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Monday, February 29, 2016

चूँ-चपड़ नई करने का...


पर लिखी नसीहत से किसी न किसी दौर में सभी गुज़र चुके हैं। फ़ारसी का यह ज़रा सा ‘चूँ’ बड़ा विकट है। ...और बच्चों का ‘चूँ’ तो और भी खतरनाक! आखिर उन्हें धमकाना ही पड़ता है “ज्यादा चूँ-चपड़ किया तो भगा देंगे” (चपड़ अनुकरणात्मक है। इसका एक आशय प्रतिरोध को दबाना भी है। ज़ाहिर है प्रतिरोध सवालों के साथ ही उभरता है इसलिए किसी भी प्रतिवाद या प्रतिरोध को दबाने के लिए भी इसी मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है, चूँ-चपड़ नई करने का... आशय सवालों से बरजने का ही है। मज़े की बात ये कि जिनकी रोज़ीरोटी ही ‘चूँ’ की मुनहसिर है, वे भी इस ‘चूँ’ से वास्ता नहीं रखते। हमारी मुराद अख़बारनवीसों से ही है। चलिए, खोलते हैं ‘चूँ’ की जन्मकुण्डली।

यह जानना बेहद जरूरी है कि सवालिया निशान के दायरे में जितने भी सवाल हैं, पूरी दुनिया में ‘क’ से ही अभिव्यक्त होते हैं। इसे अंग्रेजी में 5W & 1H अथवा “पंचवकार, एक हकार” कहा जाता है। हिन्दी में ‘ककारषष्ठी’ कहा जा सकता है। यह दिलचस्प है कि संस्कृत के किम् में एक साथ तमाम प्रश्नवाची जिज्ञासाएँ समाई हुई है अर्थात क्या, क्यों, कब, कहाँ आदि...। इस किम से ही हिन्दी के तमाम प्रश्नवाची सर्वनामों यानी ‘कौन’, ‘कब’, ‘कहाँ’, ‘क्या’, ‘कैसे’, ‘किस’ आदि पैदा हुए हैं। इनमें सबका अपना-अपना महत्व है। कोई भी मानवीय जिज्ञासा इन सवालों के बिना पूरी नहीं होती। कोई भी कथा तब तक पूरी नहीं होती जब तक इस ‘ककारषष्ठी’ का समावेश उसमें न कर दिया जाए।

पत्रकारिता में तो इन शब्दों का महत्व गीता-कुरान-बाइबल से भी ज्यादा है। किसी भी घटना/ वारदात/ प्रसंग को जब तक इन कब-क्यों से न गुज़ारा जाए, उसे खबर की शक्ल में ढाला नहीं जा सकता। अफ़सोस कि आज के पत्रकार खबर लिखने से पहले ‘ककारषष्ठी’ मन्त्र का आह्वान नहीं करते। शायद शर्म आती होगी तो ‘6K’ की तरह याद कर लें, इसे भूल कर कोई खबर बन नहीं सकती और आप साख कमा नहीं सकते।

तो ‘किम्’ से जन्में ‘क्यों ‘का ही एक रूप है ‘चूँ’ जिसमें सवाल छिपे हैं। ध्यान रहे कि बच्चे ‘क’ और ‘च’ ध्वनियाँ सहज रूप से उच्चार लेते हैं मगर संयुक्त ध्वनियों का उच्चार नहीं कर पाते। यह समस्या अनेक मानव समूहों में भी होती है। नासिक्य स्पर्श के साथ क+य से बने क्यों का रूपान्तर ‘चों’ जाता है। अनेक लोग इसी प्रश्नवाचक चों को उच्चारते हैं। ‘क्यों’ का एक रूप फ़ारसी-उर्दू में ‘क्यूँ’ हो जाता है। स्वाभाविक है कि ‘क्यों’ से ‘चों’ की तरह ‘क्यूँ’ से ‘चूँ’ भी बन जाता है।

अब ‘क्यूँ’ हो या ‘चूँ’, है तो सवाल ही। ...और हमारा समाज जवाबदेही से हमेशा बचता नज़र आता है। भाषाओं के विकास में ही मानव-विकास नज़र आता है। लोकतन्त्र विरोधी समाज ही सवालों से कतराता है। “ज्यादा चूँ-चपड़ की तो...” एकाधिकारवादी, सामन्तवादी और सवालों से कतराते समाज की अभिव्यक्ति है। इसमें यह निहित है कि ज्यादा सवाल पूछेंगे, तो ख़ैर नहीं।

