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Monday, December 28, 2015

बात तफ़सील की...


वि वरण या विस्तार के अर्थ में हिन्दी में तफ़सील تفصيل शब्द का इस्तेमाल भी खूब होता है जो फ़ारसी से हिन्दी में आया ज़रूर पर है अरबी शब्द। मराठी में तफ़सील का रूप तपशील होता है। तफ़सील में सीमा, हद या विभाजन का भाव है। लिखित अथवा कही गई बात या चर्चा की व्याख्या-विश्लेषण भी इसके दायरे में आता है। एक मुहावरा है-तफ़सीलवार अर्थात किसी बात को तोड़ तोड़ कर बताना। अलग-अलग कर बताना। दरअअसल यही विवरण देना यानी तफ़सीलवार बताना हुआ। उर्दू में तफ़्सील लिखा जाता है। इस कड़ी के कई शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे फ़स्ल (फसल), फ़ैसला, फ़ासला, फ़सील, तफ़सील और मुफ़स्सिल।

तफ़सील को थोड़ा तफ़सील से समझा जाए। तफ़सील का रिश्ता यूँ तो अरबी शब्द फ़साला से है जो फ़ा-साद-लाम (फ-स-ल) अर्थात ف- ص- ل से है जिसमें विभाजन, अलग करना, किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच का अन्तराल या दूरी, घेरा या बाड़ा, अवरोध या सीमा, पृथक, विवरण, विस्तार, निर्णय आदि है, किन्तु मूल सेमिटिक धातु है P-S-L अर्थात पू-सादे-लम्द। ध्यान रहे प्राचीन सेमिटिक लिपियों में ‘फ’ ध्वनि नहीं थी। मज़े की बात यह कि आज अरबी लिपि में ‘प’ ध्वनि के लिए कोई चिह्न नहीं है।

P-S-L का अर्थ था पत्थर को तराशना। बात यह है कि इसका सम्बन्ध प्राचीन अरबी समाज में प्रचलित सनमपरस्ती अर्थात मूर्तिपूजा से था यानी बुत तराशना। गौर करें, प्रतिमा निर्माण के लिए पत्थर को धीरे धीरे विभाजित किया जाता है। अनघड़ पत्थर को तोड़ कर, तराशकर जो रूपाकार निर्मित होता है उस भाव का विस्तार बाद में अरबी के फ़ा-साद-लाम में मूलतः विभाजन हुआ इस कड़ी के कई शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे फ़स्ल (फसल), फ़ैसला, फ़ासला, फ़सील, तफ़सील और मुफ़स्सिल।

फस्ल का मूलार्थ है अंतर, दूरी या अंतराल। दो ऋतुओं के बीच स्पष्ट अंतराल होता है। अर्थात काल, समय या वक्त का भाव भी फस्ल में है। फस्ले बहार या फस्ले गुल का अर्थ वसंत ऋतु और फस्ले खिज़ां यानी पतझड़। फ़स्ल यानी मौसम और हर मौसम की पैदावार को मिल गया फसल का नाम। इसी तरह किसी पुस्तक के अलग-अलग अध्यायों को भी फस्ल ही कहते हैं। किसी ज़माने में दो फसलों के बीच के अंतराल में कोई भी मामला सुलझा लिया जाता था इसलिए उसे फ़ैसला कहा गया। फ़ैसला किसी उलझी बात का सुलझा हुआ, उससे अलग किया गया अंश ही होता है। अंतराल या दूरी के अर्थ में फ़स्ल से ही बना है फासला। दो फसलों के बीच का वक्त ही फासला कहलाता था। प्राचीन बस्तियां परकोटों से घिरी होती थीं जिन्हें फ़सील कहते थे। शहर और वीराने का फासला जो बताए, वही है फ़सील।

इस विवरण के बाद तफ़सील की तफ़सील स्पष्ट हुई होगी। तफ़सील में किसी कविता, कहानी पर टीक या टिप्पणी लिखना भी शामिल है। कोई फ़ेहरिस्त भी तफ़सील हो सकती है। स्पष्ट करने वाली हर क्रिया तफ़सील के दायरे में आती है। कोई भी विवरण तफ़सील या ब्योरा है। ये सारे भाव विकसित हुए हैं विभाजन करने से जो फ़साला मूलभाव है। किसी चीज़ का विभाजन दरअसल विस्तार की पहली शर्त है। यह ब्रह्माण्ड एक पिण्ड के विभाजन का परिणाम है। अन्तरिक्ष में ये पिण्ड लगातार फैल रहे हैं। विस्तार हो रहा है। यह विभाजन का परिणाम है। लिखित विवरण तब ज्यादा समझ में आते हैं जब उन्हें अलग अलग अध्यायों में समझाया जाए। गौर करें समझाना भी विस्तार का ही एक नाम है। अध्याय टुकड़ा या खण्ड ही है, जो किसी मूल पिण्ड का विभाजित हिस्सा है।

इसी तरह पश्चिमी उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र में मुफ़स्सल शब्द के अनेक रूप प्रचलित हैं मसलन मुफस्सिल (यूपी-बिहार), मोफस्सल (बंगाल) और मुफशील (मराठी) इन सभी भाषाओं में मुफ़स्सल का अभिप्राय भी अन्तराल, जुड़ा हुआ, सटा हुआ या अलग किया हुआ, दूर का, विस्तार ही होता है। मुफ़स्सिल का प्रयोग आमतौर पर भौगोलिक तौर पर दूर के क्षेत्रो के लिए होता है। इसका एक अर्थ देहात भी होता है जो शहर से सटा भी हो सकता है और दूरस्थ भी। मुफ़स्सिल अदालतें यानी दूर की या शहर की परिधि से बाहर के न्यायालय। मुफ़स्सिल संवाददाता यानी देहात के रिपोर्टर या ग्रामीण संवाददाता।
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Friday, May 24, 2013

गाछ और पेड़

mango-tree 

पे ड़ के अर्थ में पूर्वी भारतीय बोलियों में ‘गाछ’ शब्द बहुत आम है। बांग्ला में भी ‘गाछ’ का अर्थ वृक्ष ही है। पूर्वी बोलियों में ‘गाछी’ शब्द का अभिप्राय वृक्षवाटिका भी होता है और आम्रकुंज भी। खासतौर पर आम, कटहल, पीपल जैसे पेड़ों के समूह के लिए इस शब्द का प्रयोग होता है। रतीनाथ की चाची उपन्यास में बाबा नागार्जुन ने बीजू आमों के बगीचे को गाछी कहा है। ‘बीजू’ यानी आम का वह पेड़ जिसे बीज बो कर लगाया गया हो। ‘कलमी’ आमों का बगीचा कलमी बाग कहलाता है। ‘गाछी’ का अर्थ छोटा पेड़ या पौधा भी होता है। इसी तरह ‘बाड़ी’ यानी छोटे बगीचे के लिए भी गाछी का प्रयोग देखा जाता है। कहीं कहीं गाछी और भी लघुता के चलते ‘गछिया’ हो जाती है। हिन्दी शब्दसागर में गाछ शब्द की प्रविष्टि में- “खजूर की नरम कोंपल जिसे लोग पेड़ कट जाने पर सुखाकर रख छोड़ते हैं और तरकारी के काम में लाते हैं । बोरा जो बैल आदि पशुओं की पीठ पर बोझ लादने के लिये रखा जाता है।” वैसे हिन्दी में पेड़ के लिए कई शब्द हैं जैसे अग, अगम, विटप, वृक्ष, द्रुम, अद्रि, कुट, जर्ण, झाड़, तरु, तरुवर, दरख़्त, पादप, भूजात या कुठारू आदि।
वृक्ष शब्द से कुछ नए नाम भी जन्मे हैं। वृक्ष से ‘व’ का लोप हुआ और रह गया ‘रूक्ष’। अब रूक्ष से मालवी-राजस्थानी में रूँख, रूँखड़ा जैसे कुछ नए नाम भी चल पड़े। इसी तरह वृक्ष से बिरछ, बिरिख या बिरिछ जैसे नाम भी चलन में हैं और लालित्यपूर्ण लेखन या देशी तड़का लगाने के लिए इनका प्रयोग सृजनधर्मी करते रहते हैं। वैसे वृक्ष के लिए ‘पेड़’ शब्द सर्वाधिक प्रचलित है। इसकी व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों में दो तरह के मत हैं। कुछ लोगों का मानना है कि पेड़ का जन्म प्राकृत के ‘पट्टी’ की कोख से हुआ है। ‘पट्टी’ के मूल में ‘पत्री’ है जिसका रिश्ता संस्कृत के ‘पत्र’ से है। पत्र यानी पत्ता। जॉन प्लैट्स इसी मत के हैं। इसके विपरीत कुछ विद्वानों का मानना है कि पेड़ दरअसल ‘पिण्ड’ से आ रहा है। पिण्ड से पेड़ के उपजने की बात तार्किक भी है क्योंकि संस्कृत वाङ्मय के अनेक संदर्भों में पिण्ड का आशय वृक्ष से जुड़ता रहा है। कई तरह के वृक्षों के साथ ‘पिण्ड’ शब्द प्रत्यय या उपसर्ग की तरह लगा दिखाई देता है जिसमें ‘पिण्ड’ का अर्थ वृक्ष ही है जैसे पिण्ड खजूर। पिण्ड शब्द का अर्थ ताड़ जाति का वृक्ष, अशोक वृक्ष आदि भी है। इसी तरह आयुर्वैदिक गुणों वाले बेर जाति के एक कँटीले वृक्ष विकंकत का नाम पिण्डारा है जिसमें पिण्ड साफ़ नज़र आ रहा है। पिण्ड से पेंड और पेड़ का रूपान्तर होता चला गया। इसके विपरीत पत्र से पेड़ के रूपान्तर की कल्पना नहीं की जा सकती।
गाछ की बात। ‘गाछ’ अर्थात वृक्ष के मूल में संस्कृत शब्द ‘गच्छ’ है जिसका अर्थ है जाना, चलना, बढ़ना, गति करना। बतौर वृक्ष, गच्छ में लगातार बढ़ना, गति करना, वृद्धि करना जैसे भाव है। यूँ देखा जाए तो गति न करना भी वृक्ष की खासियत है और इस वजह से ही ‘अगम’ या ‘अग’ अर्थात जो चलते-फिरते नहीं, जैसे नाम भी उसे मिले हैं। यह दिलचस्प है कि निरन्तर ऊर्ध्वाधर गति और वर्ष में कई रूप बदलने वाले अनूठे-अपूर्व गुण के चलते ही एक ही स्थान पर बने रहने के बावजूद पेड़ों में लगातार गति करने का लक्षण भी देखा गया और इसीलिए उसे ‘गच्छ’ कहा गया और फिर उससे गाछ, गाछी जैसे शब्द बने हैं। पेड़ की व्युत्पत्ति पिण्ड से होने का एक मज़बूत आधार ‘गच्छ’ से बने एक समास में छुपा है।
गौतम बुद्ध के जीवन पर आधारित प्रख्यात बौद्ध ग्रन्थ महावस्तु में ‘गच्छ-पिण्ड’ शब्द आया है। मूलतः यह समास है। डॉ सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या इसे विचित्र समास मानते हुए इसके लिए अनुवादात्मक समास पद निर्धारित करते हैं। वैसे यह द्वन्द्व समास का उदाहरण है। ‘गच्छ’ यानी पेड़, पौधा आदि। गच्छ में निहित बढ़ने के भाव से गच्छ में वृक्ष का संकेत भी शामिल हुआ जिससे गाछ, गाछी आदि बने। पिण्ड किसी ढेर, अचल, ठोस, घन जैसा पदार्थ ही पिण्ड है। इसी तरह बढ़ने के अर्थ से ही गच्छ में परिवार, कुल या कुटुम्ब का भाव भी आया। इसी तरह पिण्ड में भी परिवार या कुल का भाव है। पश्चिमोत्तर भारत की बोलियों में मनुष्यों के आबाद समूह को पिण्ड भी कहा जाता है। गाँव के अर्थ में भी पिण्ड का प्रयोग होता है। अब जब पिण्ड का अर्थ भी वृक्ष है और गच्छ में भी पेड़ का ही भाव है तब ‘गच्छ-पिण्ड’ यानी ‘पेड़-पेड़’ जैसे समास से क्या अर्थसिद्धि हो सकती है? ज़ाहिर है जिस तरह ‘अच्छा-भला’ ‘ऋषि-मुनि’, ‘भाई-बंध’ या ‘कंकर-पत्थर’ आदि द्वद्व समास के उदाहरण हैं वैसा ही ‘गच्छ-पिण्ड’ के साथ भी है। मगर बात इतनी आसान नहीं है।
मेरे विचार में ‘गच्छ’ में वृद्धि का जो भाव है उससे ही ‘गच्छ-पिण्ड’ की अलग अर्थवत्ता स्थापित होती है। कुल, परिवार का महत्व उसके बढ़ते जाने के गुण से ही है। बाँस शब्द वंश से बना है। पूर्ववैदिक युग में वंश शब्द का अर्थ बांस ही रहा होगा। प्राचीन समाज में लक्षणों के आधार पर ही भाषा में अर्थवत्ता विकसित होती चली गई। स्वतः फलने फूलने के बाँस के नैसर्गिक गुणों ने वंश शब्द को और भी प्रभावी बना दिया और एक वनस्पति की वंश-परंपरा ने मनुष्यों के कुल, कुटुंब से रिश्तेदारी स्थापित कर ली। सो ‘गच्छ’ में निहित परिवार, कुल, कुटुम्ब के अर्थ में ही अगर वृद्धि का अर्थ वंश-परम्परा से लगाया जाए तो ‘गच्छ-पिण्ड’ का सीधा सा अर्थ वंश-वृक्ष निकलता है। बौद्धग्रन्थ महावस्तुअवदानम् में बुद्ध के जातक रूपों का उल्लेख है। स्पष्ट है कि यहाँ गच्छ-पिण्ड से तात्पर्य वंश-वृक्ष से ही होगा।

