Wednesday, December 5, 2007

आप मियाँ फ़ज़ीहत, दीगराँ नसीहत

शब्दकौतुक/दीगर

इतिहास, व्युत्पत्ति और साहित्यिक परंपरा

हिंदी भाषा की समृद्ध विरासत में कई ऐसे शब्द समाहित हैं जिनके पीछे गहरे भाषाई और सांस्कृतिक कारक निहित हैं। "दीगर" भी ऐसा ही एक शब्द है, जिसका अर्थ अन्य, दूसरा या अगला के रूप में देखा जाता है। फ़ारसी तर्ज की एक कहावत आप मियाँ फ़ज़ीहत, दीगराँ नसीहत अर्थात آپ مِیاں فَضیحَت، دِیگَر ان نَصیَحت से अधिकांश हिन्दी-उर्दू वाले परिचित हैं। इसमें "दीगर" का प्रयोग अन्य व्यक्ति, अथवा दूसरे लोगों के संदर्भ में किया गया है। तो शब्दों का सफ़र में इस बार 'दीगर' शब्द की उत्पत्ति और इंडो-इरानी भाषाओं में इसके प्राचीन संबंधों के बारे में जानने का प्रयास करते हैं।

प्राचीन जड़ों की झलक

हिंदी में प्रयुक्त "दीगर" शब्द फ़ारसी के रास्ते आया। इसकी जड़ें इंडो-इरानी भाषाओं में खोजी गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह शब्द अवेस्ता के द्वा, दुवो, दुवितिआ से सम्बद्ध है जो कि "दूसरा" के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसके मूल तत्व dwi का अर्थ "दोहरा" होता है, जो प्रोटो-इंडो-यूरोपीय dwi- से व्युत्पन्न माना जाता है। ग़ौरतलब है संस्कृत में "द्व", "द्वौ", "द्वे", और "द्वि" आदि में संख्यात्मक भाव है और ये दो के विभिन्न रूप हैं। तो इसी कड़ी में आता है संस्कृत द्वितीय शब्द। विभिन्न शब्दकोशों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि "द्वितीय" शब्द का उपयोग अनेक संदर्भों में किया जाता है—व्याकरण, परिवार संरचना, समय गणना, मित्रता, और ध्वनि विज्ञान में। यह हिंदी एवं संस्कृत दोनों में बहुआयामी शब्द के रूप में जाना जाता है। मूलतः इसमें भी दूसरा, अन्य, सहचर, साथी, मित्र, शत्रु, दूसरा भाग आदि। ऊपर इसी द्वितीय के अवेस्ताई रूप दुवितिया का उल्लेख आया है।    

दिगर-बारगी या दीगर-बार

द्वितीय शब्द का दीगर से गहरा सम्बन्ध है। जिसका शाब्दिक अर्थ "दूसरा" या "दूसरा भाग" होता है। फारसी में "دیگر" शब्द भी इसी मूल से जुड़ता है, जिसका अर्थ होता है "अन्य में से एक"। इस प्रकार "दीगर" का मूल स्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप में ईरान के भाषायी प्रभाव को दर्शाता है। दीगर से जुड़े कुछ अन्य सर्ग, मुहावरे आदि भी हैं जो बोलचाल से लेकर साहित्यिक हिंदी में विद्यमान हैं। दिगर-बारगी या दीगर-बार का आशय भी दूसरी बार होता है। यह दर्शाता है कि कैसे भाषाओं के आंतरिक विकास में कालक्रम के साथ-साथ विभिन्न सांस्कृतिक बदलावों की छाप भी होती है। चतुर्वेदी-मैकग्रेगर समेत हिंदी के अधिकांश कोशों में दीगर शब्द अपनी फ़ारसी पहचान के साथ दर्ज है।