इस तब्सरे के बाद यह समझना मुश्किल नहीं बात बात में बोला जाने वाला अव्यय ‘चूँकि’ यूँ तो फ़ारसी का है पर ‘क्यूँकि’ का ही रूपान्तर है। हालाँकि जॉन प्लॉट्स ‘चूँ’ को फ़ारसी के ‘चिगुन’ से व्युत्पन्न मानते हैं जिसमें क्यों, कहाँ, कैसे का भाव है। सवाल यह है कि जब फ़ारसी में स्वतन्त्र रूप में ‘चि’ अव्यय मौजूद है और उसमें भी वही प्रश्नवाची आशय मौजूद है तब ‘चिगुन’ स्वयं ‘चि’ से व्युत्पन्न है जिसका रिश्ता ‘किम’ से है। शब्दों का सफ़र में पहले बताया जा चुका है कि पुरानी फ़ारसी-तुर्की में ‘किम्’ का एक रूप ‘चिम्’ होता हुआ ‘चि’ में तब्दील हुआ है।

तो चूँकि में क्योंकि वाले आशय समाहित है अर्थात ‘इसलिए’, ‘जैसे कि’, ‘कारण कि’ वगैरह आशय इससे स्पष्ट होते हैं। फ़ारसी में चूँ-चपड़ की जगह ‘चूँ-चिरा’ या ‘चूँ ओ चिरा’ पद प्रचलित है जिसका आशय है “कब, क्यों कहाँ”. इससे जो मुहावरा बनता है “चूँ-चिरा न करना” यानी बात वही ज्यादा सवाल न पूछो। हिन्दी ने इससे ही चूँ-चपड़ बना लिया। पुरानी हिन्दी में यह बतौर “चूँचरा” मौजूद है जिसका अर्थ है प्रतिरोध, विरोध, प्रतिवाद आदि।

निष्कर्ष- पत्रकारों को हमेशा चूँ-चपड़ करते रहना चाहिए यानी 'ककारषष्ठी' मन्त्र का जाप जारी रहे।

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Friday, January 1, 2016

खरप्रिय सर्वप्रिय

मात्रा के फ़र्क़ से ज़मीन-आसमान का फर्क़ आ जाता है। ‘खर’ यूँ तो गधा है पर जैसे ही इसमें ‘आ’ की मात्रा लगाई जाती है यह खरा हो जाता है जिसका मतलब है असली, साफ, बढ़िया, उत्तम। या तेज, तीखा, कठोर। क्या सचमुच ‘खर’ और ‘खरा’ में कोई रिश्तेदारी हो सकती है? संस्कृत में खर का अर्थ है सख़्त, कठोर, दृढ़, कड़ा, कटु, तेज, तीक्ष्ण, जड़, कर्णभेदी, प्रचंड, तप्त, रूखा, ऊँचा, नुकीला, अनघड़, उग्र, खुरदुरा, गहन, घनघोर अथवा अम्लीय आदि। हिन्दी में ‘खर’ का अर्थ गधा ही है। ज़ाहिर है गधे के उसकी कर्णभेदी, तीक्ष्ण, कटु, उग्र, और तेज आवाज़ के चलते ही खर कहा गया होगा और जड़ता के चलते मुर्ख की अर्थ स्थापना हुई होगी। मूर्ख से मित्रता करने वाला या तो खुद मूर्ख होगा या भोला। इसलिए ऐसे व्यक्ति को खरप्रिय कहा जाता है। कबूतर को भी खरप्रिय उपमा मिली हुई है। यूँ आज के ज़माने में मूर्खों इतने ऊँचे पदों पर विराजमान हैं कि खरप्रिय ही सर्वप्रिय हो गए हैं।

अब देखिए कि अश्व प्रजाति का होने के बावजूद जहाँ घोड़ा आभिजात्य का प्रतीक है वहीं गधा, घोड़े की सभी खूबियों से हीन है। अमरकोश के हवाले से बगुला, समुद्री बाज़, कौवा आदि भी खर की श्रेणी में ही आते हैं। अब ये सब तो परिंदे हैं तब एक चौपाए और इनके बीच कौन सा समानता बिन्दु हो सकता है? इन सबकी आवाज़ बेहद ऊँचे सुर में निकलती है। अब ऊँचा सुर अपनी निरन्तरता में तीक्ष्ण और कटु अनुभव देता है। गधे की आवाज़ तो ख़ैर कर्णभेदी है ही। असम सतह को खरदरा / खुरदुरा कहते हैं। कण्ठ के खुरदुरेपन या भर्रायी आवाज़ के लिए खरखराना शब्द भी प्रचलित है। गौर करें इन परिंदों के लिए खर अभिव्यक्ति इतनी लोकप्रिय नहीं हो पायी और गधा ही खर होकर रह गया। हालाँकि गधे की मूल पहचान उससे जुड़ा मूढ़ता का लक्षण है।

