दिया गया। इस्लामी संदर्भों में इन सात लोगों को अस्हाबे-कह्फ़ कहा गया है। अस्हब का अर्थ होता है पैग़म्बर के कृपापात्र, मोहम्मद के दोस्त। मूलतः अस्हब, साहिब का बहुवचन है जिसका अर्थ है साहिबान, मान्यवर आदि। इसी तरह कह्फ़ का अर्थ होता है गुफ़ा, कंदरा, गार आदि। कह्फ़ अरबी का शब्द है लेकिन, गुहा, गुफा, कोह, खोह जैसे इंडो-ईरानी परिवार के शब्दों से इसकी साम्यता गौरतलब है।
गोस्पेल के मुताबिक क़रीब दो सौ साल ये लोग सोते रहे जबकि सूरह् के मुताबिक इनकी नींद 309 साल बाद टूटी। जो भी हो, नींद टूटने पर इनमें से कुछ लोग भोजन की तलाश में पास की बस्ती तक पहुँचे। उन्होंने कुछ रोटियाँ खरीदी। जब नानबाई को इन्होंने कुछ सिक्के दिए तो वह हैरत में पड़ गया। सिक्के उसके लिए अनजाने थे। धीरे-धीरे ये बात पूरे बाज़ार में फैल गई कि कुछ अनोखे लोग वहाँ आए हैं। जानकारों ने देख-परख कर पहचाना कि इन सिक्कों पर दक़्यानूस नाम के राजा की तस्वीर छपी है जो क़रीब तीन सदी पहले हुआ था और बेहद ज़ालिम था। नींद से जागने वालों के लिए अब हैरत में पड़ने की बारी थी। उन्होंने बताया कि बेशक दक़्यानूस ज़ुल्मी है और उससे बचने के लिए ही तो वे कल शहर छोड़ कर भागे थे। वो तो झपकी लग गई और वे नींद में ग़ाफ़िल हो गए। तीन सदी लम्बी नींद उनके लिए ही नहीं, सबके लिए बड़ी ख़बर थी। फिर यह हुआ कि वे सातों लोग वहीं रहने लगे। उनकी यही चाहत थी कि जिस काल की गुफा में सदियों तक सोते हुए उन्हें ईश्वरीय अनुभूति हुई है, उनकी उम्र पूरी होने के बाद वे हमेशा के लिए भी उसी गुफा में सोएँ। शहरवासियों ने उनकी यह इच्छा भी पूरी की। बाद के दौर में आम लोगों में भी यह धारणा बनी कि उस गुफा में दफ़नाए जाने पर उन्हें मोक्ष मिलेगा।  पुरातत्ववेत्ताओं को एशिया व यूरोप में तुर्की, जॉर्डन से लेकर चीन के उईगुर प्रान्त तक में ऐसी गुफाएँ मिली हैं जिन्हें स्थानीय लोग अस्हाबे-कह्फ कहते हैं। इन सभी स्थानों पर कब्रें हैं। 
क़िस्सा-कोताह यह कि इस्लाम और ईसाई दोनों ही धर्मों में इस कहानी का प्रयोग अपने अपने पैग़म्बर की महानता स्थापित करने में किया। लोगों को यह पता चला कि कुल मिला कर एकेश्वरवाद ही सही रास्ता है। ईश्वर एक है और उन्होंने ही ज़ालिम के कहर से बचाने के लिए अपने सात नेक बंदों को सदियों तक सुलाए रखा। कहानी जो भी कहती हो, धर्मों की बात धर्मोपदेशक जानें, शब्दों के सफ़र में हमें तो दक़ियानूस लफ़्ज का सफ़र जानना था, जो जान लिया। अल्लाह के उन सात नेक बंदों का नाम आज कोई नहीं जानता। हाँ, जुल्मी दक़ियानूस को हम क़रीब क़रीब रोज़ ही याद कर लेते हैं।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, January 11, 2013