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Friday, January 11, 2013

देहात की बात

gaon

ग्रा मीण अंचल के लिए गाँव-देहात शब्दयुग्म का हिन्दी में खूब प्रयोग होता है । “वे दूर देहात से आए हैं,” “देहात में रहने के अपने फ़ायदे हैं,” जैसे वाक्यों में देहात का अर्थ गाँव ही है । गँवई या ग्रामीण के लिए देहात से देहाती विशेषण बनता है । देहात हमें भारतीय परिवेश से जुड़ा शब्द लगता है तो इसलिए क्योंकि यह भारत-ईरानी भाषा समूह का शब्द है और फ़ारसी मूल के ‘देह’ से हिन्दी की बोलियों में आया । फ़ारसी में देह के दीह, दिह जैसे रूप भी मिलते हैं । देह यानी गाँव और देह का बहुवचन देहात यानी ग्रामीण क्षेत्र । हिन्दी में देह, देहात जैसे शब्दों का प्रयोग ग्यारहवीं सदी से ही शुरू हो चुका था । यूल-बर्नेल के एंग्लो-इंडियन कोश हॉब्सन-जॉब्सन के अनुसार पंद्रहवीं सदी के कम्पनी राज के दस्तावेज़ों में कोलकाता को ‘दे कलकत्ता’ लिखा गया है । यह ‘दे’ दरअसल फ़ारसी का ‘देह’ है जिसका अर्थ है ग्राम । ‘दे कलकत्ता’ का अर्थ हुआ गाँव कलकत्ता जो तब हुगली के मुहाने पर स्थित एक मामूली बसाहट थी । करीब साढ़े तीन सौ साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की कासिम बाजार कोठी का फर्स्ट आफिसर था जाब चार्नक जो बाद में कंपनी एजेंट बना और उसी की देख-रेख में सूतानटी और ‘दे कलकत्ता’ का विकसित रूप आज की कोलकाता महानगरी है ।
ख्यात भाषाविद जूलियस पकोर्नी द्वारा खोजी गई प्रोटो भारोपीय धातुओं में dheigh (-धिघ, मोनियर विलियम्स ) से बना है अवेस्ता का ‘देगा’ जिसका अर्थ है निर्माण, बनाना, मिट्टी, ढाँचा अथवा लेपन । ईरानी परिवार की भाषाओं में इसके अन्य रूप हैं दिज़, देज़, दाएज़ा, दाएजायति जिनका अर्थ है दीवार, परकोटा या क़िला । अवेस्ता में पइरीदाएज़ा शब्द है जिसका अर्थ है जन्नत, वैकुण्ठ, स्वर्गवाटिका या परकोटा । अंग्रेजी का पेराडाइस इसका ही रूपान्तर है । यूनिवर्सिटी ऑफ़ टैक्सास के लिंग्विस्टिक रिसर्च सेंटर के मुताबिक पुरानी फ़ारसी में ‘दिदा’ का अर्थ कोट या क़िलेबंदी होता है । हिन्दी का ‘दीवार’ इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की इंडो-ईरानी शाखा का शब्द है और भारतीय भाषाओं में इसकी आमद फ़ारसी से हुई है । यह अवेस्ता के एक सामासिक पद ‘देगावरा’ [dega-vara] से बना है । संस्कृत की ‘दिह्’ धातु का रिश्ता dheigh से जुड़ता है । इसका अर्थ परकोटा, आश्रय, कोट, हदबंदी, किलेबंदी करना, बचाव करना, लीपना, पोतना आदि । ध्यान रहे घास-फूस के ढाँचे को मिट्टी से सान-पोत कर उसे मज़बूती दी जाती थी ।
फ़ारसी के ‘दहलीज’ शब्द में यही ‘देह’ है । इन सभी में बनाने या निर्माण की क्रिया शामिल है । ‘दहलीज’ का अर्थ होता है पौड़ी, सीढ़ी, द्वार या चौखट । इसी मूल से बने हैं देहरी, देहरा, देहरी जैसे शब्द जो चौखट या द्वार की अर्थवत्ता रखते हैं । गौर तलब है कि उत्तराखंड के कई स्थानों के साथ कोट, पौड़ी या द्वार शब्द जुड़े नज़र आते हैं जैसे कोटद्वार, हरिद्वार, पौड़ी गढ़वाल आदि । जहाँ तक ‘देहरादून’ के देहरा की व्युत्पत्ति का प्रश्न है , तमाम विकल्पों के साथ फ़ारसी के देह, दिह से भी देहरा की व्युत्पत्ति सम्भावित है जिसमें गाँव, दीवार, परकोटा जैसे भाव हैं । इस तरह ‘देहरादून’ का अर्थ हुआ वादी का गाँव । ग्वालियर के पास एक घाटीगाँव भी है । देहरादून का एक अर्थ दर ऐ वादी अर्थात घाटी का दरवाज़ा भी हो सकता है । वह बस्ती जहाँ से द्रोणिका अर्थात दून घाटी शुरू होती है । वैसे देहरादून का रिश्ता देवघर या डेरा से भी जोड़ा जाता है । इसी कड़ी में ‘टिहरी गढ़वाल’ भी आता है । संदर्भों के अनुसार टिहरी / टेहरी शब्द ‘त्रिहरी’ यानी तीन विषयों ( मनसा, वाचा, कर्मणा ) का शमन करने वाला स्थान । यह व्युत्पत्ति काल्पनिक है । ‘टिहरी’ शब्द भी ‘देहरी’ का रूपान्तर है, ऐसा मुझे लगता है ।
संस्कृत की दिह् धातु से बना है ‘देह’ शब्द जिसका अर्थ काया, शरीर होता है मगर इसका मूलार्थ है ढाँचा, आवरण, कवच या बचाव । गौर करें दिह् में निहित लेपन के अर्थ पर । किसी वस्तु पर लेपन उसे सुरक्षित बनाने के लिए ही किया जाता है । देह एक तरह से शरीर के भीतरी अंगों का सुरक्षा कवच है । मोनियर विलियम्स के कोश के अनुसार ‘देह’ का अर्थ है आवरण, लेपन, मिट्टी, ढाँचा, साँचा, गूँथना, ढालना आदि। दार्शनिक अर्थों में देह को मिट्टी से निर्मित भी कहा जाता है और इसे किले की उपमा भी दी जाती है। गौरतलब है कि अंग्रेजी के ‘डो’ dough का अर्थ होता है सानना, गूँथना आदि । डो का रिश्ता भी प्रोटो भारोपीय धिघ् dheigh से जुड़ता । कबीर ने मनुष्य को माटी का पुतला यूँ ही नहीं कहा । देह, दिह्, दिज़् शब्दों के भावार्थों पर जाएँ तो माटी के पुतले के निर्माण की सारी क्रियाएँ स्पष्ट होती है यानी मिट्टी को पीटना, सानना, राँधना, गूँथना, साँचा बनाना और फिर पुतला बनाना । स्पष्ट है कि संस्कृत के दिह् और फ़ारसी के दीह या देह परस्पर समानार्थी हैं और एक ही मूल से निकले हैं । 
गौर करें, फ़ारसी के दीह / दिह या देह शब्द में मूलतः क़िलेबंदी, हदबंदी या परकोटा बनाने का भाव ही है । प्राचीनकाल में आबादियाँ इसी तरह रहती थीं । ‘वास’ करने की वजह से ही राजस्थानी में ‘बासा’ शब्द है । बस्ती के मूल में भी ‘वास’ ही है । सर रॉल्फ़ लिली टर्नर के कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ़ इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़ के अनुसार संस्कृत के देही में ढूह, क़िला, परिधि, चाहरदीवारी, परकोटा की अर्थवत्ता का समावेश हैं । सिन्धी में यह दिहु है जिसका अर्थ पलस्तर लगाना, परत चढ़ाना, मज़बूत करना, ढूह बनाना आदि । फ़ारसी में इसका एकवचन रूप दिह या देह होता है और बहुवचन रूप देहात है जिसका अर्थ ग्रामीण क्षेत्र है । डीएन मैकेंजी के पहलवी कोश में ‘देह’, ‘दिह’ में देश, इलाक़ा, ग्राम या क्षेत्र, भूमि जैसे भाव हैं और इससे बने पहलवी के ‘दहिगन’ में ग्रामीण या कृषक का भाव है । दहिगन का फ़ारसी रूप देहक़ान होता है । हिन्दी में इसे दहकान भी लिखा जाता है । देहक़ानी या देहक़ानियत का अर्थ होता है गँवारू, गँवई या उजड्डपन । यह ठीक वैसे ही है जैसे ग्राम से गाँव और फिर गँवई । किसी व्यक्ति को असभ्य के अर्थ में गँवार इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वह उजड्ड होता है । मगर इसका आशय यह है कि ग्रामीण व्यक्ति शहरी संस्कार से अपरिचित होता है सो वह गँवार हुआ । बाद में गँवार का रूढ़ार्थ ही असभ्य हो गया ।

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Wednesday, January 2, 2013

क़िस्त दर क़िस्त…

Money
हि न्दी के बहुप्रयुक्त शब्दों में क़िस्त का भी शुमार है हालाँकि अक्सर ज्यादातर लोग ‘क़िस्त’ को ‘किश्त’ लिखने और बोलने के आदी हैं । ‘प्रसाद’ तथा ‘सौहार्द’ के ग़लत रूप ( प्रशाद, सौहार्द्र ) भी इसी तरह ज्यादा प्रचलित हैं । हिन्दी में क़िस्त का आशय हिस्सा, भाग, आंशिक भुगतान, होता है । इसके अलावा इसमें न्याय या इन्साफ़ की अर्थवत्ता भी है । यूँ तो क़िस्त शब्द हिन्दी में बरास्ता फ़ारसी आया है और शब्दकोशों में इसकी हाजिरी अरबी के खाते में नज़र आती है । यह बहुरूपिया भी है और यायावर भी । खोज-बीन करने पर अरबी के कोशों में इसे ग्रीक भाषा का मूलनिवासी माना गया है । देखते हैं किस्त की जनमपत्री । 

हिन्दी में किस्त का सर्वाधिक लोकप्रिय प्रयोग कई हिस्सों में भुगतान के लिए होता है । आजकल इसके लिए इन्स्टॉलमेंट या इएमआई शब्द भी प्रचलित हैं मगर किस्त कहीं ज्यादा व्यापक है । भुगतान-संदर्भ के अलावा मोहम्मद मुस्तफ़ा खाँ मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश के अनुसार किस्त में सामान्य तौर पर किसी भी चीज़ का अंश, हिस्सा, टुकड़ा, portion या भाग का आशय है । अरबी कोशों में अंश, हिस्सा, पैमाना, पानी का जार या न्याय जैसे अर्थ मिलते हैं । न्याय में निहित समता और माप में निहित तौल का भाव किस्त में है और इसीलिए कहीं कहीं किस्त का अर्थ न्यायदण्ड या तुलादण्ड भी मिलता है । 