बहुआयामी प्रयोग

हिंदी साहित्य एवं शब्दकोशों में "दीगर" का "दिगर" भी प्रचलित है। उदाहरण स्वरूप हिन्दी शब्दसागर में दिगर रूप देखने को मिलता है। इसका प्रमाण संपादकों ने संभवतः आईने अकबरी की पंक्तियों से दिया है- "बाबर न बरोबर बादशाह, मन दिगर न दीदम..."। कुछ कोशों में इस शब्द का प्रयोग "अगला", "पिछला" या "अन्य" के रूप में किया जाना बताते हैं। इन उदाहरणों से ज़ाहिर है कि इसका बहुआयामी अर्थ विकसित हुआ है, जो संदर्भ और शैली के अनुसार बदलता रहता है। भारतीय उपमहाद्वीप में भाषाई आदान-प्रदान के दौरान फारसी और अरबी दोनों का प्रभाव दिखता है, लेकिन अधिकांश शब्दों के बोल-व्यवहार व वर्तनी पर फ़ारसी शैली की छाप है। "दीगर" शब्द की ध्वनि और संरचनात्मक विशेषताएँ स्पष्ट रूप से फारसी मूल की ओर इंगित करती हैं।

फारसी और अरबी भाषाई प्रभाव

हालाँकि हिन्दी को दीगर शब्द फ़ारसी की देन है और इसी अर्थ में अन्य शब्द हिन्दी के पास पहले से रहा है। चूँकि हिन्दी में अरबी भी फ़ारसी के ज़रिए ही आई है, सो अरबी में दीगर के पर्याय के बारे में भी बात कर लेते हैं। जहाँ हिंदी में "दीगर" शब्द का प्रयोग प्रायः "अन्य" या "दूसरा" के अर्थ में होता है, वहीं फारसी में भी "दीगर" इन्हीं अर्थों के साथ-साथ Another, other, more; the rest; over again; near; besides, further, moreover; again; some; any more, any longer; hitherto; afternoon, evening (Steingass) आदि अर्थछायाओं में भी प्रयुक्त होता है। दूसरी ओर, अरबी भाषा में दीगर का पर्याय ग़ैर "غیر" है, जैसे ग़ालिब का शेर: ग़ैर फिरता है लिए यूँ तिरे ख़त को कि अगर, कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाए न बने ग़ालिब ग़ैर के ज़रिए यहाँ उसी अन्य अथवा दूसरे का हवाला दे रहे हैं जो दीगर में भी मिलता है। यूँ भी फ़ारसी से अरबी में जाने वाले शब्दों की तुलना में अरबी शब्दसंपदा का फ़ारसी की ओर प्रवाह तेज रहा है।

अवेस्ताई में 'द्वितीय' के प्राचीन रूप

दीगर के जन्मसूत्र भारत और ईरान के भाषिक व्यवहार के प्राचीन स्तरों तक जाते हैं। फ़ारसी की पुरखिन अवेस्ता के साहित्य में संस्कृत के ‘द्वितीय’ का रूपभेद दाइबिती के रूप में मिलता है। जिसका अर्थ भी द्वितीय, दूसरा है। गाथा-अवेस्ता के सूक्त 45:1 की महत्वपूर्ण सीख है- नोइत् दाइबीतीम् दुष्सस्तीश् अहूम् मर्ग्षीअत् इसमें दाइबितीम् शब्द ‘दूसरी बार’ के आशय से प्रयुक्त है। सूक्त का भाव यही है कि बुराई बार-बार सत्य की रोशनी को ढक नहीं सकती। संसार का अस्तित्व सत्य पर आधारित है, जीत उसी की होगी।