देहात की बात

gaon

ग्रा मीण अंचल के लिए गाँव-देहात शब्दयुग्म का हिन्दी में खूब प्रयोग होता है । “वे दूर देहात से आए हैं,” “देहात में रहने के अपने फ़ायदे हैं,” जैसे वाक्यों में देहात का अर्थ गाँव ही है । गँवई या ग्रामीण के लिए देहात से देहाती विशेषण बनता है । देहात हमें भारतीय परिवेश से जुड़ा शब्द लगता है तो इसलिए क्योंकि यह भारत-ईरानी भाषा समूह का शब्द है और फ़ारसी मूल के ‘देह’ से हिन्दी की बोलियों में आया । फ़ारसी में देह के दीह, दिह जैसे रूप भी मिलते हैं । देह यानी गाँव और देह का बहुवचन देहात यानी ग्रामीण क्षेत्र । हिन्दी में देह, देहात जैसे शब्दों का प्रयोग ग्यारहवीं सदी से ही शुरू हो चुका था । यूल-बर्नेल के एंग्लो-इंडियन कोश हॉब्सन-जॉब्सन के अनुसार पंद्रहवीं सदी के कम्पनी राज के दस्तावेज़ों में कोलकाता को ‘दे कलकत्ता’ लिखा गया है । यह ‘दे’ दरअसल फ़ारसी का ‘देह’ है जिसका अर्थ है ग्राम । ‘दे कलकत्ता’ का अर्थ हुआ गाँव कलकत्ता जो तब हुगली के मुहाने पर स्थित एक मामूली बसाहट थी । करीब साढ़े तीन सौ साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की कासिम बाजार कोठी का फर्स्ट आफिसर था जाब चार्नक जो बाद में कंपनी एजेंट बना और उसी की देख-रेख में सूतानटी और ‘दे कलकत्ता’ का विकसित रूप आज की कोलकाता महानगरी है ।
ख्यात भाषाविद जूलियस पकोर्नी द्वारा खोजी गई प्रोटो भारोपीय धातुओं में dheigh (-धिघ, मोनियर विलियम्स ) से बना है अवेस्ता का ‘देगा’ जिसका अर्थ है निर्माण, बनाना, मिट्टी, ढाँचा अथवा लेपन । ईरानी परिवार की भाषाओं में इसके अन्य रूप हैं दिज़, देज़, दाएज़ा, दाएजायति जिनका अर्थ है दीवार, परकोटा या क़िला । अवेस्ता में पइरीदाएज़ा शब्द है जिसका अर्थ है जन्नत, वैकुण्ठ, स्वर्गवाटिका या परकोटा । अंग्रेजी का पेराडाइस इसका ही रूपान्तर है । यूनिवर्सिटी ऑफ़ टैक्सास के लिंग्विस्टिक रिसर्च सेंटर के मुताबिक पुरानी फ़ारसी में ‘दिदा’ का अर्थ कोट या क़िलेबंदी होता है । हिन्दी का ‘दीवार’ इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की इंडो-ईरानी शाखा का शब्द है और भारतीय भाषाओं में इसकी आमद फ़ारसी से हुई है । यह अवेस्ता के एक सामासिक पद ‘देगावरा’ [dega-vara] से बना है । संस्कृत की ‘दिह्’ धातु का रिश्ता dheigh से जुड़ता है । इसका अर्थ परकोटा, आश्रय, कोट, हदबंदी, किलेबंदी करना, बचाव करना, लीपना, पोतना आदि । ध्यान रहे घास-फूस के ढाँचे को मिट्टी से सान-पोत कर उसे मज़बूती दी जाती थी ।
फ़ारसी के ‘दहलीज’ शब्द में यही ‘देह’ है । इन सभी में बनाने या निर्माण की क्रिया शामिल है । ‘दहलीज’ का अर्थ होता है पौड़ी, सीढ़ी, द्वार या चौखट । इसी मूल से बने हैं देहरी, देहरा, देहरी जैसे शब्द जो चौखट या द्वार की अर्थवत्ता रखते हैं । गौर तलब है कि उत्तराखंड के कई स्थानों के साथ कोट, पौड़ी या द्वार शब्द जुड़े नज़र आते हैं जैसे कोटद्वार, हरिद्वार, पौड़ी गढ़वाल आदि । जहाँ तक ‘देहरादून’ के देहरा की व्युत्पत्ति का प्रश्न है , तमाम विकल्पों के साथ फ़ारसी के देह, दिह से भी देहरा की व्युत्पत्ति सम्भावित है जिसमें गाँव, दीवार, परकोटा जैसे भाव हैं । इस तरह ‘देहरादून’ का अर्थ हुआ वादी का गाँव । ग्वालियर के पास एक घाटीगाँव भी है । देहरादून का एक अर्थ दर ऐ वादी अर्थात घाटी का दरवाज़ा भी हो सकता है । वह बस्ती जहाँ से द्रोणिका अर्थात दून घाटी शुरू होती है । वैसे देहरादून का रिश्ता देवघर या डेरा से भी जोड़ा जाता है । इसी कड़ी में ‘टिहरी गढ़वाल’ भी आता है । संदर्भों के अनुसार टिहरी / टेहरी शब्द ‘त्रिहरी’ यानी तीन विषयों ( मनसा, वाचा, कर्मणा ) का शमन करने वाला स्थान । यह व्युत्पत्ति काल्पनिक है । ‘टिहरी’ शब्द भी ‘देहरी’ का रूपान्तर है, ऐसा मुझे लगता है ।
संस्कृत की दिह् धातु से बना है ‘देह’ शब्द जिसका अर्थ काया, शरीर होता है मगर इसका मूलार्थ है ढाँचा, आवरण, कवच या बचाव । गौर करें दिह् में निहित लेपन के अर्थ पर । किसी वस्तु पर लेपन उसे सुरक्षित बनाने के लिए ही किया जाता है । देह एक तरह से शरीर के भीतरी अंगों का सुरक्षा कवच है । मोनियर विलियम्स के कोश के अनुसार ‘देह’ का अर्थ है आवरण, लेपन, मिट्टी, ढाँचा, साँचा, गूँथना, ढालना आदि। दार्शनिक अर्थों में देह को मिट्टी से निर्मित भी कहा जाता है और इसे किले की उपमा भी दी जाती है। गौरतलब है कि अंग्रेजी के ‘डो’ dough का अर्थ होता है सानना, गूँथना आदि । डो का रिश्ता भी प्रोटो भारोपीय धिघ् dheigh से जुड़ता । कबीर ने मनुष्य को माटी का पुतला यूँ ही नहीं कहा । देह, दिह्, दिज़् शब्दों के भावार्थों पर जाएँ तो माटी के पुतले के निर्माण की सारी क्रियाएँ स्पष्ट होती है यानी मिट्टी को पीटना, सानना, राँधना, गूँथना, साँचा बनाना और फिर पुतला बनाना । स्पष्ट है कि संस्कृत के दिह् और फ़ारसी के दीह या देह परस्पर समानार्थी हैं और एक ही मूल से निकले हैं । 
गौर करें, फ़ारसी के दीह / दिह या देह शब्द में मूलतः क़िलेबंदी, हदबंदी या परकोटा बनाने का भाव ही है । प्राचीनकाल में आबादियाँ इसी तरह रहती थीं । ‘वास’ करने की वजह से ही राजस्थानी में ‘बासा’ शब्द है । बस्ती के मूल में भी ‘वास’ ही है । सर रॉल्फ़ लिली टर्नर के कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ़ इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़ के अनुसार संस्कृत के देही में ढूह, क़िला, परिधि, चाहरदीवारी, परकोटा की अर्थवत्ता का समावेश हैं । सिन्धी में यह दिहु है जिसका अर्थ पलस्तर लगाना, परत चढ़ाना, मज़बूत करना, ढूह बनाना आदि । फ़ारसी में इसका एकवचन रूप दिह या देह होता है और बहुवचन रूप देहात है जिसका अर्थ ग्रामीण क्षेत्र है । डीएन मैकेंजी के पहलवी कोश में ‘देह’, ‘दिह’ में देश, इलाक़ा, ग्राम या क्षेत्र, भूमि जैसे भाव हैं और इससे बने पहलवी के ‘दहिगन’ में ग्रामीण या कृषक का भाव है । दहिगन का फ़ारसी रूप देहक़ान होता है । हिन्दी में इसे दहकान भी लिखा जाता है । देहक़ानी या देहक़ानियत का अर्थ होता है गँवारू, गँवई या उजड्डपन । यह ठीक वैसे ही है जैसे ग्राम से गाँव और फिर गँवई । किसी व्यक्ति को असभ्य के अर्थ में गँवार इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वह उजड्ड होता है । मगर इसका आशय यह है कि ग्रामीण व्यक्ति शहरी संस्कार से अपरिचित होता है सो वह गँवार हुआ । बाद में गँवार का रूढ़ार्थ ही असभ्य हो गया ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, December 31, 2012

