Friday, January 1, 2010

नववर्ष-1 / बारिश में स्वयंवर और बैल

8375 ...वर और वृषभ की तुलना करें तो वृषभ जहां दलपति है, वहीं वर सिर्फ पति है...दलपति के रूप में बैल छुट्टा सांड है जबकि वर जोरू का गुलाम है… 
का ल गणना का एक प्रसिद्ध मानक या इकाई है वर्ष जिसका अर्थ है बारह महीनों का समूह। शब्द का जन्म संस्कृत के वर्ष: या वर्षम् से हुआ। इन दोनों शब्दो का अर्थ है बरसात, बौछार या मेघवृष्टि। एक अन्य अर्थ है बादल जो बरसात से ही जुड़ता है। दरअसल प्राचीन समय में कालगणना में ऋतुओं ने ही मानव की मदद की । एक वर्षा के बाद दूसरी वर्षा का समय आने पर मनीषियों ने इस मध्यावधि को वर्ष के रूप में जाना-समझा और इसका उल्लेख किया। वर्षा से ही बने हैं बरखा, बरसात, वर्षात और बारिश जैसे रूप। वर्षम् या वर्षः शब्द के मूल में वृष् या वृ धातु है जिसमें शक्ति, ऊपर उठना, तर करना, अनुदान देना, बौछार करना आदि। इसमें इन्द्र का भाव भी है और इसीलिए उसे वर्षा का देवता भी कहा जाता है। मूलतः इस धातु में शक्तिवान होने या उत्पन्न करने का भाव है। वृष् का पूर्व रूप वर् था जिसमें ऊपर उठने, चुनने, वितरित करना, नियंत्रित करना जैसे भाव हैं। प्राचीन काल से ही मनुष्य ने प्रकृति के सभी रूपों में शक्ति को अनुभव किया। आसमान से बरसते पानी पर उसे आश्चर्य होता था। गरमियों में जलाशयों का रीत जाना, आसमान में बादलों का बनना और फिर बरसने जैसी क्रियाओं का अन्तर्संबंध जब उसे समझ में आया तो वाष्प के रूप में भारी जल राशि के ऊपर उठने जैसी क्रिया में निहित शक्ति का उसे अनुभव हुआ। वाष्पीकरण की क्रिया में पृथ्वी से जल कणों के चुने जाने को हम समझ सकते हैं। वर् में निहित ऊपर उठने का भाव यहां स्पष्ट है। जलकणों का बादलों में संघनित होना और फिर उनका बरसना दरअसल वितरण ही है। स्पष्ट है कि वर्षा शब्द का रिश्ता मूलतः वृ धातु से है। बारिश के संदर्भ में वृष्टि, अतिवृष्टि या अल्पवृष्टि जैसे शब्द भी हिन्दी में प्रचलित हैं जो इसी मूल से आ रहे हैं।
हिन्दी-संस्कृत में वर् धातु से बने वर शब्द के कई रूप और अर्थ प्रचलित है। वर के सबसे प्रचलित अर्थरूपों में एक है वर का पति रूप। जीवनसाथी के रूप में कन्या खुद अथवा उसके परिजन उचित पात्र को चुनते हैं। वर् में निहित चुनाव या चुनने का भाव साफ है। वरण, स्वयंवर जैसे शब्द भी इसे स्पष्ट करते हैं। वर का दूसरा अर्थ है कुछ मांगना या पाना। इससे बना है वरदान यानी किसी अभीष्ट की आशा में शक्तिवान, ईश्वर, ऋषि-मुनि आदि से कुछ मांगना या प्राप्त करना। वरदान दरअसल एक किस्म की सिद्धि या उपलब्धि होती है। यहां वर् में निहित वितरित करने, देने अथवा सामर्थ्य का बोध हो रहा है। बारात या बरात शब्द की रिश्तेदारी भी इसी शब्दसमूह से है जो बना है वरयात्रा से। sunrise इसके अलावा वरेण्य, वरमाला भी इसी कड़ी में है। महान, पूज्य, उत्तम, गुरुतर या अपने से बड़े के लिए हिन्दी में वरिष्ठ शब्द प्रचलित है। इसके मूल में भी वर् धातु ही है। स्पष्ट है कि ज्ञान और चरित्र में श्रेष्ठ व्यक्ति को समाज में ऊंचा स्थान मिलता है। ऊंचा स्थान में ऊच्चासन में विराजमान होने का भाव है। प्रचीनकाल में वरिष्ठ के बड़े या विशाल जैसे अर्थ भी थे और इस शब्द में लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई जैसे आयाम भी शामिल थे मगर आज वरिष्ठ का अर्थ सिर्फ पद या आयु के संदर्भ में गुरुतर व्यक्ति से है। वरिष्ट व्यक्ति विशिष्ट अधिकार और शक्तियां भी रखता है, यह तय है।
प्राचीन काल से बैल को शक्ति का प्रबल प्रतीक समझा जाता है क्योंकि इसके जरिये ही मनुष्य कृषि जैसे श्रमसाध्य कार्य को एक पावन-संस्कृति का रूप दे पाया। अन्न कणों को उपजाने का श्रम समूची मानवता को धन्य करनेवाला होता है। शक्तिवान होने के संदर्भ में ही वृ धातु से ही संस्कृत में बैल के लिए वृष या वृषभ शब्द बना। हालांकि बैल का अर्थ वृषभ में बाद में स्थापित हुआ सर्वप्रथम तो इसका अर्थ दलपति, किसी समूह का नेता या मुखिया था जिसमें सर्वोच्चता या वरिष्ठता का भाव है। वृष का अर्थ कामदेव भी है और शिव का वाहन नंदी भी वृष ही कहलाता है। शिव को वृषपति भी कहते हैं। विष्णु के हजार नामों में एक नाम वृषः भी है। उन्हें वृषभाक्ष या वृषप्रिय भी कहा गया है। पाण्डुरंग राव सहस्रधारा में लिखते हैं कि संसार के कण-कण को ईश्वर ध्यान और बारीकी से देखते हैं। धर्म की निर्मल धारा और सत्य के प्रकाश से सजे उनके नेत्रों को इसीलिए वृषभ कहा गया है। सामान्य तौर पर वृषभ का अर्थ बैल होता है पर यहां वृष अर्थात बरसानेवाले और भा यानी प्रकाशतत्व का संकलित रूप समझना चाहिए। बैल को धर्म का प्रतीक समझा जाता है तथा बैल की पुकार सुनकर ही बादल बरसते हैं। व्याख्या यही है कि जहां धर्म है, वहां ईश्वर है। सूर्य की राशियों में एक राशि का नाम भी वृषभ है। कृष्णचरित्र में राधा का उल्लेख कई बार वृषभानुजा, वृषभानुकन्या, वृषभानुसुता या वृषभानुनंदिनी के रूप में आया है। राधा के पिता का नाम वृषभानु था इसलिए वे इन विशेषणों से भी उल्लेखित हैं। वृषभ का ही एक रूप रिषभ या ऋषभ है। हिन्दी की कुछ बोलियों में इसे रिखब  भी कहते हैं। इसमें दलपति, प्रमुख या परम पूज्य व्यक्ति का अर्थ निहित है। वर और वृषभ की तुलना करें तो वषभ जहां दलपति है वहीं वर सिर्फ पति है। दलपति के रूप में मुखिया निरंकुश हो सकताहै मगर वर यानी चयनित प्राणीके रूप में पति सचमुच बैल की भूमिका में ही गृहस्थी के कोल्हूं में जुतता है। दलपति के रूप में बैल छुट्टा सांड है जबकि वर जोरू का गुलाम है।
[अगली कड़ी में भी जारी]