गौर करें मूढ़ता में एक किस्म की जड़ता, स्थिरता, अपरिवर्तनीयता होती है इन्हीं लक्षणों के चलते जड़ को अड़ियल या मूर्ख मान लिया जाता है। बुद्ध प्रतिमा के लिए बुत शब्द चल पड़ा और बुद्धमुद्रा से बुद्धू चल पड़ा। जड़ता पर गौर करें। सो खर में निहित जड़, अनघड़ और ठोस जैसे लक्षणों से गधे की मूल पहचान की पुष्टि भी होती है। खर शब्द फ़ारसी में भी चला आया। मगर यहाँ खरगोश में यह खर लक्षण के तौर पर मौजूद है। फ़ारसी में ‘गोश’ का अर्थ कान होता है। खर यानी गदहा इस तरह खरगोश का अर्थ हुआ गधे जैसे कान वाला पशु। मूर्ख व्यक्ति को खरदिमाग़ कहते हैं, यह फ़ारसी मुहावरा है। इसी तरह खर- का अर्थ है कामातुर, खिलंदड़ा, लट्ठ। एक और पद है खरवार यानी खर पर लादा गया भार।

अब बात करते हैं खर से बने खरा की जिससे हिन्दी में कई तरह की अभिव्यक्तियाँ शामिल हुई हैं जैसे खरी-खोटी सुनाना, खरी-खरी कहना, खरा माल, खरा सिक्का, खरा उतरना आदि। खरा का अर्थ उत्तम, सही, सच्चा, शुद्ध, बिना मिलावट का, ठोस, तेज़, तीक्ष्ण, कटु आदि ही है। गौर करें अपने मूल रूप में कोई भी वस्तु अनघड़ ही होती है। करेला या नीम कड़ुवेपन की वजह से खरे हैं। अगर नीम में कटुता न हो तो उसकी ओषधीय गुणता संदिग्ध होगी। खर से ही बना एक और बहुप्रयुक्त शब्द है प्रखर जिसमें तप्तता, तीक्ष्णता, प्रचंडता, तेज, तीखापन जैसे भाव हैं। मिसाल के तौर पर दोपहर में सूर्य सबसे प्रखर होता है। यहाँ एक साथ सूर्य के ताप, उग्रता, प्रचंडता, तीक्ष्णता से आशय है।