चक, चकला, चकलादार

chakla-tokenहिन्दी के तीन चकले-2

च क्र का चकला रूप मूलतः हिन्दी, पंजाबी में है । हिन्दी के चकला में चपटा, गोल, वृत्ताकार वाले आशय के साथ साथ प्रान्त का भाव भी है जबकि पंजाबी चकला में वृत्ताकार, गोल, घेरदार, विस्तीर्ण के साथ साथ शहर का खुला चौक, ज़िला अथवा वेश्यालय का आशय भी है । ज़ाहिर है ये फ़ारसी का असर है । भाषायी स्तर पर नहीं बल्कि मुस्लिम शासन का प्रभाव । विभिन्न संदर्भों से पता चलता है कि चकला मूलतः मुस्लिम शासन के दौरान भूप्रबन्धन, उपनिवेशन और राजस्व सम्बन्धी मामलों की शब्दावली से निकला है । चकला व्यवस्था से तात्पर्य एक राजस्व ज़िले से था । राजस्व अधिकारी चकलादार कहलाता था जिसे नाज़िम भी कहते थे । चकला में स्थानवाची भाव प्रमुख है । इसमें ‘चक’ में निहित तमाम आशय तो शामिल हैं ही, साथ ही आबादी और बसाहट का भाव भी है  । जिस तरह कई आबादियों के साथ चक नाम जुड़ा नज़र आता है ( रामपुर चक या चक बिलावली ) वही बात चकला में भी है जैसे मीरपुर चकला या चकला-सरहिन्द और दर्जनों ऐसे ही अन्य स्थानों के नाम । विभिन्न संदर्भों में चकला का अर्थ सर्किल, वृत्त, खण्ड या भाग होता है ।
मुस्लिमकाल की सरकारी भाषा अर्थात फ़ारसी में चकला यानी एक सब डिवीज़न या उपखण्ड जिसके अधीन कई परगना होते थे । आज इसे अनुभाग, उपवृत्त, उपखण्ड की तरह समझा जा सकता है । ख्यात इतिहासकार इरफ़ान हबीब के अनुसार क्षेत्रीय इकाई के रूप में चकला का संदर्भ शाहजहाँ के शासनकाल से मिलना शुरू होता है । परगना व्यवस्था के साथ साथ चकला व्यवस्था भी कायम थी । मुग़ल काल में लगभग समूचे उत्तर भारत में कई गाँवों के समूहों को पुनर्गठित कर उन्हें चकला कहा जाता था । चकले का प्रमुख नाज़िम, चकलादार या भूयान कहलाता था । इतिहास की किताबों में दर्ज़ है कि मुग़ल दौर में अलग-अलग राज्य इकाई को ‘सरकार’ का दर्ज़ा प्राप्त था । ‘सरकार’ या ‘सिरकार’ अर्थात एक राज्य शासन । एक ‘सरकार’ कई छोटी राजस्व इकाइयों में बँटी होती थी जो चकला कहलाती थीं । पूर्वी भारत में एक चकले का आकार मुग़ल सरकार (प्रशासनिक इकाई) का छठा हिस्सा होता था । शेरशाह सूरी शासित क्षेत्र को 47 सरकारों में बाँटा गया था । एक अन्य संदर्भ के अनुसार मुर्शिदकुली खाँ के ज़माने में बंगाल को 13 चकलों में बाँटा गया था ।
कोठे के अर्थ में भी चकला शब्द का स्थानवाची आशय ही उभरता है । देहव्यापार केन्द्र के रूप में चकला शब्द कैसे सामने आया इसे जानने से पहले यह समझ लेना ज़रूरी है कि प्राचीनकाल से ही समाज के प्रभावशाली तबके द्वारा देह व्यापार को प्रश्रय दिया जाता रहा है । शासन, सामंत, श्रेष्ठीवर्ग ने वेश्यावृत्ति को बढ़ावा दिया । सत्ता का जैसे-जैसे विकास होता गया, स्त्री-देह राजतन्त्र का एक विशिष्ट उपकरण बनती चली गई । वेश्यावृत्ति या देहव्यापार के पीछे स्त्री की मजबूरी नहीं बल्कि उसे ऐसा करने के लिए विवश किया गया । ब्राह्मणों-पुरोहितों नें इसके लिए न जाने कितने विधान-अनुष्ठान रचे । धर्म से लेकर कर्म तक स्त्री जकड़ी हुई है । वैसे भी स्त्री के रूप-लावण्य के आगे उसकी जाति-धर्म-वर्ण को ब्राह्मणों-पुरोहितों ने गौण माना है । विवाह, संतानोत्पत्ति आदि मुद्दों पर भी उपविधान रच कर पुरोहित समाज ने श्रेष्ठियों के लिए किसी भी वर्ण की स्त्री को सुलभ बनाया । देवदासी, नगरवधु का दर्ज़ा देकर सत्ता ने उसे विशिष्ट बना दिया और गणिका, वेश्या कह कर श्रेष्ठी वर्ग ने उसे बाजार में बैठा दिया । कभी कूटनीतिक दाँवपेच का हिस्सा बनी स्त्री देह कालान्तर में निरन्तर युद्धरत शूरवीरों की यौनपिपासा को शान्त करने का ज़रिया बनी । सेनाओं के साथ सरकारी खर्चे पर वारांगनाओं का काफ़िला भी चला करता था ।