दीगर की व्युत्पत्ति विवेचना

अब थोड़ी तसल्ली से दीगर की व्युत्पत्ति के बारे में भी बात कर ली जाए। फ़ारसी के दीगर की रिश्तेदारी अवेस्ता दुवितिआ/दिबितीम् से जुड़ने के संदर्भ में यह प्रश्न सहज ही उठता है कि अवेस्ताई द्वा, दुवो, दुवितिआ, दिबितीम् (द्वितीयम्) का बदलाव दीगर "دیگر" कैसे हो गया। यानी 'द्वि' से 'दी' होना तो समझ में आता है। यह तो स्पष्ट है कि संस्कृत के द्वितीया का ही रूपभेद अवेस्ता का दुवितिआ है। समस्या यह है कि दीगर में निहित दुवितिआ के किन वर्णों का रूपांतर '' और '' में हुआ अथवा किन ध्वनियों को धकेल कर ‘दुवि’ के बाद '' और '' का आगमन हुआ। इसका भेद मध्यकालीन फ़ारसी यानी पहलवी के दुदीगर से खुलता है।

दुदीगर से दीगर

भाषाविज्ञानियों ने इसी दुदीगर पर ध्यान लगाया और प्रोटो ईरानी में द्वितीयकारा शब्द का रिकंस्ट्रक्शन किया और बात आसान हो गई। इसे यूँ समझ सकते हैं कि प्रोटो ईरानी के किसी स्तर पर पहला परिवर्तन – "द्वितीय" से "दी" हुआ। शब्द के दूसरे भाग में "karah" स्वरूप प्रत्यय है, जो कर्म करने या क्रिया करने के अर्थ से जुड़ा हुआ है। मौखिक उच्चारण की सहजता के लिए और ध्वनि नियमों के अनुसार, "कार" का ‘क’ शिथिल होकर ‘ग’ में बदल गया है। इसी कारण "कार/कर" के स्थान पर "गर/गार" प्राप्त होता है। इन दो स्तरों पर जो बदलाव हुए उसकी वजह से अवेस्ताई दुवितिआ-कार से पहलवी में दुदीगर रूप प्राप्त होता है जिससे विकसित होकर आज की फ़ारसी में दीगर उभरता है।

तो कुल मिलाकर...

"दीगर" की व्युत्पत्ति एक लंबी और दिलचस्प भाषाई यात्रा का परिणाम है, जो संस्कृत से लेकर प्रोटो-ईरानी, फिर पहलवी और अंततः आधुनिक फ़ारसी तक फैली हुई है। "दुदीगर" का "दीगर" में परिवर्तन एक स्वाभाविक ध्वन्यात्मक विकास है। "दुदीगर" का अवेस्ता के "दुवितिया-कारा" जैसे किसी प्रोटो रूप से विकसित होने की सैद्धांतिकी भाषाई इतिहास की एक सुसंगत कड़ी बन जाती है।


अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

काफिर वह जो नाशुक्रा

भारत में आम धारणा रही है कि काफिर हर वो इन्सान है जो इस्लाम को नहीं मानता । या यूं कहें कि मुसलमानों की निगाह में गैर इस्लामी व्यक्ति काफिर है। जो भी हो, काफिर लफ्ज को खराब माना जाता है। हकीकत ये है कि काफिर शब्द के मायने हैं इन्कार करने वाला, सत्य को छुपाने वाला। यह बना है अरबी लफ्ज़ कुफ्र से जिसके मायने होते हैं इनकार , अस्वीकृति वगैरह। कृतघ्नता दिखाना या नाशुक्रापन दिखाना भी इसमें शामिल है। बाद में इसे पाप से जोड़कर देखा जाने लगा। दरअसल ये शब्द किसी न किसी रूप में धर्म , ईश्वर या सर्वोच्च सत्ता के लिए स्वीकार या नकार के संदर्भ में ही सामनें आए हैं। इसे हम हिन्दू दर्शन में समाहित अस्ति और नास्ति जैसे भावों से समझ सकते हैं। आस्तिक और नास्तिक शब्द इससे ही बने हैं। भारत में जब इस्लाम का प्रवेश हुआ तब जबर्दस्ती इस्लाम कुबूल करवाने की चेष्टाएं भी शासक वर्ग की ओर से की गईं। जिन्होने इन्कार किया वे काफिर कहलाए। जाहिर है इस अर्थ में गैर मुस्लिमों को काफिर कहना कुछ गलत नहीं था। और इसी नजरिये से समझना चाहें तो हिन्दुओं की निगाह में सभी गैर हिन्दू काफिर हो सकते है और ईसाइयों की निगाह में सभी गैर ईसाई भी काफिर हो सकते है। कश्मीर के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र के एक इलाके का नाम काफिरिस्तान है(इसे कुफ्रिस्तान भी कहा जाता है)। यह इलाका अब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच का विवादित क्षेत्र है। इसके नाम से जाहिर है कि इस्लाम के प्रभाव में न आने की वजह से किसी समय इस पूरे इलाके को ही हमलावरों ने यह नाम दे दिया होगा। आने की वजह से किसी समय इस पूरे इलाके को ही हमलावरों ने यह नाम दे दिया होगा। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, December 4, 2007