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17 कमेंट्स:

sidheshwer said...

मेरे प्रिय ब्लाग पर नए वर्ष की पहलॊ पोस्ट और 'वर्ष', 'वर' 'बारिश' की चर्चा से जानकारी में इजाफा !
यह अच्छी शुरुआत है।
नया साल शुभ हो अजित दद्दा!

मनोज कुमार said...

आपको नव वर्ष 2010 की हार्दिक शुभकामनाएं।

संगीता पुरी said...

अच्‍छी जानकारी .. आपके और आपके परिवार के लिए भी नया वर्ष मंगलमय हो !!

Devendra said...

वर और वृषभ की तुलना करें तो वषभ जहां दलपति है वहीं वर सिर्फ पति है।
---आपके ब्लाग को रोज पढ़ता हूँ यह मानकर कि शब्दों के डाक्टर के पास कवि को रोज ही जाना चाहिए।
नववर्ष मंगलमय हो।

S B Tamare said...

नया साल २०१० मुबारक हो !

उम्मीद ही नहीं विशवास है नया वर्ष आपके और आपके परिवार के लिए खुशियों भरा होगा /

साल दो हजार दस , नहीं कहेगा खुशियाँ और नहीं बस !

थैंक्स!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

उम्दा सफर है जी यह भी।
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

वर जोरू का गुलाम है
साल के पहले दिन एक सच को आत्मसात करता हूँ

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

अजित जी आपको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाये.
सुख आये जन के जीवन मे यत्न विधायक हो
सब के हित मे बन्धु! वर्ष यह मंगलदयक हो.

(अजीत जोगी की कविता के अंश)

िकरण राजपुरोिहत िनितला said...

हुकुम बहुत बढ़िया पोस्ट .बेचारे बैल की तो गृहस्थी कभी हुई नही पर दूसरो की गृहस्थी का भार युगों युगों से उसके कंधे है .घोर विडम्बना है .

सुलभ सतरंगी said...