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Thursday, February 14, 2013

अगर, मगर, वरना, लेकिन…

question

ल्पना करें कि किसी सुबह आपको ये फ़रमान सुनने को मिले कि दिनभर आप जो भी बोलेंगे, उसमें ‘अगर’, ‘मगर’, ‘वरना’ या ‘लेकिन’ का इस्तेमाल नहीं करेंगे तो क्या इसे मंजूर कर लेंगे? व्यक्तिगत रूप से मैं इस चुनौती को स्वीकार नहीं कर पाऊंगा। यह नामुमकिन है। ये जानकर भी ताज्जुब हो सकता है कि ‘अगर’, ‘मगर’, ‘लेकिन’ या ‘वरना’ हिन्दी के अपने नहीं बल्कि फ़ारसी से आयातित अव्यय हैं। यही नहीं, ‘मगर’ तो फ़ारसी-अरबी का संकर है। इन शब्दों के आसान हिन्दी पर्याय यदि, किन्तु, परन्तु, अन्यथा हैं पर इनका प्रयोग अगर’, ‘मगर’ या ‘वरना’ की तुलना में काफ़ी कम है। आप जब ये चुनौती स्वीकार करेंगे, तब इसकी आज़माइश भी हो जाएगी।
बसे पहले बात करते हैं ‘अगर’ की। बोलचाल में अगर बेहद लोकप्रिय अव्यय है इसका पर्याय यदि है जो हिन्दी की तत्सम शब्दावली से आता है। ‘अगर’ की व्युत्पत्ति के बारे में उर्दू-फ़ारसी के शब्दकोश ज्यादा जानकारी नहीं देते हैं। अली नूराई के फ़ारसी-अंग्रेजी व भारोपीय भाषाओं के व्युत्पत्ति कोश में ईरान के भाषाविद् एम.एच. तबरिज़ी और जर्मन भाषाविद पॉल होर्न के हवाले से ‘अगर’ की व्युत्पत्ति का रिश्ता अवेस्ता के ‘हाकरत’ से जुड़ता नज़र आता है। गहराई में जाने पर पता चलता है कि ‘हाकरत’ का ‘हा’ अवेस्ता के ‘हम’ (सर्व) और ‘करत’ ‘कर्त’ [काट(ना), धार(ना)] से आ रहा है। जोसेफ़ एच पीटरसन की “डिक्शनरी ऑफ़ मोस्ट कॉमन अवेस्ता वर्ड्स” के मुताबिक इसमें एक बार या कभी-कभी का भाव है।
हरहाल, जॉन प्लैट्स के कोश के मुताबिक ‘यदि’ के अर्थ वाले अगर में अरबी का ‘मा’ उपसर्ग (मा+अगर) लगने से मगर बनता है। अरबी के ‘मा’ उपसर्ग में ‘ना’ की अर्थवत्ता है। इस मगर में लेकिन, किन्तु, परन्त की अर्थवत्ता है। फ़ारसी का मुहावरा “अगर-मगर” करना हिन्दी में भी लोकप्रिय है। इसी तरह “किन्तु-परन्तु” में भी वही भाव है। हील-हवाला, टालमटोल, आनाकानी या मामले को लटकाने का आशय यहाँ उभरता है। अगर और मगर में जड़ता, यथास्थितिवादिता उजागर होती है।नूराई के कोश की एक अन्य प्रविष्टि में ‘अगर’ का अर्थ ‘IF’ यानी ‘यदि’ या ‘अगर’ बताया गया है किन्तु उसके आगे ‘cut once’ भी लिखा है।अवेस्ता में ‘अक’ (ak) भी है जिसमें अक्ष, धुरी का भाव है। ‘कभी कभी’ के मद्देनज़र यदि पर गौर करे तो लगता है कि यदि में निश्चयात्मकता नहीं है। परिस्थिति प्रमुख है। अक्ष के एक पलड़े पर ‘अगर’ है और दूसरे पर ‘मगर’ है। ‘अक’ या ‘हकरत’ में ही ‘अगर’ के बीज छुपे हैं। ‘ह’ ध्वनि का लोप होकर सिर्फ़ ‘अ’ स्वर बच रहा है और ‘क’ रूपान्तर ‘ग’ में हो रहा है। अन्तिम ‘त’ भी लुप्त हो रहा है।
न्यथा की अर्थवत्ता वाला ‘वरना’ भी हिन्दी में खूब चलता है। ‘वरना’ में ‘नहीं तो फिर’ या ‘और नहीं तो’ की अर्थवत्ता है। उर्दू-फ़ारसी में इसका ‘वगरना’ रूप देखने को मिलता है। क़तील शिफ़ाई साहब का एक शेर है- “चलो अच्छा हुआ, काम आ गई दीवानगी अपनी / वगरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते”। वरना के बीच में इस ‘ग’ के वजूद के क्या मायने हैं? दरअसल ‘वरना’ के मूल में भी ‘अगर’ छिपा है। जॉन प्लैट्स के कोश के मुताबिक वरना एक वाक्याँश है “वा अगर ना”। इसका संक्षेप हुआ वगरना। उर्दू हिन्दी में यह ‘वरना’ रह गया। इसकी एक और वर्तनी है वर्ना जिसमें सिर्फ़ ढाई आखर रह जाते हैं “वा अगर ना” में जो ‘वा’ है वह अवेस्ता के अप से आ रहा है जिसमें पुनः, फिर, पार्श्व, परे, दूर जैसे भाव हैं। अगर का एक अन्य संक्षेपरूप है ‘गर’। “गर ऐसा हो जाए”, “गर वैसा हो जाए” जैसे वाक्य भी हिन्दी में चलते हैं। “वा अगर ना” का एक रूप “वा गर ना” भी हो सकता है जिससे ‘वगरना बना होगा।गर्चे या अगर्चे जैसे रूपों में ‘यद्यपि’ का भाव है।
हिन्दी में किन्तु, परन्तु के आशय वाला ‘लेकिन’ शब्द भी खूब चलता है यूँ कहें कि ‘लेकिन’ के बिना तो काम चलना ही मुश्किल है। कोशों के मुतबिक लेकिन शब्द अरबी के ‘लाकिन’ से आ रहा है जिसका अर्थ यदि, किन्तु, परन्तु जैसा ही है । सेमिटिक भाषाओं के ख्यात विशेषज्ञ मायर मोशे ब्रॉमन (1909-1977) अपनी पुस्तक स्टडीज़ इन सेमिटिक फ़िलोलॉजी में सम्भावना जताते हैं कि लाकिन के मूल में प्रोटो अरेबिक रूप ‘इल्ला-कान’ है । इल्ला दरअसल ‘ला’ का मूल रूप है जिसमें यदि, सिवाय, परन्तु जैसे भाव हैं । ‘कान’ सहायक क्रिया है । इस तरह इल्ला-कान का रूपान्तर ही लाकिन हुआ जो फ़ारसी (लाकेन) होते हुए हिन्दी का ‘लेकिन’ बना ।

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Tuesday, January 15, 2013

चर्चा कैसी कैसी !!