बसे पहले क़िस्त के मूल की बात । अरबी कोशों में क़िस्त को अरबी का बताया जाता है जिसकी धातु क़ाफ़-सीन-ता (ق س ط) है । हालाँकि अधिकांश भाषाविद् अरबी क़िस्त का मूल ग्रीक ज़बान के ख़ेस्तेस से मानते हैं जिसका अर्थ है माप या पैमाना । लैटिन ( प्राचीन रोम ) में यह सेक्सटैरियस (Sextarius) है । ग्रीक ज़बान का ख़ेस्तेस, लैटिन के सेक्सटैरियस का बिगड़ा रूप है । यूँ ग्रीक भाषा लैटिन से ज्यादा पुरानी मानी जाती है मगर भाषाविदों का कहना है कि सेक्सटैरियस रोमन माप प्रणाली से जुड़ा शब्द है । यह माप पदार्थ के द्रव तथा ठोस दोनों रूपों की है । सेक्सटेरियस दरअसल माप की वह ईकाई है जिसमें किसी भी वस्तु के 1/6 भाग का आशय है । समूचे मेडिटरेनियन क्षेत्र में मोरक्को से लेकर मिस्र तक और एशियाई क्षेत्र में तुर्की से लेकर पूर्व के तुर्कमेनिस्तान तक ग्रीकोरोमन सभ्यता का प्रभाव पड़ा । खुद ग्रीक और रोमन सभ्यताओं ने एक दूसरे को प्रभावित किया इसीलिए यह नाम मिला । 

सेक्सटैरियस में निहित ‘छठा भाग’ महत्वपूर्ण है जिसमें हिस्सा या अंश का भाव  तो है ही साथ ही इसका छह भी खास है । दिलचस्प है कि सेक्सटैरियस में जो छह का भाव है वह दरअसल भारोपीय धातु सेक्स (seks ) से आ रहा है । भाषाविदों का मानना है कि संस्कृत के षष् रूप से छह और षष्ट रूप से छट जैसे शब्द बने  । अवेस्ता में इसका रूप क्षवश हुआ और फिर फ़ारसी में यह शेश हो गया । ग्रीक में यह हेक्स हुआ तो लैटिन में सेक्स, स्लोवानी में सेस्टी और लिथुआनी में सेसी हुआ । आइरिश में यह छे की तरह ‘से’ है । अंग्रेजी के सिक्स का विकास जर्मनिक के सेच्स sechs से हुआ है । सेक्सटैरियस का बिगड़ा रूप ही ग्रीक में खेस्तेस हुआ । खेस्तेस की आमद सबसे पहले मिस्र मे हुई। 

मझा जा सकता है कि इसका अरब भूमि पर प्रवेश इस्लाम के जन्म से सदियों पहले हो चुका था क्योंकि अरब सभ्यता में माप की इकाई को रूप में क़िस्त का विविधआयामी प्रयोग होता है । यह किसी भी तरह की मात्रा के लिए इस्तेमाल होता है चाहे स्थान व समय की पैमाईश हो या ठोस अथवा तरल पदार्थ । हाँ, प्राचीनकाल से आज तक क़िस्त शब्द में निहित मान इतने भिन्न हैं कि सबका उल्लेख करना ग़ैरज़रूरी है । खास यही कि मूलतः इसमें भी किसी पदार्थ के 1/6 का भाव है जैसा कि पुराने संदर्भ कहते हैं । आज के अर्थ वही हैं जो हिन्दी-उर्दू में प्रचलित हैं जैसे फ्रान्सिस जोसेफ़ स्टैंगस के कोश के अनुसार इसमें न्याय, सही भार और माप, परिमाप, हिस्सा, अंश, भाग, वेतन, किराया, पेंशन, दर, अन्तर, संलन, संतुलन, समता जैसे अर्थ भी समाए हैं । क़िस्त में न्याय का आशय भी अंश या भाग का अर्थ विस्तार है । कोई भी बँटवारा समान होना चाहिए । यहाँ समान का अर्थ 50:50 नहीं है बल्कि ऐसा तौल जो दोनों पक्षों को ‘सम’ यानी उचित लगे । यह जो बँटवारा है , वही न्याय है । इसे ही संतुलन कहते हैं और इसीलिए न्याय का प्रतीक तराजू है । 

हाँ तक क़िस्त के किश्त उच्चार का सवाल है यह अशुद्ध वर्तनी और मुखसुख का मामला है । वैसे मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश में किश्त का अलग से इन्द्राज़ है । किश्त मूलतः काश्त का ही एक अन्य रूप है जिसका अर्थ है कृषि भूमि, जोती गई ज़मीन आदि । काश्तकार की तरह किश्तकार का अर्थ है किसान और किश्तकारी का अर्थ है खेती-किसानी । किश्तः या किश्ता का अर्थ होता है वे फल जिनसे बीज निकालने के बाद उन्हें सुखा लिया गया हो । सभी मेवे इसके अन्तर्गत आते हैं । किश्त और काश्त इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है । फ़ारसी के कश से इसका रिश्ता है जिसमें आकर्षण, खिंचाव जैसे भाव हैं । काश्त या किश्त में यही कश है । गौर करें ज़मीन को जोतना दरअसल हल खींचने की क्रिया है । कर्षण यानी खींचना । आकर्षण यानी खिंचाव । फ़ारसी में कश से ही कशिश बनता है जिसका अर्थ आकर्षण ही है ।
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Monday, December 31, 2012

चक, चकला, चकलादार

chakla-tokenहिन्दी के तीन चकले-2

क्र का चकला रूप मूलतः हिन्दी, पंजाबी में है । हिन्दी के चकला में चपटा, गोल, वृत्ताकार वाले आशय के साथ साथ प्रान्त का भाव भी है जबकि पंजाबी चकला में वृत्ताकार, गोल, घेरदार, विस्तीर्ण के साथ साथ शहर का खुला चौक, ज़िला अथवा वेश्यालय का आशय भी है । ज़ाहिर है ये फ़ारसी का असर है । भाषायी स्तर पर नहीं बल्कि मुस्लिम शासन का प्रभाव । विभिन्न संदर्भों से पता चलता है कि चकला मूलतः मुस्लिम शासन के दौरान भूप्रबन्धन, उपनिवेशन और राजस्व सम्बन्धी मामलों की शब्दावली से निकला है । चकला व्यवस्था से तात्पर्य एक राजस्व ज़िले से था । राजस्व अधिकारी चकलादार कहलाता था जिसे नाज़िम भी कहते थे । चकला में स्थानवाची भाव प्रमुख है । इसमें ‘चक’ में निहित तमाम आशय तो शामिल हैं ही, साथ ही आबादी और बसाहट का भाव भी है  । जिस तरह कई आबादियों के साथ चक नाम जुड़ा नज़र आता है ( रामपुर चक या चक बिलावली ) वही बात चकला में भी है जैसे मीरपुर चकला या चकला-सरहिन्द और दर्जनों ऐसे ही अन्य स्थानों के नाम । विभिन्न संदर्भों में चकला का अर्थ सर्किल, वृत्त, खण्ड या भाग होता है ।
मुस्लिमकाल की सरकारी भाषा अर्थात फ़ारसी में चकला यानी एक सब डिवीज़न या उपखण्ड जिसके अधीन कई परगना होते थे । आज इसे अनुभाग, उपवृत्त, उपखण्ड की तरह समझा जा सकता है । ख्यात इतिहासकार इरफ़ान हबीब के अनुसार क्षेत्रीय इकाई के रूप में चकला का संदर्भ शाहजहाँ के शासनकाल से मिलना शुरू होता है । परगना व्यवस्था के साथ साथ चकला व्यवस्था भी कायम थी । मुग़ल काल में लगभग समूचे उत्तर भारत में कई गाँवों के समूहों को पुनर्गठित कर उन्हें चकला कहा जाता था । चकले का प्रमुख नाज़िम, चकलादार या भूयान कहलाता था । इतिहास की किताबों में दर्ज़ है कि मुग़ल दौर में अलग-अलग राज्य इकाई को ‘सरकार’ का दर्ज़ा प्राप्त था । ‘सरकार’ या ‘सिरकार’ अर्थात एक राज्य शासन । एक ‘सरकार’ कई छोटी राजस्व इकाइयों में बँटी होती थी जो चकला कहलाती थीं । पूर्वी भारत में एक चकले का आकार मुग़ल सरकार (प्रशासनिक इकाई) का छठा हिस्सा होता था । शेरशाह सूरी शासित क्षेत्र को 47 सरकारों में बाँटा गया था । एक अन्य संदर्भ के अनुसार मुर्शिदकुली खाँ के ज़माने में बंगाल को 13 चकलों में बाँटा गया था ।
कोठे के अर्थ में भी चकला शब्द का स्थानवाची आशय ही उभरता है । देहव्यापार केन्द्र के रूप में चकला शब्द कैसे सामने आया इसे जानने से पहले यह समझ लेना ज़रूरी है कि प्राचीनकाल से ही समाज के प्रभावशाली तबके द्वारा देह व्यापार को प्रश्रय दिया जाता रहा है । शासन, सामंत, श्रेष्ठीवर्ग ने वेश्यावृत्ति को बढ़ावा दिया । सत्ता का जैसे-जैसे विकास होता गया, स्त्री-देह राजतन्त्र का एक विशिष्ट उपकरण बनती चली गई । वेश्यावृत्ति या देहव्यापार के पीछे स्त्री की मजबूरी नहीं बल्कि उसे ऐसा करने के लिए विवश किया गया । ब्राह्मणों-पुरोहितों नें इसके लिए न जाने कितने विधान-अनुष्ठान रचे । धर्म से लेकर कर्म तक स्त्री जकड़ी हुई है । वैसे भी स्त्री के रूप-लावण्य के आगे उसकी जाति-धर्म-वर्ण को ब्राह्मणों-पुरोहितों ने गौण माना है । विवाह, संतानोत्पत्ति आदि मुद्दों पर भी उपविधान रच कर पुरोहित समाज ने श्रेष्ठियों के लिए किसी भी वर्ण की स्त्री को सुलभ बनाया । देवदासी, नगरवधु का दर्ज़ा देकर सत्ता ने उसे विशिष्ट बना दिया और गणिका, वेश्या कह कर श्रेष्ठी वर्ग ने उसे बाजार में बैठा दिया । कभी कूटनीतिक दाँवपेच का हिस्सा बनी स्त्री देह कालान्तर में निरन्तर युद्धरत शूरवीरों की यौनपिपासा को शान्त करने का ज़रिया बनी । सेनाओं के साथ सरकारी खर्चे पर वारांगनाओं का काफ़िला भी चला करता था ।
हिन्दी शब्दकोशों में चकला का अर्थ वृत्त, चौका, रोटी बेलने का गोल, सपाट पत्थर, राज्य, सूबा, इलाक़ा, क्षेत्र के अलावा देहव्यापार का अड्डा, तवाइफ़खाना, वेश्यालय आदि बताया गया है । चकला के स्थानवाची आशय के साथ इसमें कसबीनों, तवाइफ़ों और जिस्मफ़रोशी के डेरों की अर्थवत्ता पश्चिमोत्तर सीमान्त क्षेत्र की बोलियों में स्थापित हुई होगी, ऐसा लगता है । गाँव, सूबा, इलाक़ा के लिए चक़, चक़ला जैसे शब्द फ़ारसी, पश्तो, पहलवी, बलूची, सिंधी के अलावा अनेक पश्चिमी बोलियों में मिलते हैं । मुग़ल फ़ौजों के लिए वेश्याओं की अलग जमात चलती थी । यही नहीं मुग़ल दौर में यह पेशा काफ़ी फलाफूला । चकला, रंडीखाना, ज़िनाख़ाना, ज़िनाक़ारी का अड्डा, तवाइफ़ख़ाना, कोठा जैसे कितने ही पर्यायी शब्दों की मौजूदगी से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है जो मुग़लदौर में प्रचलित थे । यही नहीं फ़ौजी चकला, रेजिमेंटल चकला जैसे शब्दों से भी इसकी पुष्टि होती है कि पहले मुग़ल दौर में और फिर औपनिवेशिक दौर में सामान्य चकला आबादी से इन चकलों को पृथक करने के लिए इनके आगे फौजी या रेजिमेंटल जैसे विशेषण लगाए गए । गौरतलब है कि दो सदी पहले तक यूरोप में भी मिलिटरी ब्रॉथेल जैसी व्यवस्था प्रचलित थी । रेजिमेंटल चकला भी वही है । ये सरकारी चकले होते थे ।
क़रीब सवा सौ साल पहले एलिजाबेथ एन्ड्र्यू और कैथरीन बुशनैल द्वारा लिखी गई पुस्तक - “द क्वींस डॉटर्स इन इंडिया” में फ़िरंगियों की सरपरस्ती में चलते ऐसे ही वेश्यालयों की दारुण गाथा बयान की गई है । क़िताब में इन अड्डों के लिए चकला शब्द का प्रयोग ही किया गया है । किताब बताती है कि ब्रिटिश दौर की हर अंग्रेज छावनी में चकला होता था जहाँ के रेट भी सरकार ने फिक्स किए हुए थे । चकलों के बारे में किताब में लिखा है कि, “In the regimental bazaars it is necessary to have a sufficient number of women, to take care that they are sufficiently attractive, to provide them with proper houses, and, above all, to insist upon means of ablution being always available.” ध्यान रहे रेजिमेंटल बाजार यानी छावनी बाजार जिनकी मूल पहचान रूपजीवाओं के डेरों यानी चकलों की वजह से ही थी । कृ.पा. कुलकर्णी के ‘मराठी व्युत्पत्ति कोश’, रॉल्फ़ लिली टर्नर की 'ए कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ़ इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़’ के मुताबिक चकला शहर का केन्द्रीय स्थान भी है । शहर के मध्य स्थित वृत्ताकार क्षेत्र, बाज़ार, पीठा, कोई भी गोलाकार बसाहट, अड्डा, दुकान, चौक आदि । यह मध्यवर्ती बसाहट ही कोठों का इलाक़ा यानी चक़ला था । किसी ज़माने में चक़ला तवाइफ़ों की बस्ती थी । बाद में चकला एक पेशे का पर्याय भी हो गया । कुछ लोग चक़ला और कोठा को एक मानते हैं । चक़ला शुरू से ही देह व्यापार केन्द्र रहा है जबकि कोठा महफ़िलों से आबाद होता था । चकला क्षेत्र था, कोठा इमारत थी । 
संदर्भों के मुताबिक मुग़ल बादशाहों ने जहाँ-जहाँ अपने स्थायी पड़ाव और लश्कर आदि रखे वहाँ तवायफ़ों और वेश्याओं को बसाया । जब लश्कर और पड़ाव जैसी आबादियाँ स्थायी बस्तियों में तब्दील हुईं तो वहाँ क़िलों की तामीर की गईं । फौज़ी और सरकारी अमलों की दिलज़ोयी के लिए इन नाचने-गानेवालियों, डेरेदारनियों, वेश्याओं को स्थायी ठिकाना बनाने के लिए जगह दी गईं । इन्हें भी चकला कहा गया । ये बसाहटें प्रायः छोटी गढ़ियों के बाहर और बड़े क़िलों में मुख्य बाज़ार से जुड़े हिस्सों में होती थीं । गौर करें चावड़ी बाज़ार शब्द पर । यह भी औपनिवेशिक दौर का शब्द हैं । चावड़ी यानी शहर के मध्य स्थित मुख्य चौराहा या चौक । इन्हें ही चावड़ी बाजार chawri bazar कहा गया। धनिकों के मनोरंजन के लिए ऐसे ठिकानों पर रूपजीवाओं के डेरे भी जुटने लगते हैं । इसीलिए चावड़ी बाजार शब्द के साथ तवायफों का ठिकाना भी जुड़ा है । ग्वालियर के चावड़ी बाजार की भी इसी अर्थ में किसी ज़माने में ख्याति थी । स्पष्ट है कि वेश्यालय के अर्थ में रसोई का चकला या स्थानवाची चकला में सिर्फ़ वृत्ताकार लक्षण की ही समानता है । स्थाननाम के साथ जुड़े चकला शब्द में पहले सिर्फ़ भूक्षेत्र का भाव था । बाद में इसमें बसाहट या आबादी का आशय जुड़ा । ब्रॉथेल की अर्थवत्ता वाले चकले में भी मूलतः आबादी, बसाहट का भाव था, न कि देहव्यापार का । समाप्त [ पिछली कड़ीः हिन्दी के तीन चकले-1]