सफ़र के सभी सदस्यों को मेरा सादर नमस्कार
नववर्ष की बधाई एवं शुभकामनाओं सहित
- सुलभ

सुलभ सतरंगी said...

नया वर्ष नयी उम्मीदों
नयी तैयारियों के नाम
नूतन उत्साह और
नवीन चेतना के नाम

पराजय की घड़ी में भी
विजय के सपनों के नाम
लगातार चलते रहने की
जीवटता के नाम
सतत प्रयासों और
संघर्षों के नाम

हिमांशु । Himanshu said...

नव वर्ष की पहली प्रविष्टि ने फिर वही काम किया ! हर बार की तरह हमें अचम्भित करती शब्द सम्पदा का बखान किया !

नये वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ।

डॉ टी एस दराल said...

Ajit ji, आपको एवम आपके समस्त परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें।

डॉ. मनोज मिश्र said...

नववर्ष की बहुत बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ!

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

नये वर्ष की शुभकामनाओं सहित

आपसे अपेक्षा है कि आप हिन्दी के प्रति अपना मोह नहीं त्यागेंगे और ब्लाग संसार में नित सार्थक लेखन के प्रति सचेत रहेंगे।

अपने ब्लाग लेखन को विस्तार देने के साथ-साथ नये लोगों को भी ब्लाग लेखन के प्रति जागरूक कर हिन्दी सेवा में अपना योगदान दें।

आपका लेखन हम सभी को और सार्थकता प्रदान करे, इसी आशा के साथ

डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

जय-जय बुन्देलखण्ड

Baljit Basi said...

१. "बैल की पुकार सुनकर ही बादल बरसते हैं।" यह शब्द थोडा भ्रम पैदा करते हैं क्योंकि पहले आप इस शब्द की व्युत्पति वृष् या वृ से बता चुके हैं.
२.इस मूल से बने शब्द थोडा गिराने या ल्म्काने के भाव भी देते हैं, खास तौर से पंजाबी में. लाठियां बरसाई जाती हैं, इस के आगे पंजाबी में वराना शब्द है जिस का सीधा अर्थ कुएं से गिराना या लटकाना है जसे डोल, रज्जू, आदमी आदि को.
३.वरना या वर कर ले जाने का भाव लड़की को शादी कर के ले जाना है , अजीब बात है मांगती लड़की है लेकिन लड़की को वर बना कर लड़का ले जाता है.
४. पंजाबी में सगाई के लिए मंगनी शब्द है जो वर के मांगने वाले अर्थ की पुष्टि करता है.
५. बोछाड, वछाढ़, बुछाढ़ आदि शब्द भी इसी से बने लगते हैं.
६.मैं ने कहीं पढ़ा है कि वैदिक मूल वक्शा, ज़ेन्द. में उक्षा बना जो आगे अंग्रेजी में ओक्स बन गया.लेकिन यह स्रोत अंग्रेजी बुल और हमारे बैल को भी इसी से बांधता है.

अजित वडनेरकर said...

@बलजीत बासी
1) भ्रम की कोई बात नहीं है बलजीतभाई। ये संस्कृत साहित्य के प्रख्यात विद्वान पांडुरंग राव की व्याख्या है।
2) पंजाबी में वर् की उपस्थिति के जो उदाहरण आपने दिए हैं, वे इस पोस्ट को समृद्ध करनेवाले हैं।
3)आप जिस ओर संकेत कर रहे हैं वह सब भारतीय संस्कृति में प्रदूषण आने के बाद के लोकाचार हैं। पूर्व वैदिक काल में गंगा से वोल्गा तक के क्षेत्र में पसरी आर्य संस्कृति में मातृसत्तात्मक समाज था। महिलाएं ही खुद के लिए पुरुष-समूह से उचित साथी को चुनती थीं। यह विवाह संस्था के जन्म से भी पहले का दौर था। भाषा के संदर्भ में हम हमेशा ही वैदिक युग पर अटक जाते हैं। ऐसा नहीं है। इसीलिए विद्वानों को पूर्व वैदिक युग की ओर ध्यान दिलाना पड़ा। सबकुछ रातों रात नहीं हो गया था। निश्चित ही पूर्ववैदिक युग की भाषा भी थी जो वैदिकी की तुलना में कहीं कमतर नहीं थी। इसी लिए प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की कल्पना की गई। सभ्यता के विकास-क्रम में स्त्री पराधीन तो बहुत बाद में हुई।
4)5)6) के बारे में आप बिल्कुल सही हैं। वक्षु न होकर संस्कृत में यह वंक्षु है। इसे फारसी, उर्दू में आमू दरिया लिखा जाता रहा है। ओक्सस मूलतः वंक्षु या इसके ईरानी-रूसी उच्चारण का ग्रीक रूपांतर था। बाद में यह अंग्रेजी में गया।

नीचे दिया गया बक्सा प्रयोग करें हिन्दी में टाइप करने के लिए

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