हिन्दी शब्दकोशों में चकला का अर्थ वृत्त, चौका, रोटी बेलने का गोल, सपाट पत्थर, राज्य, सूबा, इलाक़ा, क्षेत्र के अलावा देहव्यापार का अड्डा, तवाइफ़खाना, वेश्यालय आदि बताया गया है । चकला के स्थानवाची आशय के साथ इसमें कसबीनों, तवाइफ़ों और जिस्मफ़रोशी के डेरों की अर्थवत्ता पश्चिमोत्तर सीमान्त क्षेत्र की बोलियों में स्थापित हुई होगी, ऐसा लगता है । गाँव, सूबा, इलाक़ा के लिए चक़, चक़ला जैसे शब्द फ़ारसी, पश्तो, पहलवी, बलूची, सिंधी के अलावा अनेक पश्चिमी बोलियों में मिलते हैं । मुग़ल फ़ौजों के लिए वेश्याओं की अलग जमात चलती थी । यही नहीं मुग़ल दौर में यह पेशा काफ़ी फलाफूला । चकला, रंडीखाना, ज़िनाख़ाना, ज़िनाक़ारी का अड्डा, तवाइफ़ख़ाना, कोठा जैसे कितने ही पर्यायी शब्दों की मौजूदगी से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है जो मुग़लदौर में प्रचलित थे । यही नहीं फ़ौजी चकला, रेजिमेंटल चकला जैसे शब्दों से भी इसकी पुष्टि होती है कि पहले मुग़ल दौर में और फिर औपनिवेशिक दौर में सामान्य चकला आबादी से इन चकलों को पृथक करने के लिए इनके आगे फौजी या रेजिमेंटल जैसे विशेषण लगाए गए । गौरतलब है कि दो सदी पहले तक यूरोप में भी मिलिटरी ब्रॉथेल जैसी व्यवस्था प्रचलित थी । रेजिमेंटल चकला भी वही है । ये सरकारी चकले होते थे ।
क़रीब सवा सौ साल पहले एलिजाबेथ एन्ड्र्यू और कैथरीन बुशनैल द्वारा लिखी गई पुस्तक - “द क्वींस डॉटर्स इन इंडिया” में फ़िरंगियों की सरपरस्ती में चलते ऐसे ही वेश्यालयों की दारुण गाथा बयान की गई है । क़िताब में इन अड्डों के लिए चकला शब्द का प्रयोग ही किया गया है । किताब बताती है कि ब्रिटिश दौर की हर अंग्रेज छावनी में चकला होता था जहाँ के रेट भी सरकार ने फिक्स किए हुए थे । चकलों के बारे में किताब में लिखा है कि, “In the regimental bazaars it is necessary to have a sufficient number of women, to take care that they are sufficiently attractive, to provide them with proper houses, and, above all, to insist upon means of ablution being always available.” ध्यान रहे रेजिमेंटल बाजार यानी छावनी बाजार जिनकी मूल पहचान रूपजीवाओं के डेरों यानी चकलों की वजह से ही थी । कृ.पा. कुलकर्णी के ‘मराठी व्युत्पत्ति कोश’, रॉल्फ़ लिली टर्नर की 'ए कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ़ इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़’ के मुताबिक चकला शहर का केन्द्रीय स्थान भी है । शहर के मध्य स्थित वृत्ताकार क्षेत्र, बाज़ार, पीठा, कोई भी गोलाकार बसाहट, अड्डा, दुकान, चौक आदि । यह मध्यवर्ती बसाहट ही कोठों का इलाक़ा यानी चक़ला था । किसी ज़माने में चक़ला तवाइफ़ों की बस्ती थी । बाद में चकला एक पेशे का पर्याय भी हो गया । कुछ लोग चक़ला और कोठा को एक मानते हैं । चक़ला शुरू से ही देह व्यापार केन्द्र रहा है जबकि कोठा महफ़िलों से आबाद होता था । चकला क्षेत्र था, कोठा इमारत थी । 
संदर्भों के मुताबिक मुग़ल बादशाहों ने जहाँ-जहाँ अपने स्थायी पड़ाव और लश्कर आदि रखे वहाँ तवायफ़ों और वेश्याओं को बसाया । जब लश्कर और पड़ाव जैसी आबादियाँ स्थायी बस्तियों में तब्दील हुईं तो वहाँ क़िलों की तामीर की गईं । फौज़ी और सरकारी अमलों की दिलज़ोयी के लिए इन नाचने-गानेवालियों, डेरेदारनियों, वेश्याओं को स्थायी ठिकाना बनाने के लिए जगह दी गईं । इन्हें भी चकला कहा गया । ये बसाहटें प्रायः छोटी गढ़ियों के बाहर और बड़े क़िलों में मुख्य बाज़ार से जुड़े हिस्सों में होती थीं । गौर करें चावड़ी बाज़ार शब्द पर । यह भी औपनिवेशिक दौर का शब्द हैं । चावड़ी यानी शहर के मध्य स्थित मुख्य चौराहा या चौक । इन्हें ही चावड़ी बाजार chawri bazar कहा गया। धनिकों के मनोरंजन के लिए ऐसे ठिकानों पर रूपजीवाओं के डेरे भी जुटने लगते हैं । इसीलिए चावड़ी बाजार शब्द के साथ तवायफों का ठिकाना भी जुड़ा है । ग्वालियर के चावड़ी बाजार की भी इसी अर्थ में किसी ज़माने में ख्याति थी । स्पष्ट है कि वेश्यालय के अर्थ में रसोई का चकला या स्थानवाची चकला में सिर्फ़ वृत्ताकार लक्षण की ही समानता है । स्थाननाम के साथ जुड़े चकला शब्द में पहले सिर्फ़ भूक्षेत्र का भाव था । बाद में इसमें बसाहट या आबादी का आशय जुड़ा । ब्रॉथेल की अर्थवत्ता वाले चकले में भी मूलतः आबादी, बसाहट का भाव था, न कि देहव्यापार का । समाप्त [ पिछली कड़ीः हिन्दी के तीन चकले-1]