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चक्र, चक्कर, चरखा

हिन्दी के तीन चकले-1circles
हिन्दी में तीन चकले बहुत प्रसिद्ध हैं । पहला ‘चकला’ है रसोई का जिसका साथ निभाता है बेलन । दूसरा ‘चकला’ स्थानवाची अर्थवत्ता रखता है जैसे चकला-खानपुर या नरवर-चकला । तीसरा चकला  है रूपजीवाओं का ठिकाना जो कला-व्यापार से ज्यादा देह-व्यापार के लिए कुख्यात है । तीनों ही तरह के चकलों का आज भी अस्तित्व है बल्कि ये भाषा-प्रयोग में भी बने हुए हैं । ये अलग बात है कि रसोई वाले चकले को छोड़ कर दोनो चकलों का सम्बन्ध भारत-ईरानी भाषा परिवार की फ़ारसी भाषा से है । गौरतलब है कि चक्कर, व्हील, साइकल, सर्कल जैसे शब्द इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार से सम्बद्ध हैं और एक ही गर्भनाल से जुड़े हैं और इनका रिश्ता वैदिक / संस्कृत शब्दावली के ‘चक्र’ से है । चकले के भीतर दाखिल होने से पहले जायज़ा लेते हैं चक्र का । भाषाविदों का मानना है कि वैदिक चक्र का पूर्वरूप चर्क रहा होगा और इसी वजह से वे चक्र की ‘चर्’ क्रिया में निहित निरन्तर गति का भाव देखते है । निरन्तर गति सीधी दिशा में हमेशा मुमकिन नहीं है किन्तु वलयाकार परिभ्रमण करते हुए इस निरन्तरता को सौफ़ीसद सम्भव बनाया जा सकता है । इसी लिए ‘चक्र’ के पूर्वरूप ‘चर्क’ से निरन्तर ‘चर्’ ( चल् = चलना ) वाली क्रिया सिद्ध होती है । अक्ष पर चारों दिशाओं में घूमना ही ‘चक्र’ है ।

इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की भाषाओं में रोमन ध्वनियां ‘c’ और ‘k’ के उच्चारण में बहुत समानता है और अक्सर ये एक दूसरे में बदलती भी हैं । इसी तरह अंग्रेजी का कैमरा camara, चैम्बर और हिन्दी का कमरा  एक ही मूल के हैं मगर मूल c (स) वर्ण की ध्वनि यहाँ अलग-अलग है । यह जानना ज़रूरी है कि ग्रीक और आर्यभाषाओं के ‘च’ और ‘क’ वर्णों से बनने वाले शब्दों में आपसी रूपान्तर होने की प्रवृत्ति है । भारोपीय धातु kand ( कैंड / कंद ) का एक रूप cand ( चैंड / चंद् ) भी होता है। इससे बने चंद्रः का मतलब भी श्वेत, उज्जवल, कांति, प्रकाशमान आदि है । डॉ. रामविलास शर्मा ‘भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी’ में लिखते हैं - “संस्कृत चक्र का ग्रीक प्रतिरूप कुक्लॉस है । चक्र का पूर्वरूप चर्क होगा; वर्णविपर्यय से र् का स्थानान्तरण हुआ । कुक्लॉस का पूर्वरूप कुल्कॉस होगा; यहाँ भी वर्णविपर्यय से ल् का स्थानान्तरण हुआ । कुल्, कुर् क्रिया का पूर्वरूप घुर् होगा । कर्, सर्, चर् परस्पर समबद्ध हैं । सर्, चर् वाले रूप द्रविड़ भाषाओं में उल्लेखनीय हैं ।” एमिनो-बरो के द्रविड़ व्युत्पत्ति कोश के चुनींदा शब्दों के ज़रिये वे इसे साबित भी करते हैं मसलन । तेलुगु सारि (आवर्तन), सुरगालि (बवंडर), कन्नड़ सुळि, (घूमना), सुरुळि (छल्ला), तुलु सुळि (भंवर), सुत्तु (चक्कर खाना), तमिल चुर्रू ( चक्कर खाना), चूरई (बवंडर) आदि । किक्लोस से लैटिन के प्राचीन रूप में साइक्लस शब्द बना जिसका अंग्रेजी रूप साइकल cycle है । चक्र और साइकल एक ही है ।

वैदिक चक्र और बरास्ता अवेस्ता, पहलवी होते हुए फ़ारसी के चर्ख रूप में वर्णविपर्यय स्पष्ट नज़र आ रहा है । जिस तरह वैदिक ‘शुक्र’ से फ़ारसी में ‘सुर्ख़’ बनता है, ‘चक्रवाक’ का ‘सुरख़ाब’ होता है उसी तरह ‘चक्र’ से ‘चर्ख़’ बनता है । हिन्दी की पश्चिमी बोलियों में यही रूप सुरक्षित रहा और इससे ही गोल, वलयाकार यन्त्र के लिए ‘चर्ख’ शब्द बना जिसका एक रूप ‘चरख’ भी है । मानक बृहद हिन्दी कोश के मुताबिक फ़ारसी के ‘चर्ख़’ का अर्थ घूमने वाला गोल चक्कर, खराद, गोफन, तोपगाड़ी, रथ, करघा आदि होता है । करघे के लिए चरखा शब्द के मूल में चर्ख़ / चरख ही है । ध्यान रहे कलफ़ किए हुए विशाल आकार के सूती कपड़ों को चरख किया जाता है । दरअसल यह इसी चर्ख़ से निकला है । एक विशाल चरखी पर कपड़े को लपेटने की क्रिया ही चरख़ कहलाती है । ऐसा करने से कपड़े की सिलवटें दूर हो जाती हैं । पहिये या स्टीयरिंग को चक्का कहते हैं । चरखा, चरखी, चकरी, चक्की जैसे नाम पहिए, झूले, यन्त्र, उपकरण के होते हैं । सिर घूमने को चकराना कहते हैं । यह चक्कर से बना है । जो आपको चक्कर में डाल दे ऐसे व्यक्ति को ‘चक्रम’ की संज्ञा दी जाती है । चक्कर, चकराना, चकरम (चक्रम) जैसे शब्दों के मूल में चक्र ही है ।
हले जानते हैं ‘चक’ को जो फ़ारसी से हिन्दी में दाखिल हुआ । गाँव-देहात की जानकारी रखने वाले लोग ‘चक’ से खूब परिचित हैं । चक्र का ही रूपान्तर है चक जिसका अर्थ है ज़मीन का एक विशाल टुकड़ा । बड़ी आबादी से बसा हुआ क्षेत्र । कृषि भूमि या किसी भी किस्म की गोचर ज़मीन पर बसी आबादी । उपत्यका भूमि अथवा घाटी, दर्रा या तराई का क्षेत्र । व्यवस्थित बसाहट वाला गाँव । सतपुड़ा और मैकल पर्वत की तराई के एक क्षेत्र को बैगाचक कहते हैं । यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यहाँ बैगा जाति की दर्जनों बस्तियाँ हैं । किन्हीं गाँवों के नामों के साथ भी यह शब्द लगा रहता है जैसे चक-चौबेवाला या चक-माजरा । यहाँ चक का अर्थ है चक्र अर्थात घेरा, वर्तुल, वृत्त आदि । पुराने ज़मानें से ही दुनियाभर में उपनिवेशन होता आया है । कृषिभूमि और जलस्रोतों के इर्दगिर्द आबादियाँ बसती रहीं । घिरी हुई जगह पर लोग बसते रहे । प्रायः शक्तिशाली व्यक्ति या शासक अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए निर्जन स्थानों पर लोगों को बसाया करते थे । खेतों के निकट अनुपजाऊ भूमि पैमाइश कर लोगों को बाँट दी जाती थी । इसी तरह प्रत्येक परिवार को खेत भी दिए जाते थे । भूमि के चौकोर टुकड़ों की पैमाइश होती थी, मगर चारों ओर से घिरे होने की वजह से उन्हें चक्र अर्थात ‘चक’ कहा जाने लगा था । सिलसिलेवार राज्यसत्ता के विकास के बाद भूक्षेत्र के रूप में चक शब्द का प्रयोग रूढ़ हुआ होगा । राजस्व शब्दावली के अंतर्गत हिन्दी में चक की आमद फ़ारसी से मानी जाती है । यूँ भी कह सकते हैं कि भारत-ईरानी परिवार की पश्चिमोत्तर बोलियों में प्राकृत चक्क के कई रूप प्रचलित होंगे जिनका सम्बन्ध वैदिक ‘चक्र’ से था । ऐसे कई चक होते थे जो बस्तियों में तब्दील हो जाते थे । किसी एक के स्वामित्व वाला खेतों का समूह भी चक कहलाता है जो अलग अलग मेड़ों के बावजूद मूलतः भूमि का एक ही खण्ड हो। इसी कड़ी का शब्द है चकबंदी जिसका अभिप्राय भूमि का सीमांकन या हदबंदी है । छोटी जोतों वाले खेतों को मिलाना या बड़े खेत में तब्दील करना ही चकबंदी है।
चकले की चर्चा । चक्कर ( चक्र ) और साइकल एक ही है । इसी तरह चक्र और सर्कल भी एक ही है । cycle में ‘c’ के लिए ‘स’ के स्थान पर ‘च’ का उच्चारण करें तो हमें अंदाज़ होता है इन दोनों में ( चक्कर ) ज्यादा अंतर नहीं है । साइकल भी एक वृत्त है और चक्कर भी मूलतः एक वृत्त ही है । डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार- संस्कृत में चक्र का एक ग्रीक प्रतिरूप और है- किरकॉस । ग्रीक भाषा में ही इसका एक वैकल्पिक रूप क्रिकॉस है । ‘कर’, ‘कल’ दोनो क्रियारूप ग्रीक में हैं । कॅर, कॉर, ये दोनो रूप उस भाषा में हैं । किरकॉस से इस बात की पुष्टि होती है कि कुक्लॉस का पूर्वरूप कुल्कॉस था । इसी प्रकार फ़ारसी चर्ख से इस बात की पुष्टि होती है कि संस्कृत चक्र का पूर्वरूप चर्क था । लैटिन किर्कुस (चक्र), किर्रुस (छल्लेदार बाल) का आधार कॅर है ।” जो भी हो, चक्र के पूर्वरूप चर्क की बात करें या र के ल रूपान्तर पर सोचें, चकला शब्द का रिश्ता चक्र से ही जुड़ता है । चक्र को अगर खोला जाए तो च-क-र हाथ लगता है । चकला में भी च-क-ल ध्वनियाँ हैं । 'र’ का रूपान्तर ‘ल’ में होता है और इस तरह सीधे सीधे चक्र से चकला ( बरास्ता चक्ल ) हासिल हो रहा है । रॉल्फ़ लिली टर्नर की कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ़ इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़ में चकला की व्युत्पत्ति संस्कृत के चक्रल से मानी है । भारत का ‘चकराला’ और पाकिस्तान के ‘चकलाला’ नाम के स्थानों के मूल में यही ‘चक्रल’ है । अन्य कोशों में भी चकला का रिश्ता चक्रल से जोड़ा गया है । यह चक्रल वही है जो अंग्रेजी में सर्कल है । अगर चक्र का पूर्व रूप चर्क माने तो अंगरेज़ी सर्कल के आधार पर इंडो-ईरानी परिवार में चर्कल जैसे रूप की कल्पना भी की जा सकती है अर्थात संस्कृत के चक्रल का पूर्ववैदिक बोलियों में चर्कल ( सर्कल सदृश ) जैसा रूप रहा होगा । सर्कल की कड़ी में सर्कस भी है । –जारी
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Wednesday, August 22, 2012