talk

हि न्दी से प्यार करने वालों का उसके साथ बर्ताव और व्यवहार भी अनोखा होता है । मिसाल के तौर पर चर्चा की बात करें । उर्दू-हिन्दी में बातचीत, कथन, उल्लेख, ज़िक़्र के संदर्भ में चर्चा शब्द का प्रयोग होता है । यह बहुत प्रचलित शब्द है । अक्सर यह बहस भी चलती रहती है कि चर्चा स्रीवाची है या पुरुषवाची । “चर्चा चलती है” या “चर्चा चलता है” । “चर्चा रही” या “चर्चा रहा” । कुछ लोग कह देते हैं कि कथन, ज़िक़्र या उल्लेख की तरह चर्चा के प्रयोग में पुलिंग लगना चाहिए जबकि कुछ लोग इसे स्त्रीवाची कहते हैं और इस तरह चर्चा पर चर्चा चलती ही रहती है । जो हिन्दीप्रेमी नुक़्ते से परहेज़ करते हैं उनका कहना है कि चर्चा के साथ उर्दू वाला पुल्लिंग लगाया जाए । इसके बरख़िलाफ़ जिन हिन्दीप्रेमियों को मुसलमानी बिन्दी से लगाव है वो चाहते हैं कि चर्चा को उर्दू का न माना जाए और इसके साथ स्त्रीलिंग का प्रयोग किया जाए । उर्दू में चर्चा से चर्चे बना लिया गया है जो बहुवचन है ।
बसे पहले तो एक बात साफ़ कर दें कि चर्चा हिन्दी की अपनी ज़मीन पर तैयार हुआ शब्द है और स्त्रीवाची है । यह मूलतः तत्सम शब्द है । इसमें और संस्कृत के चर्चा शब्द में अगर कोई मूलभूत फ़र्क़ है तो सिर्फ़ यही कि संस्कृत-वैदिक शब्दावली का चर्चा पुरुषवाची है और हिन्दी का चर्चा स्त्रीवाची । संस्कृत का चर्चा लोकभाषा में स्रीवाची चरचा था और हिन्दी की ज़मीन पर भी इसी रूप में सामने आया । आज से क़रीब छह सौ सात सौ साल पहले हिन्दी की विभिन्न शैलियों में चर्चा के चरचा रूप का स्त्रीवाची प्रयोग के लिखित साक्ष्य बड़े पैमाने पर उपलब्ध हैं । ज़ाहिर है बोलचाल में इसकी रचबस कई सदी पहले हो चुकी होगी । कबीर अपनी सधुक्कड़ी में कहते हैं - “संगत ही जरि जाव न चरचा नाम की । दुलह बिना बरात कहो किस काम की।।” वहीं विनयपत्रिका में तुलसी की अवधी में भी चरचा है- “जपहि नाम रघुनाथ को चरचा दूसरी न चालु।” तो उधर राजस्थानी में मीराँ के यहाँ भी चरचा है - “राम नाम रस पीजै मनुआँ, राम नाम रस पीजै । तज कुसंग सतसंग बैठ णित, हिर चरचा सुण लीजै ।।
र्चा शब्द में विभिन्न आशय शामिल हैं मगर आमतौर पर इसका अर्थ बहस या विचार-विमर्श ही है । चर्चा में मूलतः दोहराव का भाव है । तमाम कोश चर्चा के अनेक अर्थ बताते हैं मगर रॉल्फ़ लिली टर्नर कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ़ इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़ में चर्चा प्रविष्टि के आगे सिर्फ़ रिपीटीशन यानी दोहराव लिखते हैं । ज़ाहिर है, बाकी आशय बाद में विकसित हुए हैं विलियम व्हिटनी पाणिनी धातुपाठ की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि चर्च् धातु दरअसल चर् धातु में निहित भाव की पुनरावृत्ति दिखाने वाला रूप है । चर् का मूल भाव गति है (करना, अनुष्ठान, व्यवहार, आचरण, अभ्यास आदि । इससे ही चलने की क्रिया वाला चर बना है) । चर्चर (चर-चर) में दोहराव है । बहरहाल, चर्चा के मूल में चर्च् धातु है जिसका मूलार्थ है दोहराव । आप्टे कोश के मुताबिक इसमें पढ़ना, अनुशीलन करना, अध्ययन करना, विचार-विमर्श करना जैसे भाव हैं । इसी के साथ इसमें गाली देना, धिक्कारना, निन्दा करना, बुरा-भला कहना जैसे आशय भी हैं । इससे बने चर्चा में आवृत्ति, तर्क-वितर्क, स्वरपाठ, अध्ययन, सम्भाषण, वाद-विवाद, अनुशीलन, परिशीलन, अनुसंधान के साथ-साथ शरीर पर उबटन लगाना, मालिश करना, लेपन करना जैसे भाव भी हैं ।