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, November 8, 2012

मनहूस और तहस-नहस

bcat

अ पशकुनी की अर्थवत्ता वाला मनहूस शब्द हिन्दी में बहुत प्रचलित है । मनहूस का प्रयोग बहुत व्यापक है । तिथि, वार, जगह, नाम, वस्तु, ग्रह-नक्षत्र आदि वे सब चीज़ें जो शकुन-विचार के दायरे में आती हैं उनके साथ मनहूस का प्रयोग होता है । जो कुछ भी अशुभ, अलाभकारी है उसे हम मनहूस कहते हैं । हिन्दी में ‘मनहूस शक्ल’, ‘मनहूस आदमी’, ‘मनहूस घड़ी’, ‘मनहूस ख्याल’, ‘मनहूस बात’, ‘मनहूस लोग’ और ‘मनहूस ख्वाब’ जैसे संदर्भ नज़र आते हैं । अरबी का मनहूस शब्द फ़ारसी से होता हुआ हिन्दी में आया है । मनहूस के मूल में अरबी क्रिया-विशेषण नह्स / नहूसा है जिसका अर्थ है अशुभ, दुर्भाग्यशाली, अपशकुन आदि । अल सईद एम बदावी के कुरानिक कोश में नह्स / नहूसा के मूल में सेमिटिक धातु नून-हा-सीन ( n-h-s) है जिसमें मुसीबत, कठिनाई, दुख, विपत्ति जैसे भाव हैं । अरबी के नह्स में ‘म’ उपसर्ग लगने से मनहूस बनता है । मुहम्मद मुस्तफ़ा खाँ मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश के मुताबिक मनहूस में अशुभ, अनिष्ट, अकल्याणकारी, बद, अभागा, बदक़िस्मत जैसे आशय हैं ।
मनहूस के मूल में जो नहूसा है वह नहूसत बनकर उर्दू में विराजमान है । हिन्दी में अब यह अल्पप्रचलित है अलबत्ता आज़ादी से पहले की हिन्दोस्तानी में यह चलता था । नहूसत में भी मनहूसी का ही भाव है । निस्तेज, उदासीनता, दीनता, असहायता, क्लेश, आत्मदया, दुख या खिन्नता के भाव इसमें हैं । नहूसा में धूल, गर्द का भाव भी है । गौर करें कि किसी चीज़ की परवाह न की जाए तो उस पर धूल जम जाती है यानी वह वस्तु अपनी आभा या तेज खो देती है । चेहरा निस्तेज तभी होता है जब उस पर दुख या चिन्ता की छाया हो । चीज़ों पर धूल जमना बुरे दिनों का संकेत है । खुशहाली में चमक है, बदहाली को गर्दिश कहते हैं । चीज़ों पर धूल जमना अपशकुन है । यही नहूसा है । उर्दू में गर्दे-नहूसत भी एक पद है जिसका अर्थ है दुर्भाग्य की धूल, अशुभ लक्षण आदि । अस्त-व्यस्त में भी गर्दे-नहूसत को देखा जा सकता है । अस्त-व्यस्त के ‘अस्त’ में निहित निस्तेजता ( सूर्यास्त ) साफ़ पहचानी जा सकती है । परास्त में यही अस्त है । हार भी अपशकुन है । प्रेमचंद और उनके दौर की भाषा में नहूसत शब्द मिलता है ।
धूल जमने वाले लक्षण की तरह अन्य लक्षणों के आधार पर भी मनहूसियत को समझा जा सकता है । निकम्मे, कामचोर, आलसी, सुस्त लोगों को भी मनहूस कहा जाता है, क्योंकि उनकी वजह से परिवार, समूह, समाज में बरक्कत की उम्मीद नहीं रहती । अक्सर किसी भी संस्थान की बदहाली की वजह निठल्लों की जमात होती है । हाथ पर हाथ धरे बैठना, उंगलियाँ चटकाना, असमय सोना, उबासियाँ लेना, गुमसुम रहना, ऊँघना, नाखून से ज़मीन कुरेदना, आसमान ताकना, शून्य में देखना, निश्चेष्ट बैठे रहना, देर से जागना समेत दैनंदिन कार्य-व्यवहार के अनेक ऐसे संकेत हैं जिन्हें नहूसत या मनहूसी के दायरे में समझा जाता है क्योंकि इनमें गति अथवा क्रिया नहीं है । निष्क्रियता विकास को अवरुद्ध करती है । यही सबसे बड़ा अपशकुन है ।
नेस्तनाबूद, नष्ट-भ्रष्ट या बरबादी के संदर्भ में हिन्दी का तहस-नहस मुहावरा आम लोगों की ज़बान पर है । यह भी इसी कड़ी में आता है और तहस + नहस से मिलकर बना है । अ डिक्शनरी ऑफ़ उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एंड इंग्लिश में जॉन प्लैट्स तहस-नहस का मूल नह्स-तह्स ( naḥs + taḥs ) बताते हैं । नह्स के तौल पर तह्स शब्द की रचना अनुकरण और साम्य का नतीजा है । स्वतंत्र शब्द के रूप में इसकी कोई अर्थवत्ता नहीं है । अरबी की नह्स-तह्स टर्म का हिन्दुस्तानी में विपर्यय होकर तहस – नहस रूपान्तर हुआ । नहूसा में निहित दुर्भाग्य, बदक़िस्मती, अशुभ जैसे आशय नहस में खराबी, बिगाड़, विनष्ट, खंडित, बरबाद, तितर-बितर, विध्वस्त में अभिव्यक्त हो रहे हैं । दुर्भाग्यपूर्ण जैसी अर्थवत्ता यहाँ सुरक्षित है । नहूसा में निहित गर्द वाला भाव अगर देखे तो तहस-नहस का हिन्दी पर्याय धूल-धूसरित सर्वाधिक योग्य नज़र आता है ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, November 2, 2012