‘मा’, ‘माया’, ‘सरमाया’ [माया-2]

landscape1पिछली कड़ी-सरमायादारों की माया [माया-1] से आगे  

जॉ न प्लैट्स फ़ारसी के ‘मायः’ का रिश्ता संस्कृत के ‘मातृका’ से जोड़ते हैं पर यह बात तार्किक नहीं लगती । अमरकोश के मुताबिक ‘माया’ शब्द के मूल में वैदिक धातु ‘मा’ है जिसमें सीमांकन, नापतौल, तुलना, अधीन, माप, सम्पन्न, समाप्त, प्रसन्नता, खुशी, आनंद, कटि-प्रदेश, उलझाना, बांधना, ज्ञान, प्रकाश, जादू, तन्त्र, कालगणना आदि भाव हैं । इससे ही बना है ‘माप’ शब्द । किसी वस्तु के समतुल्य या उसका मान बढ़ाने के लिए प्रायः ‘उपमा’ शब्द का प्रयोग किया जाता हैं । यह इसी कड़ी का शब्द है । इसी तरह ‘प्रति’ उपसर्ग लगने से मूर्ति के अर्थ वाला ‘प्रतिमा’ शब्द बना। प्रतिमा का मतलब ही सादृश्य, तुलनीय, समरूप होता है । दिलचस्प बात यह कि फारसी का ‘पैमाँ’, ‘पैमाना’ या ‘पैमाइश’ शब्द भी इसी मूल से जन्मा है । संस्कृत उपसर्ग ‘प्रति’ का समतुल्य फ़ारसी का ‘पैति’ है । प्रति+मान से ‘प्रतिमान’ बनता है उसी तरह ‘पैति+मा’ से ‘पैमाँ’ (पैमान, पैमाना) बनता है । जो हिन्दी में प्रतिमान है वही फ़ारसी में पैमाना है । आयाम का कुछ अप्रचलित पर्याय ‘विमा’ भी इसी ‘मा’ से जन्मा है ।
लैटिन के ‘मेट्रिक्स’ matrix में भी अंतरिक्ष की परिमाप, विस्तार और मातृ सम्बन्धी भाव है । संस्कृत ‘मातृ’ और ‘मेट्रिक्स’ में रिश्तेदारी है । इसका रिश्ता भारोपीय धातु मे ‘me’ से जुड़ता है जिसके लिए संस्कृत मे ‘मा’ धातु है । मेट्रिक्स में स्त्री योनि, उर्वरता, गर्भ जैसे भाव हैं । यहाँ माँ के अर्थ में जननिभाव प्रमुख है और निरन्तर उर्वरता पर गौर करना चाहिए । वैदिक मा में इसके अलावा भी माता, उर्वरता, पृथ्वी, काल, मांगल्य, स्वामित्व, माया, जल जैसे आशय हैं । गौर करें ‘अम्मा’ के मूल में ‘अम्बा’ और प्रकारान्तर से ‘अम्बु’ यानी जल ही है । जल समृद्धि का प्रतीक है । प्रकृति के जलतत्व से ही जीवन सिरजा है । जल में ही जीवन है । इन दोनों मूल धातुओं में नाप, माप, गणना आदि भाव हैं । यानी बात खगोलपिंडों तक पहुँचती है ।
भारतीय परम्परा में ‘मा’ धातु की अर्थवत्ता भी व्यापक है । ‘मा’ धातु में चमक, प्रकाश, माप का भाव है जो स्पष्ट होता है चन्द्रमा से । प्राचीन मानव चांद की घटती-बढ़ती कलाओं में आकर्षित हुआ । स्पष्ट तो नहीं, मगर अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ववैदिक काल में कभी चन्द्रमा के लिए ‘मा’ शब्द रहा होगा । ‘मा’ के अंदर चन्द्रमा की कलाओं के लिए घटने-बढ़ने का भाव भी अर्थात उसकी ‘परिमाप’ भी शामिल है । गौर करे कि फारसी के माह, माहताब, मेहताब, महिना शब्दों में ‘मा’ ही झाँक रहा है जो चमक और माप दोनों से सम्बन्धित है क्योंकि उसका रिश्ता मूलतः चांद से जुड़ रहा है जो घटता बढ़ता रहता है और इसकी गतियों से ही काल यानी माह का निर्धारण होता है । अंग्रेजी के मंथ के पीछे भी यही ‘मा’ है और इस मंथ के पीछे अंग्रेजी का ‘मून’ moon है ।
गौरतलब है कि सम्पत्ति का सबसे आदिम पैमाना भू-सम्पदा और पशु-सम्पदा ही रहे हैं । दौलत या सरमाया के अर्थ में बाकी चीजें तो सभ्यता के विकास के साथ-साथ शामिल होती चली गईँ । मुद्रा के आविष्कार के बाद सम्पत्ति में गणना की क्रिया भी शामिल हुई । प्राचीन काल में तो ज़मीन ही सम्पदा थी जिसका माप लिया जाता था, पैमाइश होती थी । बसाहट, खेती और अन्ततः आवास के लिए भूमि की नापजोख ज़रूरी थी ।  तो फ़ारसी के ‘सरमाया’ में जो ‘मायः’ है और संस्कृत-हिन्दी में जो ‘माया’ है उसका अभिप्राय धन-दौलत, सम्पदा से ही है । उसी अर्थ में ‘सरमाया’ शब्द का विकास ‘मायः’ से हुआ है । इन दोनो ही ‘माया’ के मूल में वैदिक ‘मा’ है । मनुष्य के पास प्रकृति को समझने लायक बुद्धि का विकास होने तक और उसके बाद भी प्रकृति उसके लिए अजूबा ही रही है । मनुष्य के ज्ञान का विकास प्रकृति को समझते हुए ही हुआ है । दुनिया को समझना ही ज्ञानी होना है । इसीलिए दुनियादारी शब्द में व्यावहारिक बुद्धि का संकेत है । दुनिया का ही व्यापक स्वरूप प्रकृति है ।
'मा' में मूलतः प्रकृति का ही भाव है । संस्कृत में ‘प्रमा’ का अर्थ होता है समझना, जानना, सच्चा ज्ञान, सही धारणा आदि । ‘प्रमा’ का एक अन्य अर्थ मातामही भी होता है । किसी चीज़ की पैमाइश करना, मापना आदि क्रियाएँ जानने-समझने का ही आयाम हैं । सो प्रकृति अपने आप में सम्पदा है । प्रकृति का निरीक्षण, माप-जोख की अभिव्यक्ति मा से होती है । मा की महिमा अपरम्पार है और इसकी अर्थवत्ता की वैविध्यपूर्ण विमाएँ ( आयाम ) ही इसे माया साबित करती है । ‘मा’ में निहित वैविध्यपूर्ण भावों से अर्थमाया की सृष्टि होती है । साफ़ है कि फ़ारसी का ‘मायः’ संस्कृत माया का समतुल्य ही है अलबत्ता मातृका, माया और ‘मायः’ तीनों के मूल में वैदिक ‘मा’ धातु ही है । [समाप्त]