र्च् में निहित दोहराव वाले भाव पर गौर करें तो चर्चा के अन्य आशय भी स्पष्ट हो जाते हैं । बार-बार या दोहराव वाली बात विमर्श के दौरान भी उभरती है और विचार मन्थन में भी । अनुसंधान या खोज के दौरान भी बार बार उन्हीं रास्तों, विधियों, प्रविधियों से गुज़रना होता है । बहस-मुबाहसों में एक ही बिन्दू पर लौटना होता है या किसी एक मुद्दे का बार बार उल्लेख होता है । चर्चा में अफ़वाह, गपशप, चुग़लख़ोरी जैसी बातें भी शामिल हैं । अफ़वाह में आवर्तन की वृत्ति होती है । किसी भी क़िस्म की गप्प, गॉसिप या अफ़वाह जैसी बातें लौट-लौट कर आती हैं । सो बारम्बारता चर्चा का ख़ास गुणधर्म है । यही बारम्बारता मालिश, मसाज़ या लेपन में भी है । मालिश या लेपन करना यानी बार-बार किसी एक सतह पर दूसरी सतह फेरना सो चर्चित का आशय लेपित से भी है । बृहत हिन्दी शब्दकोश में इसका उदाहरण दिया है चन्दन-चर्चित काया । लेपन की क्रिया को चर्चन भी कहते हैं । चर् में निहित गति की पुनरावृत्ति ही ‘चर्चन’ है ।
र्च् से ही बना है चर्चित जिसका अर्थ है- ऐसा कुछ जिस पर लोग बातें करतें हैं । इसमें वस्तु, व्यक्ति, विचार कुछ भी हो सकता है । चर्चित यानी जिस पर चर्चाएँ चल रही हों । कोशों के मुताबिक चर्चित का अर्थ है जिस पर विचार किया गया हो, जिस पर चर्चा हुई हो, जिसे खोजा गया हो। इसके अलावा चर्चित वह भी है जिसकी मालिश हुई हो, जिस पर लेप किया हुआ हो, जो सुगंधित, सुवासित, अभ्यंजित हो । चर्चित के दोनों ही अर्थों में दोहराव की प्रक्रिया स्पष्ट है । आम अर्थों में चर्चित चेहरा वह होता है जो खबरों में हो । खबर को चर्चा का पर्याय मानें । बार बार कोई मुद्दा या व्यक्ति जब चर्चा में आता है तो वह चर्चित कहलाता है । चर्चा योग्य के लिए मुखसुख के आधार पर चर्चनीय शब्द भी बना लिया है । चर्चा करने वाले को वार्ताकार की तर्ज पर चर्चाकार कहते हैं । संस्कृत नाटकों की परम्परा में दो अंकों के बीच दृष्यविधान बदलते हुए दर्शकों के मनोरंजन के लिए गाया जानेवाला गीत चर्चरिका कहलाता था । फ़ाग, होली, बुआई, कटाई जैसे अवसरों पर भी चर्चरिका का चलन था । लोक भाषा में इसे चाँचर, चँचरी या चाँचरी कहते हैं । चाँचरी एक पहाड़ी लोकनृत्य की शैली भी है ।
र्चा प्रायः आर्यपरिवार की सभी भारतीय भाषाओं में है । लोगों की ज़बान पर जब किसी बात का उल्लेख आम हो जाए तो उसे मराठी में जनचर्चा या लोकचर्चा कहा जाता है । इसी तरह रामचर्चा पद है जिसका शाब्दिक अर्थ तो राम का नाम लेना है मगर इसमें मुहावरेदार अर्थवत्ता है । मोल्सवर्थ का इंग्लिश-मराठी कोश इसके बारे में कहता है - A phrase used emphatically or expletively in a speech expressing any positive and utter denial. 