तारीफ़ अली उर्फ़…

praising

प्र शंसा के अर्थ में हिन्दी मे तारीफ़ शब्द बोलचाल में रचा-बसा है । प्रशंसा क्या है ? हमारे आस-पास जो कुछ खास है उसकी शैली, गुण, वृत्ति, स्वभाव के बारे में सकारात्मक उद्गार । तारीफ़ दरअसल किसी व्यक्ति, वस्तु के गुणों का बखान ही होता है । हिन्दी की विभिन्न बोलियों समेत मराठी, गुजराती, बांग्ला में भी तारीफ़ शब्द है । तारीफ़ सबको अच्छी लगती है । कई लोग सिर्फ़ तारीफ़ सुनने के आदी होते हैं और कई लोग तारीफ़ करना जानते हैं ।  ज़रा सी तारीफ़ दो लोगों के बीच मनमुटाव खत्म कर सकती है । इसलिए तारीफ़ ज़रिया है, रिश्ता है, पुल है । खुशामदी लोग अक्सर तारीफ़ों के पुल बांध देते हैं । कहना न होगा कि झूठी तारीफ़ के रिश्ते इसलिए जल्दी ढह जाते हैं । वैसे तारीफ़ों के पुल ही नहीं बनते, तारीफ़ो की बरसात भी होती है ।
तारीफ़ सेमिटिक मूल का शब्द है और अरबी से बरास्ता फ़ारसी बोलचाल की हिन्दी में दाखिल हुआ । तारीफ़ के मूल में अराफ़ा क्रिया है जिसका जन्म अरबी धातु ऐन-रा-फ़ा [ع-ر-ف] से हुआ है । ऐन-रा-फ़ा [ 'a-r-f ] में पहचानना, मानना, स्वीकार करना जैसे भाव हैं । प्रकारान्तर से इसके साथ ज्ञान, बोध, अनुभूति, परिचय जैसे भाव जुड़ते हैं । “आपकी तारीफ़” जैसे वाक्य में परिचय का आशय है, न कि सामने वाले के मुँह से उसकी प्रशंसा सुनने की मांग ।  कुछ कोशों में इसका अर्थ गन्ध दिया हुआ है । यूँ देखा जाए तो गन्ध से ही किसी चीज़ की पहचान, बोध या ज्ञान होता है । अरबी का ‘ता’ उपसर्ग लगने से तारीफ़ बनता है जिसमें मूलतः किसी घोषणा, उद्गार (सकारात्मक) का भाव है । तारीफ़ में विवरण, वर्णन भी होता है । तारीफ़ में प्रशंसाभर नहीं बल्कि इसका एक अर्थ गुण भी है । सिर्फ़ प्रशंसा झूठी हो सकती है, मगर गुण का बखान झूठ की श्रेणी में नहीं आता । सो गुण ( परिचय ) की जानकारी, उसकी व्याख्या, विवरण, प्रकटन, बखान आदि तारीफ़ के दायरे में है ।
सामान्यतया परिचय के अर्थ में हम तआरुफ़ शब्द का प्रयोग करते हैं । ताआरुफ़ सिर्फ़ किन्ही दो लोगों को एक दूसरे से मिलाना अथवा किन्ही दो लोगों का आपस में परिचय भर नहीं है । अराफ़ा में जानने का भाव है, जो सीखने के लिए ज़रूरी है । इसी तरह औरों को योग्य बनाने के लिए सीखना ज़रूरी है । हमने जो कुछ जाना है, वही दूसरे भी जान लें, यही तआरुफ़ है । बुनियादी तौर पर तआरुफ़ में समझने-समझाने, शिक्षित होने का भाव है । इसका एक रूप तअर्रुफ़ भी है जिसका अर्थ जान-पहचान, समझना आदि है । इसी शृंखला के कुछ और शब्द हैं जो हिन्दी क्षेत्रों में इस्तेमाल होते हैं जैसे संज्ञानाम आरिफ़ जिसका अर्थ है जानकार, विशेषज्ञ, प्रवीण, निपुण, चतुर आदि । इसी तरह एक अन्य नाम है मारूफ़ । संज्ञानाम के साथ यह विशेषण भी है । मारूफ़ वह है जिसे सब जानते हों । ख्यात । प्रसिद्ध । नामी । जाना-माना । बहुमान्य । मशहूर आदि । साहित्य में मारूफो-मोतबर ( नामी और विश्वसनीय ) या मारूफ़ शख्सियत जैसे प्रयोग जाने-पहचाने हैं ।
इसी कड़ी में उर्फ़ भी है । हिन्दी में उर्फ़ शब्द का प्रयोग भी बहुतायत होता है । उर्फ़ तब लगाते हैं जब किसी व्यक्ति के मूल नाम के अलावा अन्य नाम का भी उल्लेख करना हो । उर्फ़ यानी बोलचाल का नाम, चालू नाम । जैसे राजेन्द्रसिंह उर्फ़ ‘भैयाजी’ । ज़ाहिर है मूल नाम के अलावा जिस नाम को ज्यादा लोकमान्यता मिलती है वही ‘उर्फ़’ है । उस शख्सियत का बोध समाज को प्रचलित नाम से जल्दी होता है बजाय औपचारिक नाम के । इसलिए उर्फ़ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि समाज में उसी नाम से लोग उसे पहचानते हैं । फ़ारसी में इसका उच्चार ‘ओर्फ़’ की तरह होता है । लोग कहतें है, ज़रा सी तारीफ़ करने में क्या जाता है ? अर्थात तारीफ़ में कोई मेहनत नहीं लगती, अपनी जेब से कुछ नहीं जाता । एक धेला खर्च किए बिना तारीफ़ से काम हो जाता है । ऐसी तारीफ़ खुशामद कहलाती है । 
अरबी, तुर्की में ही तारीफ़ का तारिफ़ा रूप भी है जिसका अर्थ किसी चीज़ का मूल्य अथवा किराया है । करें कि जिस तरह किसी चीज़ की गन्ध ही उसका परिचय होती है या यूँ कहें कि किसी चीज़ के अस्तित्व का बोध उसकी गंध से होता है । मनुष्य जीवन में मूल्यवान अगर कुछ है तो वह गुण ही हैं । गुणों से ही स्व-भाव विकसित होता है । मूल्य बना है ‘मूल’ से जिसमें मौलिक, असली, खरा का भाव है । जो जड़ में है । जो उसका स्व-भाव है । जब हम किसी चीज़ का मूल्य आँकते हैं तब गुणवत्ता की परख ही महत्वपूर्ण होती है । गुण ही मूल्य हैं । गुण ही किसी चीज़ को विशिष्ट बनाते हैं, मूल्यवान बनाते हैं । मनुष्य के आचार-विचार ही उसके गुण हैं । वही उसके जीवनमूल्य होते हैं । कहते हैं कि सिर्फ़ तारीफ़ से पेट नहीं भरता । इसका अर्थ यह कि गुण का मूल्यांकन करने के बाद ज़बानी प्रशंसा काफ़ी नहीं है ।
इसी तरह किसी चीज़ का मूल्य दरअसल उसका परिचय ही है । भौतिकवादी ढंग से सोचें तो किसी चीज़ का मूल्य अधिक होने पर हम फ़ौरन उसकी खूबी ( गुण ) जानना चाहते हैं । यानी मूल्य का गुण से सापेक्ष संबंध है । तारिफ़ा में मूल्य का जो भाव है उसका अर्थ भी प्रकारान्तर से परिचय ही है । अरबी के तारिफ़ा में जानकारी, सूचना जैसे भावों का अर्थसंकोच हुआ और इसमें मूल्य, मूल्यसूची, खर्रा, फेहरिस्त समेत दाम, दर, शुल्क, भाव, मूल्य, कर जैसे आशय समाहित हो गए । यह जानना भी दिलचस्प होगा कि अंग्रेजी के टैरिफ़  tariff शब्द का मूल भी अरबी का तारिफ़ा ही है । अरब सौदागरों का भूमध्यसागरीय क्षेत्र में दबदबा था । मूल्यवाची अर्थवत्ता के साथ तारिफ़ा लैटिन में दाखिल हुआ और फिर अंग्रेजी में इसका रूप टैरिफ़ हो गया जिसमें मूलतः शुल्क, दर या कर वाला अभिप्राय है ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, October 30, 2012