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Sunday, August 5, 2012

सेवा का फल नमकीन

SEV

हि न्दी में दो तरह के सेव प्रचलित हैं । पहले क्रम पर है बेसन से बने नमकीन कुरकुरे सेव और दूसरा है मीठा-रसीला सेवफल जिसे सेव या सेब भी कहते हैं । खाने-पीने की तैयारशुदा सामग्री में सर्वाधिक लोकप्रिय अगर कोई वस्तु है तो वह है नमकीन सेव । प्रायः हर गली, हर दुकान और हर घर में यह मिल जाएगा । सुबह के नाश्ते में चाय के साथ और कुछ न हो तो सेव चलेगा । मालवी आदमी को तो सुबह शाम खाने के साथ भी सेव चाहिए । भारतीय खान-पान संस्कृति दुनिया भर में निराली है । सेव के साथ सिवँइयाँ अथवा सेवँई जैसे खाद्य पदार्थ भी रसोई की अहम् चीज़ें हैं । सेवँई या सिवँइयाँ मैदे से बनती हैं । शकर और दूध के साथ उबाल कर बनई गई सेवँई की खीर बेहद लज़ीज़ मीठा पकवान है । ध्यान रहे, सेव, सेवँई या सिवँईं जैसे नामों में मीठे या नमकीन होने की महिमा नहीं है बल्कि उनका धागे या सूत्रनुमा आकार ही ख़ास है ।
दिलचस्प बात यह भी है कि दोनो तरह के सेव का सम्बन्ध बोल-चाल की भाषा में बेहद प्रचलित सेवा, सेवक, सेविका जैसे शब्दों से भी हैं जिनमें सेवा करने का मूल भाव है और इनकी व्युत्पत्ति भी संस्कृत की सेव् धातु से हुई है । संस्कृत की सेव् धातु में मूलतः करना, रहना, बारम्बार जैसे भाव हैं । मोनियर विलियम्स, रॉल्फ़ लिली टर्नर और वाशि आप्टे के कोशों के मुताबिक सेव् में सानिध्य, टहल, बहुधा, उपस्थिति, आज्ञाकारिता, पालना, बढ़ाना, विकसित करना, उत्तरदायित्व, समर्पण, खिदमत, देखभाल अथवा सहायता जैसे भाव हैं । इससे बने सेवा का मूलार्थ है देखभाल करना, सहकारी होना, समर्पित कर्म, टहल में रहना आदि । सेवक में उक्त सभी क्रियाओं में लगे रहने वाले व्यक्ति का भाव है । यूँ सेवक का अर्थ नौकर-चाकर, परिचर, सहकर्मी, अनुगामी, भक्त, अनुचर, आज्ञाकारी, भ्रत्य, वेतनभोगी आदि होता है । सेवक का स्त्रीवाची सेविका होता है । सेवा सम्बन्धी शब्दावली में अनेक शब्द हैं जैसे सेवा-पंजिका, सेवा-पुस्तिका, सेवाकर्मी, सेवानिवृत्त, सेवावधि, सेवामुक्त, समाजसेवा, समाजसेवी आदि । इसी कड़ी में सेवाशुल्क जैसा शब्द भी खड़ा है जिसका मूलार्थ है किसी काम के बदले किया जाने वाला भुगतान मगर अब सेवाशुल्क का अर्थ रिश्वत के अर्थ में ज्यादा होने लगा है ।
प्रश्न उठता है इस सेवाभावी सेव् से आहार शृंखला के सेव से सम्बन्ध की व्याख्या क्या हो सकती है ? सेव के आकार और उसे बनाने की प्राचीन विधि पर गौर करें । पुराने ज़माने में बेसन के आटे को गूँथ कर उसकी छोटी लोई को चकले पर रख कर हथेलियों से बारीक-बारीक बेला जाता था । बेलना शब्द का रिश्ता संस्कृत की बल् या वल् धातु से है जिसमें घुमाना, फेरना, चक्कर देना जैसे भाव हैं । लोई को घुमाने वाले उपकरण को भी बेलन इसीलिए कहते हैं क्योंकि इससे बेलने की क्रिया सम्पन्न होती है । जिससे बेला जाए, वह बेलन । गौर करें कि पत्थर या लकड़ी के जिस गोल आसन पर रख कर रोटी बेलते हैं उसे चकला कहते हैं । यह चकला शब्द चक्र से आ रहा है जिसमें गोल, घुमाव, राऊंड या सर्कल का भाव है । बेलने के आसन को चकला नाम इसलिए नहीं मिला क्योंकि वह गोल होता है बल्कि इसलिए मिला क्योंकि उस पर रख कर रोटी को चक्राकार बनाया जाता है । बेलने की क्रिया से कोई वस्तु चक्राकार, तश्तरीनुमा बनती है । तश्तरीनुमा आकार में बेलने के लिए आधार का समतल, ठोस होना ज़रूरी है न कि उसका गोल होना । अक्सर सभी चकले गोल नहीं होते । रोटी बनाने के लिए चकला और बेलन की ज़रूरत होती है, सेव या सेवँईं बनाने के लिए बेलन के स्थान पर चपटी सतह जैसे हथेली, होनी ज़रूरी है ।
राठी में सेवँई के लिए शिवई शब्द है जिसका मूल वही है जो हिन्दी सेवँई का है । मेरा मानना है कि नरम पिण्ड को चपटी सतह पर गोल गोल फिरा कर उसके सूत्र बनाने की तरकीब बाद में ईज़ाद हुई होगी, पहले ऐसा अंगूठे और उंगलियों की मदद से किया जाता रहा होगा । हाथ या उंगलियों लगे किसी चिपचिपे पदार्थ से छुटकारा पाने के लिए हाथों को आपस में मसलने या अंगूठे को उंगलियों पर रगड़ने की तरकीब की जानकारी मनुष्य को आदिमकाल में ही हो गई थी । इस तरह चिपचिपे पदार्थ पर दबाव पड़ने से उसके वलयाकार सूत्र बन कर हाथ से अलग हो जाते हैं । सेवँई के जन्मसूत्र का कुछ पता इसके मराठी पर्यायों से चलता है । मराठी में सेवँई को शेवई कहते हैं इसकी व्युत्पत्ति भी वही है जो हिन्दी में है । मराठी में शेवई के दो प्रकार हैं- हातशेवई और पाटशेवई । जैसा की नाम से ही स्पष्ट है, हातशेवई लोई को हथेली से रगड़ कर बनाए गए सूत्र को कहते हैं । इसका एक नाम बोटी भी है । मराठी में उंगली को बोट कहते हैं । उंगलियों से रगड़ कर बनाए गए महीन सूत्र के लिए बोटी नाम सार्थक है । प्रसंगवश, सेवँई को अंग्रेजी में वर्मीसेली कहते हैं जो मूलतः इतालवी भाषा से आयातित शब्द है और लैटिन के वर्मिस vermis से बना है जिसका मतलब होता है कृमी या रेंगनेवाला नन्हा कीड़ा । एटिमऑनलाइन के मुताबिक वर्म के मूल में भारोपीय भाषा परिवार की धातु wer है जिसमें घूमने, मुड़ने का भाव है । वृ बने वर्त या वर्तते में वही भाव हैं जो प्राचीन भारोपीय धातु वर् wer में हैं । गोल, चक्राकार के लिए हिन्दी संस्कृत का वृत्त शब्द भी इसी मूल से बना है । इतालवी वर्मीसेली  और हिन्दी के सेवँई का शब्द-निर्माण ध्यान देने योग्य है ।
रोटी के लिए मराठी में पोळी शब्द है । पूरणपोळी शब्द में यही पोळी है । पोळी बना है पल् धातु से जिसमें विस्तार, फैलाव, संरक्षण का भाव निहित है इस तरह पोळी का अर्थ हुआ जिसे फैलाया गया हो। बेलने के प्रक्रिया से रोटी विस्तार ही पाती है । पत्ते को संस्कृत में पल्लव कहा जाता है जो इसी धातु से बना है । पत्ते के आकार में पल् धातु का अर्थ स्पष्ट हो रहा है । पेड़ का वह अंग जो चपटा और विस्तारित होता है । हिन्दी का पेलना, पलाना, पलेवा जैसे शब्द जिनमें विस्तार और फैलाव का भाव निहित है इसी शृंखला में आते हैं । पालना शब्द पर गौर करें इसमें बारम्बारता, विस्तार, संरक्षण जैसे सभी भाव स्पष्ट हैं । कहने का तात्पर्य यह कि पल् धातु में जो भाव आटे की लोई को पोळी (रोटी) के रूप में विस्तारित करने में उभर रहा है वैसा ही कुछ सेव् धातु से बने सेव या सेवँई में भी हो रहा है । स्पष्ट है कि सेव् धातु से बने सेव में निहित बारम्बारता, बढ़ाना, विकसित करना और पालना जैसे अर्थ भी पल् की तरह हैं । बेसन या मैदे की लोई को चकले पर गोल-गोल घुमाने से  पतले, लम्बे,  धागेनुमा सूत्र के रूप में उसका आकार बढ़ता जाता है । यही सेव या सेवँई है । बेलने या घुमाने की क्रिया में बारम्बारता पर गौर करें तो भी सेव् क्रिया का अर्थ स्पष्ट होता है ।
सेवफल की बात । जिस तरह सेव या सेवँई में विस्तार, वृद्धि का भाव है, और सेव और सेवँई के आकार से यह अर्थ साफ़ नज़र भी आता है वहीं सेवफल को देखने से यह स्पष्ट नहीं होता । मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में सेवि या सेव शब्द है जिसका अर्थ है सेवफल । मोनियर विलियम्स के कोश में सेवि शब्दान्तर्गत सेव का अर्थ बदरी यानी बेर भी बताया गया है । apple के अर्थ में हिन्दी सेव की व्युत्पत्ति संस्कृत की सिव् धातु से है जिसमें जिसमें नोक, काँटा जैसे भाव हैं । टर्नर कोश के मुताबिक फ़ारसी में सेव का सेब रूप है । इसी तरह उड़िया और गुजराती में भी सेब ही है इसलिए यह निश्चयूर्वक नहीं कहा जा सकता की भारतीय भाषाओं में सेव के सेब रूप के पीछे फ़ारसी का सेब है ।

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Monday, June 4, 2012

कुलीनों का पर्यावरण

Environment-Image

हि न्दी की पारिभाषिक शब्दावली के जो शब्द बोलचाल में खूब प्रचलित हैं उनमें पर्यावरण का भी शुमार है । यहाँ तक कि यह शब्द अब कुलीन वर्ग की शब्दावली में भी जगह बना चुका है क्योंकि पर्यावरण पर बात करना आभिजात्य होने का लक्षण है । जिस तरह वातावरण शब्द से आशय वात + आवरण यानी पृथ्वी के चारों और हवा के आच्छादन से है मगर इसका प्रयोग परिस्थिति, परिवेश, माहौल जैसे आशय प्रकट करने के लिए भी होता है । पर्यावरण का प्रयोग ऐसी अभिव्यक्तियों के लिए भी होने लगा है । पर्यावरण शब्द, वातावरण की तुलना में बहुत व्यापक है । हालाँकि माहौल, परिस्थिति जैसे भावों को अभिव्यक्त करने के लिए वातावरण की तुलना में पर्यावरण का प्रयोग कम होता है । हमारे आस-पास के जीवन घटकों जिसमें, समाज, आचार-विचार, जीवजगत, वनस्पतिजगत, बोली-भाषा और जलवायु आदि का समावेश है, उन सबका आशय पर्यावरण में प्रकट होता है ।
र्यावरण शब्द बना है आवरण में परि उपसर्ग लगने से । आवरण में छा जाने, आच्छादन, कवर, ढकने का भाव है । आवरण शब्द भी वरण में उपसर्ग लगने से बना है । वरण में चुनने, छाँटने जैसे भावों के अलाव ढकने, पर्दा करने जैसे भाव हैं जो आवरण में व्यक्त हो रहे हैं । वरण के मूल में संस्कृत की वृ धातु है । जिसका अर्थ है घेरना, लपेटना, ढकना, छुपाना और गुप्त रखना । ध्यान रहे आवरण में किसी आकार को चारो ओर से ढकने, घेरने का भाव है । संस्कृत का परि उपसर्ग बड़ा महत्वपूर्ण है और इसकी व्याप्ति तमाम भारोपीय भाषाओं में है । परि उपसर्ग जिन शब्दों में लगता है, उनमें वह शब्द के मूल भावों को बढ़ा देता है । मूलतः परि में चारों ओर, घेरा, सम्पूर्ण जैसे आशय हैं । परिनिर्वाण, परिभ्रणण, परिकल्पना, परिचर्या, परितोष जैसे शब्दों से यह स्पष्ट हो रहा है ।
भाषाविज्ञानियों नें प्रोटो भारोपीय भाषा परिवार में वृ के समकक्ष वर् wer धातु की कल्पना की है जिससे इंडो-यूरोपीय भाषाओं में कई शब्द बने हैं । आवरण के अर्थ वाले अंग्रेजी के कवर, रैपर जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं । वृ बने वर्त या वर्तते में वही भाव हैं जो प्राचीन भारोपीय धातु वर् wer में हैं । गोल, चक्राकार के लिए हिन्दी संस्कृत का वृत्त शब्द भी इसी मूल से बना है। गोलाई दरअसल घुमाने, लपेटने की क्रिया का ही विस्तार है। वृत्त, वृत्ताकार जैसे शब्द इसी मूल से बने हैं । संस्कृत की ऋत् धातु से भी इसकी रिश्तेदारी है जिससे ऋतु शब्द बना है । गोलाई और घूमने का रिश्ता ऋतु से स्पष्ट है क्योंकि सभी ऋतुएं बारह महिनों के अंतराल पर खुद को दोहराती हैं अर्थात उनका पथ वृत्ताकार होता है। दोहराने की यह क्रिया ही आवृत्ति है जिसका अर्थ मुड़ना, लौटना, पलटना, प्रत्यावर्तन, चक्कर खाना आदि है ।