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Tuesday, February 15, 2011

शनिवार पेठ में वड़ापाव और मोफ़त सल्ला

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बी ते पाँच दिनों से पुणे में हूँ। पुणे पहली बार आना हुआ है। मराठीभाषी होते हुए भी मेरा महाराष्ट्र से जीवंत सम्पर्क नहीं रहा। ये अलग बात है कि परिवार में मराठी संस्कृति रची-बसी है और तमाम संबंधी पुणे में भी हैं। मेरा वहाँ अब तक न जाना संयोग ही है। किसी भी शहर का पुराना इलाका मुझे आकर्षित करता है, सो मैं भीयहाँ के खास इलाके यानी शनिवारवाड़ा से लगे शनिवार पेठ में एक होटल में जम गया हूँ। घना बसा इलाका मगर अव्यवस्था का कहीं नामोंनिशां तक नहीं। पुणेवासियों में अपने शहर के लिए आत्मीय लगाव है।  पुराने इलाके में शनिवार पेठ, सोमवार पेठ, बुधवार पेठ, रविवार पेठ जैसे बाज़ार हैं जो पेशवाकालीन साप्ताहिक बाजार थे।
Image0226लीजिए मोफत सल्ला इन महानुभाव से...Image0227
पुणे के बाज़ार में पान या चाय की दुकानें कम और पावभाजी, वड़ापाव, मिसळपाव, दाबेली, कच्छी दाबेली, एक किस्म की कढ़ी, उबली मक्का की उसळ से लेकर दक्षिण भारतीय व्यंजनों की दुकानें बहुतायत में नज़र आती हैं। हर सातवीं आठवीं दुकान पर यही सब बिकता नज़र आता है। सामान्य समोसे तो यहाँ मिलते ही हैं, यहाँ की खासियत नारियल समोसा भी है। मुझे खूब पसंद आया।  खान पान के प्रति इतना प्रेम मैने अबतक सिर्फ़ जोधपुरवासियों में ही देखा था। मैं जिस होटल में ठहरा हूँ, उसके मालिक आगरावासी अग्रवालजी  हैं जो यहाँ दशकों से बसे हैं। होटल का समूचा स्टॉफ ग्वालियर, भिण्ड या आगरा का ही है। मैं दो दिनों से रात को रोज़ दाल-चावल की खिचड़ी बनवा कर खा रहा हूँ क्योंकि होटल के महाराज बनाते ही इतनी लज़ीज़ खिचड़ी हैं कि क्या कहा जाए। आप भी इसके दर्शन कर सकते हैं। खिचड़ी को खूब सारे अचार के साथ खाया जाए तो आनंद बढ़ जाता है। यूँ भी हमारी माँ ने बचपन में बताया था कि खिचड़ी के हैं चार यार , दही पापड़, घी अचार!! अपने साथी अमित देशमुख से इसकी तारीफ़ की तो उसने भी खिचड़ी-डिनर का आनंद लिया। दिन में हम लंच नहीं लेते बल्कि विभिन्न ठिकानों की पड़ताल करते हैं और फिर जो मन होता है, एक या दो पीस चख लेते हैं मसलन आज सुबह हमने साबूदाणे का वड़ा खाया, मगर वह कुछ मीठा सा लगा। हम तो साबूदाणे का वड़ा भरपूर तीखी हरी चटनी के साथ खाने के आदी रहे हैं। हमारे घर का वड़ा अपने आप में भी लाल और हरी मिर्च से भरपूर होता है। बहरहाल, हमने बुधवारपेठ तक मटरगश्ती की और एक होटल में पूरी-सब्जी का आनंद लिया।
जिस इलाके में मैं रुका हूँ वहां जवाहिरात की खूब दुकाने हैं। इन दुकानों पर ज्योतिषियों की तस्वीर वाले बड़े बड़े होर्डिंग लगे हैं मोफत सल्ला। रत्न-जवाहिरात खरीदनेवाले लोगों को दुकानदार खुद ही ज्योतिषियों के ज़रिये मुफ्त सलाह दिलवाते हैं। इस तरह उनकी बिक्री बढ़ती है। ज्योतिषीय सलाह की यह होड़ अब समूचे महाराष्ट्र में फैल रही है। लोग भी इसे पसंद करते हैं क्योंकि इस तरह अपने ज्योतिषी महाराज का शुल्क उन्हें अदा नहीं करना पड़ रहा है। होर्डिंगों में ज्योतिषी बड़े ठसके के साथ बैठे नज़र आते हैं, उतना ही ठसका उनका दुकान के भीतर भी नज़र आता है। मराठी महिलाएं गहने, जिसे मरराठी में दागिणे कहा जाता है, खूब बनवाती हैं। गहनों का यह शौक इतना ज्यादा है कि फूलों के गहने भी खूब पहने जाते हैं। फूलों के गहने, यानी पुष्पसज्जा। जगह जगह पर गजरों की दुकाने हैं। अपना कैमरा हम भोपाल में ही भूल आए हैं, जिसका अफ़सोस है। फ़िलहाल सेलफ़ोन से ली एक दो तस्वीरें ही दिखा रहे हैं।