बच के रहना उस्ताद से !!

सम्बन्धित शब्द-1.गुरुघंटाल. 2.इच्छा. 3.ईंट. 4.ठग. 5.पाखंडी. 6.पालक.7.मदारी. 8.जादूगर. 9.पंडित. 

अक्सर शब्द अपना चोला बदल लेते हैं । “हरि रूठे गुरु ठौर है । गुरु रूठे नहीं ठौर।।” जैसी उक्ति पर भरोसा करने वाले समाज ने जब गुरु की होशियारी, सूझबूझ तथा दूसरों पर भारी पड़ने जैसे गुणों का प्रयोग अभिव्यक्ति को बढ़ाने के लिए किया तो गुरु की अर्थवत्ता तो बढ़ गई मगर इसकी अवनति भी हो गई । अब चोर, ठग, जालसाज़, धंधेबाज, चालबाज सब गुरु की श्रेणी में आ गए । ‘गुरुघंटाल’ जैसा मुहावरा और “गुरु, हो जा शुरु” जैसी कहावत चल पड़ी । ‘उस्ताद’ का भी यही हाल है और गुरुपद पर पहुँचे हुए तमाम लोग उस्ताद का दर्ज़ा भी पा गए । अरबी, फ़ारसी और हिन्दुस्तानी में तो उस्ताद की महिमा कायम रही मगर हिन्दी में बहुत पहले से इस शब्द ने अपना रुतबा छोड़ दिया था, मगर इसकी रच-बस बनी रही । यूँ उस्ताद का अर्थ गुरू, शिक्षक, प्रशिक्षक, हुनरमंद, कलाकार, हरफ़नमौला होता है । उस्ताद के स्त्रीवाची ‘उस्तानी’ का जन्म हिन्दुस्तानी की कोख से हुआ है जिसमें गुरुपत्नी या गुरुआनी का भाव है ।
उस्ताद’ शब्द को अरबी का समझा जाता है मगर मूलतः यह सामी परिवार का न होकर भारत-ईरानी परिवार का शब्द है । अरबी में इसका रूप ‘उस्ताध’ है और फ़ारसी में ‘ओस्ताद’। हिन्दी और भारत की अन्य बोलियों में भी उस्ताद के कई रूप प्रचलित हैं जैसे उस्ताद, उत्ताद, उस्ताज, वस्ताद ( मराठी, दक्कनी ) आदि । यूँ देखा जाए तो उस्ताद के उस्ताज रूप को गँवारू समझा जाता है और माना जाता है कि उस्ताद में यह प्रदूषण भारत आने के बाद आया होगा मगर ऐसा नहीं है । अरबी में उस्ताद का बहुवचन असातिजा(ह) होता है । उर्दू में इसे असातिजा लिखा जाता है जैसे “मदरसों में असातिजा ( शिक्षकों) की भरती।“ मज़े की बात यह कि एकवचन रूप में अरबी में उस्ताद के लिए अरबी के ‘दाल’ वर्ण का प्रयोग होता है मगर बहुवचन में इसी ‘द’ मे तब्दीली होती है और वह ‘ज़’ अर्थात ‘ज़ाल’ में बदल जाता है । इसी वजह से उस्ताद के स्थान पर उस्ताज़ कहने का चलन भी अरबी में ही शुरू हो गया था । अरबी प्रभाव में ही हिन्दुस्तानी में भी उस्ताज रूप प्रचलित हुआ । यह हमारा गँवारूपन नहीं है, ‘असातिजा’ की गवाही सामने है ।
फिक आगस्ट की (कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ इंडो-यूरोपियन लैंग्वेजेज़) में ज़ेंदावेस्ता के अइविस्ती शब्द को उस्ताद का मूल माना गया है । जिसमें शिक्षक, गुरु, संरक्षक जैसे भाव हैं । यह कोश ‘अईविस्ती’ को संस्कृत के अभिष्टि के समरूप बताता है । विल्हैम गिगर भी हैंडबुक ऑफ़ अवेस्ताप्राशे में यही बात कहते हैं । डीएन मैकेन्जी के पहलवी कोश में अइविस्ती का पहलवी रूप आस्ताद है । मैकेन्जी के मुताबिक मनिशियन पर्शियन में इसका रूप अविस्तद था । आज की फ़ारसी में इसका रूप ओस्ताद हुआ । जॉन प्लैट्स के कोश में पहलवी रूप ओस्तात और पुरानी फ़ारसी में वश्तात रूप बताया गया है । फिक आगस्ट की (कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ इंडो-यूरोपियन लैंग्वेजेज़) में अईविस्ती को संस्कृत के अभिष्टि के समरूप बताता है ।