परचून की पैदाइश से उपेन्द्रनाथ अश्क तक

पंसारी का निकटतम चलताऊ विकल्प है परचूनी या परचूनिया। अर्थात् वह आदमी जो नून, तेल , मिर्ची, आटा, चावल बेचे। यह शब्द बना है संस्कृत के परचूर्णम् से जिसका मतलब है विभिन्न प्रकार के द्रव्यों (पदार्थों)
का साधारण अथवा भुना हुआ चूरा। जाहिर है इन पदार्थों में भांति भांति के अनाजों की पीठी, विभिन्न ज़डी-बूटियों का चूर्ण, सुगंधित पदार्थों का चूरा अथवा आटा
वगैरह इसमें आते हैं। आयुर्वैदिक दवाओं का चूरा जो प्रायः हाजमा ठीक करने के काम आता है चूरन या चूरण कहलाता है , इसी चूर्ण का रूप है। चूर्ण में पर उपसर्ग लगने से बना परचूर्णम् जो हिन्दी में हो गया परचून। अब इस परचून में दैनंदिन खानपान की सारी सामग्री आ गई मसलन आटा, दाल, चावल, सत्तू, नमक, मसाले, सुगंधित शृंगार सामग्री, उबटन, दवाएं यानि जिसका भी चूरा हो सके वह सब ।
परचून से ही बन गया परचूनी अर्थात् यह सब सामग्री बेचनेवाला। चूर्ण से ही बना चूर्णः जिसमें भी यही सारे अर्थ समाहित है मगर एक नया अर्थ और जुड़ गया वह है चूना या खड़िया पत्थर। प्राचीन कर्म आधारित समाज में वर्गों के नामकरण
की परंपरा थी। चूने को उपयोग में लाने के लिए पकाना पड़ता है। इस काम को करने वाले को चूर्णकारः कहा जाता था। प्राचीन साहित्यशास्त्र में सरल गद्य रचना की एक शैली का उल्लेख है जिसे चूर्णिका कहा गया है। जिस तरह से कठोर , ठोस पदार्थ पिस कर चूर्ण बन जाते हैं। प्रयोग में सरल , आसान हो जाते हैं उसी तरह के असर की वजह से साहित्य में भी सरल प्रयोग को चूर्णिका कहा गया होगा।

अश्क जी का किस्सा
हिन्दी साहित्य के यादगार बातों में उपेन्द्रनाथ अश्क से जुड़ा हुआ परचूनवाला उल्लेख भी मशहूर है जहां तक मुझे याद है, करीब दो ढाई दशक पहले इलाहाबाद में अश्कजी ने परचून की दुकान खोली। मीडिया ने इसे उनके किसी किस्म के असंतोष या मोहभंग से जोड़ते हुए खबर प्रचारित की । गौरतलब है कि तब का मीडिया राजनीतिक दांव पेंच के साथ साथ साहित्य की अखाड़ेबाजी को भी खबरों में खूब तरजीह देता था। खैर, परचून तक तो बात ठीक थी मगर धन्य है अनुवाद आधारित पत्रकारिता जिसने इसमें सिर्फ चूना देखा और बात चूने की दुकान तक गई। कुछ लोगों को यह चूना सचमुच लाइम नज़र आया और कुछ को नींबू। उर्वराबुद्धि वालों ने इसमें पानी और जोड़ दिया और प्रचारित हो गया कि अश्क जी इलाहाबाद में नींबू पानी बेच रहे हैं। मामला साहित्यकार की दुर्दशा से जुड़ गया । अश्क जी को खुद सारी बातें साफ करनी पड़ी।
तो यही थी परचून की कहानी। कैसी लगी , ज़रूर बताएं।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, December 3, 2007