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Thursday, November 4, 2010

तालियां, जोरदार तालियां-दीपावली की शुभकामनाएं

VMT_1[1][5]विजय मनोहर तिवारी

[शब्दों का सफ़र के पाठकों के लिए दीवाली की यह बधाई भेजी है वरिष्ठ पत्रकार-लेखक विजय मनोहर तिवारी ने। पुस्तक चर्चा स्तम्भ के जरिए सफ़र के साथी उनसे परिचित हैं। इस बधाई में जिन नामों से पाठक अपरिचित हैं, उनके चरित्र के बारे में गूगल पर जानकारियां उपलब्ध हैं।]
Diya-Diwlaनेता मसरूफ हैं। अफसरों को भी सांस लेने की फुरसत नहीं। सरकारी नौकर-चाकर भी दिन-रात लगे हैं। देश बड़ा है। सेवा आसान नहीं। सब मिलकर कर रहे हैं। देश की सेवा। जनता देश में ही रहती है। इसलिए जनता की सेवा भी हो जाती है। सब साहब लोग त्योहार के वक्त भारी व्यस्त हैं। दीपावली पर शुभकामना संदेश और तोहफे मेरे पास रखकर भूल गए। चलिए, मैं ही सबको दिए देता हूं। तालियां बजाते जाएं। हौसला बना रहेगा...
Diya-Diwlaहली शुभकामना दूर-देहात के बच्चों को। वे बच्चे जो सचिन और सानिया जैसे बनना चाहते हैं। दम है इसलिए ख्वाहिश है। पर हालत की पूछिए मत और हालात जाकर देखिए। न मैदान, न कोच। न सडक़, न बिजली। कोई बात नहीं। रात के बाद सुबह होती है। सपने देखो। बड़े सपने। वी केन डू एवरीथिंग। पता है ये किसकी शुभकामना है? माननीय सुरेश कलमाड़ी की। तालियां...
Diya-Diwlaर वो कारगिल वाले पीछे क्यों हैं? लीजिए ये गुलदस्ता। मुबारक हो। अरे, आंखों में आंसू? कोई याद आ गया। तो रोइए मत, सिर ऊंचा करिए। वे देश के लिए शहीद हुए। हमें उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। वो बहादुर थे। हमें आप पर गर्व है। ये लीजिए ताजे फूलों का गुलदस्ता। अब पूछिए ये किसने भेजा? नहीं मालूम? मुंबई से अशोक चव्हाण ने। महाराष्ट्र के महामुख्यमंत्री हैं वे। तालियां...
Diya-Diwlaवो पीछे डरे-सहमे कौन खड़े हैं? अच्छा-अच्छा, कश्मीरी पंडित हैं। आगे आओ भाई। आप ये दीए ले लो। जलाओ इन्हें। सुना है दीपावली में दीप भी है और अली भी? यह गंगा-जमुनी संस्कृति बेमिसाल है? दीप और अली। मुबारक हो। जलाओ न दीप। जानते हो इतनी मोहब्बत से ये दीप-बत्ती कौन भेज रहा है? ये श्रीनगर से गिलानी साहब ने दिल से भेजी है। जोरदार तालियां...
Diya-Diwlaदानिशमंदों से गुजारिश है कि वे आतिशबाजी लेने आगे आएं। हैप्पी दिवाली। आपको कहने की पूरी आजादी है। अरे भई हक है आपका। हां-हां कहिए। कुछ भी कहिए। कह दीजिए कि नार्थ-ईस्ट पर इंडिया का कोई हक नहीं। आतिशबाजी लीजिए। कुछ कह भी दीजिए और इसका मजा लीजिए। ले भी लीजिए। बड़े जतन से भेजी हैं मोहतरमा अरुंधति राय ने। तालियां...
Diya-Diwlaब संघ वाले पथ संचलन करें। फूलों के वंदनवार आपके लिए। दीपपर्व पर शुभकामनाएं। मायूस हैं आप? अच्छा इंद्रेशजी। गनीमत समझो। अभी चंद्रेशजी, नंद्रेशजी, गिरजेशजी, अवधेशजी के नाम नहीं जुड़े। हमें क्या जोडऩा ही तो है। भटकते रहिए अदालत में आप। अदालत में हमारी आस्था है। यहां मामले जरा लंबे ही चलते हैं। ये स्पष्ट संदेश है चिदंबरम् साहब की जानिब से। तालियां...
Diya-Diwlaकौन गांव के गरीब। आगे आ जाओ। रास्तो दो इन्हें। हमारे अन्नदाता हैं ये। इन्हेंं साहब ने मिठाइयां भेजी हैं। मेमसाब ने खुद बनाई हैं। लीजिए। मुबारक हो। भैया साब-मेमसाब के लिए दुआएं करना। भगवान से प्रार्थना करें कि वे मुसीबतों से निजात पाएं। अरे उन्हें नहीं जानते? सुनो तो सही, ये डिब्बे आए हैं भोपाल के श्रीमान् अरविंद जोशी और श्रीमती टीनू जोशी के बंगले से। तालियां...
Diya-Diwlaक्या पांडाल में लाचार मरीज भी हैं। आओ, आओ। आराम से आगे आ जाओ। आपको हुजूर ने दवाएं भेजी हैं। पार्टनर की फैक्टरी की ही बनी हैं। आपकी सेहत उम्दा हो जाएगी। पांच नई स्कीमें आ रही हैं सेंट्रल से। ये लीजिए भारी पैकेट है। घर भर के लिए दवाएं। दीवाली मुबारक। पैकेट पर तो पढि़ए डॉक्टर योगीराज शर्मा का नाम लिखा है। भूल गए क्या? जोरदार तालियां...
Diya-Diwlaखिरी बधाई भोपाल के गैस पीडि़तों को। एक लिफाफा है। शायद ग्रीटिंग है। अरे वाह। क्या लिखा है कसम से। आप खुशनसीब हैं, जो भारत में जन्में। एक प्राचीन सभ्यता, एक महान् देश। वीरों और महावीरों की भूमि। तीज-त्योहारों के देश में हे मनुष्य, आपको नमन् है। क्या भाषा है। मोतियों से अलफाज। पर भेजा किसने है? न्यूयार्क से? अच्छा वॉरेन मार्टिन एंडरसन साहब हैं। तालियां...
Diya-Diwlaरे ये ढेर तो बहुत बड़ा है। देखिए, इतनी व्यस्तता के बाद भी सज्जनों ने शुभकामनाएं भेजी हैं। बाकायदा लैटरहेड पर। कई तो राजकीय चिन्ह वाले लिफाफों में। इन्हें फाइलों में रखना। पहले किसी ने भेजे थे? पीढिय़ां याद रखेंगी। गर्व करेंगी। अपने पूर्वजों पर। महान् पूर्वज। ऐसे पूर्वज जिन्हें बड़े-बड़े लोग शुभकामनाएं भेजा करते थे। बधाई। एक बार फिर जोरदार तालियां...

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