मोनियर विलियम्स की संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी में अभिष्टि का अर्थ पालक, संरक्षक, श्रेष्ठ, विजेता आदि बताया गया है साथ ही सहायक या मददगार जैसी अर्थवत्ता भी इसमें है । अभिष्टि बना है इष्ट में अभि उपसर्ग लगने से । हिन्दी-संस्कृत में ईश्वर के अर्थ में इष्ट या इष्टदेव शब्द भी प्रचलित है । यूँ इष्ट का अर्थ होता है इच्छित, प्रिय, अभिलषित, पूज्य, आदरणीय आदि । इच्छा, इषणा यानी अभिलाषा , कामना जैसे शब्द भी इष् से ही बने हैं । वैदिक अभि उपसर्ग में मूलतः निकट, सामने, पहले, ऊपर जैसे भाव हैं । गौरतलब है कि संस्कृत के अभि उपसर्ग का ज़ेंद रूप अइवी या अइबी (aiwi, aibi ) होता है । अभिष्टि का अर्थ हुआ जो इच्छापूर्ति करे, जो कामनाओं को पूरा करे अर्थात स्वामी, पालक, गुरु, गाईड आदि । अभिष्टि का बरास्ता जेंदावेस्ता आज की फ़ारसी में रूपान्तर कुछ यूँ हुआ अभिष्टि = अइविस्ती > अविस्तद (वश्तात) > ओस्तात > ओस्ताद ( फ़ारसी) / उस्ताद (हिन्दी-उर्दू) ।
यूँ उस्ताद में शिक्षक, स्वामी के साथ-साथ निपुण, प्रवीण, पण्डित, गुणी, सिद्धहस्त, सुविज्ञ, होशियार, कुशल, दक्ष, विशेषज्ञ जैसे भाव भी हैं । उस्ताद की व्याप्ति दुनिया की कई भाषाओं में है जैसे अज़रबेजानी और उज्बेकी में यह उस्ता है तो स्वाहिली में स्तादी । तुर्किश में यह उस्तात है । स्पेनिश में इसका रूप उस्तेद होता है । उर्दू में सामान्य शिक्षक उस्ताद कहलाता है मगर हिन्दी में उस्ताद का दर्ज़ा वही है जो पण्डित का है अर्थात निष्णात या प्रवीण । सामान्य शिक्षक की तुलना में पण्डित का प्रयोग उपाधि और सम्मान की तरह होता है । आमतौर पर कलागुरुओं को उस्ताद कहा जाता है । संगीत के क्षेत्र में स्पष्टतः आला दर्ज़े के मुस्लिम फ़नकारों के नाम के आगे उस्ताद लगता है और गुरुपद पर पहुँचे हिन्दू कलावंतों के आगे पण्डित लगाया जाता है । गाँव-देहात का आदमी मदारी और जमूरे के खेल की मार्फ़त उस्ताद शब्द से परिचित है । गौरतलब है कि मदारी या जादूगर को उसका जमूरा उस्ताद कहता है । उसका उच्चार भी ओस्ताद की तरह होता है । मदारी जो बाजीगरी दिखाता है, लोग उससे चमत्कृत होते हैं । उस्ताद की उस्तादी यहाँ उभरती है और उस्तादी दिखाना चमत्कृत करने से जुड़ जाता है । बाद में हाथ की सफ़ाई दिखाने, दूसरों को बेवकूफ़ बनाने या ठगने जैसे कामों को भी उस्तादी कहा जाने लगा । यही हश्र कलाकार और कलाकारी शब्द का भी हुआ जैसे- “उससे बच कर रहना, बहुत बड़ा कलाकार है!!!”
मराठी में उस्ताद के वस्ताद रूप को तवज्जो दी जाती है । दरअसल वस्ताद शब्द भी मराठी के साँचे में नहीं ढला बल्कि स्थानीय प्रभाव के साथ दक्कनी तुर्कों द्वारा अपनाया रूपान्तर है । यूँ मराठी में भी उस्ताद चलता है । उस्ताद, उस्तादगिरी, उस्तादी जैसे शब्द यहाँ प्रचलित हैं । इसी तर्ज़ पर वस्तादी, वस्तादगिरी भी प्रचलित हैं । उस्तादाना का अर्थ होता है उस्तादों की तरह । जिस तरह पाखंड सम्प्रदाय के साधु पाखंडी कहलाते थे पर ढकोसलों के चलते इस शब्द की अवनति हो गई और पाखंडी बदले हुए माहौल में ढोंगी और फ़र्ज़ी व्यक्ति के दर्ज़े पर पहुँच गया । यही उस्ताद के साथ भी हुआ । हिन्दी का उस्ताद धूर्त भी है और चालाक भी । वह गुरुघंटाल है और महाचालबाज है । कभी उस्ताद के पास जाने की नसीहतें देने वाला समाज ही आज कहता है कि “फलाँ से बच कर रहना, उस्ताद है !!” “उस्तादी दिखाना” आज हुनर या होशियारी से अलहदा छल या ठगी का प्रदर्शन हो गया है ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


Blog Widget by LinkWithin