पंसारी की महिमा और पनवेल

प्राचीनकाल से ही भारत की दुनियाभर में शोहरत मसालों की वजह से रही। मिस्र,अरब, ग्रीस और रोमन साम्राज्यों में भारतीय मसालों की धूम थी। मूलतः वृहत्तर भारत में जो जड़ीबूटियां और वनौषधियां है उन सबको विदेशी लोग मसालों में ही गिनते थे। इन्ही की वजह से पश्चिमी दुनिया के साथ भारत का व्यापार व्यवसाय खूब फलाफूला था। आज के पंसारी और मुंबई महानगरी के पनवेल उपनगर के नामकरण के पीछे ये तमाम कारण है। जानते हैं कैसे।
प्राचीनकाल में व्यापार व्यवसाय के लिए पण् शब्द का चलन था। पण् का मतलब था। लेन-देन, क्रय-विक्रय, मोल लेना, सौदा करना, आदि । शर्त लगाना जैसे भाव भी इसमें शामिल थे। इसी से बना एक अन्य शब्द पणः जिसका मतलब हुआ पांसों दांव लगाकर या शर्त लगाकर जुआ खेलना। चूंकि व्यापार व्यवसाय में शर्त, संविदा अथवा वादा बहुत आम बात है इसलिए इस शब्द में ये तमाम अर्थ भी शामिल हो गए। पण् से ही पणः नाम की एक मुद्रा भी चली जो अस्सी कौड़ियों के मूल्य का सिक्का था। इसी वजह से धनदौलत या संपत्ति के अर्थ में भी यह शब्द चल पड़ा। मकान, मंडी, दुकान या पेठ जैसे अर्थ भी इसमें शामिल हो गए। पण्य शब्द का एक अर्थ वस्तु, सौदा या शर्त के बदले दी जाने वाली वस्तु भी हुआ। इससे बना पण्य जिसका मतलब हुआ बिकाऊ या बेचने योग्य।
व्यापार व्यवसाय के स्थान के लिए इससे ही बना एक अन्य शब्द पण्यशाला अर्थात् जहां व्यापार किया जाए। जाहिर है यह स्थान दुकान का पर्याय ही हुआ। कालांतर में पण्यशाला बनी पण्यसार। इसका स्वामी कहलाया पण्यसारिन्। हिन्दी में इसका रूप बना पंसारी या पंसार। मूलतः चूंकि प्राचीनकाल से ही इन स्थानों पर , जड़ी-बूटियां आदिबेचे जाते रहे इसलिए पंसारी की दुकान को उस अर्थ में भी लिया जाता था जिस अर्थ में आज कैमिस्ट और ड्रगिस्ट को लिया जाता है।
पंसारी से ही बना पंसारहट्टा अर्थात् जहां ओषधियों मसालों का व्यापार होता है। गौरतलब है कि किसी जमाने में भारत के मुख्य कारोबार से संबंध रखने वाला यह शब्द पंसारी आज गली मुहल्ले के एक छोटे से दुकानदार या परचूनवाले से ज्यादा महत्व नहीं रखता है।
पनवेल - मुंबई के उपनगर पनवेल के पीछे भी यही पण्य छुपा है । पण्य अर्थात् बिक्री योग्य और वेल् का अर्थ हुआ किनारा यानी बेचने योग्य किनारा। जाहिर सी बात है यहां बंदरगाह से मतलब है । पश्चिमीतट के एक कस्बे का किनारा अगर व्यापार के काबिल है तो उसे पण्यवेला नाम दिया जा सकता है । यही घिसते घिसते अब पनवेल हो गया है।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, December 2, 2007