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Monday, May 7, 2012

रग-रग की खबर

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क्त वाहिनी के लिए हिन्दी में रग शब्द भी खूब प्रचलित है, अलबत्ता नस का चलन ज्यादा है । नस को नाड़ी भी कहते हैं और नलिका भी । रग भारत-ईरानी परिवार का शब्द है और फ़ारसी के ज़रिए हिन्दी में आया है जिसका सही रूप रग़ है । रग़ की व्युत्पत्ति के बारे में निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता । रक्त की पहचान उसका लाल रंग है और उसका काम है नसों में बहना क्योंकि वह तरल है और तरलता में नमी होती ही है ।  सो नमी और बहाव के गुणों को अगर पकड़ा जाए तो रग़ शब्द के जन्मसूत्र इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में नज़र आते हैं । वैदिक और जेंदावेस्ता साहित्य से यह स्ष्ट हो चुका है कि इंडो-ईरानी और भारोपीय भाषा परिवार में ऋ-री जैसी ध्वनि में बुनियादी तौर पर गति, प्रवाह का भाव रहै है और ऐसे शब्दों की एक लम्बी फेहरिस्त तैयार की जा सकती है जिनमें न सिर्फ राह, रास्ता, दिशा, आवेग, वेग, भ्रमण, चक्र, गति, भ्रमण जैसे आशय छुपे हैं बल्कि इनसे नमी, रिसन जैसे अर्थों का द्योतन भी होता है । रक्तवाहिनी मूलतः एक मार्ग भी है और और साधन भी जिसमें हृदय द्वारा तेज रफ़्तार से खून बहाया जाता है । गौरतलब है कि नल, नड, नद जैसे प्रवाही अर्थवत्ता वाले शब्द के पूर्वरूप से ही एक विशेष नली जैसे तने वाली वनस्पति का नाम नलिनी पड़ा । इसी तरह नदी के लिए भी नलिनी नाम प्रचलित हुआ ।
जॉन प्लैट्स रग़ के मूल में संस्कृत का रक्त शब्द देखते हैं । ए डिक्शनरी ऑफ़ उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एंड इंग्लिश में रग़ की तुलना प्राकृत के रग्गो से की गई है जो रक्त का परिवर्तित रूप है । ध्वनि के आधार पर शब्दों के रूपान्तर की भी निश्चित प्रक्रिया होती है । इस हिसाब से देखें तो रक्त का एक रूप रत्त बनेगा और दूसरा रूप रग्ग या रग्गो हो सकता है । खास बात यह है कि रक्त साध्य है जबकि रग़ साधन का नाम है । रक्त की विशिष्ट पहचान उसका लाल होना है जबकि रक्तवाहिनी में गति प्रमुख है । इसलिए रक्त के रग्ग रूपान्तर से यह मान लेना कि इससे ही फ़ारसी का रग़ बना होगा, दूर की कौड़ी है । रक्त से बने रग्ग का अर्थ भी खून ही होता है । फ़ारसी का रग़ निश्चित ही रक्त से नहीं है । गौरतलब है कि भारोपीय भाषा परिवार में ऋ-री जैसी ध्वनियों से बने कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिनमें जलवाची भाव हैं अर्थात जिनकी अर्थवत्ता में गति व प्रवाह के साथ साथ नमी, आर्द्रता और गीलेपन का आशय निहित है । इसे यूँ समझें कि किसी स्रोत से रिसाव में मुख्यतः गति से भी पहले गीलेपन का अहसास होता है, फिर वह रिसाव धारा का रूप लेता है ।
ख्यात जर्मन भाषा विज्ञानी जूलियस पकोर्नी ने भारोपीय भाषाओं में धारा, बहाव, प्रवाह, गति, वेग, नमी, आर्द्रता को अभिव्यक्त करने वाले विभिन्न शब्दों के कुछ पूर्वरूप तलाशे हैं जिससे इनके बीच न सिर्फ़ सजातीय साम्य है बल्कि इनका व्युत्पत्तिक आधार भी एक है । res, ros, eres ऐसे ही पूर्वरूप हैं जिनसे ताल्लुक रखने वाले अनेक शब्द भारोपीय भाषाओं में हैं जैसे दौड़ने के लिए रेस, आवेग के लिए आइर , संस्कृत का रसा अर्थात रस, पानी या नदी आदि । इन सबमें ऋ – री नज़र आता है । प्रोटो इंडोयूरोपीय भाषा परिवार की एक धातु *reie- इसी कड़ी में आती है । इसमें भी ऋ की महिमा देखें । में मूलतः गति का भाव है। जाना, पाना, घूमना, भ्रमण करना, परिधि पर चक्कर लगाना आदि । प्राचीन संस्कृत धातु ऋत् और ऋष् में निहित गतिसूचक भावों का विस्तार अभूतपूर्व रहा है । संस्कृत धातु से बना है ऋत् जिसमें उचित राह जाने और उचित फल पाने का भाव तो है ही साथ ही चक्र, वृत्त जैसे भाव भी निहित हैं । हिन्दी के रेल शब्द में बहाव या प्रवाह का आशय निहित है । रेला शब्द की व्युत्पत्ति राल्फ़ लिली टर्नर संस्कृत के रय से मानते हैं जिसका अर्थ है तेज बहाव, तेज गति, द्रुतगामी, शीघ्रता आदि । रय बना है से जिसमें गति, प्रवाह का भाव है । इसी तरह र के मायने गति या वेग से चलना है जाहिर है मार्ग या राह का अर्थ भी इसमें छुपा है ।
प्राचीन धारा, प्रवाह या नदियों के नामों में भी प्रवाहवाची र, री या ऋ के दर्शन होते हैं । एटिमऑनलाइन के मुताबिक जर्मनी की की प्रसिद्ध नदी है राईन Rhine जिसके पीछे भारोपीय धातु *reie- ही है जिसका अर्थ है गति और प्रवाह । लैटिन में राइवस शब्द का अर्थ धारा होता है । वैदिकी की सहोदरा ईरान की अवेस्ता भाषा में नदीवाची एक शब्द है ranha जिसका अभिप्राय प्रवाही धारा है और इतिहासकारों के मुताबिक यह रूस की विशालतम नदी वोल्गा का प्राचीन नाम है । मोनियर विलियम्स के कोश में संस्कृत में रिण्व् या रिण्वति का अर्थ जाना है । वैसे तो रेणुका शब्द का अर्थ भी नदी होता है और अवेस्ता के रंहा ranha से इसका ध्वनिसाम्य भी है किन्तु भाषाविज्ञानी रंहा का साम्य वैदिकी के रसा से बैठाते हैं जिसका अर्थ रस, नमी, रिसन, नदी, धारा आदि है । भाषा विज्ञानियों के मुताबिक वोल्गा नदी का नामकरण प्रोटो-स्लाव शब्द वोल्गा से हुआ है जिसमें नमी का आशय है । उक्रेनी में भी वोल्गा का यही अर्थ है । रूसी भाषा के व्लागा का अर्थ होता है नम इसी तरह चेक भाषा में व्लेह का अर्थ है गीलापन । दरअसल ये सारे शब्द जन्मे हैं प्राचीन शकस्थान यानी सिथिया क्षेत्र में बोली जाने वाली किसी भाषा के रा शब्द से जिसका अर्थ था वोल्गा नदी । मूलतः यह रा शब्द रिसन या नमी का प्रतीक ही था । इसकी तुलना अवेस्तन रंहा या संस्कृत के रसा से करनी चाहिए ।
ज के ताजिकिस्तान क्षेत्र का प्राचीन नाम सोग्दियाना था । सोग्दियन भाषा में रअक का अर्थ होता है वाहिका, नालिका आदि । र(अ)क यानी रक की तुलना फ़ारसी के रग़ से करनी चाहिए । दरअसल सोग्दियन र(अ)क ही फ़ारसी के रग़ का पूर्वरूप है । प्राचीन शक भाषा के मूल रिसन, नमी वाले भाव का स्लाव जनों नें अपनी भाषा में अनुवाद वोल्गा किया और इस तरह नदी का नाम वोल्गा बना । दरअसल मूल रंहा , राईन जैसे शब्द नदीवाची हैं और इनका अनुवाद वोल्गा हुआ । डॉ अली नूराई के कोश के मुताबिक भी अवेस्ता के रण्हा शब्द का अर्थ मूलतः एक कल्पित पौराणिक नदी है जिसे जरदुश्ती समाज मानता था । रंहा का ही रूपान्तर पहलवी में रघ, रग़ हुआ और फिर फ़ारसी में यह रग़ बना ।
गौर करें कि किसी स्रोत से जब रिसाव होता है तो उसकी अनुभूति नमी की होती है । सतत रिसाव प्रवाह बनता है । इस प्रवाही धारा तेज गति से सतह को काटते हुए अपने लिए मार्ग बनाती है जिसे नद, नदी, नाड़ी या नाली कहते हैं । शरीर में रक्त ले जाने वाली वाहिनियाँ ऐसी ही नाड़ियाँ या नालियाँ हैं । किसी विशाल भूभाग को सिंचित करने, पोषित करने और उसे हरा भरा रखने में भी नदियों की विशिष्ट भूमिका होती है । इन्हें हम किसी भूभाग की नाड़ियाँ कह सकते हैं । हमारे शरीर की नसें या रगें भी वही काम करती हैं । रग शब्द की व्युत्पत्ति रक्त से न होकर भारोपीय भाषा परिवार के ऋ-री ध्वनि से जन्मे जलवाची शब्द समूह से ज्यादा तार्किक लगती है । नस से जुड़े जितने भी मुहावरे हैं, वे सभी रग में समा गए हैं जैसे रग फड़कना यानी आवेग का संचार होना, रग दबना यानी किसी के वश में या प्रभाव में आना, रग चढ़ना यानी क्रोध आना, रग रग पहचानना यानी मूल चरित्र का भेद खुल जाना अथवा रग-पट्ठे पढ़ना यानी किसी चीज़ को बारीके से समझ लेना आदि ।