सहनशक्ति की चरम सीमा [डाकिया डाक लाया - 5]

वेनिस का मार्कोपोलो करीब सात सदी पहले कुबलाई खान का दरबारी था और उसके नोट्स के आधार पर मॉरिस कॉलिस ने मौले और पैलियट नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद श्री उदयकांत पाठक ने किया है। पेश है पोलो का दिलचस्प वृतांत- सन १२७१ के दौर में चीन के शासक कुबलाई खान की डाक व्यवस्था की अंतिम कड़ी।

class="">संदेशवाहकों के पास सरकार की ओर से दी गई विशेष तख्तियां होती थीं इनके जोर पर वह रास्ते में खाकान के नाम पर जो चाहे
पा सकता था। मसलन अगर उसका घोड़ा गिर पड़ता तो वह राह में मिलने वाले किसी भी व्यक्ति से यहां तक कि बड़े भारी सरदार से भी उसका घोड़ा ले लेता। यह था संदेशवाहकों का रुतबा और संदेश के महत्वपूर्ण होने का असर।इन संदेशवाहकों की सहनशक्ति की तुलना किसी भी सर्वाधिक शक्तिशाली आधुनिक मानक तोड़नेवाले से नहीं की जा सकती। जिस किसी को भी गुड़सवारी का अनुभव हो , वह बता सकता है कि पच्चीस मील घोड़े की सवारी कितनी थका देने वाली होती है । पूर्व में साधारण यात्री के लिए यह फासला एक दिन की मंजिल माना जाता है। पचास मील चल लेना बड़ी बात होती है और बार बार सवारी बदलकर भी सौ मील कर लेना औसत सवार की शक्ति से बाहर की चीज़ है । तब एक रात और दिन में चार सौ मील कैसे तय किया जा सकता है? इसका रहस्य स्टेपी मैदान के मंगोल सवार की थाती है। यह कभी नहीं कहा गया कि रोमन लोगों ने अपनी स़कों और चौकियों को इतनी अच्छी तरह संगठित कर रखा था कि वे अपने पररवाने इतनी जल्दी भेज सकते हों मानों उन्हें ले जाने के लिए उनके पास
मोटरकार हो। फिर भी यह असादारण बात है कि मशीनी सवारियों के आविष्कार से पहले, ज़रूरत पड़ने पर आदमी इतनी ही तेजी से ले जाने वाली प्रणाली ढूंढ लेता था। आगे के वर्णन से यह पता चलता है कि किस तरह से अरब लोगों को दसवीं सदी में हवाई जहाज का पूर्वाभास हो गया था। फातिमा सम्प्रदाय के खलीफा अजीज ने जो काहिरा में रहता था , बालबेक से ताजी चेरियों की इच्छा व्यक्त की । बालबेक रेगिस्तान के पार चार सौ मील उत्तर में था । वहा के वजीर को जब इसकी खबर मिली तो उसने छह सौ पत्रवाहक कबूतर जमा किये और हर एक के पैर में एक चेरी रखकर थैली बंध दी। चेरियां काहिरा में बिल्कुल अच्छी हालत में उसी दिन खलीफा के भोज के वक्त पर पहुंच गईं। डाक पर कुछ और दिलचस्प सामग्री अगली कड़ियों में अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

घोड़ों की टाप और परवाने [डाकिया डाक लाया -4]

पिछली कड़ी में हमने जाना कि किस तरह 1271 के दौर में चीन के मंगोल शासक कुबलाई खान ने डाक व्यवस्था के जबर्दस्त प्रबंध किए थे। उसी कड़ी में मार्को पोलो की डायरी से कुछ और जानकारी लेते हैं। गौरतलब है कि वेनिस का मार्कोपोलो इस कालखंड में कुबलाई खान का दरबारी था और उसके नोट्स के आधार पर मॉरिस कॉलिस ने मौले और पैलियट नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद श्री उदयकांत पाठक ने किया है। पेश है पोलो का दिलचस्प वृतांत-


चौबीस घंटों में चारसौ मील !


पीकिंग और प्रान्तीय शहरों के बीच सामान्य संदेशों के लिए पच्चीस मील दूर तक के स्थान का फासला वही संदेशवाहक रोज़ाना तय करता था। पच्चीस मील के हिसाब से एक संदेशवाहक लगभग दो महीने में दक्षिणी चीन पहुंचता है और बरमा की सीमा पर युन्नान को साढे तीन महीने में। किन्तु अति आवश्यक संदेशों को पहुचाने के लिए यह गति को ई इतनी तेज न थी। ज़रूरी संदेशवाहकों के लिए अलग व्यवस्था थी। चौकियों के मध्य सिर्फ तीन मील का फासला होता था। और उनके बीच भी छोटी चौकियां होती थीं जिनमें संदेशवाहक रहा करते थे। ये संदेशवाहक ज़रूरी संदेश ले जाते । प्रत्येक आदमी अगली चौकी तक तीन मील तय करता । यह फासला इतना ही होता कि वह आधे घंटे में तय कर लेता था ताकि अगली चौकी पर पहुचकर परवाना देने में देर न लगे। संदेशवाहक की कमर में घंटियां लगी रहतीं। ज्योंही घंटियां सुनाई पड़तीं, चौकी का मुंशी दूसरे धावक को तैयार कर देता । इस तरह सरकारी परवाना इस विशाल देश के एक छोर से दूसरे छोर तक धावकों की शृंखला द्वारा ले जाया जाता।
औसतन दिन रात दोनों में ही आठ मील प्रति गंटे का हिसाब रखा जाता जिससे दक्षिणी चीन में सप्ताह भर में तथा युन्नान में बारह दिन में पहुंचना संभव हो जाता। ऐसे अवसर भी होते जब इससे भी तेज पहंचना आवश्यक होता। तब इससे भी तेज गति की आवश्यकता होती। मसलन विद्रोह हो जाने की स्थिति में। मंगोलों ने इसके लिए भी व्यवस्थाएं की ताकि तेज गति सेसंदेश पहुंचाया जा सके जितनी जल्दी आज मोटर द्वारा पहुंचाया जाता है। तीन मील वाली चौकियों पर धावकों के अलावा कुछ घोड़े भी सवारों के साथ जीन कसे तैयार रहते थे। परवाना एक चौकी से दूसरी चौकी तक हर मुमकिन उस गति से भेजा जाता जिस अधिकतम गति पर घोड़े भाग सकते। घुड़सवार घंटियां साथ लेकर चलते ताकि घोड़ा बदलने में वक्त न लगे। रात दिन आदमियों को और घोड़ों को बदलते जाने के क्रम से परवाना चौबीस घंटों में चार सौ मील का फासला तय कर लेता था यानी करीब सातसौ किलोमीटर। यह दूरी और समय आज के ज़माने के हिसाब से भी कम नहीं है। जारी....