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Friday, April 27, 2012

लोबान की महक

Olibanum

दु निया में शायद ही कोई होगा जिसे खुशबू नापसन्द होगी । सुवास से न सिर्फ़ तन-मन बल्कि आसपास का माहौल भी महक उठता है । सुगन्धित पदार्थ की एक लम्बी फ़ेहरिस्त है और इसमें लोबान का नाम भी शामिल है । अगरबत्ती, धूप और हवन सामग्री के निर्माण में लोबान का प्रयोग होता है । लोबान का प्रयोग दवा के रूप में भी होता है । इसे सुलगते हुए कंडे या अंगारे पर रख कर जलाया जाता है । इसका धुआँ सुगन्धित होता है । लोबान दरअसल एक क़िस्म की राल या वृक्ष से निकलने वाला पारदर्शी स्राव है जो सूख कर सफेद या पीली आभा वाले छोटे छोटे पिण्डों में रूपान्तरित हो जाता है । इसे हवन, पूजन के दौरान या अन्य आयोजनों में सुगन्धित वातावरण बनाने के लिए जलाया जाता है । इसके धुएँ से माहौल महक उठता है ।
लोबान या लुबान दरअसल असल भारत में फ़ारसी के ज़रिये आया है मूलतः यह सेमिटिक भाषा परिवार की धातु ल-ब-न ( l-b-n ) से बना अरबी शब्द है । यह एक अनोखा शब्द है जिसके भीतर बहुत सारे आशय छुपे हैं । इसके मूल में एक देश का नाम है । श्वेत अर्थात सफेदी के विविध आयाम इसमें नज़र आते हैं । इसमें एक विशिष्ट वृक्ष का स्पर्श भी है । देखतें है लोबान के वंशवृक्ष को । अधिकांश राल आधारित सुगन्धित पदार्थों की तरह ही लोबान भी एक विशिष्ट पेड़ बोसवेलिया सेरेटा Boswellia serrata से निकलने वाला दूध है । सेमिटिक धातु ल-ब-न में सफेदी या दुग्ध जैसे स्राव का भाव है । इससे बने अल-लुबान में भी दूध या सफेद पदार्थ का आशय है जिसमें वृक्ष से निकली सुगन्धित राल का अर्थ ही उभरता है । लुबान या लोबान का रिश्ता हिब्रू से भी है । ए जनरल सिस्टम ऑफ़ बॉटनी एंड गार्डनिंग में जॉर्ज डॉन अरेबिक al-luban के हिब्रू सजातीय lebonah का उल्लेख करते हैं । लेबोनाह का अर्थ होता है श्वेतकण या सफेदी का ढेर । इससे ही ग्रीक भाषा में लिबेनोस libanos बना, जिसका आशय भी लोबान ही है । ओलिबेनम का इतालवी रूप ओलिबेनो है ।
सी तरह लैटिन का ओलिबेनम olibanumशब्द ओषधिविज्ञान का जाना पहचाना पदार्थ है जिसका उपयोग प्रायः सिरदर्द की दवा बनाने में होता रहा है । इसका आशय भी गोंद, राल या लोबान से ही है । कई संदर्भ इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि लैटिन का ओलिबेनम दरअसल अरबी के अल-लुबान al-luban का सीधा सीधा लिप्यंतरण है जिसमें उच्चारण भिन्नता की वजह से हलका बदलाव आया । लोबान या ओलिबेनम का रिश्ता कई तरह से एशिया के सुदूर पश्चिमी छोर पर स्थित लेबनान से भी जुड़ता है । ऑक्सफोर्ड इन्साक्लोपीडिया के अनुसार ओलिबेनम दरअसल “ऑइल ऑफ़ लेबेनोज” या लेबेनान टर्म का संक्षेप है जिसका अर्थ है “लेबनान का तेल” । मगर यह बहुत पुख्ता आधार नहीं है । कुछ भाषाविदों का मानना है कि प्राचीनकाल से ही लेबनान में पाए जाने वाले ख़ास देवदार से निकलने वाले सुगन्धित पदार्थ की माँग भूमध्यसागरीय क्षेत्रों के बाज़ार में खूब रही है । इसीलिए लेबनान से आने वाले राल को लोबान नाम मिला । कुछ हद तक स्वीकार्य होते हुए भी यह व्युत्पत्ति सही नही है ।
रअसल लेबनान lebanon शब्द भी सेमिटिक मूल का ही है और इसा जन्म भी ल-ब-न से हुआ है । पश्चिमी एशिया के इस पहाड़ी प्रान्त में बर्फ़ से लदी चोटियाँ हैं । शुष्क अरब क्षेत्र में बर्फीली चोटियों वाले लेबनान को ल-ब-न में निहित सफेदी, शुभ्रता की वजह से ही पहचान मिली । लेबनान यानी लुब + नान अर्थात सफेद धरती । तात्पर्य बर्फ़ से ढकी चोटियों से ही है । यहाँ का सबसे ऊँची चोटी का नाम भी माऊंट लेबनान ही है । स्पष्ट है कि लेबनान से ‘लोबान’ नहीं बना है बल्कि ल-ब-न से ही लेबनान और लोबान बने हैं । दोनों में खास बात सफेदी है । प्राचीन अरब के सौदागरों का दूर दराज़ तक व्यापार करने में कोई सानी नहीं था । दरअसल अफ्रीका और पूर्वी एशिया के देशों से भारी मात्रा में अरब के सौदागर लोबान loban खरीदते थे और उसे लेबनान में साफ़ किया जाता था । वहाँ से उसे फिर दुनियाभर के बाज़ारों में बेचा जाता था । लेबनान से लोबान का रिश्ता इसलिए है क्योंकि वह लोबान की बड़ी मण्डी थी ।
स संदर्भ में अल्बानिया, एल्प्स जैसे क्षेत्रों को भी याद कर लेना चाहिए । सेमिटिक धातु ल-ब-न से मिलती जुलती धातु है a-l-b ( कुछ लोग इसे गैर भारोपीय धातु भी मानते हैं)। एल्ब *alb- का अर्थ है श्वेत, सफेद, धवल, पहाड़, पर्वत । इससे मिलती जुलती प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा परिवार की एक धातु है *albho-जिसमें भी यही भाव है और माना जाता है कि इसका विकास *alb-से हुआ है । पूर्व से पश्चिम तक फैली यूरोप की प्रसिद्ध पर्वत शृंखला का नाम एल्प्स है । यह नाम इसी मूल से आ रहा है । ध्यान रहे आल्प्स के न सिर्फ उच्च शिखरों पर हमेशा बर्फ जमी रहती है । alps में alb धातु साफ दिखाई पड़ रही है । पर्वतीय या पहाड़ी के अर्थ में एल्पाईन शब्द भी इसी मूल से आ रहा है ।

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Saturday, April 14, 2012

चालान और चाल-चलन

challan_bobशब्द-संदर्भःनीलाम, विपणन, पण्य, क्रय-विक्रय, गल्ला, हाट, दुकान, पट्टण, पोर्ट, पंसारी

जी विकोपार्जन और ज्ञानार्जन के निमित्त ही मनुष्य निरन्तर भटकता रहा है जिसके चलते कई तरह के काम और कार्यक्षेत्र विकसित होते चले गए । इन गतिविधियों से भाषाएँ भी विकसित होती रहीं । व्यापार-व्यवसाय ने ही भाषा को सर्वाधिक समृद्ध किया है । वही भाषाएँ विस्तार पाती रहीं जिनका बाज़ार से सीधा रिश्ता था । महाजनी व्यवस्था ने हिन्दी को कई शब्द दिए हैं । ऐसा ही एक शब्द है चालान, जिसका इस्तेमाल रोजमर्रा ही हिन्दी में खूब होता है । चालान का चलने से रिश्ता है । यह सिर्फ़ शब्द भर नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था का नाम है जिससे हर वर्ग के व्यक्ति का साबका पड़ता ही है । व्यापारी, कर्मचारी, छात्र, किसान और अपराधी, चाहे कोई भी हो, सभी को चालान से गुज़रना पड़ता है । यातायात के नियमों को ताक में रख कर गाड़ी तेज़ चलाई तो भी चालान कटाना पड़ता है । किसी परीक्षा में शामिल होने के लिए निर्धारित फीस के लिए जो दस्तावेज भरा जाता है उसे भी चालान कहते हैं । अपराधियों की अदालत में पेशी के संदर्भ में भी चालान शब्द का प्रयोग होता है ।
चालान शब्द बहुत प्राचीन नहीं लगता । इसमें मूलतः निकासी का भाव है । किसी चीज़ की निकासी या प्राप्ति का आशय इसमें निहित है । चालान chalan में अपराधियों का तबादला, भेजा हुआ या आया हुआ माल, असबाब, बड़ा ज़खीरा, रुक्का, रसीद, पावती, इनवॉइस, वाऊचर जैसे तमाम निहितार्थ हैं । अगर यह फ़ारसी भाषा का शब्द होता तो मुस्लिम शासन की राजस्व सम्बन्धी तमाम शब्दावलियों की तरह इसका उल्लेख भी प्राचीन दस्तावेज़ों में मिलता । चालान शब्द अठारहवी सदी के अन्त में ( 1790 ) कम्पनीराज में नज़र आता है । अनुमान है कि यह उस महाजनी व्यवस्था से उपजा शब्द है जो कम्पनीराज में खूब फली-फूली । ईस्ट ईंडिया कम्पनी ने व्यापार करने के लिए दलालों-महाजनों का एक सुगठित तन्त्र विकसित किया था । ये लोग भारत के दूरदराज़ कोनों से कच्चा माल इकट्ठा करता था और फिर उसे ब्रिटेन भेजने के लिए मुम्बई, कोलकाता के बंदरगाहों तक पहुँचाया जाता था । ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए काम करने वाले अनेक भारतीय एजेंट वहाँ तैनात होते थे । इसी तरह फ़सल खराब होने की स्थिति में किसानों को नई फ़सल बोने के लिए ऋण उपलब्ध कराने और फिर फ़सल को बाज़ार तक पहुँचाने की प्रक्रिया भी चालान की श्रेणी में आती थी । कम्पनी राज ने इस शब्द को अपनाया और इसका रूप challan हुआ । माल परिवहन की शब्दावली का यह खास शब्द बना ।
चालान शब्द में मूल रूप से रसीद, रुक्क़ा, बिल, बिल्टी, बीजक आदि का आशय है । कुछ सन्दर्भों में चालान को फ़ारसी का शब्द बताया गया है । द पर्शियन कंट्रीब्यूशन टू द इंग्लिश लैंग्वेज में गारलैंड हैम्पटन चालान शब्द का फ़ारसी मूल का बताते हुए इसका अर्थ रसीद, इनवॉइस या बंदियों का तबादला पत्र लिखते हैं । हालाँकि वे खुद इसका प्रचलन 1958 से मानते हैं । द इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (गूगल बुक्स) के मुताबिक- प्राप्तियों और भुगतान सम्बन्धी वित्तीय लेनदेन का ब्योरा जिस दस्तावेज़ में दर्ज़ किया जाता है उसे 'चालान' कहते हैं । सिल्करोड- एन एथ्नो-हिस्ट्री ऑफ़ लद्दाख में जेक्लीन फोक्स लिखती हैं- “चालान एक ऐसा रुक्का या रसीद है जिसमें माल की लदान का ब्योरा होता है और आमतौर पर इसकी तीन प्रतिलिपियाँ बनाई जाती है जो क्रमशः विक्रेता, मध्यस्थ या माल पहुँचाने वाला तथा क्रेता यानी खरीदार के लिए होती हैं । “
मूलतः रवानगी, निकासी, सिपुर्दगी या प्राप्ति जैसे भावों वाला चालान शब्द दरअसल चलान है जिसका अर्थ है चलना । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक मूल शब्द चलान है जिसका उर्दू में चालान रूप प्रसिद्ध हुआ और फिर यही हिन्दी में भी प्रचलित हो गया । संस्कृत में एक धातु है चर् जिसमें घूमना-फिरना, गति, चलना, चक्कर काटना, भ्रमण करना आदि भाव हैं । गौर करें चर् धातु का ही अगला रूप चल् है जिसमे हिलना, गति करना, कांपना, धड़कना, सैर करना जैसे भाव हैं । हिन्दी का चल, चलना, चलित, चालित जैसे शब्द इससे ही बने हैं । पहाड़ स्थिर होते हैं, कभी चलते नहीं इसलिए चल् में उपसर्ग लगने से मनुष्य ने पर्वत के लिए अचल शब्द बना लिया जिसका लाक्षणिक अर्थ हुआ जो अडिग रहे, टस से मस न हो । चलते-चलते एक लीक बन जाती है । यही चलन है अर्थात ढंग, रीत । प्रचलन भी इससे ही बना है जिसका मतलब भी परम्परा ही है । मार्ग से भटकना अथवा गलत राह पर चलना ही विचलन है । चलान या चालान इसी चल् की कड़ी में हैं । जॉन प्लैट्स के कोश में भी यही संदर्भ है । माल को भेजने या चलने की क्रिया । किसी असबाब को एक जगह से दूसरी जगह भेजना । अपराधियों को पकड़ कर अदालत में पेश करना या जेल भेजना । अदालत में चालान पेश किया जाता है । चालान कटना या चालान काटना यानी माल सिपुर्द करना । चालान आना या चालान मिलना यानी वह रुक्का या रसीद प्राप्त करना जिसमें माल के आने की सूचना होती है ।
मेरा आजीवन कारावास पुस्तक में क्रान्तिवीर विनायक दामोदर सावरकर ने चालान का कई जगह उल्लेख किया है । वे लिखते हैं- “चालान हमारे काराशास्त्र का पारिभाषिक शब्द है । चालान का अर्थ है उस जहाज घाट का वह गुट, जिसके साथ विभिन्न कारागृहों में पड़े कालेपानी के दंडितों को इकट्ठा कर समुद्र पार अंदमान भेजने के लिए लाया जाता है । कालापानी की सजा पाए लोगों के लिए चालान एक आत्मगौरव से भरी संस्था का नाम था । कैदियों के जो जत्थे अंदमान भेजे जाने से पूर्व बंदरगाह की स्थानीय जेल में रखे जाते थे, वे चालान कहलाते थे ।” सबाल्टर्न लाइव्ज (1790-1920) में क्लेअर एंडरसन लिखते हैं कि ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरफ़ से मॉरीशस, फिज़ी या अन्य उपनिवेशों में सज़ा भुगतने के लिए भेजे जाने वाले क़ैदियों के जत्थे चालान कहलाते थे । मूलतः इन्हें पानी के जहाज से भेजा जाता था और जहाज के यात्री-दस्तावेज को मूलतः चालान कहते थे, जो प्रकारान्तर से उस समूह की पहचान बन जाती थी । कुल मिला कर चालान में चलना शब्द अंतर्निहित है । औपनिवेशिक दौर की हिन्दी में प्रचलित आंग्ल-भारतीय शब्दों के प्रसिद्ध कोश हॉब्सन-जॉब्सन में चालान शब्द की प्रविष्टि न मिलना आश्चर्य की बात है ।

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