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, December 1, 2007

क्या कहता है मार्को पोलो... [डाकिया डाक लाया - 3]


डा क पर पिछली दो कड़ियों में हमने जानने का प्रयास किया कि डाक शब्द की व्युत्पत्ति का आधार क्या हो सकता है। इस संदर्भ मे द्राक् और ढौक शब्द सामने आए। अंग्रेजी के डॉक और बांग्ला के डाक से भी कुछ रिश्तेदारी सामने आई। द्राक् के शीघ्रता और दौड़ना जैसे मायनों और ढौक के पहुंचाना, पाना जैसे अर्थों के संदर्भ में पेश है कुछ और जानकारियां । वेनिस के मशहूर यात्री मार्को पोलो के बारे में मॉरिस कॉलिस की सुप्रसिद्ध पुस्तक मौले और पेलियट का अनुवाद श्री उदयकांत पाठक ने किया है । हिन्दी में यही पुस्तक मार्को पोलो के नाम से सन्मार्ग प्रकाशन ने छापी है। यहां उसी पुस्तक के कुछ अंश दिए जा रहे हैं जिनसे प्राचीन डाक व्यवस्था के बारे में ठोस जानकारियां मिलती हैं। सन् 1271 में मार्कोपोलो अपने पिता और चाचा के साथ चीन रवाना हुआ। उनका सफर सिल्क रूट पर तय हुआ। पोलो तब पंद्रह बरस का था। साढे तीन साल में यह सफर पूरा हुआ। पोलो को चीन के महान मंगोल शासक कुबलाई खान के शासन में सिविल सर्विस में काम करने का मौका मिला । करीब दो दशक तक वह वहां रहा। उसके नोट्स के आधार पर ही उक्त पुस्तक लिखी गई है। इस दिलचस्प विवरण की पहली कड़ी का आनंद लें।

तीन लाख घोडे, दस हजार चौकियां
कुबलाई खान भी रोमनों की तरह साम्राज्य पर नियंत्रण के लिए सड़कों के महत्व को जानता था।राजधानी पीकिंग को इन तमाम स्थानों से जोड़ने के लिए उसने सुदूर इरान और रूस तक सड़को का जाल बिछाया। मंगोलों की मार्ग प्रणाली, उस पर स्थित सरायें, फौजी चौकियां, डाक के घोड़े और थके घोड़ों के बदले नए घोड़े लेना इन सबका इतना अधिक विकास हुआ कि यह सारे शासन का ही एक महत्वपूर्ण विषय बन गया । इन मुख्य उद्देश्यों में से एक यह भी था कि
चीनियों तथा अन्य विजित राष्ट्रों को नियंत्रण में रखा जाए। पोलो इस विषय संबंधी कुछ मनोरंजक विवरण देता है। उसने समूचे चीन में बहुत यात्राएं की थी और वह मार्गों से खूब परिचित था। कुछ स्थानों पर ये मार्ग पहियेदार गाड़ियों के लिए बने थे किन्तु सामान्य घुड़सवारों के लिए उनके अनुरूप मिट्टी की सड़कें थीं। हर पच्चीस मील पर सरकारी चौकी रहती थी जो

यात्रा करनेवाले अफसरों और संदेशवाहकों के लिए सुरक्षित रहती थी। इस इमारत में बढ़िया रेशमी बिस्तर और अन्य आवश्यक चीज़ें भी रहती थीं।

इनमें से प्रत्येक चौकी में एक अस्तबल रहता था जिसमें सरकारी संदेशवाहकों के लिए घोड़े तैयार रहते थे। जिन रास्तों पर शाही डाक बहुत चलती थी उन पर चारसौ घोड़े तक सुरक्षित रखे जाते थे। दूरवर्ती मार्गों पर यह संख्या कम होती और चौकियों के बीच दूरी भी ज्यादा रहती। पोलो अपने विवरण में इन तमाम घोड़ों की संख्या तीन लाख और चौकियों की संख्या दस हजार बताता है। और इस भय से कि उसकी बात पर शायद भरोसा न किया जाए - क्योंकि मंगोल साम्राज्य की विस्तृत दूरियां और विशालता उसके भूमध्यसागरीय पाठकों की कल्पना से परे थीं - वह जोर देकर कहता है कि यह सब व्यवस्था इतने आश्चर्यजनक पैमाने पर और इतनी व्ययसाध्य थी कि उसका वर्णन कठिन है।
....अगली कड़ी में भी जारी






ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें



अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


Blog Widget by LinkWithin